कुल पेज दृश्य

29 नवंबर 2022

मिलों की खरीद कमजोर होने से कॉटन मंदी, अपेक्षा के अनुसार नहीं बढ़ रही है कपास की आवक

नई दिल्ली। स्पिनिंग मिलों की खरीद कमजोर के कारण से सोमवार को कॉटन की कीमतों में गिरावट आई। गुजरात की अहमदाबाद मंडी में सोमवार को शंकर-6 किस्म की कॉटन के दाम 700 रुपये कमजोर होकर 67,300 से 67,600 रुपये प्रति कैंडी, एक कैंडी-356 किलो रह गए।


उत्तर भारत के राज्यों पंजाब में कॉटन के भाव 100 रुपये घटकर 6650 से 6700 रुपये प्रति मन रह गए, जबकि हरियाणा में इसके दाम 100 रुपये नरम होकर 6500 से 6600 रुपये प्रति मन के स्तर पर आ गए। इस दौरान अपर राजस्थान में कॉटन की कीमतें 75 रुपये कमजोर होकर 6725 से 6800 रुपये प्रति मन रह गई।

व्यापारियों के अनुसार उत्पादक मंडियां में कपास की आवक बढ़ने के बजाए कम हो गई, जिस कारण देशभर की 45 से 50 फीसदी जिनिंग मिलें पूरी उत्पादन क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रही है। रुई में भी स्थानीय एवं निर्यात मांग कमजोर है, जिस स्पिनिंग मिलों को भी पड़ते नहीं लग रहे हैं। अत: स्पिनिंग मिलें भी केवल जरुरत के हिसाब से कॉटन की खरीद कर रही हैं।  

जानकारों के अनुसार कॉटन के बाजार में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। चालू सीजन में उद्योग का अनुमान है कि कपास का उत्पादन बढ़कर 344 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो होने का अनुमान है। हालांकि उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी के बावजूद भी देशभर की मंडियों में कपास की दैनिक आवक उम्मीद के अनुसार बढ़ नहीं पा रही है। पिछले दिनों उत्पादक राज्यों में कपास की दैनिक आवक बढ़कर करीब सवा लाख गांठ, की हो गई थी, लेकिन सोमवार को इसकी आवक घटकर एक लाख बोरियों से भी कम हुई। व्यापारियों के अनुसार पिछले साल किसानों ने कपास का ऊंचा भाव देखा था, जिस कारण नीचे दाम पर बिकवाली नहीं कर रहे हैं। ऐसे में घरेलू बाजार में कॉटन की कीमतों में अभी सीमित तेजी, मंदी बनी रहने का अनुमान है।

आईसीई के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग में सोमवार कॉटन के दाम कमजोर हुए। दिसंबर महीने के वायदा अनुबंध में इसके भाव 48 प्वाइंट घटकर 80.86 सेंट रह गए, जबकि मार्च-23 वायदा अनुबंध में इसकी कीमतों में 191 प्वाइंट की गिरावट आकर दाम 78.27 सेंट रह गए। घरेलू वायदा बाजार में एमसीएक्स पर नवंबर महीने के वायदा अनुबंध में कॉटन की कीमतों में 260 रुपये की गिरावट आकर भाव 32,400 रुपये प्रति गांठ रह गए। एनसीडीईएक्स पर अप्रैल-23 महीने के वायदा अनुबंध में कॉटन के दाम 2.63 फीसदी कमजोर हुए। 

चालू रबी में गेहूं के साथ ही तिलहनी फसलों की बुआई ज्यादा, कुल बुआई 7.21 फीसदी आगे

नई दिल्ली। चालू रबी सीजन में फसलों की बुआई जोरो पर चल रही है, तथा अभी तक कुल बुआई 7.21 फीसदी बढ़कर 358.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक 334.46 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी। गेहूं के साथ ही तिलहनी फसलों की बुआई में बढ़ोतरी हुई है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में 25 नवंबर तक रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की बुआई बढ़कर 152.88 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 138.35 लाख हेक्टेयर में तुलना में आगे चल रही है।

चालू रबी में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 75.77 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 66.71 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। रबी तिलहन की प्रमुख फसल सरसों की बुआई चालू रबी में बढ़कर 70.89 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक केवल 61.96 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। हालांकि मूंगफली की बुआई चालू रबी में घटकर 1.80 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसी बुआई 2.10 हेक्टेयर में ही हुई थी। सफ्लावर, सनफ्लावर और असली की बुआई क्रमशः 42 हजार, 38 हजार एवं 2.06 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है।

दलहन की बुआई चालू रबी में थोड़ी घटकर 94.26 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 94.37 लाख हेक्टेयर हो चुकी थी। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुआई चालू रबी में 67.14 हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 66.91 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। अन्य दालों में मसूर की 11.23 लाख हेक्टेयर में, एवं मटर की 6.35 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले रबी सीजन में इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 10.83 और 7.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। उड़द की बुआई चालू रबी में 2.45 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 2.56 लाख हेक्टेयर में हुई थी। मूंग की बुआई चालू रबी में 47 हजार हेक्टेयर में हो चुकी है।

मोटे अनाजों की बुआई चालू रबी में घटकर 26.54 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 26.70 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। रबी में मक्का की बुआई 6.45 लाख हेक्टेयर में और ज्वार की 15.12 लाख हेक्टेयर में तथा रागी की 31 हजार हेक्टेयर हो चुकी है। पिछले रबी सीजन की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 5 लाख हेक्टेयर में 17.55 लाख हेक्टेयर में और 28 हजार हेक्टेयर में ही हुई थी। जौ की बुआई चालू रबी में 4.54 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 3.75 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।

धान की रोपाई चालू रबी में 9.14 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 8.33 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है।

क्रूड पाम तेल एवं आरबीडी पामोलीन के आयात शुल्क में अंतर 15 फीसदी करने की मांग - उद्योग

नई दिल्ली। घरेलू रिफाइनिंग उद्योग के हितों के लिए उद्योग ने केंद्र सरकार से क्रूड पाम तेल, सीपीओ एवं आरबीडी पामोलीन के आयात शुल्क को बढ़ाकर 15 फीसदी करने की मांग की है।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) ने खाद्य मंत्री पीयूष गोयल को लिखे पत्र में कहा है कि घरेलू रिफाइनिंग उद्योग के लिए क्रूड पाम तेल और आरबीडी पामोलिन के बीच शुल्क अंतर को बढ़ाकर 15 फीसदी तक करने का अनुरोध किया।

एसईए ने खाद्य मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि क्रूड पाम तेल और आरबीडी पामोलिन के बीच शुल्क का अंतर इस समय केवल 7.5 फीसदी है, जिससे क्रूड पाम तेल के बजाए, आरबीडी पामोलीन का आयात ज्यादा मात्रा में हो रहा है। इसका सीधा फायदा मलेशिया और इंडोनेशिया की रिफाइनिंग उद्योग को रहा है। आरबीडी पामोलीन के आयात पर इस समय आयात शुल्क 12.5 फीसदी है, जिसे बढ़ाकर 20 फीसदी किया जाए, साथ ही क्रूड पाम तेल के आयात शुल्क को ज्यों का त्यों रखा जाएं।

उद्योग ने लिखा है कि क्रूड पाम तेल और आरबीडी पामोलीन के आयात शुल्क में 15 फीसदी का अंतर करने से आरबीडी पामोलीन के बजाए क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी होगी, जिससे  घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को फायदा होगा।

एसईए के अनुसार तेल वर्ष 2021-22 के नवंबर-21 से अक्टूबर-22 के दौरान देश में क्रूड पाम तेल का आयात 5,994,346 टन का हुआ है, जबकि इस दौरान आरबीडी पामोलीन का आयात 1,840,540 टन का हुआ है। इसके पिछले तेल वर्ष 2020-21 के नवंबर-20 से अक्टूबर-21 के दौरान क्रूड पाम तेल का आयात 7,491,193 टन का हुआ था, जबकि इस दौरान आरबीडी पामोलीन का आयात केवल 686,340 टन का ही हुआ था।

ओएमएसएस के तहत केंद्र सरकार की गेहूं देने की योजना नहीं - खाद्य सचिव

नई दिल्ली। घरेलू बाजार में गेहूं की कीमतें भले ही रिकॉर्ड स्तर पर चल रही हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने कहां है कि खुले बाजार बिक्री योजना, ओएमएसएस के तहत गेहूं देने की कोई योजना नहीं है।


केंद्रीय खाद्य सचिव ने बुधवार को कहां कि हम गेहूं की कीमतों पर निगरानी रखे हुए हैं, तथा सरकार की ओएमएसएस के तहत गेहूं देने की अभी कोई योजना नहीं है।

दिल्ली की लारेंस मंडी में आज मध्य प्रदेश के गेहूं के भाव बढ़कर 2860 रुपये और राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के भाव तेज होकर 2880 रुपये प्रति क्विंटल हो गए, जबकि इसकी दैनिक दैनिक आवक करीब 5,500 बोरियों की हुई।

जानकारों के अनुसार हाजिर बाजार में गेहूं का बकाया स्टॉक कम है, जबकि नई फसल की आवक फरवरी, मार्च में शुरू होगी। ऐसे में गेहूं की मौजूदा कीमतों में आगामी दिनों में और भी तेजी आने का अनुमान है।

भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई के अनुसार केंद्रीय पूल में पहली नवंबर 2022 को गेहूं का बकाया स्टॉक 210.46 लाख टन का बचा हुआ है, जबकि इसके पिछले साल की समान अवधि में बकाया स्टॉक 419.81 लाख टन था। तय मानकों के अनुसार पहली अक्टूबर को गेहूं का बफर स्टॉक 175.20 लाख टन तथा 30 लाख टन के रिजर्व को मिलाकर गेहूं का कुल स्टॉक 205.2 लाख टन का होना चाहिए।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में 18 नवंबर तक रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की बुआई बढ़कर 101.49 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 88.46 लाख हेक्टेयर में तुलना में आगे चल रही है।

राजस्थान में चालू खरीफ में 105.83 लाख टन खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान

नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन 2022-23 में राजस्थान में 105.83 लाख टन खाद्यान्न का उत्पादन होने का अनुमान है। राज्य के कृषि निदेशालय द्वारा जारी पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार राज्य में बाजरा का उत्पादन 51.53 लाख टन होने का अनुमान है।

अन्य फसलों में चावल का उत्पादन चालू खरीफ में 6.61 लाख टन, ज्वार का 6.13 लाख टन एवं मक्का का उत्पादन 21.41 लाख टन होने का अनुमान है।

खरीफ दलहन की प्रमुख फसल मूंग का उत्पादन राज्य में 13.21 लाख टन, मोठ का 3.73 लाख टन, उड़द का 2.55 लाख टन एवं छौला का उत्पादन 53,082 टन होने का अनुमान है।

तिलहनी फसलों में मूंगफली का उत्पादन चालू खरीफ में राज्य में 19.91 लाख टन, कैस्टर सीड का 2.58 लाख टन, शीशम 1.10 लाख टन और सोयाबीन का उत्पादन 16.81 लाख टन होने का अनुमान है।

अन्य फसलों में चालू खरीफ में राज्य में कपास का उत्पादन 28.97 लाख गांठ, एक गांठ-170 किलो का उत्पादन होने का अनुमान है। इसी तरह से राज्य में ग्वार सीड का उत्पादन 14.27 लाख टन होने का अनुमान है। 

19 नवंबर 2022

मंडियों में जीरी की आवक घटी

गौरतलब है मंडियों में धान की आवक और क्वालिटी दोनों घटने लगी है जिस कारण कल भी जीरी में 100 से 200 की तेज़ी देखी गई।पहले ही धान कम है और बाहर ऑर्डर अधिक होते दिखाई दे रहे हैं और चावल के दाम और बढ़ा कर मांग रहे हैं।

जिस कारण 1509 जीरी 3800 व्हाइट सेला 6800 गोल्डन 7400 रंग वाला गोल्डन 7100 स्टीम 7700 तक बिक रही है।वहीं सुगंधा जीरी 3100 ताज जीरी 3000 तक उत्तरप्रदेश की मंडियों में ही बिक गई।और चावल 6000 सेला में भी इनका बिकवाल फिलहाल नहीं है।वहीं rh 10 सेला 5100 और गोल्डन 5400 तक बिक गया।

बासमती जीरी 5800 तक हरियाणा की मंडियों में बिक गई 1401 4000 से 4100 और पीबी1 3900 तक मंडियों में बिकने लगी।अभी बाहर और तेज़ी की उम्मीद है क्योंकि भारत और अन्य देशों में माल की कमी बनी हुई है।

व्हाइट गोल्ड @ 9000 पार; किसानों के पास कपास है लेकिन कहां?

क्षेत्र में कपास और सोयाबीन नकदी फसलें हैं। किसान मुख्य रूप से इन्हीं फसलों पर निर्भर हैं। फसलों के बढ़ते मौसम के दौरान क्षेत्र में अधिकांश स्थानों पर अगस्त और सितंबर में भारी बारिश हुई थी। इसके अलावा, बादल छाए रहेंगे, धूप की कमी, खेतों में पानी भर गया, फसलों की वृद्धि रुक ​​गई। कपास पीली पड़ गई। कीट व रोग के प्रकोप के कारण उत्पादन में कमी आई है।



किशोर मोकलकर लोकमत न्यूज नेटवर्क अस्सेगाँव पूर्णा : इस समय शिवरा में कपास की तुड़ाई का काम चल रहा है। हालांकि किसानों को राहत मिली है क्योंकि यह सफेद सोना वर्तमान में गांव की खरीद में नौ हजार दो सौ रुपये प्रति क्विंटल की दर से मिल रहा है, लेकिन आपूर्ति कम होने से किसानों की चिंता बढ़ गई है. कारोबारी सूत्रों ने बताया कि जनवरी के बाद दाम बढ़ने की संभावना है। पिछले सीजन में अब तक की सबसे ज्यादा कीमत मिली थी। इसलिए इस साल कपास का रकबा बढ़ा है। हालांकि भारी बारिश के कारण कपास की पैदावार में 50 से 60 फीसदी की कमी आ रही है। उत्पादन घटने से निर्माता 'कहीं खुशी, कहीं गम' की स्थिति में आ गए हैं. क्षेत्र में कपास और सोयाबीन नकदी फसलें हैं। किसान मुख्य रूप से इन्हीं फसलों पर निर्भर हैं। फसलों के बढ़ते मौसम के दौरान क्षेत्र में अधिकांश स्थानों पर अगस्त और सितंबर में भारी बारिश हुई थी। इसके अलावा, बादल छाए रहेंगे, धूप की कमी, खेतों में पानी भर गया, फसलों की वृद्धि रुक ​​गई। कपास पीली पड़ गई। कीट और रोगों के प्रकोप के कारण उत्पादन में कमी आई है।दिवाली की पृष्ठभूमि में कपास की तुड़ाई शुरू हुई, लेकिन कपास की उपज प्रति एकड़ दो से तीन क्विंटल कपास थी। कई गांवों में बारिश से हुई क्षति के कारण उन गांवों को सरकारी मदद नहीं मिली.



निकासी घटी, कुछ क्षेत्र जहां आवक नहीं बढ़ी, जहां सीतादई हो रही है। बोंड को बॉलवर्म ने क्षतिग्रस्त कर दिया है। भाव दस रुपए किलो तक हो गए, फिर भी लेबर नहीं मिल रही, कुछ इलाकों में दो हफ्ते में उलंगवाड़ी आने की संभावना है। जब दाम बढ़ रहे हैं, किसानों के घरों में कपास नहीं है, गांवों में लूट जारी है.


किसानों का बजट चरमरा गया, सरकारी मदद पाने के लिए भारी बारिश से प्रमुख फसलों का उत्पादन घटा. बीज, रोपण, छिड़काव, कटाई की लागत को देखते हुए उत्पादन लागत कम नहीं होगी। नतीजतन, इस साल किसानों का वित्तीय बजट चरमरा गया है। विरुल पूर्णा के किसान सुमीत बोबडे ने लोकमत से बात करते हुए कहा कि इसलिए सरकार को बारिश से हुए नुकसान के लिए राहत राशि देनी चाहिए और फसल बीमा का लाभ मिलना चाहिए.



इसी सप्ताह सीतदई हुई, बारिश से कपास को भारी नुकसान हुआ है। उसे भी सुंडी ने क्षतिग्रस्त कर दिया। खरीद भी बढ़ी गांवों में खरीद मूल्य बढ़ने के बावजूद किसानों के पास कपास नहीं है। एक बड़ी निराशा है।- रावसाहेब खंडारे, किसान