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12 सितंबर 2026

चालू खरीफ में फसलों की बुआई 1.4 फीसदी कम होकर 1,097 लाख हेक्टेयर में हुई - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। देश में चालू खरीफ सीजन में फसलों की बुवाई 1,097 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 1.4 फीसदी पीछे है। पिछले साल इस समय तक देशभर में 1,113 लाख हेक्टेयर में इनकी बुआई हो चुकी थी।

भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी के अनुसार 1 जून से 10 सितंबर के दौरान देश में सामान्य 766.6 मिमी बारिश के मुकाबले केवल 650.5 मिमी बारिश ही हुई है। अत: इस अवधि के दौरान सामान्य की तुलना में 15 फीसदी कम बारिश हुई है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार के अनुसार चालू खरीफ सीजन प्रमुख फसल धान की रोपाई इस साल लगभग 4 फीसदी घटकर 427 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, और मक्का की बुआई इस साल लगभग 3 फीसदी घटकर 92 लाख हेक्टेयर रह गई। दालों का कुल बुआई 119 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल की तुलना में 1 फीसदी ज्यादा है।

खरीफ की प्रमुख दलहनी फसल अरहर की बुआई चालू खरीफ में बढ़कर 46.1 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 45.5 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इसी तरह से उड़द की बुआई बढ़कर चालू खरीफ सीजन में 25.5 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 22.8 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

हालांकि मूंग की बुआई चालू खरीफ सीजन में घटकर 33.3 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 34.5 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

मोटे अनाज की बुआई 183.2 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जो पिछले साल के 182.5 लाख हेक्टेयर से 0.4 फीसदी बढ़ी है। मक्का की बुवाई 2.65 फीसदी घटकर 91.6 लाख हेक्टेयर ही हुई है, जबकि पिछले साल यह 94.1 लाख हेक्टेयर हो चुकी थी। इस दौरान ज्वार की बुआई 8.73 फीसदी बढ़कर 13.7 लाख हेक्टेयर में और बाजरा की बुआई 3.18 फीसदी बढ़कर 64.9 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 12.6 लाख हेक्टेयर में तथा 62.9 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

तिलहनी फसलों की बुआई चालू खरीफ सीजन में पिछले साल की बुआई के लगभग बराबर 194 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि मूंगफली और सोयाबीन की बुआई लगभग एक साल पहले के बराबर हुई है। मंत्रालय के डेटा से पता चला कि सूरजमुखी की बुआई एक साल पहले के मुकाबले 92 फीसदी ज्यादा है। सोयाबीन की बुआई अब तक 122 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो एक साल पहले की तुलना केवल 0.8 फीसदी कम है। मूंगफली की बुआई अब तक 50.5 लाख हेक्टेयर में हुई है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 0.4 फीसदी कम है।

गन्ने की बुआई पिछले साल की तुलना में थोड़ा घटकर होकर 59 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जो पिछले साल से 0.7 फीसदी कम है। कॉटन का रकबा घटकर 109 लाख हेक्टेयर ही रह गया, जो पिछले साल की तुलना में लगभग 1 फीसदी कम है। खरीफ फसलों की बुआई लगभग पूरी हो चुकी है।

वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में तिलहन का आयात, निर्यात की तुलना में बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। देश में चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान मूल्य और मात्रा दोनों के हिसाब से तिलहन का आयात, निर्यात की तुलना में बढ़ा है।

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के द्वारा जारी किए गए, डीजीएफटी के डेटा से पता चलता है कि देश में अप्रैल से जून 2026 के दौरान 2,618 करोड़ रुपये कीमत की 209,197 टन तिलहन का निर्यात किया। मात्रा और मूल्य दोनों के हिसाब से, मूंगफली और तिल का निर्यात में सबसे बड़ा हिस्सा रहा। वहीं, देश ने इसी अवधि के दौरान 5,80,119 टन तिलहन का आयात भी किया, जिनमें मुख्य रूप से सोयाबीन और तिल के बीज शामिल हैं, जिनकी कीमत 3,146 करोड़ रुपये है।

देश से निर्यात में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी मूंगफली की रही। अप्रैल से जून 2026 के दौरान, छिलके वाली मूंगफली का निर्यात 133,861 टन हुआ, जिसकी कीमत 1,550 करोड़ रुपये है। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने लगभग 663,809 टन मूंगफली निर्यात की थी, जिसकी कीमत 6,092 करोड़ रुपये थी। इसके निर्यात में इंडोनेशिया, वियतनाम, मलेशिया, चीन और फिलीपींस मुख्य रहे।

इसका निर्यात केवल कच्चे दानों तक ही सीमित नहीं है। ग्रेडेड, कैलिब्रेटेड, ब्लैंच्ड, रोस्टेड और प्रोसेस्ड मूंगफली उत्पादों के निर्यात पर ज्यादा जोर दिया जा सकता है, जिससे भारतीय निर्यातक ज्यादा मूल्य वाले सेगमेंट की ओर बढ़ सकें और फूड मैन्युफैक्चरर्स और रिटेल मार्केट्स के साथ लंबे समय के रिश्ते बना सकें।

एसईए के अनुसार अप्रैल-जून 2026 के दौरान 61,248 टन तिल का निर्यात हुआ, जिसने 945 करोड़ रुपये का योगदान दिया। इसकी तुलना में ज्यादा मात्रा इसके निर्यात से होने वाली कमाई के लिए एक जरूरी चीज बनाती है। साफ किए हुए, मशीन से छांटे गए, प्रोसेस किए हुए और वैल्यू-एडेड तिल के लिए बाजार बढ़ाने की गुंजाइश है, खासकर जहाँ खरीदार एक जैसी क्वालिटी, ट्रेसेब्लिटी और फूड-सेफ्टी का पालन चाहते हैं।

सरसों, अलसी, कुसुम और दूसरे तिलहन की हिस्सेदारी अभी देश के निर्यात बास्केट में कम हैं जबकि इन के लिए खास विदेशी मार्केट बनाने से निर्यात के और मौके बन सकते हैं।

एसईए के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के दौरान देश ने 3,146.98 करोड़ रुपये की कीमत के 580,119 टन तिलहन का आयात किया। अत: आयात बास्केट में सोयाबीन और तिल के बीज की हिस्सेदारी ज्यादा है, जो कुल आयात मात्रा का लगभग 99.25 फीसदी और कुल आयात मूल्य का 99.15 फीसदी थे। पिछले वित्त वर्ष 2025-26 की समान अवधि में देश  ने 3,130 करोड़ रुपये की कीमत के 481,000 टन अलग-अलग तिलहन आयात किए थे।

पहली तिमाही में सोयाबीन का आयात 5,50,000 टन तक पहुंच गया, जिसकी कीमत 2,931 करोड़ रुपये है, जो कुल आयात की गई मात्रा का 96 फीसदी और कुल आयात मूल्य का 93 फीसदी है। इस इस दौरान देश के ऑयल सीड आयात बास्केट में सोयाबीन सबसे बड़ा हिस्सा बन गया है। यह मुख्य रूप से इंडिया अफ्रीका ट्रेड एग्रीमेंट के तहत ‘लीस्ट डेवलप कंट्रीज़’ (एलडीसी) से बिना किसी ड्यूटी पर आयात किया जाता है।

चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में डीओसी का निर्यात 13 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान देश से डीओसी के निर्यात में 13 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 957,224 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में इनका निर्यात 1,094,593 टन का हुआ था।

सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार जून में देश से डीओसी के निर्यात में 31 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 217,757 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जून में इसका निर्यात 313,404 टन का हुआ था।

एसईए के अनुसार भारतीय सोया डीओसी के निर्यात को साउथ अमेरिकन कॉम्पिटिटर (अर्जेंटीना और ब्राजील) के सस्ते भाव से नुकसान हो रहा है, जिस कारण इसके निर्यात में भारी गिरावट दर्ज की गई।

साथ ही घरेलू बाजार में कीमतों में हुई बढ़ोतरी और पशु चारे में मांग बढ़ने से बड़े पैमाने पर  निर्यात शिपमेंट के लिए कुल उपलब्धता में कमी की।

रेड सी शिपिंग में रुकावटों और परिवहन लागत ज्यादा होने की वजह से डीओसी की शिपमेंट में गिरावट आई।

एशियाई मार्केट, चीन द्वारा सरसों डीओसी के आयात में बढ़ोतरी ने दूसरे उत्पादों में भारी कमी को कम करने में जरूर मदद की। घरेलू मार्केट में सोया डीओसी की कमी को डीडीजीएस की सप्लाई बढ़ाकर कुछ हद तक पूरा किया गया है। जिससे मवेशियों और पोल्ट्री फीड में ट्रेडिशनल ऑयलमील के इस्तेमाल की जगह ले ली।

अप्रैल से जून 2026 के दौरान, चीन, बांग्लादेश और वियतनाम भारतीय डीओसी के बड़े आयातक बनकर उभरे।

चीन ने अप्रैल से जून 2026 के दौरान 313,384 टन डीओसी आयात किया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 187,361 टन डीओसी का आयात किया था। इसके आयात में 309,650 टन सरसों डीओसी, 1,616 टन कैस्टर डीओसी और 2,118 टन सोया डीओसी शामिल है।

बांग्लादेश ने अप्रैल से जून के दौरान 143,013 टन डीओसी का आयात किया, जबकि एक साल पहले की समान अवधि में 126,351 टन का आयात किया था। इसके आयात में 133,898 टन सरसों डीओसी, 8,204 टन सोया डीओसी और 911 टन राइस ब्रान एक्सट्रैक्शन शामिल है।

भारतीय बंदरगाह पर जुलाई की तुलना में अगस्त में सोया डीओसी का भाव तेज होकर 622 डॉलर प्रति टन हो गए, जबकि जुलाई में इसका दाम 617 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य अगस्त में भारतीय बंदरगाह पर 253 डॉलर प्रति टन पर स्थिर रहा, क्योंकि जुलाई में भी इसका भाव 253 डॉलर प्रति टन ही था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जुलाई के 108 डॉलर प्रति टन से तेज होकर अगस्त में 110 डॉलर प्रति टन हो गया।

चीनी की बढ़ती कीमतों पर अंकुश हेतु महाराष्ट्र में 15 अक्टूबर से शुरू होगा नया पेराई सीजन

नई दिल्ली। त्योहारों के मौसम में चीनी की बढ़ती कीमतों पर अंकुश लगाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने 15 अक्टूबर 2026 से नया गन्ना पेराई सीजन आरंभ करने का फैसला किया है। राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक में यह महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया।


चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र के साथ ही राज्य सरकार की ओर से विभिन्न उपाय किए जा रहे हैं तथा त्योहारी सीजन में चीनी की बढ़ती मांग को देखते हुए राज्य सरकार ने 15 अक्टूबर से गन्ने का पेराई सीजन शुरू करने का फैसला लिया है। मुंबई के सह्याद्री अतिथि गृह में हुई इस बैठक में सहकारिता मंत्री बाबासाहेब पाटील, उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार, पूर्व मंत्री दिलीप वलसे-पाटील के साथ ही विभिन्न चीनी मिल संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित थे। बैठक के बाद महाराष्ट्र के गन्ना आयुक्त डॉ. संजय कोलते ने गन्ने की पेराई का सीजन 15 अक्टूबर 2026 से शुरू करने की जानकारी दी।

पिछले सीजन में विभिन्न कारणों से देशभर में चीनी के पहले के उत्पादन अनुमान में कमी आई थी, जिस कारण  बाजार में चीनी की उपलब्धता में कमी आई तथा पिछले दिनों इसके दाम काफी तेज हो गए थे। अगस्त में कुछ स्थानों पर चीनी की खुदरा कीमत बढ़कर 70 से 75 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी।

केंद्र सरकार की ओर से किए गए विभिन्न उपायों के कारण हाल ही में इसकी कीमतों में गिरावट आई है, तथा बुधवार को चीनी के एक्स-मिल भाव 4,800 से 5,200 रुपये प्रति क्विंटल के बीच रहे। केंद्र सरकार की सख्ती के बाद चीनी की थोक कीमतों में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि उसकी तुलना में खुदरा भाव में गिरावट सीमित मात्रा में देखी गई।  

आगामी त्योहार सीजन को देखते हुए चीनी की मांग और बढ़ने की संभावना है। गणेशोत्सव के बाद नवरात्रि, दशहरा और दिवाली जैसे प्रमुख त्योहार आने वाले हैं। ऐसे में बाजार में चीनी की मांग बढ़ सकती है। इसी संभावित मांग और चीनी की कमी को देखते हुए राज्य सरकार ने गन्ना पेराई सीजन समय से पहले शुरू करने का निर्णय लिया है, ताकि बाजार में पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध हो, जिससे की इसकी कीमतों को नियंत्रण में रखा जा सके।

जानकारों के अनुसार महाराष्ट्र में आमतौर पर चीनी मिलों में गन्ने का पेराई सीजन नवंबर महीने में आरंभ होता है। हालांकि, इस बार राज्य सरकार ने 15 अक्टूबर से चीनी मिलों का पेराई सीजन शुरू करने का फैसला किया है। ऐसे में माना जा रहा है कि अक्टूबर महीने में ही पेराई शुरू करने से किसानों और चीनी मिलों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए चीनी मिल संगठनों ने पेराई सीजन जल्द शुरू करने के फैसले का विरोध किया है।

राज्य सरकार ने आगामी त्योहारों के दौरान चीनी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने, संभावित चीनी की कमी को रोकने और कीमतों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया है।