आर.एस. राणा नई दिल्ल
जगह की किल्लत - एफसीआई के पास कुल भंडारण क्षमता (गोदामों में) 284.5 लाख टन की है। इसमें करीब 75 फीसदी गोदाम अनाज से भरे हुए हैं। जबकि चालू विपणन सीजन में 262 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया है। केंद्रीय पूल में तय मानकों (बफर स्टॉक) के मुकाबले खाद्यान्न का बकाया स्टॉक दोगुने से भी ज्यादा है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) की भंडारण क्षमता के मुकाबले अनाज का स्टॉक ज्यादा होने के कारण चालू विपणन सीजन में खरीद जाने वाले आधे से ज्यादा गेहूं को खुले आसमान के नीचे रखना उसकी विवशता होगी। एफसीआई के पास कुल भंडारण क्षमता (गोदामों में) 284.5 लाख टन की है। इसमें करीब 75 फीसदी गोदाम अनाज से भरे हुए हैं। जबकि चालू विपणन सीजन में 262 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया है। एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार केंद्रीय पूल में तय मानकों (बफर स्टॉक) के मुकाबले खाद्यान्न का बकाया स्टॉक दोगुने से भी ज्यादा है। एक अप्रैल को केंद्रीय पूल में 441.84 लाख टन अनाज का भंडार मौजूद है जबकि तय मानकों के आधार पर एक अप्रैल को बफर 162 लाख टन (गेहूं 40 लाख टन और चावल 122 लाख टन) का स्टॉक होना चाहिए। इसमें रिजर्व को भी मिला दें तो भी 220 लाख टन अनाज का ही स्टॉक होना चाहिए। उन्होंने बताया कि एफसीआई के पास इस समय 284.5 लाख टन (कवर) और 31.6 लाख टन कैप (तिरपाल के नीचे) को मिलाकर कुल 316.10 लाख टन की भंडारण क्षमता है। पिछले साल अप्रैल 2010 में 288.40 लाख टन भंडारण क्षमता थी। पिछले साल के मुकाबले इस साल 27.7 लाख टन ज्यादा बढ़ गई है। चालू विपणन सीजन में 262 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने गेहूं पर 50 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस तय कर दिया है जबकि चालू सीजन में गेहूं की बंपर पैदावार 842.7 लाख टन होने का अनुमान है। ऐसे में खरीद तय लक्ष्य से ज्यादा हो सकती है। पंजाब में एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पंजाब में 96 लाख टन कवर और 107 लाख टन कैप (एफसीआई और अन्य एजेंसियों) को मिलाकर कुल 203 लाख टन की भंडारण क्षमता है। पंजाब में चालू सीजन में 110 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य है जबकि पिछले साल 102 लाख टन खरीद हुई थी।उधर हरियाणा में एफसीआई के अधिकारी ने स्वीकार किया कि 65 टन की खरीद का लक्ष्य है लेकिन खरीद 67-68 लाख टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है। पिछले साल 64.29 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी। हरियाणा में कवर व पैक मिलाकर कुल 82.02 लाख टन की भंडारण क्षमता है। चालू विपणन सीजन में अभी तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 38.38 लाख टन गेहूं की खरीद ही हुई है। पिछले साल की समान अवधि में 123.62 लाख टन की खरीद हो चुकी थी। अभी तक हुई कुल खरीद में हरियाणा से 17 लाख टन, मध्य प्रदेश से 14 लाख टन और पंजाब से 6 लाख टन की हुई है। (Business Bhaskar....R S Rana)
19 अप्रैल 2011
15 अप्रैल 2011
मांग बढऩे से रबर में और तेजी की संभावना
मांग के मुकाबले उत्पादन कम होने से नेचुरल रबर की कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। फरवरी महीने में नेचुरल रबर का घरेलू उत्पादन 54,500 टन रहा जबकि इस दौरान खपत 79,000 टन रही। नेचुरल रबर के उत्पादन का ऑफ सीजन चल रहा है। जबकि भारत के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार में नेचुरल रबर के दाम 32 रुपये प्रति किलो ज्यादा हैं। इसीलिए भारत में आयात कम हो रहा है जबकि निर्यात बढ़ रहा है। ऑटोमेटिव टायर मैन्यूफैक्चचर्स एसोसिएशन (एटीएमए) के महानिदेशक राजीव बुद्धिराजा ने बताया कि नेचुरल रबर के उत्पादन का नया सीजन शुरू होने में करीब पांच से साढ़े पांच महीने का समय शेष है। नए सीजन की शुरूआत नवंबर महीने में होगी। जबकि उत्पादन के मुकाबले उद्योग की मांग ज्यादा आ रही है जिससे तेजी को बल मिल रहा है। वित्त वर्ष 2010-11 के पहले 11 महीनों (अप्रैल से जनवरी) के दौरान नेचुरल रबर का उत्पादन 8.04 लाख टन हुआ है जबकि इस दौरान खपत बढ़कर 8.68 लाख टन की हुई है। जनवरी से अभी तक घरेलू बाजार में नेचुरल रबर की कीमतों में 19.4 फीसदी की तेजी आ चुकी है। एक जनवरी को कोट्टायम में नेचुरल रबर का भाव 193 से 201 रुपये प्रति किलो था जबकि मंगलवार को भाव बढ़कर 238 से 240 रुपये प्रति किलो हो गया। हरिसंस मलायलम लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर पंकज कपूर ने बताया कि भारत के मुकाबले अंतरराष्ट्रीय बाजार में नेचुरल रबर की कीमतें ज्यादा हैं। इसीलिए भारत में आयात में कमी आ रही है जबकि निर्यात बढ़ रहा है। बैंकाक में मंगलवार को नेचुरल रबर का दाम बढ़कर 271 से 272 रुपये प्रति किलो (भारतीय मुद्रा में) हो गया। जनवरी से अभी तक इसके दाम 20.3 फीसदी बढ़ चुके हैं। चार जनवरी को बैंकाक में नेचुरल रबर का भाव 225 से 226 रुपये प्रति किलो था। भारतीय रबर बोर्ड के अनुसार फरवरी महीने में भारत में नेचुरल रबर का आयात 6,831 टन का हुआ है। पिछले साल फरवरी महीने में 12,278 टन का आयात हुआ था। जबकि फरवरी महीने में निर्यात बढ़कर 6,523 टन का हुआ जबकि पिछले साल फरवरी में 5,556 टन का निर्यात हुआ था। बोर्ड के अनुसार भारत में नेचुरल रबर का स्टॉक तीन लाख टन से ज्यादा का है। जबकि राजीव बुद्धिराजा ने बताया कि स्टॉक बोर्ड के आंकड़ों के मुकाबले कम है। विनको ऑटो इंडस्ट्रीज के मैनेजिंग डायरेक्टर एम. एल. गुप्ता ने बताया कि घरेलू बाजार में नेचुरल रबर की उपलब्धता कम है। इसके मुकाबले ऑटो उद्योग की मांग अच्छी बनी हुई है। इसलिए आगामी दिनों में इसकी कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। (Business Bhaskar.....R S Rana)
गेहूं के दाम घटने से मैदा और आटा सस्ता होने की संभावना
गेहूं की कीमतों में आई गिरावट से आटा, मैदा और सूजी के दाम करीब दस फीसदी घटने की संभावना है। पिछले एक महीने में इनकी कीमतों में करीब 80 से 100 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आई है जबकि इस दौरान गेहूं की कीमतों में 160-165 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ चुकी है। गेहूं की सरकारी खरीद सुचारु रूप से न होने के कारण उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाव घटकर 1,030 से 1,090 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं जबकि चालू विपणन सीजन के लिए एमएसपी 1,120 रुपये प्रति क्विंटल है। दिल्ली फ्लोर मिल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गेहूं उत्पादों आटा, मैदा और सूजी में मांग कमजोर है जबकि गेहूं की आवक बढऩे से कीमतों में गिरावट बनी हुई है। दिल्ली में आटा का भाव घटकर बुधवार को 680 रुपये, मैदा का भाव 830 रुपये और सूजी का 865 रुपये प्रति 50 किलो रह गया। इसकी कीमतों में और भी 60 से 90 रुपये प्रति 50 किलो की गिरावट आने की संभावना है। दिल्ली में गेहूं की आवक उत्तर प्रदेश की मंडियों से हो रही है जबकि उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,030 से 1,090 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। आगामी दिनों में आवक बढऩे पर गेहूं की कीमतों में और भी गिरावट की संभावना है। इसका असर आटा, मैदा और सूजी की कीमतों पर भी पड़ेगा। श्री बालाजी फूड प्रोडक्ट्स के डायरेक्टर संदीप बंसल ने बताया कि उत्तर प्रदेश की मंडियों में आटा का भाव घटकर 1,250-1,300 रुपये, मैदा का भाव 1,325-1400 रुपये और सूजी का भाव 1,400 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। पिछले महीने भर में इसकी कीमतों में करीब 100 रुपये प्रति क्विंटल का मंदा आया है। चालू महीने में राज्य की मंडियों में गेहूं की आवक बढ़ जाएगी जबकि अभी तक सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई है। इसीलिए मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट की संभावना है। बीएल इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर एस. बी. गुप्ता ने बताया कि राजस्थान की मंडियों में महीने भर में गेहूं की कीमतों में करीब 150 रुपये प्रति क्विंटल का मंदा आ चुका है। बुधवार को मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,030-1,040 रुपये और आटा का भाव 1,320-1,340 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। मध्य प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,050 से 1,060 रुपये और आटा का भाव घटकर 1,350 से 1,360 रुपये प्रति क्विंटल रह गया।बात पते की उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,030 से 1,090 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। आगामी दिनों में आवक बढऩे पर गेहूं की कीमतों में और भी गिरावट की संभावना है। (Business Bhaskar....R S Rana)
मक्का, जौ के दाम बढऩे से फीड महंगा होने की संभावना
आर.एस. राणा नई दिल्ली कच्चे माल जैसे मक्का, जौ और बाजरा के दाम बढऩे से कैटलफीड और पोल्ट्रीफीड की कीमतों में आठ से दस फीसदी तेजी आने की संभावना है। पिछले महीने भर में मक्का की कीमतों में 15 फीसदी, जौ की कीमतों में 10 फीसदी, सोयाबीन और बिनौला खली की कीमतों में क्रमश: पांच-पांच फीसदी की तेजी आई है। जबकि सरसों खल, चना चूरी और छिल्का में पशुआहार वालों की मांग मई-जून में बढ़ेगी। किसान फोडर मिल्स प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर नरेंद्र सिंह ने बताया कि कैटलफीड बनाने के लिए अनाज में मक्का, जौ और बाजरा का प्रयोग होता है। इसके अलावा सरसों, सायोबीन और बिनौला डीओसी तथा शीरे का प्रयोग होता है। मक्का की कीमतों में पिछले एक महीने में करीब 175 रुपये और जौ तथा बाजरा की कीमतों में 100-125 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आई है। निर्यात मांग अच्छी होने से डीओसी के दाम भी तेज बने हुए हैं। ऐसे में सप्लीमेंट कैटलफीड की कीमतों में आगामी दिनों में करीब 200-250 रुपये की तेजी आकर भाव 2,000-2,200 रुपये प्रति क्विंटल होने की संभावना है। चेतक कैटलफीड एंड एग्रीकलचर इंडस्ट्रीज के डायरेक्टर गौरव भारद्वाज ने बताया कि अप्रैल से जून के दौरान कैटलफीड में उत्तर भारत के राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान बढऩे की संभावना है। कच्चे माल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं इसीलिए आगामी दिनों में सप्लीमेंट कैटलफीड की कीमतों में और भी तेजी की संभावना है। सूर्या फीड कंस्ट्रक्टर्स प्रा. लि. के मैनेजिंग डायरेक्टर संजय बंसल ने बताया कि गर्मियों में अंडों की मांग कम हो जाती है। लेकिन मक्का, सोया डीओसी और बाजरा महंगा होने से पोल्ट्रीफीड महंगा हो गया है। इसीलिए पोल्ट्री फीड में मांग कम हो गई है। पोल्ट्री फीड में कंस्ट्रेंट फीड का भाव बढ़कर 2,800-3,000 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। अबोहर स्थित कमल कॉटन कंपनी के डायरेक्टर राकेश राठी ने बताया कि गर्मियों का मौसम होने के कारण बिनौला और बिनौला खली में मांग कम हो गई है। लेकिन सरसों खल, चना छिल्का और चूरी में मांग बढ़ जाएगी। इसीलिए इनकी कीमतों में आगामी दिनों में 100-200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। हरियाणा और पंजाब में बिनौला खल का भाव 1,400-1,700 रुपये और बिनौले का भाव 1,700-1,900 रुपये प्रति क्विंटल है। कुनाल ट्रेडिंग कंपनी के डायरेक्टर चेतन गोयल ने बताया कि उत्पादक मंडियों में सरसों और चने की नई फसल आ रही है लेकिन मई में आवक कम हो जाएगी। इसलिए सरसों खल, चना चूरी और छिल्का की कीमतों में 75-100 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। सरसों खल का भाव 1,060-1,100 रुपये, चना चूरी का भाव 1,400-1,500 रुपये और छिल्का का भाव 950 से 1,000 रुपये तथा मूंगफली खल का भाव 1,700-1,900 रुपये प्रति क्विंटल है।बात पते की :- गर्मियों का मौसम होने से बिनौला और खली की मांग घट गई है। लेकिन सरसों खल, चना छिल्का व चूरी की मांग बढऩे से भाव में 100-200 रुपये प्रति क्विंटल की तेजी आने की संभावना है। (Business Bhaskar....R S Rana)
किसान बढ़ा सकते हैं मिर्च का रकबा
मुंबई April 14, 2011 बेमौसम बारिश या अतिरिक्त मॉनसून की वजह से पैदा हुए खतरे से निपटने के लिए दक्षिण भारत के किसान आगामी खरीफ सीजन में मिर्च के रकबे में बढ़ोतरी को प्राथमिकता दे सकते हैं। एक ओर जहां दक्षिण भारत में कपास की पिछांत फसल को प्राथमिकता दी जाती रही है और ज्यादा से ज्यादा किसान इस ओर आकर्षित होते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पिछले खरीफ सीजन में बेमौसम बरसात ने कपास और तंबाकू जैसी फसलों को बचाने के जोखिम को रेखांकित किया है और इस संकट के दौर में मिर्च बेहतर फसल के रूप में उभरी है। इसके अलावा मिर्च से मिलने वाला प्रतिफल भी समान रूप से अच्छा रहा है। यहां तक कि दक्षिण भारत में बंजर पड़ी जमीन भी मिर्च की खेती में शामिल हो सकती है। बीटी बीज के बढ़ते इस्तेमाल से पैदावार में बढ़ोतरी को देखते हुए कपास पसंद की जाती थी, लेकिन मिर्च की पैदावार में भी सुधार हो रहा है (अगर पिछले साल हुई बेमौसम बारिश की वजह से फसल को हुए नुकसान को छोड़ दें तो)। मसाला बोर्ड के एक अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है कि खरीफ सीजन में जब बुआई शुरू होगी तब मिर्च के रकबे में 10-15 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है। कपास और तंबाकू के बजाय मिर्च को प्राथमिकता दिए जाने की वजह यह होगी कि मिर्च शुरुआती दौर में नर्सरी में उगाई जाती है और फिर इसे खेतों में लगाया जाता है, वहीं दूसरी ओर कपास और तंबाकू की बुआई सीधे होती है। ये चीजें मिर्च के मुकाबले कपास व तंबाकू को जोखिमभरा बना देती हैं। इस साल मिर्च के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है क्योंकि इसका रकबा घटा है। दिसंबर से जारी भारी बारिश की वजह से मिर्च के पौधे नर्सरी में ही रह गए, लिहाजा इसे खेतों में नहीं लगाया जा सका और कुल मिलाकर इसका रकबा घट गया। वहीं दूसरी ओर कपास के मामले में भी परेशानियां पैदा हुईं क्योंकि भारी बारिश की वजह से इसे भी नुकसान पहुंचा और अंतत: यह कपास की कीमतों में बढ़ोतरी का कारण बना। हाजिर बाजार में कपास की कीमतें एक साल पहले के मुकाबले 82 फीसदी बढ़ गईं। कारोबारियों को उम्मीद है कि मिर्च की पैदावार पिछले साल के मुकाबले इस साल 20 से 30 फीसदी कम होगी क्योंकि पिछले साल के मुकाबले ज्यादा पौधे खेतों तक नहीं पहुंच पाए। इस साल 70 से 80 लाख बोरी मिर्च उत्पादन रहने की संभावना है, जबकि पिछले साल 1.25 करोड़ बोरी मिर्च का उत्पादन हुआ था। (BS Hindi)
नई तकनीक से मूंगफली की पैदावार बढ़ेगी
मुंबई April 14, 2011 गुजरात के कुछ किसान मूंगफली की पैदावार बढ़ाने के लिए चीन की तकनीक (मल्चिंग टेक्नोलॉजी) का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके जरिए भारत में मूंगफली की खेती का कायापलट हो सकता है क्योंकि भारत में अपनाई जा रही परंपरागत तकनीक के मुकाबले इस तकनीक में तीन गुना तक ज्यादा पैदावार की क्षमता है। इस तकनीक का फायदा उठाने के लिए शुरुआती तौर पर पायलट आधार पर 50 एकड़ जमीन में मूंगफली की बुआई की गई है। पौधों की शुरुआती विकास से पता चलता है कि यह संतोषजनक है। ऐसे में किसानों को भरोसा है कि मल्चिंग शीट्स के नीचे लगाए गए पौधे से खुले आसमान के मुकाबले ज्यादा पैदावार होगी। चीनी कृषि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित मल्चिंग टेक्नोलॉजी में नमी से संरक्षण व अधिकतम पैदावार की खातिर मूंगफली के पौधे को स्पेशल मल्चिंग प्लास्टिक शीट्स से ढकने की जरूरत होती है। इंडियन ऑयलसीड्स ऐंड प्रड्यूस एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन नीलेश वीरा ने कहा - मूंगफली की खेती में इस्तेमाल होने वाली परंपरागत तकनीक के मुकाबले इस तकनीक में 2 से 3 गुना ज्यादा पैदावार की क्षमता है। इसका मतलब यह हुआ कि इस तकनीक के जरिए भारत में मूंगफली की खेती का कायापलट हो सकता है। परंपरागत तकनीक के जरिए होने वाली मूंगफली की खेती में मौजूदा समय में 700-900 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की पैदावार होती है, जो वैश्विक औसत 2200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के मुकाबले एक तिहाई है। इसके मुकाबले चीन में मूंगफली की पैदावार 2300-2400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से होती है जबकि अमेरिका व अर्जेंटीना में इसकी पैदावार क्रमश: 3000 और 2800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। वीरा ने कहा कि ट्रायल आधार पर हमने गुजरात में यह तकनीक अपना ली है। अगर यह अच्छा साबित हुआ तो मूंगफली की खेती में नई तकनीक का विस्तार देश के दूसरे हिस्से में भी किया जाएगा। इस तकनीक का फायदा यह है कि फसल को मॉनसून की बारिश पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं पड़ती। (BS Hindi)
'खत्म हो आयातित रबर का औचक निरीक्षण
कोच्चि April 14, 2011 ऑल इंडिया रबर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (एआईआरआईए) और ऑटोमेटिव टायर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ने रबर बोर्ड द्वारा आयातित प्राकृतिक रबर के औचक निरीक्षण की व्यवस्था को खत्म करने की मांग की है। इन दोनों संगठनों का कहना है कि निरीक्षण की वजह से मंजूरी में देरी होती है और इससे उत्पादन प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। ऊंची कीमतों और इस वजह से पडऩे वाले आर्थिक प्रभाव को देखते हुए यहां की कंपनियां उतनी ही मात्रा में प्राकृतिक रबर मंगाती हैं जितने की जरूरत हो। ऐसे में अगर मंजूरी मिलने में देरी हो तो पूरी उत्पादन प्रक्रिया बाधित होती है और निर्यात ऑर्डर भी समय पर पूरे नहीं हो पाते। ये बातें इस उद्योग के प्रतिनिधियों ने सरकार के समक्ष उठाई हैं। औचक निरीक्षण की व्यवस्था 2004 में शुरू हुई थी। इसका मकसद यह जांच करना है कि आयातित रबर तकनीक और गुणवत्ता के स्तर पर तय मानकों पर खरा उतरता है या नहीं। इस उद्योग ने सरकार से यह भी कहा है कि प्राकृतिक रबर अंतिम उत्पाद नहीं है बल्कि कच्चा माल है इसलिए इसकी गुणवत्ता के बजाए तैयार उत्पाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि आयातित प्राकृतिक रबर को कई स्तर से गुजारने के बाद इससे टायर जैसा कोई उत्पाद तैयार होता है। सरकार से इन लोगों ने यह भी कहा है कि वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक रबर की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं और ऐसे में कोई भी कंपनी खराब गुणवत्ता वाला कच्चा माल नहीं खरीदना चाहेगी, क्योंकि इससे अंतिम उत्पाद की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी। (BS Hindi)
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