नई दिल्ली [सुरेंद्र प्रसाद सिंह,]। गन्ने की आग बुझाने में केंद्र सरकार के हाथ जल जाने का भी खतरा है। इसीलिए कोई फैसला लेने में उसे देरी हो रही है। चीनी मिलों के दबाव में जहां वह गुड़ बनाने वालों पर नियंत्रण लगाने की सोच रही है, वहीं गन्ना किसानों की नाराजगी मोल लेने से भी डरी हुई है। इसी असमंजस के चलते उत्तार प्रदेश की गिनी-चुनी मिलों में ही पेराई शुरू हो पाई है।
खाद्य मंत्रालय में गन्ना नियंत्रण आदेश में संशोधन पर गंभीरता से विचार चल रहा है। हाल के जारी अध्यादेश, गन्ना [नियंत्रण] संशोधन 2009 में फिलहाल इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। माना जा रहा है कि संसद में पेश करने से पहले तैयार होने वाले संशोधन विधेयक में इस प्रावधान को शामिल किया जा सकता है। ऐसा हो जाने पर कोल्हुओं का संचालन संभव नहीं होगा, जबकि चीनी मिलों के मुकाबले गुड़ व खांडसारी वाले गन्ने का अधिक मूल्य देते हैं। चीनी उद्योग से जुड़े संगठन गन्ना मूल्य के निर्धारण और गुड़-खांडसारी उद्योग पर पाबंदी को लेकर पवार से पिछले एक सप्ताह से बैठक कर रहे हैं।
उत्तार प्रदेश की ज्यादातर चीनी मिलों में पेराई चालू न होने से गन्ना किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। गन्ना खेत खाली कर गेहूं की बुवाई करने की तैयारी में जुटे किसानों की मंशा पर पानी फिर रहा है। केंद्र की गन्ने की नई मूल्य प्रणाली [एफआरपी] और राज्य सरकार द्वारा घोषित कम समर्थन मूल्य [एसएपी] को लेकर प्रदेश के किसान पहले से ही आंदोलन कर रहे हैं। एफआरपी के तहत वर्ष 2009-10 के पेराई सत्र के लिए 129 रुपये प्रति क्विंटल गन्ना मूल्य घोषित किया गया है।
उधर, दूसरी ओर केंद्र सरकार ने गन्ने की अच्छी कीमत देने और पेराई चालू करने के लिए चीनी मिलों पर दबाव भी बनाया है। केंद्रीय कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार ने इसी सप्ताह मिल मालिकों की एक बैठक में उन्हें गन्ने का मूल्य कम से कम 180 से 200 रुपये प्रति क्विंटल देने को कहा है। मिल मालिकों ने उनके प्रस्ताव पर विचार करने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा था। इसके साथ ही उन्होंने एक शर्त भी सामने रख दी, जिसके मुताबिक राज्य में गन्ने की एक बड़ा हिस्सा गुड़ व खाडसारी बनाने वाले कोल्हुओं के पास जा रहा है, उस पर रोक लगाई जाए। यह प्रावधान पहले था, लेकिन इसे वर्ष 2007 में हटा दिया गया।
राज्य में कम खेती के चलते इस बार चीनी मिलों के समक्ष गन्ने की खासी किल्लत है। जबकि अच्छा मूल्य मिलने पर किसान अपना गन्ना गुड़ बनाने वालों को बेच रहे हैं। इससे मिलों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। यही वजह है कि चीनी उद्योग केंद्र पर दबाव बनाकर कोल्हुओं पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहा है। राज्य सरकार को भी इस बारे में पत्र लिखा है। स्थानीय स्तर पर कुछ जिलों में कोल्हू पर रोक जरूर लगी है, लेकिन पूरे राज्य में फिलहाल इन पर कोई पाबंदी नहीं है। (दैनिक जागरण)
14 नवंबर 2009
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