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07 अप्रैल 2011

एमएसपी बढ़ाने की सिफारिश

मुंबई April 06, 2011 कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने धान और चावल का कारोबार खोलने की सिफारिश की है। अभी बासमती को छोड़कर चावल की किसी और किस्म का निर्यात नहीं होता है। आयोग ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,080 रुपये प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की है। अभी यह 1,000 रुपये प्रति क्विंटल है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि अगर बाजार को खोल दिया जाए तो किसानों को धान की मौजूदा दर से अधिक कीमत मिल सकती है। इन सूत्रों ने यह भी बताया कि एमएसपी पर आयोग ने अंतिम रिपोर्ट कृषि मंत्रालय को सौंप दी है और मंत्रालय जल्द ही इसे अंतिम रूप देगी। इस रिपोर्ट में देश के पूर्वी हिस्से के किसानों को धान और गेहूं पैदा करने के लिए अधिक प्रोत्साहन देने की मांग की गई है। आयोग ने कपास के लिए प्रति क्विंटल 2,800 रुपये, सूरजमुखी के लिए प्रति क्विंटल 2,850 रुपये, अरहर के लिए प्रति क्विंटल 3,100 रुपये, उड़द के लिए प्रति क्विंटल 3,300 रुपये, मूंग के लिए प्रति क्विंटल 3,450 रुपये, नाइजर बीज के लिए प्रति क्विंटल 2,900 रुपये और तिल के लिए प्रति क्विंटल 3,900 रुपये का न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है। तंबाकू के लिए एमएसपी में कोई बड़ा बदलाव न करते हुए इसे 5,000 रुपये प्रति क्विंटल पर रखा गया है। आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि धान का एमएसपी कम होने की वजह से किसानों को उचित हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा इस रिपोर्ट में मंडी कर हटाने की भी सिफारिश की गई है ताकि थोक और खुदरा बाजार में अनाज की कीमतों में कमी आ सके और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत अनाज की खरीद आसान हो सके। सूत्रों का कहना है कि अभी एमएसपी के दायरे में 50 फीसदी किसान आते हैं। आयोग का मत है कि ऊंची महंगाई दर की वजह न तो एमएसपी और न ही अनाजों की कीमतें बल्कि इसके लिए तो मांस-मछली और डेयरी उत्पादों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी जिम्मेदार है। एमएसपी तय करते वक्त उत्पादन लागत, मांग व आपूर्ति, बाजार की स्थिति, वैश्विक कीमतें और रहने का खर्च जैसे कई पहलुओं पर विचार किया जाता है। इस दौरान इस बात पर भी ध्यान दिया जाता है कि एमएसपी में बदलाव से उद्योग जगत और किसानों पर क्या असर पड़ेगा और किसानों को कितनी रकम मिलेगी। (BS Hindi)

06 अप्रैल 2011

10-20 फीसदी तक सस्ते हो सकते हैं खाद्य तेल

कोलकाता / अहमदाबाद : घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की कीमत अगले एक महीने में 10 से 20 फीसदी तक कम हो सकती है। दरअसल, खाद्य तेल बनाने वाली भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल की घटी कीमतों का लाभ उपभोक्ताओं को देने लगी हैं। खाद्य तेल उत्पादक कंपनी इमामी पहले ही कीमतों में कमी कर चुकी है। अब अदानी विल्मर ने कहा है कि वह स्थिति की समीक्षा कर रही है। भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा आयातक है। यहां हर साल लगभग 1.66 करोड़ टन खाद्य तेल की खपत होती है। यह अपनी खपत का आधा खाद्य तेल विदेश से मंगाता है। इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम ऑयल और ब्राजील और अर्जेंटीना से सोया तेल मंगाया जाता है। इमामी ग्रुप ऑफ कंपनीज के निदेशक आदित्य अग्रवाल के मुताबिक, 'अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले कुछ हफ्तों के दौरान खाद्य तेलों की कीमत में 15 फीसदी तक कमी आई है। हमने प्रोडक्ट के हिसाब से कीमतों में 10 से 20 फीसदी तक कमी की है। अगर विदेशी बाजार में कीमत और घटती है तो हम इसका फायदा उपभोक्ताओं को भी देंगे।' अग्रवाल ने कहा कि खाद्य तेलों की कीमत में गिरावट मई तक जारी रह सकती है। उन्होंने कहा कि कीमतों में सबसे ज्यादा गिरावट सोया और सूरजमुखी तेल सेगमेंट में आई है। इमामी 'हेल्दी एंड टेस्टी' ब्रांड से खाद्य तेल बेचती है। अग्रवाल ने कहा कि कीमतों में गिरावट से ब्रांडेड ऑयल कंपनियों को अपनी बिक्री बढ़ाने में मदद मिलेगी। घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की खपत सालाना 5 फीसदी की दर से बढ़ रही है। विश्लेषकों का मानना है कि खाद्य तेलों की लॉन्ग टर्म मांग में लगातार बढ़ोतरी हो सकती है। इसकी वजह भारत और चीन में खाद्य तेलों की खपत में बढ़ोतरी है। यहां लोगों की बढ़ती समृद्धि से लोगों के खान-पान में बदलाव आया है। पेस्ट्री, चॉकलेट और आइसक्रीम जैसे प्रोसेस्ड फूड की मांग बढ़ी है। इनमें खाद्य तेलों का इस्तेमाल होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेलों के दाम में कमी की वजह मलेशिया में सोयाबीन की ज्यादा पैदावार होने की खबरें और जापान में भूकंप और सुनामी से तबाही के चलते पाम ऑयल की कीमतों में कमी आने की आशंका है। विश्लेषकों का मानना है कि सट्टेबाजी के चलते भी खाद्य तेलों की कीमत में कमजोरी आई है। उम्मीद की जा रही है कि खाद्य तेलों की कीमतों में उतार-चढ़ाव अगले कुछ महीने तक जारी रह सकता है। इस साल रबी की तिलहन की पैदावार 98.7 लाख टन होने की उम्मीद है। पिछले साल तेल सीजन में 90.7 लाख टन तिलहन की पैदावार रही थी। इस साल कुल 2.54 करोड़ टन तिलहन उत्पादन होने की उम्मीद है, जो पिछले साल 2.28 करोड़ टन था। भारत में तेल सीजन नवंबर से अक्टूबर तक होता है। अदानी विल्मर के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर आंगशू मल्लिक ने कहा, 'सरसों की पैदावार इस साल काफी अच्छी रह सकती है। इस साल 75 लाख टन से ज्यादा तिलहन की पैदावार हो सकती है। पिछले तेल वर्ष में 55 लाख टन तिलहन उपजा था। इससे हमें काफी राहत मिली है।' अदानी विल्मर हर महीने फॉर्च्यून, किंग्ज, आइवरी और फ्रायोला ब्रांड के तहत लगभग एक लाख टन खाद्य तेल बेचती है। (ET Hindi)

2014 तक पांच गुना बढ़ जाएंगे कॉफी, चीनी के दाम

लंदन : कॉफी, चीनी और कोकोआ की आपूर्ति में कमी के चलते इनके दाम 2014 तक 5 से 10 गुना बढ़ने की आशंका है। सुपरफंड फाइनेंशियल के मुताबिक इसका यह मतलब होगा कि ग्राहकों पर खाद्य मुद्रास्फीति दर काफी करारी चोट करेगी। सुपरफंड फाइनेंशियल (हांगकांग) और सुपरफंड यूएसए के प्रबंध निदेशक एरोन स्मिथ ने कहा कि कृषि के लिए जमीन की कमी और बढ़ते खर्च का मतलब यह होगा कि किसान मांग के साथ रफ्तार बरकरार नहीं रख पाएंगे। सुपरफंड की 1.25 अरब डॉलर के एसेट अंडर मैनेजमेंट में करीब 40 फीसदी हिस्सा कमोडिटी से जुड़ा है। स्मिथ ने अनुमान लगाया था कि तांबे के दाम नवंबर में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएंगे और एक महीने बाद भविष्यवाणी की कि चांदी कीमत बढ़ने के मामले में सोने को भी पीछे छोड़ देगी। उनके दोनों अनुमान सटीक साबित हुए। वैश्विक स्तर पर खाद्य उत्पादों के दामों का संयुक्त राष्ट्र इंडेक्स पिछले महीने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। जनवरी में बर्लिन में मुलाकात के बाद 48 मुल्कों के कृषि मंत्रियों ने एक संयुक्त बयान में कहा था कि कीमतों में अत्यधिक उठापटक और सट्टेबाजी की वजह से वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। स्मिथ ने लंदन में दिए एक साक्षात्कार में कहा था, 'खाद्य उत्पादों और कृषि लायक जमीन की काफी कमी है। किसी भी तरह के खाद्य उत्पादों की कीमतों में इजाफा होना तय है।' जुलाई 1994 में दो साल में कॉफी की कीमतें पांच गुना से ज्यादा बढ़ी थीं, और फरवरी 2002 से मार्च 2005 में यह तिगुनी बढ़ी। चीनी के दाम जून 2002 से फरवरी 2006 के बीच चार गुना उछले, जबकि जून 2007 से लेकर पिछले साल फरवरी में यह तिगुने से ज्यादा बढे़। कोकोआ के दाम दिसंबर 2000 से दिसंबर 2003 के दौरान 242 फीसदी बढ़े हैं। न्यू यॉर्क में आईसीई फ्यूचर्स यूएस में ट्रेडिंग देखने वाली अरेबिका कॉफी बीते एक साल में दोगुने स्तर पर पहुंच चुका है। कच्ची चीनी की वायदा कीमत 51 फीसदी मजबूत होकर 27.03 सेंट प्रति पाउंड हो गई है, जबकि कोकोआ कम बदलाव देखने के बाद 2,960 डॉलर प्रति टन के स्तर पर खड़ा है। कोलम्बिया में बारिश से फसल को नुकसान पहुंचने और दुनिया के सबसे बड़े निर्यातक ब्राजील में कम पैदावार के अनुमान के बाद कॉफी की कीमतें उछल गईं। पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ आने के बाद चीनी मजबूत हुई, जबकि आइवरी कोस्ट में नवंबर में चुनावों के बाद हुई लड़ाई की वजह से निर्यात में रुकावट पैदा हुई और कोकोआ की कीमतों में इजाफा दर्ज किया गया। 1995 में वियना में शुरू हुई सुपरफंड तथाकथित मैनेज्ड फ्यूचर में विशेषज्ञता रखती है। अमेरिकी कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स फरवरी में 0.5 फीसदी चढ़ा है, जो जून 2009 के बाद सबसे ज्यादा है। चीन से लेकर इंडोनेशिया तक, एशियाई मुल्कों ने मुद्रास्फीति दर को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों में इजाफा किया है। यूरोपीय महंगाई दर मार्च में 2.6 फीसदी बढ़ी है, जो अक्टूबर 2008 के बाद सबसे तेज है और यह यूरोपियन सेंट्रल बैंक की 2 फीसदी की सीमा से ज्यादा है। (ET Hindi)

आम आदमी की जेब की पहुंच से बाहर हुआ फलों का राजा

मुंबई April 04, 2011 फलों के राजा आम पर एक बार फिर से मौसम की मार पडऩे की आशंका है। आमों के बादशाह हापुस (अल्फांसो) के दाम देखकर तो यही लगता है कि अब आम, आम आदमी की पहुंच से बाहर हो चली है। आममान छूते दाम की वजह बेमौसम बारिश से उत्पादन कम होना बताई जा रही है। फिलहाल बाजार में आमों के बादशाह हापुस की औसत कीमत 700 रुपये दर्जन चल रही है। पर अच्छी बात यह है कि गुजरात में बंपर फसल की वजह से आम मई के अंत तक आम आदमी की पहुंच में आ सकता है। अपने बेहतरीन जायके के लिए याद किए जाने वाले हापुस की थोक मंडी एपीएमसी में एक पेटी की कीमत 1,000 से 5,000 रुपये के बीच चल रही है। एक पेटी में चार दर्जन आम होते हैं। पिछले साल इस समय हापुस 800 से 3,000 रुपये प्रति पेटी के हिसाब से बिक रहा था। इस समय थोक बाजार में औसतन हर दिन 3,000 पेटी आमों की आवक हो रही है। इसके बावजूद पिछले साल की अपेक्षा आवक कमजोर बताई जा रही है। एपीएमसी अधिकारियों के अनुसार पिछले साल मार्च में करीब 3 करोड़ पेटी हापुस आम आए थे जबकि इस बार अभी तक तकरीबन 60 लाख पेटी ही मंडी तक पहुंच पाए हैं। हापुस समेत इस समय बाजार में आम की पांच किस्में आ रही हैं। किलोग्राम के हिसाब से थोक बाजार में हापुस आम के दाम 150-300 रुपये, लालबाग आम 40-70 रुपये, पियु 40-60 रुपये, बदामी 40-70 रुपये और तोतापुरी 45-65 रुपये बताए जा रहे हैं। खुदरा बाजार में हापुस 250-600 रुपये और दूसरे आम 100-200 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिक रहे हैं। कारोबारियों का कहना है कि इस साल आम सबकी पहुंच में होगा क्योंकि गुजरात में आम की बंपर फसल होने की खबर मिल रही है। जिसकी आवक मई से बाजार में होने लगेगी। गुजरात से आने वाले आमों का ही असर है कि पिछले 15 दिनों में हापुस को छोड़कर दूसरे किस्म के आमों की कीमतों में करीबन 20-25 फीसदी की गिरावट हुई है। राष्ट्रीय कृषि संस्थान से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस साल हापुस का उत्पादन क्षेत्र बढ़कर 3.4 लाख हेक्टेयर हो गया है और फसल खराब होने की बात सही नहीं है। अधिकारियों को उम्मीद है कि इस बार उत्पादन पिछले साल के 17.7 लाख टन की अपेक्षा 20 लाख टन रहने का अनुमान है। किसानों और हापुस के कारोबारियों की राय सरकारी दावों के उलट है। हापुस आम की सबसे ज्यादा पैदावार करने वाले इलाके कोंकण के रत्नागिरि जिले के अलावा रायगढ़, देवगढ़, सिंधुदुर्ग और ठाणे में फसल कमजोर बताई जा रही है। किसानों के अनुसार इस साल शुरुआत में पेड़ों में बौर खूब आए, बौर लंबे थे जिनको देखकर अधिकारियों ने उत्पादन ज्यादा होने का अनुमान लगा दिया जबकि उनको यह नहीं पता कि लंबे बौरों में ज्यादा फल नहीं लगते हैं। इन इलाकों में अक्टूबर में अधिक ठंड और नवंबर-दिसंबर में बारिश होने के कारण हापुस की फसल प्रभावित हुई है और अब मार्च से ही बढ़ता तापमान हापुस को परेशान कर रहा है। बेमौसम बारिश के कारण पहले आम तैयार होने में देरी की आशंका जताई जा रही थी लेकिन तापमान बढऩे की वजह से किसानों को अंदेशा है कि आम को ज्यादा दिनों तक रोकने में मुश्किल होगी। जिससे अगले 15-20 दिनों में हापुस की कीमतों में तेजी से गिरावट देखने को मिल सकती है लेकिन इसकेबाद दोबारा हापुस के दाम एक नया रिकॉर्ड इस साल बना सकते हैं। (BS Hindi)

थोड़े समय तक तांबे में रहेगी नरमी

मुंबई April 05, 2011 अगले दो महीने में तांबे की कीमतों में 3 फीसदी की गिरावट आ सकती है और इसके भाव 9000 डॉलर प्रति टन के नीचे पहुंच सकते हैं। यह बात जीएफएमसी के तांबा सर्वेक्षण में बताई गई है। इस स्थिति के लिए औद्योगिक विकास को लेकर बनी अनिश्चितता, यूरोप में गहराते कर्ज संकट और औद्योगिक उत्पादन के अनिश्चित अनुमानों को जिम्मेदार माना जा रहा है। लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) में तांबे की कीमत अभी 9,300 डॉलर प्रति टन के आसपास है। इस सर्वेक्षण में यह बताया गया है कि पिछले साल की दूसरी छमाही में तांबे का बाजार घाटे में चला गया था। इसके लिए कई देशों में बढ़ी खपत, चीन से बढ़े आयात और खान उत्पादन में उतार-चढ़ाव को जिम्मेदार माना गया। शुद्ध तांबे का उत्पादन बढऩे के बावजूद इसकी खपत ज्यादा रही और सर्वेक्षण के मुताबिक इन दोनों के बीच 2.86 लाख टन का अंतर रहा। जीएफएमएस में तांबे के वरिष्ठï विश्लेषक निकोस कवालिस ने बताया, 'तांबे में हुए बुनियादी सुधार की वजह से कर्ज संकट पैदा होने के बाद इसमें निवेशकों की दिलचस्पी एक बार फिर जगी। बाजार में तंग स्थिति और निवेशकों की बढ़ी दिलचस्पी की वजह से 2010 के आखिरी दिनों और 2011 के शुरुआती दिनों में तांबा अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंचा। 14 फरवरी को इसकी कीमत 10,148 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई।Ó सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि इस साल उत्पादन में बढ़ोतरी होगी और शुद्ध तांबे का उत्पादन भी मांग को पीछे छोड़ देगा। इसके बावजूद आशंका व्यक्त की जा रही है कि चालू साल के अंत तक बाजार घाटे में ही रहेगा। हालांकि, स्थिति में सुधार की संभावना से भी सर्वेक्षण ने इनकार नहीं किया है। चीन में मौद्रिक नीतियों को सख्त किए जाने और यूरोपीयन सेंट्रल बैंक द्वारा ब्याज दर बढ़ाए जाने की वजह से निकट भविष्य में तांबे पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। ऐंजल ब्रोकिंग में निदेशक (कमोडिटीज ऐंड करेंसिज) नवीन माथुर कहते हैं कि जापान से भी मांग में कमी आई है। हालांकि, माथुर ने यह भी कहा कि जब तीन महीने में जापान की सरकार बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने का काम शुरू करेगी तो एक बार फिर मांग में तेजी दिख सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका में विनिर्माण संबंधी गतिविधियां तेज हैं और इस वजह से साल के अंत तक मांग और कीमतों में तेजी आ सकती है। रिपोर्ट के मुताबिक कुछ समय बाद तांबे में निवेशकों की दिलचस्पी और बढ़ेगी और मौजूदा साल की दूसरी छमाही में इसकी कीमतें 11000 डॉलर प्रति टन की नई ऊंचाई हासिल कर सकती हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2010 में वैश्विक स्तर पर खनन में 0.8 फीसदी कमी आई। पिछले साल कुल 1.59 करोड़ टन तांबे का खनन हुआ। इसमें सबसे ज्यादा 1.14 लाख टन उत्पादन चीन में हुआ। वहीं अमेरिका और पेरु में गिरावट दर्ज की गई। जबकि चिली और कनाडा में खनन में मामूली बढ़ोतरी हुई। खनन में मामूली बढ़ोतरी के बावजूद 2010 में शुद्ध तांबे के वैश्विक उत्पादन में 3.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस दौरान खपत में 11.3 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई। (BS Hindi)

ग्वार गम में मजबूती के आसार

मुंबई April 05, 2011 ग्वार बीज और ग्वार गम पर स्पेशल मार्जिन हटाए जाने के साथ ही वायदा बाजार में कारोबारी इन जिंसों में खरीद करने लगे हैं। काफी ज्यादा उतारचढ़ाव पर नियंत्रण करने की गरज से एक महीने पहले इन पर स्पेशल मार्जिन लगाया गया था क्योंकि तब कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी हो गई थी। लेकिन मार्जिन लगाए जाने के बाद भी कीमतें नीचे नहीं आईं क्योंकि इसके फंडामेंटल मजबूत हैं और कीमतों में एक बार फिर उफान आने की उम्मीद है। नियामक के निर्देशों के मुताबिक, नैशनल कमोडिटी ऐंड डेरिवेटिव एक्सचेंज ने ग्वार बीज पर 10 फीसदी का स्पेशल मार्जिन वापस ले लिया है और ग्वार गम पर स्पेशल मार्जिन 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है और यह 4 अप्रैल से प्रभावी हो गया है। केडिया कमोडिटीज के अजय केडिया ने कहा - मिलों के साथ-साथ दवा उद्योग से ग्वार बीज और ग्वार गम की मांग निकल रही है। उनका कहना है कि ग्वार बीज और ग्वार गम की कीमतों में वायदा बाजार में मजबूती बनी रहने की उम्मीद है। ग्वार गम का सीजन समाप्ति की ओर है और हाजिर बाजार में आवक घटी है। फिलहाल देश भर के बाजारों में इसकी रोजाना आवक 15,000 से 20,000 बोरी (प्रति बोरी 1 क्विंटल) रह गई है। पिछले साल इस समय रोजाना 25,000-30,000 बोरी थी, इस तरह इसमें 20 फीसदी की गिरावट का संकेत मिल रहा है। साल 2009-10 में ग्वार का उत्पादन 4.5 लाख टन रहा जबकि 2008-09 में कुल उत्पादन 8 से 9 लाख टन रहा था। एक कारोबारी ने बताया कि स्टॉकिस्ट माल का भंडारण कर रहे हैं, लिहाजा इस वजह से भी इसकी कीमतें बढ़ रही हैं।ग्वार गम (इसके उत्पादन के लिए ग्वार बीज का इस्तेमाल कच्चे माल के तौर पर होता है) की निर्यात मांग बेहतर होने की वजह से इसकी कीमतें काफी ज्यादा बढ़ी हैं, लिहाजा इस साल ग्वार बीज के रकबे में भी बढ़ोतरी देखने को मिली है। लेकिन इसका उत्पादन मॉनसून पर निर्भर करेगा। दूसरी ओर ग्वार गम का बाजार उतारचढ़ाव भरा है, लेकिन कपड़ा उद्योग के साथ-साथ कच्चे तेल की खोज करने वाली कंपनियों की तरफ से मजबूत मांग के चलते इस जिंस को काफी समर्थन मिल रहा है। बताया जा रहा है कि कुछ कारोबारियों व निर्यातकों ने कीमतों में बढ़ोतरी करने के लिए कार्टल बना लिया है। एक विश्लेषक ने बताया कि ग्वार गम के प्रमुख उत्पादक केंद्रों पर बड़े खिलाड़ी मौजूद हैं, जो इस जिंस की कीमतोंं में उतारचढ़ाव के लिए जिम्मेदार हैं। मौजूदा समय में इस जिंस का कुल भंडार (इन्वेंट्री) साल के निचले स्तर 40,000 टन पर पहुंच गया है जबकि एक साल पहले इस समय यह 80,000-90,000 टन था। पाराडाइम कमोडिटीज के निदेशक बीरेन वकील ने कहा - पिछले साल के मुकाबले ग्वार गम की मांग 40 फीसदी बढ़ी है और इस वजह से भी इस साल ग्वार गम की कीमतें10,000 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंची हैं। अमेरिका और यूरोप की मांग के चलते पिछले साल अप्रैल से नवंबर के दौरान ग्वार गम का निर्यात 76 फीसदी बढ़कर 2,27,757 टन पर पहुंच गया था। ऐंजल कमोडिटीज के सहायक उपाध्यक्ष बदरुद्दीन खान ने कहा - मांग में तीव्र बढ़ोतरी के चलते ग्वार गम की कीमतों में बढ़त जारी रहेगी क्योंकि तेल की खोज में तेजी आ रही है। बीरेन वकील ने बताया कि कपड़ा उद्योग की तरफ से मजबूत मांग के चलते ग्वार गम की कीमतें अगले पांच साल तक मजबूत बनी रहेगी। (BS Hindi)

04 अप्रैल 2011

केएमपी की राह म􁱶 रफ्तार का रोड़ा

गुड़गांव कुंडली-मानेसर-पलवल (केएमपी) एक्सपर्ेस-वे पर्ोजेक्ट के नोडल ऑिफसर ने राज्य सरकार के मुख्य सिचव को लेटर िलखकर जानकारी दी है िक इस पर्ोजेक्ट के समय से पूरा होने की संभावना बहुत कम है। उन्ह􁲂ने कारण बताते हुए िलखा है िक इस पर्ोजेक्ट पर बहुत धीमी गित से काम चल रहा है। दूसरी तरफ िनमार्ण करने वाली कंपनी ने िफर दावा िकया है िक वषर् 2011 तक पहला चरण पूरा कर िलया जाएगा। पहले चरण म􁱶 पलवल से मानेसर तक का काम पूरा करना है। इसम􁱶 एनएच-2 और 8 को आपस म􁱶 जोड़ने की योजना है। राज्य सरकार की ओर से पर्ोजेक्ट की देखरेख के िलए िनयुक्त नोडल ऑिफसर आर. के. कटािरया (िडप्टी किम􁳤र) ने इस दावे को झूठा बताया है। हिरयाणा स्टेट इंडिस्टर्यल एंड इन्फर्ास्टर्क्चर िडवेलपम􁱶ट कॉरपोरेशन (एचएसआईआईडीसी) की ओर से केएमपी की िडवेलपम􁱶ट का कॉन्टर्ैक्ट एक कंपनी को िदया गया है। लगभग 135.6 िकलोमीटर लंबे इस एक्सपर्ेस-वे को जून, 2009 तक पूरा होना था और इसकी िडवेलपम􁱶ट पर लगभग 1915 करोड़ रुपये खचर् होने थे। एक्सपर्ेस-वे पर 5 फ्लाईओवर, 62 पेडिस्टर्यन, 31 कैटल कर्ॉिसग, 27 अंडरपास, 2 टर्क और बस-वे के अलावा 4 रेलवे ओवरिबर्ज बनने ह􁱹। कंपनी की ओर िडवेलपम􁱶ट की समयाविध 3 बार बढ़ाई जा चुकी है। पहले इसकी डेडलाइन अक्टूबर 2010 की गई और अब माचर्, 2011 म􁱶 पहला चरण पूरा करने का वादा िकया जा रहा है। एक्सपर्ेस-वे के िनमार्ण म􁱶 लगातार हो रही देरी को देखते हुए राज्य सरकार ने िडप्टी किम􁳤र को आदेश जारी िकए ह􁱹 िक वे पर्ितमाह इस पर्ोजेक्ट की पर्ोगर्ेस िरपोटर् भेज􁱶। शुकर्वार को ही नोडल ऑिफसर की ओर से इसकी पर्ोगर्ेस िरपोटर् तैयार कर चीफ सेकर्ेटरी को भेजी गई है। क्या कहते ह􁱹 नोडल ऑिफसर नोडल ऑिफसर व िडप्टी किम􁳤र आर. के. कटािरया के अनुसार, कंपनी ने इसके पहले चरण का कायर् माचर्, 2011 तक पूरा करने का दावा िकया है। लेिकन िजस गित से काम चल रहा है, उससे तय समय म􁱶 पहला चरण पूरा नह􁱭 हो पाएगा। उनका कहना है िक इस पूरे पर्ोजेक्ट म􁱶 4 रेलवे ओवरिबर्ज ह􁱹, जो पटौदी, फरुर्खनगर, बहादुरगढ़ व सोनीपत म􁱶 ह􁱹। कंपनी को◌े हाल ही म􁱶 रेलवे से हरी झंडी िमली है। इसे बनाने म􁱶 लगभग 1 साल और लग सकता है। जमीनी हकीकत यह है िक िजस गित से केएमपी पर काम चल रहा है, वह साल 2012 तक भी पूरा नह􁱭 हो पाएगा। यह पर्ोजेक्ट बीओटी पर आधािरत है। िनमार्ण के बाद िनमार्णाधीन कंपनी इस पर 23 साल 9 महीने तक टोल टैक्स वसूल करेगी। (Navbhart hindi)