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07 अप्रैल 2019

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाया पर ब्याज के भुगतान का रास्ता साफ

आर एस राणा
नई दिल्ली।  उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को बकाया पर ब्याज के भुगतान चीनी मिलों को करना होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने शपथ पत्र देकर गन्ने के बकाया पर ब्याज का भुगतान करने की बात मान ली है। राज्य के किसानों का बकाया पर ब्याज करीब 2,000 करोड़ रुपये था, जिसे सपा की तत्कालीन अखिलेश सरकार ने माफ कर दिया था।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन की याचिका पर आज इलाहाबाद हाईकोर्ट में राज्य के गन्ना आयुक्त संजय आर भूसरेड्डी ने हलफनामा देकर बकाया पर ब्याज देना स्वीकार कर लिया। हफलनामे के अनुसार राज्य की जो चीनी मिलें फायदे में हैं, वे किसानों को बकाया पर 12 फीसदी का ब्याज तथा जो चीनी मिलें घाटे में चल रही है उनको बकाया पर 7 फीसदी का ब्याज देना होगा।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वीएम सिंह ने आउटलुक को बताया कि यह राज्य के 42 लाख किसानों की जीत है। उन्होंने बताया कि 25 महीने बाद इस पर फैसला आया है, वह भी तब जब 5 फरवरी 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि राज्य सरकार दो महीने में 9 मार्च 2017 के आदेश का अनुपालन करें, नहीं तो गन्ना आयुक्त को जेल जाना पड़ेगा।
वीएम सिंह ने इस केस के कारण छोड़ा लोकसभा चुनाव 
इलाहाबाद हाईकोर्ट में 5 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई होनी थी, इसी को देखते हुए वीएम सिंह ने लोकसभा 2019 का चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए एक चुनाव तो क्या 10 चुनाव भी छोड़ने पड़े तो, छोड़ दूंगा। 
तत्कालीन अखिलेश सरकार ने ब्याज देने के फैसले को किया था रद्द
वीएम सिंह ने बताया कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाया भुगतान ब्याज समेत दिए जाने का आदेश दिया था जिसको तत्कालीन अखिलेश सरकार की कैबिनेट ने फैसला कर रद्द कर दिया था। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार द्वारा इस फैसले को रद्द करने से जहां राज्य के लाखों किसान प्रभावित हुए, वहीं किसानों के बकाया तत्काल भुगतान को रास्ता भी बंद हो गया, क्योंकि जब चीनी मिलों को ब्याज ही नहीं देना पड़ेगा, तो फिर भुगतान मिलें अपनी मर्जी से करेंगी।
राज्य के करीब 40-42 लाख किसान परिवारों का है बकाया
उन्होंने बताया कि राज्य के करीब 40 से 42 लाख किसान परिवारों का गन्ने का ब्याज बकाया है। अदालत ने साल 2011-12, 2012-13 और 2013-14 तथा 2014-15 के जिस बकाये पर ब्याज देने को कहा है वह रकम करीब 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा होती है। उन्होंने बताया कि समाजवादी पार्टी (सपा) की तत्कालीन अखिलेश सरकार ने कैबिनेट में बकाया भुगतान नहीं करने का प्रस्ताव पारित किया था, जिस कारण अखिलेश सरकार को किसानों की नाराजगी झेलनी पड़ी और उनकी पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। ...... आर एस राणा

कांग्रेस का किसानों के लिए अलग बजट पर क्या कहना है जानकारों का?

आर एस राणा
नई दिल्ली। खेती-किसानी चुनाव के समय हर पार्टी के घोषणापत्र में प्रमुखता से जगह तो बनाती है, लेकिन यह अलग बात है कि चुनाव जीतने के बाद उन घोषणाओं पर अमल कितना होता है। किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव जीतने वाली कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्र में दावा किया है किसानों के लिए अलग से बजट पेश किया जायेगा। अत: अलग बजट से किसानों की हालात में सुधार आयेगा, या फिर यह भी केवल एक घोषणा ही साबित होगी, जानते हैं क्या कहना है इस बारे में जानकारों का?
कृषि अर्थशास्‍त्री डॉ. टी. हक ने कहां कि बजट का मतलब होता है, आय और खर्च का ब्यौरा देना। खेती में आय तो होती नही, केवल खर्च होता है इसलिए कृषि के लिए अलग से बजट व्यावहारिक ही नहीं है। उन्होंने कहा कि खेती से राज्य सरकारों को तो आय होती है, लेकिन इससे केंद्र सरकार को कोई आय नहीं होती। हॉ यह हो सकता है कि खेती के लिए, किसानों के लिए लोकसभा में अलग से समय-समय पर चर्चा हो लेकिन किसानों के लिए अगल से बजट की बात तो एकदम से बेबुनियाद है।
स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी ने कहा कि अलग बजट हो तो उसमें आय और खर्च का पूरा ब्यौरा होना चाहिए। किसानों के लिए अलग बजट, इतना जरुरी नहीं है जितना की किसानों की आय बढ़ाना। उन्होंने कहा कि किसान ट्रैक्टर, ट्रैक्टर के पार्ट्स, अन्य उपकरण, कीटनाशक, बीज या फिर खाद खरीदता है तो उसे जीएसटी देना पड़ता है, लेकिन जब किसान अपने उत्पाद मंडी में बेचता है तो उसे समर्थन मूल्य भी नहीं मिलता। किसान समर्थन मूल्य पर से नीचे भाव पर फसल बेचता है, तो बिक्री मूल्य और समर्थन मूल्य के अंतर का ब्यौरा भी सरकार को रखना चाहिए, तथा किसान की आय मानकर उसकी भरपाई करनी चाहिए। गन्ना उत्पादों जैसे चीनी, शीरा आदि की बिक्री पर भी जीएसटी लगता है, उस पर किसान का अधिकार होना चाहिए। इन सब का बजट में हिसाब—किताब होना चाहिए। 
भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही ने कहा कि किसानों की दो प्रमुख मांगें है, स्वामीनार्थन की रिपोर्ट के आधार पर फसलों की लागत का डेढ़ गुना दाम और संपूर्ण कर्जमुक्ति। उन्होंने कहा किसानों को इससे फर्क नहीं पड़ता कि, किसानों के लिए अलग से बजट हो। उनको इससे फर्क पड़ता है कि उनकी फसल समर्थन मूल्य से नीचे बिकती है। कांग्रेस किसानों के जिन मुद्दों को लेकर भाजपा पर हमला करती रही है, वह मुद्दे तो उनके घोषणापत्र में है ही नहीं।
कांग्रेस का भाजपा पर कृषि क्षेत्र को गहरे संकट में डालने का आरोप
मोदी सरकार ने रेल बजट को भी अब आम बजट में ही शामिल कर लिया है लेकिन राहुल गांधी ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार बनती है तो किसानों के लिए अलग से पेश किया जाएगा। घोषणापत्र में मोदी सरकार पर कृषि क्षेत्र को गहरे संकट में डालने का आरोप भी लगाया है। घोषणपत्र में कहा गया है कि मोदी सरकार के पांच साल के कार्यकाल में किसानों के लिए कुछ भी नहीं किया गया। उन्हें उचित न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया गया। किसानों की फसलों को भी नहीं खरीदा गया। जिसकी वजह से उनपर कर्ज का बोझ बढ़ता चला गया। वहीं रही सही कसर नोटबंदी ने पूरी कर दी। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में फसल बीमा पर भी सवाल उठाए हैं। इसमें कहा गया है कि फसल बीमा के नाम पर बीमा कंपनियों ने अपनी जेबें भरी। किसानों और खेतिहर मजदूरों को सरकार की तरफ से कोई सहायता नहीं मिली।
कृषि विकास और योजना आयोग बनाने की घोषणा
कांग्रेस ने सत्ता में आने के बाद किसानों के कर्ज को माफ करने का भी वादा किया है। साथ ही फसलों के उचित मूल्य, कृषि में कम लागत, बैंकों से ऋण सुविधा देने का भी वादा किया गया है। कांग्रेस ने कृषि क्षेत्र के विकास की योजनाओं और कार्यक्रम को बनाने के लिए एक स्थाई राष्ट्रीय आयोग “कृषि विकास और योजना आयोग” की स्थापना करने की भी घोषणा की है। इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्री सम्मलित होंगे।
कांग्रेस ने कृषि बीमा योजना में भी बदलाव करने की बात कहीं
घोषणापत्र में मोदी सरकार की कृषि बीमा योजना में बदलाव करने के भी वादे किए हैं। साथ ही देश के प्रत्येक ब्लॉक में आधुनिक गोदाम, कोल्ड स्टोर और खाद्य प्रसंस्करण सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए नीतियां बनाने की बात भी कही गई है। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भूमि अधिग्रहण, पुर्नवास और पुनर्स्थापना अधिनियम-2013 और वनाधिकार अधिनियम-2006 के क्रियान्वयन में बदलाव करने के भी संदेश दिए हैं।.....  आर एस राणा

गन्ना किसानों का बढ़ता बकाया भाजपा के लिए चुनौती

आर एस राणा
नई दिल्ली। गन्ना किसानों का बढ़ता बकाया भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए लोकसभा चुनाव में चुनौती पैदा करेगा। सबसे बड़े गन्ना उत्पादक राज्यों उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के लगभग 69 जिलों के गन्ना किसान भुगतान नहीं मिलने से केंद्र एवं राज्य सरकारों से नाराज हैं।
लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने पीएम-किसान योजना के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों को साधने के लिए 6,000 सालाना देना शुरू किया, लेकिन गन्ना किसानों का बकाया कम होने के बजाए बढ़ता गया। माना जा रहा है कि इस समय देशभर की चीनी मिलों पर पहली अक्टूबर 2018 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2018-19 (अक्टूबर से सितंबर) के मार्च अंत तक बकाया बढ़कर 20,000 करोड़ रुपये का पार कर चुका है, जिसमें सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों का है।
यूपी और महाराष्ट्र के 69 जिलों में गन्ने की खेती कर रहे हैं किसान
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से 45 और महाराष्ट्र के 36 जिलों में से 24 में किसान गन्ने की खेती करते हैं। पिछले पेराई सीजन 2017—18 में भी गन्ना किसानों को बकाया भुगतान में देरी हुई थी, जबकि चालू पेराई सीजन में हालात सुधरने के बजाए और बिगड़े हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने गन्ना किसानों के बकाया भुगतान में तेजी लाने के लिए चीनी मिलों को ब्याज मुक्त कर्ज देने के साथ ही चीनी के न्यूनतम बिक्री भाव में भी बढ़ोतरी की, लेकिन बकाया भुगतान में सुधार नहीं आया। 
गन्ने की बुवाई के लिए पैसे नहीं
उत्तर प्रदेश के अमरोह जिले के देहराचक गांव के गन्ना किसान जोगिंद्र आर्य ने बताया कि वेव शुगर मिल ने अभी तक 11 जनवरी तक का भुगतान किया है। मिल द्वारा पेराई भी धीमी गति से की जा रही है जबकि करीब एक एकड़ गन्ना अभी भी खेत में खड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि आगे गन्ने की बुवाई करनी है लेकिन भुगतान मिल नहीं रहा है, अत: बकाया भुगतान नहीं होने के कारण आगे गन्ने की बुवाई के लिए पैसे नहीं है। 
सरकारों ने गन्ना किसानों को हमेशा बनाया मोहरा
लंबे समय से गन्ना किसानों के हितों की लड़ाई लड़ रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक बीएम सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश के करीब दो करोड़ गन्ना किसान है, जिनका बकाया चीनी मिलों पर है। इससे किसानों में रोष है जिसका खामियाजा राज्य की भाजपा सरकार के साथ अन्य दलों को भी उठाना होगा। उन्होंने बताया किसानों को हमेशा सरकारों ने मोहरा बनाया है, चाहे वह कांग्रेस की सरकार हो, बसपा या फिर सपा की। इसलिए इस बार लोकसभा चुनाव में किसानों ने नोटा का बटन दबाने का फैसला किया है। केंद्र हो या फिर राज्य सरकार गन्ना किसानों के नाम पर चीनी मिलों को फायदा पहुंचा रही हैं।
बकाया के लिए किसान कर रहे हैं संघर्ष
भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) के नेता युधवीर सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा दिए गए पैकेज से चीनी मिलों को फायदा हुआ है। किसान तो अभी भी अपना बकाया पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
महाराष्ट्र के किसानों पर दोहरी मार
स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता और लोकसभा सांसद राजू शेट्टी के अनुसार महाराष्ट्र के गन्ना किसानों को चीनी मिलों से भुगतान में देरी हो रही है इससे राज्य के किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। सूखे के चलते राज्य के किसानों को पहले ही आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था। इसलिए राज्य के किसान राज्स सरकार से नाराज हैं। राज्य की चीनी मिलों के पास नकदी की दिक्कत है जबकि पिछले दो साल से देश में चीनी का उत्पादन मांग से ज्यादा हो रहा है। केंद्र सरकार ने चीनी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस नीति नहीं बनाई।.....  आर एस राणा

सरकार ने एक लाख टन मक्का आयात को दी मंजूरी, कीमतों पर पड़ेगा असर

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने उद्योग की मांग को देखते रियायती दर पर एक लाख टन मक्का के आयात की अनुमति दे दी है जिसका असर मक्का की कीमतों पर पड़ने की आशंका है। वैसे भी चालू महीने के मध्य तक बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश में मक्का की नई मक्का की आवक शुरू हो जायेगी।
विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार पोल्ट्र उद्योग की मांग को पूरी करने के लिए 15 फीसदी के आयात शुल्क की दर पर एक लाख टन मक्का के आयात की अनुमति दी है। इस मक्का का उपयोग पोल्ट्री फीड में ही होगी तथा उपयोगकर्ता कंपनियां को ही आयात की अनुमति दी जायेगी। डीजीएफटी के अनुसार तात्कालिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, कुछ निश्चित छूट और शर्तो के साथ ‘फीड ग्रेड’ मक्का को शूल्क दर कोटा (टैरिफ रेट कोटा) के तहत आयात करने की अनुमति दी गई है।
डीजीएफटी के अनुसार यह निर्णय पोल्ट्री क्षेत्र के कई प्रतिनिधियों से प्राप्त सूचना के उपरांत लिया गया है। पॉल्ट्री उद्योग ने कीट के हमले और मक्के की खेती के रकबे में कमी के चलते फ़ीड ग्रेड मक्का की अपूर्ति में कमी का उल्लेख करते हुए आयात में छूट की मांग की थी। उन्होंने शून्य शुल्क पर मक्का आयात की छूट दिए जाने का अनुरोध किया था।
यूक्रेन से हो सकता है आयात
यूएस ग्रेन काउंसिल के भारतीय प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि सरकार ने एक लाख टन मक्का आयात की अनुतति दी है। आयात की मात्रा कम होने के कारण इसका कीमतों पर केवल आंशिक असर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि यूक्रेन की मक्का का भाव 170 से 175 डॉलर प्रति टन (एफओबी) है तथा इसका भाव 205 से 210 डॉलर (सीएंडएफ) होगा। दक्षिण भारत के पोल्ट्री फीड निर्माताओं को यह मक्का 1,800 से 1,900 रुपये प्रति क्विंटल पहुंच बैठेगी। उन्होंने बताया कि अमेरिका और ब्राजील में जीएम मक्का है, इसलिए इन देशों से आयात की संभावना नहीं है। वर्ष 2015 में भी केंद्र सरकार ने पांच लाख टन मक्का के आयात की अनुमति दी थी, लेकिन आयात हुआ था केवल 2.5 लाख टन।
अगले सप्ताह नई फसल की बनेगी आवक
मक्का कारोबारी राजेश गुप्ता ने बताया कि बिहार की मंडियों में चालू महीने के मध्य तक नई फसल की आवक शुरू हो जायेगी, जबकि आयातित मक्का की खेप मई में ही आने का अनुमान है। मई में घरेलू मंडियों में भी आवक ज्यादा होगी, जिससे भाव में मंदा आने की संभावना है। उन्होंने बताया कि बिहार की मंडियों में मक्का के भाव 2,100 से 2,150 रुपये प्रति क्विंटल हैं। दिल्ली के नया बाजार में मक्का का भाव 2,300 से 2,350 रुपये प्रति क्विंटल है। माना जा रहा है कि बिहार में मक्का की दैनिक आवक बढ़ने पर अप्रैल के आखिर में भाव में 300 से 400 रुपये का मंदा बन सकता है। केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2018-19 के लिए मक्का का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,700 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। 
रबी में उत्पादन अनुमान कम
कृषि मंत्रालय के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2018-19 में रबी सीजन में मक्का का उत्पादन 75.8 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल रबी में 76.3 लाख टन का उत्पादन हुआ था। देश में खरीफ में मक्का का ज्यादा उत्पादन होता है। फसल सीजन 2018—19 में खरीफ और रबी सीजन को मिलाकर कुल उत्पादन 278 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 271.4 लाख टन का उत्पादन हुआ था।.......   आर एस राणा

पेट्रोल में दस फीसद एथेनॉल ब्लेंडिंग अभी दूर की कौड़ी, 7.2 फीसदी की होगी आपूर्ति चालू सीजन में

 आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल उत्पादन को बढ़ाने के लिए उद्योग को राहत तो दे रही है, लेकिन अभी कुल तक अनिवार्य 10 फीसदी ब्लेंडिंग के मुकाबले 7.2 फीसदी पर ही पहुंचा है। चालू पेराई सीजन 2018-19 में चीनी मिलों ने 237 करोड़ लीटर एथेनॉल की सप्लाई के अनुबंध किए हैं। अभी अनिवार्य 10 फीसदी का लक्ष्य दूर की कौड़ी ही है। पिछले पेराई सीजन में चीनी मिलों ने 150 करोड़ लीटर एथेनॉल की सप्लाई तेल कंपनियों को की थी।
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन आफ इंडिया (इस्मा) के अनुसार अनिवार्य 10 फीसदी ब्लेंडिंग के लिए 330 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरुरत होती है, जबकि चालू पेराई सीजन में चीनी मिलों ने तेल कंपनियों के साथ 237 करोड़ लीटर एथेनॉल सप्लाई के अनुबंध किए हैं। पिछले गन्ना पेराई सीजन 2017-18 में चीनी मिलों ने तेल कंपनियों के साथ 160 करोड़ लीटर एथेनॉल सप्लाई के अनुबंध किए थे, जिसमें से सप्लाई केवल 150 करोड़ लीटर एथेनॉल की, की थी जोकि अनिवार्य 10 फीसदी ब्लेंडिंग का केवल 4.22 फीसदी ही था।
उद्योग के लिए एथेनॉल महत्वपूर्ण उत्पाद तो है ही, यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित ईंधन भी है साथ ही इससे बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। यह किसानों के लिए भी लाभकारी है। केंद्र सरकार ने चीनी उद्योग को जून 2018 में 8,500 करोड़ रुपये का पैकेज देने की घोषणा की थी। इसमें 4,440 करोड़ रुपये सस्ते कर्ज के रूप में एथेनॉल की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए दिए गए थे।
सीधे गन्ने के रस से एथेनॉल का उत्पादन होने से, 5 लाख टन चीनी उत्पादन होगा कम
इस्मा के अनुसार चीनी मिलों ने जो 237 करोड़ लीटर ऐथनॉल की सप्लाई के अनुबंध किए हैं, उनमें से 45 करोड़ लीटर एथेनॉल की सप्लाई सीधे गन्ने के रस से बनने वाले बी-ग्रेड शीरे से की जायेगी, जिससे पांच लाख टन चीनी के उत्पादन में कमी आयेगी। साथ ही करीब 16.5 करोड़ लीटर ऐथनॉल की सप्लाई क्षतिग्रस्त खाद्यान्न (सड़े हुए आलू, मक्का, खराब खाद्यान्न) आदि से की जायेगी।
वर्ष 2022 तक 10 फीसदी के स्तर पर पहुंचने की उम्मीद
उद्योग के अनुसार पहले चार महीनों पहली दिसंबर 2018 से मार्च 2019 तक चीनी मिलों तेल कंपनियों को 75 करोड़ लीटर एथेनॉल की सप्लाई कर चुकी है, इसमें से 21 करोड़ लीटर ऐथनॉल का उत्पादन सीधे गन्ने के रस से बनने वाले बी-ग्रेड शीरे तथा क्षतिग्रस्त खाद्यान्न से किया गया है। इस्मा के अनुसार जिस तरह से केंद्र सरकार ने एथेनॉल का उत्पादन बढ़ाने के लिए उद्योग को राहत दी है, उससे अनिवार्य 10 फीसदी ब्लेंडिंग का टारगेट वर्ष 2022 तक पूरा हो जायेगा। उद्योग को उम्मीद है कि वर्ष 2030 तक देश में ऐथनॉल का उत्पादन बढ़कर 20 फीसदी ब्लेंडिंग के स्तर पर पहुंच जायेगा।
केंद्र सरकार ने इथेनॉल के भाव बढ़ाये थे
सितंबर में आर्थिक मामलों की मंत्रीमंडलीय समिति (सीसीईए) ने एथेनॉल की कीमतों में भी बढ़ोतरी की थी। इसके तहत सीधे गन्ने के रस से बनने वाले बी-ग्रेड एथेनॉल का भाव 47.13 रुपये से बढ़ाकर 52.43 रुपये प्रति लीटर कर दिया था, हालांकि शीरे से उत्पादित सी-ग्रेड के एथेनॉल का मूल्य 43.70 रुपये से घटाकर 43.46 रुपये प्रति लीटर कर दिया था।......   आर एस राणा

उत्तर और मध्य भारत में झुलसाएगी गर्मी-आईएमडी

आर एस राणा
नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अगले तीन महीनों के लिए अपने मौसमी अनुमान में कहा कि अप्रैल से जून के बीच उत्तर एवं मध्य भारत में औसत तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने की आशंका है। मौसम विभाग द्वारा सोमवार को जारी विज्ञप्ति में बताया कि तापमान देश के अन्य हिस्सों में सामान्य के करीब ही रहेगा।
मौसमी अनुमान में बताया गया कि मध्य भारत के ज्यादातर मौसम संबंधी उपखंडों और उत्तरपश्चिम भारत के कुछ उपखंडों में अप्रैल से जून का मौसम औसत तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने का अनुमान है।
शेष उपखंडों में औसत अधिकतम तापमान सामान्य के करीब रहने की संभावना है। आईएमडी के उत्तर-पश्चिमी उपखंड में जम्मू कश्मीर, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान आते हैं।
वहीं मध्य भारत के उपखंड में महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, गोवा, मध्यप्रदेश और गुजरात आते हैं। मौसम विभाग ने कहा कि पश्चिमी राजस्थान में मौसमी न्यूनतम एवं औसत तापमान सामान्य से एक डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहने का अनुमान है।...   आर एस राणा

केंद्र सरकार ने 6.5 लाख टन दलहन के आयात को दी मंजूरी, भाव में तेजी

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 6.5 लाख टन दालों के आयात को मंजूरी दे दी है। मूंग और उड़द के डेढ़-डेढ़ लाख टन आयात को, और अरहर के दो लाख टन तथा मटर का डेढ़ लाख टन आयात करने की मंजूरी दी गई है।
केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए डेढ़ लाख टन मूंग का आयात आयातकों के माध्यम से किया जा सकेगा, इसके अलावा केंद्र सरकार ने जो अनुबंध किए है उसका आयात होगा। उड़द के आयात की अनुमति भी चालू वित्त वर्ष के लिए डेढ़ लाख, अरहर के आयात के आयात की 2 लाख टन की मात्रा तय की गई, इसके अलावा केंद्र सरकार ने जो अनुबंध अरहर आयात के केंद्र स्तर पर किए है, वह भी आयात होगा। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने मौजाम्बिक से 2 लाख टन के आयात अनुबंध किए हुए हैं। ऐसे में अरहर का आयात 4 लाख टन हो जायेगा। सरकार ने मटर के डेढ़ लाख टन के आयात की अनुमति दी है, जोकि वित्त वर्ष 2018-19 के एक लाख से ज्यादा है।
उत्पादक मंडियों में भाव समर्थन मूल्य से नीचे
कर्नाटक की गुलबर्गा मंडी के दालों के कारोबारी सी एस नादर ने बताया कि मंडी में अरहर के भाव 5,000 से 5,300 रुपये प्रति क्विंटल हैं, जबकि केंद्र सरकार ने अरहर का समर्थन मूल्य 5,675 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। दिल्ली के लारेंस रोड़ के दलहन व्यापारी राधाकिशन गुप्ता ने बताया कि दिल्ली में चना के भाव 4,300 से 4,400 रुपये प्रति क्विंटल और मध्य प्रदेश तथा राजस्थान की मंडियों में 4,000 से 4,100 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। केंद्र सरकार ने चना का समर्थन मूल्य पर चालू रबी के लिए 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।
सरकारी सख्ती के बावजूद बढ़ा आयात
केंद्र सरकार ने दलहन आयात पर सख्ती करते हुए वित्त वर्ष 2018-19 के लिए डेढ़-डेढ़ लाख टन मूंग और उड़द तथा एक लाख टन मटर के साथ 2 लाख टन अरहर के आयात सीमा तय की थी। इसके अलावा चना के आयात पर 60 फीसदी और मसूर के आयात पर 30 फीसदी आयात शुल्क लगाया था। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 के पहले दस महीनों अप्रैल से जनवरी तक 21 लाख टन दालों का आयात हुआ।
रिकार्ड उत्पादन का अ
नुमान
कृषि मंत्रालय के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू फसल सीजन 2018-19 में दालों का रिकार्ड 240.2 लाख टन उत्पादन होने का अनुमान है जबकि पिछले फसल सीजन में 239.5 लाख टन का ही उत्पादन हुआ था......  आर एस राणा