मुंबई August 13, 2009
मेंथा की फसल कमजोर होने और सूखा पड़ने की वजह से इस साल मेंथा का उत्पादन कम होने की आशंका जताई जा रही है।
वैश्विक बाजार में मंदी के कारण आयातकों केपास का भी माल लगभग खत्म हो चुका है। मेंथा उत्पादक अन्य देशों में भी मेंथा काउत्पादन कमजोर होने की खबर से मेंथा की कीमतें बढ़ना तय माना जा रहा है।
विदेशी बाजारों में मेंथा की मांग बढ़ने से सटोरियों और कारोबारियों ने मेंथा का स्टॉक करना शुरू कर दिया हैं। कारोबारी मानते हैं कि घरेलू और वैश्विक कारणों को देखते हुए मेंथा के भाव वर्ष 1991 के स्तर तक पहुंच सकते हैं।
उत्पादन कमजोर होने से उत्तर प्रदेश, पंजाब और हिमाचल प्रदेश के मेंथा उत्पादकों को अच्छा फायदा हो सकता है क्योंकि मेंथा की सुगंध विदेशी बाजारों तक पहुंच चुकी है। वैश्विक मंदी के कारण पिछले 7-8 महीने में आयातकों के पास माल लगभग खत्म हो गया है। फार्मा क्षेत्र में मेंथा तेल की मांग सबसे ज्यादा है।
उल्लेखनीय है कि वैश्विक मंदी का फार्मा क्षेत्र में कोई असर नहीं पड़ा है। मेंथा की मांग को पूरा करने के लिए कारोबारी एक बार फिर से स्टाक बढ़ाने की जुगत में लगे हैं और यही वजह है कि पिछले कुछ दिनों से कमोडिटी एक्सचेंजों में मेंथा तेल का रिकॉर्ड कारोबार हो रहा है।
देश के सबसे बड़े कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स में अगस्त शुरूआत में मेंथा तेल का वायदा भाव 485 रुपये प्रति किलोग्राम था जो इस समय 534 रुपये पर पहुंच चुका है। कीमत के साथ मांग भी बड़ी है, एमसीएक्स में अगस्त महीने के पहले कारोबारी दिन कुल 663.44 हजार किलो मेंथा तेल का कारोबार हुआ था जबकि पिछले तीन दिन से इसका कारोबार प्रतिदिन 1100 से 1500 हजार किलो के बीच हो रहा है।
वायदा के साथ हाजिर बाजार में भी मेंथा तेल के भाव तेजी से ऊपर जा रहे हैं। एक अगस्त को जयपुर मंडी में मेंथा तेल का भाव 480 रुपये प्रति किलो था जो इस समय 525 रुपये पर पहुंच चुका है। मेंथा की प्रमुख मंडी चंदौसी में मेंथा का कारोबार करने वाले गिरीश मामा कहते हैं कि मेंथा तेल के भाव पिछले दो साल से 400 से 700 रुपये प्रति किलो के बीच चल रहे थे।
इस साल किसानों को कीमतें बढ़ने की उम्मीद थी लेकिन जुलाई तक उन्हें मन के मुताबिक भाव नहीं मिले, जिससे किसानों ने मेंथा की जगह गन्ना और दूसरी फसलों की तरफ रुख कर लिया। देश के अंदर मेंथा की कम रोपाई और विदेशी मांग मे तेजी आने की वजह से अब मेंथा की कीमतें बढ़ना शुरू हो गई हैं।
मामा कहते हैं कि हर साल अगस्त तक बाजार में माल आता रहता था लेकिन इस बार जुलाई के पहले सप्ताह से ही माल आना बंद हो गया है। जिसको देखते हुए लगता है कि इस बार 1991 वाला भाव देखने को मिल सकता है। वर्ष 1991 में मेंथा तेल 1600 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया था।
गौरतलब है कि मेंथा के किसान नई फसल के लिए मेंथा पौधे की जड़ को रखते हैं ताकि उसे अगली फसल के लिए इस्तेमाल किया जा सके, लेकिन इस साल किसानों ने निराश होकर ऐसा नहीं किया है। जिसका भी फर्क मेंथा की अगली रोपाई पर पड़ने वाला है।
मेंथा के जानकारों का कहना है विदेशों में अमेरिका एक ऐसा देश है जो मेंथा तेल का 50 फीसदी हिस्सा खरीद लेता है। मेंथा का पहले चीन में उत्पादन होता था लेकिन चीन ने भी अब भारत से मेंथा मंगाना शुरू कर दिया है।
यूरोपीय देशों के साथ जापान और सिंगापुर भी भारतीय मेंथा के दीवाने हैं। विदेशों में मेंथा की मांग बढ़ने वाली है जिसको देखते हुए मेंथा की खरीदारी बढ़ेगी जिसका फर्क कीमतों पर भी पड़ेगा। (BS Hindi)
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