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09 फ़रवरी 2009

बैंकों का पैसा नहीं पहुंच रहा है छोटे किसानों तक

कई लोगों को शायद यह आश्चर्य होगा पर यह वास्तविकता है। हमारे यहां कागजों में लगातार संस्थागत कर्ज में बढ़ोतरी हो रही है, पर वास्तविकता इसके उलट है। साल दर साल छोटे और सीमांत किसानों के लिए कर्ज की उपलब्धता में लगातार कमी आ रही है। इससे गांवों के साहूकारों पर उनकी निर्भरता बढ़ती जा रही है। जहां पर किसानों को 30-40 फीसदी सालाना ब्याज पर कर्ज मिलता है। देश के करीब 84 फीसदी किसान परिवार छोटे किसान की श्रेणी में आ गये है। यह सब कैसे हुआ? दरअसल सत्ता में दखल रखने वालों ने अपने स्वार्थ के लिए कानून को मरोड़ते चले गए। कृषि कर्ज की परिभाषा का दायरा बढ़ाया गया, जिसके बाद बैंको को अधिक लाभ देने वाले क्षेत्रों में कर्ज बांटने की अनुमति दे दी गई। बैंक यह दावा करते है कि वे प्राथमिक क्षेत्र में दिए जाने वाले कर्ज का लक्ष्य पूरा कर रहे है। लेकिन वास्तविकता यह है कि नई परिभाषा के बाद छोटे और सीमांत किसान धीरे-धीरे संस्थागत कर्ज के दायरे से बाहर होते गए। यह प्रक्रिया 1990 के दौरान शुरू हुए आर्थिक सुधारों के साथ ही प्रारंभ हो गई थी। प्राथमिक क्षेत्रों की परिभाषा का दायरा बढ़ाए हुए बड़े कजरें को इसमें शामिल कर लिया गया। दूसरे शब्दों में कहें तो बड़े कर्ज लेने वालों के लिए एक रास्ता बना दिया गया। बैंको ने छोटे किसानों को कर्ज देने के मकसद से परिकल्पित प्राथमिकता वाले क्षेत्र का असली उद्देश्य को खत्म कर दिया गया। असंगठित क्षेत्र के लिए गठित नेशनल कमीशन फार एंटरप्राइजेज ने 2007 में अपनी रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया है। अजरुन सेन गुप्ता की अध्यक्षता में गठित इस कमीशन ने रिपोर्ट में कहा है कि कृषि कर्ज के संबंध में बैंकों के लिए रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों में उदासीनता बरती गई है। इसमें छोटे और सीमांत किसानों की तुलना बड़े कर्जदारों से होने लगी।प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को दिए जाने वाले कर्ज में बढ़ोतरी बड़े कर्जदारों की मदद कर रही है जो छोटे किसानों को सीधे नुकसान पहुंचा कर की जा रही है। कंसोर्टियम ऑफ इंडियन फार्मर एसोसिएशन (सीआईएफए) ने इसी तरह की बातें सिचुएशन एसेसमेंट सर्वे- 2003 से भी उजागह होती हैं। इसमें बताया गया है कि पिछले कुछ सालों में सीमांत और छोटे किसानों को दिए जाने वाले कर्ज में कमी आई है। इसके अनुसार ये किसान गांवों के साहुकारों से ज्यादा कर्ज ले रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार गैर संस्थागत स्रोतों से कर्ज लेने वाले लोगों में 57.6 फीसदी किसान ऐसे थे, जिनके पास एक एकड़ से कम जमीन थी। दूसरी ओर इन्हीं स्रोतों से लोने लेने वालों में 33 फीसदी बड़े किसान थे। आर्थिक सुधार की प्रक्रिया के दौरान दिए गए कृषि कर्ज के आकंडे भी छोटे किसानों के साथ होने वाले भेदभाव को बताते है। जब इन सुधारों की शुरूआत हुई, उस समय कुल कृंिष कर्ज का करीब 60 फीसदी हिस्सा छोटे किसानों को दिया गया था जो करीब 25000 करोड़ रुपये था। उसके बाद से लगातार गिरावट आई है। वर्ष 1995 के 52 फीसदी से कम होकर यह 2003 में 23.50 फीसदी पर पहुंच गया। वर्ष 2006 में यह कम होकर 13.30 तक पहुंच गया है।इस तरह से 1990 के बाद से सीमांत और छोटे किसानों को दिए जाने वाले कृषि कर्ज में करीब 75 फीसदी की कमी आई है। इसके बजाय उच्च कर्ज की मांग वाले क्षेत्रों जैसे गृह निर्माण, शिक्षा, परिवहन और प्रोफेशनल्स को मिलने वाला कर्ज को प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में शामिल कर लिया गया है। एक ओर जहां बैकों द्वारा छोटे किसानों को दिए जाने वाले कर्ज में कमी आई है तो दूसरी ओर एक करोड़ रुपये से ज्यादा वाले बडे कर्जदारों को दिए जाने वाले कर्ज में चार गुना की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 1993 तक कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले सीधे कर्ज में प्राथमिकता वाले क्षेत्र का 18 फीसदी दिया जाना आवश्यक था। आगे चलकर धीरे-धीरे अप्रत्यक्ष रूप से दिए जाने वाले कर्ज को भी इसमें शामिल कर लिया गया था। दूसरी ओर 1994 के बाद पांच लाख से एक करोड़ तक के अप्रत्यक्ष कृषि कर्ज जैसे मत्स्य पालन, पॉल्ट्री गतिविधियां, ड्रिप एवं स्प्रिंकल, कृषि उपकरणों के कर्जो को भी कृषि क्षेत्र में शामिल कर दिया गया। इसी के परिणामस्वरुप अप्रत्यक्ष विधि से दिए जाने वाले कुल कजरें का हिस्सा 1999 में 57 फीसदी तक पहुंच गया था।2006 में यह 76 फीसदी तक पहुंच गया है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक होगा कि कृंिष को दिए अप्रत्यक्ष कर्ज में 1990 से 33 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसने बैंको द्वारा कृषि क्षेत्र को दिए जाने वाले कर्ज में भारी बढ़ोतरी कर दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो पिछले दो दशकों से कृषि कर्ज की संरचना में किए गए बदलावों से सीमांत और छोटे किसानों को भारी नुकसान हुआ है। दूसरी ओर सरकार यह बता रही है कि किसानों को बैंको की ओर से सस्ता कर्ज उपलब्ध कराया जा रहा है। कृषि क्षेत्र के आज के हालातों को किसानों द्वारा आत्महत्याओं की घटनाओं से समझा जा सकता है कि बड़ी संख्या में ऐसे किसान है, जिन तक बैकों का कर्ज नहीं पहुंच रहा है। जिसको देखते हुए कहा जा सकता है कि गांवों का संकट आगे भी जारी रहेगा। (Business Bhaskar)

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