नई दिल्ली : कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में बढ़ोतरी के सरकारी फैसले के बाद भी आयात बढ़ने के आसार कम ही हैं। समझा जा रहा था कि सरकार के इस फैसले से वर्ष 2009 में विदेशों से आयात होने वाली कपास की मात्रा में बढ़ोतरी होगी, लेकिन वैश्विक पैदावार कम होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कपास की कीमतें ऊंचे स्तर पर बने रहने के आसार हैं। केंद्र सरकार ने वर्ष 2008-09 के लिए स्टैंडर्ड कॉटन लॉन्ग स्टेपल के एमएसपी को बढ़ाकर 3,000 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया है। पिछले साल यह 2,030 रुपए था। इसी तरह से मीडियम स्टेपल कॉटन के एमएसपी को 1,800 रुपए से बढ़ाकर 2,500 रुपए प्रति क्विंटल कर दिया गया है। बहरहाल, वैश्विक पैदावार में कमी आने की आशंका से वैश्विक बाजार में कपास की कीमतों पर भारी दबाव है। घरेलू बाजार की तुलना में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ज्यादा हैं। कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर सुभाष ग्रोवर के मुताबिक, 'जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत ज्यादा होगी तो बड़े पैमाने पर कपास के आयात की संभावना कम ही है।' इंटरनैशनल कॉटन एडवाइजरी कमेटी (आईसीएसी) ने अनुमान लगाया था कि 2008-09 में कपास की अंतरराष्ट्रीय पैदावार में 6 फीसदी की कमी आएगी। आईसीएसी के मुताबिक, दुनिया भर में कपास किसानों की दिलचस्पी दूसरे फसलों में बढ़ी है। इस वजह से दुनिया भर में करीब 2.47 करोड़ टन कपास की पैदावार घटने की आशंका है। एक इंडस्ट्री विश्लेषक ने बताया, 'कपास की पैदावार करने वाले राज्यों में अनुकूल मौसम की वजह से घरेलू पैदावार बढ़ेगी। इससे कीमतों पर सकारात्मक प्रभाव दिखाई पड़ेगा।' ग्रोवर ने बताया, 'अक्टूबर 2008 से शुरू होने वाले सीजन में कपास की पैदावार 3.20 करोड़ बेल्स रहने की संभावना है। सितंबर 2008 को समाप्त हुए साल में 3.15 करोड़ बेल्स कपास की पैदावार हुई है।' भारत में कपास का सीजन अक्टूबर से सितंबर तक होता है। विश्लेषक यह भी कहते हैं, 'फिलहाल, देश में कपास की खपत करीब 2.4 करोड़ बेल्स है। करीब पांच लाख बेल्स कपास का आयात किया जाता है। ऐसे में कपास की पैदावार 3.25 करोड़ बेल्स होने और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में लगातार तेजी बने रहने से आयात प्रभावित होगा।' पिछले कुछ सप्ताहों के दौरान कपास की खेती वाले राज्यों में मानसून अच्छा रहा है। इससे आगामी अगले सीजन में कपास की पैदावार अच्छी रहने की उम्मीद है। (ET Hindi)
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