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31 जनवरी 2026

महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 37 फीसदी बढ़कर 76 लाख टन पर पहुंचा

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में 29 जनवरी तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 36.72 फीसदी बढ़कर 76.03 लाख टन का हो चुका है। पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में 55.61 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। राज्य का पेराई सीजन अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है।


शुगर कमिश्नर के अनुसार 29 जनवरी तक राज्य में 826.47 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 76.03 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। राज्य की औसत चीनी रिकवरी 9.2 फीसदी की बैठ रही है। राज्य में 29 जनवरी तक कुल 199 फैक्ट्रियों (98 कोऑपरेटिव और 101 प्राइवेट) ने पेराई चल रही है।

पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में भी 199 चीनी फैक्ट्रियों (98 को ऑपरेटिव और 101 प्राइवेट) ने पेराई चल रही थी। पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 616.2 लाख टन गन्ने की पेराई की थी और 55.61 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। औसत चीनी की रिकवरी दर 9.03 फीसदी की थी।

कोल्हापुर डिवीजन ने 178.7 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 19.27 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। कोल्हापुर डिवीजन में रिकवरी की दर 10.79 फीसदी की है। डिवीजन में 37 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 25 सहकारी और 12 प्राइवेट हैं।

इसी तरह से पुणे डिवीजन में कुल 30 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 17 सहकारी और 13 प्राइवेट मिलें है। उन्होंने अब तक 187 लाख टन गन्ने की पेराई कर 17.73 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। पुणे डिवीजन की रिकवरी दर 9.48 फीसदी की है।

सोलापुर डिवीजन में कुल 47 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 17 सहकारी और 30 प्राइवेट हैं। अब तक डिवीजन में 177.97 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 14.79 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। चीनी की रिकवरी दर 8.31 फीसदी की है।

अहमदनगर (अहिल्यानगर) डिवीजन में कुल 26 फैक्ट्रियां, 15 को ऑपरेटिव और 11 प्राइवेट में पेराई चल रही हैं। इन सभी फैक्ट्रियों ने अब तक 102 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 8.99 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। अहमदनगर डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 8.74 फीसदी है। छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन में कुल 22 चीनी मिलों (13 कोऑपरेटिव और 9 प्राइवेट) में पेराई चल रही है तथा उन्होंने 80.58 लाख टन गन्ने की पेराई कर 6.31 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया है। चीनी की रिकवरी की दर 7.83 फीसदी है।

नांदेड़ डिवीजन में कुल 30 फैक्ट्रियां (10 कोऑपरेटिव और 20 प्राइवेट) चल रही हैं और उन्होंने 89 लाख टन गन्ने की पेराई कर 8.05 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.06 फीसदी है। अमरावती डिवीजन में एक को ऑपरेटिव और 3 प्राइवेट फैक्ट्रियां चल रही हैं, और उन्होंने 1.33 लाख टन गन्ने की पेराई की है।

आर्थिक सर्वे में कृषि सुधारों की वकालत, मृदा स्वास्थ्य सुधार हेतु यूरिया के भाव बढ़ाने का सुझाव

नई दिल्ली। संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में कृषि सुधारों की वकालत की गई है। सर्वे में कहा गया है कि उर्वरक असंतुलन को कम करने और मृदा स्वास्थ्य सुधारने के लिए यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी तथा किसानों को वित्तीय प्रोत्साहन के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।


भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि की अहम भूमिका को रेखांकित करते हुए सर्वे में कहा गया है कि कृषि क्षेत्र ने अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान की है, लेकिन इसकी वृद्धि दर अभी अपेक्षाकृत कम है। कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों में जो वृद्धि दर्ज की गई है, उसका बड़ा हिस्सा गैर-कृषि उत्पादन से आता है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विविधता बढ़ रही है और गैर-कृषि क्षेत्र आमदनी में अहम भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि स्किल गैप और प्रोडक्टिविटी में कमी जैसी चुनौतियां हैं।  

सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश काफी कम है और इसमें बढ़ोतरी आवश्यक है। इसके साथ ही खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन प्रणाली में फूड वाउचर शुरू करने की सिफारिश भी की गई है।

उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को सर्वेक्षण में गंभीर चिंता का विषय बताते हुए यूरिया की कीमतों में बढ़ोतरी की वकालत की है। साथ ही इनपुट सब्सिडी के बजाय प्रति एकड़ इनकम सपोर्ट देने का सुझाव दिया गया है। मृदा स्वास्थ्य और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष जोर दिया गया है।

सर्वेक्षण में उर्वरकों के असंतुलित उपयोग को चिंताजनक बताया गया है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (एनपीके) का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि वर्ष 2023–24 में यह बिगड़कर 10.9:4.1:1 हो गया। वर्ष 2009–10 में यह अनुपात 4:3.2:1 था। मृदा स्वास्थ्य के लिए इस असंतुलन को दूर करना जरूरी है। किसानों को दी जाने वाली सहायता के तरीके में भी सुधार करना होगा।

पीओएस मशीनों पर आधार आधारित प्रमाणीकरण लागू होने के बाद इंटीग्रेटेड फर्टिलाइजर मैनेजमेंट सिस्टम (आईएफएमएस) के माध्यम से सरकार के पास विस्तृत डेटा उपलब्ध है। सर्वे में कहा गया है कि इसी डेटा का उपयोग कर सुधार लागू किए जाने चाहिए।

कृषि फसलों की उत्पादकता उस अनुपात में नहीं बढ़ रही है, जितनी किसानों की आय बढ़ाने के लिए आवश्यक है। इसलिए इस क्षेत्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई गई है। सर्वेक्षण में जोर दिया गया है कि ग्रामीण आय बढ़ाने के लिए प्राइस सपोर्ट की बजाय कृषि उत्पादकता को बढ़ाना होगा। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर अत्यधिक निर्भरता को लेकर भी आगाह किया है।

सर्वे में कहा गया कि मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित एक्सपोर्ट ग्रोथ, ग्रामीण इलाकों में लंबे समय तक खुशहाली के लिए ज़रूरी है, क्योंकि सिर्फ़ खेती भारत के बढ़ते वर्कफोर्स को नहीं संभाल सकती।

सर्वेक्षण में यह स्वीकार किया गया है कि देश के बढ़ते कार्यबल को सिर्फ खेती से रोजगार नहीं मिल सकता है, ग्रामीण क्षेत्रों में समृद्धि के लिए मैन्युफैक्चरिंग पर आधारित एक्सपोर्ट ग्रोथ भी आवश्यक है। हाल में हुए मुफ्त व्यापार समझौतों से श्रम-आधारित एग्रो और फूड प्रोसेसिंग आधारित निर्यात की मांग बढ़ा सकते हैं, बशर्ते भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खरा उतरने वाले उत्पाद तैयार करे।

सर्वेक्षण में जलवायु परिवर्तन को कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती माना गया है। लगातार बेहतर मानसून से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है, जिससे खाद्य सुरक्षा मजबूत हुई है और महंगाई दर को नियंत्रित रखने में मदद मिली है। देश की खाद्य सुरक्षा के लिए जलवायु अनुकूल किस्मों के विकास, सटीक खेती और जल उपयोग में दक्षता पर जोर दिया गया है।  

कृषि के विकास और किसानों की आय सुनिश्चित करने के लिए सरकार की लगभग दो दर्जन योजनाओं का उल्लेख सर्वे में किया गया है। इसमें बताया गया है कि कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की औसत वार्षिक वृद्धि दर (एएजीआर) वैश्विक औसत 2.9 फीसदी से अधिक रही है और पिछले चार वर्षों में यह 4.4 फीसदी तक पहुंची है।

चालू वर्ष में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्रों की वृद्धि दर मुख्य रूप से गैर-फसली क्षेत्रों की अधिक वृद्धि के कारण रही है। फसल उत्पादकता के मामले में देश में क्षेत्रीय असमानता बनी हुई है, जिसे प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया जाएगा।

कृषि में पूंजी निवेश की कमी को आंकड़े भी दर्शाते हैं। वर्तमान में देश के कुल सकल फसल क्षेत्र का केवल 55.8 फीसदी हिस्सा ही सिंचित है। इसमें भी तिलहन और दालों का क्षेत्रफल कम है, जबकि चावल, गेहूं और गन्ना जैसी फसलों में सिंचाई सुविधाएं अपेक्षाकृत अधिक हैं।

सर्वे के अनुसार चालू वित्त वर्ष में सरकार के 27.5 लाख करोड़ रुपये के कृषि ऋण लक्ष्य के मुकाबले ग्राउंड लेवल क्रेडिट डिस्बर्समेंट 28.69 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें 15.39 लाख करोड़ रुपये अल्पकालिक ऋण (फसली ऋण) और 12.77 लाख करोड़ रुपये टर्म लोन शामिल हैं।

देश में वर्ष 1950 में कृषि ऋण का 90 फीसदी हिस्सा गैर-संस्थागत स्रोतों यानी साहूकारों से आता था, जो 2021–22 में घटकर 23.4 फीसदी रह गया है। हालांकि मौजूदा कृषि अर्थव्यवस्था के आकार को देखते हुए यह अनुपात अब भी चिंता का विषय है। इसका अर्थ है कि बड़ी संख्या में किसान आज भी साहूकारों से ऋण ले रहे हैं, जिन पर अक्सर 30 से 50 फीसदी तक ब्याज देना पड़ता है।

वैश्विक माहौल में उथल-पुथल के बीच अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए कृषि पर दारोमदार रहेगा। हालांकि, अनिश्चित माहौल में खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण आय और कृषि को वैश्विक झटकों और जलवायु जोखिम से बचाए रखना चुनौतीपूर्ण है। टिकाऊ ग्रामीण ग्रोथ के लिए सरकारी सहायता और खरीद की बजाय उत्पादकता, विविधता और फूड सिस्टम को टिकाऊ बनाने की तरफ जाना होगा। इसके लिए केंद्र, राज्यों और निजी क्षेत्र को मिलकर काम करना होगा।

सीसीआई ने 1,700 गांठ कॉटन की बिक्री की, बिनौले के भाव लगातार दूसरे दिन बढ़ाए

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई ने बुधवार को घरेलू बाजार में ई नीलामी के माध्यम फसल सीजन 2025-26 में खरीदी हुई 1,700 गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की बिक्री घरेलू मिलों को की। इस दौरान निगम ने बिनौले की बिक्री कीमतों में 20 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी भी की।


सूत्रों के अनुसार सीसीआई ने बुधवार को लगातार दूसरे दिन बिनौले की बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की। इससे पहले निगम से मंगलवार को इसके बिक्री दाम 30 से 100 रुपये प्रति क्विंटल तक तेज किए थे।

सूत्रों के अनुसार सीसीआई चालू सीजन में न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर 80 लाख गांठ से ज्यादा की खरीद कर चुकी है तथा माना जा रहा है कि कुल खरीद एक करोड़ गांठ होने का अनुमान है। निगम के पास फसल सीजन 2024-25 की खरीदी हुई कॉटन का भी करीब 50 हजार गांठ का बकाया स्टॉक बचा हुआ है। निगम चालू फसल सीजन के साथ ही पिछले साल की खरीदी हुई कॉटन भी घरेलू बाजार में बेच रही है क्योंकि निगम के पास भारी, भरकम स्टॉक है इसलिए आगामी दिनों में घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी सीसीआई के बिक्री भाव के अनुसार ही बनेगी।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर बनी रहने के कारण बुधवार को शाम के सत्र में गुजरात में कॉटन की कीमतों में नरमी आई, जबकि इस दौरान उत्तर भारत के राज्यों में इसके भाव में मिलाजुला रुख रहा।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 150 रुपये नरम होकर 54,900 से 55,300 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव 5,400 से 5,580 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,300 से 5,400 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,400 से 5,580 रुपये प्रति मन बोले गए।
लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 51,000 से 52,000 रुपये कैंडी बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 117,600 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 2.5 रुपये तेज होकर 1,595 रुपये प्रति 20 किलो हो गए। एमसीएक्स पर जनवरी 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 26,500 रुपये प्रति कैंडी पर स्थिर हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा।

व्यापारियों के अनुसार स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने से गुजरात में कॉटन की कीमतों में नरमी आई, हालांकि जिनिंग मिलों की बिक्री कम आने से उत्तर भारत के राज्यों में इसके भाव में मिलाजुला रुख रहा। व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता ज्यादा है। इसलिए अधिकांश मिलें जरुरत के हिसाब से ही कॉटन की खरीद कर रही है। उद्योग ने कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है, तथा चालू सीजन में कॉटन का आयात भी रिकॉर्ड होने का अनुमान है। 

रबी में फसलों की बुआई 2.84 फीसदी बढ़कर 660 लाख हेक्टेयर के पार - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली, 27 जनवरी। चालू रबी सीजन में फसलों की बुआई 2.84 फीसदी बढ़कर 660.48 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 642.24 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। गेहूं के साथ ही दलहन एवं तिलहनी फसलों की बुआई में बढ़ोतरी हुई है।  


कृषि मंत्रालय के अनुसार 23 जनवरी तक रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की बुआई बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक कुल 328.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

चालू रबी में दलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 137.55 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 133.94 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुआई चालू रबी सीजन में बढ़कर 95.88 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इस समय तक 91.22 लाख हेक्टेयर में ही इसकी बुआई हुई थी।

अन्य रबी दलहन में मसूर की बुआई बढ़कर 18.12 लाख हेक्टेयर में तथा मटर की 7.92 लाख हेक्टेयर में हुई है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 17.66 लाख हेक्टेयर में और 8.27 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। उड़द की बुआई चालू रबी में घटकर 4.81 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि में 5.25 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

चालू रबी सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई देशभर में बढ़कर 97.03 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 93.58 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी। तिलहनी फसलों में सरसों की बुआई बढ़कर 89.36 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 86.57 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी। इसी तरह से मूंगफली की बुआई बढ़कर 3.52 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक 3.37 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। अलसी की बुआई भी चालू रबी में बढ़कर 1.99 लाख हेक्टेयर हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1.76 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू रबी में बढ़कर 60.70 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 57.45 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मोटे अनाजों में ज्वार की 23.01 लाख हेक्टेयर और मक्का की 29.05 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 24.11 और 26.21 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

जौ की बुआई चालू रबी सीजन में बढ़कर 7.37 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 6.08 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।

चालू रबी सीजन में राज्य में धान की रोपाई बढ़कर 31.03 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 29.23 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

सीसीआई ने 64,500 गांठ कॉटन बेची, चालू सीजन में खरीद 80 लाख गांठ के पार

दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई ने 19 जनवरी से 23 जनवरी के दौरान 364,500 गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की बिक्री की। इस दौरान निगम ने फसल सीजन 2025-26 के दौरान खरीदी हुई 353,900 गांठ और फसल सीजन 2024-25 में खरीदी हुई 10,600 गांठ कॉटन बेची।


सीसीआई ने इससे पहले सप्ताह 12 जनवरी से 16 जनवरी के दौरान 17,500 गांठ, फसल सीजन 2024-25 के दौरान खरीदी हुई कॉटन की बिक्री की थी।

पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन में सीसीआई 80 लाख गांठ से ज्यादा कॉटन की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कर चुकी है। माना जा रहा है कि निगम की कुल खरीद एक करोड़ पहुंचने का अनुमान है। निगम के पास पिछले साल की खरीदी हुई कॉटन का भी करीब एक लाख गांठ का स्टॉक बचा हुआ है। 

स्पिनिंग मिलों की मांग बनी रहने के कारण शनिवार को शाम के सत्र में गुजरात में कॉटन की कीमतों में नरमी दर्ज की गई, जबकि इस दौरान उत्तर भारत के राज्यों में इसके भाव में स्थिर हो गए।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शनिवार को 100 रुपये नरम होकर 55,200 से 55,500 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव 5,420 से 5,570 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,350 से 5,450 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,420 से 5,570 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 51,600 से 52,600 रुपये कैंडी बोले गए।

देशभर की मंडियों में कपास की आवक 109,000 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

व्यापारियों के अनुसार हाल ही में विश्व बाजार में कॉटन की कीमतों में नरमी आई है, अत: घरेलू बाजार में भी स्पिनिंग मिलों की खरीद पहले की तुलना में कम हुई है। विश्व स्तर पर भू राजनीतिक गतिरोध लगातार बढ़ रहा है। वैसे भी चालू सीजन में घरेलू बाजार में कच्चे माल की कुल उपलब्धता ज्यादा है, जबकि सीसीआई पिछले साल की खरीदी हुई कॉटन के साथ ही चालू सीजन में खरीदी हुई की बिक्री भी कर रही है। इसलिए स्पिनिंग मिलें बड़ी खरीद करके जोखिम नहीं लेना चाहती। इसलिए कॉटन की कीमतों में घरेलू बाजार में अभी सीमित तेजी, मंदी बनी रह सकती है।

24 जनवरी 2026

चालू पेराई सीजन में महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 41 फीसदी बढ़कर 69.73 लाख टन के पार

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में 22 जनवरी तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 40.92 फीसदी बढ़कर 69.73 लाख टन का हो चुका है। पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में 49.48 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था।

 
शुगर कमिश्नर के अनुसार 22 जनवरी तक राज्य में 766.28 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 69.73 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। राज्य की औसत चीनी रिकवरी 9.1 फीसदी की बैठ रही है। राज्य में 22 जनवरी तक कुल 199 फैक्ट्रियों (98 कोऑपरेटिव और 101 प्राइवेट) ने पेराई शुरू की है।

पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में भी इतनी ही चीनी फैक्ट्रियों (98 को ऑपरेटिव और 101 प्राइवेट) ने पेराई आरंभ कर दी थी। पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 554.92 लाख टन गन्ने की पेराई की थी और 49.48 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। औसत चीनी की रिकवरी दर 8.92 फीसदी की थी।

कोल्हापुर डिवीजन ने 165.93 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 17.72 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। कोल्हापुर डिवीजन में रिकवरी की दर 10.68 फीसदी की है। डिवीजन में 37 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 25 सहकारी और 12 प्राइवेट हैं।

इसी तरह से पुणे डिवीजन में कुल 30 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 17 सहकारी और 13 प्राइवेट मिलें है। उन्होंने अब तक 176.92 लाख टन गन्ने की पेराई कर 16.58 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। पुणे डिवीजन की रिकवरी दर 9.37 फीसदी की है।

सोलापुर डिवीजन में कुल 47 फैक्ट्रियां चल रही हैं, जिसमें 17 सहकारी और 30 प्राइवेट हैं। अब तक डिवीजन में 164.77 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 13.53 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। चीनी की रिकवरी दर 8.22 फीसदी की है।

अहमदनगर (अहिल्यानगर) डिवीजन में कुल 26 फैक्ट्रियां, 15 को ऑपरेटिव और 11 प्राइवेट ने पेराई शुरू कर दी हैं। इन सभी फैक्ट्रियों ने अब तक 94.35 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 8.13 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। अहमदनगर डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 8.62 फीसदी है। छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन में कुल 22 चीनी मिलों (13 कोऑपरेटिव और 9 प्राइवेट) ने पेराई शुरू कर दी है तथा उन्होंने 74.1 लाख टन गन्ने की पेराई कर 5.75 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। चीनी की रिकवरी की दर 7.77 फीसदी है।

नांदेड़ डिवीजन में कुल 30 फैक्ट्रियां (10 कोऑपरेटिव और 20 प्राइवेट) चल रही हैं और उन्होंने 80.84 लाख टन गन्ने की पेराई कर 7.22 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 8.93 फीसदी है। अमरावती डिवीजन में एक को ऑपरेटिव और 3 प्राइवेट फैक्ट्रियां चल रही हैं, और उन्होंने 8.21 लाख टन गन्ने की पेराई की है तथा 7.29 लाख क्विंटल चीनी बनाई है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 8.88 फीसदी है।

आंध्र प्रदेश में कपास किसानों पर संकट, सीसीआई द्वारा भुगतान में की जा रही देरी

नई दिल्ली। आंध्र प्रदेश के कपास उगाने वाले किसानों पर संकट बढ़ रहा है, क्योंकि कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने किसानों से खरीदे गई कपास की पेमेंट रोक दी है। हालांकि निगम ने सप्ताह भर के अंदर क्लीयरेंस का भरोसा दिया था। किसानों का आरोप है कि पेमेंट में बेवजह देरी की जा रही है और उनके पास पैसों की तंगी है, जबकि सीसीआई के अधिकारी बेनिफिशियरी की बैंक डिटेल्स में दिक्कतों का हवाला दे रहे हैं।


सीसीआई से जुडे सूत्रों के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर खरीद सिस्टम के तहत कई किसानों के जनधन या पोस्ट-ऑफिस से जुड़े अकाउंट हैं, जो अक्सर इनएक्टिव होते हैं या बड़े ट्रांजैक्शन नहीं कर पाते। कई मामलों में, पासबुक और ई-क्रॉप रिकॉर्ड में महिलाओं को किसान बताया गया है, लेकिन उनसे जुड़े अकाउंट या तो डॉरमेंट रहते हैं या बड़े ट्रांजैक्शन लेने के लिए तैयार नहीं होते हैं।

अक्सर कपास के हर किसान की 2 रुपये लाख से ज्यादा की पेमेंट होती है, तो सीसीआई को गलत क्रेडिट से बचने के लिए सावधानी बरतनी पड़ रही है। अधिकारियों ने कहा कि गलत डिपॉजिट या फेल हुए ट्रांसफर से लंबी एडमिनिस्ट्रेटिव और कानूनी दिक्कतें आ सकती हैं। सीसीआई के एक अधिकारी के अनुसार अगर पेमेंट गलत तरीके से क्रेडिट हो जाती हैं या इनएक्टिव अकाउंट की वजह से अटक जाती हैं, तो उन्हें ठीक करना एक लंबा प्रोसेस बन जाता है। इसलिए, हम हर मामले को अच्छी तरह से वेरीफाई कर रहे हैं।

हालांकि, इस सफाई से किसानों की चिंता कम करने में कोई खास मदद नहीं मिली है। किसानों का तर्क है कि उन्होंने अच्छी नीयत से कपास दिया था और अंदरूनी बैंकिंग या डॉक्यूमेंटेशन की दिक्कतों की कीमत उन्हें नहीं चुकानी चाहिए। कई किसानों को गंभीर लिक्विडिटी की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि लोन चुकाना बाकी है और अगले फसल सीजन की तैयारी चल रही है। इस देरी की वजह से कई परिवारों को प्राइवेट पार्टियों से उधार पर निर्भर रहना पड़ा और जरूरी खर्चों में कटौती करनी पड़ रही है। किसान यूनियनों ने मांग की है कि राज्य और केंद्र सरकार इस मुद्दे को जल्दी से सुलझाने के लिए कदम उठाएं। उन्होंने बताया कि पासबुक और ई-क्रॉप रिकॉर्ड में महिलाओं के नाम दिखना महिला किसानों को पहचानने के लिए पहले के पॉलिसी उपायों का हिस्सा था, और उसी हिसाब से पेमेंट को संभालने के लिए सही सिस्टम बनाए जाने चाहिए थे। विपक्ष ने भी इस मुद्दे को संभालने के तरीके की आलोचना की, यह कहते हुए कि खरीद एजेंसियों, बैंकों और रेवेन्यू अधिकारियों के बीच तालमेल की कमी से किसानों को नुकसान हो रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि लगातार देरी से एमएसपी खरीद में भरोसा कम हो सकता है और किसान प्राइवेट व्यापारियों के पास वापस जा सकते हैं जो कम कीमत पर कपास खरीद रहे हैं।

सीसीआई अधिकारियों ने कहा कि अकाउंट वेरीफाई करने और पेमेंट में तेजी लाने के लिए बैंकों, पोस्ट ऑफिस और कृषि विभागों के साथ कोऑर्डिनेट करने की कोशिशें चल रही हैं। हालांकि, किसानों का कहना है कि अगर बकाया तुरंत जारी नहीं किया गया, तो देरी से राज्य में कपास की खेती पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है।