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20 नवंबर 2025

शुरूआती चरण में चीनी का उत्पादन 48 फीसदी बढ़ा, 325 मिलों में पेराई आरंभ

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2025-26 (अक्टूबर से सितंबर) में अभी तक 10.50 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 7.10 लाख टन की तुलना में 47.88 फीसदी अधिक है।


राष्ट्रीय सहकारी चीनी कारखाना संघ लिमिटेड (एनएफसीएसएफ) के अनुसार देशभर में 325 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 144 मिलों में ही पेराई आरंभ हुई थी।

चालू पेराई सीजन 2025-26 में अभी मिलों ने 128 लाख टन गन्ने की पेराई की है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 91 लाख टन की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान गन्ने में औसत चीनी की रिकवरी दर 8.2 फीसदी आई है जोकि पिछले वर्ष की समान अवधि के 7.80 फीसदी के मुकाबले ज्यादा है।

देश में गन्ने का नया पेराई सीजन पहली अक्टूबर से शुरू होता है लेकिन इस वर्ष, यह देखा गया है कि मानसूनी बारिश अक्टूबर एवं महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में नवंबर तक जारी रही थी। जानकारों के अनुसार मानसून की वापसी में देरी हुई। साथ ही महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के कुछ हिस्सों में हुई बेमौसम भारी बारिश के कारण सोयाबीन, ज्वार, दालें, मक्का, सब्जियों की फसल को नुकसान हुआ। अत: खेतों में खड़े गन्ने का वजन बढ़ने की उम्मीद के बावजूद, गीले खेतों के कारण समय पर कटाई नहीं हो पा रही है। इस स्थिति को देखते हुए, गन्ने के नए पेराई सत्र की शुरुआत में देरी हुई है। इसके अलावा, कर्नाटक और महाराष्ट्र में गन्ना मूल्य आंदोलन ने पूरे भारत में गन्ना पेराई को धीमा कर दिया। जानकारों के अनुसार पिछले गन्ना पेराई सीजन में भी देरी हुई थी, क्योंकि महाराष्ट्र में चुनावों थे। अत: गन्ने की पेराई पिछले सीजन में नवंबर के अंत तक शुरू हो पाई थी।

एनएफसीएसएफ के अनुसार नए पेराई सीजन में देरी से शुरुआत के बावजूद, देशभर में 350 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमान है। प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चालू पेराई सीजन में लगभग 125 लाख टन, उत्तर प्रदेश में 110 लाख टन और कर्नाटक में 70 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमान है। चालू पेराई सीजन में करीब 35 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमानित उपयोग इथेनॉल उत्पादन में होने की उम्मीद है।

देश में चीनी की सालाना खपत करीब 290 लाख टन होने का अनुमान है, जबकि पहली अक्टूबर से शुरू हुए चालू पेराई सीजन के आरंभ में लगभग 50 लाख टन चीनी का बकाया स्टॉक बचा हुआ था। अत: घरेलू बाजार में 20-25 लाख टन चीनी का स्टॉक कुल खपत के मुकाबले ज्यादा है। केंद्र सरकार ने निर्यात के लिए 15 लाख टन चीनी की अनुमति दी है। अत: केंद्र सरकार द्वारा समय पर की गई इस अग्रिम घोषणा से बाजार की धारणा को स्थिर करने में मदद मिलेगी।

जनवरी से अप्रैल 2026 तक के निर्यात अवसर की अवधि केवल 2 महीने दूर है तथा जानकारों को उम्मीद है कि केंद्र सरकार चालू पेराई सीजन के मध्य तक और भी करीब 10 लाख की अनुमति दे सकती है। इससे चीनी मिल मालिकों को आंशिक रूप से राहत मिलेगी, जो पिछले 6 वर्षों से चीनी के न्यूनतम समर्थन मूल्य में संशोधन न होने और पिछले 3 वर्षों से इथेनॉल खरीद मूल्यों के स्थिर रहने के कारण अर्ध-मंदी की स्थिति में हैं।

केंद्र ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी, विश्व बाजार में भाव में हल्का सुधार

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2025-26 (अक्टूबर से सितंबर) के लिए 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी है। अत: भारत सरकार द्वारा उम्मीद से कम कोटे की अनुमति से जहां विश्व बाजार में चीनी की कीमतों में हल्का  सुधार आया, वहीं घरेलू बाजार में इसके दाम स्थिर बनी रहे।


केंद्र सरकार ने पिछले तीन चीनी सत्रों के दौरान चीनी के औसत उत्पादन को ध्यान में रखते हुए चालू पेराई सीजन में चीनी मिलों के बीच आनुपातिक आधार पर 15 लाख टन का निर्यात कोटा आवंटित किया गया है।

चीनी मिल, रिफाइनरी एवं निर्यातक द्वारा उल्लिखित मात्रा तक सभी ग्रेड की चीनी का निर्यात किया जा सकता है। पिछले तीन चीनी पेराई सत्रों में से कम से कम एक चीनी सत्र में संचालित होने वाली चीनी मिलों के बीच 15 लाख टन का निर्यात कोटा आनुपातिक आधार पर निर्धारित किया गया है, जिसमें पिछले तीन चालू चीनी पेराई सत्र पेराई सीजन 2022-23 एवं पेराई सीजन 2023-24 के अलावा पेराई सीजन 2024-25 के दौरान उनके औसत चीनी उत्पादन को ध्यान में रखा गया है। सभी चीनी मिलों को उनके तीन वर्षों के औसत चीनी उत्पादन का 5.286 फीसदी निर्यात कोटा आवंटित किया गया है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को लिखे पत्र में खाद्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कहा कि चालू पेराई सीजन के लिए केंद्र सरकार ने 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति देने का निर्णय लिया है और शीरे पर 50 फीसदी निर्यात शुल्क को हटा दिया गया है।

घरेलू बाजार में शनिवार को चीनी की थोक कीमत स्थिर बनी रही। दिल्ली में एम 30 ग्रेड चीनी के दाम 4,320 रुपये और मुंबई में 4,120 रुपये तथा कोलकाता में 4,400 रुपये तथा हैदराबाद में 4,180 रुपये और कानपुर में 4,280 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे।

चालू सप्ताह के अंत में शुक्रवार को आईसीई शुगर वायदा में तेजी देखने को मिली थी, क्योंकि भारत द्वारा अपेक्षा से कम निर्यात कोटा तय किए जाने और ब्राजील में शुगर मिक्स घटने से ग्लोबल सप्लाई आउटलुक से कीमतों को सहारा मिला। इसके साथ ही क्रूड ऑयल में मजबूती ने भी मार्केट सेंटीमेंट सुधारने में योगदान दिया।

चालू सप्ताह के अंत में मार्च आईसीई रॉ शुगर वायदा बढ़कर 14.96 सेंट प्रति पाउंड पर बंद हुआ था, जो 3 हफ्तों का ऊपरी स्तर है। दिसंबर लंदन व्हाइट शुगर भी इस दौरान बढ़कर 431.60 डॉलर प्रति टन पर बंद हुआ। रॉ–व्हाइट शुगर प्रीमियम में हल्की मजबूती देखी गई क्योंकि रिफाइंड शुगर की कीमतों में अधिक तेजी रही।

भारत के खाद्य मंत्रालय पेराई सीजन 2025–26 के लिए केवल 15 लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति दी है, जबकि बाजार 20 लाख टन की उम्मीद कर रहा था। कम कोटा से विश्व बाजार में भारत की सप्लाई सीमित रहने की संभावना है।

ब्राजील की मिलों ने अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में सिर्फ 46 फीसदी गन्ना शुगर प्रोडक्शन के लिए इस्तेमाल किया। अत: अधिक गन्ना एथेनॉल की ओर शिफ्ट होने से शुगर आउटपुट घटा, जिससे बाजार हल्का सपोर्ट मिला है।

एशियाई पाम तेल गठबंधन का लक्ष्य क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाना - अतुल चतुर्वेदी

बाली, इंडोनेशिया 14 नवंबर 2025। एशियाई पाम तेल गठबंधन (एपीओए) के अध्यक्ष अतुल चतुर्वेदी ने 21वें इंडोनेशियाई पाम तेल सम्मेलन और 2026 मूल्य परिदृश्य (आईपीओसी 2025) के अवसर पर बोलते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि “एपीओए पाम उत्पादक और पाम उपभोक्ता देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने के लिए है।”


उन्होंने कहा कि इसका गठन मुख्यतः क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ाने के साथ ही मिथकों को तोड़ने और पाम के सतत विकास को समर्थन देने के लिए किया गया है। आईपीओसी 2025 पाम तेल उद्योग के लिए एक प्रमुख वार्षिक वैश्विक मंच है, जिसने 12-14 नवंबर को इंडोनेशिया के बाली में आयोजित अपने दो दिवसीय प्रमुख कार्यक्रम में इस क्षेत्र के शीर्षस्थ लोगों को एक साथ लाया।

उद्योग के नेताओं, नीति निर्माताओं, व्यापारियों और नवप्रवर्तकों की इस प्रतिष्ठित सभा को संबोधित करते हुए और भारत के पाम तेल नीति संतुलन अधिनियम' पर जानकारी देते हुए, अतुल चतुर्वेदी ने एपीओए और सीपीओपीसी (पाम ऑयल उत्पादक देशों की परिषद) के बीच हाल ही में हस्ताक्षरित अत्यंत महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन का उल्लेख किया, जिससे सकारात्मक जनधारणा को बढ़ावा मिलने और पाम तेल से जुड़ी भ्रामक सोशल मीडिया की खबरों का समाधान होने की उम्मीद है। इस समझौता ज्ञापन पर इस वर्ष सितंबर में मुंबई में आयोजित सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए की 54वीं वार्षिक आम बैठक में हस्ताक्षर किए गए थे।

आयात के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि भारत के खाद्य तेल के आयात में पाम ऑयल की हिस्सेदारी लगभग 50 फीसदी है। आयात में भारत का हिस्सा सोया तेल (29 फीसदी) और सूरजमुखी तेल (21 फीसदी) से यह ज्यादा है। हालाँकि, सॉफ्ट ऑयल की बढ़ती मांग के कारण इसकी हिस्सेदारी 60 फीसदी से घटकर अब 50 फीसदी रह गई है।

भविष्य के बारे में उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे जीडीपी बढ़ेगी, निम्न और मध्यम आय वर्ग की क्रय शक्ति मजबूत होने की उम्मीद है, जिससे मांग में और तेजी आएगी। वर्तमान में, भारत में खाद्य तेल की खपत लगातार बढ़ रही है, हालांकि विभिन्न क्षेत्रों में खपत में काफी भिन्नता है क्योंकि समृद्ध क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति 25 किलोग्राम से अधिक खपत होती है जबकि गरीब क्षेत्रों में 10 किलोग्राम से कम खपत होती है, हालांकि औसत खपत लगभग 17.5 से 18.0 किलोग्राम प्रति व्यक्ति है।

पाम तेल के आयात में थाईलैंड प्रमुख रूप में उभरा है, जो कि भारत में पाम तेल के आयात में 10 फीसदी का योगदान देता है और लगातार बाजार में बढ़त बना रहा है, जबकि इंडोनेशिया, जो लगभग 48 फीसदी आयात करता है, की हिस्सेदारी में कमी आ रही है। मलेशिया से 30 फीसदी से बढ़कर 37 फीसदी की हो गई है जोकि मजबूत वृद्धि के संकेत हैं। आईपीओसी 2025 14 नवंबर को समाप्त हो गया है।

पाम ऑयल कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन 6 दिसंबर 2025 को भोपाल होना है। यह कॉन्क्लेव एशियन पाम ऑयल अलायंस (एपीओए) के बैनर तले सॉलिडारिडाड रीजनल एक्सपर्टिस सेंटर (एसआरईसी) और दा सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। पाम ऑयल संवादों के माध्यम से धारणाओं को नया आकार देना जैसा कि स्वास्थ्य, बाजार, जलवायु विषय पर आधारित यह कॉन्क्लेव नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों को एक साथ लाएगा ताकि भारत के खाद्य तेल पारिस्थिति की तंत्र में पाम तेल की उभरती भूमिका पर सार्थक संवाद को बढ़ावा दिया जा सके।

अक्टूबर में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 9 फीसदी घटा - एसईए

नई दिल्ली। अक्टूबर 2025 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 9 फीसदी घटकर 1,332,173 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल अक्टूबर में इनका आयात 1,459,814 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,327,548 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 4,625 टन का हुआ है।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार तेल वर्ष 2024 से 2025 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 1 फीसदी बढ़कर 163.6 लाख टन का हुआ है, जबकि इसके पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 162.3 लाख टन का हुआ था।

आपूर्ति और मांग के बीच के अंतर को पाटने के लिए भारत ने 1990 के दशक से खाद्य तेलों के आयात का सहारा लिया था। शुरुआती दौर में, आयात की मात्रा बहुत कम थी। हालांकि, पिछले 20 वर्षों (2004-05 से 2024-25) में आयात की मात्रा 2.2 गुना बढ़ गई है, जबकि आयात की लागत लगभग 15 गुना बढ़ गई है। तेल वर्ष 2024-25 में भारत को 160 लाख टन (16.0 मिलियन टन) खाद्य तेलों के आयात पर लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये (18.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर) खर्च करने होंगे।

साफ्टा समझौते के तहत नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के दौरान नेपाल से भारत में शून्य शुल्क पर 7.5 लाख टन आयात हुआ है।

1 नवंबर, 2025 तक विभिन्न बंदरगाहों पर खाद्य तेलों का स्टॉक 1,003,000 टन (सीपीओ और सीपीकेओ 560,000 टन, आरबीडी पामोलिन 10,000 टन, डिगम्ड सोयाबीन तेल 270,000 टन, क्रूड सूरजमुखी तेल 160,000 टन और रेपसीड तेल 3,000 टन) अनुमानित है। घरेलू उत्पादन और खपत को ध्यान में रखते हुए पाइपलाइन स्टॉक 728,000 टन का है। 1 नवंबर, 2025 तक कुल स्टॉक 1,731,000 टन होने का अनुमान है, जबकि 1 अक्टूबर, 2025 तक कुल स्टॉक 1,985,000 टन था, जो अक्टूबर 2025 में आयात में आई कमी के कारण 254,000 टन कम हुआ है।

भारत सरकार ने 31 मई, 2025 से प्रभावित क्रूड और रिफाइंड तेलों के बीच शुल्क अंतर को 8.25 फीसदी से बढ़ाकर 19.25 फीसदी कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप रिफाइंड पाम तेल का आयात बंद हो गया। हालांकि साफ्टा समझौते के तहत शून्य शुल्क पर नेपाल से भारत को बड़ी मात्रा में रिफाइंड सोयाबीन और सूरजमुखी तेल का आयात हुआ। नवंबर 24-अक्टूबर 25 के दौरान 1,931,254 टन की तुलना में 1,737,228 टन रिफाइंड तेलों का आयात किया गया और नवंबर 23-अक्टूबर 24 में 14,031,317 टन की तुलना में 14,273,520 टन क्रूड तेल का आयात किया गया। आरबीडी पामोलीन के कम आयात के कारण रिफाइंड तेल के आयात का अनुपात 12 फीसदी से मामूली रूप से घटकर 11 फीसदी रह गया।

सोया तेल के आयात ने 2024-25 (नवंबर-अक्टूबर) के दौरान 54.7 लाख टन का नया रिकॉर्ड बनाया है, जिसने 2015-16 में 42.3 लाख टन के पिछले उच्च आयात को तोड़ दिया। नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के दौरान, पाम तेल का आयात नवंबर 2023 से अक्टूबर 2024 के 9,015,574 टन से घटकर 7,582,742 टन रह गया। जबकि सोया तेल के आयात में तीव्र वृद्धि के कारण सॉफ्ट तेलों का आयात पिछले वर्ष की इसी अवधि के 6,946,996 टन से बढ़कर 8,428,006 टन का हो गया। इस दौरान पाम तेल की हिस्सेदारी 56 फीसदी से घटकर 47 फीसदी रह गई, जबकि सॉफ्ट ऑयल की हिस्सेदारी 44 फीसदी से बढ़कर 53 फीसदी की हो गई।

सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में आयातित खाद्य तेलों के दाम भारतीय बंदरगाह पर कमजोर हुए हैं। अक्टूबर में आरबीडी पामोलिन का भाव भारतीय बंदरगाह पर घटकर 1,106 डॉलर प्रति टन रह गया, जबकि सितंबर में इसका भाव 1,119 डॉलर प्रति था। इसी तरह से क्रूड पाम तेल का भाव भारतीय बंदरगाह पर अक्टूबर में घटकर 1,148 डॉलर प्रति टन रह गया, जबकि सितंबर में इसका भाव 1,164 डॉलर प्रति टन था। क्रूड सोया तेल का भाव अक्टूबर में भारतीय बंदरगाह पर 1,181 डॉलर प्रति टन रह गया, जोकि सितंबर में इसका भाव 1,182 डॉलर प्रति टन था।

चालू रबी में सरसों एवं चना के साथ ही गेहूं की बुआई आगे, धान की रोपाई पिछड़ी

नई दिल्ली। चालू रबी सीजन के शुरुआती चरण में सरसों एवं चना के साथ ही गेहूं की बुआई आगे चल रही है, जबकि धान की रोपाई पिछड़ी है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 31 अक्टूबर तक देशभर में रबी फसलों की कुल बुआई 75.77 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में केवल 65.88 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हुई थी।

गेहूं की बुआई बढ़कर 3.34 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 2.28 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

चालू रबी में दलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 20.77 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 16.50 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुआई चालू रबी सीजन में बढ़कर 14.92 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इस समय तक 12.15 लाख हेक्टेयर में ही इसकी बुआई हुई थी। अन्य रबी दलहन में मसूर की बुआई बढ़कर 2.56 लाख हेक्टेयर में तथा मटर की 2.16 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 1.89 लाख हेक्टेयर और 1.74 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

चालू रबी सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई देशभर में बढ़कर 42.33 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 37.42 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी। तिलहनी फसलों में सरसों की बुआई बढ़कर 41.69 लाख हेक्टेयर में हो चुकी जबकि पिछले साल इस समय तक 36.73 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी।

चालू रबी सीजन में राज्य में धान की रोपाई घटकर 3.71 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 4.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू रबी में बढ़कर 5.62 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 5.17 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मोटे अनाजों में ज्वार की 2.70 लाख हेक्टेयर और मक्का की 2.10 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 2.78 और 2.17 लाख हेक्टेयर में हुई थी। 

फसल बीमा क्लेम में किसानों की शिकायतों पर केंद्र सरकार सख्त - शिवराज सिंह चौहान

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) के तहत किसानों को नाममात्र की क्लेम राशि मिलने की शिकायतों पर केंद्र सरकार हरकत में आ गई है। केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सोमवार को दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठक बुलाई और अधिकारियों और बीमा कंपनियों को सख्त निर्देश दिए कि किसानों के साथ किसी भी तरह का अन्याय या मजाक बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 1 रुपया, तीन रुपया या फिर 21 रुपये का क्लेम मिलना किसानों के साथ मजाक है, इसे किसी भी हालत में जारी नहीं रहने दिया जाएगा।


बैठक में शिवराज सिंह ने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई किसानों को वर्चुअली जोड़ा और उनसे सीधे उनकी समस्याएं सुनी। मंत्री ने सीहोर जिले के किसानों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन किसानों ने पूरी प्रीमियम राशि देकर फसल बीमा कराया है, उन्हें फसल में नुकसान होने के बावजूद ‘जीरो लॉस’ दिखाया गया या फिर 1 रुपये का क्लेम दिया गया। उन्होंने अधिकारियों से पूछा कि क्या यह किसानों के साथ अन्याय नहीं है? यह कौन-सा तरीका है नुकसान का आकलन करने का?

शिवराज सिंह ने बताया कि उन्हें सीहोर जिले के दौरे के दौरान कई किसानों ने यह शिकायत की थी कि उन्हें बीमा के नाम पर नाममात्र की राशि दी गई। इसी तरह से महाराष्ट्र के अकोला जिले के किसानों ने भी शिकायत की थी कि उन्हें 5 रुपये या 21 रुपये जैसी राशि क्लेम के तौर पर मिली है। इस पर मंत्री ने बीमा कंपनियों से जवाब तलब करते हुए कहा कि फसल बीमा योजना किसानों के लिए मोदी सरकार का सुरक्षा कवच है, इसे मजाक बनने नहीं देंगे।

कृषि मंत्री ने बैठक में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के सीईओ एवं कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, और सभी बीमा कंपनियों के उच्चाधिकारियों को तलब किया। उन्होंने साफ निर्देश दिए कि किसानों को क्लेम राशि जल्द और एकमुश्त मिले तथा नुकसान का आकलन पारदर्शी और वैज्ञानिक प्रणाली से किया जाए।

उन्होंने कहा कि रिमोट सेंसिंग तकनीक से नुकसान के आकलन की प्रमाणिकता की जांच कराई जाएगी और आवश्यक होने पर योजना के प्रावधानों में संशोधन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि किसानों को क्लेम में देरी नहीं होनी चाहिए और बीमा कंपनियों के प्रतिनिधि नुकसान के सर्वे के समय अनिवार्य रूप से मौजूद रहें।

बैठक में यह भी बात भी सामने आई कि कुछ राज्य सरकारें अपने हिस्से की सब्सिडी राशि समय पर जमा नहीं करा रही हैं, जिससे क्लेम भुगतान में देरी हो रही है। इस पर शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जो राज्य ऐसा कर रहे हैं, उनसे 12 फीसदी ब्याज वसूला जाएगा। उन्होंने कहा कि राज्यों की लापरवाही से केंद्र सरकार बदनाम नहीं होगी तथा किसानों का हक उन्हें समय पर मिलना चाहिए।

शिवराज सिंह ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के सीईओ को आदेश दिया कि जिन किसानों को 1, 2 या 5 रुपये जैसे क्लेम मिले हैं उन सभी मामलों की फील्ड में जांच की जाए तथा जांच में स्थानीय कलेक्टर और बीमित किसानों की बात भी सुनी जाए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

उन्होंने यह भी कहा कि किसानों को टेक्नोलॉजी से जोड़ा जाए, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और कोई गड़बड़ी न हो। मंत्री ने जोर देते हुए कहा कि हम किसानों को परेशान नहीं होने देंगे क्योंकि फसल बीमा योजना उनकी सुरक्षा के लिए बनी है, किसी के शोषण का माध्यम नहीं।

बैठक के अंत में शिवराज सिंह चौहान ने महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों और बीमा कंपनियों से सुझाव मांगे है ताकि योजना को और प्रभावी बनाया जा सके। उन्होंने कहा कि किसानों के हित सर्वोपरि हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का उद्देश्य है कि हर किसान को उसका वास्तविक हक मिले, समय पर मिले और पारदर्शिता के साथ मिले।

बैठक में यह भी तय किया गया कि भविष्य में बीमा क्लेम की गणना प्रक्रिया को सरल, पारदर्शी और एकीकृत तकनीकी प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाएगा, जिससे किसानों को अपने क्लेम की स्थिति रियल-टाइम में पता चल सके। 

चालू सप्ताह में सीसीआई ने 50,900 गांठ कॉटन की बिक्री की, कीमतों में मिलाजुला रुख

नई दिल्ली। कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) ने चालू सप्ताह में 2024-25 सीजन की खरीदी हुई कॉटन की ई-नीलामी के माध्यम से लगभग 50,900 गांठ, एक गांठ 170 किलो की बिक्री की।


सीसीआई लगातार पिछले सीजन की खरीदी हुई कॉटन घरेलू बाजार में बेच रही है तथा समय, समय पर निगम बिक्री कीमतों में कटौती भी कर रही है। उधर विश्व बाजार में कॉटन के दाम घरेलू बाजार की तुलना में नीचे बने हुए हैं इसलिए हाजिर बाजार में कॉटन की कीमतों में अभी बड़ी तेजी के आसार नहीं है।

केंद्र सरकार ने कॉटन के आयात पर शून्य शुल्क की समय सीमा को 30 सितंबर 2025 से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2025 किया हुआ है।

व्यापारियों के अनुसार गुजरात एवं उत्तर भारत के कॉटन के उत्पादक राज्यों में मौसम खराब बना हुआ है। हालांकि विश्व बाजार में पिछले दो कार्यदिवस से कॉटन के दाम कमजोर हुए है, जिस कारण घरेलू बाजार में भी इसकी कीमतों पर दबाव है।

केंद्र सरकार ने दिसंबर तक शून्य शुल्क पर कॉटन के आयात की अनुमति दी हुई है। पिछले सीजन सितंबर के अंत में घरेलू बाजार में कॉटन का बकाया स्टॉक इसके पिछले साल की तुलना में ज्यादा बचा हुआ था। वैसे भी कपास की बुआई में कमी आने के बावजूद उद्योग का अनुमान है कि चालू सीजन उत्पादन बढ़ेगा।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने से शाम के सत्र में गुजरात में शुक्रवार को कॉटन की कीमतों में नरमी दर्ज की गई, जबकि इस दौरान उत्तर भारत के राज्यों में मिलाजुला रुख रहा।

गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शुक्रवार को 50 रुपये घटकर 52,900 से 53,200 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए।

पंजाब में रुई हाजिर डिलीवरी के भाव बढ़कर 5,200 से 5,270 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव नरम होकर 5,110 से 5,130 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम बढ़कर 5,200 से 5,300 रुपये प्रति मन बोले गए। लोअर राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के दाम 48,700 से 49,700 रुपये कैंडी बोले गए।

देशभर की मंडियों में कपास की आवक 48,000 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा कारोबार में कॉटन की कीमत में तेजी दर्ज की गई। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल 26 महीने के वायदा अनुबंध में कपास के दाम 10 रुपये तेज होकर 1,557 रुपये प्रति 20 किलो हो गए। इस दौरान एमसीएक्स पर नवंबर महीने के वायदा अनुबंध में कॉटन के भाव 390 रुपये तेज होकर 25,800 रुपये हो गए। आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन की कीमतों में गिरावट का रुख रहा।