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14 मार्च 2026

चालू सीजन में कॉटन का उत्पादन बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान - सीएआई

नई दिल्ली। उद्योग ने एक बार फिर कॉटन के उत्पादन अनुमान में बढ़ोतरी की है। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में देश में कॉटन का उत्पादन 3.50 लाख गांठ बढ़कर 320.50 लाख गांठ होने का अनुमान है, जबकि इससे पहले 317 लाख का अनुमान जारी किया था।


मालूम हो कि उद्योग ने दिसंबर 2025 में 309.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान जारी किया था, जोकि आरंभिक अनुमान से 4.50 लाख गांठ ज्यादा था। इसके बाद उद्योग ने इसे बढ़ाकर 317 लाख गांठ का कर दिया था।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया, सीएआई के अनुसार पंजाब के पहले के अनुमान में 50 हजार गांठ, उत्तर और लोअर राजस्थान में भी क्रमश: 50-50 हजार गांठ की कमी आने का अनुमान है। प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में पहले के अनुमान से 4 लाख गांठ ज्यादा एवं आंध्र प्रदेश में एक लाख गांठ ज्यादा होने का अनुमान है।

सीएआई के अनुसार उत्तर भारत के राज्यों में कॉटन का कुल उत्पादन 29 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें पंजाब की हिस्सेदारी 1.50 लाख गांठ, हरियाणा की 7 लाख गांठ के अलावा अपर राजस्थान में 12 लाख गांठ के अलावा लोअर राजस्थान में 8.50 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

मध्य भारत के राज्यों में कॉटन का उत्पादन 191 लाख गांठ होने का अनुमान है। इसमें गुजरात की हिस्सेदारी 75 लाख गांठ तथा महाराष्ट्र की 98 लाख गांठ के अलावा मध्य प्रदेश की 18 लाख गांठ है।

दक्षिण भारत के राज्यों में चालू फसल सीजन में 95 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है। इसमें तेलंगाना की हिस्सेदारी 45 लाख गांठ, आंध्र प्रदेश 18 लाख गांठ के अलावा कर्नाटक 27 लाख गांठ तथा तमिलनाडु में 5 लाख गांठ कॉटन के उत्पादन का अनुमान है।

अन्य राज्यों में ओडिशा में चालू सीजन में 3.50 लाख गांठ तथा अन्य राज्यों में 2 लाख गांठ के उत्पादन का अनुमान है।

चालू फसल सीजन में 47 लाख गांठ कॉटन के आयात का अनुमान है, जोकि पिछले साल के 41 लाख गांठ से 6 लाख गांठ ज्यादा है। चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत तक 36 लाख गांठ आयातित कॉटन भारतीय बंदरगाह पर पहुंच चुकी है।

चालू फसल सीजन 2025-26 के दौरान देश से 15 लाख गांठ कॉटन के निर्यात का अनुमान है, जबकि चालू फसल सीजन के पहले पांच महीनों में फरवरी अंत देश से 7 लाख गांठ कॉटन का निर्यात हो चुका है।

एसएआई के अनुसार चालू फसल सीजन के आरंभ में 60.59 लाख गांठ का बकाया स्टॉक बचा हुआ था जबकि 320.50 लाख गांठ का उत्पादन होने की उम्मीद है। इस दौरान 47 लाख गांठ आयातित कॉटन आयेगी। अत: घरेलू बाजार में कॉटन की कुल उपलब्धता 428.09 लाख गांठ की बैठेगी।

चालू फसल सीजन में कॉटन की कुल खपत 315 लाख गांठ की होने का अनुमान है, इसके अलावा 15 लाख गांठ का निर्यात हो जायेगा। अत: क्लोजिंग स्टॉक 98.09 लाख गांठ का बैठेगा। सीसीआई, महाराष्ट्र फेडरेशन, एमएनसी एवं जिनर्स के साथ ही व्यापारियों एवं निर्यातकों के पास 144.30 लाख गांठ कॉटन का स्टॉक है। इसके अलावा मिलों के पास करीब 75 लाख गांठ का स्टॉक है।

पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू फसल सीजन 2025-26 में फरवरी अंत तक उत्पादक राज्यों की मंडियों में 260.96 लाख गांठ, एक गांठ 170 किलो की आवक हो चुकी है।

चालू तेल वर्ष के पहले चार महीनों में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़ा - एसईए

नई दिल्ली। चालू तेल वर्ष 2025-26 के पहले चार महीनों नवंबर-25 एवं फरवरी-26 के दौरान देश में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 6 फीसदी बढ़कर 5,324,275 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले तेल वर्ष की समान अवधि में इनका आयात 5,023,900 टन का हुआ था। फरवरी 2026 में खाद्य तेलों का आयात पिछले महीने (जनवरी, 2026) के 13.12 लाख टन की तुलना में थोड़ा कम होकर 12.92 लाख टन का रह गया।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार फरवरी 2026 में खाद्य एवं अखाद्य तेलों का आयात 35 फीसदी बढ़कर 1,316,545 टन का हुआ है, जबकि पिछले साल फरवरी में इनका आयात 977,477 टन का हुआ था। इस दौरान खाद्य तेलों का आयात 1,292,043 टन का एवं अखाद्य तेलों का आयात 24,502 टन का हुआ है।

एसईए के अनुसार मिडिल ईस्ट और ब्लैक सी पर चल रहे तनावों ने भारत के खाद्य तेल के बाजार में काफी उतार-चढ़ाव और सप्लाई की चिंताएँ पैदा कर दी हैं। रूस और पूर्वी यूरोप से सूरजमुखी तेल के शिपमेंट में रुकावट और पाम तेल के माल ढुलाई के खर्च में बढ़ोतरी ने सूरजमुखी तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की है, जिससे व्यापारियों और उपभोक्ताओं को सप्लाई चेन के जोखिमों से निपटने के लिए स्थिति पर नजर रखनी पड़ रही है।

क्रूड तेल की कीमतों में आई तेजी से पाम तेल की बायोडीजल में दिलचस्पी बढ़ी: मिडिल ईस्ट में युद्ध की वजह से क्रूड तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से बायोफ्यूल प्रोड्यूसर पाम तेल बेस्ड बायोडीजल में दिलचस्पी ले रहे हैं, जिससे आने वाले समय में पाम तेल की डिमांड और कीमतें बढ़ सकती हैं, खासकर साउथ-ईस्ट एशिया में।

सूरजमुखी तेल की सप्लाई के रिस्क: वैसे तो भारत पहले से सूरजमुखी तेल के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर रहा है, लेकिन मौजूदा लड़ाई, खासकर लाल सागर और स्वेज नहर में संभावित रुकावटों से शिपमेंट में देरी होने, लॉजिस्टिक लागत बढ़ने और उपलब्धता पर असर पड़ने का खतरा है।

कीमतों में उतार-चढ़ाव: खाद्य तेलों की कीमतों में हाल ही में उतार-चढ़ाव देखा गया है। कुछ तेलों जैसे सूरजमुखी तेल की कीमतों में घरेलू बाजार में बढ़ोतरी देखी गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध के असर को कम करने के लिए सप्लाई चेन में रुकावट की चिंताओं के कारण, भारत सोया और सूरजमुखी तेल के लिए अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और उरुग्वे के साथ लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट की संभावना तलाश रहा है।

निर्यात पर असर: इस लड़ाई से भारत के डीओसी के निर्यात को भी खतरा है, क्योंकि साउथ-ईस्ट एशिया और मिडिल ईस्ट में शिपमेंट पर असर डालने वाली संभावित लॉजिस्टिक दिक्कतों से डीओसी के कुल एक्सपोर्ट में लगभग 20 फीसदी का हिस्सा आता है।

नेपाल से भारत में इंपोर्ट:
नवंबर-दिसंबर, 2025 के दौरान, नेपाल ने लगभग 101,000 टन रिफाइंड तेल भारत को निर्यात किया, जिसमें 89,753 टन रिफाइंड सोया तेल, 6,427 टन रिफाइंड सूरजमुखी तेल और 4,288 टन आरबीडी पामोलिन शामिल थे। जनवरी 2026 में, नेपाल ने लगभग 60,000 टन रिफाइंड तेल का निर्यात  किया, जिसमें मुख्य रूप से रिफाइंड सोया तेल और थोड़ी मात्रा में सूरजमुखी तेल तथा आरबीडी पामोलिन शामिल थे।

एसईए के अनुसार नवंबर 25 से फरवरी 26 के दौरान 803,297 टन के मुकाबले केवल 118,417 टन रिफाइंड पाम तेल का आयात हुआ और नवंबर 24 से फरवरी 25 के दौरान 4,081,880 टन के मुकाबले 5,099,951 टन क्रूड तेल का आयात हुआ। क्रूड पाम तेल के आयात में बढ़ोतरी की वजह से रिफाइंड तेल का रेश्यो 16 फीसदी से घटकर 2 फीसदी रह गया, जबकि क्रूड तेल का रेश्यो एक साल पहले के 84 फीसदी से बढ़कर 98 फीसदी का हो गया।

एसईए के अनुसार केंद्र सरकार की पॉलिसी के लिए धन्यवाद, जिसमें 31 मई, 2025 से क्रूड और रिफाइंड तेल के बीच ड्यूटी का अंतर 8.25 फीसदी से बढ़ाकर 19.25 फीसदी कर दिया गया है। इससे घरेलू रिफाइनिंग इंडस्ट्री की वैल्यू एडिशन, रोजगार और बेहतर कैपेसिटी इस्तेमाल में मदद मिली है, जो एडिबल ऑयल में आत्मनिर्भरता पर प्रधानमंत्री के विजन की तरफ एक कदम है।

चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन घटकर 283 लाख टन होने का अनुमान - एआईएसटीए

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में चीनी का उत्पादन 4.39 फीसदी घटकर 283 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पहले आरंभिक अनुमान में इसका उत्पादन 296 लाख टन होने की उम्मीद थी।


अखिल भारतीय चीनी व्यापार संघ, एआईएसटीए के अनुसार आरंभिक अनुमान में 296 लाख टन चीनी के उत्पादन का अनुमान लगाया था, लेकिन जिस तरह से हाल ही में देश के कई प्रमुख उत्पादक राज्यों में चीनी मिलों में पेराई बंद हुई है तथा गुड़ में गन्ने की खपत उम्मीद से ज्यादा हुई है, खासकर के उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में। अत: दूसरे आरंभिक अनुमान में इसको घटाकर 283 लाख टन कर दिया है।

एआईएसटीए के अनुसार चालू सीजन में चीनी का कुल उत्पादन 315 लाख टन होने की उम्मीद है, जबकि इसमें से 32 लाख टन की खपत एथेनॉल में हो जायेगी। इसलिए कुल उत्पादन 283 लाख टन का होगा।

विश्व बाजार में चीनी के दाम पांच साल के न्यूनतम स्तर पर है इसलिए निर्यात में पड़ते नहीं लग रहे। केंद्र सरकार ने 20 लाख टन चीनी के निर्यात की जो अनुमति दी हुई है, उसमें से केवल पांच लाख टन के निर्यात के सौदे ही हुए हैं, जबकि शिपमेंट केवल 2.50 लाख टन की ही हुई है।

प्रमुख उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 99.7 लाख टन तथा उत्तर प्रदेश में 91 लाख टन एवं कर्नाटक में 48 लाख टन और तमिलनाडु में 7.80 लाख टन के अलावा गुजरात में 7.50 लाख टन तथा अन्य राज्यों में इसका उत्पादन 29 लाख टन होने का अनुमान है।

बुधवार को विश्व बाजार शुगर की कीमतों में तेजी आई। आईसीई रॉ शुगर कॉन्ट्रैक्ट 0.09 सेंट तेज होकर 14.46 सेंट प्रति lb हो गया। इस दौरान व्हाइट शुगर वायदा 2.70 बढ़कर 421.10 डॉलर प्रति टन हो गया।

दिल्ली में बुधवार को एम ग्रेड चीनी की थोक दाम 4,350 रुपये और मुंबई में 4,100 रुपये तथा कानपुर में 4,370 रुपये तथा कोलकाता में 4,340 रुपये प्रति क्विंटल रहे। इस दौरान दिल्ली में चीनी के खुदरा भाव 46 रुपये तथा कानपुर में 45 रुपये और मुंबई में 45 रुपये तथा कोलकाता में 46 रुपये प्रति किलो बोले गए।

चालू समर सीजन में फसलों की बुआई 5.06 फीसदी पिछड़ी - कृषि मंत्रालय

नई दिल्ली। चालू समर सीजन 2026 में फसलों की कुल बुआई पिछले साल की तुलना में 5.06 फीसदी पिछे चल रही है। इस दौरान दलहन एवं तिलहन की बुआई बढ़ी है, जबकि धान की रोपाई के साथ मोटे अनाजों की बुवाई पिछले साल की तुलना में पिछड़ रही है।


कृषि मंत्रालय के अनुसार 9 मार्च 2026 तक देशभर में समर सीजन की फसलों की बुआई घटकर 31.69 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 33.38 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

समर की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू सीजन में घटकर केवल 25.30 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 26.89 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। समर सीजन में धान की रोपाई सामान्यत 31.49 लाख हेक्टेयर में होती है तथा फसल सीजन 2025 में इसकी रोपाई 33.28 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

समर सीजन में दालों की बुआई बढ़कर 1.59 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 1.57 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। समर में दलहन की प्रमुख फसल मूंग की बुआई 95 हजार हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि के 98 हजार हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान उड़द की बुआई चालू समर में 45 हजार हेक्टेयर में ही हुई है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 46 हजार हेक्टेयर की तुलना में कम है।

मोटे अनाजों की बुवाई चालू समर सीजन में घटकर 2.51 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इनकी बुआई 2.73 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। इस दौरान समर मक्का की बुआई 1.72 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.88 लाख हेक्टेयर की तुलना में कम है। इस दौरान ज्वार की बुआई 15 हजार हेक्टेयर, ज्वार की 46 हजार हेक्टेयर तथा रागी की 17 हजार हेक्टेयर में ही हुई है।

चालू समर सीजन में तिलहनी फसलों की बुआई बढ़कर 2.29 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई केवल 2.18 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। मूंगफली की बुआई चालू समर सीजन में बढ़कर 1.58 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल के 1.50 लाख हेक्टेयर की तुलना में ज्यादा है। इस दौरान सनफ्लावर की 19 हजार हेक्टेयर में और शीशम सीड की बुआई 49 हजार हेक्टेयर हो चुकी है। 

महाराष्ट्र में 133 चीनी मिलों में गन्ने की पेराई बंद, उत्पादन 97.50 लाख टन के पार

नई दिल्ली। पहली अक्टूबर 2025 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन (अक्टूबर-25 से सितंबर-26) में 8 मार्च तक महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 97.52 लाख टन का हो चुका है तथा राज्य की 133 चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है।


महाराष्ट्र में 2025–26 पेराई सीजन की गन्ना पेराई का काम अंतिम चरण में पहुंच गया है। राज्य की कुल 210 चीनी मिलों में से 133 मिलों ने अपना उत्पादन बंद कर दिया है। राज्य के शुगर कमिश्नर के अनुसार 8 मार्च तक राज्य में 1031.03 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 97.52 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। राज्य की औसत चीनी रिकवरी 9.46 फीसदी की बैठ रही है। पिछले साल की समान अवधि में राज्य में 835.32 लाख टन गन्ने की पेराई की थी और औसत चीनी की रिकवरी दर 9.41 फीसदी की थी। पिछले सीजन की इसी अवधि तक 143 चीनी मिलें बंद हो चुकी थी।

कोल्हापुर डिवीजन की सभी चीनी मिलों ने पेराई बंद कर दी है तथा इस डिवीजन की मिलों ने 209.96 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 23.10 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। कोल्हापुर डिवीजन में रिकवरी की दर 11.01 फीसदी की है। इसी तरह से पुणे डिवीजन में अब तक 223.38 लाख टन गन्ने की पेराई कर 21.95 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। पुणे डिवीजन की रिकवरी दर 9.83 फीसदी की है।

सोलापुर डिवीजन की 49 में से 35 मिलों पेराई बंद कर दी है। इस डिवीजन की मिलों में 218.64 लाख टन गन्ने की पेराई हो चुकी है और 18.76 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। अहमदनगर (अहिल्यानगर) डिवीजन में चीनी मिलों ने 125 लाख टन गन्ने की पेराई की है और 11.33 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। अहमदनगर डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.07 फीसदी है। यहां की 28 में से 23 चीनी मिलें बंद हो चुकी है।

छत्रपति संभाजीनगर डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 107.06 लाख टन गन्ने की पेराई कर 9.59 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया है। चीनी की रिकवरी की दर 8.02 फीसदी है। यहां की 25 में से 7 मिलें पेराई बंद कर चुकी है।

नांदेड़ डिवीजन में चीनी मिलों ने 123.27 लाख टन गन्ने की पेराई कर 11.57 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। इस डिवीजन में चीनी की रिकवरी दर 9.39 फीसदी है। अमरावती डिवीजन में चीनी मिलों ने अब तक 11.9 लाख टन गन्ने की पेराई की है तथा 1.18 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है। चीनी में रिकवरी की दर इस डिवीजन में 9.31 फीसदी है। नागपुर डिवीजन में 1.92 लाख टन पेराई हुई है।

रबी विपणन सीजन 2026-27 के दौरान केंद्र सरकार 303 लाख टन गेहूं खरीदेगी

नई दिल्ली। सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 (अप्रैल-मार्च) के दौरान 303 लाख टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया है। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अनुसार सरकार ने 779,000 टन मोटे अनाज, जिसमें बाजरा भी शामिल है, खरीदने का भी लक्ष्य तय किया है।


पिछले रबी विपणन सीजन 2025-26 में केंद्र सरकार ने गेहूं खरीदने का लक्ष्य 312.7 लाख टन का तय किया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 332.7 लाख टन कर दिया गया था। इसके मुकाबले, सरकार ने किसानों से 300.35 लाख टन गेहूं की खरीद की थी।

केंद्र सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 2,585 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। हालांकि मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं उत्पादक किसानों को राहत देते हुए एमएसपी पर 40 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने का फैसला किया है अत: राज्य के किसानों से गेहूं की खरीद मध्य प्रदेश में 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जाएगी।

उधर राजस्थान सरकार ने भी रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए राज्य के गेहूं किसानों को 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की हुई है। अत: राजस्थान के किसानों से गेहूं की खरीद 2,735 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जायेगी।

प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्यों पंजाब एवं हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में गेहूं की समर्थन मूल्य पर खरीद पहली अप्रैल से शुरू होगी, जबकि राजस्थान एवं मध्य प्रदेश से खरीद चालू महीने में शुरू हो जायेगी।

फसल वर्ष 2024-25 (जुलाई-जून) में देश में गेहूं का उत्पादन 117.9 मिलियन टन का हुआ टन था। चालू रबी में गेहूं की बुआई बढ़ी है तथा उत्पादक राज्यों में मौसम भी फसल के अनुकूल बना हुआ है ऐसे में उत्पादन पिछले साल की तुलना में बढ़ने की उम्मीद है। गेहूं खरीदने का समय आमतौर पर अप्रैल से जून के आखिर तक होता है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी सीजन गेहूं की बुआई बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 328.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी।

गेहूं के खरीद का लक्ष्य अलग-अलग राज्यों के फूड सेक्रेटरी और भारतीय खाद्य निगम, एफसीआई के अधिकारियों की एक बैठक में तय किया गया। इस बैठक में अनाज की खरीद, पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन और स्टोरेज पर असर डालने वाले कई फैक्टर का भी रिव्यू किया गया।

सरकार ने 10 फीसदी तक टूटे हुए दानों वाले बेहतर चावल की सप्लाई के लिए पांच राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया है। राज्यों से इसे लागू करने पर फीडबैक देने के लिए कहा गया है।

मध्य प्रदेश सरकार गेहूं किसानों को 40 रुपये का बोनस देगी, पंजीकरण का समय बढ़ाया

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश सरकार ने गेहूं उत्पादक किसानों को बड़ी राहत देते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बोनस देने का फैसला किया है। सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये प्रति क्विंटल के साथ 40 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की है। इसके बाद अब राज्य के किसानों से गेहूं की खरीदी 2,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जाएगी


राज्य के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि सरकार किसान कल्याण के लिए समर्पित है और उसी भाव के साथ काम कर रही है। शुक्रवार को मुख्यमंत्री ने भारतीय किसान संघ के प्रतिनिधियों के साथ मीटिंग की थी। इस मीटिंग के बाद किसानों को राहत देते हुए कई फैसले लिए गए।

उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने 2026 को 'किसान कल्याण वर्ष' घोषित किया है और अन्नदाताओं के हित में लगातार कदम उठाए जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने बताया कि गेहूं की सरकारी खरीद के लिए किसानों के पंजीयन की आखिरी तारीख को बढ़ाकर 10 मार्च कर दी गई है जो पहले सात मार्च तय की गई थी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने अपने संकल्प पत्र में 2028 तक गेहूं का खरीद भाव 2,700 रुपये प्रति क्विंटल करने की बात कही थी, जिसे राज्य सरकार किसानों के हित में धीरे, धीरे इस भाव को पार करेगी।

मालूम हो कि इससे पहले राजस्थान सरकार ने रबी विपणन सीजन 2026-27 के लिए राज्य के गेहूं किसानों 150 रुपये प्रति क्विंटल का बोनस देने की घोषणा की हुई है। अत: राजस्थान के किसानों से गेहूं की खरीद 2,735 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की जायेगी।

व्यापारियों के अनुसार गुजरात के बाद मध्य प्रदेश की मंडियों में गेहूं के बाद घटकर 2,250 से 2,350 रुपये प्रति क्विंटल रह गए हैं तथा चालू महीने में मध्य प्रदेश के साथ ही राजस्थान की मंडियों में गेहूं की आवक बढ़ेगी। इससे कीमतों पर और दबाव बनने की उम्मीद है। पंजाब एवं हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश की मंडियों में नए गेहूं की आवक अप्रैल में बढ़ेगी। जानकारों के अनुसार चालू सीजन में गेहूं की बुआई बढ़ी है तथा अभी तक मौसम भी फसल के लगभग अनुकूल रहा है इसलिए उत्पादन अनुमान बढ़ने की उम्मीद है।

केंद्र सरकार ने देश में गेहूं के बंपर स्टॉक को हल्का करने और इनकी कीमतों में स्थिरता को ध्यान में रखते हुए 25 लाख टन गेहूं के साथ-साथ 5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को मंजूरी दी थी। हालांकि भारतीय गेहूं विश्व कीमतों से करीब 45 से 50 डॉलर महंगा होने के कारण निर्यात में पड़ते नहीं लग रहे।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी सीजन गेहूं की बुआई बढ़कर 334.17 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इसकी बुआई केवल 328.04 लाख हेक्टेयर में ही हुई थी। 

मिडिल ईस्ट संकट जारी रहा तो बासमती चावल एवं क्रूड से जुड़े सेक्टर पर असर बढ़ेगा - क्रिसिल

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में चल रही जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताएं और बढ़ती हैं या फिर लंबे समय तक बनी रही, तो इसका कई भारतीय सेक्टर पर बुरा असर पड़ सकता है, जिसमें बासमती चावल, फर्टिलाइजर, डायमंड पॉलिशिंग, ट्रैवल ऑपरेटर और एयरलाइंस शामिल हैं, क्योंकि उनका इस क्षेत्र से सीधा संपर्क है।


क्रिसिल रेटिंग की रिपोर्ट के मुताबिक, सिरेमिक और फर्टिलाइजर जैसे सेक्टर, जो इम्पोर्टेड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं, उन्हें भी जल्द ही उत्पादन में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है और उन पर कड़ी नजर रखने की जरूरत होगी। मिडिल ईस्ट की अनिश्चितताएं, डायरेक्ट ट्रेड, एनएनजी पर निर्भर और क्रूड से जुड़े सेक्टर लंबे समय तक रुकावट का खामियाजा भुगत सकते है। अगर एनर्जी की कीमत ऊंची रहती हैं तो डाउनस्ट्रीम ऑयल रिफाइनर, टायर, पेंट, स्पेशलिटी केमिकल, फ्लेक्सिबल पैकेजिंग और सिंथेटिक टेक्सटाइल जैसे क्रूड से जुड़े सेक्टर भी प्रभावित हो सकते हैं।

भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 फीसदी कच्चा तेल और एलएनजी की आधी सप्लाई आयात से पूरी करता है, जिसमें लगभग 40-50 फीसदी कच्चा तेल और 50-60 फीसदी एलएनजी शिपमेंट होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ज़्यादातर शिपिंग जहाजों ने 1 मार्च, 2026 से इस रास्ते पर चलना बंद कर दिया है, क्योंकि रास्ते में खतरा बढ़ गया है। इस रास्ते में कोई भी लंबे समय तक रुकावट ग्लोबल क्रूड तेल और एलएनजी की उपलब्धता पर असर डाल सकती है और कीमतें बढ़ सकती है।

ब्रेंट क्रूड की कीमत जनवरी-फरवरी 2026 के दौरान औसतन 66-67 यूएसडी से बढ़कर पहले ही लगभग 82-84 यूएसडी प्रति बैरल (बीबीएल) हो गई है। इसी तरह, एशियाई स्पॉट एलएनजी की कीमत लगभग यूएसडी 10/एमएमबीटीयू से बढ़कर यूएसडी 24-25/एमएमबीटीयू हो गई है। एनर्जी की कीमतों में और बढ़ोतरी से देश का करंट अकाउंट डेफिसिट और फ्यूल इन्फ्लेशन बढ़ सकता है। इंडस्ट्रीज़ में एनर्जी की अहम भूमिका को देखते हुए, यह भारतीय कंपनियों के प्रॉफिट पर भी असर डाल सकता है। भारत अपनी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का लगभग दो-तिहाई हिस्सा भी आयात करता है, जिसमें ज्यादातर की सप्लाई वेस्ट एशिया से होती है। हालाँकि, क्योंकि एलपीजी का ज्यादा इस्तेमाल घरेलू इस्तेमाल के लिए होता है और सिर्फ लगभग 10 फीसदी का इस्तेमाल इंडस्ट्रियल फ्यूल के तौर पर होता है, इसलिए इंडिया इंक पर इसका असर कम होने का अनुमान है।

जिन सेक्टर्स पर ज्यादा असर पड़ रहा है, उनमें बासमती चावल की निर्यात शिपमेंट में देरी हो सकती है, क्योंकि पिछले वित्त वर्ष में भारत के लगभग 6 मिलियन टन बासमती निर्यात वॉल्यूम का लगभग 70-72 फीसदी वेस्ट एशियाई देशों को भेजा गया था। फर्टिलाइजर सेक्टर को भी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि भारत अपनी फर्टिलाइजर की जरूरत का लगभग 30 फीसदी आयात करता है, जिसमें वेस्ट एशिया इन आयात का लगभग 40 फीसदी सप्लाई करता है।

एविएशन सेक्टर को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इंडियन एयरलाइंस द्वारा ऑपरेट की जाने वाली कुल फ्लाइट्स में से लगभग 10 फीसदी वेस्ट एशिया जाती हैं या वहाँ से होकर दूसरे देशों को जाती हैं। एयरस्पेस पर रोक और एयरपोर्ट बंद होने, खासकर दुबई में, फ्यूल की लागत बढ़ सकती है और ऑपरेटिंग मार्जिन पर असर पड़ सकता है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर भारतीय कंपनियों पर जल्द असर सीमित रह सकता है, क्योंकि उनकी बैलेंस शीट मजबूत हैं, जो मौजूदा अनिश्चितताओं से कुछ बचाव कर सकती हैं।

कैस्टर सीड का उत्पादन बढ़कर 17.60 लाख टन होने का अनुमान - एसईए

नई दिल्ली। फसल सीजन 2025-26 के दौरान देश में कैस्टर सीड का उत्पादन 11 फीसदी बढ़कर 17.60 लाख टन होने का अनुमान है। फसल सीजन 2024-25 के इसका उत्पादन 15.90 लाख टन का हुआ है।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए ने 27 और 28 फरवरी 2026 को गांधीनगर में हुए ग्लोबल कैस्टर कॉन्फ्रेंस 2026 में 2025-26 सीजन के लिए अपने कैस्टर क्रॉप सर्वे के नतीजे जारी किए हैं। इसमें देश का कुल कैस्टर सीड का उत्पादन 17.60 लाख टन होने का अनुमान जारी किया, जो कि पिछले साल की तुलना में 11 फीसदी ज्यादा है। सर्वे के अनुसार कैस्टर सीड के प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम फसल के अनुकूल रहा जिससे इसकी प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई। यह अनुमान फरवरी 2026 के पहले सप्ताह तक किए गए दो राउंड के फील्ड सर्वे पर आधारित हैं।

एसईए के अनुसार कैस्टर सीड के उत्पादन में बढ़ोतरी के मुख्य कारणों में समय पर बुआई तथा उत्पादक क्षेत्रों में अच्छी मानसूनी बारिश के साथ ही किसानों द्वारा ज्यादा पैदावार वाली किस्मों को बड़े पैमाने पर अपनाने से हुई है। सभी राज्यों में फसल की सेहत काफी हद तक ठीक-ठाक रही। हालांकि एकाध जगहों पर प्रतिकूल मौसम का असर फसल पर पड़ा है, लेकिन इससे कुल उत्पादन पर कोई खास असर नहीं पड़ा।

गुजरात जोकि कैस्टर उत्पादन में सबसे ज्यादा योगदान देने वाला राज्य है, इसका उत्पादन 13.65 लाख टन होने का अनुमान है, जो कि पिछले साल की तुलना में 9 फीसदी ज्यादा है। हालांकि राज्य में इसकी बुआई थोड़ी कम होकर 6.34 लाख हेक्टेयर में हुई, लेकिन अच्छे फसल मैनेजमेंट और अच्छे मौसम की वजह से उत्पादकता में बढ़ोतरी हुई।

राजस्थान में कैस्टर सीड की बुआई 10 फीसदी बढ़कर 1.88 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि उत्पादन 18 फीसदी बढ़कर 3.22 लाख टन का होने का अनुमान। राज्य में समय पर बुआई, अच्छी मानसून बारिश और बाड़मेर, जालोर और जोधपुर जैसे खास जिलों में बेहतर फसल मैनेजमेंट से पैदावार में बढ़ोतरी हुई।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का कैस्टर सीड का कुल उत्पादन 0.58 लाख टन होने का अनुमान है, जो पिछले साल के 0.54 लाख टन से ज्यादा है। अन्य राज्यों में चालू फसल सीजन में कैस्टर सीड का उत्पादन 15 हजार होने का अनुमान है, जोकि पिछले साल की तुलना में बढ़ा है।

जनवरी में कैस्टर तेल का निर्यात 18 फीसदी फीसदी से ज्यादा घटा - एसईए

नई दिल्ली। जनवरी में देश से कैस्टर तेल का निर्यात 18.30 फीसदी घटकर 43,238 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले साल जनवरी में इसका निर्यात 52,926 टन का हुआ था।


सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एसईए के अनुसार मूल्य के हिसाब से जनवरी में कैस्टर तेल का निर्यात 605.65 करोड़ रुपये का ही हुआ है, जो कि पिछले साल जनवरी के 714.19 करोड़ रुपये की तुलना में कम है।

एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान कैस्टर तेल का निर्यात 542,063 टन का ही हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के दौरान इसका निर्यात 563,399 टन का हुआ था।

एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 10 महीनों अप्रैल से जनवरी के दौरान मूल्य के हिसाब से कैस्टर तेल का निर्यात 7,306.40 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात मूल्य के हिसाब से 7,026.52 करोड़ रुपये का ही हुआ था।

गुजरात में शनिवार को कैस्टर सीड के भाव 5 रुपये कमजोर होकर 1,250 से 1,275 रुपये प्रति 20 किलो रह गए, जबकि दैनिक आवक 75 हजार बोरियों, एक बोरी 75 किलो की हुई। राजकोट में कैस्टर सीड के दाम 10 रुपये कमजोर होकर 1,220 से 1,255 रुपये प्रति 20 किलो रह गए, जबकि गोंडल में इसके दाम 10 रुपये घटकर 1,220 से 1,256 रुपये प्रति 20 किलो बोले गए।

व्यापारियों के अनुसार हाल ही में कैस्टर सीड की कीमतों में मंदा आया है, क्योंकि उत्पादक मंडियों में इसकी दैनिक आवकों में बढ़ोतरी हुई है। मार्च महीने में भी कैस्टर सीड की दैनिक आवक बराबर बनी रहने का अनुमान है

कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2025-26 के दौरान कैस्टर सीड का उत्पादन 16.96 लाख टन का ही होने का अनुमान है, जबकि इसके पिछले फसल सीजन के दौरान 17.86 लाख टन का उत्पादन हुआ था।