October 09, 2009
भारतीय चाय एसोसिएशन के अध्यक्ष आदित्य खेतान इस बात को लेकर काफी हैरत में हैं कि शायद ही कोई ऐसी जिंस होगी जिसके उत्पादन, लागत और कीमतों पर उत्पादकों का नियंत्रण न हो।
अगर यह मान भी लिया जाए कि अधिकांश उत्पादक अपने चाय के बागानों को बेहतर हालत में रखने का हरसंभव प्रयास करते हैं, लेकिन इसके बाद भी वर्षा और उसके वितरण का चाय के उत्पादन और गुणवत्ता पर काफी हद तक प्रभावित हो जाती है।
मांग में अचानक आई गिरावट के समय इस्पात, एल्युमीनियम और अन्य औद्योगिक जिंसों के उत्पादक इससे निपटने के लिए अपने खर्च में कटौती का रास्ता अख्तियार करते हैं। लेकिन यह काफी दुखद है कि भारतीय चाय उद्योग 2008 तक के पिछले 8 वर्षों में ऐसा कुछ भी कर पाने में अभी तक नाकाम रहा है।
इस अवधि में चाय की कीमतों में आई गिरावट से चाय उद्योग पर काफी असर पडा, वहीं कई बगानों को बंद करने तक की नौबत आ गई। चाय एक ऐसी जिंस है जिसकी आपूर्ति किसी खास सत्र में कीमतों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। विश्व के करीब दो दर्जन देश 3.75 अरब किलोग्राम चाय का उत्पादन करते हैं और इनका कारोबार मुख्यत: नीलामी के जरिये होता है।
उत्पादकों की भूमिका भले ही अहम हो लेकिन जहां तक कीमतों के निर्धारण की बात है उनकी भूमिका उतनी कारगर नहीं हो सकती। भारत में बडी संख्या में छोटे चाय उत्पादकों के चाय की पत्तियों की फैक्टरी खरीदने के साथ ही यहां के चाय उद्योग में संरचनात्मक स्तर पर काफी अनियमितता आ गई और ऐसा 1998 तक पूरे रफ्तार के साथ हुआ।
चाय कारोबार में इन छोटे कारोबारियों के आ जाने से बाजार में चाय की आपूर्ति बढ़ गई, नतीजतन कीमतें काफी कम हो गई, जिससे इस उद्योग की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ा। छोटे उत्पादकों ने बाजार में चाय की अत्यधिक आपूर्ति में कोई कसर बाकी नहीं रखी, हालांकि, पिछले साल से चाय की कीमतों में सुधार जरूर देखा गया है जो श्रीलंका और केन्या जैसे देशों में चाय का उत्पादन अपेक्षित नहीं रहने की वजह से हुआ।
हालांकि, खेतान यह कहने से नहीं चूकते कि इस समय छोटे कारोबारियों के नियंत्रण में बड़ी तादाद में चाय की खेती हो रही है, जो अभी परिपक्व नहीं हुई है। ऐसी स्थिति में अगर उत्पादन पर नियंत्रण किया जाए तो भी अगले पांच सालों में बाजार में चाय की आपूर्ति कम नहीं होने वाली है।
खेतान इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि बाजार में किसी खास समय में चाय किस कीमत पर बेची जाए, इस पर चाय उद्योग का नियंत्रण कभी नहीं स्थापित हो पाएगा। बाजार ही कीमतों का निर्धारण करें, शायद इससे बेहतर विकल्प फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।
लेकिन क्या अब खेतान को नहीं लग रहा है कि श्रीलंका और कीनया में चाय की फसलों को नुकसान पहुंचने से बाजार चाय उत्पादकों को फायदा पहुंचा रहा है और मौजूदा समय काफी लंबे अर्से से धूल फांक रहे सुधारों की गठरी को खोलने का है? इन सुधारों का लक्ष्य 160 साल पुराने इस उद्योग में नई जान डालने की जरूरत है।
कोई भी यह नहीं चाहता कि 12 लाख चाय मजदूरों जिसमें से अधिकांश महिलाएं हैं, उनको किसी भी सामाजिक लाभ से वंचित रखा जाए। हालांकि, चाय कंपनियों के पूरी तरह दबाव में आ जाने से इस भारतीय पेय पदार्थों की प्रर्तिस्ध्दी क्षमताओं से काफी समझौता किया जा रहा है। श्रीलंका को छोड़कर कोई भी देश भारत जैसा उत्पादन पर खर्च नहीं कर रहा है।
यह आवश्यक है कि चाय उद्योग की सेहत अच्छी बनी रहे, क्योंकि यह न सिर्फ मजदूरों के हितों के लिहाज से बेहतर है, बल्कि भारत से होने वाले 2000 किलोग्राम चाय निर्यात के लिए भी यह जरूरी है। देश के कुल चाय उत्पादन में असमका योगदान लगभग 50 फीसदी है।
लेकिन इस राज्य में चाय उत्पादक क्षेत्रों में आतंकवादियों द्वारा लगातार हमले किए जाने से चाय कंपनियों को अपने मजूदरों को सुरक्षा प्रदान करनी पड़ रही है, जिस पर खासा खर्च आ रहा है। अब वह समय आ गया जब केंद्र सरकार को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या असम में चाय उत्पादकों के इस खर्च की भरपाई नहीं की जाए।
चाय सहित प्लांटेशन क्षेत्रों की हालत में सुधार के प्रति सरकार के गंभीर रवैया अख्यितार करने का पता इसी बात से चलता है कि इसके लिए विशेषाधिकार प्राप्त मंत्रिमंडलीय समिति का गठन किया गया है जो संरचनात्मक परिवर्तन लाने की संभावनाओं का पता लगाएगी।
वाणिज्य मंत्री आंनद शर्मा चाय उद्योग को यह बताने नहीं भूलते कि भारतीय चाय कारोबारियों का मुकाबला कीनिया, मलावी और वियतनाम के युवा उत्पादकों से है, लिहाजा चाय की गुणवत्ता और बागानों की सेहत में महत्वपूर्ण सुधार लाए जाने की जरूरत है।
जे थॉमस चाय के आंकड़ों पर नजर डालें तो पाएंगे कि चाय के बागानों की हालत ठीक नहीं है और काफी मात्रा में झाड़ियां मौजूद हैं जो 40 वर्ष या उससे अधिक पुरानी हैं। जाहिर सी बात है कि इससे उत्पादन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। समय की मांग है कि चाय बगानों की गुणवत्ता में सुधार किया जाय हो इस उद्योग में एक बार फिर से जान फूंकने की हरसंभव कोशिश की जाए। (बीएस हिन्दी)
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