बंगलुरु- चीन से आयात किए जाने वाले सस्ते टसर सिल्क से भारतीय टसर को कारोबारी मैदान में कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है। यह अपने प्रकार की तीसरी घटना है, जब चीन की बढ़ती घुसपैठ के कारण घरेलू सेरीकल्चर सेक्टर के कारोबार पर असर पड़ा है। वर्ष 2001-03 में चीन के सस्ते मलबेरी यार्न के कारण घरेलू कारोबारियों के हितों की रक्षा के लिए भारत को इस पर एंटी डंपिंग ड्यूटी (एडीडी) लगानी पड़ी थी। इसके बाद चीन ने सिल्क फ्रैबिक का निर्यात करना शुरू कर दिया। हालांकि, केंद्र सरकार ने एक बार फिर एंटी डंपिंग ड्यूटी के जरिए इस पर रोक लगाई। टसर के प्रमुख उत्पादक राज्य झारखंड का कारोबार चीन के टसर के कारण काफी प्रभावित हो रहा है। भारत में चीन से आयात किया जाने वाला टसर जमीनी और समुदी रास्तों के जरिए भारत पहुंच रहा है। जानकारों का कहना है कि चीनी टसर बाजार में 1,500-1,600 प्रति किलोग्राम के भाव पर बिक रहा है, जबकि भारतीय टसर के दाम 2,000 से 2,200 रुपए प्रति किलोग्राम हैं। झारखंड सरकार के सेरीकल्चर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, 'टसर में चीन की घुसपैठ लगातार बढ़ रही है। निश्चित रूप से यह भारतीय कारोबार के लिए बड़ा खतरा हो सकता है। कीमत के लिहाज से हम चीन के टसर का कोई मुकाबला नहीं कर सकते हैं। इस समय इस उद्योग को सरकारी सहायता की दरकार है। इसके साथ ही इसके आयात पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाना भी घरेलू कारोबारियों के लिए फायदेमंद होगा। इस समय पांच लाख से ज्यादा लोगों का जीवन-यापन इस उद्योग के जरिए हो रहा है। अगर सरकार ने चीनी टसर के आयात को रोकने के लिए सही दिशा में कदम नहीं उठाए तो इसका असर उन परिवारों पर पड़ेगा।'
राज्य का सेरीकल्चर विभाग अभी उन आंकड़ों को हासिल करने में जुटा है कि चीन से आयात किए जाने वाले टसर की सही मात्रा क्या है? हालांकि, शुरुआती आंकड़ों को देखते हुए विभाग का अनुमान है कि झारखंड के कुल टसर उत्पादन के 30-50 फीसदी हिस्से के बराबर चीन से आयात किया जाता है। झारखंड में पिछले साल करीब 300 टन टसर का उत्पादन किया गया। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के आखिर तक राज्य में टसर का उत्पादन मौजूदा उत्पादन से तीन गुना होने का अनुमान है। हालांकि, इस साल मानसून की बेरुखी ने उत्पादन को बढ़ाकर तीन गुना किए जाने के लक्ष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। चीन से आयात किए जाने वाले टसर पर प्रतिबंध लगाए जाने की मांग के साथ ही राज्य का सेरीकल्चर विभाग यहां पैदा होने वाले टसर की लोकप्रियता बढ़ाने का अभियान भी चला रहा है। (ET Hindi)
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