नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश में खाद्य तेलों के आयात में 3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, जिसका प्रमुख कारण नेपाल से साफ्टा के तहत शुल्क मुक्त आयात को माना जा रहा है।
सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के दौरान देश में खाद्य तेलों का आयात 166.51 लाख टन का हुआ है, जोकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की समान अवधि के मुकाबले 3 फीसदी बढ़ा है। इस दौरान विश्व बाजार में खाद्य तेलों की कीमत बढ़ी है, और डॉलर के मुकाबले रुपये में बड़ी गिरावट दर्ज की गई।
खाद्य तेलों के कुल आयात में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण साफ्टा के तहत नेपाल से आयात में भारी बढ़ोतरी थी, जिसके तहत नेपाल, भारत को रिफाइंड खाने के तेलों का निर्यात जीरो ड्यूटी के तहत करता है। अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के दौरान नेपाल ने भारत को 7.36 लाख टन खाद्य तेलों का निर्यात किया, जबकि पिछले साल यह सिर्फ 3.45 लाख टन था, यानी कि 113 फीसदी की भारी बढ़ोतरी। नेपाल से देश में हुए आयात में रिफाइंड सोया तेल का बड़ा हिस्सा था, साथ ही सूरजमुखी तेल, आरबीडी पामोलिन और रेपसीड तेल की थोड़ी मात्रा भी थी।
अगर साफ्टा के तहत नेपाल को जीरो-ड्यूटी निर्यात की सुविधा नहीं मिली होती, तो 2025-26 के दौरान भारत का कुल खाद्य तेलों का आयात घरेलू मांग बढ़ने के बावजूद पिछले साल के मुकाबले कम ही होता। नेपाल से रिफाइंड तेलों के ड्यूटी-फ्री आयात में बढ़ोतरी ने इस साल भारत के कुल खाने के तेल के आयात में हुई बढ़ोतरी में काफी योगदान दिया।
भारत अभी भी खाद्य तेल के आयात पर निर्भर है क्योंकि घरेलू उत्पादन कुल खपत की सिर्फ 40 फीसदी ही पूरी करता है। तिलहन की कम पैदावार, जोत का आकार छोटा होना, सिंचाई की अपर्याप्त सुविधाएँ और गेहूं और धान की खेती को लेकर पॉलिसी में प्राथमिकता घरेलू तिलहन उत्पादन में बढ़ोतरी को रोक रही है।
एसोसिएशन का मानना है कि खाद्य तेलों के आयात पर लंबे समय की निर्भरता कम करने और घरेलू खाद्य तेल सेक्टर में स्थिरता पैदा करने के लिए, देश में तिलहन का उत्पादन बढ़ाना होगा। उत्पादकता में सुधार और देश के अंदर वैल्यू एडिशन को बढ़ावा देना जरूरी है। इस संदर्भ में, खाद्य तेलों की खपत कम करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील अहम हो जाती है, क्योंकि घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ ज्यादा खपत को कम करके आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा खर्च पर दबाव कम करने और बढ़ती ग्लोबल सप्लाई अनिश्चितताओं के बीच देश की लंबे समय की खाद्य तेलों की सुरक्षा में सुधार करने में मदद मिलेगी।

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