नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने 15 सितंबर से लागू होने वाली संशोधित चीनी स्टॉक रखने की सीमा के प्रभावी कार्यान्वयन को लेकर सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासन को दिशा-निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश सरकार के पहले के चीनी स्टॉक सीमा आदेश में किए गए संशोधन के बाद जारी किया गया है। यह संशोधन 3 सितंबर 2026 की राजपत्र अधिसूचना संख्या एस.ओ. 4907(ई) के माध्यम से किया गया था
संशोधित प्रावधानों के तहत चीनी डीलरों के लिए अधिकतम स्टॉक रखने की सीमा 4,000 क्विंटल से घटाकर 2,000 क्विंटल कर दी गई है। हालांकि, कोलकाता और उसके विस्तारित महानगरीय क्षेत्रों के लिए 4,000 क्विंटल की अलग सीमा पहले की तरह जारी रहेगी। खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से संशोधित प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने तथा स्टॉक सीमा संबंधी नियमों के अनुपालन की कड़ी निगरानी सुनिश्चित करने को कहा है।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को डीलरों द्वारा घोषित चीनी स्टॉक के समय-समय पर भौतिक सत्यापन के लिए उचित व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए है। साथ ही, डीलरों द्वारा घोषित स्टॉक की तुलना उनके पास वास्तव में उपलब्ध स्टॉक से करने को कहा गया है। सरकार ने चीनी डीलरों को फूड स्टॉक मॉनिटरिंग पोर्टल पर पंजीकरण कराने और नियमित रूप से अपने स्टॉक की स्थिति अपडेट करने के निर्देश भी दिए हैं। पंजीकरण के तुरंत बाद डीलरों को अपने मौजूदा स्टॉक का विवरण उपलब्ध कराना होगा। इसके बाद उन्हें हर शुक्रवार को अपने स्टॉक की स्थिति अपडेट करनी होगी।
केंद्र सरकार ने चेतावनी दी है कि, पोर्टल पर पंजीकरण नहीं कराने या गलत, अधूरी अथवा देरी से स्टॉक संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने के मामलों को गंभीरता से लिया जाएगा। ऐसे मामलों में आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।
केंद्र की ताजा सूचना का उद्देश्य 15 सितंबर से संशोधित स्टॉक सीमा लागू होने से पहले अनुपालन सुनिश्चित करना और निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना है। मूल आदेश के तहत चीनी डीलरों के लिए अधिकतम स्टॉक रखने की सीमा 4,000 क्विंटल निर्धारित की गई थी और चीनी प्राप्त होने की तारीख से 30 दिनों तक ही स्टॉक रखने की अनुमति दी गई थी।
07 सितंबर 2026
चीनी के नए स्टॉक सीमा नियम 15 सितंबर से होंगे लागू होंगे, केंद्र ने जारी किए निर्देश
चालू खरीफ में फसलों की बुआई 1,086.3 लाख हेक्टेयर के पार, 1.6 फीसदी पीछे
नई दिल्ली। देश में चालू खरीफ सीजन में फसलों की बुवाई 1,086.3 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल के मुकाबले 1.6 फीसदी पीछे है। पिछले साल इस समय तक देशभर में 1,104 लाख हेक्टेयर में इनकी बुआई हो चुकी थी
भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी के अनुसार 1 जून से 3 सितंबर के दौरान देश में सामान्य 721.1 मिमी बारिश के मुकाबले केवल 624.5 मिमी बारिश ही हुई है। अत: इस अवधि के दौरान सामान्य की तुलना में 13 फीसदी कम बारिश हुई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार देशभर में 3 सितंबर तक धान की रोपाई चालू खरीफ में 3.74 फीसदी घटकर 421.8 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 438.2 लाख हेक्टेयर में रोपाई हो चुकी थी।
चालू खरीफ सीजन में दालों की बुआई 1.60 फीसदी बढ़कर 117.1 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 115.3 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। खरीफ की प्रमुख दलहनी फसल अरहर की बुआई चालू खरीफ में बढ़कर 45.7 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 44.9 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इसी तरह से उड़द की बुआई बढ़कर चालू खरीफ सीजन में 25.2 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 22.5 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
हालांकि मूंग की बुआई चालू खरीफ सीजन में घटकर 33.2 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 34.2 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
मोटे अनाज की बुआई 181.4 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जो पिछले साल के 182.5 लाख हेक्टेयर से 0.6 फीसदी कम है। मक्का की बुवाई 3.18 फीसदी घटकर 91.1 लाख हेक्टेयर ही हुई है, जबकि पिछले साल यह 94.1 लाख हेक्टेयर हो चुकी थी। इस दौरान ज्वार की बुआई 7.73 फीसदी बढ़कर 13.6 लाख हेक्टेयर में और बाजरा की बुआई 3.16 फीसदी बढ़कर 64.8 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 12.6 लाख हेक्टेयर में तथा 62.9 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।
तिलहन की बुवाई पिछले साल की तुलना में 0.56 फीसदी घटकर 191.9 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 193.1 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। सोयाबीन की बुआई 0.94 फीसदी कम होकर 121.8 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 122.9 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। मूंगफली की बुआई चालू खरीफ में 49.6 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 50.4 लाख हेक्टेयर की तुलना में थोड़ी कम है।
गन्ने की बुआई चालू खरीफ में 58.5 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 58.9 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
कपास की बुवाई चालू खरीफ सीजन में 109.2 लाख हेक्टेयर में ही हुई, जबकि पिछले साल के 109.9 लाख हेक्टेयर से थोड़ी कम है।
अल नीनो के मजबूत होने से देश में सितंबर में भी कम बारिश की आशंका - रिपोर्ट
नई दिल्ली। अल नीनो के मजबूत होने के साथ ही हिंद महासागर द्विध्रुव (आईओडी) के तटस्थ स्थिति में लौटने से देश में सितंबर में भी मानसून पर दबाव बने रहने की आशंका है।
आईसीआईसीआई बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार सितंबर में देशभर में बारिश दीर्घकालिक औसत (एलपीए) के 94 फीसदी से कम रह सकती है। अगस्त में ही मानसून कमजोर पड़ गया था और बारिश एलपीए से 16 फीसदी कम हुई थी। इसके चलते अगस्त के अंत तक मानसूनी बारिश की संचयी कमी बढ़कर 14 फीसदी हो गई। सितंबर के लिए भी मौसम का परिदृश्य सतर्क रहने वाला है, क्योंकि अल नीनो की स्थिति मजबूत हो रही है और आईओडी से मिलने वाला समर्थन कमजोर पड़ रहा है।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने सितंबर में देशभर में सामान्य से कम बारिश यानी 94 फीसदी एलपीए से कम रहने की भविष्यवाणी की हुई है।
आईसीआईसीआई बैंक की रिपोर्ट के अनुसार जुलाई से सितंबर के दौरान मजबूत से बेहद मजबूत अल नीनो की संभावना बढ़ाकर करीब 99 फीसदी हो गई है, जिसमें बेहद मजबूत स्थिति की संभावना 75 फीसदी है। सितंबर से नवंबर के दौरान बेहद मजबूत अल नीनो की संभावना करीब 100 फीसदी तक पहुंच सकती है। अगस्त में अल नीनो सूचकांक बढ़कर 2.45 हो गया, जो 0.8 की सीमा से काफी ऊपर था। वहीं, आईओडी सूचकांक कमजोर होकर करीब 0.22 पर आ गया और तटस्थ क्षेत्र में लौट गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि, मजबूत होता अल नीनो और आईओडी का कमजोर पड़ता समर्थन मानसून के शेष सीजन के प्रदर्शन के लिए नकारात्मक जोखिम बने हुए हैं।
मानसून की कमजोरी का असर चालू खरीफ सीजन में फसलों की बुवाई पर भी दिखाई दे रहा है। 28 अगस्त तक देशभर में करीब 10.71 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हो पाई है, जो एक साल पहले के 10.9 करोड़ हेक्टेयर से करीब 2 फीसदी कम है। इस दौरान धान की पेराई सालाना आधार पर 3.4 फीसदी, मोटे अनाज की बुआई करीब 2.3 फीसदी और तिलहनी फसलों की बुआई का रकबा 0.5 फीसदी कम हुआ है। हालांकि इस दौरान देश में दलहन का रकबा 1.2 फीसदी जरुर बढ़ा है।
देशभर के 150 प्रमुख जलाशयों में 27 अगस्त तक जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 68 फीसदी ही था, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 74 फीसदी था। हालांकि, आईसीआईसीआई बैंक को उम्मीद है कि सितंबर में बेहतर बारिश से जलाशयों के जलस्तर में सुधार हो सकता है। मानसून संबंधी चिंताओं के बावजूद ग्रामीण मांग फिलहाल मजबूत बनी हुई है। ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की बिक्री में इस दौरान मजबूती देखी गई है। वहीं जुलाई में कृषि ऋण की वृद्धि सालाना आधार पर 17 फीसदी रही, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था के व्यापक परिदृश्य को समर्थन मिल रहा है।
देश में कपास वायदा मार्केट को मजबूत करने के लिए सीएआई और एनसीडीईएक्स में समझौता
नई दिल्ली। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएआई) और नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) ने गुरुवार को मुंबई में एनसीडीईएक्स ऑफिस में समझौता किया, जो देश में कपास वायदा मार्केट को डेवलप करने और मजबूत करने की दिशा में एक कदम उठायेगा।
इस पत्र पर एनसीडीईएक्स के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ विकास गोयल और सीएआई के प्रेसिडेंट, विनय एन. कोटक ने कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के सीएमडी, एनसीडीईएक्स बोर्ड के सदस्यों और सीएआई बोर्ड और कमेटियों के सदस्यों की मौजूदगी में साइन किए।
इस मौके पर बोलते हुए विनय एन. कोटक ने कहा कि सीएआई के लिए एनसीडीईएक्स के साथ यह जुड़ाव हमारी पुरानी जड़ों की ओर वापसी दिखाता है, साथ ही हम भविष्य की ओर मजबूती से देख रहे हैं। सीएआई कॉटन वायदा एक समृद्ध विरासत और गहरी डोमेन जानकारी लेकर आया है, जबकि एनसीडीईएक्स टेक्नोलॉजी, इंस्टीट्यूशनल ताकत और कमोडिटी डेरिवेटिव्स की एक्सपर्टाइज्ड लेकर आया है। अत: हमें पूरा भरोसा है कि हम साथ मिलकर एक लिक्विड, ट्रांसपेरेंट और यूजर-फ्रेंडली कॉटन वायदा मार्केट बना पाएंगे जो पूरी कॉटन और टेक्सटाइल वैल्यू चेन को सर्विस देगा।
सीएआई की ऐतिहासिक भूमिका को याद करते हुए, कोटक ने कहा कि सीएआई को फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1952 के तहत परमानेंट पहचान मिली थी, और 1966 में सरकार के बैन के बाद, 1998 में जब वायदा फिर से शुरू हुआ, तो यह पहला एक्सचेंज था जिसे कॉटन फ्यूचर्स ट्रेडिंग फिर से शुरू करने की अनुमति मिली थी। सीएआई ने बाद में मल्टी-कमोडिटी एक्सचेंज के आने से पहले कॉटन वायदा में काफी वॉल्यूम जेनरेट किया था। उन्होंने कहा कि वायदा तीन जरूरी काम करते हैं, पहला है प्राइस डिस्कवरी, हेजिंग और रिस्क मैनेजमेंट के साथ ही लिक्विडिटी देना है।
उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कॉटन उत्पादन और उपभोक्ता में से एक है, फिर भी इंडियन मार्केट पार्टिसिपेट अक्सर हेजिंग के लिए इंटरनेशनल मार्केट की ओर देखते हैं। हमें वायदा में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कॉटन वायदा कॉन्ट्रैक्ट की सफलता पूरी वैल्यू चेन पर निर्भर करेगी, क्योंकि एक्सचेंज प्लेटफॉर्म देता है, लेकिन लिक्विडिटी मार्केट पार्टिसिपेट की मिली-जुली जिम्मेदारी है। हमें पहला कदम उठाना चाहिए और मार्केट में एक्टिव रूप से भाग लेना होगा।
उन्होंने कहा कि आज की साइनिंग भारत के कॉटन वायदा मार्केट में एक नए चैप्टर की शुरुआत हुई है, जिसमें सरकार, एक्सचेंज और मार्केट की भागीदारी मिलकर देश को कॉटन वायदा में सच में आत्मनिर्भर बनाने के लिए काम कर रहे हैं। हमारा मुख्य मकसद कपास के लिए आत्मनिर्भर वायदा भाव डिस्कवरी और हेजिंग सुविधाओं के सरकार के विजन को सपोर्ट करना है, जिससे किसानों के लिए बेहतर प्राइस डिस्कवरी और ज्यादा आमदनी हो सके, साथ ही टेक्सटाइल प्रोडक्ट एक्सपोर्टर्स को उनके कॉटन के रॉ मटेरियल की जरूरतों को हेज करने के लिए एक असरदार रिस्क कम करने वाला टूल दिया जा सके और 2030 तक टेक्सटाइल एक्सपोर्ट में 100 डॉलर बिलियन हासिल करने के सरकार के लक्ष्य में योगदान दिया जा सके।
इस अवसर पर एनसीडीईएक्स के एमडी और सीईओ विकास गोयल ने कहा कि कॉटन भारत की खेती-बाड़ी की इकॉनमी का केंद्र है, फिर भी हमारा डेरिवेटिव्स मार्केट कभी भी देश के उत्पादन के स्केल को पूरी तरह से नहीं दिखा पाया है। सीएआई के साथ यह पार्टनरशिप इसे बदलने के लिए एक सोचा-समझा कदम है। सीएआई का गहरा मेंबरशिप बेस और ऑन-ग्राउंड एक्सपर्टीज बहुत कीमती होगी क्योंकि हम मार्केट डेवलपमेंट पर मिलकर काम करेंगे और देश के कॉटन वैल्यू चेन पार्टिसिपेंट्स के लिए नई संभावनाएं खोलेंगे। यह न सिर्फ एनसीडीईएक्स को हमारी कॉटन कॉम्प्लेक्स ऑफरिंग को मजबूत करने और ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से ट्रेड प्रैक्टिस बनाने में मदद करेगा, बल्कि यह कपास उगाने वालों से लेकर निर्यातकों तक पूरी वैल्यू चेन को प्राइस रिस्क को मैनेज करने का एक ट्रांसपेरेंट और भरोसेमंद तरीका भी देगा।
03 सितंबर 2026
देश से 1.5 अरब डॉलर से अधिक के गेहूं निर्यात का अवसर - एसोचैम
नई दिल्ली। देश 1.5 अरब डॉलर से अधिक के गेहूं निर्यात के अवसर का लाभ उठा सकता है। निर्यात पर लगी पाबंदियों में धीरे-धीरे ढील, मजबूत घरेलू उत्पादन, पर्याप्त भंडार और प्रमुख वैश्विक खरीदारों द्वारा गेहूं की खरीद के स्रोतों में विविधता लाने के प्रयास भारत के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं। यह बात एसोचैम (एसोचैम) की एक रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन और पर्याप्त अधिशेष स्टॉक मौजूद है। इससे घरेलू खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ गेहूं के निर्यात को बढ़ाने की गुंजाइश बनी है।
एसोचैम ने कहा कि, भारत हाल के वर्षों में वैश्विक गेहूं व्यापार के सबसे संभावनाशील दौर में प्रवेश कर रहा है। वर्ष 2026 में करीब चार वर्षों तक लागू निर्यात प्रतिबंधों के बाद गेहूं निर्यात को धीरे-धीरे फिर से खोलने की प्रक्रिया शुरू हुई है।रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने गेहूं की कुछ निर्धारित किस्मों, गेहूं के आटे और संबंधित उत्पादों की निर्यात नीति में भी बदलाव किया है। गेहूं, ड्यूरम गेहूं, आटा, मैदा और सूजी/रवा सहित इन उत्पादों की श्रेणी को ‘प्रतिबंधित’ से ‘मुक्त’ निर्यात नीति के तहत लाया गया है।
भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में रिकॉर्ड 120.7 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन किया। इसके साथ भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश बना हुआ है। 28 मई 2026 तक केंद्रीय पूल में गेहूं का भंडार 51.3 मिलियन टन था, जबकि 1 जुलाई के लिए निर्धारित बफर स्टॉक मानक 27.58 मिलियन टन है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, भारत का मौजूदा गेहूं निर्यात उसकी उत्पादन क्षमता और उपलब्ध अधिशेष की तुलना में अभी काफी कम है। ऐसे में आने वाले वर्षों में गेहूं निर्यात बढ़ाने की काफी गुंजाइश मौजूद है।
वैश्विक बाजार में भारत को कीमत के स्तर पर भी फायदा मिल सकता है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए देश का गेहूं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) लगभग 268 अमेरिकी डॉलर प्रति टन के बराबर था, जबकि मई 2026 में अंतरराष्ट्रीय गेहूं की कीमत करीब 303 अमेरिकी डॉलर प्रति टन थी। इस तरह दोनों कीमतों में लगभग 35 डॉलर प्रति टन का अंतर था।
रिपोर्ट के अनुसार, बांग्लादेश भारतीय गेहूं के लिए सबसे मजबूत बाजार अवसर पेश करता है। इसके अलावा मिस्र, इंडोनेशिया, अल्जीरिया, मोरक्को और फिलीपींस जैसे देशों में भी धीरे-धीरे निर्यात बढ़ाने की संभावनाएं हैं। बांग्लादेश ने वित्त वर्ष 2024-25 में करीब 6.7 मिलियन टन गेहूं का आयात किया था और भारत पहले से ही उसके प्रमुख गेहूं आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि, वैश्विक गेहूं उत्पादन 2026-27 में घटकर लगभग 819 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जबकि 2025-26 में यह रिकॉर्ड 843.8 मिलियन टन था। प्रमुख गेहूं निर्यातक देशों में मौसम संबंधी चुनौतियों को उत्पादन में संभावित गिरावट की एक वजह बताया गया है।इसी बीच, प्रमुख गेहूं आयातक देश अधिक विविधतापूर्ण और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ताओं की तलाश कर रहे हैं। इससे भारत को वैश्विक गेहूं बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।
हालांकि, रिपोर्ट ने आगाह किया कि लंबे समय में सफलता के लिए भारत को लगातार बेहतर गुणवत्ता, मजबूत लॉजिस्टिक्स, बेहतर भंडारण एवं परीक्षण सुविधाओं और निर्यात नीतियों में अधिक स्पष्टता सुनिश्चित करनी होगी।एसोचैम के अनुसार, निर्यात के लिए क्रमिक और पूर्वानुमान योग्य नीति अपनाने के साथ-साथ भंडारण, परिवहन और बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे में निवेश किया जाए तो भारत एक अधिक भरोसेमंद वैश्विक गेहूं आपूर्तिकर्ता बन सकता है।
चीनी की खुदरा कीमतों में 5 फीसदी की आई गिरावट - डीएफपीडी
नई दिल्ली। देश में चीनी की खुदरा कीमतों में करीब 5 फीसदी की गिरावट आई है और आने वाले दिनों में इनमें और नरमी आने की उम्मीद है। यह गिरावट मिल स्तर (एक्स-मिल) पर चीनी की कीमतों में करीब 20 फीसदी की कमी के बाद देखने को मिली है।
खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) ने यह जानकारी दी। डीएफपीडी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि, एक्स-मिल कीमतों में आई गिरावट का असर धीरे-धीरे खुदरा बाजारों में भी दिखाई दे रहा है। विभाग को उम्मीद है कि, एक्स-मिल दरों में गिरावट का रुझान जारी रहने पर खुदरा कीमतों में भी आगे और कमी आएगी।
सरकार ने कहा कि वह घरेलू चीनी बाजार पर करीबी नजर रख रही है और पर्याप्त उपलब्धता, व्यवस्थित आपूर्ति तथा कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठा रही है। विभाग ने कहा, सरकार सभी हितधारकों को आश्वस्त करती है कि घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता, व्यवस्थित आपूर्ति और कीमतों में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए हर जरूरी कदम उठाया जा रहा है। साथ ही, सरकार ने स्पष्ट किया कि वास्तविक व्यापार और वितरण गतिविधियां सुचारू रूप से जारी रहेंगी।
यह बयान अगस्त में चीनी की कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बाद सरकार द्वारा बाजार में बढ़ाए गए हस्तक्षेप के बीच आया है। अधिकारियों ने जमाखोरी और सट्टेबाजी जैसी गतिविधियों पर रोक लगाने के साथ-साथ उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चीनी के स्टॉक, बिक्री और बाजार कीमतों की निगरानी बढ़ा दी है। एक्स-मिल कीमतों में गिरावट से थोक और खुदरा बाजारों पर कीमतों का दबाव कम होने की उम्मीद है। सरकार का कहना है कि देशभर में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है
केंद्र ने मिलों से 20 से 25 अगस्त के दौरान चीनी की खरीद एवं बिक्री का ब्योरा मांगा
नई दिल्ली। चीनी की कीमतों में हाल ही में आई तेजी को रोकने के लिए केंद्र सरकार आए दिन नए, नए निर्देश जारी कर रही है। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंतर्गत खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के चीनी एवं वनस्पति तेल निदेशालय ने सभी चीनी मिलों द्वारा 20 से 25 अगस्त 2026 के दौरान बेची गई चीनी का मिल-वार और खरीदार का पूरा विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
केंद्र सरकार ने यह निर्देश 2 सितंबर 2026 को चीनी मिलों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (सीईओ) और प्रबंध निदेशकों (एमडी) को जारी किए गए पत्र के माध्यम से दिया गया। विभाग ने यह निर्देश 20 अगस्त 2026 को जारी किए गए अपने पूर्व पत्र के क्रम में जारी किया है। इसके तहत चीनी मिलों को पत्र के साथ संलग्न निर्धारित प्रारूप में बिक्री संबंधी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। यह जानकारी मात्रा-वार, दर-वार और तारीख के आधार पर देनी होगी तथा प्रत्येक बिक्री के साथ ही लेनदेन का अलग-अलग विवरण दर्ज करना अनिवार्य किया है।
विभाग के अनुसार 20 से 25 अगस्त 2026 की प्रत्येक तारीख का विवरण अलग से प्रस्तुत किया जाना है। यदि किसी एक दिन अलग-अलग दरों पर या अलग-अलग खरीदारों को कई बार बिक्री की गई हैं, तो प्रत्येक लेनदेन को अलग-अलग ब्यौरा दर्ज करना होगा। प्रत्येक लेनदेन के लिए खरीदार का नाम, पूरा पता, टेलीफोन या मोबाइल नंबर तथा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पंजीकरण संख्या भी उपलब्ध करानी होगी। बेची गई चीनी की मात्रा केवल क्विंटल में दर्ज करनी होगी, जबकि बिक्री दर रुपये प्रति क्विंटल के रूप में बतानी होगी।
विभाग ने स्पष्ट किया है कि प्रस्तुत की जाने वाली जानकारी पूर्ण, सटीक और संबंधित चीनी मिल द्वारा विधिवत सत्यापित होनी चाहिए। सभी चीनी मिलों के लिए यह विवरण 3 सितंबर 2026 को दोपहर 12 बजे तक निर्धारित आधिकारिक ईमेल sugarcontrol-fpd@gov.in पर एक्सेल प्रारूप में भेजना अनिवार्य किया गया है। विभाग ने इस मामले को अत्यंत जरूरी बताया है और कहा है कि निर्धारित समय सीमा के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने में किसी भी तरह की देरी या विफलता को गंभीरता से लिया जाएगा।
व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में 22 अगस्त से अभी तक चीनी की थोक कीमतों में करीब 900 से 1,400 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ चुकी है। दिल्ली में चीनी के थोक भाव 2 सितंबर, यानी बुधवार को 5,700 रुपये, कानपुर में 5,650 रुपये और मुंबई में 5,200 रुपये तथा कोलकाता में 5,400 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। 20 अगस्त 2026 को दिल्ली में चीनी के थोक भाव 6,600 रुपये, कानपुर में 6,650 रुपये और मुंबई में 6,750 रुपये तथा कोलकाता में 6,800 रुपये प्रति क्विंटल थे।
चीनी की खुदरा कीमतों में इस दौरान 7 से 9 रुपये प्रति किलो का मंदा आया है। दिल्ली में चीनी के खुदरा भाव 2 सितंबर, यानी बुधवार को 61 रुपये, कानपुर में 62 रुपये और मुंबई में 61 रुपये तथा कोलकाता में 61 रुपये प्रति किलो रह गए। 20 अगस्त 2026 को दिल्ली में चीनी के खुदरा भाव 68 रुपये, कानपुर में 69 रुपये और मुंबई में 68 रुपये तथा कोलकाता में 70 रुपये प्रति किलो थे।
