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09 जुलाई 2026

कोल्हापुर में गुड़ के दाम बढ़कर उच्चतम स्तर पर पहुंचे

कोल्हापुर: महाराष्ट्र के कोल्हापुर कृषि उपज मंडी में प्रथम श्रेणी के गुड़ का भाव 5,500 रुपये प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। व्यापारियों के अनुसार, गुजरात के कोल्ड स्टोरेज में गुड़ का स्टॉक कम होने और कोल्हापुर जिले में उत्पादन घटने से बाजार में मांग बढ़ गई है, जिससे कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। विशेष बात यह है कि, गुड़ को मौजूदा समय में उसके मुख्य उत्पादन सीजन की तुलना में भी अधिक कीमत मिल रही है।

जानकारों के मुताबिक, कोल्हापुर कृषि उपज मंडी में आने वाले अधिकांश गुड़ की आपूर्ति गुजरात की मंडियों में की जाती है। कोल्हापुर, सांगली और कर्नाटक से आने वाला गुड़ अहमदाबाद, मेहसाणा और हिम्मतनगर स्थित कोल्ड स्टोरेज में संग्रहित किया जाता है। हर साल मार्च के बाद इन कोल्ड स्टोरेज से गुड़ की निकासी शुरू होती है, लेकिन इस वर्ष वहां गुड़ का भंडारण अपेक्षाकृत कम रहा है। इसका सीधा असर बाजार में मांग और कीमतों पर पड़ा है।

पहले गुड़ का उत्पादन मुख्य रूप से अक्टूबर से मार्च के बीच ही होता था, इसलिए बड़ी मात्रा में गुड़ को गुजरात के कोल्ड स्टोरेज में रखा जाता था। लेकिन पिछले करीब दस वर्षों में स्थिति बदल गई है। अब कई क्षेत्रों में सालभर गुड़ का उत्पादन होने लगा है, जिसके कारण कोल्ड स्टोरेज में भंडारण की मात्रा पहले की तुलना में कम हो गई है।

हाल ही में खाद्य एवं औषधि विभाग द्वारा पुणे जिले के कुछ गुड़ निर्माण केंद्रों पर की गई कार्रवाई का असर कोल्हापुर के उत्पादकों पर भी पड़ा। कार्रवाई की आशंका के चलते कई गुड़ निर्माताओं ने कुछ समय के लिए अपनी गुड़ भट्टियां बंद रखीं।हालांकि, उत्पादन पूरी तरह बंद नहीं हुआ और चीनी मिलों का पेराई सत्र समाप्त होने के बाद भी कई गुड़ निर्माण इकाइयों में काम जारी है

बुधवार को कोल्हापुर कृषि उपज मंडी में 30 किलोग्राम के 7,450 गुड़ के ढेपों की आवक दर्ज की गई। व्यापारियों का कहना है कि, बाजार में गुड़ की मांग लगातार बनी हुई है, जबकि आवक अपेक्षाकृत कम है। इसी कारण गुड़ के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।

तमिलनाडु के गन्ना किसानों ने एफआरपी 5,500 रुपये प्रति टन तय करने की मांग की

तिरुचिरापल्ली: केंद्र सरकार द्वारा 2026-27 चीनी सत्र के लिए गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरी) 3,600 रुपये प्रति टन निर्धारित किए जाने पर तमिलनाडु के गन्ना किसानों ने नाराजगी जताई है। किसानों का कहना है कि, 100 रुपये प्रति टन की बढ़ोतरी खेती की लगातार बढ़ती लागत के मुकाबले बेहद कम है।


तमिलनाडु कावेरी किसान संरक्षण संघ के सचिव एस. विमलनाथन ने कहा कि, सरकार द्वारा घोषित मूल्य न तो उचित है और न ही लाभकारी। उन्होंने कहा, खेती में उपयोग होने वाले सभी इनपुट की लागत लगातार बढ़ी है, लेकिन किसानों को उसके अनुरूप लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा। वर्तमान उत्पादन लागत को देखते हुए एफआरी कम से कम 5,500 रुपये प्रति टन होना चाहिए।

लालगुडी के निकट कोप्पावली गांव के किसान केएसटी अंगमुथु के अनुसार चीनी मिलों की आय केवल चीनी बिक्री तक सीमित नहीं है। उन्होंने कहा कि मिलें बिजली उत्पादन, कागज निर्माण, एथेनॉल, जैव उर्वरक और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों से भी अच्छी कमाई करती हैं। ऐसे में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन अतिरिक्त आय का उचित हिस्सा भी किसानों को एफआरपी के माध्यम से मिले।

अंगमुथु ने बताया कि एक एकड़ गन्ने की खेती पर 45,000 से 50,000 रुपये तक खर्च आता है, जबकि किसानों को इससे केवल 55,000 से 60,000 रुपये की आय होती है। कम मुनाफे के कारण उन्होंने अपनी गन्ने की खेती 10 एकड़ से घटाकर 5 एकड़ कर दी है। अरिग्नार अन्ना शुगर मिल गन्ना उत्पादक संघ के अध्यक्ष पी. रामासामी ने बताया कि तंजावुर की चीनी मिल पहले हर वर्ष करीब 6 लाख टन गन्ने की पेराई करती थी, लेकिन अब यह घटकर लगभग 1.40 लाख टन रह गई है।

उन्होंने कहा कि जिले में गन्ने का रकबा भी 15 हजार एकड़ से घटकर लगभग 3,500 एकड़ रह गया है। इसका मुख्य कारण खेती की बढ़ती लागत और किसानों को पर्याप्त मूल्य नहीं मिलना है। रामासामी ने केंद्र सरकार से मांग की कि गन्ने की उत्पादन लागत को ध्यान में रखते हुए FRP में फिर से संशोधन किया जाए, ताकि किसानों को लाभकारी मूल्य मिल सके और गन्ना खेती को बढ़ावा मिले।

कमजोर मानसून से गुजरात में खरीफ फसलों की बुआई पिछड़ी - कृषि निदेशालय

नई दिल्ली। मानसूनी बारिश की कमी से गुजरात में चालू खरीफ सीजन 2026 फसलों की बुआई पीछे चल रही है। राज्य में 6 जुलाई तक केवल 1,854,564 हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 4,305,997 हेक्टेयर में हो चुकी थी। अत: राज्य में अभी कुल 21.74 फीसदी में ही फसलों की बुआई हो पाई है।


भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी के अनुसार पहली जून से 7 जुलाई तक गुजरात रीजन में सामान्य की तुलना में 12 फीसदी और सौराष्ट्र तथा कच्छ में इस दौरान सामान्य के मुकाबले 17 फीसदी कम बारिश हुई है। जानकारों के अनुसार जुलाई में राज्य में बारिश में सुधार आया है इसलिए आगामी दिनों में फसलों की बुआई में तेजी आने का अनुमान है।

राज्य के कृषि निदेशालय के अनुसार 6 जुलाई तक कपास की बुआई घटकर 931,926 हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 1,710,610 हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। सामान्यत राज्य में कपास की बुआई 2,383,232 हेक्टेयर में होती है। अत: सामान्य के हिसाब से कुल बुआई अभी तक केवल 30.1 फीसदी ही हुई है।

चालू खरीफ सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई घटकर 666,029 हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 1,936,845 हेक्टेयर में हो चुकी थी। खरीफ तिलहन की प्रमुख फसल मूंगफली की बुआई चालू खरीफ सीजन में घटकर 628,888 हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 1,759,081 हेक्टेयर में इसकी बुआई हो चुकी थी। इस दौरान सोयाबीन की बुआई 35,200 हेक्टेयर में एवं शीशम की 901 हेक्टेयर के अलावा कैस्टर सीड की 1,041 हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू खरीफ सीजन में दालों की बुआई घटकर 15,498 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 73,162 हेक्टेयर में हो चुकी थी। अरहर की बुआई राज्य में अभी तक केवल 14,097 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 48,717 हेक्टेयर में इसकी बुआई हो चुकी थी। उड़द की बुआई राज्य में केवल 820 हेक्टेयर में तथा मूंग की 540 हेक्टेयर में ही हुई है। पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 11,085 हेक्टेयर एवं 12,080 हेक्टेयर में हो चुकी थी।

धान के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई घटकर 76,683 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 164,515 हेक्टेयर में ही बुआई हो चुकी थी। धान की रोपाई 30,435 हेक्टेयर में तथा मक्का की बुआई 37,101 हेक्टेयर के अलावा बाजरा की 8,534 हेक्टेयर में ही हुई है।

एल नीनो से बढ़ा खतरा, कमजोर मानसून से ग्रामीण मांग और एफएमसीजी कारोबार पर पड़ सकता है असर : रिपोर्ट

 नई दिल्ली: भारत में उभरते एल नीनो प्रभाव के कारण सामान्य से कमजोर मानसून की आशंका बढ़ गई है, जिसका असर देश के एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) क्षेत्र और ग्रामीण खपत पर पड़ सकता है। ब्रोकरेज फर्म फिलिप कैपिटल (Phillip Capital) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि, यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय और उपभोक्ता मांग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, जून महीने में देश में सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। वहीं, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जुलाई में भी सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है।रिपोर्ट में कहा गया है कि, कमजोर मानसून से कृषि उत्पादन प्रभावित होगा, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ेंगी और इसका असर कुछ समय बाद एफएमसीजी उत्पादों की मांग पर भी दिखाई देगा।

दक्षिण-पश्चिम मानसून जून से सितंबर तक चलता है और देश की करीब 80 प्रतिशत वार्षिक वर्षा इसी दौरान होती है। यही अवधि खरीफ फसलों की बुवाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि धान, दलहन, तिलहन, कपास और गन्ना जैसी प्रमुख फसलें मानसून पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में कमजोर बारिश से इन फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ेगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, यदि मानसून कमजोर रहता है तो शुरुआत में व्यापारियों द्वारा स्टॉक कम किया जा सकता है, जिससे बाजार में मांग कमजोर पड़ सकती है। इसके बाद अगले एक-दो महीनों में कृषि उत्पादन घटने से खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है। ऐसी स्थिति में परिवार गैर-जरूरी खर्चों में कटौती कर आवश्यक वस्तुओं की खरीद को प्राथमिकता देंगे, जिससे एफएमसीजी उत्पादों की बिक्री प्रभावित हो सकती है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कमजोर खरीफ उत्पादन का सबसे अधिक असर वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में किसानों की आय पर पड़ेगा। इसका प्रभाव दो से तीन महीने बाद ग्रामीण खपत में गिरावट के रूप में सामने आ सकता है। फिलिप कैपिटल ने चेतावनी दी है कि यदि एल नीनो का प्रभाव मजबूत रहता है और मानसून कमजोर पड़ता है, तो इसका पूरा असर वर्ष के अंत तक अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देगा।

हालात पहले से बेहतर, लेकिन जोखिम बरकरार

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2015-16 और 2023 की तुलना में इस बार एल नीनो का असर कुछ कम हो सकता है। इसकी वजह पिछले दो वर्षों में अच्छे मानसून के कारण किसानों की बेहतर आय, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में वृद्धि और सिंचाई सुविधाओं का विस्तार है। रिपोर्ट के अनुसार, अब देश में लगभग 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र सिंचाई सुविधाओं से जुड़ चुका है, जबकि वित्त वर्ष 2015-16 में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत था। इसके अलावा, देश के जलाशयों में जल स्तर भी दीर्घकालिक औसत से करीब 19 प्रतिशत अधिक है, जिससे वर्षा की कमी की स्थिति में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि यदि मानसून वास्तव में कमजोर रहता है, तो उसका वास्तविक प्रभाव 2026 के अंत तक अधिक स्पष्ट रूप से देखने को मिलेगा।

08 जुलाई 2026

जुलाई में मानसून की रफ्तार से मिली राहत, कम वर्षा वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 हुई: शिवराज सिंह चौहान

 नई दिल्ली : संभावित अल नीनो के प्रभाव के बीच मानसून को लेकर बनी अनिश्चितता के बावजूद केंद्र सरकार ने कहा है कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और इससे निपटने के लिए पूरी तैयारी की गई है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि, जून में बारिश की कमी के बाद जुलाई में मानसून की स्थिति में सुधार देखने को मिला है। उन्होंने कहा कि, जून में देशभर में 33 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई थी, जो जुलाई में घटकर 24 प्रतिशत रह गई है। हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों में हुई अच्छी बारिश के कारण कम वर्षा वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 हो गई है।

उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के बाद शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा सहित कई राज्यों की विशेष निगरानी की जा रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जुलाई में मानसून और सक्रिय होगा, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आएगी।

पिछले साल की तुलना में कम हुई बुवाई…

केंद्रीय मंत्री के अनुसार, अब तक 350.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 91.95 लाख हेक्टेयर कम है। उन्होंने बताया कि, मानसून में देरी का सबसे अधिक असर सोयाबीन और कपास की फसल पर पड़ा है। ऐसे में किसानों को कम अवधि और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों जैसे मक्का, बाजरा और मूंग की खेती अपनाने की सलाह दी गई है।

अप्रैल से शुरू कर दी गई थी तैयारी…

शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि सरकार ने संभावित चुनौती को देखते हुए अप्रैल से ही तैयारी शुरू कर दी थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहयोग से प्रभावित होने वाले जिलों के लिए आकस्मिक कार्ययोजना (कंटीजेंसी प्लान) तैयार कर राज्यों को भेजी गई है। उन्होंने बताया कि, जून में चलाए गए ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत देशभर में 1.24 लाख से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनके माध्यम से 80 लाख से ज्यादा किसानों तक सीधी पहुंच बनाई गई।

1.75 लाख क्विंटल बीज का राष्ट्रीय भंडार तैयार…

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि, किसी भी स्थिति में बुवाई प्रभावित न हो, इसके लिए करीब 1.75 लाख क्विंटल बीज का राष्ट्रीय भंडार तैयार रखा गया है। इसके साथ ही किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) अभियान को भी तेज किया गया है। 30 जून तक प्राप्त 1.14 लाख आवेदनों में से 94 हजार से अधिक को मंजूरी दी जा चुकी है।

फसल बीमा और निगरानी व्यवस्था पर जोर…

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि, किसानों को प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान से आर्थिक सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अधिक से अधिक किसानों को जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि, संभावित अल नीनो को देखते हुए एल नीनो मॉनिटरिंग सेल, क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप, राज्य स्तरीय कंट्रोल रूम और नियुक्त अधिकारी लगातार मानसून, बुवाई, फसल की स्थिति और बाजार पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि, सरकार केवल स्थिति पर नजर नहीं रख रही, बल्कि समयबद्ध रणनीति, पर्याप्त संसाधनों और मजबूत कार्ययोजना के साथ हर चुनौती का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।