बंगलुरु: कर्नाटक में इस बार खरीफ सीजन में मक्के की बंपर फसल होने वाली है। मक्के के बारे में जो खबरें मिली है उसके हिसाब से इसका बुवाई रकबा 9.59 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसका मतलब जितनी जमीन पर मक्का बोने का लक्ष्य था, उस पर पूरी बुवाई हुई है। एक अनुमान के मुताबिक कर्नाटक में बुवाई रकबा 10 हेक्टेयर को पार कर सकता है। इससे मक्के की कुल उपज 20 लाख टन का स्तर पार कर सकती है। यहां प्रति हेक्टेयर 30 क्विंटल मक्के का उत्पादन तय किया गया है। राज्य के कृषि विभाग के अधिकारियों ने ईटी से कहा, 'मक्के का बुवाई रकबा बढ़ने की वजह उसका न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी है। पिछले साल मक्के के एमएसपी में 35 फीसदी की बढ़ोतरी की गई थी। मक्के की उपज वाले प्रमुख जिलों देवनगिरी, हावेरी, बेलगाम या हासन के किसान इस साल मक्के की फसल को तरजीह दे रहे हैं।'
मक्के की एमएसपी को 620 रुपए प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 840 रुपए कर दिया गया है। गौरतलब है कि हासन जिले में आलू उगाने वाले किसानों ने इस बार मक्का बोने में दिलचस्पी दिखाई है। वे पिछले साल आलू की बंपर फसल के असर से काफी परेशान हैं। इस बार खरीफ सीजन में आलू की लक्ष्य बुवाई में 50 फीसदी की कमी आई है। कर्नाटक देश भर के मक्का उत्पादन में 8 से 10 फीसदी का योगदान करता है। इस बार दूसरे मक्का उत्पादक राज्यों आंध्र प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में कम फसल होने की आशंका को देखते हुए इस राज्य को खासा फायदा होने का अनुमान है। एक अनुमान के मुताबिक, इन तीनों राज्यों में मक्के की फसल 20 से 30 फीसदी कम रह सकती है। देश के कुल मक्का उत्पादन का लगभग 40 फीसदी इन तीनों राज्यों में होता है। देश में हर साल 2 करोड़ टन मक्के का उत्पादन होता है। मक्के के बुवाई रकबे पर करीबी नजर रखने वाले ट्रेडरों का कहना है, 'अगर केंद ने एमएसपी में फिर इजाफा किया तो उसकी खरीदारी में कमी आ सकती है। मक्के के एमएसपी में पिछली बार जो बढ़ोतरी हुई थी उससे यह महंगा हो गया और खरीदारों पर बुरा असर पड़ा। हम उम्मीद करते हैं कि एमएसपी में बेवजह इजाफा नहीं किया जाएगा।' गौरतलब है कि मक्के उत्पादन की आधी खपत मुर्गा मुर्गीपालन में होती है। लगभग 30 से 35 फीसदी हिस्सा स्टार्च बनाने वाली कंपनियां खरीदती हैं। बाकी मक्के का इस्तेमाल खाने-पीने का सामान तैयार करने वगैरह में किया जाता है। (ET Hindi)
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