असफलता- संकट से उबरने के प्रयासों पर निवेशकों को भरोसा नहींनरमी का लाभ:- कॉपर की कीमतों में गिरावट का फायदा चीन को मिल रहा है। चीन की ओर से नई औद्योगिक मांग निकल रही है। चीन में शनिवार को पेश किए आंकड़ों के अनुसार, कॉपर का आयात नवंबर में 17.9 फीसदी बढ़कर 4,52,022 टन हो गया।यूरोप में आर्थिक एकीकरण के लिए प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इससे निवेशकों में भरोसा पैदा नहीं हो पा रहा है। यही वजह है कि न्यूयॉर्क कमोडिटी एक्सचेंज (नायमेक्स), लंदन मेटल एक्सचेंज (एल एमई) और शंघाई कमोडिटी एक्सचेंज में बेस मेटल्स में गिरावट दर्ज की गई।नायमैक्स में क्रूड ऑयल जनवरी की डिलीवरी १.६६ डॉलर गिरकर ९७.७५ डॉलर प्रति बैरल रह गए जबकि ब्रैंट १.६२ डॉलर गिरकर १०७ डॉलर प्रति बैरल रह गए।
एल एमई में तीन महीने की कॉपर डिलीवरी 2.24 फीसदी गिरकर 7,640 डॉलर प्रति टन रह गए। सोमवार को कारोबारी सत्र की शुरुआत में यह गिरकर 7,617.25 डॉलर प्रति टन तक गिरकर चला गया था। कॉपर में 30 नवंबर 2011 के बाद सर्वाधिक गिरावट दर्ज की गई। नायमेक्स में कॉपर तीन महीने की डिलीवरी 2.38 फीसदी गिरकर 346.60 डॉलर प्रति पाउंड रह गए।शंघाई में कॉपर तीन महीने की डिलीवरी 22.06 युआन गिरकर 444.70 युआन प्रति टन के स्तर पर पहुंच गया।
लंदन में एल्यूमीनियम तीन महीने की डिलीवरी 1.84 फीसदी गिरकर 2,027 डॉलर प्रति टन रह गए। वहीं शंघाई कमोडिटी एक्सचेंज में 17.94 युआन गिरकर एल्यूमीनियम की तीन महीने की डिलीवरी के भाव 2,470 युआन प्रति टन रह गए।
यूरोप में कर्ज का संकट गहराता जा रहा है और इसके लिए किए जा रहे उपाय पर्याप्त नहीं जो निवेशकों में भरोसा पैदा कर सकें। मेरिल लिंच के विश्लेषक माइकल विडूर का कहना है कि अमेरिका अर्थव्यवस्था की चाल लंबे समय से सुस्त पड़ गई है और यूरोप में लगातार कर्ज का संकट बना हुआ है जिससे मेटल्स में गिरावट दर्ज की गई।
कॉपर की कीमतों में गिरावट का फायदा चीन को मिल रहा है। चीन की ओर से नई औद्योगिक मांग निकल रही है। चीन में शनिवार को पेश किए आंकड़ों के अनुसार, कॉपर का आयात नवंबर में 17.9 फीसदी बढ़कर 4,52,022 टन हो गया। (Business Bhaskar)
13 दिसंबर 2011
प्याज की मंदी थामने को निर्यात मूल्य और घटाने की तैयारी
सरकार प्याज की घटती कीमतों से परेशान किसानों को राहत देने के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) में 50 डॉलर प्रति टन की और कटौती कर सकती है। नवंबर महीने में सरकार ने दो बार प्याज के एमईपी में क्रमश: 125 और 100 डॉलर प्रति टन की कटौती की थी।
सितंबर के मुकाबले अक्टूबर महीने में प्याज का निर्यात 29.5 फीसदी कम हुआ है जबकि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नई फसल की आवक शुरू हो गई है। जिससे उत्पादक मंडियों में प्याज का दाम घटकर तीन से सात रुपये प्रति किलो रह गया।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कृषि मंत्रालय ने प्याज के एमईपी में और कटौती की सिफारिश की है। वैसे भी खरीफ की नई फसल आने से राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात की मंडियों में प्याज के दाम लगातार घट रहे हैं। इसलिए मौजूदा एमईपी में और भी 50 डॉलर प्रति टन की कटौती करने पर विचार चल रहा है। उन्होंने बताया कि अक्टूबर महीने में केवल 93,000 टन प्याज का ही निर्यात हुआ है जबकि सितंबर महीने में 1.32 लाख टन का निर्यात हुआ था। इस समय प्याज का एमईपी 250 डॉलर प्रति टन है।
सरकार ने 18 नंवबर को प्याज के एमईपी में 125 डॉलर और फिर 28 नवंबर को 100 डॉलर की कटौती की थी। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 8.56 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10.14 लाख टन का निर्यात हुआ था। एनएचआरडीएफ के अनुसार वर्ष 2011-12 में प्याज का उत्पादन बढ़कर 151 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 145 लाख टन का उत्पादन हुआ था।
गुजरात ओनियन कंपनी के डायरेक्टर सुरेंद्र साहनी ने बताया कि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नए प्याज की आवक शुरू हो गई है। नासिक मंडी में प्याज का भाव घटकर 4,00 से 700 रुपये और राजस्थान की मंडियों में 3,00 से 5,00 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। गुजरात की मंडियों में 90 से 120 रुपये प्रति 20 किलो प्याज बिक रहा है।
दिल्ली में प्याज का भाव घटकर 5,00 से 600 रुपये प्रति क्विंटल रह गया तथा दिल्ली में दैनिक आवक 30 से 35 हजार कट्टों (एक कट्टा-40 किलो) हो रही है इसमें 90 से 95 फीसदी आवक राजस्थान से हो रही है। चालू महीने के आखिर में महाराष्ट्र से और जनवरी के पहले सप्ताह में गुजरात में प्याज की आवक बढ़ जाएगी जिससे दाम घटने की ही संभावना है। (Business Bhaskar.....R S Rana)
सितंबर के मुकाबले अक्टूबर महीने में प्याज का निर्यात 29.5 फीसदी कम हुआ है जबकि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नई फसल की आवक शुरू हो गई है। जिससे उत्पादक मंडियों में प्याज का दाम घटकर तीन से सात रुपये प्रति किलो रह गया।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कृषि मंत्रालय ने प्याज के एमईपी में और कटौती की सिफारिश की है। वैसे भी खरीफ की नई फसल आने से राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात की मंडियों में प्याज के दाम लगातार घट रहे हैं। इसलिए मौजूदा एमईपी में और भी 50 डॉलर प्रति टन की कटौती करने पर विचार चल रहा है। उन्होंने बताया कि अक्टूबर महीने में केवल 93,000 टन प्याज का ही निर्यात हुआ है जबकि सितंबर महीने में 1.32 लाख टन का निर्यात हुआ था। इस समय प्याज का एमईपी 250 डॉलर प्रति टन है।
सरकार ने 18 नंवबर को प्याज के एमईपी में 125 डॉलर और फिर 28 नवंबर को 100 डॉलर की कटौती की थी। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 8.56 लाख टन प्याज का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 10.14 लाख टन का निर्यात हुआ था। एनएचआरडीएफ के अनुसार वर्ष 2011-12 में प्याज का उत्पादन बढ़कर 151 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 145 लाख टन का उत्पादन हुआ था।
गुजरात ओनियन कंपनी के डायरेक्टर सुरेंद्र साहनी ने बताया कि महाराष्ट्र के बाद गुजरात में भी नए प्याज की आवक शुरू हो गई है। नासिक मंडी में प्याज का भाव घटकर 4,00 से 700 रुपये और राजस्थान की मंडियों में 3,00 से 5,00 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। गुजरात की मंडियों में 90 से 120 रुपये प्रति 20 किलो प्याज बिक रहा है।
दिल्ली में प्याज का भाव घटकर 5,00 से 600 रुपये प्रति क्विंटल रह गया तथा दिल्ली में दैनिक आवक 30 से 35 हजार कट्टों (एक कट्टा-40 किलो) हो रही है इसमें 90 से 95 फीसदी आवक राजस्थान से हो रही है। चालू महीने के आखिर में महाराष्ट्र से और जनवरी के पहले सप्ताह में गुजरात में प्याज की आवक बढ़ जाएगी जिससे दाम घटने की ही संभावना है। (Business Bhaskar.....R S Rana)
'किसानों को मिलेगी सब्सिडी'
मुंबई December 12, 2011
कपास की कीमतें महाराष्ट्र सरकार के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। जहां किसान संगठन व विपक्षी दल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार चुनाव आचार संहिता लागू होने का हवाला देकर इस पर कुछ भी बोलने से बच रही है। कपास की कीमतों को लेकर जारी हो हल्ला को देखते हुए घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है। सोमवार से शुरू हुआ राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र का पहला दिन कपास की कीमतों की भेंट चढ़ गया। विपक्षी दलों ने किसानों को ज्यादा मूल्य दिये जाने के मुद्दे को लेकर सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी। किसान संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार कपास किसानों के साथ भेदभाव कर रही है। जब गन्ने का न्यूनतम मूल्य बढ़ाया जा सकता है तो कपास, सोयाबीन और धान का मूल्य बढ़ाने में सरकार को परेशानी क्यों हो रही है। विपक्षी नेता एकनाथ खडसे के मुताबिक जब तक किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक सदन में कामकाज नहीं हो पाएगा। बिजली का बिल, पानी, खाद और मजदूरी में बढ़ोतरी हो गई है, जिससे प्रति हेक्टेयर उपज की लागत बढ़ गई है। ऐसे में किसानों को उनकी फसल के लिए जो मूल्य तय किया गया है, वह कम है। इसीलिए किसान संगठन और विपक्षी दल लंबे समय से सरकार से मांग कर रहे हैं कि कपास सहित सोयाबीन और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए, लेकिन सरकार चुप है। इसके लिए सदन की कार्यवाही में विपक्षी दल शामिल नहीं हो रहे हैं और न ही सदन को चलने दे रहे हैं।सत्ताधारी कांग्रेस और एनसीपी विपक्ष के इस रवैये को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहते हैं - सभी लोग चाहते हैं कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले, जिसके लिए राज्य सरकार ने केंद्र से बात भी की है। लेकिन फिलहाल कीमतों को नहीं बढ़ाया जा सकता है क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में निकाय चुनाव हो रहे हैं, जिसके चलते आचार संहिता लागू है। बकौल मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कपास का एमएसपी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से बात हो चुकी है। उन्होंने कहा - हमने तय किया है कि प्रति क्ंिवटल नहीं बल्कि प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किसानों को सब्सिडी दी जाएगी, लेकिन निकाय चुनाव के कारण चल रही आचार संहिता की वजह से राहत दिये जाने की घोषणा रोक ली गई है। जैसे ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, इसका ऐलान कर दिया जाएगा। इस साल केंद्र सरकार ने कपास का एमएसपी 3150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि किसान संगठन 6000 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के सूत्रों की मानी जाए तो सरकार कपास की कीमतें बढ़ाने का खाका तैयार कर चुकी है। अगर प्रति क्विंटल कीमतें दी जाएंगी तो इसका मूल्य 4285 रुपये प्रति क्विंटल दिये जाने की योजना बनाई गई है, लेकिन चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण सरकार इस बात की घोषणा नहीं कर पा रही है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया से प्राप्त कीमतों के अनुसार इस समय शंकर-6 किस्म का कपास 9870 रुपये ( 35100 रुपये प्रति कैंडी) के भाव बिक रहा है जबकि एक महीना पहले इसका भाव 10770 रुपये प्रति क्विंटल था। कपास की कीमतों में लगातार हो रही गिरावट की वजह घरेलू बाजार में कमजोर मांग को माना जा रहा है। इस समय देश भर की मंडिय़ों में हर दिन करीब 85,000 से 90,000 गांठ की आवक हो रही है, लेकिन कीमतों में अभी और कमी होने की आशंका को देखते हुए घरेलू मिले खरीदारी करने से बच रही हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल देश में कपास की पैदावार भी 8 फीसदी बढ़कर 361 लाख गांठ (एक गांठ बराबर 170 किलोग्राम) होने की संभावना है, जिसकी वजह से कीमतों में गिरावट हो रही है। (BS Hindi)
कपास की कीमतें महाराष्ट्र सरकार के लिए गले की हड्डी बनती जा रही है। जहां किसान संगठन व विपक्षी दल कपास का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाए जाने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार चुनाव आचार संहिता लागू होने का हवाला देकर इस पर कुछ भी बोलने से बच रही है। कपास की कीमतों को लेकर जारी हो हल्ला को देखते हुए घरेलू मांग कमजोर बनी हुई है। सोमवार से शुरू हुआ राज्य विधानसभा के शीतकालीन सत्र का पहला दिन कपास की कीमतों की भेंट चढ़ गया। विपक्षी दलों ने किसानों को ज्यादा मूल्य दिये जाने के मुद्दे को लेकर सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी। किसान संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार कपास किसानों के साथ भेदभाव कर रही है। जब गन्ने का न्यूनतम मूल्य बढ़ाया जा सकता है तो कपास, सोयाबीन और धान का मूल्य बढ़ाने में सरकार को परेशानी क्यों हो रही है। विपक्षी नेता एकनाथ खडसे के मुताबिक जब तक किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तब तक सदन में कामकाज नहीं हो पाएगा। बिजली का बिल, पानी, खाद और मजदूरी में बढ़ोतरी हो गई है, जिससे प्रति हेक्टेयर उपज की लागत बढ़ गई है। ऐसे में किसानों को उनकी फसल के लिए जो मूल्य तय किया गया है, वह कम है। इसीलिए किसान संगठन और विपक्षी दल लंबे समय से सरकार से मांग कर रहे हैं कि कपास सहित सोयाबीन और धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए, लेकिन सरकार चुप है। इसके लिए सदन की कार्यवाही में विपक्षी दल शामिल नहीं हो रहे हैं और न ही सदन को चलने दे रहे हैं।सत्ताधारी कांग्रेस और एनसीपी विपक्ष के इस रवैये को गैरजिम्मेदाराना बताते हुए कहते हैं - सभी लोग चाहते हैं कि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिले, जिसके लिए राज्य सरकार ने केंद्र से बात भी की है। लेकिन फिलहाल कीमतों को नहीं बढ़ाया जा सकता है क्योंकि राज्य के कई हिस्सों में निकाय चुनाव हो रहे हैं, जिसके चलते आचार संहिता लागू है। बकौल मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण कपास का एमएसपी बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से बात हो चुकी है। उन्होंने कहा - हमने तय किया है कि प्रति क्ंिवटल नहीं बल्कि प्रति हेक्टेयर के हिसाब से किसानों को सब्सिडी दी जाएगी, लेकिन निकाय चुनाव के कारण चल रही आचार संहिता की वजह से राहत दिये जाने की घोषणा रोक ली गई है। जैसे ही चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, इसका ऐलान कर दिया जाएगा। इस साल केंद्र सरकार ने कपास का एमएसपी 3150 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है, जबकि किसान संगठन 6000 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के सूत्रों की मानी जाए तो सरकार कपास की कीमतें बढ़ाने का खाका तैयार कर चुकी है। अगर प्रति क्विंटल कीमतें दी जाएंगी तो इसका मूल्य 4285 रुपये प्रति क्विंटल दिये जाने की योजना बनाई गई है, लेकिन चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण सरकार इस बात की घोषणा नहीं कर पा रही है। कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया से प्राप्त कीमतों के अनुसार इस समय शंकर-6 किस्म का कपास 9870 रुपये ( 35100 रुपये प्रति कैंडी) के भाव बिक रहा है जबकि एक महीना पहले इसका भाव 10770 रुपये प्रति क्विंटल था। कपास की कीमतों में लगातार हो रही गिरावट की वजह घरेलू बाजार में कमजोर मांग को माना जा रहा है। इस समय देश भर की मंडिय़ों में हर दिन करीब 85,000 से 90,000 गांठ की आवक हो रही है, लेकिन कीमतों में अभी और कमी होने की आशंका को देखते हुए घरेलू मिले खरीदारी करने से बच रही हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल देश में कपास की पैदावार भी 8 फीसदी बढ़कर 361 लाख गांठ (एक गांठ बराबर 170 किलोग्राम) होने की संभावना है, जिसकी वजह से कीमतों में गिरावट हो रही है। (BS Hindi)
हीरा कारोबारियों को पुराना केंद्र ही भाये, नया बोर्स नहीं लुभाये
मुंबई December 12, 2011
हीरा कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अरबों रुपये की लागत से बना भारत डायमंड बोर्स (बीडीबी) अभी तक कारोबारियों की पहली पसंद नहीं बन पाया है। कई समस्याओं के बावजूद अभी भी हीरा कारोबारियों के दिलो-दिमाग में ओपेरा हाउस का इलाका ही बसा हुआ है। कारोबारियों की दिलचस्पी के कारण इस इलाके में प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं जबकि बांद्रा कुर्ला कॉम्लेक्स (बीकेसी) में बीडीबी की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है।हीरा कारोबार के गढ़ ओपेरा हाउस के प्रसाद चैंबर में हाल में कुछ फ्लैटों (दफ्तर) की बिक्री ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हीरा कारोबारियों की पसंद बीडीबी नहीं बल्कि ओपेरा हाउस है। रियल एस्टेट में मंदी की वजह से चारों ओर कीमतें कम हो रही हैं या फिर स्थिर हैं, लेकिन इस इलाके में कारोबारियों की भारी मांग की वजह से कीमतें पिछले साल के मुकाबले करीब 25-30 फीसदी बढ़ गई हैं। प्रसाद चैंंबर की पहली मंजिल पर 700 वर्ग फुट के एक दफ्तर का सौदा 63,500 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से हुआ, जबकि तीसरी मंजिल में 300 वर्ग फुट का दफ्तर 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से बेचा गया है। पंचरत्ना बिल्डिंग की 17वीं मंजिल में 900 वर्ग फुट के भी एक दफ्तर का सौदा होने वाला है, जिसकी कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट मांगी जा रही है जबकि कारोबारियों ने इसकी कीमत 65 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट लगा रखी है। जानकारों की राय में इसका सौदा 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के आसपास होना मुमकिन है क्योंकि इस इलाके में दफ्तर मिलना मुश्किल होता है। हीरा कारोबार का प्रमुख गढ़ होने की वजह से कारोबारी किसी भी कीमत पर दफ्तर खरीदने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरी ओर आधुनिक सुविधाओं से लैस बीडीबी मंदी का शिकार होने लगा है। बीडीबी में चार महीने पहले दफ्तरों की कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट थी जो इस समय गिरकर 54 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट पर आ गई है। प्रसाद चैंबर के सचिव सतीश शाह कहते हैं कि कारोबारियों की मांग की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। नए दफ्तर नहीं बन रहे हैं। इसीलिए अगर कोई कंपनी पुराना दफ्तर बेचती है तो उसे खरीदने के लिए 10 लोग लाइन में खड़े हो जाते हैं। जिन लोगों ने अपने दफ्तर की बिक्री है, वे छोटे हीरा कारोबारी हैं, जो मंदी की वजह से सौदा कर रहे हैं। छोटे और मध्यम कारोबार करने वाले कारोबारी बीकेसी नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि वह महंगा पड़ रहा है। ओपेरा हाउस इलाके के लगभग सभी बिल्डिगों में रखरखाव शुल्क कम है, जबकि बीडीबी में 30-40 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से यह शुल्क देना पड़ता है। लोकल टे्रन की कनेक्टिविटी भी एक बड़ा मुद्दा है। हीरा कारोबार के जानकार हार्दिक हुंडिया कहते हैं कि हीरा कारोबारियों के बीच प्रसाद चैंंबर, पंचरत्ना व ओपेरा हाउस के दूसरे चैंंबरों में दफ्तर खरीदने की ललक कम नहीं हुई है। इसकी बड़ी वजह इस इलाके में पहले से जमा जमाया कारोबार है और दूसरी बात बीकेसी में असुरक्षा जैसी भावनाएं कारोबारियों को यहां से बाहर निकलने नहीं दे रही हैं।ओपेरा हाउस की करीब 13 बिल्डिगों में हीरा कारोबार होता है, जिन्हें देश के सबसे बड़े हीरा बाजार के रूप में जाना जाता है। जुलाई में प्रसाद चैंंबर के पास हुए बम धामके के बाद माना जा रहा था कि यह कारोबार बीकेसी के बीडीबी में शिफ्ट हो जाएगा और यहां कीमतें घटने लगेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। नाइन डायमंड के चेयरमैन संजय शाह कहते हैं कि बीकेसी में परविहन एक बड़ी समस्या है। दूसरी बात यह इलाका शाम 6 बजे बाद एकदम सुनसान हो जाता है, जिससे बाहर से आने वाले डायमंड ब्रोकर वहां नहीं जाना चाहते हैं और कारोबारियों को भी डर सताता है कि बांद्रा से बीकेसी जाने पर उनके जान माल का खतरा रहेगा। ओपेरा हाउस चर्नी रोड स्टेशन के पास है जिससे गुजरात या मुंबई के दूसरे हिस्सों से आने वाले कारोबारी, दलाल और ग्राहक आसानी से यहां आ जाते हैं। बढ़ सकता है किरायादफ्तरों की कीमत बढऩे के साथ ही यहां के दफ्तरों का किराया भी बढऩे वाला है। रियल एस्टेट एंजेटों और कारोबारियों की मानी जाए तो जनवरी से यहां के दफ्तरों का किराया 25 से 30 फीसदी बढ़ा दिया जाएगा। इस समय यहां दफ्तरों का किराया हर महीने 300 रुपये से 500 रुपये प्रति वर्ग फुट देना होता है, जो जनवरी से बढ़कर 400 रुपये से 700 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच सकता है। दूसरी तरफ बीडीबी में दफ्तरों की बुकिंग तो हो गई है, लेकिन अभी तक महज 27 हीरा कंपनियों ने ही यहां से कारोबार शुरू किया है। किराये पर दफ्तर लेने वालों का तो पूरी तरह अकाल है। (BS Hindi)
हीरा कारोबार को बढ़ावा देने के लिए अरबों रुपये की लागत से बना भारत डायमंड बोर्स (बीडीबी) अभी तक कारोबारियों की पहली पसंद नहीं बन पाया है। कई समस्याओं के बावजूद अभी भी हीरा कारोबारियों के दिलो-दिमाग में ओपेरा हाउस का इलाका ही बसा हुआ है। कारोबारियों की दिलचस्पी के कारण इस इलाके में प्रॉपर्टी की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं जबकि बांद्रा कुर्ला कॉम्लेक्स (बीकेसी) में बीडीबी की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है।हीरा कारोबार के गढ़ ओपेरा हाउस के प्रसाद चैंबर में हाल में कुछ फ्लैटों (दफ्तर) की बिक्री ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि हीरा कारोबारियों की पसंद बीडीबी नहीं बल्कि ओपेरा हाउस है। रियल एस्टेट में मंदी की वजह से चारों ओर कीमतें कम हो रही हैं या फिर स्थिर हैं, लेकिन इस इलाके में कारोबारियों की भारी मांग की वजह से कीमतें पिछले साल के मुकाबले करीब 25-30 फीसदी बढ़ गई हैं। प्रसाद चैंंबर की पहली मंजिल पर 700 वर्ग फुट के एक दफ्तर का सौदा 63,500 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से हुआ, जबकि तीसरी मंजिल में 300 वर्ग फुट का दफ्तर 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से बेचा गया है। पंचरत्ना बिल्डिंग की 17वीं मंजिल में 900 वर्ग फुट के भी एक दफ्तर का सौदा होने वाला है, जिसकी कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट मांगी जा रही है जबकि कारोबारियों ने इसकी कीमत 65 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट लगा रखी है। जानकारों की राय में इसका सौदा 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट के आसपास होना मुमकिन है क्योंकि इस इलाके में दफ्तर मिलना मुश्किल होता है। हीरा कारोबार का प्रमुख गढ़ होने की वजह से कारोबारी किसी भी कीमत पर दफ्तर खरीदने के लिए तैयार हो जाते हैं। दूसरी ओर आधुनिक सुविधाओं से लैस बीडीबी मंदी का शिकार होने लगा है। बीडीबी में चार महीने पहले दफ्तरों की कीमत 70 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट थी जो इस समय गिरकर 54 हजार रुपये प्रति वर्ग फुट पर आ गई है। प्रसाद चैंबर के सचिव सतीश शाह कहते हैं कि कारोबारियों की मांग की वजह से कीमतें बढ़ रही हैं। नए दफ्तर नहीं बन रहे हैं। इसीलिए अगर कोई कंपनी पुराना दफ्तर बेचती है तो उसे खरीदने के लिए 10 लोग लाइन में खड़े हो जाते हैं। जिन लोगों ने अपने दफ्तर की बिक्री है, वे छोटे हीरा कारोबारी हैं, जो मंदी की वजह से सौदा कर रहे हैं। छोटे और मध्यम कारोबार करने वाले कारोबारी बीकेसी नहीं जाना चाहते हैं क्योंकि वह महंगा पड़ रहा है। ओपेरा हाउस इलाके के लगभग सभी बिल्डिगों में रखरखाव शुल्क कम है, जबकि बीडीबी में 30-40 रुपये प्रति वर्ग फुट के हिसाब से यह शुल्क देना पड़ता है। लोकल टे्रन की कनेक्टिविटी भी एक बड़ा मुद्दा है। हीरा कारोबार के जानकार हार्दिक हुंडिया कहते हैं कि हीरा कारोबारियों के बीच प्रसाद चैंंबर, पंचरत्ना व ओपेरा हाउस के दूसरे चैंंबरों में दफ्तर खरीदने की ललक कम नहीं हुई है। इसकी बड़ी वजह इस इलाके में पहले से जमा जमाया कारोबार है और दूसरी बात बीकेसी में असुरक्षा जैसी भावनाएं कारोबारियों को यहां से बाहर निकलने नहीं दे रही हैं।ओपेरा हाउस की करीब 13 बिल्डिगों में हीरा कारोबार होता है, जिन्हें देश के सबसे बड़े हीरा बाजार के रूप में जाना जाता है। जुलाई में प्रसाद चैंंबर के पास हुए बम धामके के बाद माना जा रहा था कि यह कारोबार बीकेसी के बीडीबी में शिफ्ट हो जाएगा और यहां कीमतें घटने लगेंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। नाइन डायमंड के चेयरमैन संजय शाह कहते हैं कि बीकेसी में परविहन एक बड़ी समस्या है। दूसरी बात यह इलाका शाम 6 बजे बाद एकदम सुनसान हो जाता है, जिससे बाहर से आने वाले डायमंड ब्रोकर वहां नहीं जाना चाहते हैं और कारोबारियों को भी डर सताता है कि बांद्रा से बीकेसी जाने पर उनके जान माल का खतरा रहेगा। ओपेरा हाउस चर्नी रोड स्टेशन के पास है जिससे गुजरात या मुंबई के दूसरे हिस्सों से आने वाले कारोबारी, दलाल और ग्राहक आसानी से यहां आ जाते हैं। बढ़ सकता है किरायादफ्तरों की कीमत बढऩे के साथ ही यहां के दफ्तरों का किराया भी बढऩे वाला है। रियल एस्टेट एंजेटों और कारोबारियों की मानी जाए तो जनवरी से यहां के दफ्तरों का किराया 25 से 30 फीसदी बढ़ा दिया जाएगा। इस समय यहां दफ्तरों का किराया हर महीने 300 रुपये से 500 रुपये प्रति वर्ग फुट देना होता है, जो जनवरी से बढ़कर 400 रुपये से 700 रुपये प्रति वर्ग फुट तक पहुंच सकता है। दूसरी तरफ बीडीबी में दफ्तरों की बुकिंग तो हो गई है, लेकिन अभी तक महज 27 हीरा कंपनियों ने ही यहां से कारोबार शुरू किया है। किराये पर दफ्तर लेने वालों का तो पूरी तरह अकाल है। (BS Hindi)
चावल निर्यात तीन गुना बढ़ने की उम्मीद
नई दिल्ली : देश से चावल का निर्यात 2011-12 में करीब तीन गुना बढ़कर 70 लाख टन हो जाने की उम्मीद है। उत्पादन बढ़ने तथा प्रमुख निर्यात देशों में उत्पादन कम रहने के कारण देश से चावल का निर्यात अधिक रहने की उम्मीद है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कहा, ‘2011-12 (अक्तूबर से सितंबर) में चावल का बंपर उत्पादन होने की उम्मीद है। साथ ही सरकार ने गैर-बासमती चावल के निर्यात पर से प्रतिबंध हटा दिया है, वहीं प्रमुख चावल निर्यातक देशों में उत्पादन कम रहने की आशंका है। ऐसे में भारत से चावल निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है।’
एजेंसी ने बयान में कहा कि वैश्विक चावल कारोबार में भारत की हिस्सेदारी 2011-12 में 21 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। 2010-11 देश की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत थी। क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक गुरप्रीत चटवाल ने कहा, ‘हम भारत से 2011-12 में लगभग 70 लाख टन चावल निर्यात की उम्मीद कर रहे हैं जो 2010-11 में 22 लाख टन था।’ (Z news)
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने कहा, ‘2011-12 (अक्तूबर से सितंबर) में चावल का बंपर उत्पादन होने की उम्मीद है। साथ ही सरकार ने गैर-बासमती चावल के निर्यात पर से प्रतिबंध हटा दिया है, वहीं प्रमुख चावल निर्यातक देशों में उत्पादन कम रहने की आशंका है। ऐसे में भारत से चावल निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है।’
एजेंसी ने बयान में कहा कि वैश्विक चावल कारोबार में भारत की हिस्सेदारी 2011-12 में 21 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है। 2010-11 देश की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत थी। क्रिसिल रेटिंग्स के निदेशक गुरप्रीत चटवाल ने कहा, ‘हम भारत से 2011-12 में लगभग 70 लाख टन चावल निर्यात की उम्मीद कर रहे हैं जो 2010-11 में 22 लाख टन था।’ (Z news)
ग़रीबों को मिलेगा अन्न का अधिकार
देश में पहली बार खाद्य सुरक्षा का क़ानूनी अधिकार देने वाले बिल पर आज कैबिनेट में अंतिम मुहर लगेगी। ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के साथ ही देश की बड़ी आबादी को अन्न का अधिकार देने वाला यह बिल यूपीए सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट है, जिससे आम आदमी के साथ होने का सरकार का दावा सही साबित होता दिखे। यूपीए सरकार मनरेगा के बाद अब तक के सबसे बड़े प्रॉजेक्ट को पेश करने जा रही है। देश की 63 फ़ीसदी आबादी को खाने की गारंटी देने वाले इस बिल के रास्ते में हालांकि कई रुकावटें भी आईं और सरकार के भीतर ही इसपर काफ़ी विरोध हुआ, लेकिन सोनिया गांधी की पहल के बाद आख़िरकार इस बिल को इसी सत्र में लाने का फ़ैसला किया गया। खाद्य सुरक्षा बिल के तहत-हर महीने ग़रीबों को 25 किलो अनाज तीन रुपये प्रति किलो की सस्ती दर पर उपलब्ध कराया जाएगा -खाद्य सुरक्षा बिल में पहली बार अनाज देने के लिए ग़रीबी रेखा को आधार नहीं बनाया गया है -बिल के मुताबिक, ग्रामीण इलाक़ों में 75 फ़ीसदी लोगों को खाद्य सुरक्षा के तहत लाया जाएगा, जबकि शहरी क्षेत्रों में भी 50 फ़ीसदी लोगों को भोजन का क़ानूनी अधिकार मिलेगा -ग्रामीण क्षेत्रों में 46 फ़ीसदी और शहरी इलाक़ों में 28 फ़ीसदी लोगों को प्रॉयोरिटी ग्रुप का दर्ज़ा दिया जाएगा, जिन्हें ग़रीबी रेखा से नीचे के लोगों के बराबर अनाज मिलेगा -बिल के मुताबिक, प्रॉयरिटी ग्रुप में आने वाले हर शख़्स को हर महीने 7 किलो राशन दिया जाएगा, जबकि अन्य लोगों के लिए 3 किलो राशन का प्रावधान होगा -संयुक्त राष्ट्र द्वारा परिभाषित ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या भारत में 41 करोड़ है। यह संख्या उन लोगों की है, जिनकी एक दिन की आमदनी 1.25 डॉलर से भी कम है ऐसे में ग़रीबी और भुखमरी से जुझते लोंगों के लिए खाद्य सुरक्षा बिल में उम्मीद की किरण दिख रही है। राजनीतिक और आर्थिक फ़्रंट पर विपक्ष का हमला झेल रही यूपीए सरकार को खाद्य बिल से काफ़ी उम्मीदें हैं। हालांकि खाद्य सुरक्षा बिल अगर क़ानूनी शक्ल लेता है, तो सरकार पर 32 हज़ार करोड़ रुपये का आर्थिक बोझ बढ़ेगा। हालांकि इस बिल के तहत आने वाले ग़रीबों की पहचान और क़ानूनी अड़चनों को लेकर भी कुछ परेशानी है। लेकिन अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक और आर्थिक संकट से जूझ रही यूपीए सरकार को इस बिल से काफ़ी उम्मीदें हैं। (PZ news)
खाद्य सुरक्षा बिल को आज मिल सकती है मंजूरी
नई दिल्ली: केंद्र सरकार आज अपनी खाद्य सुरक्षा योजना को हरी झंडी दे सकती है.हो सकता है कि आज यह तय हो जाए कि देश में कोई गरीब भूखा नहीं रहेगा और हर किसी दो वक्त की रोटी नसीब होगी. दरअसल, कांग्रेस और सोनिया गांधी की महत्वाकांक्षी योजना 'खाद्य सुरक्षा बिल' को आज कैबिनेट से मंजूरी मिल सकती है. सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने सरकार को बताया है कि खाद्य सुरक्षा बिल क्या होना चाहिए और क्या नहीं. खाद्य सुरक्षा बिल की अहम बात यह है कि खाद्य सुरक्षा कानून बनने से देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मिलेगा. खाद्य सुरक्षा बिल में शहरी इलाकों में रह रहे ग़रीब भी शामिल किए गए हैं. इस बिल से गांवों की 75 फीसदी आबादी और 50 फीसदीत शहरी गरीबों को अनाज की गारंटी मिलेगी.खाद्य सुरक्षा बिल में सरकार ने अपनी प्राथमिकता को दो हिस्सों में बांटा है. गांवों में ग़रीबी रेखा के नीचे जीवन बसर कर रहे लोग सरकार की प्राथमिकता में है.इस बिल के लागू हो जाने के बाद बीपीएल परिवारों के हर सदस्य को हर महीने सात किलो अनाज मिलेगा. बीपीएल परिवारों को तीन रुपये किलो चावल और दो रुपये किलो गेहूं मुहैया कराया जाएगा.इस बिल में गरीबी की रेखा से ऊपर रहने वाले परिवारों यानी एपीएल को भी सस्ता अनाज देने की व्यवस्था है. एपीएल परिवारों के हर सदस्य को हर महीने तीन किलो राशन मिलेगा. उन्हें य ह अनाज न्यूनतम समर्थन मूल्य की आधी कीमत पर उपलब्ध होगा.रियायती दरों पर गरीबों को अनाज देने की इस योजना पर सरकार हर साल एक लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी. (News Bullet.in)
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