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09 दिसंबर 2009

जलवायु परिवर्तन के असर से आ रही है गेहूं उत्पादन में कमी

नई दिल्ली December 08, 2009
पंजाब में प्रति हेक्टेयर गेहूं की उपज में कई सालों से कोई बढ़ोतरी नहीं हो पायी है। वर्ष 2000 के बाद पंजाब में गेहूं की उत्पादकता में गिरावट आई।
और उसके बाद यह कभी वर्ष 2000 के स्तर पर नहीं पहुंच पाई। पंजाब के कृषि वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का असर मान रहे हैं। पंजाब में इन दिनों गेहूं की बुआई जोरों पर हैं और इस साल भी पिछले साल की तरह 35 लाख हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की बुआई होने की उम्मीद है।
हालांकि कम बारिश के बावजूद सिंचाई की सुविधा के कारण पंजाब में इस साल धान के उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले कोई कमी नहीं आई है। पंजाब के कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक वर्ष 2000 में यहां गेहूं की प्रति हेक्टेयर पैदावार 47 क्विंटल थी। लेकिन उसके बाद से यह उत्पादकता घटती गई। और पिछले तीन-चार सालों से यह 45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास बनी हुई है।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के शिक्षक एमएस सिध्दू कहते हैं, 'समय से पहले तापमान में बढ़ोतरी होने से गेहूं सही तरीके से परिपक्व नहीं हो पाता है और इससे इसके वजन में कमी आ जाती है।' गेहूं किसान कहते हैं फरवरी में ही तापमान अप्रैल के मुताबिक हो जाता है इससे गेहूं की कटाई पहले हो जाती है।
फरवरी-मार्च में ठंड रहने से गेहूं का विकास काफी अच्छा होता है और तभी उपज में बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि देश की प्रति हेक्टेयर गेहूं उपज मात्र 28 क्विंटल है और इस लिहाज से पंजाब काफी आगे हैं। पंजाब के किसानों के मुताबिक आगामी 15 दिसंबर तक प्रदेश में गेहूं की बुआई समाप्त हो जाएगी। जिन इलाकों में कपास की खेती की गई थी वहां देर से बुआई का काम शुरू किया गया।
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक खरीफ के दौरान मानसून के धोखे का असर धान के उत्पादन पर नहीं रहा। क्योंकि पंजाब में 95 फीसदी खेती योग्य जमीन सिंचाई सुविधा से संपन्न है। पिछले साल पंजाब में धान का उत्पादन 164 लाख टन था और इस साल धान उत्पादन पिछले साल के मुकाबले थोड़ा अधिक रहने का अनुमान है। (बीएस हिन्दी)

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