कुल पेज दृश्य

27 दिसंबर 2019

चालू सीजन में 354.50 लाख गांठ कपास के उत्पादन का अनुमान : सीएआई

आर एस राणा
नई दिल्ली। पहली अक्टूबर से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2019-20 में कपास का उत्पादन 13.62 फीसदी बढ़कर 354.50 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) होने का अनुमान है। अक्टूबर-नवंबर में पांच लाख गांठ कपास के निर्यात सौदे हो चुके हैं जबकि इतनी मात्रा में ही आयात भी हो चुका है।
कॉटन एसोसिएशन आफ इंडिया (सीएआई) के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार कपास का उत्पादन 354.50 लाख गांठ होने का अनुमान है जबकि पिछले साल केवल 312 लाख गांठ का ही उत्पादन हुआ था। सीएआई ने पहले अनुमान को जारी रखा है लेकिन कुछ राज्यों में उत्पादन अनुमान में बदलाव किया है। एसोसिएशन के मुताबिक उत्तर भारत में पैदावार 2.50 लाख गांठ कम होकर पहले अनुमान 65.5 लाख गांठ के मुकाबले 63 लाख गांठ रह सकती है। वहीं मध्य क्षेत्र में उत्पादन एक लाख गांठ कम होकर 196 लाख गांठ की जगह 195 लाख गांठ रहने का अनुमान है।
गुजरात में पिंक बॉलवर्म और बारिश से फसल को नुकसान
गुजरात में पिंक बॉलवर्म के हमले और बारिश से नुकसान की वजह से पैदावार करीब 4 लाख गांठ कम होकर 96 लाख गांठ ही होने का अनुमान है। वहीं महाराष्ट्र में उत्पादन 3 लाख गांठ बढ़कर 83 लाख गांठ होने की उम्मीद है। साथ ही तेलंगाना में 3 लाख गांठ और कर्नाटक में 50,000 गांठ पैदावार बढ़कर इन राज्यों में क्रमश: 51 लाख गांठ और 20.50 लाख गांठ होने का अनुमान है। अन्य राज्यों में मध्य प्रदेश में 16 लाख गांठ, आंध्रप्रदेश में 15 लाख गांठ और तमिलनाडु में 5 लाख गांठ तथा ओडिशा में 4 लाख गांठ उत्पादन का अनुमान है।
निर्यात पिछले साल के बराबर, आयात में कमी आने का अनुमान
सीएआई के अनुसार चालू फसल सीजन के पहले दो महीनों अक्टूबर-नवंबर में कपास का निर्यात 5 लाख गांठ का हुआ है, जबकि इतनी मात्रा में ही आयात भी हो चुका है। चालू फसल सीजन में 42 लाख गांठ कपास के निर्यात का अनुमान है जोकि पिछले साल के लगभग बराबर ही है। कपास का आयात चालू सीजन में घटकर 25 लाख गांठ ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 32 लाख गांठ कपास का निर्यात हुआ था। उत्पादक मंडियों में अक्टूबर-नवंबर में 56.15 लाख गांठ कपास की आवक हो चुकी है।
सीएबी का उत्पादन अनुमान ज्यादा
कॉटन एडवाइजरी बोर्ड (सीएबी) ने फसल सीजन 2019-20 में देश में कपास का उत्पादन 360 लाख गांठ होने का अनुमान जारी किया है, तथा निर्यात 50 लाख गांठ होने का अनुमान सीएबी का है। ..........  आर एस राणा

सोयाबीन का आयात बढ़कर तीन लाख टन होने का अनुमान : सोपा

आर एस राणा
नई दिल्ली। सोयाबीन के उत्पादक राज्यों में बेमौसम बारिश और बाढ़ से सोयाबीन की फसल को नुकसान हुआ है जिससे चालू फसल सीजन में आयात बढ़कर तीन लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले फसल सीजन में 1.80 लाख टन का आयात हुआ था।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (सोपा) के अनुसार चालू फसल सीजन 2019-20 में सोयाबीन का उत्पादन घटकर 89.84 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 109.33 लाख टन का उत्पादन हुआ था। नई फसल की आवक के समय उत्पादक राज्यों में 1.70 लाख टन सोयाबीन का बकाया स्टॉक बचा हुआ था, अत: चालू सीजन में कुल उपलब्धता 91.54 लाख टन की बैठेगी।
बेनिन से लग रहे हैं सोयाबीन के आयात पड़ते
सोपा के उपाध्यक्ष नरेश गोयनका ने बताया कि बेनिन से सोयाबीन के आयात पड़ते लग रहे हैं। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में सोयाबीन की कुल उपलब्धता कम है, जिस कारण आयात पिछले साल से ज्यादा ही होगा। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की मंडियों में सोयाबीन के भाव 4,000 से 4,050 रुपये और प्लांट डिलीवरी भाव 4,150 से 4,200 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। सोया रिफाइंड तेल में मांग अच्छी बनी हुई है लेकिन डीओसी में निर्यात पड़ते नहीं लग रहे है। सोया डीओसी के भाव 33,000 से 33,500 रुपये प्रति टन हैं।
डीओसी के निर्यात में भारी कमी
सोपा के अनुसार अक्टूबर-नवंबर में उत्पादक मंडियों में 30.50 लाख टन सोयाबीन की आवक हुई है जबकि पिछले साल इस दौरान 41 लाख टन की आवक हुई थी। सोया डीओसी का उत्पादक अक्टूबर-नवंबर में 11.74 लाख टन का हुआ है, जबकि इस दौरान निर्यात केवल 1.13 लाख टन का ही हुआ है। पिछले साल अक्टूबर-नवंबर में 4.57 लाख टन सोया डीओसी का निर्यात हुआ था। कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू फसल सीजन 2019-20 में सोयाबीन का 135.05 लाख टन होने का है, जबकि पिछले साल 137.86 लाख टन का उत्पादन हुआ था।............ आर एस राणा

तोरिया के एमएसपी में 525 रुपये की बढ़ोतरी कर भाव 4,425 रुपये किया

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने रबी तिलहन की फसल तोरिया का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 525 रुपये बढ़ाकर 4,425 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार रबी विपणन सीजन 2019-20 के लिए तोरिया का एमएसपी 3,900 रुपये प्रति क्विंटल था। तोरिया की फसल रबी सीजन की अन्य तिलहनी फसल सरसों के बजाए कम अवधि में तैयार होती है।
कृषि मंत्रालय द्वारा जारी बयान के अनुसार रबी विपणन सीजन 2020-21 के लिए तोरिया का एमएसपी तय किया गया है, तथा आगामी रबी विपणन सीजन में तोरिया की एमएसपी पर खरीद के लिए नेफेड के साथ ही स्मॉल फार्मर्स एग्री बिजनेस कंसोर्टियम (एसएफएसी) और अन्य नामित केंद्रीय एजेंसियों ने नामित किया गया है। आगामी रबी विपणन सीजन 2020-21 में ये कंपनियों तोरिया की सीधे किसानों से खरीद करेंगी।
कम समय पर पककर तैयार होती है तोरिया की फसल
तोरिया की फसल एक छोटी अवधि की फसल है। सरसों की नई फसल की आवक उत्पादक मंडियों में जहां मार्च में आती है, वहीं तोरिया की नई फसल की आवक फरवरी में शुरू हो जाती है। तोरिया की खेती मुख्य रूप से पूर्व में असम, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में की जाती है। इसके अलावा इसकी खेती पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमित क्षेत्रों में भी की जाती है। तोरिया रबी मौसम में उगाई जाने वाली तिलहनी फसल है। तोरिया की कुछ किस्में 85 से 90 दिन में पककर तैयार हो जाती है। केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2020-21 के लिए सरसों का एमएसपी 4,425 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।...........  आर एस राणा

रबी में गेहूं के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई बढ़ी, दलहन की घटी

आर एस राणा
नई दिल्ली। रबी की प्रमुख फसल गेहूं के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई में तो बढ़ोतरी हुई है, लेकिन दालों की बुआई अभी भी पिछे चल रही है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में फसलों की बुआई बढ़कर 418.47 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 413.36 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।
रबी की प्रमुख फसल गेहूं की बुआई बढ़कर चालू सीजन में 202.54 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 194.21 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। चालू सीजन में दलहन की बुआई पिछड़कर 105.16 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 111.90 लाख हेक्टेयर में दालों की बुआई हो चुकी थी। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुआई पिछले साल के 76.54 लाख हेक्टेयर से घटकर 71.77 लाख हेक्टयेर में ही हुई है। मसूर की बुआई चालू रबी में 12.12 लाख हेक्टेयर में और मटर की 7.24 लाख हेक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 13.53 और 7.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। उड़द और मूंग की बुआई क्रमश: 3.69 और 1.09 लाख हेक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमश: 3 और 1.15 लाख हेक्टयेर में हुई थी।
मोटे अनाजों की कुल बुआई बढ़ी, मक्का की घटी
मोटे अनाजों की बुआई चालू रबी में बढ़कर 35.56 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 32.75 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मोटे अनाजों में ज्वार की बुआई चालू रबी में बढ़कर 21.22 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई 18.20 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हुई थी। मक्का की बुआई चालू रबी में 7.88 लाख हेक्टेयर और जौ की बुआई 5.95 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमश: 8.71 और 5.45 लाख हेक्टेयर में हुई थी।
रबी तिलहन में सरसों की बुआई थोड़ी पिछे
रबी तिलहन की बुआई चालू सीजन में 65.05 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 66.10 लाख हेक्टेयर हो चुकी थी। रबी तिलहन की प्रमुख फसल सरसों की बुआई 59.12 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 60.24 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। मूंगफली की बुआई 2.43 लाख हेक्टेयर में और अलसी की बुआई 2.07 लाख हेक्टेयर तथा सनफ्लावर की बुआई 65 हजार हेक्टेयर में हुई है।.............  आर एस राणा

विश्व बाजार में कीमतें कम होने से डीओसी का निर्यात नवंबर में 64 फीसदी घटा

आर एस राणा
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीतमें कम होने की वजह से नवंबर में डीओसी के निर्यात में 64 फीसदी की भारी गिरावट आकर कुल निर्यात 1,26,128 टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल नवंबर में इसका निर्यात 3,53,405 टन का हुआ था।
साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार डीओसी की कीमतें विश्व बाजार में नीचे बनी हुई है, जिसका असर निर्यात सौदे पर पड़ रहा है। चालू वित्त वर्ष 2019-20 के पहले 8 महीनों अप्रैल से नवंबर के दौरान डीओसी का निर्यात 21 फीसदी घटकर 16,52,599 टन का ही हुआ है जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 20,86,321 टन का हुआ था। वित्त वर्ष 2018-19 में डीओसी का कुल निर्यात 33,24,693 टन का हुआ था।
सोया डीओसी के निर्यात में आई सबसे ज्यादा कमी
एसईए के अनुसार नवंबर में सोया डीओसी के निर्यात में सबसे ज्यादा गिरावट आई है, नवंबर में सोया डीओसी का केवल 9,574 टन का ही निर्यात हुआ है, जबकि पिछले साल नवंबर में 63,800 टन का निर्यात हुआ था। चालू तेल वर्ष के पहले 8 महीनों में सोया डीओसी का निर्यात घटकर 4,37,275 टन का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 7,53,954 टन का हुआ है। सरसों डीओसी का निर्यात नवंबर में तो कम हुआ है लेकिन चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से नवंबर के दौरान कुल निर्यात बढ़कर 7,76,161 टन का हुआ है जबकि वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 6,67,775 टन का हुआ था। केस्टर डीओसी का निर्यात चालू वित्त वर्ष के पहले 8 महीनों में 4,31,692 टन और राइस ब्रान डीओसी का निर्यात 1,15,160 टन का हुआ है।
डीओसी की कीमतें नवंबर में हुई तेज
सोया डीओसी के भाव भारतीय बंदरगाह पर नवंबर में बढ़कर 449 डॉलर प्रति टन हो गए जबकि अक्टूबर में इसका भाव 439 डॉलर प्रति टन था। इसी तरह से सरसों डीओसी का भाव अक्टूबर के 237 डॉलर से बढ़कर नवंबर में 249 डॉलर प्रति टन हो गया। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से नवंबर के दौरान दक्षिण कोरिया ने डीओसी का आयात ज्यादा किया है, लेकिन वियतनाम, ईरान, थाइलैंड और ताईवान ने आयात कम किया है। ..... आर एस राणा

पेराई में देरी से पहले दो महीनों में चीनी उत्पादन 54 फीसदी घटा : उद्योग

आर एस राणा
नई दिल्ली। महाराष्ट्र में पेराई में देरी होने से पहली अक्टूबर 2019 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन 2019-20 के पहले दो महीनों में नवंबर अंत तक चीनी का उत्पादन 54 फीसदी घटकर 18.85 लाख टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 40.69 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के अनुसार चालू पेराई सीजन में महाराष्ट्र की चीनी मिलों में देरी से पेराई आरंभ हुई है तथा अभी भी राज्य की केवल 43 चीनी मिलों में पेराई आरंभ हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 175 मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी थी। राज्य में 30 नवंबर तक केवल 67,000 टन चीनी का ही उत्पादन हुआ है, जबकि पिछले पेराई सीजन में अक्टूबर-नवंबर में 18.89 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। महाराष्ट्र में सूखे और बाढ़ से गन्ने की फसल को भारी नुकसान हुआ है जिस कारण राज्य में चीनी का उत्पादन पिछले साल के 107 लाख टन की तुलना में चालू पेराई सीजन में 58.3 लाख टन ही होने का अनुमान है।
उत्तर प्रदेश में बढ़ा है उत्पादन
उत्तर प्रदेश में चालू पेराई सीजन में नवंबर अंत तक चीनी का उत्पादन थोड़ा बढ़कर 10.81 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले पेराई सीजन में इस दौरान राज्य में 9.14 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ था। राज्य की 111 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ कर दी है, जबकि पिछले साल इस समय तक 105 चीनी मिलों ने ही पेराई आरंभ की थी।
कर्नाटक एवं अन्य राज्यों में उत्पादन कम
कर्नाटक में चालू पेराई सीजन में 30 नवंबर 2019 तक राज्य में 61 चीनी मिलों ने 5.21 लाख टन चीनी का उत्पादन ही किया है जबकि पिछले पेराई सीजन में राज्य की 63 चीनी मिलों ने 8.40 लाख टन चीनी का उत्पादन किया था। गुजरात में बेमौसम बारिश की वजह से राज्य चीनी मिलों ने करीब 20 दिन की देरी से पेराई आरंभ की है। राज्य में 14 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ कर दी है तथा अभी तक 75 हजार चीनी का ही उत्पादन हुआ है जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में राज्य में 16 मिलों ने पेराई आरंभ कर दी थी, और 2.05 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका था। अन्य उत्पादक राज्यों में 50 चीनी मिलों ने पेराई आरंभ की है तथा 1.41 लाख टन चीनी का उत्पादन ही हुआ है जबकि पिछले साल 60 मिलों में पेराई आरंभ हो चुकी थी तथा 2.21 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका था।
चीनी मिलों पर पिछले पेराई सीजन का 5,000 करोड़ रुपये किसानों का अभी भी बकाया
इस्मा के अनुसार चालू पेराई सीजन में चीनी मिलों ने करीब 15 लाख टन चीनी निर्यात के सौदे ईरान, श्रीलंका, अफगानिस्तान और अफ्रीकी देशों को किए हैं। चीनी के भाव उत्तर भारत में एक्स फैक्ट्री 3,250 से 3,300 रुपये और महाराष्ट्र में चीनी के एक्स फैक्ट्री भाव 3,100 से 3,250 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। गन्ना उत्पादक राज्यों के अनुसार चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का पेराई सीजन 2018-19 का 30 नवंबर 2019 तक करीब 5,000 करोड़ रुपये बकाया बचा हुआ है।
उत्पादन अनुमान पिछले साल की तुलना में कम
इस्मा के अनुसार चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन 260 लाख टन होने का ही होने का अनुमान है जबकि खाद्य एवं उपभोक्ता मामले मंत्रालय के अनुसार चालू पेराई सीजन 2019-20 में देश में चीनी का उत्पादन 273 लाख टन होने का अनुमान है जोकि पिछले पेराई सीजन 331 लाख टन से कम है। हालांकि पेराई सीजन के आरंभ में 140 लाख टन चीनी का बकाया स्टॉक बचा है, जिस कारण चीनी की कुल उपलब्धता 413 लाख टन की बैठेगी, जबकि देश में चीनी की सालाना खपत 260 लाख टन की ही होती है। ............   आर एस राणा

01 दिसंबर 2019

दिसंबर अंत तक ही मिलेगी प्याज की उंची कीमतों से राहत, आयात भी महंगा

आर एस राणा
नई दिल्ली। देश के कई शहरों में प्याज के खुदरा दाम 80 से 100 प्रति किलो बने हुए हैं। दिसंबर के अंत तक ही इससे राहत मिलने की उम्मीद है। जनवरी के शुरू में महाराष्ट्र और गुजरात में लेट खरीफ प्याज की फसल की आवक बनेगी, इसलिए दिसंबर के अंत में ही गिरावट आने का अनुमान है। आयातित प्याज महंगा होने के साथ ही इसकी क्वालिटी भी हल्की है। प्याज के प्रमुख उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान में अक्टूबर और नवंबर में हुई बेमौसम बारिश के साथ ही कई राज्यों में बाढ़ जैसे हालात बनने से प्याज की फसल को भारी नुकसान हुआ। इसीलिए उत्पादक मंडियों में प्याज की दैनिक आवक नहीं बढ़ पा रही है।
राजस्थान से आ रहा है इस समय नया प्याज
दिल्ली आजादपुर मंडी की पोटेटो एंड अनियन मर्चेंट एसोसिएशन (पोमा) के महासचिव राजेंद्र शर्मा ने आउटलुक को बताया कि दिल्ली में इस समय राजस्थान से प्याज की आवक हो रही है। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक तथा गुजरात में फसल को भारी नुकसान हुआ, जिस कारण इन राज्यों की अपनी मांग ही पूरी नहीं हो रही है। उन्होंने बताया कि शनिवार को दिल्ली में 80 ट्रक प्याज की आवक हुई, जिसमें से 76 ट्रक राजस्थान से आए थे। बाकी चार ट्रक आयातित प्याज के हैं। अफगानिस्तान से आयातित प्याज आ रहा है लेकिन इसकी क्वालिटी हल्की होने के कारण खुदरा विक्रेता इसे खरीद नहीं कर रहे हैं। अफगानिस्तान से आयातित प्याज का भाव आजादपुर मंडी में 50 रुपये प्रति किलो रहा, जबकि राजस्थान के प्याज का भाव 50 से 65 रुपये प्रति किलो रहा। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने 1.2 लाख टन प्याज के आयात की अनुमति दी है, लेकिन जिस देश में सालाना करीब 200 लाख टन की खपत होती हो, वहां 1.2 लाख टन से क्या होता है? वैसे भी दैनिक खपत ही करीब 50 हजार टन से ज्यादा की होती है।
जनवरी के आरंभ में आएगी लेट खरीफ प्याज की फसल
दिल्ली के प्याज के थोक कारोबारी सुरेंद्र कुमार गुप्ता ने बताया कि प्याज का उत्पादन रबी, खरीफ और लेट खरीफ सीजन में होता है। कुल उत्पादन का 60 से 65 फीसदी रबी सीजन में होता है जबकि 35 से 40 फीसदी उत्पादन खरीफ और लेट खरीफ में होता है। खरीफ की फसल की रोपाई जुलाई-अगस्त में की जाती है तथा इसकी खुदाई अक्टूबर से दिसंबर के दौरान होती है। लेट खरीफ की प्याज की रोपाई अक्टूबर-नवंबर में होती तथा इसकी खुदाई जनवरी-फरवरी में होती है। अत: लेट खरीफ प्याज की फसल की आवक जनवरी में बनेगी, इसलिए दिसंबर के अंत तक ही कीमतों में गिरावट आने का अनुमान है। उन्होंने बताया कि खरीफ और लेट खरीफ प्याज की फसल का भंडारण भी नहीं किया जाता है।
उत्पादक मंडियों में थोक में ही दाम ऊंचे
राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एनएचआरडीएफ) के अनुसार महाराष्ट्र की पीपलगांव मंडी में शुक्रवार को बढ़िया क्वालिटी के प्याज का भाव 68 से 78.51 रुपये प्रति किलो रहा जबकि 19 अक्टूबर को इसका भाव 34 से 61.56 रुपये प्रति किलो था। मंडी में शुक्रवार को प्याज की आवक 3,800 क्विंटल की हुई। पुणे मंडी में प्याज का भाव शुक्रवार को बढ़िया क्वालिटी का 80 रुपये प्रति किलो रहा, जबकि 19 नवंबर को इसका भाव 65 रुपये प्रति किलो था। लासलगांव मंडी में प्याज का भाव शुक्रवार को 62.26 रुपये प्रति किलो रहा जबकि 19 नवंबर को इसका भाव 63 रुपये प्रति किलो थे। अन्य मंडियों मालेगांव में शुक्रवार को प्याज का भाव 64.80 रुपये और कोल्हापुर में 75 रुपये प्रति किलो रहा। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के अनुसार फुटकर में प्याज के भाव शनिवार को दिल्ली में 76 रुपये, देहरादून में 75 रुपये, जम्मू में 80 रुपये, हिसार में 75 रुपये तथा पंचकुला में 90 रुपये प्रति किलो रहे।
बेमौसम बारिश से खरीफ प्याज उत्पादन में कमी
कृषि मंत्रालय के अनुसार उत्पादक राज्यों में बेमौसम बारिश और बाढ़ से प्याज की फसल को भारी नुकसान हुआ है। चालू खरीफ और लेट खरीफ में इसका उत्पादन घटकर 52.06 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल खरीफ और लेट खरीफ में उत्पादन 69.91 लाख टन का हुआ था। मंत्रलाय के अनुसार फसल सीजन 2018-19 में प्याज के उत्पादन का अनुमान 234.85 लाख टन का था, जो इसके पिछले साल के 232.62 लाख टन से ज्यादा ही था।............  आर एस राणा