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08 अगस्त 2009

वास्तविक लगने लगा है सूखा, 65 फीसदी कम रहा मॉनसून

इस साल मॉनसून सुखद खबरें नहीं दे रहा है। वास्तव में 5 अगस्त को समाप्त हफ्ते में इसमें पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 65 फीसदी तक की कमी रही है। कुछ सप्ताह पहले सूखा पड़ने का जो भय सता रहा था, अब वह कई राज्यों में वास्तविक लगने लगा है। इस समस्या की गहराई पर सबकी नजर है और कई शोध संस्थानों ने देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर का अनुमान पहले से घटा दिया है। कई राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं और समस्या की थाह लेने की दिशा में वह सक्रिय हो गई है। उत्तर प्रदेश और असम जैसे राज्य अपने तमाम इलाकों को पहले ही सूखा ग्रस्त घोषित कर चुके हैं और आगे इस श्रेणी में दूसरे कई राज्य शामिल हो सकते हैं। इस बात को लेकर सरकार भी चिंतित है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने शुक्रवार को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान कहा, 'अर्थव्यवस्था में सुधार शुरू हो चुके हैं, लेकिन मैं इस बात को लेकर सुनिश्चित नहीं हूं क्योंकि मॉनसून खराब होने के कारण दूसरी समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं।'
सितंबर 2008 से जून 2009 के बीच कर्ज वितरण की सुस्त रफ्तार से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा, 'कृषि मंत्री शरद पवार इसका मूल्यांकन करने में लगे हैं। हम भी मूल्यांकन कर रहे हैं, लेकिन यह ऐसी समस्या है जो वास्तविकता बन चुकी है। हम इसे सुलझाने जा रहे हैं।' इस महीने के पहले सप्ताह में देशभर में मॉनसून की स्थिति देखें तो बारिश 23.5 मिलीमीटर रही जो 65.9 फीसदी के औसत के मुकाबले काफी कम है। इसमें 65 फीसदी की कमी है। खास बात है कि जुलाई के पहले सप्ताह से लेकर तीसरे सप्ताह तक स्थितियां बेहतर नजर आ रही थीं। 5 अगस्त को समाप्त सप्ताह में बरसात ने स्थिति को बिगाड़ दिया है। 1 जून से 5 अगस्त के बीच 25 फीसदी की कमी रही है। अगर अगले दो महीने में तेज बरसात होती भी है तो इस अंतर को भर पाना मुश्किल होगा। गोल्डमैन सैक्स के अनुसार अगर मानसून में 15-18 फीसदी की कमी आती है तो मौजूदा वित्त वर्ष में कृषि विकास दर में दो फीसदी की गिरावट आ सकती है। इसी तरह सिटी इंडिया की अर्थशास्त्री रोहिणी मलकानी ने वित्त वर्ष 2010 के लिए जीडीपी वृद्धि दर को बदलकर 5.8 फीसदी कर दिया है। (ET Hindi)

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