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10 अगस्त 2009

तेहरान से तय होंगी बासमती किसानों के मुनाफे की किस्मत

नई दिल्ली- इस सीजन में पंजाब और हरियाणा के किसानों ने बासमती की बुआई में जोरदार बढ़ोतरी की है, लेकिन इसमें खास बात यह है कि बड़ी कंपनियों के साथ ये किसान बासमती से कितना पैसा बनाएंगे यह तेहरान में तय होगा। 13,000 करोड़ रुपए के इस उद्योग में इन कंपनियों ने अपने बैंकरों और शेयरहोल्डरों के साथ 2,000 करोड़ रुपए का निवेश किया है। वे उत्सुकता से नैरोज त्योहार और राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के मामले पर नजर रखे हुए हैं क्योंकि ये नए कारक निवेश पर मिलने वाला रिटर्न तय करेंगे। लेकिन ऐसी क्या वजह रही है कि बासमती का हाजिर बाजार तरौरी से तेहरान जाने को बेकरार है? इसके पीछे वजह यह है कि पिछले कुछ सीजन से ईरान अपने पड़ोसी देश इराक के साथ भारतीय बासमती निर्यात के प्रमुख ग्राहक के रूप में उभरा है। इस उभार के कई कारण हैं। पहला कि ईरानी बड़ी मात्रा में हाफ ब्वायल्ड पूसा 1121 का आयात करते हैं। ईरान में खेती पर संकट के कारण अपनी जरूरत के सुगंधित चावल के लिए दुनिया के दूसरे बाजारों पर उसकी निर्भरता बढ़ गई है। इसका फायदा भारत को मिला है। नजदीक होने और 30 लाख टन चावल आपूर्ति करने की क्षमता रखने के कारण ईरान ने अपना ध्यान भारत पर केंद्रित कर दिया है। एक अक्टूबर से शुरू होने वाले नए सीजन में भारत से जा रहे 25 लाख टन बासमती चावल में से करीब आधा ईरान पहुंच जाएगा। और अगर आपकी टोकरी का आधा हिस्सा एक ही जगह जा रहा हो तो आपको उस पर कड़ी नजर रखनी होती है और यही काम भारतीय इंडस्ट्री कर रही है। दूसरा कारण यह है कि ईरान इतनी अधिक कीमत देता है जितनी भारतीय ख्वाब में भी नहीं सोच सकते हैं। किसे मालूम था कि हाल ही में बासमती श्रेणी में शामिल हुई पूसा 1121 किस्म ईरान की पसंद में शामिल हो जाएगी।
इस्फाहान में इसकी कीमत 1,500 डॉलर प्रति टन या फिर 70 रुपए प्रति किलोग्राम पर है। इसके पीछे मुख्य वजह है कि ईरानी अपनी स्थानीय किस्म दोमसिया के मुकाबले अधिक कीमत चुकाते रहे हैं और चूंकि पूसा 1121 में रेशा नहीं है, इस कारण किसी को भी पूसा 1121 के लिए अधिक कीमत चुकाने से परहेज भी नहीं है। इससे यह हुआ है कि भारतीय कंपनियों और किसानों के मन में यह बात आई कि इस किस्म के चावल का उत्पादन और निर्यात अधिक से अधिक किया जाए। हरियाणा में तेजी से पूसा 1121 की तरफ रुझान बढ़ रहा है। इसके अलावा ईरानी खरीदार एक साथ बड़ा स्टॉक लेना पसंद नहीं करते हैं और वे तभी आयात करना शुरू करते हैं जब स्पष्ट तौर पर कम आपूर्ति की समस्या दिखने लगे। यहां इनवेंटरी मैनेजमेंट से पता चलता है कि ईरानी खरीदारों को लो कैरिंग कॉस्ट का तो फायदा मिलता है, लेकिन मोलभाव के मामले में वे भारतीयों से पिछड़ जाते हैं। इस कारण आधे उबले पूसा 1121 पर रिकॉर्ड मार्जिन कमाने वाले निर्यातकों के लिए इससे अच्छी कोई खबर नहीं है। तीसरा कारण यह है कि ईरानी भुगतान करने में तेजी दिखाते हैं। यह नकदी संकट से जूझ रहे भारतीय निर्यातकों के लिए एक वरदान की तरह है। ऑर्डर मिलने से धान खरीदने और निर्यात करने से लेकर हाथ में नकद आने तक में चार सप्ताह से कम ही समय लगता है। बासमती बिजनेस के मामले में यह अप्रत्याशित है। अंतिम कारण यह है कि ईरानियों ने धीरे-धीरे और प्रभावी तरीके से सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया जिन्होंने दशकों तक अंतरराष्ट्रीय बासमती बाजार पर अपना नियंत्रण बनाकर रखा। यह भारतीय निर्यातकों के लिए अच्छी खबर है। हालांकि सऊदी अरब अब भी भारत से 7,50,000 टन बासमती चावल का आयात करता है, लेकिन उसका मोलभाव काफी कठिन होता है। सऊदी आयातक कुछ ही हैं और उनके पास हमेशा एक साल का स्टॉक होता है। वे हमेशा सबसे कम कीमत पर बोली लगाते हैं। सभी पाकिस्तानी और भारतीय निर्यातक उनको निर्यात करने के लिए व्यग्र रहते हैं, इसका फायदा सऊदी उठाते हैं और वे अपनी शर्तों पर डील करते हैं। लेकिन अब यह किस्सा पुराना पड़ रहा है। ईरानियों के बड़ी मात्रा में ऊंची कीमत पर चावल खरीदने के कारण निर्यातकों को अब सऊदी अरब के खरीदारों के पीछे भागने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात है कि ईरान में राजनीति कभी बड़ा मुद्दा नहीं रही। ऐसे में देखें तो ईरान में बड़ी संभावना है, लेकिन इसके दूसरे पक्ष तो देखें तो कुछ नया मसला है। स्टोर्स में 130 रुपए प्रति किलो पर बासमती चावल चिकन से भी अधिक महंगा हो गया है। इस कारण आश्चर्य नहीं है कि इंडस्ट्री को इस साल भारत में 5,00,000 टन बासमती चावल बिकने की ही उम्मीद है। (ET Hindi)

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