नई दिल्ली। चालू पेराई सीजन 2026-27 के लिए महाराष्ट्र में चीनी सीजन को जल्द शुरू करने के लिए सितंबर में ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया चलाई गई थी। इसके तहत राज्य की 106 सहकारी और 107 निजी चीनी मिलों सहित कुल 213 मिलों ने पेराई लाइसेंस के लिए आवेदन किया है, जिनमें से अब तक केवल 30 चीनी मिलों को ही लाइसेंस जारी किए गए हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 40 सहकारी और 45 निजी चीनी मिलों के आवेदनों की क्षेत्रीय स्तर पर जांच चल रही है। कुछ आवेदनों में आवश्यक दस्तावेजों और निर्धारित शर्तों की पूर्ति की जांच की जा रही है। लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है।
चीनी आयुक्तालय के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 23 सहकारी और 19 निजी चीनी मिलों के आवेदनों के संबंध में स्थगन या रद्द किए जाने की प्रविष्टियां दर्ज हैं। ऐसे में चालू पेराई सीजन की शुरुआत की प्रक्रिया अपेक्षाकृत धीमी दिखाई हो सकती है।
महाराष्ट्र में गुरुवार, 15 अक्टूबर से आधिकारिक रूप से चालू पेराई सीजन 2026-27, अक्टूबर से सितंबर के गन्ना पेराई की शुरुआत हो गई है। हालांकि, मानसूनी बारिश की कमी के कारण राज्य के कई क्षेत्रों में गन्ने की अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है। ऐसे में पेराई सीजन जल्दी शुरू करने से मिलों को पर्याप्त मात्रा में गन्ने की आपूर्ति पर असर पड़ने की आशंका है।
चीनी उद्योग के सामने पेराई की योजना, लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया और गन्ने की उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। चीनी सीजन जल्दी शुरू करने के फैसले का किसान संगठनों ने विरोध किया है। वहीं, पेराई लाइसेंस के मुद्दे पर कुछ चीनी मिलों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने उन 14 मिलों को 14 अक्टूबर तक अस्थायी राहत दी थी।
महाराष्ट्र के चीनी आयुक्त डॉ. संजय कोलते पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि बिना लाइसेंस गन्ने की पेराई शुरू करने वाली चीनी मिलों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल यह जांच की जा रही है कि किन मिलों ने बिना आवश्यक लाइसेंस के पेराई शुरू की है। यदि ऐसा पाया जाता है, तो संबंधित मिलों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। राज्य की 213 चीनी मिलों ने पेराई लाइसेंस के लिए आवेदन किया है, लेकिन अब तक केवल 30 मिलों को अनुमति मिली है। कम बारिश, गन्ने की उपलब्धता और लाइसेंस प्रक्रिया के कारण गन्ने के नया पेराई सीजन शुरू में ही कई चुनौतियों का सामाना कर रहा है।
16 अक्टूबर 2026
महाराष्ट्र की 213 चीनी मिलों ने गन्ना पेराई के लिए आवेदन किया, 30 को मिली है अनुमति
चालू तेल वर्ष के पहले 11 महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 3 फीसदी बढ़ा - एसईए
नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों (नवंबर-25 एवं सितंबर-26) के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 3 फीसदी बढ़कर 154.64 लाख टन का हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 150.31 लाख टन का ही हुआ था।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार इस दौरान खाद्य तेलों के आयात में भी बढ़ोतरी हुई, जो पिछले तेल वर्ष की समान अवधि के 146.83 लाख टन से बढ़कर 151.64 लाख टन का हो गया, यानी 3 फीसदी की बढ़ोतरी। नए आंकड़ों से पता चलता है कि चालू तेल वर्ष में खाद्य तेलों का कुल आयात ज्यादा हो रहा है।
एसईए के अनुसार सितंबर 2026 के दौरान देश में खाद्य तेलों का आयात 15.44 लाख टन और अखाद्य तेलों का आयात 35,196 टन का हुआ है। मासिक आधार पर, खाद्य तेलों का आयात सितंबर में थोड़ा कम होकर 15.44 लाख टन का रह गया, जबकि अगस्त 2026 में इनका आयात 15.72 लाख टन का हुआ था। यह कमी मुख्य रूप से आरबीडी पामोलिन के आयात में 22,700 टन से कम होकर 2,905 टन और क्रूड सूरजमुखी तेल का आयात 155,639 टन से कम होकर 104,984 टन के कारण हुई है।
एसईए के अनुसार नेपाल से रिफाइंड तेलों का आयात बड़े पैमाने पर जारी रहा। नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के दौरान, नेपाल से देश में 682,452 टन रिफाइंड तेलों का आयात हुआ है, जिसमें 605,896 टन रिफाइंड सोया तेल, तथा 37,734 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 31,633 टन आरबीडी पामोलिन के अलावा 7,189 टन रेपसीड तेल शामिल हैं। यह ध्यान देने वाली बात है कि नेपाल मुख्य रूप से क्रूड सोया तेल, थोड़ी मात्रा में क्रूड सूरजमुखी तेल और सीपीओ भी आयात कर रहा है और रिफाइनिंग के बाद, भारत को रिफाइंड तेलों का निर्यात कर रहा है। नेपाल से देश में खाद्य तेलों का आयात साफ्टा एग्रीमेंट के तहत शून्य आयात शुल्क पर हो रहा है।
नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के दौरान, देश में रिफाइंड तेलों का आयात घटकर 740,441 टन का रह गया, जबकि पिछले तेल वर्ष की इसी अवधि में यह 1,689,228 टन का हुआ था। इसलिए, इंडोनेशिया और मलेशिया से रिफाइंड पामोलिन के बहुत कम आयात की वजह से इसका हिस्सा 12 फीसदी से घटकर 5 फीसदी का रह गया। इस दौरान, क्रूड खाद्य तेलों का आयात बढ़कर 14,423,939 टन का हो गया, जबकि पिछले तेल वर्ष की इसी अवधि में इनका आयात 12,993,972 टन का हुआ था। अत: इसकी हिस्सेदारी 88 फीसदी से बढ़कर 95 फीसदी की हो गई। यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से क्रूड पाम तेल के ज्यादा आयात की वजह से हुई, जिसने रिफाइंड पामोलिन के आयात की जगह ले ली। नेपाल से भारत को रिफाइंड सोया तेल का निर्यात भी बढ़ा है।
जुलाई में डीओसी का निर्यात 65 फीसदी घटा - एसईए
नई दिल्ली। जुलाई में देश से डीओसी के निर्यात में 65 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 148,609 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जुलाई में इसका निर्यात 422,388 टन का हुआ था।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहले चार महीनों अप्रैल से जुलाई के दौरान देश से डीओसी के निर्यात में 27 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 1,105,833 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 1,516,981 टन का हुआ था।
एसईए के अनुसार भारतीय सोया डीओसी के निर्यात को अर्जेंटीना और ब्राजील से सस्ती सप्लाई से कड़ी टक्कर मिल रही है। जुलाई 2026 में, सोया डीओसी निर्यात में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 90 फीसदी की गिरावट आई। खासकर यूरोप और वेस्ट एशिया में शिपमेंट के लिए रेड सी में रुकावटों की वजह से जहाजों को लंबे रास्ते से जाना पड़ रहा है, जिससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च और डिलीवरी का समय बढ़ गया है।
जुलाई 2026 में भारतीय सोया डीओसी की कीमत लगभग 613 डॉलर प्रति टन थी, जबकि इंटरनेशनल कीमत लगभग 428 डॉलर प्रति टन थी, जिस कारण इंटरनेशनल मार्केट में भारतीय सप्लाई पूरी तरह से बढ़ी हुई कीमतों के कारण नहीं के बराबर हो गई। घरेलू सोया डीओसी की ज्यादा कीमत और पोल्ट्री और जानवरों के चारे बनाने वालों की मांग ने निर्यात के लिए इंसेंटिव और उपलब्धता को कम कर दिया है।
चालू वित्त वर्ष 2026-27 के अप्रैल से जुलाई के दौरान देश के कुल डीओसी निर्यात में 27 फीसदी की गिरावट मुख्य रूप से सोया डीओसी के कमजोर शिपमेंट, साउथ अमेरिकन सप्लायर से जबरदस्त कॉम्पिटिशन और शिपिंग में रुकावटों के कारण बढ़ी हुई परिवहन लागत की वजह से हुई। हालांकि इस दौरान सरसों डीओसी के निर्यात में बढ़ोतरी हुई, क्योंकि खासकर के चीन की आयात मांग ने सपोर्ट दिया, लेकिन वह पूरी गिरावट को कम करने के लिए काफी नहीं था।
भारतीय बंदरगाह पर अगस्त की तुलना में सितंबर में सोया डीओसी का भाव कमजोर होकर 530 डॉलर प्रति टन रह गए, जबकि अगस्त में इसका दाम 622 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य सितंबर में भारतीय बंदरगाह पर 253 डॉलर प्रति टन पर स्थिर रहा, क्योंकि अगस्त में भी इसका भाव 253 डॉलर प्रति टन ही था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम, सितंबर में भी अगस्त के 110 डॉलर प्रति टन पर स्थिर बना रहा।
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