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14 अप्रैल 2026

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले पांच महीनों नवंबर-25 एवं मार्च-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 8 फीसदी बढ़कर 6,572,131 टन का हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 6,096,923 टन का हुआ था। मार्च 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (फरवरी, 2026) के 12.92 लाख टन की तुलना में 10 फीसदी होकर 11.93 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार मार्च 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 11 फीसदी बढ़कर 1,186,569 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल मार्च में इनका आयात 1,073,023 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,173,168 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 13,401 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि भारत के खाद्य तेलों के आयात में पिछले साल समान अवधि के मुकाबले 8 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी हुई है, जो विश्व सप्लाई पर लगातार इंडिपेंडेंस दिखाता है। हालांकि, मार्च में फरवरी की तुलना में गिरावट से पता चलता है कि विश्व बाजार में दाम तेज होना तथा रुपये में गिरावट और घरेलू उपलब्धता, खासकर सरसों की फसल आने की वजह से मांग प्रभावित हुई है।

दिसंबर और फरवरी के बीच आयात में तेज बढ़ोतरी विश्व बाजार में सप्लाई में रुकावट की चिंताओं की ओर इशारा करती है, खासकर सूरजमुखी के तेल पर असर डालने वाले चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष, पाम तेल के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया में सप्लाई-साइड की अनिश्चितताओं और मिडिल ईस्ट तनाव के कारण बढ़ी हुई माल ढुलाई लागत है। इसके अलावा, बड़े उत्पादक देशों में बायोफ्यूल की ओर झुकाव सहित मजबूत विश्व की मांग ने कीमतों को स्थिर रखा है, जिससे भारतीय रिफाइनर सावधानी से इंतजार करों एवं देखो की नीति अपना रहे हैं।

जानकारों के अनुसार आगे चलकर, जब तक विश्व बाजार में कीमत नरम नही होती या करेंसी की हालत बेहतर नहीं होती, तब तक शॉर्ट टर्म में आयात कम रहने की संभावना है, जबकि लॉन्ग टर्म में, देश जियोपॉलिटिकल रिस्क को कम करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी पर फोकस करने के साथ ही आयात को बैलेंस करना जारी रख सकता है।

नवंबर’25 से मार्च’26 के दौरान नेपाल ने लगभग 162,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया है, जिसमें 142,133 टन रिफाइंड सोया तेल, 12,123 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 6,793 टन आरबीडी पामोलिन शामिल है। फरवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 55,000 टन रिफाइंड तेल निर्यात किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल के अलावा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से मार्च 26 के दौरान 952,170 टन के मुकाबले केवल 192,486 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से मार्च 25 के दौरान 4,978,288 टन के मुकाबले 6,260,337 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। रिफाइंड तेल का रेश्यो तेजी से घटकर 16 फीसदी से 3 फीसदी ही रह गया, जबकि क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 97 फीसदी हो गया।

नवंबर’25 से मार्च’26 के आयात डेटा से पता चलता है कि देश इंडोनेशिया और मलेशिया से क्रूड पाम तेल के आयात पर सबसे ज्यादा निर्भर है। दोनों मिलकर 2.8 मिलियन टन से ज्यादा का योगदान देते हैं, जिससे भारत की खाने के तेल की मुख्य जरूरतों के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया पर निर्भरता ज्यादा है। साथ ही अर्जेंटीना और ब्राजील सोया तेल के आयात के लिए रीढ़ बने हुए हैं, जबकि रूस और यूक्रेन, ब्लैक सी क्षेत्र में चल रहे जियोपॉलिटिकल तनाव के बावजूद, सूरजमुखी तेल के जरूरी सप्लायर बने हुए हैं।

इंडोनेशिया द्वारा भविष्य में निर्यात पर रोक, बायोडीजल की शर्तें, या रूस-यूक्रेन संघर्ष में बढ़ोतरी जैसी कोई भी रुकावट सीधे देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता और कीमतों पर असर डाल सकती है। रिफाइंड तेलों के लिए नेपाल का आयात के रूप में उभरना, भारत को घरेलू रिफाइनिंग क्षमता को कम करके और रेवेन्यू लीकेज की वजह से नुकसान पहुंचा रहा है।

कॉटन का उत्पादन बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ, (एक गांठ 170 किलो) बढ़कर 324 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 320.50 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया। मार्च में उद्योग ने एक फिर इसे बढ़ाकर 320.50 लाख गांठ कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार महाराष्ट्र में कॉटन का उत्पादन इसके पहले के अनुमान से 7 लाख गांठ ज्यादा होने की उम्मीद है, जबकि गुजरात में पहले के अनुमान में 3 लाख गांठ एवं मध्य प्रदेश में 50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 194.50 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 72 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 105 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 17.50 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार पहली अक्टूबर 2025 से 31 मार्च 2026 तक प्रमुख उत्पादक राज्यों की मंडियों में 292.74 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है। अभी तक कुल आवकों में उत्तर भारत के राज्यों में 27.10 लाख गांठ की आवक हुई है जिसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 6.50 लाख गांठ तथा अपर राजस्थान की 10.90 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान की 8.20 लाख गांठ है।

मध्य भारत के राज्यों में 31 मार्च तक 171.43 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें गुजरात की हिस्सेदारी 58.44 लाख गांठ, महाराष्ट्र की 96.39 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 16.60 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में मार्च अंत तक 88.86 लाख गांठ कॉटन की आवक हो चुकी है, जिसमें तेलंगाना में 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश में 17.06 लाख गांठ तथा कर्नाटक में 24.75 लाख गांठ के अलावा तमिलनाडु में 2.05 लाख गांठ की हिस्सेदारी है।

ओडिशा में चालू सीजन में मार्च अंत तक 3.35 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ की आवक हुई है।

यूरोप में शिपमेंट बढ़ाने हेतु केंद्र ने चावल के निर्यात नियमों दी छूट, घरेलू बाजार में भाव तेज

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने कई यूरोपीय देशों को छह महीने के लिए बिना किसी जरूरी इंस्पेक्शन सर्टिफिकेट के बासमती और नॉन-बासमती चावल का निर्यात करने की इजाजत दे दी है। घरेलू बाजार में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी बनी हुई है। गेहूं की सरकारी खरीद शुरू होने के कारण हरियाणा एवं पंजाब की मंडियों में धान की आवक लगभग बंद है।


केंद्र सरकार द्वारा शुक्रवार को जारी एक अधिसूचना के अनुसार यूरोपियन यूनियन के सदस्य देशों, यूनाइटेड किंगडम, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड के लिए निर्यात इंस्पेक्शन एजेंसियों से सर्टिफिकेशन की जरूरत जारी रहेगी, जबकि दूसरे यूरोपीय देशों को इस दौरान छूट दी गई है।

घरेलू बाजार में हाल ही में चावल के साथ ही धान की कीमतों में तेजी आई है। दिल्ली की नजफगढ़ मंडी में पूसा 1,121 किस्म के धान के भाव तेज होकर शुक्रवार को 4,871 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। इस दौरान हरियाणा की गोहाना मंडी में 1,885 किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,400 से 4,800 रुपये तथा राजस्थान की कोटा मंडी में 1,509 किस्म के धान के दाम तेज होकर 3,900 से 4,200 रुपये और 1,718 किस्म के धान के भाव 4,000 से 4,661 रुपये तथा डीपी किस्म के धान के दाम तेज होकर 4,000 से 4,425 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

राजस्थान लाइन से 1,718 किस्म के सेला चावल का व्यापार 8,500 से 8,700 रुपये तथा पंजाब लाईन 1885 किस्म के स्टीम चावल का व्यापार 9,400 से 9,600 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। दिल्ली के नया बाजार में 1,121 किस्म के सेला चावल का भाव 9,400 से 9,600 तथा इसके स्टीम चावल का भाव 10,200 से 10,400 रुपये प्रति क्विंटल रहा।  

इस कदम का मकसद विश्व बाजार में बढ़ती मांग के समय चावल निर्यात को सपोर्ट देना है। द हंस इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024-25 में भारत का चावल निर्यात 12.95 बिलियन डॉलर था, जबकि दालों और बाजरे के शिपमेंट की कीमत क्रमशः 855 मिलियन डॉलर और 59.20 मिलियन डॉलर थी, जो दुनिया भर में अलग-अलग तरह के अनाजों की बढ़ती मांग को दिखाता है।

केंद्रीय यूनियन कॉमर्स और इंडस्ट्री मंत्री पीयूष गोयल ने पहले कहा था कि 2014 और 2025 के बीच चावल का निर्यात 62 फीसदी बढ़ा है, जो ग्लोबल फूड मार्केट में भारत की बढ़ती मौजूदगी को दिखाता है।

देश में चावल का उत्पादन मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के साथ ही मध्य प्रदेश और राजस्थान तथा बिहार आदि राज्यों में होता है, जबकि गेहूं का उत्पादन उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में सबसे ज्यादा होता है।

इस साल की शुरुआत में, भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई ने ग्लोबल मानवीय कामों के लिए 200,000 टन चावल सप्लाई करने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के साथ एक एग्रीमेंट साइन किया था। यह एग्रीमेंट पांच साल के लिए अधिकृत है, और इसमें 31 मार्च, 2026 तक मौजूदा कीमत 2,800 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है।

चालू समर सीजन में दलहन, तिलहन एवं मोटे अनाजों की बुआई बढ़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में दलहन एवं तिलहन के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई में बढ़ोतरी हुई है, जबकि इस दौरान धान की रोपाई में कमी आई है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 3 अप्रैल 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई 0.84 फीसदी बढ़कर 58.29 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 57.80 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 30.12 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 32.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 8.79 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 7.02 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 6.09 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.91 हजार हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 2.942 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.93 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.28 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में बढ़कर 11.64 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई केवल 10.77 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 7.18 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 7.01 लाख हेक्टेयर की तुलना में बढ़ी है। इस दौरान ज्वार की बुआई 32 हजार हेक्टेयर में, बाजरा की 3.91 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 21 हजार हेक्टेयर में हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 7.74 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 7.42 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 4.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 4.20 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान सनफ्लावर की 38 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 2.71 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 36 हजार हेक्टेयर और 2.80 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

केंद्र सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य बढ़ाकर 41 रुपये तय करें - एनएफसीएसएफ

नई दिल्ली। चीनी मिलों को वित्तीय संकट से उबारने और किसानों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) को 31 रुपये से बढ़ाकर 41  रुपये प्रति किलो तय करें।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) ने कोऑपरेटिव शुगर सेक्टर में बढ़ते फाइनेंशियल स्ट्रेस को दूर करने के लिए केंद्र सरकार से तुरंत पॉलिसी में दखल देने की मांग की है।

एनएफसीएसएफ के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन पाटिल और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नाइकनवरे के नेतृत्व में एक डेलिगेशन ने सेक्टर की चिंताओं को दूर करने के लिए नई दिल्ली में कोऑपरेशन मिनिस्ट्री के सचिव, आईएएस, डॉ. आशीष कुमार भूटानी से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि कोऑपरेटिव शुगर मिलों पर गन्ने की बढ़ती लागत, चीनी की कम कीमतों और बढ़ते गन्ने के बकाए के कारण चीनी मिलों को फाइनेंशियल दबाव का सामना करना पड़ रहा है।

गन्ना पेराई सीजन 2025-26 के लिए चीनी का उत्पादन कम हुआ है, लेकिन उत्पादक लागत जोकि करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि चीनी के एक्स-मिल भाव 3,850 रुपये प्रति क्विंटल के बीच का अंतर फाइनेंशियल नुकसान का कारण बन रहा है, जिस कारण किसानों को समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है।

उन्होंने केंद्र सरकार से चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) 31 से बढ़ाकर 41 प्रति किलो करने की मांग की है। इसके साथ ही एथेनॉल के खरीद मूल्य में वृद्धि की जाए तथा चीनी उद्योग के लिए इथेनॉल उत्पादन कोटा 50 फीसदी तक बढ़ाया जाए। चीनी विकास निधि के तहत ओटीएस योजना में सुधार किया जाए, जिसमें मिलों को दंडात्मक ब्याज में 50 फीसदी की छूट मिले।

एनएफसीएसएफ ने इस बात पर जोर दिया कि कोऑपरेटिव चीनी मिलों को स्थिर करने, लिक्विडिटी में सुधार करने और गन्ना किसानों को तुरंत भुगतान करने के लिए समय पर सरकारी दखल देना बहुत जरूरी है। फेडरेशन कोऑपरेटिव चीनी सेक्टर की लंबे समय तक चलने वाली सस्टेनेबिलिटी पक्का करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का अपना वादा दोहराता है।

मार्च अंत तक उत्तर भारत के राज्यों में 25.49 लाख गांठ कॉटन की आवक हुई

नई दिल्ली। उत्तर भारत के राज्यों पंजाब, हरियाणा एवं राजस्थान की मंडियों में 31 मार्च 2026 तक 25.49 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो कॉटन की आवक हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 26.07 लाख गांठ की तुलना में कम है।


इंडियन कॉटन एसोसिएशन लिमिटेड, आईसीएल के अनुसार चालू फसल सीजन 2025-26 के दौरान उत्तर भारत के राज्यों में 25.91 लाख गांठ कॉटन का उत्पादन होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल इन राज्यों में 27.77 लाख गांठ का उत्पादन हुआ था।

उत्तर भारत के राज्यों में 38,293 गांठ कॉटन का स्टॉक प्राइवेट गोदामों में बचा हुआ है, जबकि 10,961 गांठ अनजिंड कॉटन की बची हुई है। मार्च अंत तक इन राज्यों में 25.12 लाख गांठ की परेसिंग हो चुकी है।

उत्तर भारत के राज्यों से फसल सीजन 2025-26 में सीसीआई ने 5,97,122 गांठ कॉटन की खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी पर की थी, जिसमें से निगम मार्च अंत तक 4,75,871 गांठ की बिक्री कर चुकी है। अत: सीसीआई के पास पहली अप्रैल को उत्तर भारत के राज्यों में फसल सीजन 2025-26 की खरीदी हुई कॉटन का 1,21,251 गांठ का स्टॉक बचा हुआ है। इसके अलावा निगम के पास फसल सीजन 2024-25 का 4,800 गांठ एवं फसल सीजन 2023-24 का 11,500 गांठ का स्टॉक बचा हुआ है।

इन राज्यों में एमएनसी कंपनियों के पास पहली अप्रैल को 14,200 गांठ कॉटन का स्टॉक है।

कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया, सीसीआई द्वारा कॉटन की बिक्री कीमतों में लगातार दूसरे दिन 100 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो की बढ़ोतरी करने से मंगलवार को शाम के सत्र में उत्तर भारत में कॉटन की कीमतों में तेजी दर्ज की गई।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,850 से 6,050 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव 5,700 से 5,850 रुपये प्रति मन बोले गए।
ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम तेज होकर 5,750 से 6,050 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 55,800 से 56,800 रुपये कैंडी बोले गए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई 4.73 फीसदी पिछड़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 4.73 फीसदी पीछे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई के साथ मोटे अनाज एवं तिलहनी फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 27 मार्च 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई घटकर 49.87 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 52.35 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 28.50 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 30.69 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 6.06 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 5.60 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 3.91 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 3.65 हजार हेक्टेयर में ही हुई थी। इस दौरान उड़द की बुआई बढ़कर 1.90 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.77 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। अन्य दालों की बुआई चालू समर सीजन में 0.25 लाख हेक्टेयर में हुई है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में घटकर 9.34 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 9.71 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 6.36 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 6.91 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है। इस दौरान ज्वार की बुआई 26 हजार हेक्टेयर, बाजरा की 2.50 लाख हेक्टेयर तथा रागी की 20 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई घटकर 5.97 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 6.34 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में घटकर 3.56 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 4.08 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान सनफ्लावर की 34 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 2.02 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है।