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28 फ़रवरी 2018

खाद्यान्न का रिकार्ड 27.74 करोड़ टन उत्पादन का अनुमान, गेहूं में कमी की आशंका

आर एस राणा
नई दिल्ली। फसल सीजन 2017-18 में दलहन के साथ ही कुल खाद्यान्न का रिकार्ड उत्पादन होने का अनुमान है लेकिन गेहूं के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार खाद्यान्न का उत्पादन 27.74 करोड़ टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2016-17 में उत्पादन 27.51 करोड़ टन का हुआ था।
भले ही दलहनों की कीमतें उत्पादक मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बनी हुई है लेकिन फसल सीजन 2017-18 में दालों का रिकार्ड उत्पादन 239.5 लाख टन होने का अनुमान है जबकि फसल सीजन 2016-17 में दालों का 231.3 लाख टन का हुआ था। दलहन की प्रमुख फसल चना का उत्पादन चालू रबी में रिकार्ड 111 लाख टन होने का अनुमान है। अरहर का उत्पादन 40.2 लाख टन और मूंग का उत्पादन 32.3 लाख टन होने का अनुमान जारी किया है।
मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार बुवाई में आई कमी से गेहूं का उत्पादन फसल सीजन 2017-18 में घटकर 971.1 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल गेहूं का 985.1 लाख टन का रिकार्ड उत्पादन हुआ था। चावल का उत्पादन भी फसल सीजन 2017-18 में रिकार्ड 11.10 करोड़ टन होने का अनुमान है। मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़कर 454.2 लाख टन होने का अनुमान है। इसमें मक्का का उत्पादन रिकार्ड 271.4 लाख टन होने का अनुमान है।
दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2017-18 में तिलहनों का उत्पादन 298.8 लाख टन होने का अनुमान है जोकि पिछले साल के 312.8 लाख टन से कम है। तिलहन की प्रमुख फसल सोयाबीन का उत्पादन 113.9 लाख टन, मूंगफली का उत्पादन 82.2 लाख टन और केस्टर सीड का उत्पादन 15 लाख टन होने का अनुमान है। 
कपास का उत्पादन चालू फसल सीजन में 339.2 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) होने का अनुमान है जबकि पिछले साल कपास का उत्पादन 325.8 लाख गांठ का हुआ था। गन्ने का उत्पादन चालू सीजन में 3,532.3 लाख टन होने का अनुमान है। ...............  आर एस राणा

उत्तर प्रदेश में 70 लाख टन से ज्यादा हो चुका है चीनी उत्पादन

आर एस राणा
नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2017 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2017—18 में उत्तर प्रदेश में चीनी का उत्पादन बढ़कर 70.43 लाख टन का हो चुका है जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में इसका उत्पादन केवल 59.57 लाख टन का ही हुआ था। 
यूपी शुगर मिल्स एसोसिएशन (यूपीएसएमए) के अनुसार चालू पेराई सीजन में गन्ने में रिकवरी की दर बढ़कर औसतन 10.44 फीसदी की आ रही है जबकि पिछले पेराई सीजन में औसत रिकवरी 10.19 फीसदी की ही आ ​रही थी। राज्य में 119 चीनी मिलों में पेराई चल रही है जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में केवल 116 चीनी मिलों में ही पेराई चल रही थी।  .....   आर एस राणा

केस्टर सीड का उत्पादन 35 फीसदी बढ़ने का अनुमान —एसईए

आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू फसल सीजन 2017—18 में केस्टर सीड के उत्पादन में 35 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल उत्पादन 14.30 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसका उत्पादन 10.6 लाख टन का ही हुआ था। 
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू सीजन में केस्टर सीड की बुवाई में बढ़ोतरी होने के साथ ही प्रति हैक्टेयर उत्पादकता भी ज्यादा होने का अनुमान है। फसल सीजन 2017—18 में केस्टर सीड की बुवाई 2.9 फीसदी बढ़कर 8.22 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इसकी बुवाई 8 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। चालू सीजन में प्रति हैक्टेयर उत्पादकता 1,738 किलोग्राम होने का अनुमान है।
एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2017—18 के पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान केस्टर तेल का निर्यात बढ़कर 5.20 लाख टन का हो चुका है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2016—17 की समान अव​धि में इसका निर्यात 4.51 लाख टन का ही हुआ था। वित्त वर्ष 2016—17 के दौरान केस्टर तेल का कुल निर्यात 5.56 लाख टन का हुआ था। 
उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की नई फसल की आवक बढ़ रही है, तथा मंडियों में इसके भाव 4,000 से 4,100 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। उद्योग ने उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है जिससे इसकी कीमतों में आगे गिरावट बन सकती है।  ...... 
आर एस राणा

केंद्र सरकार गेहूं पर आयात शुल्क को करेगी दोगुना

आर एस राणा
नई दिल्ली। गेहूं किसानों को उचित भाव दिलाने के लिए केंद्र सरकार इसके आयात शुल्क को 20 फीसदी से बढ़ाकर 40 फीसदी करने पर जल्द फैसला ले सकती हैं। हालांकि इस समय गेहूं के आयात सौदे नहीं हो रहे हैं, लेकिन नई फसल की आवक को देखते हुए केंद्र सरकार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। 

सूत्रों के अनुसार कृषि मंत्रालय ने आयात शुल्क को 20 फीसदी से बढाकर 40 फीसदी करने का प्रस्ताव किया हुआ है। हालांकि चालू रबी में गेहूं की बुवाई में आंशिक कमी आई है लेकिन उत्पादक राज्यों में अभी तक अनुकूल रहा है, तथा फसल की स्थिति अच्छी ​है। गुजरात और महाराष्ट्र में नई फसल की आवक चालू हो गई है, जबकि मार्च में मध्य प्रदेश और राजस्थान में आवक बन जायेगी।

आयातित गेहूं सस्ता

सूत्रों के अनुसार इस समय गेहूं के आयात सौदे नहीं हो रहे हैं, लेकिन दक्षिण भारत के राज्यों में करीब तीन से चार लाख टन आयातित गेहूं का स्टॉक है जबकि अप्रैल में घरेलू मंडियों में गेहूं की नई फसल की आवकों का दबाव बन जायेगा। विश्व बाजार में गेहूं के भाव नीचे बने हुए हैं, ऐसे में माना जा रहा है कि अगर आयात शुल्क में बढ़ोतरी नहीं की गई तो फिर आगे और आयात होने की आशंका है। तुतीकोरन बंदरगाह पर यूक्रेन से आयातित गेहूं के भाव 1,870 से 1,880 रुपये और आस्ट्रेलियाई गेहूं के भाव 2,000 से 2,050 रुपये प्रति क्विंटल है। जबकि उत्तर प्रदेश से बंगलुरु पहुंच गेहूं सौदे 2,075 से 2,100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हो रहे है।

आयात में आई कमी

चालू वित्त वर्ष 2017-18 के पहले 9 महीनों अप्रैल से दिसंबर के दौरान 15.55 लाख टन गेहूं का आयात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2016—17 की समान अवधि में 20 लाख टन का आयात हुआ था। वित्त वर्ष 2016-17 में गेहूं का कुल आयात 57.49 लाख टन का हुआ था। केंद्र सरकार ने 9 नवंबर 2017 को गेहूं के आयात शुल्क में 10 फीसदी की बढ़ोतरी कर शुल्क 20 फीसदी कर दिया था जबकि मार्च 2017 में गेहूं के आयात पर 10 फीसदी का आयात शुल्क लगाया था।

एमएसपी से नीचे बिक रहा है गेहूं

रबी विपणन सीजन 2018-19 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,735 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है जबकि उत्पादक राज्यों की मंडियों में गेहूं का भाव 1,650 से 1,725 रुपये प्रति क्विंटल है।

गेहूं की बुवाई में आई कमी

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई 304.29 लाख हैक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 317.88 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी। मंत्रालय ने चालू रबी 2017-18 फसल सीजन में गेहूं के उत्पादन का लक्ष्य 975 लाख टन का रखा है जबकि फसल सीजन 2016-17 में गेहूं का उत्पादन 983.8 लाख टन का हुआ था।

एमएसपी पर 320 लाख टन खरीद का लक्ष्य

चालू रबी विपणन सीजन 2018—19 में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 320 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन में 308.24 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी। जबकि खरीद का लक्ष्य 330 लाख टन का था।

एमएसपी में बढ़ोतरी
पहली अप्रैल से शुरू होने वाले चालू रबी विपणन सीजन 2018—19 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 1,735 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन में एमएसपी 1,625 रुपये प्रति क्विंटल था। ...............  आर एस राणा

कॉन्ट्रेक्ट खेती के लिए किसान और कंपनी आॅनलाइन कर सकेंगे समझौता

आर एस राणा
किसानों की आय बढ़ाने को लेकर गंभीर केंद्र सरकार हर वह कदम उठा रही है, जिससे खेती मुनाफे का सौदा साबित हो। इसीलिए केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट खेती अधिनियम ड्राफ्ट पर हितधारकों से सुझाव मांगे है।
केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट खेती अधिनियम के नए ड्राफ्ट में जहां किसानों के हितों की रक्षा पर बल दिया है, वहीं कं​पनियों के लिए भी नियम उदार बनाने पर जोर दिया है। उप—कृषि विपणन सलाहकार और समिति के सदस्य सचिव डॉ. एस के सिंह ने आउटलुक को बताया कि ​नए ड्राफ्ट के अनुसार कंपनी और किसान सीधे अनुबंध कर सकेंगे, इसके लिए कहीं रजिस्ट्रशन या कोई डाक्यूमेंट जमा कराने की जरुरत नहीं होगी। इस अनुबंध को पूरी तरह से पारदर्शी बनाने के लिए आॅन​—लाईन प्रावधान किया जायेगा। इसके अलावा किसान और कंपनी किसी भी एग्री जिंस, डेयरी या पोल्ट्र उत्पादों में अनुबंध कर सकेंगे। केंद्र सरकार केवल उन्हीं एग्री जिंसो की एक लिस्ट जारी करेगी, जिन एग्री जिंसों को राज्य सरकार ने अपने यहां उगाने पर प्रतिबंध कर रखा है।

एपीएमएसी एक्ट से होगा बाहर

उन्होंने बताया कि कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम को इससे पूरी तरह से अलग रखा गया है। विवादों के निपटारे पर उन्होंनें बताया कि किसान और कंपनी के बीच में अनुबंध के अवसर पर किसान किसी को भी अनुबंध में रख सकता है, जैसे कि गांव के सरपंच या ​फिर नम्बरदार या अन्य किसी भी व्यक्ति को। अगर यहां भी विवाद का हल नहीं होता है तो फिर 3 सदस्यों की एक कमेटी बनाई जायेगी, जिसमें एक सदस्य किसान की तरफ से होगा, दूसरा कंपनी की तरफ से होगा, तथा तीसरा सदस्य इन दोंनो से अलग होगा, लेकिन इस विषय का जानकार होगा।

उन्होंने बताया कि कॉन्ट्रैक्ट खेती अधिनियम के नए ड्राफ्ट में बहुत से बदलाव किए गए है, तथा हितधारकों से सुझाव मांगे गए हैं, अत: व्यवा​हरिक सुझाव आने पर उसको भी इसमें शामिल किया जायेगा।

मॉडल भाव से 10 फीसदी अधिक कीमत पर होगा अनुबंध

किसानों के हितों की रक्षा के लिए अनुबंध के समय आस—पास की मंडियों के मॉडल भाव से 10 फीसदी अधिक भाव पर अनुबंध होगा। अगर संबंधीत एग्री जिंस का व्यापार आसपास की मंडियों में नहीं होता है तो फिर होलसेल की मंडियों में सात दिन के भाव के आधार पर औसत कीमत तय की जायेगी, तथा उस पर 10 फीसदी और जोड़कर ही अनुबंध हो सकेगा।

फायदे या नुकसान में दोनों होंगे शामिल

एग्री जिंसों की कीमतों में भारी उठा—पटक होती रहती है, ऐसे में किसी एग्री जिंस में अनुबंध के समय जो भाव तय किया गया है, उसके बाद फसल की पकाई के उसमें बड़ी तेजी या फिर गिरावट आती है तो कंपनी के साथ ही किसान को भी मुनाफे और घाटे में शामिल होना होगा। अगर किसी प्राकृति आपदा से कोई नुकसान होता है, तो कंपनी का अनुबंध निरस्त माना जायेगा।

कई राज्यों में हो रही कॉट्रेक्ट खेती 

उन्होंने बताया कि इस समय महाराष्ट्र में 10 कंपनी किसानों से प्याज और अन्य फसलों की कॉन्ट्रैक्ट खेती करा रही है, इसके अलावा पंजाब में आॅन रिकार्ड कॉन्ट्रैक्ट खेती हो रही है। हरियाणा में 7 कंपनियां जौ और बासमती चावल की, गुजरात में 2 कंपनियां, मध्य प्रदेश, कर्नाटका तथा छत्तीसगढ़ में एक—एक कंपनी कॉन्ट्रैक्ट खेती कर रही है।

क्या है कॉन्ट्रैक्ट खेती?

कॉन्ट्रैक्ट खेती में किसान को पैसा नहीं खर्च करना पड़ता। खाद बीज से लेकर सिंचाई और मजदूरी सब खर्च कॉन्ट्रैक्टर के जिम्मे होता है। कॉन्ट्रैक्टर ही उसे खेती के गुर बताता है। कॉन्ट्रैक्ट खेती में उत्पादक और खरीदार के बीच कीमत पहले ही तय हो जाती है। फसल की क्वालिटी, मात्रा और उसकी डिलीवरी का वक्त फसल उगाने से पहले ही तय हो जाता है। 

कांट्रेक्ट खेती का मकसद है 

फसल उत्पाद के लिए तयशुदा बाज़ार तैयार करना। इसके अलावा कृषि के क्षेत्र में पूँजी निवेश को बढ़ावा देना भी कांट्रेक्ट खेती का उद्देश्य है।

क्या कहना है एक्सपर्ट का
विजय सरदाना, सदस्य, कमोडिटी डेरिवेटिव्स एडवायजरी कमेटी, सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड आॅफ इंडिया (सेबी)

के अनुसार कॉन्ट्रैक्ट खेती अधिनियम का ड्राफ्ट अच्छा है लेकिन इसमें थोड़ा और सुधार किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि ड्राफ्ट में बोर्ड बनाने की बात कहीं गई है, जिसकी तकनीकी तौर पर जरुरत नहीं है। कॉन्ट्रैक्ट खेती किसान और कंपनी के बीच का मामला है जबकि बोर्ड बनाने से इसमें सरकार का हस्तक्षेप बढ़ेगा। कॉन्ट्रैक्ट खेती में छोटे किसानों का समूह बनाकर उन्हें कंपनी से जोड़ने पर जोर दिया जाना चाहिए।.......  आर एस राणा

27 फ़रवरी 2018

पेस्टीसाइड्स प्रबंधन बिल-2017 पर सरकार ने हितधारकों से मांगे सुझाव

आर एस राणा
नई दिल्ली।  किसानों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार जोरशोर से प्रयास कर रही है। अत: प्रस्तावित पेस्टीसाइड्स प्रबंधन बिल-2017 पर कृषि मंत्रालय ने सभी ​हितधारकों से सुझाव मांगे है। हितधारकों को अपने सुझाव 15 दिन में देने होंगे।
देश में कृषि रसायनों मुख्य रूप से कीटनाशकों का सही उपयोग न होने के कारण हर वर्ष इनके कुप्रभाव से हजारों किसानों को अपने जीवन की बलि देनी पड़ती है। अत: किसानों के हितों की रक्षा के लिए ​कृषि मंत्रालय पेस्टीसाइड्स ​प्रबंधन बिल-2017 को संसद से पारित कराना चाहता है जो किसानों के हितों को पूर्ति करने वाला है। सूत्रों के अनुसार 11 जनवरी 2018 को केंद्रीय कृषि सचिव की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस बिल से संबं​धित सभी पहलुओं पर विचार कर इसका ड्राफ्ट तैयार किया है।
इस प्रस्तावित विधेयक में पेस्टीसाइड्स को नये सिरे से परिभाषित किया गया है। इसमें खराब गुणवत्ता, मिलावटी या हानिकारक कीटनाशकों के नियमन एवं अन्य मानदंड निर्धारित किये गए हैं।
देश में अभी भी बहुत से ऐसे पेस्टीसाइड्स हैं जो अत्यधिक जहरीले हैं। इनमें दो पेस्टीसाइड्स मोनोक्रोटोफॉस तथा आक्सीडेमेटान मिथाइल है जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा अत्यधिक विषैली श्रेणी (1 ए) में रखा गया है। देश के किसान अभी भी इनका उपयोग कर रहे हैं। मोनोक्रोटोफॉस पेस्टीसाइड्स विश्व के 60 देशों में प्रतिबंधित है। दूसरे पेस्टीसाइड्स जैसे फोरेट 37 देशों में, ट्राइजोफॉस 40 देशों में और फास्फोमिडान 49 देशों में प्रतिबंधित है परन्तु इनका उपयोग देश व प्रदेश में किसानों द्वारा बिना सोचे-समझे किया जा रहा है। जिसके कारण उन्हें इसका कुप्रभाव झेलना पड़ता है। बाजार में बिना रोक-टोक के उपलब्ध होने के कारण किसान इनका लगातार उपयोग कर रहे हैं।
साल 2016 में संसद के मानसून सत्र के दौरान पेस्टीसाइड्स प्रबंधन विधेयक 2008 को नए सिरे से चर्चा एवं पारित किये जाने के लिये कामकाज की सूची में शामिल किया गया था लेकिन यह पारित नहीं हो सका था। इससे पहले भी तत्कालीन संप्रग सरकार ने वर्ष 2008 में पेस्टीसाइड्स प्रबंधन विधेयक संसद में पेश किया था, लेकिन उस समय भी इसे पारित नहीं किया जा सका था। ...... आर एस राणा

ई-स्पाईस बाजार के माध्यम से किसान अपने मसालों की खुद करेंगे बिक्री

आर एस राणा
नई दिल्ली। मसाला किसान अपने उत्पादों की बिक्री के लिए खुद ही भाव तय कर सकेंगे, साथ ही ई-स्पाइस बाजार पर पंजीकृत खरीददार भी खरीद करने के लिए अपनी बोली लगा सकेंगे। मसाला बोर्ड द्वारा शुरू की गई ई-स्पाइस बाजार को आधिकारिक तौर पर आरंभ करते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि इसके तहत देशभर में उगाये जाने वाले सभी वाणिज्यिक मसालों को शामिल करके, मसालों के किसानों को विश्व बाजार में पहचान दिलाई जायेगी। इस अवसर पर आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू भी उपस्थित थे।
मसाला बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. ए जयतिलक ने कहा कि आंध्रप्रदेश के प्रकाशम और गुंटूर जिले और तेलंगाना के वारंगल और खम्मम में दो साल पहले शुरू की गई इस परियोजना में अब तक 53,000 मिर्च और हल्दी किसान शामिल हो चुके हैं। उन्होंने बताया कि इस परियोजना को अब डिजिटल स्वरुप प्रदान किया गया है और इसके लिए एक पोर्टल बनाया गया है। यह परियोजना इन दो राज्यों के 517 गांव के 47 मंडलों में किसानों तक पहुंची है। 
उन्होंने बताया कि इस परियोजना के तहत सभी मसालों के किसानों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए अलग-अलग ग्लोबल लोकेशन नंबर (जीएलएन) आवंटित किया गया है। इस पोर्टल में किसान और उनके खेत, फसल तथा कीटनाशकों और रसायनों के उपयोग के साथ-साथ फसल की कटाई के बाद उत्पादन की भी जानकारी है। किसान और किसानों के खेतों का सर्वेक्षण फील्ड को-आर्डिनेटर के द्वारा किया जाता है। 
उन्होंने बताया कि निर्यातकों को खरीद के लिए आवश्यक गुणवत्ता और विविधता के आधार पर खरीदादों को भी इस पोर्टल पर सूचीबद्व किया गया है। ई-स्पाइस बाजार मसालों के उत्पादन और निर्यात में शामिल सभी एजेंसियों को एक पलेटफार्म उपलब्ध करवाता है। इसके साथ ही किसानों को मसाला शोध संस्थानों के वैज्ञानिकों की सलाह से भी अवगत कराता है। 
इस परियोजना में किसान समूहों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन पर जोर दिया गया है। एफपीओ का गठन नाबार्ड और राज्यों के बागवानी विभागों द्वारा किया जा रहा है।........   आर एस राणा