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10 अगस्त 2009

थाली में कम हो गए दाल के दाने

दालों की आसमान छूती कीमतों ने लोगों को दाल कम खाने पर मजबूर कर दिया है।उद्योग मंडल एसोचैम के एक अध्ययन में कहा गया कि 1960 के दशक में दाल की प्रति व्यक्ति खपत 27 किलोग्राम सालाना थी। यह जनवरी-जून 2009 की अवधि में घटकर 11 किलो से भी कम हो गई है।एसोचैम ने कहा दाल की बढ़ती कीमत ने आम परिवारों को दाल कम खाने पर मजूबर कर दिया है। इस साल की पहली छमाही में दाल की खपत घटकर 11 किलो प्रति व्यक्ति से भी कम हो गई है।अध्ययन में कहा गया कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में दाल के उत्पादन पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।एसोचैम ने कहा इसका नतीजा है कि दाल का उत्पादन गिर गया और अब कीमतों में बढ़ोतरी के कारण दाल आम आदमी की थाली से लगभग गायब हो गई है।राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन 2008 में 5,000 करोड़ रुपए के शुरुआती कोष के साथ शुरू किया गया था, ताकि 2011-12 तक गेहूँ के उत्पादन में 80 लाख टन, चावल में एक करोड़ टन और दाल के उत्पादन में 20 लाख टन की बढ़ोतरी की जा सके। एसोचैम ने कहा कि 1967 में हरित क्रांति शुरू होने से लेकर अब तक दाल का उत्पादन सबसे कम सिर्फ 1.14 फीसद बढ़ा है।उद्योग मंडल के महासचिव डीएस रावत ने कहा इधर गेहूँ, चावल, तिलहन और मक्के के उत्पादन में क्रमश: 2.8 फीसद, 2.3 फीसद, 1.88 फीसद और 1.7 फीसद सीएजीआर की वृद्धि दर्ज हुई थी।क्षेत्रफल के विस्तार के अभाव और उत्पादन में बहुत कम बढ़ोतरी के कारण दालों का उत्पादन पिछले पाँच दशकों में सिर्फ 0.8 फीसद बढ़ा है।एसोचैम ने कहा कि देश की दाल की माँग में बढ़ोतरी के कारण आयात में बढ़ोतरी हुई। विडंबना ही है कि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश अपनी उत्पादन योजना में भारत की माँग को ध्यान में रखते हैं तथा वे भारत की स्थिति का फायदा उठाने में कामयाब रहे हैं। (Webdunia)

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