नई दिल्ली: संभावित रूप से मजबूत अल नीनो मौसम पैटर्न वैश्विक चीनी उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इसका असर कोको और कॉफी जैसी फसलों की तुलना में चीनी बाजार पर कम असर डालेगा।
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के हवाले से यह जानकारी सामने आई है। अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में 2026-27 की शरद और सर्दियों के दौरान बहुत मजबूत अल नीनो विकसित होने की संभावना 90 फीसदी से अधिक है। अल नीनो आमतौर पर 9 से 12 महीने तक बना रहता है और इसके कारण बारिश तथा तापमान में बदलाव हो सकता है, जिसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ता है।चीनी के मामले में मुख्य मौसम संबंधी जोखिम ब्राजील, भारत और थाईलैंड में उभर रहे हैं। ये तीनों देश दुनिया के प्रमुख चीनी उत्पादक और निर्यातक हैं।
ब्राजील दुनिया का सबसे बड़ा चीनी निर्यातक है। अल नीनो के प्रभाव से साल की दूसरी छमाही में वहां सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है। ज्यादा बारिश के कारण गन्ने की कटाई धीमी पड़ सकती है और गन्ने की गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, पर्याप्त बारिश का एक सकारात्मक पहलू भी है। इससे अगली फसल को बेहतर नमी मिल सकती है और भविष्य में ब्राजील का चीनी उत्पादन बढ़ सकता है। इसलिए ब्राजील में अल नीनो का असर पूरी तरह नकारात्मक नहीं माना जा रहा है।
भारत और थाईलैंड को ब्राजील के विपरीत स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। अल नीनो का संबंध आमतौर पर दोनों देशों में कमजोर मानसूनी बारिश से जोड़ा जाता है।भारत में पहले ही 11 वर्षों में सबसे कम मानसूनी बारिश होने का अनुमान लगाया जा रहा है। बारिश दीर्घकालिक औसत की करीब 90 प्रतिशत रहने की संभावना है।रिपोर्ट के अनुसार, हेजपॉइंट का अनुमान है कि मध्यम स्तर का अल नीनो भारत के चीनी उत्पादन में करीब 10 लाख टन की कमी कर सकता है।
दुनिया में चीनी की कुल निर्यात मात्रा में ब्राजील की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है। इसलिए वैश्विक चीनी बाजार पर अल नीनो का वास्तविक असर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्राजील की फसल कैसी रहती है।यदि ब्राजील में उत्पादन मजबूत रहता है तो वह भारत और थाईलैंड में उत्पादन में होने वाली कमी की भरपाई कर सकता है। ऐसी स्थिति में वैश्विक चीनी कीमतों में लंबे समय तक तेजी आने की संभावना सीमित हो सकती है।
चीनी पर अल नीनो का असर कोको और कॉफी की तुलना में अलग हो सकता है, क्योंकि प्रमुख उत्पादक देशों में मौसम की स्थिति एक जैसी नहीं रहती। एक देश में भारी बारिश हो सकती है, जबकि उसी समय दूसरे देश में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। कोको को अल नीनो के प्रभाव के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि आइवरी कोस्ट और घाना मिलकर दुनिया के करीब आधे कोको का उत्पादन करते हैं।कॉफी, खासकर रोबस्टा कॉफी, के लिए भी मौसम जोखिम महत्वपूर्ण है। वियतनाम और इंडोनेशिया मिलकर दुनिया की करीब आधी रोबस्टा कॉफी का उत्पादन करते हैं। इन दोनों फसलों को पहले भी अल नीनो से जुड़े चरम मौसम का नुकसान हो चुका है।
चीनी के लिए अल नीनो का प्रभाव मिला-जुला रह सकता है। भारत और थाईलैंड में कम बारिश से उत्पादन घट सकता है, जबकि ब्राजील में बेहतर बारिश अगली फसल के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।अंततः इसका असर मौसम में बदलाव के समय और तीव्रता पर निर्भर करेगा। जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो और फसल उत्पादन के बीच संबंध लगातार अधिक जटिल और अनिश्चित होता जा रहा है।वैश्विक चीनी बाजार के लिए फिलहाल ब्राजील की फसल सबसे महत्वपूर्ण कारक बनी रहेगी। यदि ब्राजील का उत्पादन अच्छा रहता है तो भारत और थाईलैंड में संभावित उत्पादन कमी के बावजूद वैश्विक चीनी कीमतों में लंबी तेजी को रोका जा सकता है।
19 अगस्त 2026
अल नीनो से चीनी बाजार पर मिला-जुला असर, ब्राजील और भारत में मौसम का जोखिम बढ़ा
यूपी में चीनी के दाम रिकॉर्ड स्तर पर, एक्स-फैक्ट्री भाव 5,400 रुपये प्रति क्विंटल के पार
लखनऊ। भारत में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी जारी है और कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। उत्तर प्रदेश में एम-ग्रेड चीनी का एक्स-फैक्ट्री भाव 18 अगस्त को 5,400 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया। इसके ऊपर 5 फीसदी जीएसटी अलग से लागू है।
घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर केंद्र सरकार की चिंताएं बढ़ गई हैं। कम उत्पादन के साथ-साथ चीनी के निर्यात और गन्ने से मिलने वाले कच्चे माल को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने के कारण मौजूदा चीनी सीजन के अंत में क्लोजिंग स्टॉक कई वर्षों के निचले स्तर पर पहुंचने की संभावना है। आपूर्ति में कमी का असर अब घरेलू बाजार की कीमतों में साफ दिखाई दे रहा है।
स्पॉट मार्केट में भी चीनी की कीमतों में तेजी आई है। दिल्ली में चीनी का भाव करीब 5,775 रुपये प्रति क्विंटल और मुजफ्फरनगर में करीब 5,754 रुपये प्रति क्विंटल बताया जा रहा है। एक्स-फैक्ट्री कीमतों में बढ़ोतरी का असर थोक बाजार पर भी पड़ा है। दिल्ली में थोक चीनी का भाव करीब 5,800 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है। थोक बाजार में बढ़ी कीमतों का असर आने वाले दिनों में खुदरा बाजार पर भी पड़ सकता है। कुछ बाजारों में चीनी के खुदरा भाव पहले ही 58-60 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं।
त्योहारी सीजन के दौरान यदि कीमतों में और बढ़ोतरी होती है तो इससे सरकार की खाद्य महंगाई को लेकर चिंता बढ़ सकती है।हालांकि, बाजार में दिखाई दे रही कीमतों और सरकार के आधिकारिक खुदरा मूल्य आंकड़ों में अंतर है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के मूल्य निगरानी प्रभाग के अनुसार चीनी का औसत दैनिक खुदरा मूल्य 51.68 रुपये प्रति किलो है।
चालू खरीफ में कपास की बुआई का अंतर घटकर आधा फीसदी रह गया - कृषि मंत्रालय
नई दिल्ली। जुलाई एवं अगस्त में हुई बारिश से देशभर में कपास की बुआई में बढ़ोतरी हुई है तथा देशभर के राज्यों में इसकी बुआई का अंतर पिछले साल की तुलना में घटकर केवल 0.50 फीसदी का रह गया।
भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी के अनुसार 1 जून से 14 अगस्त के दौरान देश में सामान्य 596.2 मिमी बारिश के मुकाबले केवल 518.7 मिमी बारिश ही हुई है। अत: इस अवधि के दौरान सामान्य की तुलना में 13 फीसदी कम बारिश हुई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार देशभर के राज्यों में 14 अगस्त तक कपास की बुआई 107.33 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 107.87 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है।
उत्तर भारत के राज्यों में 14 अगस्त तक कपास की बुआई 9.31 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इसकी बुआई 11.41 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। अत: इन राज्यों में इसकी बुआई में 18.40 फीसदी की कमी आई है। पंजाब में चालू खरीफ में कपास की बुआई घटकर 0.85 लाख हेक्टेयर में, हरियाणा में 3.11 लाख हेक्टेयर एवं राजस्थान में 5.35 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इन राज्यों में क्रमश: 1.19 लाख हेक्टेयर, 3.94 लाख हेक्टेयर एवं 6.28 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी।
मध्य प्रदेश चालू खरीफ में कपास की बुआई 5.82 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई केवल 5.56 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
इस दौरान महाराष्ट्र में कपास की बुआई 37.96 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 38.47 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
इस दौरान गुजरात में कपास की बुआई बढ़कर 21.23 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई केवल 20.59 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
तेलंगाना में कपास की बुआई 19.31 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई केवल 18.06 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
आंध्रप्रदेश में चालू खरीफ में कपास की बुआई 3.61 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई केवल 3.52 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
कर्नाटक में कपास की बुआई 7.50 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 7.62 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
ओडिशा में कपास की बुआई चालू सीजन में 2.32 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जोकि पिछले साल के 2.33 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है। अन्य राज्यों में कपास की बुआई 21 हजार हेक्टेयर में हुई है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 26 हजार हेक्टेयर की तुलना में कम है।
