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14 नवंबर 2009

सरकारी लालच में बंधक किसान और चीनी उद्योग

गन्ना मूल्य विवाद का जिन्न एक बार फिर बोतल के बाहर आ गया है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछले कई दशकों से हर तीसरे चौथे साल यह विवाद सामने आ जाता है। लेकिन सरकार अभी तक इस मुद्दे का कोई स्थायी हल नहीं खोज सकी है। 21 अक्तूबर को जारी एक अध्यादेश के जरिये लागू की गई गन्ने की फेयर एंड रिम्यूनेरेटिव प्राइस (एफआरपी) व्यवस्था को इसके हल के रूप में पेश किया गया, लेकिन इसके सामने आते ही जैसे विवादों का पिटारा खुल गया। मौजूदा स्वरूप में इस अध्यादेश को संसद में कानून की शक्ल देना लगभग असंभव दिख रहा है। बिजनेस भास्कर ने पिछले सप्ताह गन्ना मूल्य विवाद और चीनी उद्योग से जुड़े विभिन्न पहलुओं की परत दर परत पड़ताल करने के लिए एक श्रंखला शुरू थी। आज इसकी अंतिम किस्त को इस विवाद के स्थायी समाधान पर फोकस किया गया है।
चीनी उद्योग अकेला ऐसा उद्योग है जो आर्थिक उदारीकरण के फायदों से अछूता रहने के मामले में किसान की बराबरी पर ही खड़ा है। सरकार ने हर कदम पर चीनी उद्योग और किसान को कानूनी जाल में जकड़ रखा है। इसके पीछे जहां राजनीतिक लाभ उठाने की मंशा रही है वहीं सरकार का राशन में सस्ती चीनी बांटने का लालच भी बड़ा कारण है।
एफआरपी का ताजा फामरूला भी राशन में गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के लोगों के लिए मिलों से ली जाने वाली लेवी चीनी से ही पैदा हुआ है। वर्ष 2008 में सुप्रीम कोर्ट ने चीनी मिलों की याचिका पर फैसला देते हुए कहा कि चीनी मिलों द्वारा गन्ना खरीदने के लिए जो वास्तविक कीमत दी जा रही है उसी के आधार पर सरकार लेवी चीनी का मूल्य दे। अभी तक केंद्र सरकार न्यूनतम वैधानिक मूल्य (एसएमपी) पर लेवी चीनी की कीमत देती रही है। वहीं देश के उत्तरी राज्यों में मिलें गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) देती हैं। पिछले साल एसएमपी 81.18 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि एसएपी 140 रुपये से 170 रुपये प्रति क्विंटल था।
एसएपी के खिलाफ चीनी मिलों ने 1996 में कानूनी लड़ाई शुरू की थी लेकिन मई, 2004 में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने राज्यों के एसएपी तय करने के अधिकार को वैधता दे दी थी। आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन कर केंद्र ने एफआरपी की व्यवस्था लागू की। जिसे चालू साल के लिए 9.5 फीसदी चीनी रिकवरी पर 129.84 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। साथ ही राज्यों को इससे ज्यादा एसएपी तय करने पर भुगतान का जिम्मेदार बनाने के लिए शुगरकेन कंट्रोल आर्डर, 1966 में संशोधन कर दिया गया है। जाहिर है कि इसके बाद विवाद पैदा होना ही था। वह भी तब जब चीनी की 40 रुपये किलो की ऊंची कीमत के चलते मिलों को 200 रुपये के गन्ना मूल्य पर भी मुनाफा मिल रहा हो।
इस सारे बखेड़े के बावजूद केंद्र सरकार को करीब 1500 करोड़ रुपये की ही बचत होगी। जो सरकार 60,000 करोड़ रुपये से अधिक की खाद्य सब्सिडी दे रही हो उसके लिए बेहतर होगा कि वह बाजार मूल्य पर ही चीनी की खरीद करे और उपभोक्ताओं के नाम पर उद्योग की नकेल कसना बंद करे। यही नहीं, एसएपी को खत्म करने के लिए केंद्र ने जो तरीका अपनाया वह देश के संघीय ढांचे के खिलाफ था। यह कदम उठाने से पहले किसी भी राज्य से चर्चा तक नहीं की गई। एफआरपी की जो व्यवस्था लागू की गई है उसे भी उचित नहीं कहा जा सकता है। देश के अधिकांश हिस्सों में चीनी मिलों के लिए गन्ना क्षेत्र आरक्षित किये जाते हैं। इसके लिए राज्य सरकारें रिजर्वेशन आर्डर जारी करती हैं। यानी किसानों को अपना गन्ना बेचने की आजादी ही नहीं है। यानी वह पूरी तरह से चीनी मिलों के रहमोकरम पर हैं। ऊपर से दाम को लेकर होने वाला झंझट उसे इस फसल से दूर कर सकता है। लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल किसान पर प्रतिबंध है।
चीनी मिलों को उत्पादन का 20 फीसदी लेवी में देना होता है। उनके लिए हर माह खुले बाजार का कोटा तय किया जाता है। चीनी निर्यात पर अक्सर प्रतिबंध रहता है। उसके अलावा दो चीनी मिलों के बीच की न्यूनतम दूरी जैसी दूसरी तमाम पाबंदियां मिलों पर भी लागू हैं। बेहतर होगा चीनी की कीमत और गन्ना मूल्य के बीच एक फामरूला तय कर उन दोनो पक्षों को खुद दाम तय करने का अधिकार दे दिया जाए। साथ ही चीनी मिलों को भी समझना होगा कि गन्ना केवल अब चीनी उत्पादन के लिए कच्चा माल नहीं है बल्कि यह एक एनर्जी क्राप है। चीनी मिलों को इसके चलते कार्बन क्रेडिट, बिजली उत्पादन और एथनॉल जैसे उत्पादों के रास्ते अतिरिक्त आय के स्रोत मिले हैं। मिलों को भी इस अतिरिक्त आय का बंटवारा किसान के साथ करने के लिए व्यवहारिक रवैया अपनाना चाहिए। (बिज़नस भास्कर)

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