07 अगस्त 2009
सरकार को महंगी पड़ सकती है खाद्य पदार्थों के दामों में तेजी
नई दिल्ली: सरकारी आंकड़ों के अनुसार सभी कमोडिटी के लिए सालाना महंगाई दर लगातार आठवें सप्ताह नकारात्मक दायरे में रही, लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी जारी है। आने वाले कुछ महीनों में कई राज्यों में चुनाव होने हैं। लिहाजा खाद्य पदार्थों के दाम में इस तेजी से केंद्र सरकार के माथे पर बल पड़ गए हैं। महाराष्ट्र में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने वाले हैं जबकि हरियाणा में अगले साल चुनाव होने हैं। झारखंड में अभी राष्ट्रपति शासन है और साल के अंत तक वहां भी चुनाव होने हैं। ताजा आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक थोक मूल्य सूचकांक आधारित सालाना महंगाई दर 25 जुलाई को समाप्त सप्ताह में -1.58 फीसदी रही जबकि एक साल पहले इसी अवधि में यह 12.53 फीसदी थी। बहरहाल नकारात्मक महंगाई दर होने के बावजूद उपभोक्ताओं के लिए राहत की कोई बात नहीं है, क्योंकि खाद्य पदार्थों के मामले में महंगाई 25 जुलाई को समाप्त सप्ताह में दहाई अंक के करीब 9.7 फीसदी पर पहुंच गई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों में काफी तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, लेकिन होलसेल प्राइस इंडेक्स में उनका भार कम होने के कारण सालाना महंगाई दर पर खाद्य पदार्थों का खास असर नहीं पड़ता है। ऐसे समय में जब खाद्य पदार्थों की कीमतों में जारी है, महंगाई दर के नकारात्मक होने से सरकार कुछ राहत की सांस ले सकती है। यह संसद में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बयान से भी जाहिर है, 'सरकार उत्तरदायी है...सरकार कदम उठा रही है। हम कीमत वृद्धि को लेकर सजग हैं और जब भी नीतिगत कदमों की जरूरत होगी, उन्हें उठाया जाएगा।' उन्होंने कहा कि सब्जियों और दूध की कीमत बढ़ने के पीछे मॉनसून एक अहम वजह है। उन्होंने कहा कि पिछले साल जब महंगाई काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गई थी तो आम आदमी को राहत देने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए थे। अब जब कुल महंगाई दर गिरकर नीचे आ गई है और पिछले साल की कड़ी मौद्रिक नीति नरम हो गई है तो वैश्विक दबाव अब कमोडिटी कीमतों के ऊपर देखने को मिल रहा है। मुखर्जी ने कहा कि यह सब डॉलर के चढ़ने और उसकी मांग की वजह से है और ईंधन समेत दूसरी कमोडिटी कीमतों को लेकर वैश्विक रुख के बारे में कुछ कह पाना मुश्किल है। भारत के मुख्य सांख्यिकीविद् और सांख्यिकी मंत्रालय में प्रमुख अधिकारी डॉ प्रणव सेन का कहना है कि इस स्थिति में कीमतों में वृद्धि फसल के बर्बाद होने से ज्यादा सट्टेबाजी के कारण है। सेन ने कहा, 'कटाई सीजन से पहले काफी सट्टेबाजी होती है। हम अभी तक नहीं कह सकते हैं कि फसल खराब होने जा रही है। इस वित्त वर्ष में अर्थव्यवस्था को कोई गंभीर खतरा नहीं है।' पिछले साल के मुकाबले होलसेल स्तर पर दाल की कीमतें 19 फीसदी, सब्जियों की कीमत 26 फीसदी और अनाजों की कीमत 11.1 फीसदी अधिक हैं। (ET Hindi)
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