09 मई 2011
गेहूं उत्पादन : सरकारी अनुमान को लग सकता है झटका
पीला रतुआ और बारिश व ओलावृष्टि से हरियाणा के कई जिलों में फसल को 15 से 20' तक नुकसान हुआ हैआर.एस. राणा/नरेश बातिश कुरुक्षेत्र/लुधियाना <ङ्खद्बठ्ठद्दस्रद्बठ्ठद्दह्य>ह्व<क्चद्धड्डह्यद्मड्डह्म्> इस बार गेहूं उत्पादन के सरकारी अनुमानों को झटका लग सकता है। कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के मुताबिक इस वर्ष 842.7 लाख टन गेहूं का रिकार्ड उत्पादन होगा। लेकिन बिजनेस भास्कर ने दो प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों हरियाणा और पंजाब का दौरा किया तो हकीकत डगमगाती नजर आई। पंजाब में तो हालात काफी ठीक दिखे लेकिन हरियाणा के कई जिलों में पैदावार कम रहने का अंदेशा नजर आया। यहां कई इलाकों में फसल पीला रतुआ बीमारी और बारिश-ओलावृष्टि का शिकार हुई है। दूसरी ओर पंजाब की कुछ मंडियों में अभी गेहूं उठान की समस्या बनी हुई है।करनाल जिले में अभी तक हुई गेहूं की खरीद पिछले साल से 16 फीसदी कम है। करनाल की मंडी में तो गेहूं की आवक 27 फीसदी कम है। कुरुक्षेत्र में खरीद पिछले साल से 17 फीसदी और पानीपत में करीब 2.5 फीसदी कम है। कैथल और सोनीपत जिले की कई मंडियों में अभी तक दो से छह फीसदी कम खरीद हुई है। हरियाणा में किसान उत्पादन प्रभावित होने की बात कर ही रहे हैं, सरकारी अमला भी इसे मान रहा है। करनाल के एक किसान ने बताया कि पिछले साल प्रति एकड़ 23 से 24 क्विंटल गेहूं का उत्पादन हुआ था लेकिन इस साल यह घटकर 14 से 15 क्विंटल रह गया। गेहूं अनुसंधान निदेशालय की प्रोजेक्ट डायरेक्टर डॉ. इंदु शर्मा ने भी माना कि जिन इलाकों में किसानों ने पीला रतुआ की बीमारी से बचाव के लिए दवाई का छिड़काव नहीं किया वहां उत्पादन प्रभावित हुआ है। पंजाब की ग्राउंड रिपोर्ट हरियाणा के विपरीत निकली। यहां प्रति एकड़ पैदावार बढऩे से किसान खुश हैं। मंडियों में भी गेहूं की आवक भी पिछले साल से ज्यादा है। हालांकि यहां की मंडियों में उठान की समस्या बनी हुई है। यहां निजी कंपनियों की तरफ से खरीद बहुत कम हो रही है। राज्य में इस बार गेहूं का उत्पादन सात-आठ लाख टन बढऩे की संभावना है। कुल उत्पादन 160 लाख टन तक पहुंच सकता है। मंडियों में अब तक 100 लाख टन तक गेहूं पहुंच चुका है। हफ्ते भर में यहां गेहूं की आवक पूरी हो जाएगी। इस साल 108-110 लाख टन तक गेहूं की आवक की उम्मीद है। पिछले साल मंडियों में 103.95 लाख टन गेहूं की आवक हुई थी। पंजाब कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक गुरदयाल सिंह के मुताबिक राज्य में इस बार मौसम अनुकूल रहने से गेहूं का कुल उत्पादन 160 लाख टन तक पहुंचने की संभावना है, जो पिछले साल करीब 151.69 लाख टन था। (Business Bhaskar....R S Rana)
मंडियों में गेहूं का अंबार आवक ज्यादा उठान धीमी
ग्राउंड रिपोर्ट : पंजाबगेहूं का सीजन आता है तो पूरे देश की नजरें पंजाब और हरियाणा पर टिक जाती हैं। आखिर ये दोनों ही राज्य देश के गोदामों को हर साल भरते हैं। पूरे देश के इन 'अन्नदाताÓ राज्यों में इस साल विपरीत स्थिति दिखाई दे रही है। पंजाब में जहां अनुकूल मौसम के चलते गेहूं के दाने का बेहतर विकास हुआ और उत्पादन बढऩे का अनुमान है। इस वजह से वहां मंडियों में आवक पिछले साल से ज्यादा हो रही है। इसके विपरीत हरियाणा में रतुआ रोग के चलते फसल को नुकसान हुआ। इस वजह से वहां उत्पादन और मंडियों में आवक पिछले साल से कम चल रही है। बिजनेस भास्कर ने इन दोनों राज्यों की मंडियों का जमीनी जायजा लेने के लिए अपने संवाददाताओं को भेजा। पंजाब की मंडियों का दौरा नरेश बातिश ने किया, वहीं हरियाणा की मंडियों का जायजा आर. एस. राणा ने लिया। पेश है दोनों संवाददाताओं की ग्राउंड रिपोर्ट। बटाला, फतेहगढ़ चूडिय़ां, फगवाड़ा, जगरांव, माछीवाड़ा, अटारी, जंडियाला मंडियों में गेहूं का अंबार लगा है। ठेकेदारों ने कम रेट भरकर गेहूं उठान का काम तो ले लिया लेकिन सस्ते मजदूर न मिलने के कारण मंडियों से गेहू का उठान धीमा है। कुछ मंडियों में उठान में दिक्कत आ रही है। इसके अलग-अलग कारण हैं। अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बना हुआ है ताकि इन मंडियों में पड़े गेहूं की लिफ्टिंग में तेजी आ सके।- रविंदर सिंह चीमा वाइस चेयरमैन, पंजाब मंडी बोर्डगेहूं पंजाबचालू सीजन में 110 लाख टन आवक होने का अनुमानअब तक मंडियों में 100 लाख टन गेहूं की सप्लाई हुईपंजाब में इस बार गेहूं का उत्पादन सात-आठ लाख टन बढऩे की संभावना है। कुल उत्पादन 160 लाख टन तक पहुंच सकता है। पंजाब की मंडियों में अब तक 100 लाख टन तक गेहूं पहुंच चुका है। अगले एक सप्ताह के भीतर पंजाब की मंडियों में गेहूं की आवक पूरी हो जाएगी। संभावना है कि पंजाब की मंडियों में इस साल 108-110 लाख टन तक गेहूं की आवक हो सकती है। पिछले साल मंडियों में 103.95 लाख टन गेहूं की आवक हुई थी। हालांकि पंजाब की कुछ मंडियां ऐसी हैं, जहां पर अभी भी गेहूं उठान की समस्या आ रही है।पंजाब की काफी संख्या में ऐसी मंडियां हैं, जहां पर मंडियों में गेहूं का उठान नहीं हो पा रहा है। करीब 25 लाख टन गेहूं अभी भी विभिन्न मंडियों में उठान के इंतजार में पड़ा हुआ है। आढ़ती लगातार मांग उठा रहे हैं कि गेहूं की उठान में तेज की जाए। आढ़तियों के मुताबिक पिछले कुछ दिनों में बूंदा-बांदी हो रही है।ऐसे में बारिश होने पर गेहूं को होने वाले नुकसान की जिम्मेदारी उनकी ही रहेगी। पंजाब के बटाला, फतेहगढ़ चूडिय़ां, फगवाड़ा, जगरांव, माछीवाड़ा, अटारी, जंडियाला मुख्य रूप से ऐसी मंडियां हैं, जहां पर गेहूं का उठान जल्दी नहीं हो पा रहा है। कुछ मंडियां तो ऐसी हैं जहां पर ठेकेदारों ने कम रेट लगाकर गेहूं उठान के ठेके तो ले लिए, लेकिन अब वे गेहूं की उठान नहीं कर रहे हैं क्योंकि उन्हें सस्ते श्रमिक नहीं मिल पा रहे हैं। वहीं कुछ मंडियों के नजदीक गोदाम न होने के चलते फिलहाल गेहूं में ही को मंडियों में पड़ा है। तरनतारन, अमृतसर एवं गुरदासपुर मंडी में अभी गेहूं की आवक अन्य मंडियों के मुकाबले ज्यादा हो रही है। पंजाब में रोजाना अभी भी 5-6 लाख टन गेहूं की आवक मंडियों में हो रही है।मंडी बोर्ड के वाइस चेयरमैन रविंदर सिंह चीमा के मुताबिक मंडियों में अभी तक 100 लाख टन के गेहूं पहुंच चुका है। पिछले साल मंडियों में 103.95 लाख टन गेहूं पहुंचा था। इस बार उत्पादन बढ़ोतरी से मंडियों में गेहूं पिछले साल के मुकाबले ज्यादा पहुंच रहा है।इस साल पंजाब की मंडियों में 108-110 लाख टन गेहूं की कुल आवक हो सकती है। चीमा के मुताबिक गेहूं का उठान ज्यादातर मंडियों में तेजी से हुआ है हालांकि अभी भी कुछ मंडियां ऐसी हैं जहां पर उठान में दिक्कत आ रही है। इसके अलग-अलग स्थानीय कारण हैं। मंडी बोर्ड भी मंडियों के अधिकारियों के साथ लगातार संपर्क बनाए हुए है ताकि इन मंडियों में पड़ी गेहूं की लिफ्टिंग में तेजी आ सके।कृषि विभाग पंजाब के संयुक्त निदेशक गुरदयाल सिंह के मुताबिक पंजाब में इस बार मौसम अनुकूल रहने के चलते गेहूं का कुल उत्पादन 160 लाख टन तक पहुंचने की संभावना है, जो पिछले साल करीब 151.69 लाख टन था। पंजाब में 8 लाख टन के करीब गेहूं का उत्पादन बढ़ा है। गेहूं की फसल पकने में देरी होने से इसके दाने का अच्छा विकास हुआ। पंजाब में जिन किसानों ने समय पर अपनी फसलों पर स्प्रे नहीं किया, वहां पर पीली कुंगी बीमारी का भी असर पड़ा है। जिससे कुछ किसानों का उत्पादन घटा है। हालांकि कुल मिलाकर उत्पादन बढ़ा है। (Business Bhaskar)
03 मई 2011
परिवार नहीं, सदस्य होगा आधार!
नई दिल्ली May 01, 2011
खाद्य व जन वितरण पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता वाला कार्य समूह जन वितरण प्रणाली के तहत पूरे परिवार के बजाय हर पात्र व्यक्ति विशेष को खाद्यान्न का वितरण करने की सिफारिश कर सकता है। मौजूदा समय में पीडीएस के तहत सब्सिडी वाले अनाज का वितरण गरीबी रेखा से नीचे व ऊपर रहने वाले परिवारों को किया जाता है, चाहे उस परिवार में सदस्यों की संख्या कितनी भी हो। विशेषज्ञों को लगता है कि इस वजह से आïबंटन में गड़बड़ी होती है क्योंकि अलग-अलग परिवार में सदस्यों की संख्या अलग-अलग होती है।अगर नया प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो अनाज का वितरण व्यक्ति विशेष के आधार पर होगा, न कि चिह्नित किए गए परिवारों के आधार पर। कार्य समूह की रिपोर्ट के मसौदे के मुताबिक, प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज का वितरण प्रगतिशील कदम होगा क्योंकि नैशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि कम आय वाले परिवारों में सदस्यों की संख्या उच्च आय वाले परिवारों के मुकाबले ज्यादा होती है। इसमें यह भी कहा गया है कि प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज का वितरण होने से राज्यों को इसके लाभ का विस्तार वास्तविक स्थिति के हिसाब से करने में मदद मिलेगी।पिछले साल अप्रैल में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ संपन्न बैठक के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कृषि, खाद्य व जन वितरण और उपभोक्ता मामलों पर तीन कार्य समूह का गठन किया था। इस बैठक का आयोजन खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों और खाद्य महंगाई में कमी लाने के लिए ठोस कदम उठाने की खातिर विचार-विमर्श करने के लिए हुआ था।कृषि पर गठित कार्य समूह की अगुआई हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा कर रहे हैं, वहीं उपभोक्ता मामले पर गठित कार्यसमूह की अध्यक्षता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। तीसरा कार्यसमूह अहलूवालिया की अध्यक्षता में गठित हुआ था। इस कार्यसमूह को पीडीएस में सुधार, भंडारण और नुकसान को कम से कम करने के लिए उपाय सुझाने का काम सौंपा गया है। अधिकारियों ने कहा कि अहलूवालिया की अध्यक्षता वाला कार्यसमूह गैर-पीडीएस सामानों की बिक्री राशन दुकानों के जरिए करने और उचित मूल्य की दुकानों का आवंटन संस्थाओं व समूहों को करने की सिफारिश कर सकता है। इसके अलावा कार्यसमूह इसकी उचित निगरानी और उचित मूल्य की दुकानों पर नियंत्रण की भी सिफारिशें कर सकता है। अधिकारियों ने कहा कि अहलूवालिया की अगुआई वाला पैनल पीडीएस के तहत वितरित किए जाने वाले अनाज के वितरण व परिवहन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटराइज्ड सिस्टम की वकालत कर सकता है। यह समूह अनाज का वितरण नेक्स्ट-जेन स्मार्ट कार्ड के जरिए करने की सिफारिश कर सकता है ताकि सब्सिडी की रकम सीधे लाभार्थियों को करने का रास्ता साफ हो सके। यह समूह नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाले टास्क फोर्स को अनाज व खाद्यान्न सब्सिडी के प्रभावी वितरण के लिए सुझाव दे सकता है। (BS Hindi)
खाद्य व जन वितरण पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता वाला कार्य समूह जन वितरण प्रणाली के तहत पूरे परिवार के बजाय हर पात्र व्यक्ति विशेष को खाद्यान्न का वितरण करने की सिफारिश कर सकता है। मौजूदा समय में पीडीएस के तहत सब्सिडी वाले अनाज का वितरण गरीबी रेखा से नीचे व ऊपर रहने वाले परिवारों को किया जाता है, चाहे उस परिवार में सदस्यों की संख्या कितनी भी हो। विशेषज्ञों को लगता है कि इस वजह से आïबंटन में गड़बड़ी होती है क्योंकि अलग-अलग परिवार में सदस्यों की संख्या अलग-अलग होती है।अगर नया प्रस्ताव स्वीकार किया जाता है तो अनाज का वितरण व्यक्ति विशेष के आधार पर होगा, न कि चिह्नित किए गए परिवारों के आधार पर। कार्य समूह की रिपोर्ट के मसौदे के मुताबिक, प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज का वितरण प्रगतिशील कदम होगा क्योंकि नैशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के आंकड़ों से पता चलता है कि कम आय वाले परिवारों में सदस्यों की संख्या उच्च आय वाले परिवारों के मुकाबले ज्यादा होती है। इसमें यह भी कहा गया है कि प्रति व्यक्ति के हिसाब से अनाज का वितरण होने से राज्यों को इसके लाभ का विस्तार वास्तविक स्थिति के हिसाब से करने में मदद मिलेगी।पिछले साल अप्रैल में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ संपन्न बैठक के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कृषि, खाद्य व जन वितरण और उपभोक्ता मामलों पर तीन कार्य समूह का गठन किया था। इस बैठक का आयोजन खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों और खाद्य महंगाई में कमी लाने के लिए ठोस कदम उठाने की खातिर विचार-विमर्श करने के लिए हुआ था।कृषि पर गठित कार्य समूह की अगुआई हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा कर रहे हैं, वहीं उपभोक्ता मामले पर गठित कार्यसमूह की अध्यक्षता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी। तीसरा कार्यसमूह अहलूवालिया की अध्यक्षता में गठित हुआ था। इस कार्यसमूह को पीडीएस में सुधार, भंडारण और नुकसान को कम से कम करने के लिए उपाय सुझाने का काम सौंपा गया है। अधिकारियों ने कहा कि अहलूवालिया की अध्यक्षता वाला कार्यसमूह गैर-पीडीएस सामानों की बिक्री राशन दुकानों के जरिए करने और उचित मूल्य की दुकानों का आवंटन संस्थाओं व समूहों को करने की सिफारिश कर सकता है। इसके अलावा कार्यसमूह इसकी उचित निगरानी और उचित मूल्य की दुकानों पर नियंत्रण की भी सिफारिशें कर सकता है। अधिकारियों ने कहा कि अहलूवालिया की अगुआई वाला पैनल पीडीएस के तहत वितरित किए जाने वाले अनाज के वितरण व परिवहन की निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कंप्यूटराइज्ड सिस्टम की वकालत कर सकता है। यह समूह अनाज का वितरण नेक्स्ट-जेन स्मार्ट कार्ड के जरिए करने की सिफारिश कर सकता है ताकि सब्सिडी की रकम सीधे लाभार्थियों को करने का रास्ता साफ हो सके। यह समूह नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाले टास्क फोर्स को अनाज व खाद्यान्न सब्सिडी के प्रभावी वितरण के लिए सुझाव दे सकता है। (BS Hindi)
बैगिंग से पकाए जा रहे हैं आम
लखनऊ May 02, 2011
कमजोर फसल के बावजूद बेहतर मुनाफे की आस में इस साल मलिहाबाद के किसान आमों को पकाने के लिए बैगिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के फल-पट्टी क्षेत्र मलिहाबाद और काकोरी में बागवान इस हफ्ते से पेड़ों पर बढ़े आमों को पकाने के लिए बैगिंग तकनीक अपना रहे हैं। इस तकनीक के इस्तेमाल से न केवल आम की गुणवत्ता में सुधार आता है बल्कि इसकी शेल्फ लाइफ भी बढ़ जाती है। बैगिंग तकनीक का इस्तेमाल आम में गुठली पडऩे के बाद किया जाता है। इसके तहत आम को अखबारी कागज, विशेष पैकेट या कागजी बैग में लपेट कर पोसा जाता है। पकने के बाद इन आमों के रंग में भी निखार आ जाता है।मलिहाबाद क्षेत्र के बागवान शिवसरन सिंह बताते हैं कि बैगिंग तकनीक के इस्तेमाल से पके आम को 10 से 15 दिन तक बचाया जा सकता है। खासतौर पर विदेश में भेजने के लिए इस तरह से पके आम सबसे मुफीद साबित होंगे। आम का आकार बढ़ाने में भी बैगिंग तकनीक सहायक साबित होती है। सिंह के मुताबिक मलिहाबाद क्षेत्र में कुछ बागवानों ने बीते साल इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया था और इन आमों को बाजार में हाथों-हाथ लिया गया। बड़े रिटेल स्टोरों पर तो बैगिंग तकनीक से पके आमों की अच्छी मांग रही। बैगिंग की सफलता से उत्साहित हो इस बार मलिहाबाद-काकोरी के आधे से ज्यादा बागवान इस तकनीक का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। दशहरी के अलावा इस बार मलिहाबाद में आम्रपाली आम की भी आमद हो रही हैं। मलिहाबाद से कई बागवानों ने 4-5 साल पहले आम्रपाली आम के पौधे लगाए थे। इस बार इन पेड़ों पर भी आम आए हैं और बाजार में दशहरी के अलावा इनकी भी आमद नजर आएगी। कम रेशे ज्यादा खुशबू और भीतर से ठोस आम्रपाली की बाजार में अच्छी मांग रहने की उम्मीद जताई जा रही है। गौरतलब है बौर में ही फंगस लग जाने के चलते इस साल प्रदेश के फल पट्टी क्षेत्र मलिहाबाद ही नहीं बल्कि संडीला, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर में भी आम की फसल खराब हुई है। केंद्रीय बागवानी एवं उप्पोषण संस्थान (सीआईएसएच) के अधिकारियों के मुताबिक फंगस लग जाने के चलते इस साल आम के उत्पादन में करीब 40 फीसदी की कमी आएगी। हालांकि फंगस का सबसे ज्यादा असर दशहरी पर पड़ा है पर राज्य के फैजाबाद, सुल्तानपुर और आजमगढ़ में होने वाला चौसा और सफेदा आम भी इससे बच नहीं सका है। (BS Hindi)
कमजोर फसल के बावजूद बेहतर मुनाफे की आस में इस साल मलिहाबाद के किसान आमों को पकाने के लिए बैगिंग तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के फल-पट्टी क्षेत्र मलिहाबाद और काकोरी में बागवान इस हफ्ते से पेड़ों पर बढ़े आमों को पकाने के लिए बैगिंग तकनीक अपना रहे हैं। इस तकनीक के इस्तेमाल से न केवल आम की गुणवत्ता में सुधार आता है बल्कि इसकी शेल्फ लाइफ भी बढ़ जाती है। बैगिंग तकनीक का इस्तेमाल आम में गुठली पडऩे के बाद किया जाता है। इसके तहत आम को अखबारी कागज, विशेष पैकेट या कागजी बैग में लपेट कर पोसा जाता है। पकने के बाद इन आमों के रंग में भी निखार आ जाता है।मलिहाबाद क्षेत्र के बागवान शिवसरन सिंह बताते हैं कि बैगिंग तकनीक के इस्तेमाल से पके आम को 10 से 15 दिन तक बचाया जा सकता है। खासतौर पर विदेश में भेजने के लिए इस तरह से पके आम सबसे मुफीद साबित होंगे। आम का आकार बढ़ाने में भी बैगिंग तकनीक सहायक साबित होती है। सिंह के मुताबिक मलिहाबाद क्षेत्र में कुछ बागवानों ने बीते साल इस तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया था और इन आमों को बाजार में हाथों-हाथ लिया गया। बड़े रिटेल स्टोरों पर तो बैगिंग तकनीक से पके आमों की अच्छी मांग रही। बैगिंग की सफलता से उत्साहित हो इस बार मलिहाबाद-काकोरी के आधे से ज्यादा बागवान इस तकनीक का इस्तेमाल करने जा रहे हैं। दशहरी के अलावा इस बार मलिहाबाद में आम्रपाली आम की भी आमद हो रही हैं। मलिहाबाद से कई बागवानों ने 4-5 साल पहले आम्रपाली आम के पौधे लगाए थे। इस बार इन पेड़ों पर भी आम आए हैं और बाजार में दशहरी के अलावा इनकी भी आमद नजर आएगी। कम रेशे ज्यादा खुशबू और भीतर से ठोस आम्रपाली की बाजार में अच्छी मांग रहने की उम्मीद जताई जा रही है। गौरतलब है बौर में ही फंगस लग जाने के चलते इस साल प्रदेश के फल पट्टी क्षेत्र मलिहाबाद ही नहीं बल्कि संडीला, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर में भी आम की फसल खराब हुई है। केंद्रीय बागवानी एवं उप्पोषण संस्थान (सीआईएसएच) के अधिकारियों के मुताबिक फंगस लग जाने के चलते इस साल आम के उत्पादन में करीब 40 फीसदी की कमी आएगी। हालांकि फंगस का सबसे ज्यादा असर दशहरी पर पड़ा है पर राज्य के फैजाबाद, सुल्तानपुर और आजमगढ़ में होने वाला चौसा और सफेदा आम भी इससे बच नहीं सका है। (BS Hindi)
सेब उत्पादन पर मौसम की मार, घटेगी पैदावार
नई दिल्ली May 02, 2011
इस साल उपभोक्ताओं को सेब के लिए ज्यादा कीमतें चुकानी पड़ सकती है। इसकी वजह सेब की फसल के लिए प्रतिकूल मौसम को माना जा रहा हैं। दरअसल सेब उत्पादक इलाकों में असमय हुई बर्फबारी और बारिश के कारण इसकी फसल को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही हैं, जिससे देश के कुल सेब उत्पादन में 50 फीसदी की गिरावट मुमकिन है। कश्मीर में सामान्य तौर पर 9-10 करोड़ पेटी (प्रति पेटी करीब 20 किलोग्राम) सेब का उत्पादन होता है और हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा 2 से 2.5 करोड़ पेटी हैं। इसके अलावा 50 लाख पेटी सेब का उत्पादन उत्तराखंड में होता है। इस तरह सामान्य तौर पर देश का कुल सेब उत्पादन 11.5 से 13 करोड़ पेटी बैठता है। इस साल प्रतिकूल मौसम के चलते कुल सेब उत्पादन 50 फीसदी घटकर 6 से 7 करोड़ पेटी रह सकता है। अखिल भारतीय सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष रवींद्र चौहान ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि इस बार तापमान में ज्यादा उतारचढ़ाव देखा गया हैं, जिसका सेब की फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके मुताबिक मार्च और अप्रैल महीने की शुरुआत में असमय ज्यादा बर्फ पड़ी थी और इस दौरान पेड़ों में फूल आने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। ऐसे में वर्फ पडऩे से इसका विकास ढंग से नहीं हो पाया। चौहान का कहना है कि आमतौर इन दिनों तापमान 20-23 डिग्री सेल्सियस रहता है, जो घटकर 7 से 8 डिग्री सेल्सियस तक चला गया था। परिणामस्वरूप सेब की फसल को भारी नुकसान हुआ है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कश्मीर, हिमाचल सहित देश के कुल सेब उत्पादन में 50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। हिमाचल प्रदेश के बागवानी बोर्ड के निदेशक डॉ. गुरुदेव सिंह भी सेब के उत्पादन में कमी बात से इत्तिफाक रखते हैं। सिंह बताते है कि असमय बारिश और मौसम अत्यधिक ठंडा होने से सेब की फसल को नुकसान हुआ है। सिंह का कहना है कि प्रतिकूल मौसम सेब का उत्पादन कम रहेगा, लेकिन कितनी गिरावट आएगी, इस बारे कुछ नहीं कहा जा सकता। हिमाचल सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष लेखराज चौहान हिमाचल में सेब की पैदावार 50 फीसदी तक गिरने की संभावना व्यक्त करते हैं। चौहान भी इस बात से इत्तिफाक रखते हैं। इस समय हिमाचल में कोल्ड स्टोर वाले सेब के दाम 2500-3000 रुपये प्रति पेटी चल रहे हैं। ये दाम पिछले साल से ज्यादा हैं। (BS Hindi)
इस साल उपभोक्ताओं को सेब के लिए ज्यादा कीमतें चुकानी पड़ सकती है। इसकी वजह सेब की फसल के लिए प्रतिकूल मौसम को माना जा रहा हैं। दरअसल सेब उत्पादक इलाकों में असमय हुई बर्फबारी और बारिश के कारण इसकी फसल को भारी नुकसान होने की आशंका जताई जा रही हैं, जिससे देश के कुल सेब उत्पादन में 50 फीसदी की गिरावट मुमकिन है। कश्मीर में सामान्य तौर पर 9-10 करोड़ पेटी (प्रति पेटी करीब 20 किलोग्राम) सेब का उत्पादन होता है और हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा 2 से 2.5 करोड़ पेटी हैं। इसके अलावा 50 लाख पेटी सेब का उत्पादन उत्तराखंड में होता है। इस तरह सामान्य तौर पर देश का कुल सेब उत्पादन 11.5 से 13 करोड़ पेटी बैठता है। इस साल प्रतिकूल मौसम के चलते कुल सेब उत्पादन 50 फीसदी घटकर 6 से 7 करोड़ पेटी रह सकता है। अखिल भारतीय सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष रवींद्र चौहान ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि इस बार तापमान में ज्यादा उतारचढ़ाव देखा गया हैं, जिसका सेब की फसल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनके मुताबिक मार्च और अप्रैल महीने की शुरुआत में असमय ज्यादा बर्फ पड़ी थी और इस दौरान पेड़ों में फूल आने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। ऐसे में वर्फ पडऩे से इसका विकास ढंग से नहीं हो पाया। चौहान का कहना है कि आमतौर इन दिनों तापमान 20-23 डिग्री सेल्सियस रहता है, जो घटकर 7 से 8 डिग्री सेल्सियस तक चला गया था। परिणामस्वरूप सेब की फसल को भारी नुकसान हुआ है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए कश्मीर, हिमाचल सहित देश के कुल सेब उत्पादन में 50 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। हिमाचल प्रदेश के बागवानी बोर्ड के निदेशक डॉ. गुरुदेव सिंह भी सेब के उत्पादन में कमी बात से इत्तिफाक रखते हैं। सिंह बताते है कि असमय बारिश और मौसम अत्यधिक ठंडा होने से सेब की फसल को नुकसान हुआ है। सिंह का कहना है कि प्रतिकूल मौसम सेब का उत्पादन कम रहेगा, लेकिन कितनी गिरावट आएगी, इस बारे कुछ नहीं कहा जा सकता। हिमाचल सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष लेखराज चौहान हिमाचल में सेब की पैदावार 50 फीसदी तक गिरने की संभावना व्यक्त करते हैं। चौहान भी इस बात से इत्तिफाक रखते हैं। इस समय हिमाचल में कोल्ड स्टोर वाले सेब के दाम 2500-3000 रुपये प्रति पेटी चल रहे हैं। ये दाम पिछले साल से ज्यादा हैं। (BS Hindi)
पीडीएस के लिए 5 करोड़ टन अतिरिक्त अनाज
नई दिल्ली May 02, 2011
सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गेहूं और चावल के वितरण के लिए 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज आवंटित करने का फैसला किया है। यह फैसला वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में किया गया। इस फैसले से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 6.52 करोड़ परिवारों को लाभ होगा। इन परिवारों को गेहूं 4.15 रुपये प्रति किलोग्राम और चावल 5.65 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से दिया जाता है। इन परिवारों को हर महीने 35 किलोग्राम अनाज दिया जाता है। समिति ने गेहूं निर्यात को मंजूरी दिए जाने की मांग पर कोई फैसला नहीं किया। बढ़ती महंगाई को देखते हुए निर्यात पर पाबंदी लगी हुई है। कूटनीतिक वजहों से समिति ने यह फैसला किया कि मालदीव को 1 लाख टन आटा और गैर बासमती चावल का निर्यात किया जाएगा। भारत कुछ पड़ोसी और छोटे देशों को गेहूं और गैर बासमती चावल के निर्यात में नियमों में थोड़ी ढील दे रहा है। BS Hindi)
सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत गेहूं और चावल के वितरण के लिए 50 लाख टन अतिरिक्त अनाज आवंटित करने का फैसला किया है। यह फैसला वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में किया गया। इस फैसले से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 6.52 करोड़ परिवारों को लाभ होगा। इन परिवारों को गेहूं 4.15 रुपये प्रति किलोग्राम और चावल 5.65 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से दिया जाता है। इन परिवारों को हर महीने 35 किलोग्राम अनाज दिया जाता है। समिति ने गेहूं निर्यात को मंजूरी दिए जाने की मांग पर कोई फैसला नहीं किया। बढ़ती महंगाई को देखते हुए निर्यात पर पाबंदी लगी हुई है। कूटनीतिक वजहों से समिति ने यह फैसला किया कि मालदीव को 1 लाख टन आटा और गैर बासमती चावल का निर्यात किया जाएगा। भारत कुछ पड़ोसी और छोटे देशों को गेहूं और गैर बासमती चावल के निर्यात में नियमों में थोड़ी ढील दे रहा है। BS Hindi)
30 अप्रैल 2011
सब्जियों की किल्लत दूर करने पर हो रहा विचार
नई दिल्ली April 03, 2011
देश भर के प्रमुख शहरों में सब्जियों की किल्लत दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने सब्जियों की खेती के लिए क्लस्टर की योजना बनाई है। साथ ही हर राज्य की राजधानी या 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले दूसरे शहरों में से किसी एक में इसके भंडारण की व्यवस्था करने की योजना है।
ऐसे क्लस्टर के निर्माण से चुनिंदा शहरों में सब्जियों की मांग व आपूर्ति की समस्या दूर होगी और इस बाबत वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने साल 2011-12 के बजट में प्रस्ताव रखा है और इसके लिए 300 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।
इस योजना के क्रियान्वयन के लिए तैयार दिशा-निर्देश के मसौदे के मुताबिक, इस कार्यक्रम के संचालन में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका नहीं होगी। राज्य सरकारें शहरों की पहचान करेगी, जहां वह सब्जियों के लिए क्लस्टर स्थापित करना चाहती हों। पहचान किए गए इन शहरों में एक सर्वे किया जाएगा ताकि आपूर्ति की बाधाओं के बारे में जानकारी मिले और उस शहर के आसपास के उन इलाकों की क्षमता का आकलन किया जाएगा, जहां सब्जियों की खेती की जा सकती हो।
एक अधिकारी ने बताया कि सर्वे के आधार पर राज्य सरकारों को प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें भौगोलिक व जलवायु के संबंध में सूचना के साथ-साथ सब्जियों के विकास की क्षमता और जमीन की उपलब्धता की जानकारी देनी होगी। इस रिपोर्ट में उन कदमों का भी जिक्र होगा जिसके जरिए मौजूदा बुनियादी ढांचा मसलन राज्यों में गोदामों का इस्तेमाल बेहतर तरीके से सब्जियों के भंडारण में किया जा सकता है।
अधिकारी ने बताया कि उचित कीमत पर सुरक्षित व अच्छी गुणवत्ता वाली सब्जियों की लगातार उपलब्धता प्रमुख चुनौती है। इसके लिए कई मोर्चे पर मसलन उत्पादन, कटाई के बाद, भंडारण, परिवहन, विपणन, वितरण और नीतिगत सुधार पर कदम उठाने की जरूरत है।
सरकार ने सब्जी उत्पादकों को किसान एसोसिएशन के तौर पर संगठित करने और इन समूहों को मितव्ययिता का लाभ उठाने के बारे में जानकारी देने और सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों व नगर निगमों के साथ तालमेल बिठाने की योजना है ताकि शहर के आसपास सब्जियों की खेती के लिए जमीन उपलब्ध हो जाए।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) इस योजना के लिए आवश्यक क्रेडिट उपलब्ध कराएगा। राज्यों के वानिकी निदेशालयों, वानिकी मिशन और सरकारें इस योजना को लागू कराने वाली प्रमुख एजेंसियां होंगी।
बढ़ेगी आपूर्ति
सब्जियों की खेती के लिए क्लस्टर बनाने की योजना, राज्यों की राजधानी या दूसरे शहरों में इसके भंडारण की होगी व्ययवस्था
सरकार ने इनके लिए बजट में 300 करोड़ रुपये का आवंटन किया है (BS hindi)
देश भर के प्रमुख शहरों में सब्जियों की किल्लत दूर करने के लिए केंद्र सरकार ने सब्जियों की खेती के लिए क्लस्टर की योजना बनाई है। साथ ही हर राज्य की राजधानी या 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले दूसरे शहरों में से किसी एक में इसके भंडारण की व्यवस्था करने की योजना है।
ऐसे क्लस्टर के निर्माण से चुनिंदा शहरों में सब्जियों की मांग व आपूर्ति की समस्या दूर होगी और इस बाबत वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने साल 2011-12 के बजट में प्रस्ताव रखा है और इसके लिए 300 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।
इस योजना के क्रियान्वयन के लिए तैयार दिशा-निर्देश के मसौदे के मुताबिक, इस कार्यक्रम के संचालन में निजी क्षेत्र की बड़ी भूमिका नहीं होगी। राज्य सरकारें शहरों की पहचान करेगी, जहां वह सब्जियों के लिए क्लस्टर स्थापित करना चाहती हों। पहचान किए गए इन शहरों में एक सर्वे किया जाएगा ताकि आपूर्ति की बाधाओं के बारे में जानकारी मिले और उस शहर के आसपास के उन इलाकों की क्षमता का आकलन किया जाएगा, जहां सब्जियों की खेती की जा सकती हो।
एक अधिकारी ने बताया कि सर्वे के आधार पर राज्य सरकारों को प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करनी होगी, जिसमें भौगोलिक व जलवायु के संबंध में सूचना के साथ-साथ सब्जियों के विकास की क्षमता और जमीन की उपलब्धता की जानकारी देनी होगी। इस रिपोर्ट में उन कदमों का भी जिक्र होगा जिसके जरिए मौजूदा बुनियादी ढांचा मसलन राज्यों में गोदामों का इस्तेमाल बेहतर तरीके से सब्जियों के भंडारण में किया जा सकता है।
अधिकारी ने बताया कि उचित कीमत पर सुरक्षित व अच्छी गुणवत्ता वाली सब्जियों की लगातार उपलब्धता प्रमुख चुनौती है। इसके लिए कई मोर्चे पर मसलन उत्पादन, कटाई के बाद, भंडारण, परिवहन, विपणन, वितरण और नीतिगत सुधार पर कदम उठाने की जरूरत है।
सरकार ने सब्जी उत्पादकों को किसान एसोसिएशन के तौर पर संगठित करने और इन समूहों को मितव्ययिता का लाभ उठाने के बारे में जानकारी देने और सार्वजनिक क्षेत्र की एजेंसियों व नगर निगमों के साथ तालमेल बिठाने की योजना है ताकि शहर के आसपास सब्जियों की खेती के लिए जमीन उपलब्ध हो जाए।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) इस योजना के लिए आवश्यक क्रेडिट उपलब्ध कराएगा। राज्यों के वानिकी निदेशालयों, वानिकी मिशन और सरकारें इस योजना को लागू कराने वाली प्रमुख एजेंसियां होंगी।
बढ़ेगी आपूर्ति
सब्जियों की खेती के लिए क्लस्टर बनाने की योजना, राज्यों की राजधानी या दूसरे शहरों में इसके भंडारण की होगी व्ययवस्था
सरकार ने इनके लिए बजट में 300 करोड़ रुपये का आवंटन किया है (BS hindi)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
