01 दिसंबर 2009
दिसंबर के लिए प्याज का निर्यात मूल्य बढ़ाया
सरकार को प्याज के मूल्य में अब और ज्यादा तेजी आने की ज्यादा संभावना नहीं दिखाई दे रही है। यही वजह है कि प्याज भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नेफेड) ने दिसंबर माह के लिए प्याज का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) सिर्फ पांच डॉलर बढ़ाकर 450-455 डॉलर प्रति टन कर दिया है। घरेलू बाजार में प्याज के दाम नियंत्रण में रहने और नई फसल की सप्लाई शुरू होने के कारण ही एमईपी में मामूली वृद्धि की गई है। नेफेड के एक अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि नवंबर माह के दौरान प्याज का निर्यात सीमित रहने के कारण इसका एमईपी कम बढ़ाया गया है। अधिकारी के मुताबिक 25 नवंबर करीब 40 हजार टन प्याज का निर्यात किया गया, जबकि पिछले साल नवंबर के दौरान 1।07 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ था। घरेलू बाजार में प्याज के दाम घटने और पहले से एमईपी अधिक होने की वजह से भी इसमें ज्यादा बढ़ोतरी नहीं की गई। नवंबर की शुरूआत में देश में प्याज के दाम 1800-2100 रुपये प्रति क्विंटल थे जो अब घटकर 1500-1600 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं। अक्टूबर माह के शुरूआत में प्याज के दाम अचानक दोगुने बढ़ने के कारण एमईपी 85 डॉलर बढ़ाकर 300 डॉलर प्रति टन कर दिया गया था। इसके बाद नवंबर की शुरूआत में भी प्याज की कीमतों में तेजी रहने के कारण नवंबर माह के लिए प्याज का एमईपी 145 डॉलर प्रति टन बढ़ाया गया था। इसे बढ़ाने का मकसद प्याज के निर्यात को नियंत्रण में करना था। दरअसल अक्टूबर के लिए एमईपी बढ़ने के बावजूद प्याज का निर्यात बढ़ा था। सितंबर के मुकाबले अक्टूबर में प्याज का निर्यात 20 फीसदी बढ़कर 1.23 लाख टन हो गया था। चालू वित्त वर्ष में अक्टूबर तक करीब 11.20 लाख टन प्याज का निर्यात हो गया। जो पिछली समान अवधि के मुकाबले करीब दस फीसदी अधिक है। वित्त वर्ष 2008-09 में भारत से प्याज का निर्यात करीब 51 फीसदी बढ़कर 16.70 लाख टन हो गया था। प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में सितंबर माह के अंत में भारी बारिश होने के कारण 15-25 फीसदी प्याज की फसल को नुकसान होने की आशंका हैं। आंध्र प्रदेश में 25 फीसदी, कर्नाटक में 35 फीसदी प्याज की फसल खराब हो गई है। हालांकि मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्याज का अधिक उत्पादन होने की संभावना है। देश के कई हिस्सों में प्याज की फसल को नुकसान होने के कारण ही इसके दाम अधिक हैं। (बिज़नस भास्कर)
काली मिर्च आयात में भारी तेजी
देश का काली मिर्च आयात चालू वित्त वर्ष के पहले सात महीनों (अप्रैल से अक्टूबर तक) के दौरान 11,500 टन रहा है। यह गत वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 44 फीसदी अधिक है। उद्योग जगत से जुड़े एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि वैश्विक बाजार में कीमतों के कम होने और घरेलू बाजार में मांग तेज होने के कारण आयात को बढ़ावा मिला। गत वर्ष अप्रैल-अक्टूबर के दौरान 8,000 टन काली मिर्च का आयात किया गया था। आयातित काली मिर्च मुख्य रूप से प्रोसेसिंग के लिए होती है। प्रोसेसिंग के बाद इसका निर्यात जाता है। हालांकि वियतनाम के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा काली मिर्च उत्पादक देश है। कर्वी कॉमट्रेड के वरिष्ठ विश्लेषक वीरेश हिरेमथ ने कहा कि भारतीय काली मिर्च के भाव इस समय 3,350 डॉलर प्रति टन के आसपास हैं। जबकि वियतनाम में भाव 3,150 डॉलर प्रति टन और इंडोनेशिया में 3,000 डॉलर प्रति टन हैं। अधिकारी ने बताया कि कम उत्पादन के कारण घरेलू बाजार में काली मिर्च की कमी आयात बढ़ने का दूसरा प्रमुख कारण है। देश का काली मिर्च उत्पादन पिछले एक दशक से लगातार गिर रहा है। करीब दस सालों में काली मिर्च का उत्पादन 80-85 हजार टन सालाना से गिरकर इस समय करीब 50 हजार टन रह गया है। काली मिर्च के पेड़ कई रोगों से ग्रसित होने का असर उत्पादन पर पड़ रहा है। हालांकि एक जून से शुरू हुए चालू सीजन में मौसम अनुकूल रहने से रकबा बढ़ा है और काली मिर्च का उत्पादन 10 फीसदी बढ़कर 55,000 टन हो सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि जनवरी में नई फसल की आवक शुरू हो जाएगी तो आयात में भी गिरावट आएगी। 31 मार्च को समाप्त वित्त वर्ष में देश ने 10,750 टन काली मिर्च का आयात किया है। (बिज़नस भास्कर)
पंजाब और हरियाणा की मंडियों में कपास की सप्लाई धीमी पड़ी
पंजाब और हरियाणा की मंडियांे में कपास की आवक और घट गई है। सप्लाई घटने लेकिन मांग मजबूत बनी रहने से पिछले 10 दिनों में कपास के भाव करीब 400 रुपये प्रति `िंटल तेज हो गए। आगे भाव और बढ़ने की उम्मीद में किसान कपास की बिक्री से बच रहे हैं। अनुमान है कि इन राज्यों मंे अब तक सिर्फ 30 फीसदी कपास बिक्री के लिए मंडियों में लाई गई। जबकि पिछले साल समान अवधि में तकरीबन 45 फीसदी कपास की मंडियों में सप्लाई हो गई थी। दस दिन पहले तक 2800 से 3000 रुपये प्रति क्ंिवटल के भाव पर बिकने वाली कपास मंडियांे मंे 3200 से 3400 रुपये प्रति क्विंटल के बीच बिक रही है। कॉटन कारपोरेशन ऑफ इंडिया (सीसीआई) के आंकड़ों के मुताबिक 21 नवम्बर तक पंजाब की मंडियांे मंे 5।म्क् लाख गांठ (एक गांठ मंे 170 किलो) और हरियाणा की मंडियांे मंे 4.त्तम् लाख गांठ कपास की आवक हो चुकी है। पिछले साल समान अवधि मंे पंजाब में 7.8क् लाख और हरियाणा में 4.8म् लाख गांठ की आवक मंडियों मंे हो गई थी। बठिंडा मंे कपास के एक बड़े व्यापारी और पंजाब जिनर्स मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष भगवान बंसल का कहना है कि पंजाब और हरियाणा की मंडियांे मंे 10 दिन पहले तक प्रतिदिन 12 से 13 हजार गांठ कपास की आवक हो रही थी लेकिन अब घटकर 8 से 10 हजार गांठ रह गई है। हरियाणा के हिसार जिला के गांव मड़ के किसान कृष्ण कक्कड़ का कहना है कि वह अभी अपनी तकरीबन 200 क्विंवटल कपास बेचने का इच्छुक नहीं है। वह अपनी फसल तब बेचेगा जब भाव 4000 रुपये प्रति `िंटल से अधिक होगा। कक्कड़ का कहना है कि पहली बार किसान फसल से समय अपना माल निकालने के इच्छुक नहीं हैं।मानसा में कपास व्यापारी पवन जिंदल का कहना है कि कपास का बुवाई रकबा बढ़ने के बावजूद इस साल पंजाब व हरियाणा में सूखे के चलते उत्पादन घटने के आसार हैं। इसके अलावा विश्व बाजार मंे यार्न के महंगे होने से यहां कपास के दाम बढ़ रहे हैं। भारत से कपास की निर्यात मांग बढ़ रही है। सीसीआई के अनुसार पंजाब में इस साल 5.ब्स्त्र लाख हैक्टेयर में कपास की बुवाई हुई थी। यहां 16 लाख गांठ कपास का उत्पादन होने का अनुमान है। जबकि पिछले साल 5.फ्त्त लाख हैक्टेयर में 17.म्क् लाख गांठ उत्पादन हुआ था। वहीं हरियाणा मंे पिछले साल 4.म्स्त्र लाख हैक्टेयर रकबा रहा था। इस साल यह बढ़कर 5.फ्फ् लाख हैक्टेयर हो गया। व उत्पादन 14 लाख गांठ से घटकर 13 लाख टन रहने के आसार हैं। (बिज़नस भास्कर)
वनस्पति तेल होंगे सेहत के अनुकूल
नई दिल्ली November 30, 2009
ट्रांस फैट (ट्रांस-आइसोमर फैटी एसिड; टीएफए) युक्त खाद्य पदार्थों से होने वाले हार्टअटैक के खतरे को कम करने के लिए सरकार आंशिक हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेलों में टीएफए की सीमा 10 फीसदी निश्चित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की स्वायत्त सांविधानिक संस्था भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने इस मसले पर एक प्रस्ताव तैयार किया है और इसे अपने भागीदारों के समक्ष पेश किया है। प्राधिकरण की योजना 10 फीसदी की सीमा को जनवरी 2010 से लागू करने की है।
एफएसएसएआई के अध्यक्ष पी. आई. सुव्रतन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'वनस्पति तेलों में टीएफए होने से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों (तेलों में तले जाने वाले) में टीएफए की मात्रा स्वत: ही कम हो जाएगी। हमारी योजना अगले 3 साल में इस सीमा को घटाकर 5 फीसदी तक लाने की है।' डेनमार्क, कनाडा, अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में टीएफए पर सीमा पहले से ही तय है।
मालूम हो कि टीएफए खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ा देती है। इतना ही नहीं वह खून में एचडीएल की मात्रा घटाकर अन्य नुकसानदेह वसा को भी बढ़ा देती है। महिलाओं के बारे में बताया जाता है कि टीएफए उनमें हार्टअटैक के खतरे को दोगुना कर देती है। यह बूढ़ों और बच्चों को भी नुकसान पहुंचाती है।
औद्योगिक स्तर पर टीएफए को आंशिक हाइड्रोजनीकरण (तरल वनस्पति तेल को सख्त बनाने और जमाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया) के जरिए तैयार किया जाता है। अब तक वनस्पति तेलों में टीएफए का स्तर 40 फीसदी तक हो सकता है।
देश में खाद्य वनस्पति तेलों और वसा की सालाना खपत 1.3 करोड़ टन से भी ज्यादा है। देश का वनस्पति उद्योग करीब 5-6 हजार करोड़ रुपये के होने का अनुमान है। अनुमान है कि इसमें करीब 30 से 40 हजार लोग प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हैं। इतना ही नहीं इसकी पैकेजिंग और ढुलाई से भी काफी बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं।
इस नियमन से डालडा, धारा, कमानी, रुचि सोया, एग्रो पैक और कारगिल जैसी कंपनियों पर असर होगा। उद्योग ने बताया कि टीएफए को घटाकर 10 फीसदी करने से उत्पाद का गलनांक बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर उत्पाद का गलनांक खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम (पीएफए) द्वारा 41 डिग्री की निश्चित सीमा से ज्यादा हो जाएगा। गलनांक मसले पर सरकार छूट देने के मूड में नहीं है।
देश की बड़ी वनस्पति तेल कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'अमेरिका में भी 48 डिग्री के गलनांक की इजाजत है। विज्ञान कहता है कि 50 डिग्री तक का गलनांक सुरक्षित है।' उन्होंने दावा किया कि डेनमार्क, कनाडा और अमेरिका ने भी टीएफए नियमन के लिए जिस कोडेक्स मानक का अनुसरण किया है, उसमें किसी अधिकतम गलनांक का जिक्र नहीं है। (बीएस हिन्दी)
ट्रांस फैट (ट्रांस-आइसोमर फैटी एसिड; टीएफए) युक्त खाद्य पदार्थों से होने वाले हार्टअटैक के खतरे को कम करने के लिए सरकार आंशिक हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेलों में टीएफए की सीमा 10 फीसदी निश्चित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है।
स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की स्वायत्त सांविधानिक संस्था भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने इस मसले पर एक प्रस्ताव तैयार किया है और इसे अपने भागीदारों के समक्ष पेश किया है। प्राधिकरण की योजना 10 फीसदी की सीमा को जनवरी 2010 से लागू करने की है।
एफएसएसएआई के अध्यक्ष पी. आई. सुव्रतन ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'वनस्पति तेलों में टीएफए होने से पैकेज्ड खाद्य पदार्थों (तेलों में तले जाने वाले) में टीएफए की मात्रा स्वत: ही कम हो जाएगी। हमारी योजना अगले 3 साल में इस सीमा को घटाकर 5 फीसदी तक लाने की है।' डेनमार्क, कनाडा, अमेरिका और कुछ अन्य यूरोपीय देशों में टीएफए पर सीमा पहले से ही तय है।
मालूम हो कि टीएफए खून में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ा देती है। इतना ही नहीं वह खून में एचडीएल की मात्रा घटाकर अन्य नुकसानदेह वसा को भी बढ़ा देती है। महिलाओं के बारे में बताया जाता है कि टीएफए उनमें हार्टअटैक के खतरे को दोगुना कर देती है। यह बूढ़ों और बच्चों को भी नुकसान पहुंचाती है।
औद्योगिक स्तर पर टीएफए को आंशिक हाइड्रोजनीकरण (तरल वनस्पति तेल को सख्त बनाने और जमाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया) के जरिए तैयार किया जाता है। अब तक वनस्पति तेलों में टीएफए का स्तर 40 फीसदी तक हो सकता है।
देश में खाद्य वनस्पति तेलों और वसा की सालाना खपत 1.3 करोड़ टन से भी ज्यादा है। देश का वनस्पति उद्योग करीब 5-6 हजार करोड़ रुपये के होने का अनुमान है। अनुमान है कि इसमें करीब 30 से 40 हजार लोग प्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हैं। इतना ही नहीं इसकी पैकेजिंग और ढुलाई से भी काफी बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं।
इस नियमन से डालडा, धारा, कमानी, रुचि सोया, एग्रो पैक और कारगिल जैसी कंपनियों पर असर होगा। उद्योग ने बताया कि टीएफए को घटाकर 10 फीसदी करने से उत्पाद का गलनांक बढ़ जाएगा। ऐसा होने पर उत्पाद का गलनांक खाद्य अपमिश्रण रोकथाम अधिनियम (पीएफए) द्वारा 41 डिग्री की निश्चित सीमा से ज्यादा हो जाएगा। गलनांक मसले पर सरकार छूट देने के मूड में नहीं है।
देश की बड़ी वनस्पति तेल कंपनी के एक शीर्ष अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, 'अमेरिका में भी 48 डिग्री के गलनांक की इजाजत है। विज्ञान कहता है कि 50 डिग्री तक का गलनांक सुरक्षित है।' उन्होंने दावा किया कि डेनमार्क, कनाडा और अमेरिका ने भी टीएफए नियमन के लिए जिस कोडेक्स मानक का अनुसरण किया है, उसमें किसी अधिकतम गलनांक का जिक्र नहीं है। (बीएस हिन्दी)
खाड़ी ने ज़ेवरों की रंगत बिगाड़ी
मुंबई November 30, 2009
रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने 200 करोड़ रुपये के अपने 'अनंत' नाम की आभूषण प्रोत्साहन योजना पर फिलहाल ब्रेक लगा दिए हैं।
इसकी वजह दुबई वर्ल्ड कर्ज संकट और भारत में मिल रहे ठंडे रुख को बताया जा रहा है। जीजेईपीसी वाणिज्य मंत्रालय के अधीन रत्न और आभूषण कारोबार की शीर्ष संस्था है। अनंत जीजेईपीसी का पहला ब्रांड है और भारत में यह संस्था अपने करीब 200 आउटलेट पर अगस्त से ही इसे बेच रही है और फरवरी तक यह सिलसिला चलेगा।
अगले साल की शुरुआत में परिषद अनंत का विस्तार करना चाह रही थी और इसे देश की सीमाओं से बाहर ले जाकर दुबई और शारजाह में पेश करने जा रही थी। इसके लिए स्थानीय आभूषण विक्रेताओं से बातचीत भी कई।
बहरहाल दुबई के ताजा कर्ज संकट ने अनंत की रफ्तार थाम दी है। परिषद में विपणन और कारोबार विकास के संयोजक संजय कोठारी का कहना है, 'परिषद को मिल रहे ठंडे रेस्पॉन्स और दुबई में वित्तीय संकट की वजह से फिलहाल यह योजना टालनी पड़ रही है।'
भारत से होने वाले कुल आभूषण निर्यात का 35 फीसदी दुबई को होता है और इसमें से ज्यादातर निर्यात सोने से बने जेवरों का ही होता है। दुबई से फिर इन जेवरों को रूस, ईरान, इराक और अफ्रीकी देशों को निर्यात किया जाता है।
दुबई कर्ज़ संकट का हुआ असरजेवरों की प्रदर्शनी को पड़ा टालना, 200 करोड़ रुपये की योजनादेश से होने वाले कुल जेवर निर्यात का 35 फीसदी दुबई को (बीएस हिन्दी)
रत्न और आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने 200 करोड़ रुपये के अपने 'अनंत' नाम की आभूषण प्रोत्साहन योजना पर फिलहाल ब्रेक लगा दिए हैं।
इसकी वजह दुबई वर्ल्ड कर्ज संकट और भारत में मिल रहे ठंडे रुख को बताया जा रहा है। जीजेईपीसी वाणिज्य मंत्रालय के अधीन रत्न और आभूषण कारोबार की शीर्ष संस्था है। अनंत जीजेईपीसी का पहला ब्रांड है और भारत में यह संस्था अपने करीब 200 आउटलेट पर अगस्त से ही इसे बेच रही है और फरवरी तक यह सिलसिला चलेगा।
अगले साल की शुरुआत में परिषद अनंत का विस्तार करना चाह रही थी और इसे देश की सीमाओं से बाहर ले जाकर दुबई और शारजाह में पेश करने जा रही थी। इसके लिए स्थानीय आभूषण विक्रेताओं से बातचीत भी कई।
बहरहाल दुबई के ताजा कर्ज संकट ने अनंत की रफ्तार थाम दी है। परिषद में विपणन और कारोबार विकास के संयोजक संजय कोठारी का कहना है, 'परिषद को मिल रहे ठंडे रेस्पॉन्स और दुबई में वित्तीय संकट की वजह से फिलहाल यह योजना टालनी पड़ रही है।'
भारत से होने वाले कुल आभूषण निर्यात का 35 फीसदी दुबई को होता है और इसमें से ज्यादातर निर्यात सोने से बने जेवरों का ही होता है। दुबई से फिर इन जेवरों को रूस, ईरान, इराक और अफ्रीकी देशों को निर्यात किया जाता है।
दुबई कर्ज़ संकट का हुआ असरजेवरों की प्रदर्शनी को पड़ा टालना, 200 करोड़ रुपये की योजनादेश से होने वाले कुल जेवर निर्यात का 35 फीसदी दुबई को (बीएस हिन्दी)
सोयाबीन संयंत्रों पर लगने लगे हैं ताले
मुंबई November 30, 2009
विदेशों से सस्ती दर पर आयात किये जा रहे सोयाबीन, सोया रिफाइंड तेल और पाम ऑयल की वजह से इस समय देसी कारोबारियों को घाटे का सौदा करना पड़ा रहा है।
चीन में सोयाबीन की मांग बढ़ने की वजह से पिछले एक महीने में सोयाबीन की कीमतों में 10 फीसदी का इजाफा हुआ। कीमतों में बढ़ोतरी और विदेशों से आ रहे सस्ते माल की वजह से कारोबारियों को मजबूरी में घाटे का सौदा करना पड़ रहा है।
नतीजतन देश में चल रहे सोयाबीन ऑयल प्लांटों में ताला पड़ने लगा है और जिन प्लांटों में काम चल भी रहा है वह अपनी क्षमता का मुश्किल से 30-40 फीसदी ही काम कर रहे हैं। कमोडिटी रिसर्च फर्म शेयरखान कमोडिटी की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इस समय सोयाबीन की प्लांट डिलिवरी कीमत 24,000 रुपये प्रति टन है। इसमें 1100 रुपये प्रति टन प्रोसेसिंग शुल्क पड़ जा रहा है।
इस तरह प्रति टन सोयाबीन की कीमत 25,100 रुपये प्रति टन हो जा रही है। रिफाइंड करने के बाद इसकी कुल कीमत निकलकर 22,280.49 रुपये आ पाती है। जो कारोबारियों के लिए घाटे का सौदा हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में सोयाबीन की लगभग 98 फीसदी फसल तैयार हो गई है।
अमेरिका में सोयाबीन का उत्पादन अक्टूबर महीने तक पिछले साल के 748590 लाख टन से बढ़कर इस साल 884540 लाख टन हुआ है। जबकि भारत में सोयाबीन के उत्पादन में करीबन 3 फीसदी की कमी हो सकती है। शेयरखान के कमोडिटी रिसर्च हेड मेहुल अग्रवाल के अनुसार देश में पैदावार कम होने की वजह से घरेलू बाजार में सोयाबीन और महंगी हो सकती है।
जनवरी तक कीमतों में 10 से 15 फीसदी का इजाफा देखने को मिल सकता है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरेगी। इस समय घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतें 2350 रुपये प्रति क्विंटल के आस पास चल रही है जबकि एक महीने पहले ये 2200 रुपये थी।
सॉलवेंट एक्सटैक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भरत मेहता के अनुसार अमेरिका, ब्राजील और अर्जेटीना का माल भारतीय माल से सस्ता पड़ा रहा है इसलिए लोग उसे खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारतीय कारोबारियों को बाजार में उनसे मुकाबला करने के लिए लगभग 40 डॉलर प्रति टन का घाटा उठाना पड़ रहा है यही वजह है कि कारोबारी प्लांट बंद कर रहे हैं।
इस समय वे प्लांट चल रहे हैं जिन्होने पहले से ऑर्डर लेकर रखा है। दूसरी बात कारोबारी घाटा होने के बाद भी बाजार में बने रहने और अपनी साख बचाने के लिए प्लांट चालू रखे हैं। जिन प्लांटों में काम चल भी रहा है वह मुश्किल से पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी काम हो रहा है। यानी मजबूरी का सौदा किया जा रहा है।
मेहता के अनुसार अगर यही स्थिति रही तो देश के अंतर यह कारोबार इस साल के अंत तक ठप पड़ सकता है। क्योंकि घाटे का सौदा कोई भी कारोबारी ज्यादा दिन तक नहीं कर सकता है। देश में लगभग 700 सोयाबीन रिफाइंड प्लांट है जिनमें से इस समय लगभग 40 फीसदी में काम बंद हो चुका है और साल के अंत तक चालू प्लांटों में से 30 फीसदी और बंद हो सकते हैं।
कारोबारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में माल सस्ता होने से कारोबारी रिफाइंड करने का काम बंद कर देगे और सीधा रिफाइंड माल लाकर ही बेचेगे। वैश्विक स्तर पर पैदावार ज्यादा होने के साथ ही मांग भी बढ़ी है सबसे ज्यादा मांग चीन में है। जबकि दूसरी ओर देश में कीमतें आसमान पर है और पैदावार भी कम हुई है जिसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी कीमतों में और बढ़ोतरी होने वाली है।
सस्ते आयात से पिटा कारोबार
सोयाबीन, सोया रिफाइंड तेल और पाम ऑयल के सस्ते आयात की वजह से देसी कारोबारियों को घाटाचीन में मांग बढ़ने से पिछले 1 माह में 10 फीसदी बढ़े सोयाबीन के दामक्षमता का 30-40 फीसदी ही काम कर रहे हैं संयंत्र (बीएस हिन्दी)
विदेशों से सस्ती दर पर आयात किये जा रहे सोयाबीन, सोया रिफाइंड तेल और पाम ऑयल की वजह से इस समय देसी कारोबारियों को घाटे का सौदा करना पड़ा रहा है।
चीन में सोयाबीन की मांग बढ़ने की वजह से पिछले एक महीने में सोयाबीन की कीमतों में 10 फीसदी का इजाफा हुआ। कीमतों में बढ़ोतरी और विदेशों से आ रहे सस्ते माल की वजह से कारोबारियों को मजबूरी में घाटे का सौदा करना पड़ रहा है।
नतीजतन देश में चल रहे सोयाबीन ऑयल प्लांटों में ताला पड़ने लगा है और जिन प्लांटों में काम चल भी रहा है वह अपनी क्षमता का मुश्किल से 30-40 फीसदी ही काम कर रहे हैं। कमोडिटी रिसर्च फर्म शेयरखान कमोडिटी की रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार इस समय सोयाबीन की प्लांट डिलिवरी कीमत 24,000 रुपये प्रति टन है। इसमें 1100 रुपये प्रति टन प्रोसेसिंग शुल्क पड़ जा रहा है।
इस तरह प्रति टन सोयाबीन की कीमत 25,100 रुपये प्रति टन हो जा रही है। रिफाइंड करने के बाद इसकी कुल कीमत निकलकर 22,280.49 रुपये आ पाती है। जो कारोबारियों के लिए घाटे का सौदा हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में सोयाबीन की लगभग 98 फीसदी फसल तैयार हो गई है।
अमेरिका में सोयाबीन का उत्पादन अक्टूबर महीने तक पिछले साल के 748590 लाख टन से बढ़कर इस साल 884540 लाख टन हुआ है। जबकि भारत में सोयाबीन के उत्पादन में करीबन 3 फीसदी की कमी हो सकती है। शेयरखान के कमोडिटी रिसर्च हेड मेहुल अग्रवाल के अनुसार देश में पैदावार कम होने की वजह से घरेलू बाजार में सोयाबीन और महंगी हो सकती है।
जनवरी तक कीमतों में 10 से 15 फीसदी का इजाफा देखने को मिल सकता है जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें गिरेगी। इस समय घरेलू बाजार में सोयाबीन की कीमतें 2350 रुपये प्रति क्विंटल के आस पास चल रही है जबकि एक महीने पहले ये 2200 रुपये थी।
सॉलवेंट एक्सटैक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष भरत मेहता के अनुसार अमेरिका, ब्राजील और अर्जेटीना का माल भारतीय माल से सस्ता पड़ा रहा है इसलिए लोग उसे खरीदना पसंद कर रहे हैं। भारतीय कारोबारियों को बाजार में उनसे मुकाबला करने के लिए लगभग 40 डॉलर प्रति टन का घाटा उठाना पड़ रहा है यही वजह है कि कारोबारी प्लांट बंद कर रहे हैं।
इस समय वे प्लांट चल रहे हैं जिन्होने पहले से ऑर्डर लेकर रखा है। दूसरी बात कारोबारी घाटा होने के बाद भी बाजार में बने रहने और अपनी साख बचाने के लिए प्लांट चालू रखे हैं। जिन प्लांटों में काम चल भी रहा है वह मुश्किल से पिछले साल के मुकाबले 30 फीसदी काम हो रहा है। यानी मजबूरी का सौदा किया जा रहा है।
मेहता के अनुसार अगर यही स्थिति रही तो देश के अंतर यह कारोबार इस साल के अंत तक ठप पड़ सकता है। क्योंकि घाटे का सौदा कोई भी कारोबारी ज्यादा दिन तक नहीं कर सकता है। देश में लगभग 700 सोयाबीन रिफाइंड प्लांट है जिनमें से इस समय लगभग 40 फीसदी में काम बंद हो चुका है और साल के अंत तक चालू प्लांटों में से 30 फीसदी और बंद हो सकते हैं।
कारोबारियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में माल सस्ता होने से कारोबारी रिफाइंड करने का काम बंद कर देगे और सीधा रिफाइंड माल लाकर ही बेचेगे। वैश्विक स्तर पर पैदावार ज्यादा होने के साथ ही मांग भी बढ़ी है सबसे ज्यादा मांग चीन में है। जबकि दूसरी ओर देश में कीमतें आसमान पर है और पैदावार भी कम हुई है जिसको देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी कीमतों में और बढ़ोतरी होने वाली है।
सस्ते आयात से पिटा कारोबार
सोयाबीन, सोया रिफाइंड तेल और पाम ऑयल के सस्ते आयात की वजह से देसी कारोबारियों को घाटाचीन में मांग बढ़ने से पिछले 1 माह में 10 फीसदी बढ़े सोयाबीन के दामक्षमता का 30-40 फीसदी ही काम कर रहे हैं संयंत्र (बीएस हिन्दी)
चौंकाने वाली रही कृषि क्षेत्र की विकास दर
नई दिल्ली November 30, 2009
मंदी और सूखे जैसी आपदा को देखते हुए तमाम विश्लेषकों का मानना था कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की विकास दर नकारात्मक रहेगी।
लेकिन उम्मीदों से परे कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 0.9 फीसदी रही। वहीं खनन और निर्माण क्षेत्र के अच्छे प्रदर्शन की बदौलत दूसरी तिमाही में जीडीपी 7.9 फीसदी रही। सिटी ग्र्रुप की अर्थशास्त्री रोहिणी मलकानी और अनुष्का शाह ने रिपोर्ट में बताया कि उद्योग और सेवा क्षेत्र की विकास दर की उम्मीद के अनुरूप रही, लेकिन कृषि क्षेत्र की विकास दर 0.9 फीसदी रहना जरूर चकित करता है।
उन्होंने बताया कि गर्मियों में फसलों के उत्पादन में करीब 17.9 फीसदी की गिरावट आई, जिसका असर दूसरी तिमाही के आंकड़ों पर पड़ा। खनन क्षेत्र दूसरी तिमाही में 9.5 फीसदी की दर से बढ़ा, जो पिछले साल की समान अवधि में 3.7 फीसदी थी। रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से प्राकृतिक गैस के उत्पादन बढ़ने से इस क्षेत्र को काफी मदद मिली।
विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 9.2 फीसदी बढ़ी, जो पिछले साल की समान तिमाही में 5.1 फीसदी थी। इसके पीछे सरकार की ओर से खर्च बढ़ाना रहा। एमओएसपीआई के सचिव और भारत के मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने बताया कि खनन क्षेत्र में विकास दर में इजाफा केजी बेसिन से गैस के उत्पादन होने की वजह से आई है। पिछले साल इस क्षेत्र से गैस का उत्पादन नहीं हुआ था।
वहीं विनिर्माण क्षेत्र में सरकार की ओर से निवेश बढ़ाने और अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने से वृद्धि हुई है। दूसररी तिमाही में आईआईपी की विकास दर 9.2 फीसदी रही। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी ने बताया कि विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर मुख्य रूप से कंज्यूमर डयूरेबल्स और वाहन क्षेत्रों में आई तेजी की वजह से रही।
सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवा क्षेत्र 12.7 फीसदी की दर से बढ़ा, वहीं वित्तीय, रियल एस्टेट और कारोबार सेवा की विकास दर 7.7 फीसदी दर्ज की गई। पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में इन क्षेत्रों की विकास दर क्रमश: 9 फीसदी और 6.4 फीसदी थी।
इसी तरह ट्रेड, होटल, परिवहन और कम्युनिकेशन क्षेत्र की विकास दर 8।5 फीसदी दर्ज की गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 12.2 फीसदी थी। यानी इस क्षेत्र की विकास दर पिछले साल की तुलना में कम रही। कंस्ट्रक्शन और बिजली क्षेत्र की विकास दर क्रमश: 6.5 फीसदी और 7.4 फीसदी रही। (बीएस हिन्दी)
मंदी और सूखे जैसी आपदा को देखते हुए तमाम विश्लेषकों का मानना था कि चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र की विकास दर नकारात्मक रहेगी।
लेकिन उम्मीदों से परे कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 0.9 फीसदी रही। वहीं खनन और निर्माण क्षेत्र के अच्छे प्रदर्शन की बदौलत दूसरी तिमाही में जीडीपी 7.9 फीसदी रही। सिटी ग्र्रुप की अर्थशास्त्री रोहिणी मलकानी और अनुष्का शाह ने रिपोर्ट में बताया कि उद्योग और सेवा क्षेत्र की विकास दर की उम्मीद के अनुरूप रही, लेकिन कृषि क्षेत्र की विकास दर 0.9 फीसदी रहना जरूर चकित करता है।
उन्होंने बताया कि गर्मियों में फसलों के उत्पादन में करीब 17.9 फीसदी की गिरावट आई, जिसका असर दूसरी तिमाही के आंकड़ों पर पड़ा। खनन क्षेत्र दूसरी तिमाही में 9.5 फीसदी की दर से बढ़ा, जो पिछले साल की समान अवधि में 3.7 फीसदी थी। रिलायंस इंडस्ट्रीज की ओर से प्राकृतिक गैस के उत्पादन बढ़ने से इस क्षेत्र को काफी मदद मिली।
विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 9.2 फीसदी बढ़ी, जो पिछले साल की समान तिमाही में 5.1 फीसदी थी। इसके पीछे सरकार की ओर से खर्च बढ़ाना रहा। एमओएसपीआई के सचिव और भारत के मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने बताया कि खनन क्षेत्र में विकास दर में इजाफा केजी बेसिन से गैस के उत्पादन होने की वजह से आई है। पिछले साल इस क्षेत्र से गैस का उत्पादन नहीं हुआ था।
वहीं विनिर्माण क्षेत्र में सरकार की ओर से निवेश बढ़ाने और अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने से वृद्धि हुई है। दूसररी तिमाही में आईआईपी की विकास दर 9.2 फीसदी रही। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के प्रमुख अर्थशास्त्री डीके जोशी ने बताया कि विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर मुख्य रूप से कंज्यूमर डयूरेबल्स और वाहन क्षेत्रों में आई तेजी की वजह से रही।
सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवा क्षेत्र 12.7 फीसदी की दर से बढ़ा, वहीं वित्तीय, रियल एस्टेट और कारोबार सेवा की विकास दर 7.7 फीसदी दर्ज की गई। पिछले वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में इन क्षेत्रों की विकास दर क्रमश: 9 फीसदी और 6.4 फीसदी थी।
इसी तरह ट्रेड, होटल, परिवहन और कम्युनिकेशन क्षेत्र की विकास दर 8।5 फीसदी दर्ज की गई, जो पिछले साल की समान अवधि में 12.2 फीसदी थी। यानी इस क्षेत्र की विकास दर पिछले साल की तुलना में कम रही। कंस्ट्रक्शन और बिजली क्षेत्र की विकास दर क्रमश: 6.5 फीसदी और 7.4 फीसदी रही। (बीएस हिन्दी)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
