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05 मार्च 2025

केंद्रीय पूल से सोयाबीन की बिक्री से कीमतों पर बढ़ेगा दबाव - सोपा

नई दिल्ली। केंद्रीय पूल से सोयाबीन की बिक्री करने से घरेलू बाजार में इसकी कीमतों पर दबाव बनेगा, जिस कारण किसानों को नुकसान होगा। साथ ही इसका असर खरीफ सीजन में होने वाली सोयाबीन की बुआई पर भी पड़ेगा।


सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन आफ इंडिया, सोपा ने केंद्रीय कृषि मंत्री को पत्र लिखकर बुआई से पहले सोयाबीन नहीं बेचने की मांग की है। सोपा के अनुसार सोयाबीन के दाम उत्पादक मंडियों में 3,900 से 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है, जोकि न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी 4,892 रुपये प्रति क्विंटल की तुलना में नीचे बने हुए हैं।

अत: केंद्रीय एजेंसी द्वारा खुले बाजार में केंद्रीय पूल से सोयाबीन की बिक्री करने से मौजूदा कीमतों पर और दबाव बनेगा। सोपा के अनुसार आमतौर पर सोयाबीन की बुआई जून के तीसरे सप्ताह से शुरू होती है जोकि आमतौर पर बुआई 15 जुलाई तक बुआई जारी रहती है।

महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान में सोयाबीन का सबसे ज्यादा उत्पादन होता है तथा इन राज्यों के किसानों का कहना है कि सोयाबीन के दाम उत्पादक मंडियों में एमएसपी पर 800 से 1,000 रुपये प्रति क्विंटल तक नीचे बने हुए हैं। भाव कम होने के कारण किसान सोयाबीन के बजाए दूसरी फसलों की बुआई को प्राथमिकता देंगे, जिसका असर घरेलू बाजार में खाद्वय तेलों के आयात पर पड़ेगा।

सोया ने केंद्रीय कृषि मंत्री से मांग की है कि सोयाबीन की बिक्री 15 जुलाई के बाद ही शुरू की जाए, ताकि बुआई पर इसका असर नहीं पड़े।

मालूम हो कि भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नेफेड) मध्य प्रदेश में 2024 खरीफ सीजन के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत खरीदी गई 3,88,796.24 टन सोयाबीन की बिक्री शुरू करेगी। 3 मार्च, 2025 से ई-नीलामी के माध्यम से बिक्री प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव है।  

24 फ़रवरी 2025

चालू पेराई सीजन में महाराष्ट्र की 38 चीनी मिलों ने पेराई बंद की, उत्पादन 17 फीसदी कम

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2024 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2024-25 (अक्टूबर से सितंबर) में 20 फरवरी तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 17 फीसदी घटकर 70.90 लाख टन का ही हुआ है जबकि राज्य की 38 चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है।


राज्य के चीनी आयुक्तालय की एक रिपोर्ट के अनुसार चालू पेराई सीजन 2024-25 में 20 फरवरी तक राज्य की चीनी मिलों ने 70.92 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है जोकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि के 85.37 लाख टन की तुलना में 17 फीसदी कम है।

बीस फरवरी तक राज्य की 38 चीनी मिलों ने अपना परिचालन बंद कर दिया है। इनमें सबसे ज्यादा सोलापुर की 25 मिलें, नांदेड़ में पांच चीनी मिलें, कोल्हापुर में चार मिलें तथा पुणे की तीन चीनी मिलों के अलावा अहिल्यानगर क्षेत्र की एक चीनी मिल शामिल हैं। मालूम हो कि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि के दौरान राज्य की केवल 11 चीनी मिलों ने ही पेराई बंद की थी। इस समय राज्य की 162 चीनी मिलें गन्ने की पेराई कर रही हैं।

राज्य की चीनी मिलों ने 20 फरवरी तक 763.53 लाख टन गन्ने की पेराई की है, जबकि पिछले सत्र की समान अवधि के दौरान 861.91 लाख टन गन्ने की पेराई की गई थी। चालू पेराई सीजन में राज्य की औसत चीनी रिकवरी की दर 9.29 फीसदी है, जोकि पिछले सत्र की इसी अवधि की 9.9 फीसदी की तुलना में कम है।

जानकारों के अनुसार चालू सीजन में गन्ने की कम पैदावार और मिलें की बढ़ी हुई पेराई क्षमता के कारण मिलों ने इस इस सीजन में जल्दी पेराई सत्र बंद कर दिया है। चालू गन्ना पेराई सत्र शुरू होने में देरी के साथ ही गन्ने से इथेनॉल उत्पादन में अधिक योगदान के साथ ही गन्ने की पैदावार में कमी आने के कारण राज्य में चीनी का उत्पादन पिछले पेराई सीजन में तुलना में कम होने की आशंका है।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने से गुजरात के साथ ही उत्तर भारत में कॉटन के दाम नरम

नई दिल्ली। स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने के कारण शुक्रवार को गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमत नरम हो गई।


गुजरात के अहमदाबाद में 29 शंकर-6 किस्म की कॉटन के भाव शुक्रवार को 150 रुपये कमजोर होकर दाम 53,400 से 53,800 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए। मालूम हो कि गुरुवार को भी कॉटन के दाम 200 रुपये कमजोर हुए थे।

पंजाब में रुई के हाजिर डिलीवरी के भाव कमजोर होकर 5545 से 5555 रुपये प्रति मन बोले गए। हरियाणा में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव नरम होकर 5520 से 5545 रुपये प्रति मन बोले गए। ऊपरी राजस्थान में रुई के भाव हाजिर डिलीवरी के भाव घटकर 5550 से 5610 रुपये प्रति मन बोले गए। खैरथल लाइन में कॉटन के भाव तेज होकर 53,800 से 53,900 रुपये कैंडी, एक कैंडी-356 किलो बोले गए। देशभर की मंडियों में कपास की आवक 95,500 गांठ, एक गांठ-170 किलो की हुई।

घरेलू वायदा बाजार एमसीएक्स के साथ ही एनसीडीएक्स पर आज शाम को कॉटन की कीमतों में गिरावट का रुख रहा। आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में कॉटन के दाम कमजोर हुए।

स्पिनिंग मिलों की मांग कमजोर होने के कारण गुजरात के साथ ही उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन की कीमत नरम हो गई। व्यापारी कॉटन की कीमतों में अभी एकतरफा बड़ी तेजी के पक्ष में नहीं है। जानकारों के अनुसार खपत में कमी आने के कारण यूएसडीए की विश्व कृषि आपूर्ति और मांग अनुमान (डब्ल्यूएएसडीई) की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी कपास के अंतिम स्टॉक में वृद्धि हुई है साथ ही वैश्विक कपास स्टॉक में भी बढ़ोतरी हुई है।

व्यापारियों के अनुसार खपत का सीजन होने के कारण सूती धागे की स्थानीय मांग आगामी दिनों में बढ़ने की उम्मीद है, हालांकि निर्यात मांग कमजोर बनी हुई है।

कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ सीजन में कपास का उत्पादन 299.26 लाख गांठ, एक गांठ-170 किलो होने का अनुमान है, जो क‍ि पिछले खरीफ 2023-24 के 325.22 लाख गांठ के मुकाबले कम है।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई ने चौथे आरंभिक अनुमान में कॉटन के उत्पादन अनुमान में 2.50 लाख गांठ की कटौती की है। पहली अक्टूबर 2024 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2024-25 में देश में 301.75 लाख गांठ, एक गांठ-170 किलो कॉटन के उत्पादन का अनुमान है, जबकि इससे पहले 304.25 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान था। पिछले फसल सीजन 2023-24 के दौरान देश में 325.29 लाख गांठ कॉटन का उत्पादन हुआ था।

जनवरी में देश से डीओसी के निर्यात में 5 फीसदी की कमी आई - एसईए

नई दिल्ली। जनवरी में देश से डीओसी के निर्यात में 5 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 452,352 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जनवरी में इनका निर्यात 477,580 टन का ही हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2024-25 की पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान डीओसी के निर्यात में 9 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 3,603,030 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 3,974,351 टन का ही हुआ था। इस दौरान सरसों डीओसी के साथ ही कैस्टर एवं राइस ब्रान डीओसी के निर्यात में कमी आई है।

चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल 2024 से जनवरी 2025) में सोया डीओसी का कुल निर्यात पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 15.86 लाख टन की तुलना में बढ़कर 17.71 लाख टन हो गया। इसके निर्यात में बढ़ोतरी का श्रेय जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय खरीदारों द्वारा अधिक आयात को जाता है। हालांकि तेल वर्ष अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 के दौरान सोया डीओसी का निर्यात अक्टूबर 2023 से जनवरी 2024 तक की समान अवधि के 9.98 लाख टन की तुलना में 14 फीसदी कम होकर 8.62 लाख टन का ही हुआ है।

मक्का और अनाज से डीडीजीएस का उत्पादन और आपूर्ति बढ़ने से स्थानीय बाजार से डीओसी की निर्यात मांग कम हुई है। इसके अलावा, सरसों डीओसी के लिए बांग्लादेश एक प्रमुख बाजार है, जहां हाल के महीनों में अनिश्चितता के कारण इसके निर्यात में कमी आई है, तथा आगामी दिनों में इसके निर्यात में और भी कमी आने की आशंका है।

चालू फसल सीजन में केंद्र सरकार ने 11 फरवरी तक 4,892 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी की दर से 14.73 लाख टन से अधिक सोयाबीन की खरीद की है। अभी तक कुल खरीद में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी महाराष्ट्र की 8.36 लाख टन तथा मध्य प्रदेश की 3.88 लाख टन और राजस्थान की 0.99 लाख टन हैं। नवंबर में जारी पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार, फसल सीजन 2024-25 के दौरान सोयाबीन का उत्पादन 133.60 लाख टन होने की उम्मीद है, जो पिछले साल के 130.62 लाख टन से अधिक है, जबकि सोपा ने वर्ष 2024-25 के लिए 125.82 लाख टन सोयाबीन के उत्पादन का अनुमान लगाया है।

भारतीय बंदरगाह पर जनवरी में सोया डीओसी का भाव तेज होकर 378 डॉलर प्रति टन हो गया, जबकि दिसंबर में इसका दाम 363 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य जनवरी में भारतीय बंदरगाह पर 270 डॉलर प्रति टन रहा, जबकि दिसंबर में भी इसका भाव 270 डॉलर प्रति टन ही था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जनवरी में भी 81 डॉलर प्रति टन पर स्थिर है, जबकि दिसंबर में भी यही भाव था।

जनवरी में देश से डीओसी के निर्यात में 5 फीसदी की कमी आई - एसईए

नई दिल्ली। जनवरी में देश से डीओसी के निर्यात में 5 फीसदी की कमी आकर कुल निर्यात 452,352 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जनवरी में इनका निर्यात 477,580 टन का ही हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2024-25 की पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान डीओसी के निर्यात में 9 फीसदी की गिरावट आकर कुल निर्यात 3,603,030 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 3,974,351 टन का ही हुआ था। इस दौरान सरसों डीओसी के साथ ही कैस्टर एवं राइस ब्रान डीओसी के निर्यात में कमी आई है।

चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों (अप्रैल 2024 से जनवरी 2025) में सोया डीओसी का कुल निर्यात पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के 15.86 लाख टन की तुलना में बढ़कर 17.71 लाख टन हो गया। इसके निर्यात में बढ़ोतरी का श्रेय जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय खरीदारों द्वारा अधिक आयात को जाता है। हालांकि तेल वर्ष अक्टूबर 2024 से जनवरी 2025 के दौरान सोया डीओसी का निर्यात अक्टूबर 2023 से जनवरी 2024 तक की समान अवधि के 9.98 लाख टन की तुलना में 14 फीसदी कम होकर 8.62 लाख टन का ही हुआ है।

मक्का और अनाज से डीडीजीएस का उत्पादन और आपूर्ति बढ़ने से स्थानीय बाजार से डीओसी की निर्यात मांग कम हुई है। इसके अलावा, सरसों डीओसी के लिए बांग्लादेश एक प्रमुख बाजार है, जहां हाल के महीनों में अनिश्चितता के कारण इसके निर्यात में कमी आई है, तथा आगामी दिनों में इसके निर्यात में और भी कमी आने की आशंका है।

चालू फसल सीजन में केंद्र सरकार ने 11 फरवरी तक 4,892 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य, एमएसपी की दर से 14.73 लाख टन से अधिक सोयाबीन की खरीद की है। अभी तक कुल खरीद में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी महाराष्ट्र की 8.36 लाख टन तथा मध्य प्रदेश की 3.88 लाख टन और राजस्थान की 0.99 लाख टन हैं। नवंबर में जारी पहले अग्रिम अनुमान के अनुसार, फसल सीजन 2024-25 के दौरान सोयाबीन का उत्पादन 133.60 लाख टन होने की उम्मीद है, जो पिछले साल के 130.62 लाख टन से अधिक है, जबकि सोपा ने वर्ष 2024-25 के लिए 125.82 लाख टन सोयाबीन के उत्पादन का अनुमान लगाया है।

भारतीय बंदरगाह पर जनवरी में सोया डीओसी का भाव तेज होकर 378 डॉलर प्रति टन हो गया, जबकि दिसंबर में इसका दाम 363 डॉलर प्रति टन था। इस दौरान सरसों डीओसी का मूल्य जनवरी में भारतीय बंदरगाह पर 270 डॉलर प्रति टन रहा, जबकि दिसंबर में भी इसका भाव 270 डॉलर प्रति टन ही था। इस दौरान कैस्टर डीओसी का दाम जनवरी में भी 81 डॉलर प्रति टन पर स्थिर है, जबकि दिसंबर में भी यही भाव था।

बुआई में आई कमी से कैस्टर सीड का उत्पादन 8 फीसदी कम होने का अनुमान - एसईए

नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों में बुआई में आई कमी से चालू फसल सीजन 2024-25 में कैस्टर सीड का उत्पादन 8 फीसदी घटकर 18.22 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसका उत्पादन 19.75 लाख टन हुआ था।

साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार फसल सीजन 2024-25 के दौरान देशभर में 8.67 लाख हेक्टेयर में ही कैस्टर सीड की बुआई हुई थी, जोकि इसके पिछले फसल सीजन 2023-24 के 9.88 लाख हेक्टेयर की तुलना में 12 फीसदी कम थी।

एसईए के अनुसार बुआई में कमी आने के बावजूद भी मौसम अनुकूल होने के कारण चालू फसल सीजन में कैस्टर सीड की उत्पादकता में 5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। फसल सीजन 2023_24 में कैस्टर की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 1,999 किलोग्राम की बैठी थी, जबकि चालू सीजन में औसत उत्पादकता 2,101 किलोग्राम की बैठ रही है।

प्रमुख उत्पादक राज्य गुजरात में चालू फसल सीजन में कैस्टर सीड का उत्पादन 14.75 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल राज्य में इसका उत्पादन 15.74 लाख टन का हुआ था। इसी तरह से राजस्थान में चालू फसल सीजन में कैस्टर सीड का उत्पादन घटकर 2.85 लाख टन ही होने का अनुमान है, जबकि पिछले साल राज्य में 3.14 लाख टन का उत्पादन हुआ था। चालू सीजन में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में कैस्टर सीड का उत्पादन 54 हजार एवं अन्य राज्यों में 9 हजार टन होने का अनुमान है।

गुजरात की मंडियों में सोमवार को कैस्टर सीड के भाव 1,250 से 1,265 रुपये प्रति 20 किलो पर स्थिर हो गए, जबकि आवक 45,000 बोरियों, एक बोरी 35 किलो की हुई। राजकोट में कैस्टर तेल कमर्शियल के दाम 1,280 रुपये और एफएसजी के दाम 1,290 रुपये प्रति 10 किलो पर स्थिर हो गए।


चालू वित्त वर्ष में अभी तक कुल सब्सिडी खर्च में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी खाद्य सब्सिडी की

नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2024-25 में अब तक केंद्र सरकार द्वारा जारी कुल सब्सिडी खर्च में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी खाद्य सब्सिडी की रही है जोकि वितरित की गई कुल राशि का 50 फीसदी से ज़्यादा है।


बैंक ऑफ बड़ौदा की एक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीनों (अप्रैल-दिसंबर 2024) के दौरान सब्सिडी पर 3.07 लाख करोड़ रुपये खर्च किए है। यह पिछले साल की समान अवधि में खर्च किए गए 2.77 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा है, लेकिन अप्रैल-दिसंबर 2022 में खर्च किए गए 3.51 लाख करोड़ रुपये से कम है। इस वृद्धि का एक बड़ा कारण खाद्य सब्सिडी खर्च में बढ़ोतरी होना है। सरकार ने अप्रैल-दिसंबर 2024 के दौरान खाद्य सब्सिडी के लिए 1.64 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए है, जोकि पिछले साल की समान अवधि में खर्च किए गए 1.34 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा है। हालांकि यह अप्रैल-दिसंबर 2022 में खर्च हुए 1.68 लाख करोड़ रुपये से थोड़ा कम है।

इस दौरान खाद्य सब्सिडी में वृद्धि हुई है, जबकि उर्वरक सब्सिडी पर खर्च में थोड़ी इस दौरान कमी आई है। अप्रैल से दिसंबर 2024 के बीच सरकार ने उर्वरक सब्सिडी पर 1.36 लाख करोड़ रुपये खर्च किए है, जबकि पिछले साल यह रकम 1.41 लाख करोड़ रुपये और अप्रैल-दिसंबर 2022 में 1.81 लाख करोड़ रुपये थी। रिपोर्ट में सरकार की गैर-ऋण पूंजी प्राप्तियों में गिरावट पर भी प्रकाश डाला गया है, जिसमें संपत्ति की बिक्री और विनिवेश से राजस्व शामिल है। दिसंबर 2024 तक ये प्राप्तियां 27,296 करोड़ रुपये थी, जोकि दिसंबर 2023 में 29,650 करोड़ रुपये से कम और दिसंबर 2022 में 55,107 करोड़ रुपये से भी काफी कम है। यह कमजोर राजस्व संग्रह और गैर-ऋण स्रोतों के माध्यम से धन जुटाने में कम सफलता को दर्शाता है।

इसके अलावा बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का प्रवाह कमजोर हुआ है। नवंबर 2024 में एफडीआई का प्रवाह 2.4 बिलियन अमरीकी डॉलर रहा है, जोकि अक्टूबर 2024 में दर्ज 4.3 बिलियन अमरीकी डॉलर से काफी कम है। रिपोर्ट में भारतीय शेयर बाजारों से विदेशी निवेशकों के बाहर होने में हुई बढ़ोतरी का भी उल्लेख किया गया है, जिससे देश के कुल निवेश पर दबाव बढ़ रहा है।