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07 मई 2012

ग्वार के गुनाहगारों पर FMC

मुंबई। वायदा कारोबार में 2000 करोड़ रुपए के घोटाले के परदाफाश के बाद फॉरवर्ड मार्केट कमिशन (एफएमसी) ने सख्त कदम का फैसला लिया है।
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सीएनबीसी आवाज की एक्सक्यूलिव जानकारी के मुताबिक 9 और कमोडिटी ब्रोकिंग के खिलाफ एफएमसी जुर्माना लगा सकता है। साथ ही मार्जिन मनी के कानून को और कड़े करने के अलावा जुर्माने की रकम बढ़ाने की भी तैयारी है।
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सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक एफएमसी और स्टॉक एक्सचेंज मिलकर कुल 9 ब्रोकिंग कमोडिटी हाउसेस के खिलाफ कार्रवाई करने की तैयारी में है। फिलहाल जांच चल रही है और अगर यह दोषी पाए गए तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। इन 9 ब्रोकर्स में शामिल है - रेलिगेयर कमोडिटी, मोतीलाल ओसवाल कमोडिटी, आनंदराठी कमोडिटीज, एम के कॉमट्रेंड आदी। करीबन 9 कमोडिटीज के खिलाफ एफएमसी जांच कर रहा है। साथ ही दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की जा सकती है। माना जा रहा है कि 31 मई तक अंतिम कार्रवाई इनके खिलाफ कर ली जाएगी। इन पर सबसे बड़ा आरोप यह है कि अपने क्लाइंट को मार्जिन मनी फंड करते थे। यहां तक कि इनीशियल मनी लेना भी जरुरी नहीं समझते थे। कई क्लाइंट कुछ मार्जिन मनी देता था तो उन्हें आंशिक मार्जिन मनी फंड करते थे। यह एक महत्वपूर्ण डेव्लपमेंट है जो एफएमसी की तरफ से� आने वाले दिनों में देखने को मिल सकता है। इसके अलावा जो 37 क्लाइंट है। एक्सचेंज ने उनके बैंक अकाऊंट की जानकारी बैंकों से मांगी है। कई क्लाइंटों ने ग्वार गम और ग्वार सीड़ में बड़ी पोजीशन ली थी और यह फंड्स कहां से आया। यह पता नहीं चल पा रहा है। अंत में यह तय किया है कि उनके बैंक अकाउंट से संबंधित जानकारी बैंक से मांग जाए और 37 क्लाइंट्स है। साथ ही साथ 31 कंपनियां और 37 क्लाइंट्स को एफएमसी ने नोटीस भी जारी किया है। यानी अगले कुछ दिन काफी हलचल भरे होंगे और पूरे वायदा घोटाले को लेकर काफी चौंकाने वाली चीजें सामने आ सकती है। (Commodity Control)

04 मई 2012

सोना खरीदने वालों के लिए जरूरी खबर...अब कभी न खरीदें ऐसा सोना

सोना खरीदने वालों के लिए बिना हालमार्क का सोना खरीदना आने वाले समय में मुसीबत भरा हो सकता है। बिना हालमार्क वाले सोने के लिए आपको ज्वैलर्स से सोने के बराबर कीमत नहीं मिलेगी या ज्वैलर्स ऐसे सोने को लेने से मना भी कर सकते हैं।


दरअसल, सोने पर हालमार्क लगाने को अनिवार्य करने के चलते ज्वैलर्स ऐसी सतर्कता बरतने की तैयारी कर रहे हैं। सोने पर हालमार्क लगाना अनिवार्य बनाने के लिए एक विधेयक आज संसद में पेश किया गया। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) संशोधन विधेयक 2012 को उपभोक्ता मामले, खाद्य और नागरिक आपूर्ति राज्यमंत्री के वी थामस ने लोकसभा के सामने रखा।


मौजूदा बी आई एस कानून के तहत सरकार सिर्फ उन उत्पादों पर हालमार्क अनिवार्य बना सकती है जो औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम के तहत सूचीबद्ध हैं। सोना और जौहरी का व्यवसाय इस अधिनियम के तहत सूचीबद्ध नहीं होने के कारण सरकार के लिए सोने पर हालमार्क अनिवार्य करना फिलहाल संभव नहीं है।


विधि मंत्रालय ने बी आई एस कानून को औद्योगिक विकास एवं नियमन अधिनियम से अलग करने की सिफारिश की थी जिस पर अमल करते हुए मंत्रिमंडल ने इस संशोधन विधेयक को संसद में पेश करने का फैसला किया। मौजूदा समय में सोने के जेवर पर बी आई एस हालमार्क लगाने की योजना फिलहाल स्वैच्छिक है। (Business Bhaskar)

02 मई 2012

ग्रामीण भंडारण योजना में 367 % की बढ़ोतरी

सरकार की कोशिश ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा गोदाम बनाने की

खाद्यान्न भंडारण की समस्या से निपटने के लिए सरकार ग्रामीण भंडारण योजना (आरजीएस) का सहारा लेगी। इसीलिए चालू वित्त वर्ष 2012-13 के बजट में सरकार ने आरजीएस के तहत आवंटित राशि में 367 फीसदी की बढ़ोतरी की है।

कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ग्रामीण भंडारण योजना के तहत गांव में खाद्यान्न भंडारण के लिए गोदाम बनाने पर जोर दिया जाएगा। इसीलिए चालू वित्त वर्ष 2012-13 के बजट में आरजीएस का बजट बढ़ाकर 636 करोड़ रुपये कर दिया है। वित्त वर्ष 2011-12 के बजट में इसमें 136 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई थी।

उन्होंने बताया कि योजना शुरू होने के समय से 29 फरवरी 2012 तक देशभर में इस स्कीम के तहत 27,110 गोदामों का निर्माण हो चुका है, जिनकी भंडारण क्षमता 310.29 लाख टन है। प्राइवेट भागीदार को इस समय 15 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है जबकि पब्लिक सेक्टर के भागीदार को 25 फीसदी की सब्सिडी दी जा रही है।

उन्होंने बताया कि ढांचागत सुविधाओं के अभाव में इस योजना में किसानों की भागीदारी कम है, जिसे बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। हालांकि सब्सिडी की दर ज्यादा होने के कारण पब्लिक सेक्टर इसका सर्वाधिक लाभ उठा रहा है। उन्होंने बताया कि सब्सिडी 33.33 प्रतिशत होने के बावजूद इस योजना में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की भागीदारी लगभग शून्य है।

केंद्र सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में खाद्यान्न की बर्बादी में कमी लाने के लिए एक अप्रैल 2001 में ग्रामीण भंडारण योजना की शुरूआत की थी। इस योजना का मुख्य लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में सहयोगी सुविधाओं के साथ वैज्ञानिक भंडारण प्रणाली का निर्माण करना था। ताकि किसानों द्वारा अपनी कृषि उपज और प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों को भंडार करने की जरूरत को पूरा किया जा सके। (BS Hindi)

गेहूं किसान मजबूर बिचौलियों की चांदी

अजब खेल
परेशान किसान एमएसपी से कम पर बेच रहे गेहूं
बिचौलिए ऊंचे भाव पर बेच कमा रहे हैं मुनाफा

उत्तर प्रदेश में गेहूं की सरकारी खरीद की समुचित व्यवस्था नहीं होने से राज्य के किसानों को मजबूरन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 125 से 185 रुपये प्रति क्विंटल नीचे अपनी उपज बेचनी पड़ रही है। बिचौलिये कम दाम पर गेहूं खरीद कर पड़ोसी राज्य हरियाणा के सरकारी खरीद केंद्रों पर बेच कर मोटा मुनाफा कमा रहे हैं।

चालू विपणन सीजन के लिए गेहूं का एमएसपी 1,285 रुपये प्रति क्विंटल है, लेकिन यूपी में खरीद की समुचित व्यवस्था नहीं होने के कारण बिचौलिये किसानों से 1,100-1,165 रुपये प्रति क्विंटल के भाव खरीद कर रहे हैं। यही बिचौलिए हरियाणा में एमएसपी पर गेहूं बेच रहे हैं और राज्य के आढ़तियों से मिलीभगत कर 2.5 फीसदी कमीशन भी ले रहे हैं।

इस कारण चालू विपणन सीजन में हरियाणा में अभी तक एमएसपी पर 68.80 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है। यूपी में अभी तक केवल 6.33 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हो पाई है। प्रदेश के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि किसानों को एमएसपी से कम पर गेहूं न बेचना पड़े इसलिए राज्य सरकार ने गेहूं की खरीद में आढ़तियों को भी शामिल किया है। निजी कंपनियों से भी गेहूं खरीद की बात चल रही है।

उत्तर प्रदेश में इस बार 300 लाख टन से ज्यादा गेहूं उत्पादन का अनुमान है। बंपर उत्पादन के बावजूद राज्य सरकार ने एमएसपी पर केवल 42 लाख टन खरीद का लक्ष्य तय किया है। अलीगढ़ जिले के नंगला का देवा गांव के किसान भगवती प्रसाद ने बताया कि उन्होंने 80 क्विंटल गेहूं व्यापारी को 1,100 से 1,150 रुपये प्रति क्विंटल के भाव बेचा है।

व्यापारी ने सीधे खेत से खरीदा और तत्काल भुगतान कर दिया। गौतमबुद्धनगर जिले के गांव चिरौली के किसान रतन सिंह ने भी व्यापारी को 50 क्विंटल गेहूं 1,150 से 1,175 रुपये की दर से बेचा। सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं में नमी, बारदाने की कमी और कागजात के बहाने परेशान किया जा रहा है। (Business Bhaskar...R S Rana)

कपास निर्यात से निराश

अमेरिका के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक देश है। फिर भी सरकार द्वारा बिना किसी प्र्रतिबंध के कपास के निर्यात की स्वीकृति से इस साल देश का कपास आयात बढ़कर नई ऊंचाई पर पहुंच सकता है। सरकार ने सोमवार को कपास निर्यात को स्वीकृति दे दी है। इसके पीछे सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को उनकी उपज का अच्छा पैसा मिलेगा।
हालांकि कपास के आयात की मात्रा कपड़ा मिलों की कमजोर सीजन में मांग पर निर्भर करेगी लेकिन भारतीय कपड़ा उद्योग संघ (कनफेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री, सिटी) का मानना है कि घरेलू बाजार में कपास की कम उपलब्धता से इस जिंस का आयात बढ़ेगा। पिछले कपास सीजन में कुल आयात 6 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलोग्राम) दर्ज किया गया, जो इससे पिछले सीजन में 5 लाख गांठ रहा था। सिटी के महासचिव डी के नायर के अनुसार भारत को कुछ महीनों खासतौर से कमजोर सीजन के दौरान मांग के बराबर कपास आयात करना पड़ेगा। केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के तहत काम करने वाले कपास सलाहकार बोर्ड (कैब) द्वारा हाल में जुटाए  गए आंकड़ों के अनुसार देश में इस कपास सत्र के दौरान कुल कपास उपभोग 2.52 करोड़ गांठ रह सकता है जो पिछले कपास सत्र में 2.62 करोड़ गांठ था। इसका अर्थ यही है कि घरेलू कपड़ा उद्योग को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए औसतन 20 लाख गांठ कपास का आयात करना होगा।
उद्योग जगत के अनुमान के अनुसार देश में कपास का आयात वर्ष 2002-03 के 25 लाख गांठ के रिकॉर्ड को पार कर सकता है। कपड़ा मिलों की एक स्थानीय इकाई मिल मालिक संघ के महासचिव वी वाई ताम्हाणे ने कहा, 'पिछले कुछ अरसे से रुपये में आ रही कमजोरी को देखते हुए आयातित कपास देश से निर्यातित होनेे वाले कपास से भी महंगा रहेगा। इस तरह न केवल कपास और धागे की कीमत बढ़ेगी बल्कि तैयार परिधानों के दाम भी चढ़ेंगे।' इस बीच सिटी ने सरकार से गुहार लगाई है कि वह अपने फैसले को वापस ले और कपास निर्यात के नए प्रस्तावों पर विचार न करे। 
घरेलू कपड़ा उद्योग पर इसके प्रतिकूल प्रभावों से आशंकित सिटी के अध्यक्ष एस वी अरुमुगम ने कहा कि देश में निर्यात योग्य अधिशेष की स्थिति नहीं है इसलिए सरकार को तुरंत प्रभाव से चालू सत्र के फसल उत्पादन के निर्यात पर रोक लगानी चाहिए। कैब ने इस कपास सत्र में कपास का कुल क्लोजिंग स्टॉक 25 लाख गांठ रहने का अनुमान लगाया है जबकि मंत्रियों के समूह ने शुरुआत में इसके लिए 50 लाख गांठ का स्तर तय किया था। इससे पहले कैब ने निर्यात के लिए भी 84 लाख गांठों के अधिशेष का अनुमान लगाया था। (BS Hindi)

डिलिवरी डिफॉल्ट पर आधा हुआ जुर्माना

नैशनल कमोडिटी ऐंड डेरिवेटिव एक्सचेंज (एनसीडीईएक्स) ने कारोबारियों को राहत देते हुए कीमतों के लिहाज से संवेदनशील कुछ जिंसों के मामले में डिलिवरी डिफॉल्ट (ग्राहक को माल मुहैया करा पाने में नाकाम) पर जुर्माने की दर कम की है। एक्सचेंज का यह प्रावधान मई 2012 के निपटान अनुबंधों से लागू होगा। सोमवार को जारी परिपत्र में एक्सचेंज ने स्पष्ट किया है कि चना, काली मिर्च, सरसों की डिलिवरी डिफॉल्ट पर लगने वाले 3 फीसदी जुर्माने को कम करके 1.5 फीसदी कर दिया गया है। 
इसके अतिरिक्त एक्सचेंज अंतिम निपटान कीमत (एफएसपी) और अनुबंध के निपटान के अगले पांच दिनों की हाजिर कीमत के तीन दिनों के सर्वोच्च स्तर के औसत में यदि औसत कीमत एफएसपी से ज्यादा पाता है तो वह इस अंतर की रकम को भी वसूलेगा। इससे उलट स्थिति में एक्सचेंज कुछ नहीं लेगा। एक विश्लेषक ने कहा कि एक्सचेंज द्वारा डिलिवरी डिफॉल्ट पर जुर्माना कम करने से कारोबारी कीमतों के लिहाज से बेहद संवेदनशील इन जिंसों में अधिक डिफॉल्ट करने के लिए प्रेरित होंगे ताकि वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बना सकें। इस प्रकार जो 1.5 फीसदी का जुर्माना वसूला जाएगा उसे निवेशक संरक्षण कोष (आईपीएफ) में हस्तांतरित किया जाएगा। इसके कुछ हिस्से से खरीदार को होने वाले नुकसान की भरपाई की जाएगी और शेष एक्सचेंज के पास रहेगा। हर्जाने का 0.75 फीसदी हिस्सा आईपीएफ में हस्तांतरित किए जाने की योजना बनाई जा रही है जिसका 0.50 फीसदी हिस्सा खरीदार को माल न मिलने की सूरत में नुकसान के तौर पर दिया जाएगा। शेष 0.25 फीसदी राशि बतौर प्रशासनिक खर्च एक्सचेंज के पास रहेगी। डिलिवरी डिफॉल्ट पर जुर्माने में तीन साल बाद संशोधन किया गया। सितंबर 2008 में एक्सचेंज ने चना, काली मिर्च और आरएम सीड सहित सभी जिंसों के अनिवार्य निपटान अनुबंधों में डिलिवरी डिफॉल्ट की स्थिति में 3 फीसदी का जुर्माना तय किया था। (BS Hindi)

दलहन, तिलहन का बढ़े समर्थन!

अनाज के बजाय तिलहन और दलहन के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने इन फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने की सिफारिश की है। आयोग ने खरीफ सत्र में बोए जाने वाले सोयाबीन, मूंगफली, मूंग, उड़द और अरहर के एमएसपी में खासा इजाफा करने की सिफारिश की है।
गहन विचार-विमर्श के बाद जारी की गई इन सिफारिशों को अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट के पास भेजा जाएगा। कैबिनेट के पास इन सिफारिशों में बदलाव करने का अधिकार है। आयोग ने चालू विपणन वर्ष के दौरान बिना भूसी के चावल का एमएसपी 15.7 फीसदी बढ़ाकर 1,250 रुपये प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की है। धान के एमएसपी में महज 5.5 फीसदी इजाफे की सिफारिश पर सफाई देते हुए आयोग ने कहा कि मांग से ज्यादा आपूर्ति होने की हालत में लागत पर 5.5 फीसदी और व्यय पर 47 फीसदी के मार्जिन को देखते हुए इसके एमएसपी में कुल 15.7 फीसदी का इजाफा किया गया है, जो ठीक है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम भुगतान के अनुसार 2011-12 के दौरान भारत का चावल उत्पादन 7.74 फीसदी बढ़कर रिकॉर्ड 10.34 करोड़ टन होने की
उम्मीद है। ज्यादा उत्पादन और खरीद से सरकारी एजेंसियों के गोदाम भरे पड़े हैं।
एक अनुमान के अनुसार 1 अप्रैल तक भारत का अनाज भंडार 5.3 करोड़ टन था, जो बफर और रणनीतिक भंडार नियमों के तहत रखे जाने वाले अनाज की मात्रा से 151 फीसदी ज्यादा है। तिलहन में आयोग ने मूंगफली के एमएसपी में 37 फीसदी, तिल के लिए 23.5 फीसदी, सूरजमुखी के लिए 32 फीसदी और सोयाबीन के लिए 33 फीसदी इजाफा किया है। आयोग ने कहा है कि खाद्य तेलों के आयात पर व्यय देखते हुए इन तिलहनों का एमएसपी सबसे ज्यादा बढ़ाने की दरकार है। हर साल करीब 30,000 करोड़ रुपये मूल्य के खाद्य तेलों का आयात किया जाता है।
एमएसपी इन जिंसों की लागत और उत्पादकों के लिए थोड़ा मार्जिन कवर करता हैं। लेकिन यह देसी और अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव पर भी निर्भर करता है। आयोग ने दलहनों पर भी ध्यान देने की बात कही। कपास के लिए एमएसपी में 28.5 से 18 फीसदी इजाफा करने पर आयोग ने कहा है कि रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद  देश में कपास का भंडार कम है। इसलिए इसका उत्पादन और बढ़ाने की जरूरत है। हालांकि इस बारे में सीएसीपी के चेयरमैन अशोक गुलाटी से कई बार कोशिश के बावजूद बात नहीं हो पाई। (BS Hindi)