मुंबई August 16, 2009
खराब मॉनसून के बावजूद, खाद्यान्न के भरपूर स्टॉक के चलते महंगाई दर पर लगाम लग सकती है।
एक कमोडिटी ब्रोकिंग फर्म ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जिंसों की महंगाई दर खाद्यान्न स्टॉक के चलते बहुत ज्यादा होने की संभावना नहीं है। अपनी रिपोर्ट में ऐंजल कमोडिटीज ने कहा है कि बारिश न होने से निश्चित रूप से खाद्यान्न की कीमतों पर असर पड़ेगा, जिसके असर से महंगाई दर बढ़ेगी। बहरहाल, भारत के पास अनाज का पर्याप्त भंडार है।
2002-03 में भी संचित स्टॉक जारी किए जाने से कीमतों को नियंत्रित करने में मदद मिली थी। सरकार ने यह घोषणा की है कि उसके पास मांग को पूरा करने के लिए खाद्यान्न का पर्याप्त स्टॉक है, जिसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाएगा। इसके अलावा 2009-10 में और भी कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाएंगी।
खाद्यान्न का स्टॉक 1 जून को 535 लाख टन से ज्यादा था, जबकि सरकार की कुल वार्षिक जरूरत 496 लाख टन होती है। अगर इन जिंसों को अलग अलग करके देखें तो 204.03 लाख टन चावल, 331.22 लाख टन गेहूं है।
इस समय कल्याणकारी योजनाओं के तहत दिए जाने वाले अनाज के लिए कुल 446 लाख टन सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए, 50 लाख टन अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए खाद्यान्न की जरूरत है।
इस तरह से अगर पूरे देश में बारिश की कमी रहती है तो भी कीमतें नियंत्रण में रहेंगी, क्योंकि किसी भी स्थिति को संभालने के लिए सरकार के पास खाद्यान्न का पर्याप्त स्टॉक है। सरकार की नीतियों से हाजिर बाजार विकसित करने में मदद मिलेगी और इससे बेहतर और प्रभावी मूल्य प्रणाली की खोज कृ षि जिंसों के लिए हो सकेगी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि सरकार की इस नीति के चलते कृषि जिंस वायदा के तेज विकास के लिए जमीन तैयार होगी। सरकार द्वारा घोषित विकास योजनाओं का उद्देश्य कृषि क्षेत्र को समर्थन देना है। इससे विभिन्न जिंसों के उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही मांग-आपूर्ति का खाईं को भी भरा जा सकेगा।
सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का प्रतिशत 2002 में 25 प्रतिशत था जो अब घटकर 17 प्रतिशत रह गया है। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र, जीडीपी में अहम भूमिका निभाता है, जिसके चलते भारत के विकास में इस क्षेत्र को अहम माना जाता है।
कृषि क्षेत्र की भूमिका केवल सकल घरेलू उत्पाद में योगदान की वजह से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भारत में यह इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश की बहुसंख्यक आबादी इस क्षेत्र पर निर्भर है। इस साल बारिश पिछले 28 साल में सबसे कम हुई है, जिसकी वजह से कृ षि क्षेत्र पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
उत्तर पश्चिमी इलाकों में बारिश सामान्य से 40 प्रतिशत कम हुई, जहां व्यापक पैमाने पर खेती होती है। अगर कृषि उत्पादन में गिरावट आती है तो इसका सीधा असर आम लोगों की आमदनी पर पड़ेगा। इस तरह से संपूर्ण अर्थव्यवस्था और जीडीपी प्रभावित होगी। इन सभी वजहों से उत्पादन में गिरावट के आसार हैं और साथ ही कीमतें भी बढ़ेंगी।
इस तरह से भारतीय खेती में मॉनसून को दरकिनार नहीं किया जा सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मॉनसून- सरकार की बचत पर सीधा प्रभाव डाल सकता है, इससे सार्वजनिक निवेश में कमी आ सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आ सकती है। (BS Hindi)
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