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05 मई 2026

कपास उत्पादन में आत्मनिर्भरता के लिए 5,659 करोड़ के 'कॉटन मिशन' को मंजूरी

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय कपास क्षेत्र की चुनौतियों को दूर करने और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत करने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। सरकार ने 'कपास उत्पादकता मिशन' (2026-27 से 2030-31) को मंजूरी दी है, जिसके लिए 5,659.22 करोड़ रुपये का खर्च निर्धारित किया गया है। यह मिशन सरकार के '5F' विजन (फार्म टू फाइबर, फैक्ट्री, फैशन और फॉरेन) के अनुरूप तैयार किया गया है, जो कपास की उत्पादकता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

मिशन के तहत अनुसंधान और तकनीक पर विशेष जोर दिया जाएगा, जिसमें जलवायु-अनुकूल और कीट-प्रतिरोधी उन्नत बीज किस्मों का विकास शामिल है। राज्य सरकारों, कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विश्वविद्यालयों के माध्यम से आधुनिक खेती तकनीकों जैसे हाई डेंसिटी प्लांटिंग सिस्टम (HDPS) और एक्स्ट्रा लॉन्ग स्टेपल (ELS) कपास को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जाएगा। साथ ही, कपास की सफाई और प्रसंस्करण में सुधार के लिए देश की लगभग 2000 जिनिंग और प्रोसेसिंग फैक्ट्रियों का आधुनिकीकरण किया जाएगा, जिससे कपास में अशुद्धियों को 2% से कम रखा जा सके।

भारतीय कपास को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में स्थापित करने के लिए 'कस्तूरी कॉटन भारत' के तहत ब्रांडिंग और ट्रैसेबिलिटी को मजबूत किया जाएगा। गुणवत्ता जांच के लिए देश भर में मान्यता प्राप्त और आधुनिक परीक्षण बुनियादी ढांचे का जाल बिछाया जाएगा। इसके अलावा, डिजिटल एकीकरण के माध्यम से मंडियों को जोड़ा जाएगा, ताकि किसानों को बेहतर मूल्य और सीधी बाजार पहुंच प्राप्त हो सके

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और कपड़ा मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से संचालित होने वाले इस मिशन में 14 राज्यों के 140 जिलों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य 2031 तक कपास की उत्पादकता को 440 किलोग्राम से बढ़ाकर 755 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना और कुल उत्पादन 498 लाख गांठों तक पहुंचाना है, जिससे देश के लगभग 32 लाख किसानों के जीवन में समृद्धि आए और भारत कपास क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके।

चालू रबी में गेहूं की सरकारी खरीद 7.58 फीसदी घटकर 251 लाख टन के पार

नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2026-27 में 3 अप्रैल तक गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर खरीद 250.95 लाख टन की हो गई है जोकि रबी विपणन सीजन 2025-26 की समान अवधि के 271.56 लाख टन की तुलना में 7.58 फीसदी कम है।


प्रमुख उत्पादक राज्य पंजाब से चालू रबी सीजन में 3 अप्रैल तक 117.55 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 110.43 लाख टन से 6.44 फीसदी ज्यादा है।

हरियाणा से चालू रबी सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद बढ़कर 78.20 लाख टन की हो चुकी है, जोकि तय लक्ष्य 72 लाख टन से ज्यादा है। पिछले साल की समान अवधि में राज्य से 67.50 लाख टन गेहूं की खरीद ही हो पाई थी। अत: चालू रबी में गेहूं की खरीद पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 15.85 फीसदी ज्यादा गेहूं खरीदा गया है।

मध्य प्रदेश से चालू रबी सीजन में 3 अप्रैल तक केवल 35.62 लाख टन गेहूं की खरीद ही हो पाई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 672.66 लाख टन की तुलना में 50.97 फीसदी कम है। केंद्र सरकार ने राज्य में गेहूं की खरीद के तय लक्ष्य को 78 लाख टन से बढ़ाकर 100 लाख टन कर दिया है। राज्य सरकार मध्य प्रदेश में गेहूं खरीद के लिए तय किए न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल के अलावा अतिरिक्त बोनस भी दे रही है।

भारतीय खाद्वय निगम, एफसीआई के अनुसार उत्तर प्रदेश से चालू रबी में गेहूं की खरीद 7.88 लाख टन और राजस्थान से 11.07 लाख टन की हुई है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन की समान अवधि में इन राज्यों से क्रमश: 8.37 लाख टन और 12.30 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। बिहार से चालू रबी में 22,00 टन गेहूं की सरकारी खरीद हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 15,000 लाख टन से ज्यादा है।

गुजरात से चालू रबी में गेहूं की सरकारी खरीद 22 हजार टन की और हिमाचल प्रदेश से 3 हजार टन की हुई है।  

बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से गेहूं की फसल को चालू रबी सीजन में नुकसान हुआ है। अत: किसानों को राहत देते हुए केंद्र सरकार ने हरियाणा और राजस्थान के बाद पंजाब में भी गेहूं की चमक में कमी, लस्टर लॉस की सीमा को बढ़ाकर 70 फीसदी और टूटे दानों की सीमा को बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है।

सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 (अप्रैल-मार्च) के दौरान गेहूं की खरीद का लक्ष्य बढ़ाकर 345 लाख टन कर दिया है, जबकि पहले 303 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया गया था।

सीसीआई द्वारा बिक्री कीमतों में भारी बढ़ोतरी से उत्तर भारत एवं गुजरात में कॉटन महंगी

नई दिल्ली। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई द्वारा कॉटन की बिक्री कीमतों में भारी बढ़ोतरी करने से सोमवार को शाम के सत्र में उत्तर भारत के साथ ही गुजरात में कॉटन की कीमतों में भारी तेजी दर्ज की गई।


सूत्रों के अनुसार कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई ने सोमवार को कॉटन की बिक्री कीमतों में 2,900 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। इस दौरान निगम ने फसल सीजन 2025-26 की 89,600 गांठ कॉटन स्पिनिंग मिलों को बेची।

सीसीआई चालू फसल सीजन 2025-26 की खरीदी हुई लगभग 61,02,100 कपास गांठ की बिक्री अभी तक कर चुकी हैं। निगम द्वारा अभी तक कुल बिक्री में सबसे ज्यादा 21.48 लाख गांठ महाराष्ट्र में तथा 10 लाख गांठ गुजरात में बेची है। सीसीआई ने तेलंगाना में भी 10.93 लाख गांठ तथा मध्य प्रदेश में 4.80 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 4.17 लाख गांठ तथा राजस्थान में 3.04 लाख गांठ और ओडिशा में 2.39 लाख गांठ के अलावा हरियाणा 1.64 और आंध्रप्रदेश 1.22 के अलावा पंजाब में 41,800 गांठ काटन की बिक्री की है।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव सोमवार को 1,750 रुपये तेज होकर 63,800 से 64,200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 6,400 से 6,600 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 6,260 से 6,300 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम बढ़कर 6,300 से 6,600 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 60,500 से 61,500 रुपये कैंडी बोले गए।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमतों में 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई। जानकारों के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास की आवक सीमित मात्रा में ही हो रही है।

सीसीआई द्वारा बिक्री कीमतों में बढ़ोतरी करने से उत्तर भारत के राज्यों के साथ ही गुजरात में इसके दाम तेज हुए। व्यापारियों के अनुसार सूती धागे में स्थानीय मांग अच्छी है, साथ ही चीन की आयात मांग भी बराबर बनी हुई है। घरेलू बाजार में कॉटन का बकाया स्टॉक प्राइवेट जिनिंग मिलों के पास नहीं के बराबर है, जबकि सीसीआई के पास अभी बकाया स्टॉक अच्छा है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है ऐसे में घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

उद्योग ने कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की थी। साथ ही चालू सीजन में कॉटन का आयात भी बढ़ेगा, हालांकि प्राइवेट जिनर्स के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है, जिस कारण इनकी बिकवाली कम आ रही है।

गेहूं की सरकारी खरीद 232 लाख टन के पार, हरियाणा से खरीद तय लक्ष्य से ज्यादा

नई दिल्ली। चालू रबी विपणन सीजन 2026-27 में 30 अप्रैल तक गेहूं की न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर खरीद बढ़कर 232.5 लाख टन की हो गई है जोकि रबी विपणन सीजन 2025-26 की समान अवधि के 253.63 लाख टन की तुलना में 9.28 फीसदी कम है।


प्रमुख उत्पादक राज्य पंजाब से चालू रबी सीजन में 30 अप्रैल तक 111 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 103.9 लाख टन से 7 फीसदी ज्यादा है।

हरियाणा से चालू रबी सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद बढ़कर 76.6 लाख टन की हो चुकी है, जोकि तय लक्ष्य 72 लाख टन से ज्यादा है। पिछले साल की समान अवधि में राज्य से 65.7 लाख टन गेहूं की खरीद ही हो पाई थी। अत: चालू रबी में गेहूं की खरीद पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 17 फीसदी ज्यादा गेहूं खरीदा गया है।

मध्य प्रदेश से चालू रबी सीजन में 30 अप्रैल तक केवल 27.5 लाख टन गेहूं की खरीद ही हो पाई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 67.68 लाख टन की तुलना में 59 फीसदी कम है। केंद्र सरकार ने राज्य में गेहूं की खरीद के तय लक्ष्य को 78 लाख टन से बढ़ाकर 100 लाख टन कर दिया है। राज्य सरकार मध्य प्रदेश में गेहूं खरीद के लिए तय किए न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल के अलावा अतिरिक्त बोनस भी दे रही है।

भारतीय खाद्वय निगम, एफसीआई के अनुसार उत्तर प्रदेश से चालू रबी में गेहूं की खरीद 7.12 लाख टन और राजस्थान से 9.76 लाख टन की हुई है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन की समान अवधि में इन राज्यों से क्रमश: 7.54 लाख टन और 11.44 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी थी। बिहार से चालू रबी में 19,485 टन गेहूं की सरकारी खरीद हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 14,291 लाख टन से ज्यादा है।

बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से गेहूं की फसल को चालू रबी सीजन में नुकसान हुआ है। अत: किसानों को राहत देते हुए केंद्र सरकार ने हरियाणा और राजस्थान के बाद पंजाब में भी गेहूं की चमक में कमी, लस्टर लॉस की सीमा को बढ़ाकर 70 फीसदी और टूटे दानों की सीमा को बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया है।

सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 (अप्रैल-मार्च) के दौरान गेहूं की खरीद का लक्ष्य बढ़ाकर 345 लाख टन कर दिया है, जबकि पहले 303 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया गया था।

विश्व बाजार में दाम कमजोर होने से चीनी का निर्यात 7.50 से 8 लाख टन होने का अनुमान

नई दिल्ली। विश्व बाजार में दाम कमजोर होने के कारण घरेलू बाजार से चालू विपणन सत्र 2025-26 (अक्टूबर–सितंबर) में केवल 7.5 से 8 लाख टन ही चीनी का निर्यात होने का अनुमान है।


हालांकि आईसीई शुगर वायदा चालू सप्ताह के अंत में उच्चतम स्तर से कुछ नरम हुआ है। निवेशकों की मुनाफावसूली से इसके दाम नरम हुए है क्योंकि बढ़ी हुई एनर्जी कीमतों से मिल रहा सपोट कम हो गया। बेंचमार्क जुलाई कॉन्ट्रैक्ट 14.61 सेंट प्रति lb पर सेटल हुआ, जो 0.16 सेंट नीचे था, जबकि यह तीन हफ्तों में अपने सबसे मजबूत लेवल 14.85 सेंट के इंट्राडे हाई को छू गया था।

यूएसडीए ने विपणन सीजन 2026-27 के आरंभ में भारत में 25 लाख टन सरप्लस चीनी का अनुमान लगाया था, जबकि मौजूदा उपलब्धता शुरू के आकलन से कम बैठेगी। भारत का उत्पादन 275.28 लाख टन शुरुआती अनुमानों से कम है। अत: चीनी मिलों के जल्दी बंद होने से इसकी बकाया उपलब्धता सीमित रहेगी, और घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों को बकाया स्टॉक कम होने से सपोर्ट मिल रहा है।

केंद्रीय खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार 2025-26 के लिए 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी गई थी, जबकि इससे पहले 5 लाख टन का एक्स्ट्रा पूल खोला गया था, जिसमें से अब तक सिर्फ 87,587 टन को ही मंजूरी मिली है। जानकारों के अनुसार 3 मार्च तक, पहले ही देश से 5 लाख टन चीनी के निर्यात की शिपमेंट हो चुकी थी।

विश्व बाजार में कीमत नीचे होने के कारण अभी निर्यात के लिए पैरिटी नहीं बैठ रही है। ऐसे में चीनी मिलों द्वारा पूरे निर्यात कोटा का इस्तेमाल करने की संभावना नहीं हैं, भले ही सीजन की शुरुआत में इसके निर्यात सौदें अच्छे हुए थे।

भारत, दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश हैं, जहां चीनी मिलों के बीच बराबर बांटे गए कोटा के तहत निर्यात को सरकारी कंट्रोल में रखा जाता है।

चीनी की घरेलू मांग ने निर्यात उपलब्धता पर दबाव बढ़ा दिया है। देश में हाल के सालों में चीनी के उत्पादन में बढ़ोतरी रुक सी गई है, और जिस कारण उत्पादकता में मामूली रिकवरी के बावजूद निर्यात के लिए उपलब्धता कम हो गई है।

पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में अप्रैल अंत तक देशभर के राज्यों में चीनी का उत्पादन फीसदी बढ़कर 275.28 लाख टन का हुआ है तथा चालू सीजन में कुल उत्पादन 282 लाख टन ही होने का अनुमान है। हालांकि फसल सीजन 2024-25 में देश में 261 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था।

विश्व बाजार में दाम तेज होने से घरेलू बाजार में कॉटन महंगी हुई

नई दिल्ली। विश्व बाजार में दाम तेज होने से घरेलू बाजार में शुक्रवार को कॉटन महंगी हुई। स्पिनिंग मिलों की खरीद बढ़ने के कारण शाम के सत्र में उत्तर भारत के साथ ही गुजरात में इसकी कीमतों में तेजी दर्ज की गई।


आईसीई कॉटन वायदा में गुरुवार को बड़ी तेजी दर्ज की गई तथा कीमत मंथ के हाई पर बंद हुईं। फरवरी 2024 के बाद यह सबसे मजबूत मासिक प्रदर्शन रहा, जिसका प्रमुख कारण डॉलर में कमजोरी के साथ ही एनर्जी प्राइस बढ़ने से भाव को सहारा मिला।

इंटरकॉन्टिनेंटल एक्सचेंज पर जुलाई कॉन्ट्रैक्ट तेज होकर 82.20 सेंट प्रति पाउंड पर बंद हुआ, जो कि 3.00 सेंट तेज हुआ। यह तेजी मई 2024 के बाद का सबसे ऊँचा भाव है तथा पूरे महीने में इसके दाम करीब 18 फीसदी बढ़े।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शुक्रवार को 400 रुपये तेज होकर 61,800 से 62,200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 6,250 से 6,400 रुपये प्रति मन बोले गए।हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 6,060 से 6,120 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम बढ़कर 6,100 से 6,450 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 59,000 से 60,000 रुपये कैंडी बोले गए।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एमसीएक्स पर अप्रैल 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 840 रुपये तेज होकर 29,390 रुपये प्रति कैंडी हो गए। इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में तेजी का रख रहा।

प्रमुख उत्पादक राज्यों में कपास की कीमतों में 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई। जानकारों के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास की आवक सीमित मात्रा में ही हो रही है।

घरेलू बाजार में स्पिनिंग मिलों की खरीद से उत्तर भारत के राज्यों के साथ ही गुजरात में इसके दाम तेज हुए है। व्यापारियों विश्व बाजार में कॉटन महंगी होने से इसके आयात पड़ते महंगे हुए है, हालांकि आयात सौदे पहले ही नहीं के बराबर हो रहे हैं। घरेलू बाजार में हाल ही में सूती धागे में स्थानीय मांग कम हुई है, जिससे इसके दाम भी नरम हुए है। अत: स्पिनिंग मिलों के मार्जिन में कमी आई है। सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है हालांकि निगम के पास अभी भी 50 लाख गांठ से ज्यादा का कॉटन का स्टॉक है। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक सीसीआई के बिक्री दाम पर निर्भर करेगी।

चार साल बाद भारत ने गेहूं निर्यात फिर शुरू किया, ऊंची कीमतें मांग पर लगा सकती हैं लगाम

नई दिल्ली। सूत्रों के अनुसार, भारतीय व्यापारियों ने चार साल में पहली बार गेहूं का निर्यात शुरू कर दिया है। पर्याप्त भंडार, वैश्विक बाजार में बेहतर कीमतें और माल ढुलाई दरों में आई मजबूती ने एशिया और मध्य पूर्व के खरीदारों को छोटी खेप भेजने का मौका दे दिया है।रॉयटर्स को सूत्रों ने बताया कि, उपभोक्ता वस्तु समूह आईटीसी ने संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात के लिए पश्चिमी बंदरगाह कांडला पर 22,000 मीट्रिक टन गेहूं लदान शुरू कर दिया है।हालांकि, सूत्रों ने मीडिया से बात करने का अधिकार न होने के कारण अपना नाम उजागर करने से मना कर दिया। आईटीसी ने इस विषय पर रॉयटर्स के सवालों का तुरंत कोई जवाब नहीं दिया।

चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं उत्पादक देश भारत, इस साल गेहूं के निर्यात की अनुमति दे चुका है। यह 2022 में लगाया गया निर्यात प्रतिबंध हटाने के बाद संभव हुआ है। नई दिल्ली ने 2023 और 2024 में यह पाबंदी इसलिए जारी रखी थी क्योंकि भीषण गर्मी से फसलें बर्बाद हो गई थीं, भंडार घट गए थे, घरेलू कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई थीं और यह अटकलें भी लगने लगी थीं कि भारत को 2017 के बाद पहली बार गेहूं आयात करना पड़ सकता है। पिछले साल अनुकूल मौसम के कारण बंपर पैदावार हुई, जिससे आयात की अटकलें खारिज हो गईं, सरकार घटे हुए भंडार को फिर से भर सकी और उसे निर्यात की अनुमति देने का भरोसा मिला। इस साल की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने व्यापारियों को 25 लाख टन गेहूं निर्यात करने की अनुमति दी, और पिछले महीने के अंत में 25 लाख टन की अतिरिक्त खेप भेजने की भी मंजूरी दे दी।

निर्यात की अनुमति मिलने के बावजूद वैश्विक बाजार में कम कीमतें और भारत में ऊंचे भाव होने के कारण व्यापारी निर्यात सौदे करने से बचते रहे। लेकिन ईरान संघर्ष ने माल ढुलाई की लागत बढ़ा दी और जिन खरीदारों को तत्काल खेप की जरूरत थी, वे भारत की ओर मुड़ गए। संयुक्त अरब अमीरात को 22,000 टन गेहूं का यह सौदा करीब 275 डॉलर प्रति टन के एफओबी भाव पर हुआ है। चार साल का पहला निर्यात सौदा होने के बावजूद भारत से गेहूं के निर्यात में बड़ी उछाल आने की संभावना कम है, क्योंकि फसल नुकसान के चलते हाल के दिनों में घरेलू कीमतें बढ़ी हैं, जिससे भारतीय गेहूं ऑस्ट्रेलिया और काला सागर क्षेत्र की प्रतिस्पर्धी आपूर्ति से महंगा हो गया है। ऑस्ट्रेलिया और काला सागर से आपूर्ति की कीमत बीमा और माल ढुलाई समेत लगभग 290 से 300 डॉलर प्रति टन है, जबकि भारतीय गेहूं वैश्विक बाजार में कम से कम 20 डॉलर प्रति टन महंगा पड़ रहा है।

सूत्रों ने बताया कि जिन खरीदारों के पास ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना या काला सागर क्षेत्र की पर्याप्त आपूर्ति है, उन्हें भारतीय गेहूं की अपेक्षाकृत ऊंची कीमत के कारण वह कम आकर्षक लगेगा। केवल वे खरीदार जिनके पास तत्काल आपूर्ति की कमी है, वही भारतीय गेहूं की ओर रुख करेंगे। जिन आयातकों को 30 से 45 दिनों के भीतर खेप चाहिए, वे ही भारतीय गेहूं खरीदने की सबसे ज्यादा संभावना रखते हैं।