15 दिसंबर 2008
विदेशों में जौ की निर्यात मांग हल्की
निर्यात मांग में कमी होने से जौ के भाव में एक सप्ताह के दौरान 50-60 रुपये प्रति क्विंटल तक की गिरावट आई है। भारतीय जौ के भाव दूसरे देशों से अधिक होने और क्वालिटी अच्छी न होने से निर्यात मांग हल्की पड़ गई। वहीं दूसरी ओर बाजरा की तुलना में इसके महंगा होने से पशुचारे के लिए भी इसकी मांग में भी कमी आ गई है।कारोबारियों की मानें तो इस बार मौसम अनुकूल रहने से अच्छी फसल होने की उम्मीद है। दादरी के जौ कारोबारी मुन्नालाल ने बिÊानेस भास्कर को बताया कि विदेशों में मोटे दोने के जौ की माल रहती है जबकि इसकी कमी है। कई अन्य निर्यातक देशों के मुकाबले भी भारतीय जौ महंगा पड़ रहा है। मोटे दाने की मांग माल्ट इंडस्ट्री से होती है। यही वजह है कि निर्यात मांग हल्की पड़ गई है। जिससे इसके भाव में बीते एक सप्ताह के दौरान 50-60 रुपये प्रति क्विंटल तक की गिरावट आई है। उनका कहना कहना है कि इसके अलावा पशुचारे के लिए किसान जौ के बजाय बाजरा की सस्ते होने के कारण ज्यादा खपत हो रही है। इससे पशुचारे के लिए भी जौ की मांग में कमी आई है। बाजार में एक सप्ताह पहले माल्ट में उपयोग होने वाला मोटे दाने का जौ 1000 रुपये से ऊपर बिकने के बाद गिरकर अब 950 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। जबकि पशुचारे में उपयोग होने वाले जौ का भाव 900 से कम होकर 850 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। इस बार अच्छी बारिश होने से जौ की पैदावार अधिक होने की उम्मीद है। गांधीधाम स्थित जौ निर्यातक कंपनी मनीवा क्रिएशन के निदेशक निखिल भट्ट ने बताया कि देश से जौ का निर्यात गल्फ देशों को किया जाता है लेकिन इन देशों को ब्राजील का जौ यहां से कम दाम पर मिल रहा है क्योंकि ब्राजील से शिपिंग में आने वाले वाला खर्चा भारत से कम है। ब्राजील के अलावा कजाकिस्तान का जौ सस्ता होने की वजह से इसकी निर्यात मांग भारतीय जौ से अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2007-08 में 1फ्.3 लाख टन जौ का उत्पादन हुआ था जो वित्त वर्ष 2006-07 के 13.3 लाख टन से कम है। जबकि सरकार ने वित्त वर्ष 2008-09 में 15 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य रखा है। (Business Bhaskar)
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