नई दिल्ली। चीनी मिलों को वित्तीय संकट से उबारने और किसानों के बकाया भुगतान को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) को 31 रुपये से बढ़ाकर 41 रुपये प्रति किलो तय करें।
नेशनल फेडरेशन ऑफ कोआपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज (एनएफसीएसएफ) ने कोऑपरेटिव शुगर सेक्टर में बढ़ते फाइनेंशियल स्ट्रेस को दूर करने के लिए केंद्र सरकार से तुरंत पॉलिसी में दखल देने की मांग की है।
एनएफसीएसएफ के प्रेसिडेंट हर्षवर्धन पाटिल और मैनेजिंग डायरेक्टर प्रकाश नाइकनवरे के नेतृत्व में एक डेलिगेशन ने सेक्टर की चिंताओं को दूर करने के लिए नई दिल्ली में कोऑपरेशन मिनिस्ट्री के सचिव, आईएएस, डॉ. आशीष कुमार भूटानी से मुलाकात की। उन्होंने बताया कि कोऑपरेटिव शुगर मिलों पर गन्ने की बढ़ती लागत, चीनी की कम कीमतों और बढ़ते गन्ने के बकाए के कारण चीनी मिलों को फाइनेंशियल दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
गन्ना पेराई सीजन 2025-26 के लिए चीनी का उत्पादन कम हुआ है, लेकिन उत्पादक लागत जोकि करीब 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि चीनी के एक्स-मिल भाव 3,850 रुपये प्रति क्विंटल के बीच का अंतर फाइनेंशियल नुकसान का कारण बन रहा है, जिस कारण किसानों को समय पर भुगतान नहीं हो पा रहा है।
उन्होंने केंद्र सरकार से चीनी का न्यूनतम बिक्री मूल्य (एमएसपी) 31 से बढ़ाकर 41 प्रति किलो करने की मांग की है। इसके साथ ही एथेनॉल के खरीद मूल्य में वृद्धि की जाए तथा चीनी उद्योग के लिए इथेनॉल उत्पादन कोटा 50 फीसदी तक बढ़ाया जाए। चीनी विकास निधि के तहत ओटीएस योजना में सुधार किया जाए, जिसमें मिलों को दंडात्मक ब्याज में 50 फीसदी की छूट मिले।
एनएफसीएसएफ ने इस बात पर जोर दिया कि कोऑपरेटिव चीनी मिलों को स्थिर करने, लिक्विडिटी में सुधार करने और गन्ना किसानों को तुरंत भुगतान करने के लिए समय पर सरकारी दखल देना बहुत जरूरी है। फेडरेशन कोऑपरेटिव चीनी सेक्टर की लंबे समय तक चलने वाली सस्टेनेबिलिटी पक्का करने के लिए सरकार के साथ मिलकर काम करने का अपना वादा दोहराता है।

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