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10 अगस्त 2009

मंहगाई के मारे प्रधानमंत्री बेचारे

देश की जनता सचेत हो जाए। अब सरकार भी महंगाई के सामने हाथ खड़ी कर चुकी है। महंगाई नियंत्रण सरकार के हाथ में नहीं है। महंगाई को नियंत्रित को अब भगवान ही करेंगे। मानूसन मेहरबान नहीं है और उधर मंहगाई चरम है। अब सरकार मानसून तो ला नहीं सकती। इसलिए सरकार ने हाथ खड़े कर दिए। देश के मुखिया बेबस है। ठीक उसी तरह से जैसे शर्म-अल-शेख में अमेरिका दबाव में बेबस थे। ज्वाइंट स्टेटमेंट जारी करते हुए भारतीय हितों को ध्यान में नहीं रखा था। दिलचस्प बात है कि यह बयान अपने आप में विरोधाभास लिए है। लेकिन प्रधानमंत्री का यह बयान लोगों को संकेत देता है कि लोग महंगाई में जीने की आदत डाले।
अगर आदत डालेंगे तो ठीक रहेगा क्योंकि आने वाले समय में महंगाई नियंत्रण सरकार के हाथ में नहीं रहेगा। दो साल पहले महंगाई के मसले पर ठीक इसी तरह का बयान तत्कालीन वित मंत्री पी चिंदबरम का था। उन्होंने उस समय भी कहा था कि देश की जनता मंहगी सामान खरीदने की आदत डाले। महंगाई को बरदाश्त करने की क्षमता रखे। यह बयान चिंदबरम ने उस समय दिया था जब देश पर मानसून मेहरबान था और देश के अनाज भंडार भरे हुए थे। न तो चीनी का उत्पादन कम हुआ था और न ही दाल का उत्पादन कम हुआ था। फिर भी वित मंत्री ने महंगाई में रहने की आदत डालने की बात की थी।नई दिल्ली में मुख्य सचिवों की बैठक में मानसून पर चर्चा हुई। सूखे की हालत से उपजी स्थिति पर बातचीत हुई। प्रधानमंत्री ने माना कि महंगाई बढ़ रही है और आने वाले दिनों में और महंगाई से जूझने के लिए जनता तैयार रहे। प्रधानमंत्री ने महंगाई से निपटने के लिए एक ही संकेत दिए। कहा कि जमाखोरों पर कार्रवाई होगी। पर दिलचस्प बात है कि अन्य उपायों पर चर्चा नहीं हुई। लेकिन प्रधानमंत्री के आधिकारिक बयान ने जमाखोरों को मालामाल भी कर दिया। अब प्रधानमंत्री के बयान पर ही जमाखोरी बढ़ेगी और जरूर वस्तुओं की कीमतें बाजार में बढ़ेगी। बहाना प्रधानमंत्री के बयान को लिया जाएगा। कहा जाएगा सरकार खुद मानती है महंगाई बढ़ेगी। कारण खराब मानसून है। अब ऐसे में देश की निगरानी व्यवस्था कितनी जमाखोरी रोक पाएगी यह समय बताएगा। इस देश में आजादी के बाद से ही जमाखोरी माल कमाने का बढ़िया तरीका है। समाजवादी सिस्टम में जब सबिसडी थी, लोककल्याणकारी राज्य की अवधारणा थी तब भी जमाखोरी से माल कमाया जाता था। आज जब खुली व्यवस्था तब भी जमाखोरी से माल कमाया जा रहा है।
पर यह मनमोहन सिंह का ही राज है जो ब्रिटिश राज की याद दिलाते है। वो समस्या से निपटने के बजाए लोगों को डरा रहे है। जब राजा ही डर गया हो और जनता को डराने लगा हो तो उस देश में प्रजा की स्थिति क्या होगी? हालांकि यह भी सच्चाई है कि ब्रिटिश काल में भूख से मरने वाली जनता की तरह आजादी के साठ साल बाद भी उड़ीसा के कालाहांडी जैसे जिलों में भूख से लोग मर रहे है। ऐसे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयान जनता के दिल को शायद मजबूत करने के लिए है। आप अपना दिल मजबूत रखिए, अगर भूख से मरना भी पड़े तो साहस से मरे। जैसे सीमा पर सेना के जवान साहस से दुश्मन की गोली से मरते है पर पीछे नहीं हटते। सवाल उठता है कि आज तो मानसून खराब है इसलिए महंगाई बढ़ गई। पर कुछ मामले अभी भी शक की स्थिति पैदा करते है। देश में एकाएक चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। चीनी की कीमत 30 रुपये किलो तक पहुंच गई है। शरद पवार का मानना है कि गन्ना के कम उत्पादन के कारण चीनी की कीमतें बढ़ी है। दिलचस्प बात है कि जब गन्ना का कम उत्पादन नहीं था, देश में चीनी का भंडार भी पूरा था तब चीनी तीस रुपये किलो कैसे पहुंच गई थी। कम से कम फरवरी- मार्च में चीनी जो बाजार में बेची गई उसकी कीमतें तो सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाती है। सवाल यह है कि मानसून खराब है तो इसका असर चावल की कीमतों पर पड़ेगा। पर दाल की कीमतों में लोकसभा चुनावों के बाद एकाएक उछाल कैसे आ गया? जबकि साथ में यह रिपोर्ट भी आ रही है कि बंदरगाहों पर छ हजार टन दाल सड़ गया। बेशक वे दाल सरकारी एजेंसियों की हो या किसी प्राइवेट एजेंसी की।प्रधानमंत्री जी कम से कम यह स्पष्ट करे कि देश में जब सामान्य स्थिति होती है तब भी महंगाई क्यों बढ़ती है। पिछले पांच सालों में जिस तरह से महंगाई बढ़ी उसपर प्रधानमंत्री चुप क्यों है? तमाम कीमतों में बेतहाशा वृद्वि के बावजूद वायदा कारोबार को क्यों बढ़ावा दे जा रहा है? सच्चाई यह है कि जिस तरह से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में जिस तरह के कुछ मुनाफाखोरों ने सरकार पर नियंत्रण कर रखा था, उसी तरह से अब मनमोहन सिंह सरकार पर भी नियंत्रण जमाखोरों ने कर रखा है। यह भी दिलचस्प स्थिति है कि संसद के बजट सत्र में गंभीरता से महंगाई पर चर्चा नहीं हुई। विदेश नीति पर अगर प्रधानमंत्री ने जवाब दिया, अगर रिलांयस घराने के विवाद पर मुरली देवड़ा ने लोकसभा में जवाब दिया तो महंगाई पर भी गंभीरता से सरकार को जवाब देना चाहिए था। लेकिन संसद के बजट सत्र में महंगाई से सरकार भागती नजर आयी। ऐसा लगता है कि वर्तमान केंद्र सरकार पूरे देश को ही कालाहांडी बनाना चाहती है। अब समय आ गया है कि सरकार अपनी नीतियों का अवलोकन करे। सेज और प्राइवेट उद्योगों के लिए किसानों की जमीन हथियाने की नीति को बदले। इससे देश में बड़े पैमाने पर कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है। हर जगह रियल एस्टेट के बिजनेस को बढ़ावा देने से बड़े पैमाने पर कृषि उद्योग प्रभावित हुआ है। निश्चित तौर पर इससे जरूरी खाद्यान वस्तु जिसमें चावल और गेहूं को छोड़ सबजी, दलहन और तिलहन शामिल है के उत्पादन प्रभावित हुए है। गेहूं और चावल के उत्पादन में भी पंजाब और हरियाणा ने पूरे देश का बचाव कर रखा है। जबकि बाकी राज्यों की हालत अभी भी पतली है। अगर पंजाब केंद्रीय पुल में गेहूं नहीं दे तो देश में गेहूं का भारी संकट भी आ जाएगा। यही कारण ही कि पंजाब आज तक कृषि विविधिकरण की नीति को लागू नहीं कर पाया। इस राज्य ने जब भी अपनी नई कृषि नीति लागू करने की कोशिश की केंद्र ने दबाव डाल राज्य को गेहूं और चावल की खेती करने को मजबूर किया। इससे यह राज्य भी भारी जल संकट में फंसा है। धान की खेती के कारण भूजल स्तर काफी नीचे जा रहा है। उधर देश के अधिकतर राज्यों में पिछले पांच सालों में और रियल एस्टेट कंपनियां और प्रापर्टी डीलरों ने जाल बिछा दिया है। वे कृषि जमीनों पर आंख लगाए बैठे है। हर जगह प्रापर्टी डीलरों के दफ्तर खुले हुए है। हर चौथा आदमी अपने आप को प्रापर्टी डीलर बताता है। उधर सरकारों की सहयोग से रिएल एस्टेट कंपनियां कृषि योगय जमीन को कंक्रीट के जंगल में तबदील कर रहे है। (Agency)

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