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21 अगस्त 2026

विश्व बाजार में आई तेजी के साथ ही सीसीआई द्वारा बिक्री भाव बढ़ाने से कॉटन हुई महंगी

नई दिल्ली। विश्व बाजार में दाम तेज होने के साथ ही कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई द्वारा बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी करने से हाजिर बाजार में कॉटन की कीमतों में गुरुवार को 500 से 1,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो की तेजी दर्ज की गई।

आईसीई कॉटन वायदा के भाव में बुधवार को बड़ी तेजी दर्ज की गई थी। दिसंबर-26 वायदा अनुबंध में इसके दाम 2.94 सेंट तेज होकर 88.35 सेंट हो गए थे। डॉलर में भारी गिरावट और अमेरिका के कपास उत्पादक क्षेत्रों में प्रतिकूल मौसम के कारण बढ़ती चिंताओं से बुधवार को आईसीई कॉटन वायदा मई के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया।

सीसीआई ने 20 अगस्त, गुरुवार को कॉटन के बिक्री भाव 600 रुपये प्रति कैंडी तक तेज किए। इस दौरान निगम ने 41,800 गांठ कॉटन की बिक्री की, जिसमें से स्पिनिंग मिलों ने 23,800 गांठ एवं ट्रेडर्स ने 18,000 गांठ कॉटन की खरीद की। चालू फसल सीजन 2025-26 में खरीदी हुई करीब 93 लाख गांठ कॉटन की बिक्री सीसीआई अभी तक कर चुकी है।

जुलाई एवं अगस्त में हुई बारिश से देशभर में कपास की बुआई में बढ़ोतरी हुई है तथा देशभर के राज्यों में इसकी बुआई का अंतर पिछले साल की तुलना में घटकर केवल 0.50 फीसदी का रह गया। कृषि मंत्रालय के अनुसार देशभर के राज्यों में 14 अगस्त तक कपास की बुआई 107.33 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 107.87 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है।

स्पिनिंग मिलों की मांग बढ़ने से गुरुवार को गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी आई।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव 500 रुपये तेज होकर 69,000 से 69,200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 6,900 से 7,050 रुपये प्रति मन बोले गए। 
हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 6,725 से 6,750 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 6,750 से 7,050 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 65,000 से 66,000 रुपये कैंडी बोले गए।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमत स्थिर से तेज हो गई। जानकारों के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास की आवक सीमित मात्रा में ही हो रही है। उत्तर भारत के राज्यों में कपास की नई फसल की आवक सितंबर में एवं अन्य राज्यों में अक्टूबर में बनेगी। जानकारों के अनुसार अभी तक मौसम फसल के लगभग अनुकूल रहा है तथा व्यापारियों के साथ ही मिलों की नजर आगामी दिनों में मानसूनी बारिश उत्पादक राज्यों में कैसी होती है, इस पर लगी हुई है।

घरेलू बाजार में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यें में कॉटन की कीमतों में तेजी आई, क्योंकि विदेश में दाम तेज होने से इसके आयात पड़ते महंगे हुए हैं। हालांकि अधिकांश राज्यों में प्राइवेट जिनिंग मिलों के पास अच्छी क्वालिटी की कॉटन का बकाया स्टॉक कम है। अत: अच्छी क्वालिटी कपास की खरीद के लिए मिलों को सीसीआई एवं एमएनसी कंपनियों से करनी पड़ रही है।

हालांकि केंद्र सरकार ने घरेलू टेक्सटाइल उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता को बेहतर बनाने के लिए 1 जून, 2026 से आगामी पांच महीनों के लिए कॉटन आयात पर से सभी कस्टम ड्यूटी समाप्त की हुई है, जिस कारण इसके आयात में बढ़ोतरी होने का अनुमान है। घरेलू बाजार में  सीसीआई के पास अभी बकाया स्टॉक अभी भी अच्छी मात्रा में बचा हुआ है। इसलिए हाजिर बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी सीसीआई के बिक्री दाम पर भी निर्भर करेगी।

देश में बारिश की कमी का खतरा बढ़ा, अल नीनो के मजबूत होने की आशंका

नई दिल्ली। आने वाले महीनों में अल नीनो जलवायु पैटर्न के और मजबूत होने की संभावना है। इससे भारत में बारिश और तापमान को लेकर चिंता बढ़ गई है। रूरल वॉयस ने एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग जलवायु केंद्र (एपीसीसी) द्वारा जारी ताजा मौसमी पूर्वानुमान के हवाले से यह जानकारी दी है। एपीसीसी की मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल (एमएमई) मौसमी आउटलुक 18 अगस्त को जारी की गई, जिसमें सितंबर 2026 से फरवरी 2027 तक की जलवायु परिस्थितियों का पूर्वानुमान दिया गया है।

इसके ईएनएसओ अलर्ट में अल नीनो को प्रमुख जलवायु स्थिति बताया गया है और संकेत दिया गया है कि आने वाले मौसमों में यह स्थिति और विकसित हो सकती है। पूर्वानुमान के अनुसार, सितंबर से नवंबर 2026 के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ गई है। वहीं, देश के अधिकांश हिस्सों और एशिया के बड़े क्षेत्रों में तापमान सामान्य से अधिक रहने का अनुमान है।

सितंबर-नवंबर के मौसम के लिए एपीसीसी ने भारत में सामान्य से कम वर्षा की संभावना अधिक रहने का अनुमान लगाया है। पूर्वी उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर, मैरीटाइम कॉन्टिनेंट और पश्चिमी उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में भी सामान्य से कम बारिश की संभावना काफी अधिक बताई गई है। इसके अलावा, दक्षिण प्रशांत के कुछ उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों, उष्णकटिबंधीय उत्तरी अटलांटिक, पश्चिमी भूमध्यरेखीय अटलांटिक, मध्य अमेरिका, कैरेबियन और उत्तरी दक्षिण अमेरिका के कुछ हिस्सों में भी सामान्य से कम वर्षा का अनुमान है।

हालांकि, दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान भारत में बारिश का पैटर्न अलग हो सकता है। एपीसीसी ने देश के मध्य हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश की प्रवृत्ति का अनुमान लगाया है। मध्य और पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में भी सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है। इससे संकेत मिलता है कि, सितंबर 2026 से फरवरी 2027 तक पूरे छह महीने भारत में लगातार सामान्य से कम बारिश नहीं होगी। क्षेत्र और मौसम के अनुसार बारिश के पैटर्न में बदलाव देखने को मिल सकता है।

तापमान को लेकर पूर्वानुमान में ज्यादा व्यापक गर्मी का संकेत दिया गया है। सितंबर-नवंबर के दौरान एपीसीसी ने हिंद महासागर और एशिया के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान की संभावना काफी अधिक बताई है। इसी तरह अफ्रीका के बड़े हिस्सों, भूमध्यसागरीय क्षेत्र, पश्चिमी यूरोप, आर्कटिक, उष्णकटिबंधीय प्रशांत, दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया, कैरेबियन, मध्य अमेरिका और उत्तरी दक्षिण अमेरिका में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान है।दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान भी गर्मी का यह रुझान जारी रहने की संभावना है। दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, हिंद महासागर, अफ्रीका के अधिकांश हिस्सों, उष्णकटिबंधीय प्रशांत और उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में सामान्य से अधिक तापमान का अनुमान है।

इस अवधि में भूमध्यसागरीय क्षेत्र और पश्चिमी यूरोप, उत्तरी कनाडा, कैरेबियन, मध्य अमेरिका और उत्तरी दक्षिण अमेरिका में भी सामान्य से अधिक तापमान रहने की संभावना है।भारत के लिए मानसून के बाद बारिश में कमी और सामान्य से अधिक तापमान का संयोजन मिट्टी की नमी, पानी की उपलब्धता और कृषि परिस्थितियों पर असर डाल सकता है।

सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के दौरान अल नीनो के बने रहने और और मजबूत होने की संभावना है। केंद्र ने नीनो 3.4 सूचकांक के लिए भी पूर्वानुमान जारी किया है। यह मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में ईएनएसओ की स्थिति और उसकी तीव्रता का आकलन करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला प्रमुख सूचकांक है।

अल नीनो तब विकसित होता है जब मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की समुद्री सतह का तापमान सामान्य से असामान्य रूप से अधिक गर्म हो जाता है। इससे वायुमंडलीय परिसंचरण में बदलाव आ सकता है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बारिश तथा तापमान के पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं। भारत के संदर्भ में अल नीनो का संबंध ऐतिहासिक रूप से कमजोर मानसूनी बारिश के बढ़े हुए जोखिम से रहा है। हालांकि, यह संबंध हमेशा सीधा या निश्चित नहीं होता। समुद्र और वायुमंडल से जुड़े कई अन्य कारक भी भारतीय मानसून को प्रभावित करते हैं और वे अल नीनो के प्रभाव को बढ़ा या कम कर सकते हैं।

चीनी मिलों के पास पर्याप्त स्टॉक, केंद्र के निर्देश का पालन करने को प्रतिबद्ध - विस्मा

नई दिल्ली। अगस्त 2026 में चीनी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता के बीच वेस्ट इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (विस्मा) ने कहा है कि, चीनी मिलों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

संगठन ने केंद्र और राज्य सरकारों के निर्देशों का पालन करने की अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई है। विस्मा ने एक सार्वजनिक हित में जारी बयान में कहा कि, वह वर्ष 2013 से महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा की सार्वजनिक एवं निजी चीनी मिलों का प्रतिनिधित्व कर रहा है। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 और चीनी (नियंत्रण) आदेश, 2025 के तहत प्रत्येक चीनी मिल को बिक्री के लिए हर महीने एक निर्धारित मात्रा जारी करने का कोटा दिया जाता है।

बयान के अनुसार, महाराष्ट्र के लिए चीनी का मासिक स्टॉक रिलीज कोटा जून 2026 में 7,78,206 टन, जुलाई में 7,18,170 टन और अगस्त में 7,75,003 टन रहा। इसी अवधि में पूरे देश के लिए यह कोटा क्रमशः 22.50 लाख टन, 22 लाख टन और 22.50 लाख टन निर्धारित किया गया था। विस्मा के अनुसार, उसके सदस्य चीनी मिलें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित चीनी बिक्री संबंधी आदेशों का पालन कर रही हैं। मांग के आधार पर बाजार में चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव जरूर हो रहा है, लेकिन मिलों के पास पर्याप्त चीनी स्टॉक उपलब्ध है। संगठन ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले सभी निर्देशों का पालन किया जा रहा है।

विस्मा ने बताया कि, 2026-27 का नया चीनी सीजन अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाला है। महाराष्ट्र सरकार की मंत्रिमंडल समिति के फैसले के अनुसार, सदस्य चीनी मिलें गन्ने की पेराई शुरू करेंगी। इसके बाद नए सीजन की पर्याप्त मात्रा में चीनी बाजार में उपलब्ध होगी। विस्मा ने कहा कि वह गन्ना उत्पादक किसानों, सदस्य चीनी मिलों और खुदरा उपभोक्ताओं के हितों के लिए प्रतिबद्ध है। संगठन के अनुसार, केंद्र सरकार के निर्देशों के तहत चीनी मिलें हर साल गन्ने का उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) किसानों को समय पर चुकाती हैं।

विस्मा ने कहा कि, वह आम लोगों को उचित और किफायती कीमतों पर चीनी उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। मौजूदा मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए विस्मा की सदस्य चीनी मिलों ने केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के निर्देशों का पालन करने तथा बाजार में पर्याप्त चीनी आपूर्ति सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।

20 अगस्त 2026

पहली सितंबर से नवंबर अंत तक चीनी के थोक उपभोक्ताओं पर स्टॉक सीमा लागू

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने चीनी के थोक उपभोक्ताओं के लिए अस्थायी स्टॉक रखने की सीमा लागू कर दी है। इसके तहत बड़े उपभोक्ता अधिकतम 15 दिनों की खपत के बराबर चीनी का स्टॉक ही अपने पास रख सकेंगे। यह व्यवस्था पहली सितंबर 2026 से लागू होकर 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगी।

केंद्र सरकार का उद्देश्य निर्धारित अवधि के दौरान बड़े संस्थागत और औद्योगिक उपभोक्ताओं द्वारा रखे जाने वाले चीनी के स्टॉक की मात्रा को नियंत्रित करना है। यह आदेश आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की धारा 3(1) के तहत जारी किया गया है और इसे ‘शुगर (स्टॉक होल्डिंग लिमिट ऑफ बल्क कंज्यूमर) ऑर्डर, 2026’ नाम दिया गया है।

आदेश के अनुसार, उत्पादन, उपभोग या किसी भी अन्य उपयोग के लिए कच्चे माल के रूप में प्रति माह 10 टन से अधिक चीनी का इस्तेमाल या खपत करने वाले थोक उपभोक्ता अपने पास 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। इस प्रतिबंध का उद्देश्य निर्धारित अवधि के दौरान बड़े संस्थागत और औद्योगिक उपभोक्ताओं के पास मौजूद चीनी की मात्रा को नियंत्रित करना है।

आदेश में थोक उपभोक्ता की श्रेणी में कन्फेक्शनरी निर्माता, शीतल पेय निर्माता, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, मिठाई विक्रेता और अन्य संस्थागत खरीदारों को शामिल किया गया है। ऐसे उपभोक्ता, जिन्होंने मौजूदा महीने को छोड़कर पिछले एक वर्ष के दौरान औसतन कम से कम 10 टन चीनी प्रति माह की खपत की है, इस श्रेणी में आएंगे। हालांकि, केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन और स्थानीय निकायों से संबंधित संस्थानों पर यह स्टॉक सीमा लागू नहीं होगी।

सरकार ने थोक उपभोक्ताओं द्वारा चीनी की खरीद और खपत की पुष्टि के लिए भी एक व्यवस्था निर्धारित की है। इसके तहत प्रत्येक चीनी मिल द्वारा किसी थोक उपभोक्ता को सीधे या डीलरों के माध्यम से बेची गई मासिक चीनी की मात्रा का सत्यापन किया जाएगा। इसके लिए विक्रेताओं और/या खरीदारों द्वारा दाखिल किए गए जीएसटी रिटर्न का उपयोग किया जाएगा। चीनी से संबंधित निर्धारित एचएसएन कोड के आधार पर लेनदेन की पहचान की जाएगी और इसी के माध्यम से चीनी की वास्तविक खपत का आकलन किया जाएगा। सरकार का यह कदम त्योहारी सीजन से पहले चीनी की उपलब्धता बनाए रखने और बड़े उपभोक्ताओं द्वारा अत्यधिक स्टॉक जमा करने पर नियंत्रण रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अप्रैल एवं मई के दौरान डीओसी का निर्यात 5 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले दो महीनों अप्रैल से मई के दौरान देश से डीओसी के निर्यात में 5 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 739,467 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 781,189 टन का हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार मई में देश से डीओसी के निर्यात में 19 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल निर्यात 373,907 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल मई में इसका निर्यात केवल 315,326 टन का ही हुआ था।

एसईए के अनुसार मई 2026 में देश से डीओसी के निर्यात में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 19 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। अत: मई में हुई इस बढ़ोतरी ने चालू वित्त वर्ष की धीमी शुरुआत को कम करने में मदद की, क्योंकि अप्रैल 2026 में रेड सी शिपिंग में रुकावटों और परिवहन लागत ज्यादा होने की वजह से डीओसी की शिपमेंट में 21.5 फीसदी की गिरावट आई थी।

चीन द्वारा सरसों डीओसी के आयात में बढ़ोतरी ने दूसरे उत्पादों में भारी कमी को कम करने में जरूर मदद की। भारतीय सोया डीओसी और सरसों डीओसी को साउथ अमेरिका (अर्जेंटीना और ब्राजील) और यूरोपियन सप्लायर से कम कीमतों का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि चीन और साउथ कोरिया जैसे खास मार्केट में मांग बढ़ी है। घरेलू मार्केट में सोया डीओसी की कमी को डीडीजीएस की सप्लाई बढ़ाकर कुछ हद तक पूरा किया गया है। सोया डीओसी की बढ़ती कीमतें, विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही हैं।

कृषि मंत्रालय के अनुसार 14 अगस्त, 2026 तक सोयाबीन की बुआई का क्षेत्रफल पिछले साल के 123 लाख हेक्टेयर के मुकाबले थोड़ा कम होकर 121 लाख हेक्टेयर का ही हुआ है, जबकि मूंगफली की बुआई का रकबा पिछले साल इसी समय के मुकाबले थोड़ा बढ़कर 48.03 लाख हेक्टेयर (47.01 लाख हेक्टेयर की तुलना में) हो गया है। पैदावार और उत्पादन आने वाले महीनों में मौसम के हालात पर निर्भर करेगा।

एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से मई के दौरान, चीन ने 276,147 टन डीओसी (117,388 टन की पिछले साल की तुलना में) आयात किया है, जिसमें 273,533 टन सरसों डीओसी, 1,616, टन कैस्टर डीओसी और 998 टन सोया डीओसी शामिल है। बांग्लादेश ने भारत से रेपसीड डीओसी और सोया डीओसी का 102,100 टन का (पिछले साल के 102,642 टन की तुलना में) आयात किया है। वियतनाम ने 80,231 टन डीओसी का आयात किया, जिसमें 29,435 टन सरसों डीओसी, 47,811 टन राइस ब्रान एक्सट्रैक्शन और 2,855 टन सोया डीओसी शामिल है।

भारतीय बंदरगाह पर जून की तुलना में जुलाई में सोया डीओसी का भाव कमजोर होकर 617 डॉलर प्रति टन रह गए, जबकि जून में इसका दाम 621 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य जुलाई में भारतीय बंदरगाह पर 253 डॉलर प्रति टन पर स्थिर रहा, क्योंकि जून में भी इसका भाव 253 डॉलर प्रति टन ही था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जून के 94 डॉलर प्रति टन से तेज होकर जुलाई में 108 डॉलर प्रति टन हो गया।