नई दिल्ली November 14, 2011
एक ओर जहां महंगाई में कमी लाने के लिए सरकार जूझ रही है, वहीं कई कृषि विशेषज्ञों को लगता है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल में स्थानीय ऊंची करों की बड़ी भूमिका है। ऐसे कर सामान्यत: राज्य सरकारें वसूलती हैं, लेकिन वास्तव में इससे कीमतें बढ़ती हैं और बाजार कीमतें विकृत हो जाती हैं।कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने हाल में इसका एक समाधान सामने रखा है। अगर कोई राज्य कृषि उत्पादों पर चरणबद्ध तरीके से कर घटाने का फैसला लेते हैं तो वैसे राज्यों के लिए न्यूनतम समर्थन में बढ़ोतरी कर इसकी भरपाई का सुझाव आयोग ने दिया है।दूसरा समाधान राज्यों को कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम में संशोधन के लिए प्रोत्साहित करने का है, जिससे किसान कुछ लोगों द्वारा नियंत्रित ढांचे से मुक्त हो जाएंगे और निजी खरीदार सीधे किसानों से खरीदारी कर पाएंगे। हालांकि कुछ राज्यों ने इस बाबत कदम बढ़ाए हैं, लेकिन ज्यादातर राज्य मंडियों पर नियंत्रण ढीला करने के प्रति अनिच्छुक हैं।कुछ कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि एपीएमसी अधिनियम को समाप्त करना कॉरपोरेट कंपनियों की पिछले दरवाजे की कोशिश रही है ताकि वह भारतीय कृषि पर नियंत्रण स्थापित कर सकें और किसानों से सीधे उत्पाद खरीद सकें।चाहे जिस तरह का तर्क हो, लेकिन अनाज का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पंजाब व हरियाणा में इस साल कृषि उत्पादों खास तौर से अनाज पर कर सबसे ज्यादा है। ये दोनोंं राज्य अनाज से सबसे बड़े उत्पादक राज्य हैं।साल 2011-12 के गेहूं खरीद सीजन में (जो मार्च में समाप्त होगा) पंजाब में स्थानीय कर देश भर में सबसे ज्यादा रहा। सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि यहां कुल समर्थन मूल्य का 13.5 फीसदी कर चुकाना होता है। ऐसे में जब गेहूं का एमएसपी 1170 रुपये प्रति क्विंटल है तो इस पर कुल 158 रुपये कर लगता है और इस तरह से उपभोक्ताओं व निजी खरीदारों के लिए यह महंगा हो जाता है।हरियाणा में एमएसपी का 10.5 फीसदी कर वसूला जाता है। पंजाब और हरियाणा देश में उत्पादित होने वाले कुल गेहूं में 80 फीसदी की भागीदारी करता है। न सिर्फ गेहूं के मामले में करों की दरें ऊंची हैं बल्कि चावल के साथ भी ऐसा ही है। (BS Hindi)
15 नवंबर 2011
महंगाई और वायदा में संबंध नहीं : समिति
मुंबई November 14, 2011
जिंस डेरिवेटिव बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को स्वायत्तता देने की दिशा में आगे बढ़ते हुए खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण पर गठित संसदीय स्थायी समिति ने 8 महीनों के अंतराल के बाद फिर से संबंधित पक्षों से बातचीत शुरू कर दी है।विभिन्न पक्षों के विचार जानने के लिए सोमवार को समिति एफएमसी के अधिकारियों से मिली और मुंबई के सभी प्रमुख जिंस एक्सचेंजों का दौरा किया। निष्कर्षात्मक सिफारिशों पर पहुंचने के लिए यह कोलकाता, चेन्नई, भोपाल और अन्य प्रमुख शहरों का दौरा कर रही है। समिति के चेयरमैन विलास मुत्तेमवार ने कहा, 'संसद को अंतिम सिफारिश देने से पहले हम जिंस वायदा बाजार के सभी पक्षों के विचार जानना पसंद करेंगे।' एफएमसी के पूर्व चेयरमैन बी सी खटुआ के मुताबिक समिति ने इस साल मार्च में अंतिम विचार-विमर्श किया था। उसे उम्मीद थी कि वह अप्रैल तक सिफारिशें सौंप देगी। लेकिन इसने संबंधित पक्षों से मिलना शुरू कर दिया है। इसका मतलब है कि समिति एक महीने में सभी औपचारिकताएं पूरा कर दिसंबर के अंत तक अंतिम रिपोर्ट सौंप सकती है।हालांकि इस समिति का मुख्य उद्देश्य सरकार को यह सिफारिश देना है वायदा अनुबंध (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन किया जा सकता है या नहीं, जिससे वित्तीय संस्थानों को जिंसों में कारोबार की स्वीकृति दी जा सके। साथ ही एफएमसी को प्रतिभूति बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की तर्ज पर सभी शक्तियां दी जा सकें। समिति वायदा प्लेटफॉर्म पर कृषि जिंसों के कारोबार और मुद्रास्फीति के बीच संबंध के बारे में भी राय जानना चाहती है। कृषि जिंसों में वायदा कारोबार से महंगाई बढ़ती है, इस पर मुत्तेवार ने कहा - हितधारकों के साथ हुई बैठक में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया है। उन्होंने कहा - महंगाई के लिहाज से गेहूं और चावल ऐसे दो प्रमुख जिंस हैं जिस पर हम अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ऐसी राय सामने आ रही है कि बैंकों, बीमा कंपनियों और म्युचुअल फंड को वायदा कारोबार की अनुमति दी जानी चाहिए। समिति जल्द ही एक्सचेंजों व ब्रोकिंग फर्मों के पास मौजूद बुनियादी ढांचे की जांच करेगी। (BS Hindi)
जिंस डेरिवेटिव बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को स्वायत्तता देने की दिशा में आगे बढ़ते हुए खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण पर गठित संसदीय स्थायी समिति ने 8 महीनों के अंतराल के बाद फिर से संबंधित पक्षों से बातचीत शुरू कर दी है।विभिन्न पक्षों के विचार जानने के लिए सोमवार को समिति एफएमसी के अधिकारियों से मिली और मुंबई के सभी प्रमुख जिंस एक्सचेंजों का दौरा किया। निष्कर्षात्मक सिफारिशों पर पहुंचने के लिए यह कोलकाता, चेन्नई, भोपाल और अन्य प्रमुख शहरों का दौरा कर रही है। समिति के चेयरमैन विलास मुत्तेमवार ने कहा, 'संसद को अंतिम सिफारिश देने से पहले हम जिंस वायदा बाजार के सभी पक्षों के विचार जानना पसंद करेंगे।' एफएमसी के पूर्व चेयरमैन बी सी खटुआ के मुताबिक समिति ने इस साल मार्च में अंतिम विचार-विमर्श किया था। उसे उम्मीद थी कि वह अप्रैल तक सिफारिशें सौंप देगी। लेकिन इसने संबंधित पक्षों से मिलना शुरू कर दिया है। इसका मतलब है कि समिति एक महीने में सभी औपचारिकताएं पूरा कर दिसंबर के अंत तक अंतिम रिपोर्ट सौंप सकती है।हालांकि इस समिति का मुख्य उद्देश्य सरकार को यह सिफारिश देना है वायदा अनुबंध (नियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में संशोधन किया जा सकता है या नहीं, जिससे वित्तीय संस्थानों को जिंसों में कारोबार की स्वीकृति दी जा सके। साथ ही एफएमसी को प्रतिभूति बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की तर्ज पर सभी शक्तियां दी जा सकें। समिति वायदा प्लेटफॉर्म पर कृषि जिंसों के कारोबार और मुद्रास्फीति के बीच संबंध के बारे में भी राय जानना चाहती है। कृषि जिंसों में वायदा कारोबार से महंगाई बढ़ती है, इस पर मुत्तेवार ने कहा - हितधारकों के साथ हुई बैठक में ऐसा कुछ भी नजर नहीं आया है। उन्होंने कहा - महंगाई के लिहाज से गेहूं और चावल ऐसे दो प्रमुख जिंस हैं जिस पर हम अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ऐसी राय सामने आ रही है कि बैंकों, बीमा कंपनियों और म्युचुअल फंड को वायदा कारोबार की अनुमति दी जानी चाहिए। समिति जल्द ही एक्सचेंजों व ब्रोकिंग फर्मों के पास मौजूद बुनियादी ढांचे की जांच करेगी। (BS Hindi)
14 नवंबर 2011
सस्ते खाद्य तेल से मिलेगी राहत
नई दिल्ली November 10, 2011
महंगाई से परेशान उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है। क्योंकि अब खाद्य तेल सस्ते होने लगे हैं। कारोबारियों का कहना है कि त्योहार बीत जाने के बाद एक तो इनकी मांग कमजोर हुई है, वहीं दूसरी ओर नई फसल का भी दबाव बढ़ा है। इसलिए खाद्य तेलों की कीमतों में गिरावट आई है और आने वाले दिनों में खाद्य तेल 3 से 4 फीसदी और सस्ते हो सकते हैं। बीते 10-12 दिनों के दौरान घरेलू बाजार में रिफाइंड सोया तेल इंदौर डिलिवरी के दाम 20 रुपये गिकर 610 रुपये, सरसों तेल दादरी डिलिवरी के दाम 672 रुपये से गिरकर 660 रुपये और मूंगफली तेल के दाम 80 रुपये गिरकर 850 रुपये प्रति 10 किलोग्राम रह गए हैं। खाद्य तेल की कीमतों के बारे में सेंट्रल ऑर्गेनाइजेशन फॉर ऑयल इंडस्ट्री ऐंड ट्रेड (कोएट) के अध्यक्ष सत्यनारायण अग्रवाल ने बताया कि बीते माह त्योहारों के चलते खाद्य तेल महंगे हुए थे, लेकिन अब त्योहार बीतने के साथ ही मांग कमजोर हुई है। इसलिए खाद्य तेल की कीमतों में फिर से गिरावट आने लगी है। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स एसोसिएशन (डिवोटा) के महासचिव हेमंत गुप्ता भी खाद्य सस्ते होने की बात से इत्तेफाक रखते हैं। गुप्ता बताते है कि पिछले साल की तरह इस साल भी तिलहन की पैदावार अधिक है। इसलिए त्योहारों के अवसर को छोड़ दिया जाए तो खाद्य तेलों की कीमतें नरम ही रही हैं। बकौल गुप्ता आने वाले दिनों में सोयाबीन, मूंगफली समेत अन्य तिलहन की आवक जोर पकड़ेगी। ऐसे में खाद्य तेल 3 से 4 फीसदी सस्ते हो सकते हैं। खाद्य तेल कारोबारी तुषार भाई को भी लगता है कि आने वाले दिनों में खाद्य तेल और सस्ते हो सकते है। इस बारे में अग्रवाल का कहना है कि बीते साल भी तिलहन की पैदावार अच्छी थी और इस बार भी पैदावार ज्यादा है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी खाद्य तेल की उपलब्धता बेहतर है। इसलिए खाद्य तेल की कीमतों में नरमी का ही माहौल दिखाई दे रहा है। पहले सरकारी अग्रिम खरीफ अनुमान के मुताबिक देश में 208.9 लाख टन तिलहन की पैदावार होने की संभावना है, पिछले खरीफ में यह आंकड़ा 208.4 लाख टन था। देश में तिलहन की पैदावार बढऩे की वजह से खाद्य तेलों के आयात में कमी आ रही है। तेल वर्ष (नवंबर 2010-सितंबर 2011) के दौरान खाद्य तेलों का आयात 7.6 फीसदी घटकर 77.73 लाख टन रह गया है। (BS Hindi)
महंगाई से परेशान उपभोक्ताओं के लिए राहत की खबर है। क्योंकि अब खाद्य तेल सस्ते होने लगे हैं। कारोबारियों का कहना है कि त्योहार बीत जाने के बाद एक तो इनकी मांग कमजोर हुई है, वहीं दूसरी ओर नई फसल का भी दबाव बढ़ा है। इसलिए खाद्य तेलों की कीमतों में गिरावट आई है और आने वाले दिनों में खाद्य तेल 3 से 4 फीसदी और सस्ते हो सकते हैं। बीते 10-12 दिनों के दौरान घरेलू बाजार में रिफाइंड सोया तेल इंदौर डिलिवरी के दाम 20 रुपये गिकर 610 रुपये, सरसों तेल दादरी डिलिवरी के दाम 672 रुपये से गिरकर 660 रुपये और मूंगफली तेल के दाम 80 रुपये गिरकर 850 रुपये प्रति 10 किलोग्राम रह गए हैं। खाद्य तेल की कीमतों के बारे में सेंट्रल ऑर्गेनाइजेशन फॉर ऑयल इंडस्ट्री ऐंड ट्रेड (कोएट) के अध्यक्ष सत्यनारायण अग्रवाल ने बताया कि बीते माह त्योहारों के चलते खाद्य तेल महंगे हुए थे, लेकिन अब त्योहार बीतने के साथ ही मांग कमजोर हुई है। इसलिए खाद्य तेल की कीमतों में फिर से गिरावट आने लगी है। दिल्ली वेजिटेबल ऑयल ट्रेडर्स एसोसिएशन (डिवोटा) के महासचिव हेमंत गुप्ता भी खाद्य सस्ते होने की बात से इत्तेफाक रखते हैं। गुप्ता बताते है कि पिछले साल की तरह इस साल भी तिलहन की पैदावार अधिक है। इसलिए त्योहारों के अवसर को छोड़ दिया जाए तो खाद्य तेलों की कीमतें नरम ही रही हैं। बकौल गुप्ता आने वाले दिनों में सोयाबीन, मूंगफली समेत अन्य तिलहन की आवक जोर पकड़ेगी। ऐसे में खाद्य तेल 3 से 4 फीसदी सस्ते हो सकते हैं। खाद्य तेल कारोबारी तुषार भाई को भी लगता है कि आने वाले दिनों में खाद्य तेल और सस्ते हो सकते है। इस बारे में अग्रवाल का कहना है कि बीते साल भी तिलहन की पैदावार अच्छी थी और इस बार भी पैदावार ज्यादा है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी खाद्य तेल की उपलब्धता बेहतर है। इसलिए खाद्य तेल की कीमतों में नरमी का ही माहौल दिखाई दे रहा है। पहले सरकारी अग्रिम खरीफ अनुमान के मुताबिक देश में 208.9 लाख टन तिलहन की पैदावार होने की संभावना है, पिछले खरीफ में यह आंकड़ा 208.4 लाख टन था। देश में तिलहन की पैदावार बढऩे की वजह से खाद्य तेलों के आयात में कमी आ रही है। तेल वर्ष (नवंबर 2010-सितंबर 2011) के दौरान खाद्य तेलों का आयात 7.6 फीसदी घटकर 77.73 लाख टन रह गया है। (BS Hindi)
थोक और खुदरा कीमतों के बीच चौड़ी हुई खाई
नई दिल्ली November 10, 2011
उपभोक्ता तेजी से बढ़ रही मुद्रास्फीति से परेशान हैं, वहीं दैनिक उपभोग में काम आने वाले ज्यादातर खाद्य उत्पादों की थोक और खुदरा कीमतों के बीच अंतर बढ़ रहा है। इसकी वजह परिवहन, श्रम लागत और कमीशन में बढ़ोतरी के चलते ऊंची ट्रॉन्जेक्शन लागत है। ज्यादातर दैनिक उपभोग के खाद्य उत्पादों की खुदरा कीमतें थोक कीमतों की तुलना में तेजी से बढ़ रही हैं। अक्टूबर 2010 और 2011 के बीच 13 प्रमुख खाद्य उत्पादों की थोक और खुदरा कीमतों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि 9 उत्पादों की खुदरा कीमतें थोक कीमतों से ज्यादा बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए नई दिल्ली के थोक बाजार में गेहूं की कीमतें एक वर्ष पहले की तुलना में 1.62 फीसदी गिरी हैं, लेकिन खुदरा कीमतें 7.14 फीसदी बढ़ी हैं। वहीं, प्याज की थोक कीमतों में 30 फीसदी गिरावट आई है, लेकिन खुदरा कीमतें केवल 12 फीसदी कम हुई हैं। खाद्य मुद्रास्फीति 22 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में बढ़कर 9 महीनों के उच्चतम स्तर 12.21 फीसदी पर पहुंच गई। जिंस विशेषज्ञ और केयर रेटिंग के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि 'ऊंची ट्रॉन्जेक्शन लागत के कारण खुदरा कीमतें ज्यादा हैं। खुदरा विके्रता, विशेष रूप से सब्जी विक्रेताओं को माल के परिवहन पर ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है। इसी तरह श्रम लागत भी बढ़ चुकी है। खुदरा विक्रेताओं द्वारा वसूला जाने वाला शुल्क मूल्य के अनुसार (एड वेलोरम) है। इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही कमीशन भी बढ़ जाता है। अच्छी पैदावार से मांग-पूर्ति का संतुलन सुधरा है, लेकिन मुनाफाखोरी के कारण उपभोक्ताओं को ज्यादा पैसा चुकाना पड़ रहा है।' सबनवीस ने खुदरा कीमतों में भारी कमी की संभावना से इनकार कर दिया। हालांकि बेस रेट प्रभाव के कारण थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति में दिसंबर में मामूली कमी आ सकती है। अनाज की बढ़ती कीमतों के कारण ही इनके न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अच्छी खासी बढ़ोतरी की गई है।आजादपुर मंडी से सब्जी खरीदकर मॉडल टाउन में बेचने वाले एक सब्जी विक्रेता ने बताया कि अब उसे 250 किलोग्राम सब्जी लाने के लिए 150 रुपये भाड़ा देना पड़ता है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 120 रुपये था। इसके अलावा बाजार से वाहन में सब्जी चढ़ाने वाले मजदूरों ने मजदूरी 60 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये कर दी है। ज्यादा खुदरा विक्रेता असंगठित हैं और उनका कारोबार सीमित होता है। इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का प्रयत्न करते हैं। खाद्य नीति विशेषज्ञ और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा कि खुदरा विक्रेताओं की समस्या यह है कि उनकी बिक्री की मात्रा बहुत कम होती है। 'इसलिए वे 20-25 फीसदी मार्जिन वसूलते हैं। संगठित खुदरा विक्रेताओं और किसानों को एक समान मंच पर लाना ही इसका एकमात्र हल है। इससे बिचौलिए समाप्त हो जाएंगे, जिससे खुदरा कीमतें नीचे आएंगी।' गुलाटी इसके लिए मदर डेयरी का उदाहरण देते हैं, जो सीधे किसानों से दूध खरीदती है। उन्होंने कहा, 'हमें एजेंटों को इस श्रृंखला से हटाने, बर्बादी रोकने और लॉजिस्टिक में सुधार लाने की जरूरत है। छोटे खुदरा विक्रेताओं को संगठित होने की जरूरत है, जिससे उनकी बिक्री मात्रा बढ़े और मार्जिन कम हो।' (BS Hindi)
उपभोक्ता तेजी से बढ़ रही मुद्रास्फीति से परेशान हैं, वहीं दैनिक उपभोग में काम आने वाले ज्यादातर खाद्य उत्पादों की थोक और खुदरा कीमतों के बीच अंतर बढ़ रहा है। इसकी वजह परिवहन, श्रम लागत और कमीशन में बढ़ोतरी के चलते ऊंची ट्रॉन्जेक्शन लागत है। ज्यादातर दैनिक उपभोग के खाद्य उत्पादों की खुदरा कीमतें थोक कीमतों की तुलना में तेजी से बढ़ रही हैं। अक्टूबर 2010 और 2011 के बीच 13 प्रमुख खाद्य उत्पादों की थोक और खुदरा कीमतों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि 9 उत्पादों की खुदरा कीमतें थोक कीमतों से ज्यादा बढ़ी हैं। उदाहरण के लिए नई दिल्ली के थोक बाजार में गेहूं की कीमतें एक वर्ष पहले की तुलना में 1.62 फीसदी गिरी हैं, लेकिन खुदरा कीमतें 7.14 फीसदी बढ़ी हैं। वहीं, प्याज की थोक कीमतों में 30 फीसदी गिरावट आई है, लेकिन खुदरा कीमतें केवल 12 फीसदी कम हुई हैं। खाद्य मुद्रास्फीति 22 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह में बढ़कर 9 महीनों के उच्चतम स्तर 12.21 फीसदी पर पहुंच गई। जिंस विशेषज्ञ और केयर रेटिंग के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि 'ऊंची ट्रॉन्जेक्शन लागत के कारण खुदरा कीमतें ज्यादा हैं। खुदरा विके्रता, विशेष रूप से सब्जी विक्रेताओं को माल के परिवहन पर ज्यादा पैसा देना पड़ रहा है। इसी तरह श्रम लागत भी बढ़ चुकी है। खुदरा विक्रेताओं द्वारा वसूला जाने वाला शुल्क मूल्य के अनुसार (एड वेलोरम) है। इसलिए कीमतों में बढ़ोतरी के साथ ही कमीशन भी बढ़ जाता है। अच्छी पैदावार से मांग-पूर्ति का संतुलन सुधरा है, लेकिन मुनाफाखोरी के कारण उपभोक्ताओं को ज्यादा पैसा चुकाना पड़ रहा है।' सबनवीस ने खुदरा कीमतों में भारी कमी की संभावना से इनकार कर दिया। हालांकि बेस रेट प्रभाव के कारण थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति में दिसंबर में मामूली कमी आ सकती है। अनाज की बढ़ती कीमतों के कारण ही इनके न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अच्छी खासी बढ़ोतरी की गई है।आजादपुर मंडी से सब्जी खरीदकर मॉडल टाउन में बेचने वाले एक सब्जी विक्रेता ने बताया कि अब उसे 250 किलोग्राम सब्जी लाने के लिए 150 रुपये भाड़ा देना पड़ता है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 120 रुपये था। इसके अलावा बाजार से वाहन में सब्जी चढ़ाने वाले मजदूरों ने मजदूरी 60 रुपये से बढ़ाकर 100 रुपये कर दी है। ज्यादा खुदरा विक्रेता असंगठित हैं और उनका कारोबार सीमित होता है। इसलिए वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने का प्रयत्न करते हैं। खाद्य नीति विशेषज्ञ और कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के चेयरमैन अशोक गुलाटी ने कहा कि खुदरा विक्रेताओं की समस्या यह है कि उनकी बिक्री की मात्रा बहुत कम होती है। 'इसलिए वे 20-25 फीसदी मार्जिन वसूलते हैं। संगठित खुदरा विक्रेताओं और किसानों को एक समान मंच पर लाना ही इसका एकमात्र हल है। इससे बिचौलिए समाप्त हो जाएंगे, जिससे खुदरा कीमतें नीचे आएंगी।' गुलाटी इसके लिए मदर डेयरी का उदाहरण देते हैं, जो सीधे किसानों से दूध खरीदती है। उन्होंने कहा, 'हमें एजेंटों को इस श्रृंखला से हटाने, बर्बादी रोकने और लॉजिस्टिक में सुधार लाने की जरूरत है। छोटे खुदरा विक्रेताओं को संगठित होने की जरूरत है, जिससे उनकी बिक्री मात्रा बढ़े और मार्जिन कम हो।' (BS Hindi)
इस साल बढ़ेगा बासमती चावल का निर्यात
चंडीगढ़ November 10, 2011
प्रमुख उत्पादक क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में बासमती चावल के बंपर उत्पादन के अनुमान के चलते इसकी कीमतों पर दबाव बढ़ा है और घटती कीमतें निर्यातकों को आगे बढऩे में मदद कर रही है। वैश्विक स्तर पर भी कीमतें घटी हैं, लिहाजा घरेलू बाजार में बासमती की नरम कीमतें निर्यातकों के लिए मददगार साबित हुई हैं। निर्यातकों का मानना है कि कीमतों में कमी से निर्यात में इजाफा हो सकता है और इस साल यह 30 लाख टन पर पहुंच सकता है जबकि पिछले साल 22 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था।एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून 2011 के दौरान कुल निर्यात 6.88 लाख टन का रहा जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.35 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था। एपीडा के पास दर्ज आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-अक्टूबर 2011 के दौरान 16.22 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ, जो कमोबेश पिछले साल के समान ही है। एपीडा के सलाहकार ए के गुप्ता ने कहा कि कीमतें घटने के चलते इस साल निर्यात बढ़ सकता है। कृषि संबंधी व प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) देश में खाद्य उत्पादों के निर्यात का विनियमन करता है।बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने ऐसी ही राय व्यक्त करते हुए कहा - पिछले साल देश से कुल 22 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था और हमें उम्मीद है कि अनुकूल कीमतों के चलते इस साल कुल निर्यात 30 लाख टन पर पहुंच जाएगा। उन्होंने कहा - निर्यात में तेजी लाने के लिए हम सरकार से 900 डॉलर प्रति टन के न्यूनतम निर्यात कीमत को हटाने का अनुरोध कर रहे हैं, ताकि निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। उन्होंने कहा कि देश से निर्यात में तेजी लाने के लिए निर्यातकों को सरकारी प्रोत्साहन की पेशकश की जानी चाहिए क्योंकि निर्यात की खातिर ईरान का बाजार उभर रहा है।यहां इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि बासमती का उत्पादन करने वाले दो प्रमुख राज्यों पंजाब व हरियाणा में इसका रकबा बढ़ा है। पंजाब में जहां बासमती का रकबा 3-5 फीसदी बढ़ा है, वहीं हरियाणा में धान के कुल रकबे के 60 फीसदी से ज्यादा हिस्से में बासमती की बुआई हुई है। साथ ही इस साल उम्मीद की जा रही है कि देश में बासमती का कुल उत्पादन 75 लाख टन पर पहुंच जाएगा, जबकि पिछले साल 65 लाख टन बासमती का उत्पादन हुआ था। पिछले साल के मुकाबले इस साल कीमतें 15,000-20,000 रुपये प्रति टन के दायरे में है। पिछले साल इसकी कीमतें 21,000-23,000 रुपये प्रति टन के दायरे में थीं। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन के विजय सेतिया ने कहा कि इस साल निर्यात की औसत कीमत करीब 850 डॉलर प्रति टन पर है जबकि पिछले साल कीमतें 1000 डॉलर प्रति टन थीं। बासमती की घटती कीमतें किसानों पर असर डालेंगी।हालांकि सेतिया ने कहा कि वैश्विक स्तर पर कमजोर वातावरण निर्यात कीमत पर असर डाल रहा है। निर्यातकों के पास बड़ी मात्रा में चावल का भंडार है और इसकी वजह से भी निर्यात कीमतें कम हैं। निर्यातकों के मुताबिक, उनके पास कुल कैरीओवर स्टॉक 1.5 करोड़ बोरी (प्रति बोरी 50 किलोग्राम) है। (BS Hindi)
प्रमुख उत्पादक क्षेत्र (पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में बासमती चावल के बंपर उत्पादन के अनुमान के चलते इसकी कीमतों पर दबाव बढ़ा है और घटती कीमतें निर्यातकों को आगे बढऩे में मदद कर रही है। वैश्विक स्तर पर भी कीमतें घटी हैं, लिहाजा घरेलू बाजार में बासमती की नरम कीमतें निर्यातकों के लिए मददगार साबित हुई हैं। निर्यातकों का मानना है कि कीमतों में कमी से निर्यात में इजाफा हो सकता है और इस साल यह 30 लाख टन पर पहुंच सकता है जबकि पिछले साल 22 लाख टन बासमती चावल का निर्यात हुआ था।एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-जून 2011 के दौरान कुल निर्यात 6.88 लाख टन का रहा जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.35 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था। एपीडा के पास दर्ज आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल-अक्टूबर 2011 के दौरान 16.22 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ, जो कमोबेश पिछले साल के समान ही है। एपीडा के सलाहकार ए के गुप्ता ने कहा कि कीमतें घटने के चलते इस साल निर्यात बढ़ सकता है। कृषि संबंधी व प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) देश में खाद्य उत्पादों के निर्यात का विनियमन करता है।बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कोहिनूर फूड्स के संयुक्त प्रबंध निदेशक गुरनाम अरोड़ा ने ऐसी ही राय व्यक्त करते हुए कहा - पिछले साल देश से कुल 22 लाख टन बासमती का निर्यात हुआ था और हमें उम्मीद है कि अनुकूल कीमतों के चलते इस साल कुल निर्यात 30 लाख टन पर पहुंच जाएगा। उन्होंने कहा - निर्यात में तेजी लाने के लिए हम सरकार से 900 डॉलर प्रति टन के न्यूनतम निर्यात कीमत को हटाने का अनुरोध कर रहे हैं, ताकि निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। उन्होंने कहा कि देश से निर्यात में तेजी लाने के लिए निर्यातकों को सरकारी प्रोत्साहन की पेशकश की जानी चाहिए क्योंकि निर्यात की खातिर ईरान का बाजार उभर रहा है।यहां इस बात का उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि बासमती का उत्पादन करने वाले दो प्रमुख राज्यों पंजाब व हरियाणा में इसका रकबा बढ़ा है। पंजाब में जहां बासमती का रकबा 3-5 फीसदी बढ़ा है, वहीं हरियाणा में धान के कुल रकबे के 60 फीसदी से ज्यादा हिस्से में बासमती की बुआई हुई है। साथ ही इस साल उम्मीद की जा रही है कि देश में बासमती का कुल उत्पादन 75 लाख टन पर पहुंच जाएगा, जबकि पिछले साल 65 लाख टन बासमती का उत्पादन हुआ था। पिछले साल के मुकाबले इस साल कीमतें 15,000-20,000 रुपये प्रति टन के दायरे में है। पिछले साल इसकी कीमतें 21,000-23,000 रुपये प्रति टन के दायरे में थीं। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर एसोसिएशन के विजय सेतिया ने कहा कि इस साल निर्यात की औसत कीमत करीब 850 डॉलर प्रति टन पर है जबकि पिछले साल कीमतें 1000 डॉलर प्रति टन थीं। बासमती की घटती कीमतें किसानों पर असर डालेंगी।हालांकि सेतिया ने कहा कि वैश्विक स्तर पर कमजोर वातावरण निर्यात कीमत पर असर डाल रहा है। निर्यातकों के पास बड़ी मात्रा में चावल का भंडार है और इसकी वजह से भी निर्यात कीमतें कम हैं। निर्यातकों के मुताबिक, उनके पास कुल कैरीओवर स्टॉक 1.5 करोड़ बोरी (प्रति बोरी 50 किलोग्राम) है। (BS Hindi)
10 नवंबर 2011
जल्द महंगी हो जाएगी चीनी
नई दिल्ली November 09, 2011
पिछले एक साल से महंगाई के मोर्चे पर चीनी की कीमतों ने ज्यादा परेशान नहीं किया है, लेकिन अब उपभोक्ताओं को महंगी चीनी के लिए तैयार रहना होगा। ऐसा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाने के कारण होने जा रहा है। एसएपी बढऩे के एक दिन बाद ही थोक बाजार में चीनी के दाम 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ चुके हैं। कारोबारियों के मुताबिक यह बढ़ोतरी आगे भी जारी रहेगी। चीनी उद्योग के मुताबिक एसएपी बढऩे से उसकी लागत काफी बढ़ गई है। ऐसे में चीनी महंगी होनी तय है।चीनी का कारोबार करने वाली कंपनी एसएनबी इंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि एसएपी बढऩे के एक दिन बाद ही चीनी मिलों ने इसकी कीमतों में 30-35 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर दी है। इसलिए बाजार में चीनी के दाम 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ चुके हैं। बकौल भालोटिया ताजा बढ़ोतरी के बाद उत्तर प्रदेश में एक्स फैक्ट्री चीनी के दाम 2,950-3,000 रुपये और दिल्ली में पहुंच भाव 3100-3150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। चीनी कारोबारी आर. पी. गर्ग भी चीनी के दाम बढऩे की बात से इत्तेफाक रखते हैं। एसएपी बढऩे के बाद चीनी कीमतों के बारे में देश की प्रमुख चीनी निर्माता कंपनी बजाज हिंदुस्तान के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि गन्ना महंगा होने से चीनी की लागत काफी बढ़ गई है। इसलिए उपभोक्ताओं को महंगी चीनी के लिए तैयार रहना चाहिए। उक्त अधिकारी के मुताबिक चीनी मिलों ने फिलहाल इसकी कीमतों में 30-35 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। इस संबंध में धामपुर चीनी मिल लिमिटेड के उपाध्यक्ष अरविंद जैन का कहना है कि निश्चित रूप से गन्ना महंगा होने से लागत बढ़ी है। ऐसे में नई चीनी महंगी होना लाजिमी है। चीनी की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी? इसका पता लागत का आकलन करने के बाद ही चलेगा? बकौल जैन चीनी के दाम मांग और पूर्ति पर भी निर्भर करेंगे। भारतीय चीनी उद्योग संघ (इस्मा) के मुताबिक गन्ना महंगा होने से चीनी उत्पादन की औसत लागत बढ़कर कम से कम 33-34 रुपये प्रति किलोग्राम हो जाएगी, यह पिछले साल के 27-28 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा है। ऐसे में उपभोक्ताओं को इस साल चीनी 36-37 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर खरीदने के लिए तैयार रहना होगा। वर्तमान में चीनी का औसत खुदरा मूल्य 32 रुपये प्रति किलोग्राम है। मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ने के एसएपी में 20 फीसदी बढ़ोतरी की थी। इस बढा़ेतरी के बाद सामान्य किस्म के गन्ने का एसएपी 240 रुपये और अगेती किस्म के गन्ने का एसएपी 250 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। इस्मा ने चीनी वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) 2011-12 के दौरान 2.6 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया है। चीनी उत्पादन का सरकारी अनुमान 247-250 लाख टन है। पिछले चीनी वर्ष में यह आंकडा 2.45 करोड़ टन था। देश में चीनी की सालाना खपत 220 लाख टन है। इस वर्ष सरकार तीन समान खेपों में खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दे चुकी है। (BS Hindi)
पिछले एक साल से महंगाई के मोर्चे पर चीनी की कीमतों ने ज्यादा परेशान नहीं किया है, लेकिन अब उपभोक्ताओं को महंगी चीनी के लिए तैयार रहना होगा। ऐसा उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) बढ़ाने के कारण होने जा रहा है। एसएपी बढऩे के एक दिन बाद ही थोक बाजार में चीनी के दाम 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ चुके हैं। कारोबारियों के मुताबिक यह बढ़ोतरी आगे भी जारी रहेगी। चीनी उद्योग के मुताबिक एसएपी बढऩे से उसकी लागत काफी बढ़ गई है। ऐसे में चीनी महंगी होनी तय है।चीनी का कारोबार करने वाली कंपनी एसएनबी इंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि एसएपी बढऩे के एक दिन बाद ही चीनी मिलों ने इसकी कीमतों में 30-35 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी कर दी है। इसलिए बाजार में चीनी के दाम 50 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ चुके हैं। बकौल भालोटिया ताजा बढ़ोतरी के बाद उत्तर प्रदेश में एक्स फैक्ट्री चीनी के दाम 2,950-3,000 रुपये और दिल्ली में पहुंच भाव 3100-3150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए हैं। चीनी कारोबारी आर. पी. गर्ग भी चीनी के दाम बढऩे की बात से इत्तेफाक रखते हैं। एसएपी बढऩे के बाद चीनी कीमतों के बारे में देश की प्रमुख चीनी निर्माता कंपनी बजाज हिंदुस्तान के वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि गन्ना महंगा होने से चीनी की लागत काफी बढ़ गई है। इसलिए उपभोक्ताओं को महंगी चीनी के लिए तैयार रहना चाहिए। उक्त अधिकारी के मुताबिक चीनी मिलों ने फिलहाल इसकी कीमतों में 30-35 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। इस संबंध में धामपुर चीनी मिल लिमिटेड के उपाध्यक्ष अरविंद जैन का कहना है कि निश्चित रूप से गन्ना महंगा होने से लागत बढ़ी है। ऐसे में नई चीनी महंगी होना लाजिमी है। चीनी की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी? इसका पता लागत का आकलन करने के बाद ही चलेगा? बकौल जैन चीनी के दाम मांग और पूर्ति पर भी निर्भर करेंगे। भारतीय चीनी उद्योग संघ (इस्मा) के मुताबिक गन्ना महंगा होने से चीनी उत्पादन की औसत लागत बढ़कर कम से कम 33-34 रुपये प्रति किलोग्राम हो जाएगी, यह पिछले साल के 27-28 रुपये प्रति किलोग्राम से ज्यादा है। ऐसे में उपभोक्ताओं को इस साल चीनी 36-37 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर खरीदने के लिए तैयार रहना होगा। वर्तमान में चीनी का औसत खुदरा मूल्य 32 रुपये प्रति किलोग्राम है। मंगलवार को उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ने के एसएपी में 20 फीसदी बढ़ोतरी की थी। इस बढा़ेतरी के बाद सामान्य किस्म के गन्ने का एसएपी 240 रुपये और अगेती किस्म के गन्ने का एसएपी 250 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है। इस्मा ने चीनी वर्ष (अक्टूबर-सितंबर) 2011-12 के दौरान 2.6 करोड़ टन चीनी उत्पादन का अनुमान लगाया है। चीनी उत्पादन का सरकारी अनुमान 247-250 लाख टन है। पिछले चीनी वर्ष में यह आंकडा 2.45 करोड़ टन था। देश में चीनी की सालाना खपत 220 लाख टन है। इस वर्ष सरकार तीन समान खेपों में खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दे चुकी है। (BS Hindi)
चीनी निर्यात की अनुमति दे केंद्र
मुंबई November 09, 2011
संकट के दौर से गुजर रहे राज्य के चीनी उद्योग को मदद पहुंचाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर नवंबर में 10 लाख टन चीनी निर्यात की स्वीकृति देने का केंद्र से आग्रह किया है। इसने कहा है कि इसके बाद दिसंबर, जनवरी, मार्च और अप्रैल में इस मात्रा को 5 लाख या 10 लाख टन बढ़ाया जा सकता है।महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र से कहा है कि चालू पेराई सीजन में 260 लाख टन अनुमानित चीनी उत्पादन को देखते हुए भारत 40-50 लाख टन चीनी निर्यात की स्थिति में है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण ने खाद्य मंत्री के वी थॉमस के साथ बातचीत में दावा किया कि निर्यात के जल्द निर्णय से राज्य की मिलों को फायदा मिलेगा।एक वरिष्ठ मंत्री ने पहचान सार्वजनिक न करने का आग्रह करते हुए बिजनेस स्टैेंडर्ड को बताया कि 'खाद्य सुरक्षा के लिए 40 लाख टन संरक्षित करने के बाद भी उद्योग के पास 57 लाख टन चीनी का स्टॉक बचेगा। इसमें महाराष्ट्र का शेष चीनी स्टॉक 34 लाख टन होगा, जो भारत के कुल बचे हुए स्टॉक का 55.67 फीसदी है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में मार्च 2012 में ब्राजील और थाईलैंड से चीनी की आवक शुरू होने से पहले इस बचे हुए स्टॉक का निपटान निर्यात के जरिए कर दिया जाए।' मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि निर्यात की स्वीकृति खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत दी जानी चााहिए। राज्य की 170 से अधिक मिलों की प्रतिनिधि संस्था महाराष्ट्र सहकारी चीनी मिल संगठन ने भी निर्यात पर काफी जोर दिया है। संगठन के चेयरमैन विजयसिंह मोहिते-पाटिल ने कहा, 'जल्द निर्णय होना महाराष्ट्र के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे फैक्टरियों को अच्छा रिटर्न मिलेगा और उनके घाटे में कमी आएगी। साथ ही वे गन्ना किसानों को समय से भुगतान कर सकेंगी।' (BS Hindi)
संकट के दौर से गुजर रहे राज्य के चीनी उद्योग को मदद पहुंचाने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर नवंबर में 10 लाख टन चीनी निर्यात की स्वीकृति देने का केंद्र से आग्रह किया है। इसने कहा है कि इसके बाद दिसंबर, जनवरी, मार्च और अप्रैल में इस मात्रा को 5 लाख या 10 लाख टन बढ़ाया जा सकता है।महाराष्ट्र सरकार ने केंद्र से कहा है कि चालू पेराई सीजन में 260 लाख टन अनुमानित चीनी उत्पादन को देखते हुए भारत 40-50 लाख टन चीनी निर्यात की स्थिति में है। मुख्यमंत्री पृथ्वीराज च्वहाण ने खाद्य मंत्री के वी थॉमस के साथ बातचीत में दावा किया कि निर्यात के जल्द निर्णय से राज्य की मिलों को फायदा मिलेगा।एक वरिष्ठ मंत्री ने पहचान सार्वजनिक न करने का आग्रह करते हुए बिजनेस स्टैेंडर्ड को बताया कि 'खाद्य सुरक्षा के लिए 40 लाख टन संरक्षित करने के बाद भी उद्योग के पास 57 लाख टन चीनी का स्टॉक बचेगा। इसमें महाराष्ट्र का शेष चीनी स्टॉक 34 लाख टन होगा, जो भारत के कुल बचे हुए स्टॉक का 55.67 फीसदी है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में मार्च 2012 में ब्राजील और थाईलैंड से चीनी की आवक शुरू होने से पहले इस बचे हुए स्टॉक का निपटान निर्यात के जरिए कर दिया जाए।' मंत्री ने यह स्पष्ट किया कि निर्यात की स्वीकृति खुले सामान्य लाइसेंस (ओजीएल) के तहत दी जानी चााहिए। राज्य की 170 से अधिक मिलों की प्रतिनिधि संस्था महाराष्ट्र सहकारी चीनी मिल संगठन ने भी निर्यात पर काफी जोर दिया है। संगठन के चेयरमैन विजयसिंह मोहिते-पाटिल ने कहा, 'जल्द निर्णय होना महाराष्ट्र के लिए काफी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे फैक्टरियों को अच्छा रिटर्न मिलेगा और उनके घाटे में कमी आएगी। साथ ही वे गन्ना किसानों को समय से भुगतान कर सकेंगी।' (BS Hindi)
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