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18 अप्रैल 2026

मिलों की कमजोर खरीद से अरहर एवं उड़द के साथ चना में गिरावट, मसूर तथा मूंग स्थिर

नई दिल्ली। दाल मिलों की मांग कमजोर बनी रहने से घरेलू बाजार में शुक्रवार को अरहर एवं उड़द के साथ ही चना की कीमतों में मंदा आया, जबकि इस दौरान मसूर एवं के भाव लगभग स्थिर बने रहे।


उत्पादक मंडियों में अरहर, चना, मसूर एवं उड़द के साथ ही मूंग के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी से नीचे बने हुए हैं।

बर्मा से आयातित उड़द एफएक्यू एवं एसक्यू की कीमत चेन्नई में स्थिर हो गई। उड़द एफएक्यू के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के 835 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए, जबकि इस दौरान एसक्यू उड़द के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के 930 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए। लेमन अरहर फसल सीजन 2026 के भाव चेन्नई में अप्रैल एवं मई शिपमेंट के भाव 845 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। लेमन अरहर फसल सीजन 2025 के भाव चेन्नई में अप्रैल एवं मई शिपमेंट के भाव 825 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ बोले गए।

केंद्रीय पूल में दलहन का 22 लाख टन का स्टॉक हैं, जबकि केंद्र सरकार को 35 लाख टन बफर स्टॉक की जरूरत है। केंद्रीय पूल में दलहन के कुल स्टॉक में, मूंग 780,000 टन है, इसके बाद अरहर का स्टॉक 550,000 टन, मसूर का 400,000 टन और चना का लगभग 300,000 टन है। पिछले सीजन में कमजोर खरीद के कारण सरकार के पास उड़द का स्टॉक बहुत कम है।

चेन्नई में उड़द की कीमत स्थिर हो गई, साथ ही इस दौरान बर्मा में इनकी कीमत स्थिर बनी रही। घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग कमजोर बनी रहने लगातार तीसरे दिन उड़द की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। जानकारों के अनुसार अप्रैल मध्य के बाद और मई के मध्य तक म्यांमार से उड़द के कई शिपमेंट आने की उम्मीद है, इसलिए कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। उधर खपत का सीजन होने के बावजूद भी उड़द दाल मांग कमजोर है, जिससे स्टॉकिस्टों में घबराहट पूर्ण बिकवाली बनी हुई है। आगामी दिनों में इसकी कीमतों में तेजी, मंदी गर्मियों की फसल की आवक के साथ ही इसके आयात पड़ते के आधार पर बनेगी। आंध्र प्रदेश में रबी उड़द की लगातार आवक और म्यांमार से आयात की उपलब्धता भी कीमतों पर दबाव डाल रही है। हालांकि उड़द मोगर एवं गोटा में मांग पहले की तुलना में बढ़ी है। केंद्रीय पूल में उड़द का स्टॉक केवल 80,000 टन का ही है। मंडियों में उड़द की कीमत 7,800 रुपये प्रति क्विंटल एमएसपी की तुलना में डेढ़ से दो फीसदी नीचे हैं।

चेन्नई में लेमन अरहर की कीमत स्थिर हो गई, साथ ही इस दौरान बर्मा में इसके दाम लगातार तीसरे दिन भी स्थिर बने रहे। हालांकि घरेलू बाजार में दाल मिलों की मांग कमजोर होने से अरहर की कीमतों में गिरावट जारी रही। व्यापारियों के अनुसार चालू सप्ताह के आरंभ में बर्मा के साथ ही अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के दाम कमजोर हुए थे, जिससे घरेलू बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव है। भाव में चल रही गिरावट को देखते हुए दाल मिलें केवल जरुरत के हिसाब से खरीद कर रही हैं। अरहर की समर्थन मूल्य पर कई राज्यों में खरीद हो रही है लेकिन खरीद भी सीमित मात्रा में ही हो रही है। केंद्र सरकार ने अरहर का समर्थन मूल्य 8,000 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है लेकिन उत्पादक मंडियों में देसी अरहर के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य के मुकाबले सात से आठ फीसदी नीचे आ गए हैं। चालू सीजन में अरहर की समर्थन मूल्य पर खरीद दो लाख टन की हुई है।

अफ्रीकी देशों से आयातित सफेद अरहर के दाम नवा सेवा बंदरगाह पर 685 से 690 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। गजरी के दाम 680 से 685 डॉलर प्रति टन पर स्थिर हो गए। इस दौरान अरुषा अरहर के भाव 730 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए।

दाल मिलों की मांग कमजोर होने से दिल्ली में चना की कीमत 25 रुपये नरम हुई। व्यापारियों के अनुसार चना में बढ़ी हुई कीमतों में मिलों की खरीद का समर्थन नहीं मिल पा रहा। इसलिए दाम कमजोर हुए हैं। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान की उत्पादक मंडियों में चना की दैनिक आवक बराबर बनी हुई है, लेकिन कुल आवक की तुलना में खरीद नहीं बढ़ पा रही। इसलिए चना की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है। हालांकि चालू सीजन में पीली मटर का कुल आयात पिछले साल की तुलना में कम हुआ है, जिससे चना की मांग में बढ़ोतरी का अनुमान है। बंदरगाह पर आयातित का स्टॉक ज्यादा है लेकिन गुजरात एवं कर्नाटक तथा महाराष्ट्र की मंडियों में चना की आवक पहले की तुलना में कम हुई है। उत्पादक मंडियों में देसी चना के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 5,875 रुपये प्रति क्विंटल से 10 फीसदी से ज्यादा नीचे बने हुए हैं।

ऑस्ट्रेलिया से आयातित चना के भाव केंटनर में अप्रैल एवं मई डिलीवरी के 580 डॉलर तथा वैसल में इसके दाम 540 डॉलर प्रति, टन सीएडंएफ पर स्थिर हो गए। तंजानिया के चना के भाव अप्रैल एवं मई शिपमेंट के नवा सेवा बंदरगाह पर 565 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ पर स्थिर हो गए।

चने की समर्थन मूल्य पर खरीद एक लाख टन की हुई है। मध्य प्रदेश और राजस्थान से खरीद बढ़ने की उम्मीद है।

देसी मसूर के दाम दिल्ली में स्थिर हो गए, साथ ही इस दौरान बंदरगाह पर आयातित की कीमत स्थिर बनी रही। व्यापारियों के अनुसार मसूर के भाव में यहां से बड़ी गिरावट के आसार नहीं है, क्योंकि उत्पादक मंडियों में इसके भाव समर्थन मूल्य से काफी नीचे बने हुए हैं। उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की मंडियों में नई फसल की आवक अपेक्षा अनुरूप बढ़ नहीं पा रही है, क्योंकि जानकार उत्पादन कम मान रहे हैं। इस दाल मिलें जरुरत के हिसाब से खरीद ही कर रही है, हालांकि खपत का सीजन होने के कारण मसूर दाल में बिहार एवं बंगाल तथा असम की मांग बनी रहेगी। केंद्रीय पूल में चार लाख टन मसूर का स्टॉक है। मसूर के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 7,000 रुपये प्रति क्विंटल से 3.5 से 4 फीसदी नीचे आ गए हैं।


कनाडा से एक जहाज जिसमें कुल 43,278.110 टन दलहन हैं, (11,000 टन मसूर और 32,278.110 टन पीली मटर) इसके 19 अप्रैल, 2026 को मुंद्रा बंदरगाह पर पहुंचने की उम्मीद है।

मसूर की समर्थन मूल्य पर खरीद सीमित मात्रा में ही हो रही है। केंद्रीय पूल में मसूर का स्टॉक 400,000 टन का है।

मूंग के दाम अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे। व्यापारियों के अनुसार मूंग की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है क्योंकि दाल मिलें जरूरत के हिसाब से ही खरीद कर रही है तथा कई राज्यों में मूंग की समर्थन मूल्य पर खरीद तो हो रही है, लेकिन कुल आवक की तुलना में खरीद सीमित मात्रा में ही हो रही है। मौसम अनुकूल रहा मूंग की आवक उत्पादक मंडियों में अभी बनी रहने की उम्मीद है। चालू समर सीजन में भी मूंग की बुआई बढ़ी है। उधर केंद्रीय पूल मूंग का स्टॉक सबसे ज्यादा है। अत: अभी इसके भाव में बड़ी तेजी मानकर व्यापार नहीं करना चाहिए। मूंग की कीमत उत्पादक मंडियों में एमएसपी 8,768 प्रति क्विंटल की तुलना में 18 से 20 फीसदी नीचे है।

चेन्नई में उड़द एफएक्यू के दाम 50 रुपये कमजोर होकर 7,800 से 7,825 रुपये प्रति क्विंटल रह गए, जबकि एसक्यू के भाव 50 रुपये घटकर 8,400 से 8,425 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

दिल्ली में उड़द एफएक्यू के दाम 75 रुपये घटकर 8,200 से 8,225 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए, जबकि एसक्यू के भाव 8,825 से 8,850 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

मुंबई में उड़द एफएक्यू के दाम 75 रुपये कमजोर होकर 7,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

कोलकाता में उड़द एफएक्यू के दाम 25 रुपये कमजोर होकर 8,100 से 8,125 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

गुंटूर में उड़द पॉलिश के दाम 50 रुपये घटकर 7,850 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। विजयवाड़ा में उड़द पॉलिश के भाव 7,950 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चेन्नई में लेमन अरहर भाव शाम के सत्र में 25 रुपये कमजोर होकर 7,500 से 7,525 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 7,725 से 7,750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

मुंबई में लेमन अरहर के भाव शाम के सत्र में 25 रुपये कमजोर होकर 7,500 से 7,525 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

देसी अरहर के दाम कानपुर, सोलापुर, जलगांव और नागपुर में कमजोर हुए, जबकि अन्य अधिकांश उत्पादक मंडियों में स्थिर बने रहे।

मुंबई में अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के भाव स्थिर हो गए। सूडान से आयातित अरहर के भाव 6,750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान गजरी अरहर के भाव 6,250 से 6,300 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। मतवारा की अरहर का स्टॉक नहीं है। सफेद अरहर के दाम 6,300 से 6,350 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में देसी मसूर के दाम 6,600 से 6,625 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

कनाडा की मसूर के दाम कंटेनर में 6,125 से 6,150 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। जबकि ऑस्ट्रेलिया की मसूर के भाव कंटेनर में 6,075 से 6,125 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। कनाडा की मसूर के दाम मुद्रा बंदरगाह पर 5,925 से 5,950 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। हजिरा बंदरगाह पर इसके दाम 6,000 से 6,025 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। बरेली में देसी मसूर के भाव 6,550 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

दिल्ली में राजस्थान के नए चना के दाम 25 रुपये नरम होकर 5,475 से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मध्य प्रदेश के नए चना का व्यापार 25 रुपये घटकर 5,425 से 5,450 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। जयपुर लाइन के चना के भाव 25 रुपये कमजोर होकर 5,450 से 5,475 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

इंदौर में बोल्ड किस्म के मूंग के दाम 8,200 से 8,400 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। इस दौरान जयपुर में चमकी मूंग के भाव 7,450 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे। राजस्थान लाइन की मूंग के दाम दिल्ली में 7,000 से 7,900 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। अकोला में चमकी मूंग के दाम 8,300 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की 85 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में मध्य अप्रैल तक देशभर के राज्यों में चीनी का उत्पादन बढ़कर 273.90 लाख टन का हुआ है। इसमें महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक की हिस्सेदारी 235 लाख टन के साथ तकरीबन 85 फीसदी है।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के आकड़ों के मुताबिक इन तीन राज्यों ने चीनी उत्पादन में हमेशा अहम भूमिका निभाई है। इन तीन राज्यों में चीनी रिकवरी देखी जाए तो उत्तर प्रदेश 10.20 फीसदी की रिकवरी दर के साथ सबसे आगे है।इसके बाद 9.50 फीसदी की रिकवरी दर के साथ महाराष्ट्र दुसरे और 8.60 फीसदी की रिकवरी के साथ कर्नाटक तीसरे नंबर पर है।

देशभर के राज्यों में 541 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ की थी, जिनमें से 15 अप्रैल तक केवल 21 चीनी मिलों में पेराई चल रही है, बाकि सभी मिलों पेराई बंद कर चुकी है। चालू पेराई सीजन में देश में कुल 2865.21 लाख टन गन्ने की पेराई की गई है। पिछले सीजन की बात करें तो 2024-25 में 534 चीनी मिलों ने पेराई में हिस्सा लिया था और 15 अप्रैल 2025 तक 520 चीनी मिलें बंद हो गई थी। चीनी मिलों द्वारा 2,713.88 लाख टन गन्ना पेराई कर 254.30 लाख टन चीनी उत्पादन हुआ था। चालू सीजन में देश में चीनी रिकवरी की दर पिछले सीजन से ज्यादा बैठी है। देश में औसत चीनी रिकवरी 9.56 फीसदी है जबकि पिछले सीजन में इसी समय औसत चीनी रिकवरी की दर 9.37 फीसदी थी।

चीनी के उत्पादन के मामलें में महाराष्ट्र सबसे आगे है और उत्तर प्रदेश दूसरे नंबर पर है। एनएफसीएसएफ के आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में अब तक 99.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जबकि उत्तर प्रदेश में अब तक 89.20 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। तीसरे नंबर पर कर्नाटक है। कर्नाटक में चालू सीजन में 15 अप्रैल तक 47.15 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।

अन्य राज्यों में गुजरात में मध्य अप्रैल तक 7.50 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि आंध्रप्रदेश  0.70 लाख टन, बिहार में 5.80 लाख टन, हरियाणा में 4.50 लाख टन, मध्य प्रदेश में 4.50 लाख टन, पंजाब में 4.25 लाख टन, तमिलनाडु में 5.30 लाख टन तथा तेलंगाना में 2.00 लाख टन, उत्तराखंड में 2.85 लाख टन और अन्य राज्यों में कुल 0.95 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है।

सीसीआई ने कॉटन के बिक्री दाम बढ़ाए, गुजरात के साथ ही उत्तर भारत में इसके भाव तेज

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई ने बुधवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी की जिससे स्पिनिंग मिलों की खरीद बढ़ने से शाम के सत्र में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई।


सीसीआई ने बुधवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 900 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। इस दौरान निगम ने फसल सीजन 2025-26 की कुल 60,100 गांठ कॉटन की बिक्री की, जिसमें से स्पिनिंग मिलों ने 23,000 गांठ एवं व्यापारियों ने 37,100 गांठ कॉटन की खरीद की।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 300 रुपये तेज होकर 59,600 से 60,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 5,930 से 6,130 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,780 से 5,930 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,800 से 6,130 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 56,300 से 57,300 रुपये कैंडी बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 47,500 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 22 रुपये तेज होकर 1,662 रुपये प्रति 20 किलो हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमत स्थिर हो गई। जानकारों के अनुसार चालू सीजन में मार्च अंत तक उत्पादक मंडियों में 292.74 लाख गांठ से ज्यादा कॉटन की आवक हो चुकी है।

सीसीआई द्वारा बिक्री कीमत तेज करने से स्पिनिंग मिलों की मांग बढ़ गई, जिससे गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी आई। व्यापारियों के अनुसार घरेलू बाजार में अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जबकि यार्न में निर्यात मांग अच्छी बनी हुई है, इसलिए मिलों को कॉटन की ज्यादा खरीद सीसीआई से करनी पड़ रही है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है तथा निगम के पास कॉटन का बंपर स्टॉक है। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

हाल ही में उद्योग ने इसके उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है जबकि चालू सीजन में कॉटन का आयात भी बढ़ेगा, हालांकि प्राइवेट जिनर्स के पास अच्छी क्वालिटी की कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जिस कारण उनकी बिकवाली भी कमजोर बनी हुई है।

अक्टूबर से मार्च के दौरान सोया डीओसी का निर्यात 30.57 फीसदी घटा - सोपा

नई दिल्ली। चालू फसल सीजन 2025-26 के पहली छमाही अक्टूबर 25 से मार्च 26 के दौरान देश से सोया डीओसी का निर्यात 30.57 फीसदी घटकर 7.72 लाख टन का ही हुआ है, जबकि इसके पिछले फसल सीजन की समान अवधि में 11.12 लाख टन का निर्यात हुआ था।


सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सोपा के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों अक्टूबर से मार्च के दौरान 44.98 लाख टन सोया डीओसी का उत्पादन हुआ है, जबकि इसके पिछले साल का करीब 0.68 लाख टन का बकाया स्टॉक बचा हुआ था। इस दौरान 7.72 लाख टन सोया डीओसी का निर्यात हुआ है जबकि 4.20 लाख टन की खपत फूड में एवं 32.50 लाख टन की फीड में हुई है। अत: पहली अप्रैल 2026 को मिलों के पास 1.24 लाख टन सोया डीओसी का बकाया स्टॉक बचा हुआ है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.10 लाख टन से ज्यादा है।

सोपा के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों में देशभर की उत्पादक मंडियों में 63 लाख टन सोयाबीन की आवक हुई है, जबकि मार्च अंत तक 57 लाख टन की पेराई हुई है। इस दौरान 2.80 लाख टन सोयाबीन की खपत डारेक्ट हुई है जबकि 0.11 लाख टन का निर्यात हुआ है। अत: प्लांटों एवं व्यापारियों तथा किसानों के पास पहली अप्रैल 2026 को 51.10 लाख टन सोयाबीन का बकाया स्टॉक बचा हुआ है, जोकि इससे पिछले साल की समान अवधि के 63.01 लाख टन की तुलना में कम है।

सोपा के अनुसार फसल सीजन 2025-26 में देश में सोयाबीन का उत्पादन 110.26 लाख टन का हुआ था, जबकि 7.66 लाख टन का बकाया स्टॉक नई फसल की आवक के समय बचा हुआ था। अत: कुल उपलब्धता 117.92 लाख टन की बैठी है, जबकि फसल सीजन 2025-26 के पहले छह महीनों में ही करीब 6 लाख टन सोयाबीन का आयात हुआ है। फसल सीजन 2024-25 में 128.82 लाख टन सोयाबीन का उत्पादन हुआ था, जबकि नई फसल की आवक के समय 8.94 लाख टन का बकाया स्टॉक बचा हुआ था। अत: कुल उपलब्धता 137.76 लाख टन की बैठी थी, जबकि 0.02 लाख टन का ही आयात हुआ था।

14 अप्रैल 2026

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले पांच महीनों नवंबर-25 एवं मार्च-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़कर 6,572,131 टन का हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 6,096,923 टन का हुआ था। मार्च 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (फरवरी, 2026) के 12.92 लाख टन की तुलना में 10 फीसदी होकर 11.93 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार मार्च 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 11 फीसदी बढ़कर 1,186,569 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल मार्च में इनका आयात 1,073,023 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,173,168 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 13,401 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि भारत के खाद्य तेलों के आयात में पिछले साल समान अवधि के मुकाबले 8 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई है, जो विश्व सप्लाई पर लगातार इंडिपेंडेंस दिखाता है। हालांकि, मार्च में फरवरी की तुलना में गिरावट से पता चलता है कि विश्व बाजार में दाम तेज होना तथा रुपये में गिरावट और घरेलू उपलब्धता, खासकर सरसों की फसल आने की वजह से मांग प्रभावित हुई है।

दिसंबर और फरवरी के बीच आयात में तेज बढ़ोतरी विश्व बाजार में सप्लाई में रुकावट की चिंताओं की ओर इशारा करती है, खासकर सूरजमुखी के तेल पर असर डालने वाले चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष, पाम तेल के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में सप्लाई-साइड की अनिश्चितताओं और मिडिल ईस्ट तनाव के कारण बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत है। इसके अलावा, बड़े उत्पादक देशों में बायोफ्यूल की ओर झुकाव सहित मजबूत विश्व की मांग ने कीमतों को स्थिर रखा है, जिससे भारतीय रिफाइनर सावधानी से इंतजार करों एवं देखो की नीति अपना रहे हैं।

जानकारों के अनुसार आगे चलकर, जब तक विश्व बाजार में कीमत नरम नही होती या करेंसी की हालत बेहतर नहीं होती, तब तक शॉर्ट टर्म में आयात कम रहने की संभावना है, जबकि लॉन्ग टर्म में, देश जियोपॉलिटिकल रिस्क को कम करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी पर फोकस करने के साथ ही आयात को बैलेंस करना जारी रख सकता है।

नवंबर’25 से मार्च’26 के दौरान नेपाल ने लगभग 162,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया है, जिसमें 142,133 टन रिफाइंड सोया तेल, 12,123 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 6,793 टन आरबीडी पामोलिन शामिल है। फरवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 55,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल के अलावा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से मार्च 26 के दौरान 952,170 टन के मुकाबले केवल 192,486 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से मार्च 25 के दौरान 4,978,288 टन के मुकाबले 6,260,337 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। रिफाइंड तेल का रेश्यो तेजी से घटकर 16 फीसदी से 3 फीसदी ही रह गया, जबकि क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 97 फीसदी हो गया।

नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि देश इंडोनेशिया और मलेशिया से क्रूड पाम तेल के आयात पर सबसे ज्यादा निर्भर है। दोनों मिलकर 2.8 मिलियन टन से ज्यादा का योगदान देते हैं, जिससे भारत की खाने के तेल की मुख्य जरूरतों के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया पर निर्भरता ज्यादा है। साथ ही अर्जेंटीना और ब्राजील सोया तेल के आयात के लिए रीढ़ बने हुए हैं, जबकि रूस और यूक्रेन, ब्लैक सी क्षेत्र में चल रहे जियोपॉलिटिकल तनाव के बावजूद, सूरजमुखी तेल के जरूरी सप्लायर बने हुए हैं।

इंडोनेशिया द्वारा भविष्य में निर्यात पर रोक, बायोडीजल की शर्तें, या रूस-यूक्रेन संघर्ष में बढ़ोतरी जैसी कोई भी रुकावट सीधे देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर असर डाल सकती है। रिफाइंड तेलों के लिए नेपाल का आयात के रूप में उभरना, भारत को घरेलू रिफाइनिंग क्षमता को कम करके और रेवेन्यू लीकेज की वजह से नुकसान पहुंचा रहा है।

कॉटन का उत्पादन बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ, (एक गांठ 170 किलो) बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 320.50 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया। मार्च में उद्योग ने एक फिर इसे बढ़ाकर 320.50 लाख गांठ कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार महाराष्ट्र में कॉटन का उत्पादन इसके पहले के अनुमान से 7 लाख गांठ ज्यादा होने की उम्मीद है, जबकि गुजरात में पहले के अनुमान में 3 लाख गांठ एवं मध्य प्रदेश में 50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 194.50 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 72 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 105 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 17.50 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार पहली अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक प्रमुख उत्पादक राज्यों की मंडियों में 292.74 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है। अभी तक कुल आवकों में उत्तर भारत के राज्यों में 27.10 लाख गांठ की आवक हुई है जिसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 6.50 लाख गांठ तथा अपर राजस्थान की 10.90 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान की 8.20 लाख गांठ है।

मध्य भारत के राज्यों में 31 मार्च तक 171.43 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें गुजरात की हिस्सेदारी 58.44 लाख गांठ, महाराष्ट्र की 96.39 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 16.60 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में मार्च अंत तक 88.86 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें तेलंगाना में 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश में 17.06 लाख गांठ तथा कर्नाटक में 24.75 लाख गांठ के अलावा तमिलनाडु में 2.05 लाख गांठ की हिस्सेदारी है।

ओडिशा में चालू सीजन में मार्च अंत तक 3.35 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ की आवक हुई है।

यूरोप में शिपमेंट बढ़ाने हेतु केंद्र ने चावल के निर्यात नियमों दी छूट, घरेलू बाजार में भाव तेज

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कई यूरोपीय देशों को छह महीने के लिए बिना किसी जरूरी इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट के बासमती और नॉन-बासमती चावल का निर्यात करने की इजाजत दे दी है। घरेलू बाजार में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी बनी हुई है। गेहूं की सरकारी खरीद शुरू होने के कारण हरियाणा एवं पंजाब की मंडियों में धान की आवक लगभग बंद है।


केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी एक अधिसूचना के अनुसार यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों, यूनाइटेड किंगडम, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के लिए निर्यात इंस्पेक्शन एजेंसियों से सर्टिफिकेशन की जरूरत जारी रहेगी, जबकि दूसरे यूरोपीय देशों को इस दौरान छूट दी गई है।

घरेलू बाजार में हाल ही में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी आई है। दिल्ली की नजफगढ़ मंडी में पूसा 1,121 किस्म के धान के भाव तेज होकर शुक्रवार को 4,871 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इस दौरान हरियाणा की गोहाना मंडी में 1,885 किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,400 से 4,800 रुपये तथा राजस्थान की कोटा मंडी में 1,509 किस्म के धान के दाम तेज होकर 3,900 से 4,200 रुपये और 1,718 किस्म के धान के भाव 4,000 से 4,661 रुपये तथा डीपी किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,000 से 4,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

राजस्थान लाइन से 1,718 किस्म के सेला चावल का व्यापार 8,500 से 8,700 रुपये तथा पंजाब लाईन 1885 किस्म के स्टीम चावल का व्यापार 9,400 से 9,600 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। दिल्ली के नया बाजार में 1,121 किस्म के सेला चावल का भाव 9,400 से 9,600 तथा इसके स्टीम चावल का भाव 10,200 से 10,400 रुपये प्रति क्विंटल रहा।  

इस कदम का मकसद विश्व बाजार में बढ़ती मांग के समय चावल निर्यात को सपोर्ट देना है। द हंस इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत का चावल निर्यात 12.95 बिलियन डॉलर था, जबकि दालों और बाजरे के शिपमेंट की कीमत क्रमशः 855 मिलियन डॉलर और 59.20 मिलियन डॉलर थी, जो दुनिया भर में अलग-अलग तरह के अनाजों की बढ़ती मांग को दिखाता है।

केंद्रीय यूनियन कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्री पीयूष गोयल ने पहले कहा था कि 2014 और 2025 के बीच चावल का निर्यात 62 फीसदी बढ़ा है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में भारत की बढ़ती मौजूदगी को दिखाता है।

देश में चावल का उत्पादन मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के साथ ही मध्य प्रदेश और राजस्थान तथा बिहार आदि राज्यों में होता है, जबकि गेहूं का उत्पादन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में सबसे ज्यादा होता है।

इस साल की शुरुआत में, भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई ने ग्लोबल मानवीय कामों के लिए 200,000 टन चावल सप्लाई करने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के साथ एक एग्रीमेंट साइन किया था। यह एग्रीमेंट पांच साल के लिए अधिकृत है, और इसमें 31 मार्च, 2026 तक मौजूदा कीमत 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है।