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21 मार्च 2026

महाराष्ट्र में 85 फीसदी चीनी मिलों में पेराई बंद, केवल 28 मिलें ही चल रही हैं

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) के दौरान 18 मार्च महाराष्ट्र की 85 फीसदी से अधिक मिलों ने गन्ने की कमी के कारण पेराई कार्य बंद कर दिया है तथा अब केवल 28 मिलों में ही पेराई चल रही है।


महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त की रिपोर्ट के अनुसार बेमौसम बारिश से गन्ने की खेती पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे चालू सीजन में गन्ने का उत्पादन और मिलों को आपूर्ति प्रभावित हुई है। 18 मार्च तक राज्य की मिलों ने केवल 837.31 लाख टन गन्ने की पेराई की, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 1,029.98 लाख टन थी। इसी तरह से चालू पेराई सीजन में चीनी की रिकवरी दर भी घटकर 9.45 फीसदी की बैठी है, जो पिछले साल के 10.16 फीसदी से कम है।

चालू सीजन में कुल 202 चीनी मिलों में से 85 फीसदी से अधिक चीनी मिलों ने गन्ने की कमी के कारण पेराई कार्य बंद कर दिया है। इस समय केवल 28 मिलों में ही पेराई जारी है। राज्य की लगभग 172 चीनी मिलों ने गन्ने की पेराई पूरी कर ली है। इनमें सोलापुर की 45, कोल्हापुर की 40, पुणे की 24, नांदेड़ की 24, छत्रपति संभाजीनगर की 18, अहिल्यानगर की 20 और अमरावती क्षेत्र की 1 मिल शामिल है। पिछले सीजन में की समान अवधि में केवल 103 चीनी मिलों ने पेराई समाप्त की थी।

इस सीजन में गन्ने की कमी के कारण समय से पहले पेराई बंद होने और आने वाले खरीफ मौसम में सूखे जैसी स्थिति की आशंका के चलते महाराष्ट्र के चीनी उद्योग की समस्याएं और बढ़ सकती हैं। जानकारों के अनुसार यदि एल नीनो के कारण महाराष्ट्र में सूखा पड़ता है, तो फिर सरकार को गन्ने की खेती को हतोत्साहित करने का निर्णय लेना पड़ सकता है, क्योंकि यह अत्यधिक पानी की खपत वाली फसल है। इसके बजाय कृषि अनुसंधान विश्वविद्यालयों की मदद से किसानों को फसल विविधीकरण अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सूखे की स्थिति में कम पानी वाली फसलें जैसे मोटे अनाज (मिलेट्स) और दालों पर जोर दिया जाएगा।

पशु आहार वालों की कमजोर मांग से बिनौला एवं कपास खली में गिरावट, कॉटन वॉश तेज

नई दिल्ली। पशु आहार वालों की मांग कमजोर होने से घरेलू बाजार में गुरुवार को बिनौला के साथ ही कपास खली की कीमतों में गिरावट आई, जबकि इस दौरान कॉटन वॉश के भाव तेज हुए। सीसीआई ने चालू सप्ताह में बिनौला की बिक्री कीमतों में कटौती थी, जिसके कारण हाजिर बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव देखा गया।


सीसीआई ने बुधवार को ई नीलामी के माध्यम से 5,19,800 क्विंटल बिनौले की बिक्री की पेशकश की थी तथा इस दौरान 2,95,600 क्विंटल बिनौले की बिक्री हुई। निगम ने इसके बिक्री भाव 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल तक कम किए थे। निगम ने मंगलवार को भी बिनौले की बिक्री कीमतों में 10 से 80 रुपये प्रति क्विंटल तक की कटौती थी।

व्यापारियों के अनुसार सीसीआई ने चालू सप्ताह में लगातार दो दिन बिनौले की कीमतों में कटौती की है जिससे हाजिर बाजार में भी इसकी कीमतों पर दबाव देखा गया। घरेलू बाजार में बिनौले का बंपर स्टॉक सीसीआई के पास है, इसलिए इसकी कीमतों में तेजी, मंदी काफी हद तक निगम के बिक्री भाव पर ही निर्भर करेगी।

तेल मिलों की खरीद कमजोर होने के कारण उत्तर भारत के राज्यों में गुरुवार को बिनौले की कीमतों में मंदा आया। हरियाणा में बिनौले के भाव 50 रुपये घटकर 3,950 से 4,250 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान राजस्थान में बिनौला के भाव 50 रुपये घटकर 4,050 से 4,250 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। बिनौला के दाम में पंजाब में 50 रुपये नरम होकर 3,950 से 4,150 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

पशु आहार वालों की मांग कमजोर होने से कपास खली की कीमतों में दूसरे दिन नरमी आई। सेलू में रेगुलर क्वालिटी की कपास खली की कीमत कमजोर होकर 3,750 रुपये प्रति क्विंटल रह गई। इस दौरान भोकर में रेगुलर कपास खली की कीमत घटकर 3,720 रुपये प्रति क्विंटल बोली गई। शाहपुर में रेगुलर कपास खली के भाव कमजोर होकर 3,780 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान सूर्यापेट में रेगुलर क्वालिटी की कपास खली के दाम घटकर 3,580 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

विश्व बाजार में खाद्य तेलों की कीमतों में तेजी का रुख रहा, इस दौरान घरेलू बाजार में कॉटन वॉश की कीमत तेज हुई। राजकोट में कॉटन वॉश के भाव तेज होकर 1,390 रुपये प्रति 10 किलो हो गए। इस दौरान अकोला में कॉटन वॉश की कीमत बढ़कर 1,385 रुपये प्रति दस किलो हो गई। गुजरात डिलीवरी कॉटन वॉश के दाम तेज होकर 1,405 से 1,410 रुपये प्रति 10 किलो हो गए।

सीसीआई ने तीसरे कार्यदिवस में कॉटन के बिक्री भाव तेज किए, बिनौले के बिक्री दाम घटाए

नई दिल्ली। कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने बुधवार को लगातार तीसरे कार्यदिवस में कॉटन की बिक्री कीमतों में 200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की। अत: स्पिनिंग मिलों की मांग बनी रहने के कारण बुधवार को शाम के सत्र में गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमतों में तेजी आई। इस दौरान निगम ने बिनौले की बिक्री कीमतों में कटौती की।


सीसीआई ने बुधवार को ई नीलामी के माध्यम से 5,19,800 क्विंटल बिनौले की बिक्री की पेशकश की। निगम ने इसके बिक्री भाव 50 से 100 रुपये प्रति क्विंटल तक कम किए। सीसीआई ने लगातार दूसरे दिन बिनौले की कीमतों में कटौती की है।

सीसीआई ने मंगलवार को भी कॉटन की बिक्री कीमतों में 500 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी 356 किलो की बढ़ोतरी की थी, जबकि इससे पहले सोमवार भी इसके बिक्री भाव 700 रुपये प्रति कैंडी तक बढ़ाये थे।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव बुधवार को 500 रुपये तेज होकर 55,500 से 56,000 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो हो गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,500 से 5,700 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव तेज होकर 5,300 से 5,500 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 5,380 से 5,710 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 51,500 से 52,500 रुपये कैंडी बोले गए।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमतों में तेजी का रुख रहा। एमसीएक्स पर मार्च 26 के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 540 रुपये तेज होकर 26,700 रुपये प्रति कैंडी हो गए। हालांकि इस दौरान आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में नरमी का रुख रहा।

उधर विश्व बाजार में भी हाल ही में कॉटन के दाम तेज हुए हैं। अधिकांश स्पिनिंग मिलों के पास कॉटन का बकाया स्टॉक कम है। हालांकि सीसीआई घरेलू बाजार में लगातार कॉटन बेच रही है तथा निगम के पास कॉटन का भारी, भरकम स्टॉक है लेकिन सीसीआई द्वारा बिक्री दाम तेज करने से हाजिर बाजार में इसके दाम तेज हो रहे हैं।

चालू सीजन में उत्पादन अनुमान तो ज्यादा है ही, साथ ही आयात भी बढ़ेगा, हालांकि मौजूदा भाव में जिनर्स की बिकवाली कम आ रही है। ऐसे में घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में तेजी, मंदी सीसीआई के बिक्री दाम पर भी निर्भर करेगी।

घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता ज्यादा है, जबकि यार्न में स्थानीय मांग पहले की तुलना में बढ़ी है।

फरवरी के दौरान डीओसी का निर्यात 22 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। फरवरी में डीओसी के निर्यात में 22 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 257,961 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल फरवरी में इनका निर्यात 330,319 टन का ही हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीने अप्रैल से फरवरी के दौरान डीओसी के निर्यात में 11 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 3,493,823 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 3,933,349 टन का हुआ था।

अमेरिका एवं इजराइल के साथ ईरान के बीच बढ़ते झगड़े ने होर्मुज स्ट्रेट और रेड सी के आसपास अस्थिरता की वजह से, खासकर मिडिल ईस्ट और यूरोप को भारत से डीओसी के निर्यात में काफी रुकावट डाली है। लॉजिस्टिक्स और शिपिंग में रुकावटों की वजह से मिडिल ईस्ट को जाने वाले भारत के डीओसी निर्यात का लगभग 20 फीसदी और यूरोप को जाने वाले 15 फीसदी पर खतरा मंडरा रहा है।

शिपिंग में रुकावट - शिपिंग कंपनियां लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य से बच रही हैं, जिससे रास्ता बदलना पड़ रहा है, जिससे आने-जाने का समय और लागत बढ़ रही है, क्योंकि मिडिल ईस्ट और यूरोप को डीओसी का निर्यात जारी रहने में खतरा है।

एक्सपोर्ट रुका - कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि मिडिल ईस्ट में कई कृषि उत्पादों का निर्यात पहले से ही रुका हुआ है।

लॉजिस्टिक्स की लागत में हुई बढ़ोतरी - लड़ाई लंबी होने की वजह से क्रूड तेल की कीमतों में तेजी आई है (100 डॉलर प्रति बैरल के पार) और जहाजों के लिए इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ गए हैं, जिससे शिपमेंट महंगा और कम फायदेमंद हो गया है।

दूसरे रास्ते — केप ऑफ गुड होप के आस-पास से रास्ता बदलने से शिपिंग की यात्रा में 10-15 दिन और लग जाते हैं, जिससे देरी होती है साथ ही लागत का खर्च ज्यादा होता है। उद्योग को खास तौर पर इस बात की चिंता है कि लगातार लड़ाई शिपमेंट में रुकावट डालती रहेगी, जिससे भारत डीओसी समेत अन्य कृषि उत्पादों के निर्यात पर असर पड़ेगा।

इस साल चीन से मांग बढ़ने और यूरोपियन सप्लायर के मुकाबले कॉम्पिटिटिव प्राइसिंग की वजह से भारतीय डीओसी का निर्यात बढ़ा है। भारतीय डीओसी में ज्यादा प्रोटीन होने की वजह से यह जानवरों के चारे के लिए बहुत अच्छा है। चीन की मांग में बढ़ोतरी देखी गई है, और अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 के बीच आयात 7.7 लाख टन से ज्यादा का हो गया। भारतीय डीओसी की कीमत अभी लगभग 225 डॉलर प्रति टन (एफओबी/एफएएस कांडला) है, जो एचबीजी एक्स-मिल 297 डॉलर प्रति टन से सस्ता है। नई फसल आने से पहले कम क्रशिंग की वजह से 2026 की शुरुआत में भारत से कुछ समय के लिए निर्यात में कमी आ सकती है।

मार्च 2025 में, चीन ने चीनी इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर कनाडा के टैरिफ के बदले में कनाडाई डीओसी और तेल पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया। अत: आयात शुल्क में बढ़ोतरी से कनाडा से आयात महंगा हो गया, जिससे चीन को दूसरे सप्लायर की ओर देखना पड़ा और सप्लाई के अंतर को कम करने के लिए भारत से आयात बढ़ाना पड़ा। हालांकि, 1 मार्च 2026 से चीन ने ट्रेड को कम करने की कोशिशों के तहत 31 दिसंबर, 2026 तक कनाडाई कैनोला (रेपसीड) मील पर 100 फीसदी टैरिफ को रोक दिया है। इससे भारतीय डीओसी के निर्यात को चीन की मार्केट में बने रहने के लिए कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ेगा।

भारतीय बंदरगाह पर फरवरी में सोया डीओसी का भाव तेज होकर 489 डॉलर प्रति टन हो गया, जबकि जनवरी में इसका दाम 435 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य फरवरी में भारतीय बंदरगाह पर घटकर 239 डॉलर प्रति टन रह गया, जबकि जनवरी में इसका भाव 248 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जनवरी के 84 डॉलर प्रति टन से कमजोर होकर फरवरी में 82 डॉलर प्रति टन रह गया।

मध्य मार्च तक चीनी का उत्पादन बढ़कर 261 लाख टन के पार, पेराई सत्र अंतिम चरण में

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) के दौरान 15 मार्च तक देशभर में चीनी का उत्पादन 10 फीसदी बढ़कर 261.75 लाख टन का हो चुका है। पिछले साल की समान अवधि में इसका उत्पादन 237.15 लाख टन का हुआ था।


नेशनल फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के अनुसार गन्ने की अधिक उपलब्धता और बेहतर दक्षता के कारण चालू पेराई सीजन में चीनी का कुल उत्पादन और इसकी रिकवरी दर में भी सुधार हुआ है। हालांकि कई प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में पेराई का कार्य अब समाप्ति की ओर है।

एनएफसीएसएफ के अनुसार पेराई सीजन 2025-26 के दौरान कुल 540 चीनी मिलें संचालित हुईं, जबकि 2024-25 में यह संख्या 533 थी। हालांकि मध्य मार्च तक केवल 173 चीनी मिलें ही चल रही हैं, जो कि पिछले साल इसी समय चल रही 200 चीनी मिलों की तुलना में काफी कम है।

प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में मध्य मार्च तक चीनी उत्पादन बढ़कर 98.50 लाख टन का हो गया है, जबकि पेराई सीजन 2024-25 की समान अवधि में इसका उत्पादन केवल 78.60 लाख टन का ही हुआ था। राज्य में औसत रिकवरी की दर 9.50 फीसदी की दर्ज की गई है, जो कि पिछले सीजन के 9.45 फीसदी से थोड़ी अधिक है।

उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में चीनी के उत्पादन में मामूली वृद्धि हुई है और यह 81.50 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि पिछले सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 80.95 लाख टन का हुआ था। बेहतर रिकवरी के कारण चीनी के कुल उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। राज्य में औसत चीनी की रिकवरी 10.15 फीसदी की आई है, जो पिछले साल के 9.60 फीसदी से अधिक है।

कर्नाटक में चालू पेराई सीजन में मध्य मार्च तक चीनी का उत्पादन बढ़कर 45.80 लाख टन का हो गया है, जबकि 2024-25 पेराई सीजन की समान अवधि में इसका उत्पादन 39.10 लाख टन का ही हुआ था। यहां औसत रिकवरी की दर 8.65 फीसदी की दर्ज की गई है, जो कि पिछले साल के 8.50 फीसदी से अधिक है।

एनएफसीएसएफ की रिपोर्ट के अनुसार गन्ने का पेराई सत्र अब धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, खासकर पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में। हालांकि उत्तरी राज्यों में अभी भी पेराई कुछ समय तक जारी रहने की संभावना है।

14 मार्च 2026

चालू सीजन में कॉटन का उत्पादन बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 317 लाख का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार पंजाब के पहले के अनुमान में 50 हजार गांठ, उत्तर और लोअर राजस्थान में भी क्रमश: 50-50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है। प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में पहले के अनुमान से 4 लाख गांठ ज्यादा एवं आंध्र प्रदेश में एक लाख गांठ ज्यादा होने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 191 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 75 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 98 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 18 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

चालू फसल सीजन में 47 लाख गांठ कॉटन के आयात का अनुमान है, जोकि पिछले साल के 41 लाख गांठ से 6 लाख गांठ ज्यादा है। चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत तक 36 लाख गांठ आयातित कॉटन भारतीय बंदरगाह पर पहुंच चुकी है।

चालू फसल सीजन 2025-26 के दौरान देश से 15 लाख गांठ कॉटन के निर्यात का अनुमान है, जबकि चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत देश से 7 लाख गांठ कॉटन का निर्यात हो चुका है।

एसएआई के अनुसार चालू फसल सीजन के आरंभ में 60.59 लाख गांठ का बकाया स्टॉक बचा हुआ था जबकि 320.50 लाख गांठ का उत्पादन होने की उम्मीद है। इस दौरान 47 लाख गांठ आयातित कॉटन आयेगी। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता 428.09 लाख गांठ की बैठेगी।

चालू फसल सीजन में कॉटन की कुल खपत 315 लाख गांठ की होने का अनुमान है, इसके अलावा 15 लाख गांठ का निर्यात हो जायेगा। अत: क्लोजिंग स्टॉक 98.09 लाख गांठ का बैठेगा। सीसीआई, महाराष्ट्र फेडरेशन, एमएनसी एवं जिनर्स के साथ ही व्यापारियों एवं निर्यातकों के पास 144.30 लाख गांठ कॉटन का स्टॉक है। इसके अलावा मिलों के पास करीब 75 लाख गांठ का स्टॉक है।

पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में फरवरी अंत तक उत्पादक राज्यों की मंडियों में 260.96 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो की आवक हो चुकी है।

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले चार महीनों नवंबर-25 एवं फरवरी-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़कर 5,324,275 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 5,023,900 टन का हुआ था। फरवरी 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (जनवरी, 2026) के 13.12 लाख टन की तुलना में थोड़ा कम होकर 12.92 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार फरवरी 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 35 फीसदी बढ़कर 1,316,545 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल फरवरी में इनका आयात 977,477 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,292,043 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 24,502 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार मिडिल ईस्ट और ब्लैक सी पर चल रहे तनावों ने भारत के खाद्य तेल के बाजार में काफी उतार-चढ़ाव और सप्लाई की चिंताएँ पैदा कर दी हैं। रूस और पूर्वी यूरोप से सूरजमुखी तेल के शिपमेंट में रुकावट और पाम तेल के माल ढुलाई के खर्च में बढ़ोतरी ने सूरजमुखी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की है, जिससे व्यापारियों और उपभोक्ताओं को सप्लाई चेन के जोखिमों से निपटने के लिए स्थिति पर नजर रखनी पड़ रही है।

क्रूड तेल की कीमतों में आई तेजी से पाम तेल की बायोडीजल में दिलचस्पी बढ़ी: मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से क्रूड तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से बायोफ्यूल प्रोड्यूसर पाम तेल बेस्ड बायोडीजल में दिलचस्पी ले रहे हैं, जिससे आने वाले समय में पाम तेल की डिमांड और कीमतें बढ़ सकती हैं, खासकर साउथ-ईस्ट एशिया में।

सूरजमुखी तेल की सप्लाई के रिस्क: वैसे तो भारत पहले से सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर रहा है, लेकिन मौजूदा लड़ाई, खासकर लाल सागर और स्वेज नहर में संभावित रुकावटों से शिपमेंट में देरी होने, लॉजिस्टिक लागत बढ़ने और उपलब्धता पर असर पड़ने का खतरा है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव: खाद्य तेलों की कीमतों में हाल ही में उतार-चढ़ाव देखा गया है। कुछ तेलों जैसे सूरजमुखी तेल की कीमतों में घरेलू बाजार में बढ़ोतरी देखी गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के असर को कम करने के लिए सप्लाई चेन में रुकावट की चिंताओं के कारण, भारत सोया और सूरजमुखी तेल के लिए अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और उरुग्वे के साथ लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट की संभावना तलाश रहा है।

निर्यात पर असर: इस लड़ाई से भारत के डीओसी के निर्यात को भी खतरा है, क्योंकि साउथ-ईस्ट एशिया और मिडिल ईस्ट में शिपमेंट पर असर डालने वाली संभावित लॉजिस्टिक दिक्कतों से डीओसी के कुल एक्सपोर्ट में लगभग 20 फीसदी का हिस्सा आता है।

नेपाल से भारत में इंपोर्ट:
नवंबर-दिसंबर, 2025 के दौरान, नेपाल ने लगभग 101,000 टन रिफाइंड तेल भारत को निर्यात किया, जिसमें 89,753 टन रिफाइंड सोया तेल, 6,427 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 4,288 टन आरबीडी पामोलिन शामिल थे। जनवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 60,000 टन रिफाइंड तेल का निर्यात  किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल तथा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से फरवरी 26 के दौरान 803,297 टन के मुकाबले केवल 118,417 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से फरवरी 25 के दौरान 4,081,880 टन के मुकाबले 5,099,951 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से रिफाइंड तेल का रेश्यो 16 फीसदी से घटकर 2 फीसदी रह गया, जबकि क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 98 फीसदी का हो गया।

एसईए के अनुसार केंद्र सरकार की पॉलिसी के लिए धन्यवाद, जिसमें 31 मई, 2025 से क्रूड और रिफाइंड तेल के बीच ड्यूटी का अंतर 8.25 फीसदी से बढ़ाकर 19.25 फीसदी कर दिया गया है। इससे घरेलू रिफाइनिंग इंडस्ट्री की वैल्यू एडिशन, रोजगार और बेहतर कैपेसिटी इस्तेमाल में मदद मिली है, जो एडिबल ऑयल में आत्मनिर्भरता पर प्रधानमंत्री के विजन की तरफ एक कदम है।