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06 दिसंबर 2011

एफसीआरए में जल्द संशोधन से पहुंचेगा किसानों तक कमोडिटी फ्यूचर्स का लाभ

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संसदीय समिति उस विधेयक का परीक्षण कर रही है जिसके अंतर्गत कमोडिटी डेरिवेटिव मार्केट नियामक को स्वायत्तता देने की बात कही गई है। आठ महीने के बाद अब खाद्य, उपभोक्ता मामले और जन वितरण पर संसदीय स्थाई समिति कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट रेगुलेटर, फारवर्ड मार्केट कमीशन के अधिकारियों और कमोडिटी एक्सचेंजों के अधिकारियों से बातचीत कर रही है।
कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट को और सशक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार ने फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट (एफसीआरए) 1952 में संशोधन के लिए संसद के सामने प्रस्तुत किया है। इस अधिनियम के तहत ही भारत के कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट विनियमित होते हैं। साथ ही कमोडिटी फ्यूचर मार्केट के नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट के विकास और नियमों के कार्यान्वयन हेतु अधिकार मिलते हैं।
इस संदर्भ में पहला विधेयक लोक सभा में मार्च 2006 में रखा गया था जिसे स्थाई समिति को भेज दिया गया था। दिसंबर 2006 में ही स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी थी। इसके बाद विधेयक में संशोधन हेतु कैबिनेट के लिए एक नोट तैयार किया गया था जिस पर मई 2007 में विचार भी किया गया। बाद में इस पर व्यापक विचार-विमर्श का निर्णय लिया गया और इसे अंजाम भी दिया गया।
बाद में यह निर्णय लिया गया कि साल 2006 के विधेयक को वापस लेते हुए एक नया बिल पेश किया जाए और अभी समिति इसी नये विधेयक पर विचार कर रही है।अगर हम कमोडिटी एक्सचेंजों के ऐतिहासिक कारोबार पर एक नजर डालें तो पिछले सात वर्षों में संचयित कारोबार 40 प्रतिशत सीएजीआर के हिसाब से बढ़ कर साल 2010-11 में 120 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है।
वर्तमान एफसीआरए में कुछ मूलभूत कमियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है ताकि यह और सरल बनें। वर्तमान में ऑप्शन और वेदर डेरिवेटिव्स जैसे हेजिंग के उत्पाद उपलब्ध नहीं हैं। इसके जरिये किसान जोखिम के समय हेजिंग का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा अब तक फ्यूचर्स मार्केट में वित्तीय संस्थानों को अनुमति नहीं दी गई है।
नियामक के हाथ भी कई मामलों में बंधे हुए हैं और कई बातों के लिए उसे सरकार पर निर्भर रहना होता है। वर्तमान अधिनियम के तहत नियामक को वित्तीय और दैनिक परिचालन के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहना होता है। सरकार पर वित्तीय निर्भरता के कारण इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, मानव संसाधन में निवेश सीमित हो गया है जिस वजह से नियमनों के व्यवस्थित परिचालन और भावी विकास संभावनाओं में कठिनाई हो रही है।
देखा जाए तो बाजार के वर्तमान आकार और तेज विकास को देखते हुए फ्यूचर्स मार्केट को एक स्वायत्त और मजबूत नियामक की जरूरत है। नियामक को बाजार के कारोबारियों के गलत व्यापार पर पेनाल्टी लगाने और उसकी जांच करने का अधिकार मिलना चाहिए साथ ही फ्यूचर्स मार्केट के व्यापार को बेहतर निगरानी के लिए संपूर्ण पर्यवेक्षण का अधिकार मिलना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह वायदा बाजार आयोग को नियमों के सख्त कार्यान्वयन के लिए सबल बनाए जिसे वर्तमान में संबद्ध मंत्रालय की अनुमति पर निर्भर रहना होता है।
कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट को और आगे बढ़ाने के लिए एफएमसी को वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए ताकि इसके दायरे का विस्तार हो सके और इसे सभी वर्गों तक पहुंचाया जा सके।
दशकों से अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के साथ नियामकों की भूमिका में बदलाव आया है लेकिन एक एफएमसी ही ऐसा नियामक है जो सशक्तीकरण के मामले में पीछे छूट गया है। एक सशक्त एफएमसी दूसरे नियामकों से फ्यूचर्स मार्केट में वित्तीय संस्थानों की स्वीकृति हेतु पहल और मदद कर कसता है। अगर बैंक सहभागी बन जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पहुंच की बदौलत किसानों भी फ्यूचर्स मार्केट में भाग ले सकते हैं।
इसके अलावा नेटवर्क मजबूत होने की वजह से फ्यूचर्स के भाव का प्रसारण भी बड़े पैमाने पर हो सकेगा। वर्तमान में भारतीय कॉरपोरेट जो हेजिंग के लिए वैश्विक एक्सचेंजों का उपयोग कर रहे हैं वह भारतीय एक्सचेंजों और सेवाओं का उपयोग करने लगेंगे। यह सब तभी संभव होगा जब कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट के फायदे एक समर्पित, सशक्त और सक्षम नियामकीय ढांचे के जरिये समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाया जाए। (Business Bhaskar)

भारतीय घरों में है 950 अरब डॉलर का सोना

नई दिल्ली।। भारतीयों का सोने से लगाव जगजाहिर है। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय परिवारों के पास 950 अरब डॉलर (49,400 अरब रुपए) मूल्य का सोना है। वैश्विक अनुसंधान फर्म मैकक्वैरी की रिपोर्ट में कहा गया है कि सोना रखना देश की संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है। भारत सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। चीन का नंबर उसके बाद आता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय परिवारों के पास 18,000 टन सोना है, जो सोने के वैश्विक भंडार का 11 प्रतिशत है और मौजूदा मूल्य के हिसाब से यह 950 अरब डॉलर का बैठता है। यह सोना डॉलर मूल्य में भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 50 प्रतिशत है। मैकक्वैरी ने कहा है कि वित्त वर्ष 2009-10 में भारतीयों परिवारों की कुल बचत 329 अरब डॉलर थी। इसमें से सात से आठ फीसद निवेश सोने में किया गया था। सोने को श्रृंगार से अधिक सम्पत्ति रखने का साधन के रूप में रेखा जाता है। इस वजह से इस समय सोने के दाम बढ़ने से भारतीय परिवारों की इस ' अनुमानित स्वर्ण संपत्ति' का मूल्य भी बढ़ा है। रिपोर्ट में यह शब्द इसलिए इस्तेमाल किया गया है क्योंकि आम भारतीय परिवार संकट के समय भी सोने के आभूषण या सोना नहीं बेचते, क्योंकि ऐसा किए जाने को वे सही नहीं मानते। (ET Hindi)

रिटेल एफ डीआई पर होगा मेल!

नई दिल्ली December 05, 2011
बहुब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का रास्ता अभी पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार नीतियों, सहयोगी दलों और विपक्ष के बीच तालमेल के जरिये विकल्प की संभावनाएं भी तलाशने में जुटी है। सरकार मसले का हल निकालने के लिए एक नई नीति पर काम कर रही है। इसके तहत बहुब्रांड रिटेल में एफडीआई को 51 फीसदी से कम कर 26 या 49 फीसदी किया जा सकता है। हालांकि कैबिनेट ने 10 दिन पहले ही बहुब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी है।राजनीतिक दबाव को देखते हुए बुधवार को संसद की कार्यवाही शुरू होने से पहले सरकार ने 9 बजे सुबह सर्वदलीय बैठक बुलाई है। बैठक के बाद सरकार की ओर से सदन में बहुब्रांड रिटेल एफडीआई की नीति को आम सहमति बनने तक टालने की घोषणा की जा सकती है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सोमवार को नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और माकपा नेता सीताराम येचुरी को बताया कि सरकार रिटेल एफडीआई नीति को फिलहाल रोक सकती है। बहुब्रांड रिटेल में एफडीआई की सीमा 26 या 49 फीसदी करने के पीछे यह तर्क बताया जा सकता है कि स्टोरों का नियंत्रण भारतीयों के हाथों में ही रहेगा। भारतीय जनता पार्टी भी पहले कह चुकी है कि एफडीआई की अनुमति चरणबद्घ तरीके से दी जा सकती है।एक रिटेल कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में आने को उत्सुक हैं और वे एफडीआई के संशोधित विकल्प भी अपना सकती हैं। उन्होंने कहा कि एफडीआई की सीमा बाद में बढ़ाई जा सकती है। हालांकि एक अन्य रिटेल कंपनी के अधिकारी ने कहा कि एफडीआई में किसी तरह के बदलाव का विदेशी रिटेलरों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जो लंबे समय से भारत में आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार इसके जरिये खुद की छवि दुरुस्त करने में जुटी है।बुधवार को वित्त मंत्री के बयान के बाद उम्मीद है कि सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से चल सके। इस बीच भारतीय जनता पार्टी आंतरिक बैठक करने की तैयारी में है ताकि सरकार के किसी भी कदम का समुचित जवाब दिया जा सके। इस मसले पर भाजपा का रुख यह है कि जब तक सरकार एफडीआई नीति को वापस नहीं लेती है तब तक सदन की कार्यवाही बाधित रहेगी। हालांकि भाजपा के सूत्रों ने कहा कि सरकार के इस कदम पर सहमति बना सकती है क्योंकि इसे भाजपा कुछ हद तक अपनी जीत बता सकती है।सरकार के प्रबंधकों का कहना है कि प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जाएगा बल्कि नीति में थोड़ा बदलाव कर सहमति बनाने की कोशिश की जाएगी। भारतीयों के हाथों में कमान रहने पर सहमति बनने की उम्मीद है। इसके साथ ही यह भी अनिवार्य किया जा सकता है कि विदेशी कंपनियां पैसा तो लाएंगी और अपने ब्रांड बेचेगी लेकिन खुद के ब्रांड नाम को नहीं दिखा सकेंगी। यानी भारती-वॉलमार्ट स्टोर में केवल भारती का नाम हो सकता है। इन स्टोरों को यह भी सुनिश्चित करने को कहा जा सकता है कि कुल बिक्री का कुछ हिस्सा छोटे किराना स्टोरों को किया जाए। यही नहीं, छोटे और मझोले उद्योगों से 30 फीसदी उत्पादों की खरीद नीति को कायम रखते हुए छोटे-मझोले स्टोर का आकार 2.5 लाख डॉलर किया जा सकता है। अभी यह सीमा 10 लाख डॉलर है।लुढ़के रिटेल शेयरबहुब्रांड रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति पर फिलहाल रोक लगाए जाने की खबर से रिटेल कंपनियों के शेयरों में गिरावट का रुख देखा गया। बंबई स्टॉक एक्सचेंज में सोमवार को किशोर बियाणी प्रवर्तित पैंटालून रिटेल का शेयर 12.86 फीसदी की गिरावट के साथ 186.40 रुपये पर बंद हुआ। विशाल रिटेल, कुटन्स और ट्रेंट के शेयरों में भी करीब 3 से 7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। (BS Hindi)

पंजाब में बनेंगे 45 लाख टन क्षमता के गोदाम

चंडीगढ़ December 05, 2011
अगर सबकुछ ठीक-ठाक रहा तो अगले साल पंजाब में 45 लाख टन भंडारण की अतिरिक्त क्षमता का निर्माण हो जाएगा। निजी उद्यम गारंटी योजना (पीईजीएस) के तहत भारतीय खाद्य निगम पहले ही निजी उद्यमी को निविदा आवंटित कर चुका है। केंद्र की इस योजना के तहत नवंबर 2012 में ऑपरेशन शुरू होने की संभावना है। इसके बाद एफसीआई द्वारा नियुक्त नोडल एजेंसी पनग्रेन बाकी 5 लाख टन भंडारण क्षमता के निर्माण के लिए निविदा जारी करेगा। केंद्र पहले ही इसकी मंजूरी दे चुका है। यहां इस बात का उल्लेख महत्वपूर्ण है कि राज्य में भंडारण की अतिरिक्त क्षमता की काफी जरूरत है क्योंकि केंद्रीय भंडार में गेहूं व चावल का योगदान करने वाला यह प्रमुख राज्य है। साथ ही पंजाब के कृषि वैज्ञानिकों ने भंडारण की सुविधा के अभाव से खाद्यान्न के सडऩे और इसकी आर्थिक लागत पर चिंता जताई है। इसके समाधान के लिए एफसीआई ने पीईजीएस योजना के तहत करीब 50 लाख टन भंडारण की अतिरिक्त क्षमता का आवंटन किया है। पंजाब में फिलहाल भंडारण की बाबत 60-80 लाख टन क्षमता का अभाव है। राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि भंडारण क्षमता के निर्माण में निजी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई है। मौजूदा समय में पंजाब में 20 लाख टन अनाज के भंडारण की सुविधा है। राज्य में 1 करोड़ टन क्षमता के बंद भंडार हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर अवैज्ञानिक हैं। इसके अलावा 105 लाख टन भंडारण की सुविधा खुले में है, जिससे काफी ज्यादा नुकसान होता है।एफसीआई के सूत्रों ने कहा - पीईजीएस के तहत राज्य में भंडारण क्षमता के निर्माण के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे और 45 लाख टन भंडार की क्षमता के निर्माण को अंतिम मंजूरी दी गई है। इन भंडार गृहों में कई जिंस रखे जाएंगे। प्रस्तावित बुनियादी ढांचे के निर्माण पर करीब 1600 करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है, जिसमें जमीन की लागत शामिल नहीं है। जमीन की लागत हालांकि 225 करोड़ रुपये होगी।राज्य में भंडारण की अधिकतम क्षमता का निर्माण सोमा पंजाब वेयरहाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड करेगी, जो 579.30 करोड़ रुपये की लागत से राज्य में 12 स्थानों पर 12 गोदाम बना रही है। ये गोदाम संगरूर, फरीदकोट, मानसा, बठिंडा, मोगा, पटियाला और फतेहगढ़ साहिब जिलों में बनाए जाएंगे।एफसीआई के सूत्रों ने कहा कि बाकी 5 लाख टन भंडारण की क्षमता के निर्माण के लिए जल्द ही पनग्रेन निविदा जारी करेगा। (BS Hindi)

वैश्विक नरमी से चीनी मिलें चिंतित

मुंबई December 05, 2011
चीनी उद्योग विकट स्थिति का सामना कर रहा है। एक ओर जहां पेराई में देरी के बावजूद मिलों ने पिछले साल के मुकाबले ज्यादा चीनी उत्पादन के लिए ज्यादा गन्ने की पेराई की है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक बाजार में चीनी की लगातार कम हो रही कीमतों से निर्यात अनाकर्षक बनता जा रहा है, खास तौर पर तब जबकि केंद्र ने ओजीएल के तहत 10 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी है। घरेलू बाजार में चीनी की कीमतें 2800-2920 रुपये प्रति क्विंटल (एक्स-मिल) के दायरे में हैं, वहीं वैश्विक कीमतें गिरकर 613 डॉलर प्रति टन पर आ गई हैं जबकि पहले यह 750 डॉलर प्रति टन पर बिक रही थीं।इस सीजन में 30 नवंबर तक मिलों ने 21 लाख टन चीनी का उत्पादन किया है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 18 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के मुताबिक, पिछले साल 30 नवंबर तक 355 मिलें संचालित हो रही थीं, लेकिन इस सीजन में अब तक 350 मिलें ही संचालित हो पाई हैं। खास तौर से महाराष्ट्र में मिलों ने हालांकि इस सीजन में पेराई देरी से शुरू की है, लेकिन उत्पादन में कुल मिलाकर 17 फीसदी की उछाल आई है। चीनी उत्पादन में उत्तर प्रदेश ने बड़ी छलांग लगाई है और 30 नवंबर तक वहां 5 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। यह शायद उच्च उत्पादन का असर हो सकता है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में चीनी की कीमतें थोड़ी नरम हुई हैं।देश के कुल उत्पादन में 30 फीसदी से ज्यादा भागीदारी वाले राज्य महाराष्ट्र में 118 लाख टन गन्ने की पेराई से 11.3 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 114 लाख टन गन्ने की पेराई से 10.4 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। फेडरेशन ऑफ कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्रीज महाराष्ट्र के कार्यकारी प्रबंध निदेशक अजीत चौगले ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया - इस साल रिकवरी दर 9.6 फीसदी पर पहुंच गई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 9.2 फीसदी थी। मौजूदा सीजन में 161 मिलें (115 सहकारी व 46 निजी) पेराई में हिस्सा ले रही हैं, वहीं पिछले साल की समान अवधि में 147 मिलों (112 सहकारी और 35 निजी) ने पेराई में हिस्सा लिया था। उन्होंने कहा - अगर हम रोजाना 5 लाख टन गन्ने की पेराई का अनुमान लेकर चलें तो महाराष्ट्र में 8 करोड़ टन गन्ने की पेराई के जरिए अगले साल मई तक 90 लाख टन चीनी उत्पादन की उम्मीद कर सकते हैं।हालांकि इस्मा के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा - आज हमें ज्यादा प्रीमियम नहीं मिल रहा है। चीनी की वैश्विक कीमतें लगातार गिर रही हैं, इसलिए घरेलू कीमत के मुकाबले ज्यादातर चीनी मिलों को शायद ही कोई प्रीमियम मिल पाएगा। हालांकि तटीय राज्यों में स्थित चीनी मिलों को निर्यात थोड़ा आकर्षक लग सकता है, क्योंकि उनकी परिवहन लागत कम होगी। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में नरमी के बावजूद चीनी मिलें इसका निर्यात करना चाहती हैं ताकि उनकी नकदी में सुधार हो और चीनी के भंडार में थोड़ी कमी आए।महाराष्ट्र के बारे में एक सहकारी चीनी मिल के प्रबंध निदेशक ने कहा - वैश्विक बाजार में मांग घटने से राज्य की चीनी मिलें आहत हुई हैं क्योंकि वहां कीमतें 750 डॉलर प्रति टन से गिरकर 613 डॉलर प्रति टन पर आ गई हैं। ओजीएल के तहत पूर्व के 5 लाख टन चीनी के कोटे का करीब 2 लाख टन का निर्यात अनुबंध वैश्विक कीमतों के धराशायी होने के चलते एक्सपायर हो चुका है। उन्होंने कहा कि अब मिलें उम्मीद कर रही हैं कि केंद्र सरकार पूर्व के ओजीएल ऑर्डर की वैधता अवधि में विस्तार देगी। (BS Hindi)

सोने के ज्वैलरी पर अनिवार्य हॉलमार्किंग पहले महानगरों में

आर.एस. राणा नई दिल्ल

के बाद छोटे शहरों में स्कीम लागू होगीअभी सोने की ज्वैलरी पर हॉलमार्किंग स्वैच्छिकहॉलमार्किंग से ग्राहकों को शुद्धता की गारंटी मिलेगीबीआईएस (संशोधन) विधेयक पारित होने के बाद लागू होगी अनिवार्य हॉलमार्किंगउपभोक्ताओं के हितों को देखते हुए सरकार ने सोने के आभूषणों पर हॉलमार्किंग को अनिवार्य करने का मसौदा तैयार कर लिया है। इसके तहत सबसे पहले मेट्रो शहरों में सोने के गहनों पर हॉलमार्किंग अनिवार्य की जाएगी। सभी ज्वैलर्स को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा तथा हॉलमार्किंग अनिवार्य होने के बाद इसका पालन न करने वाले ज्वैलर्स के खिलाफ बीआईएस (संशोधन) विधेयक 2011 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कार्यवाही की जाएगी। हालांकि यह बदलाव बीआईएस (संशोधन) विधेयक 2011 संसद से पारित होने के बाद ही हो पाएगा।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बीआईएस (संशोधन) विधेयक, 2011 संसद में पारित होने के बाद सोने के गहनों पर अनिवार्य हॉलमार्किंग का रास्ता साफ हो जाएगा। सोने के आभूषणों पर हॉलमार्किंग अनिवार्य होने के बाद उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होगी तथा उपभोक्ताओं द्वारा खरीदे गए गहनों की शुद्धता की गारंटी तो मिलेगी ही, साथ ही खरीदे गए गहनों को दोबारा बनवाने या फिर बेचने पर वाजिब कीमत मिलने में भी आसानी होगी।
उन्होंने बताया कि हॉलमार्किंग की अनिवार्यता देश भर में चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएगी। सबसे पहले मेट्रो शहरों में इसकी अनिवार्यता होगी। उसके बाद छोटे शहरों और गांव में लागू करने की योजना है। इसका मसौदा तैयार कर लिया गया है तथा जल्द ही इसे केबिनेट की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। सबसे पहले सोने के गहनों पर हॉलमार्किंग की अनिवार्यता मेट्रो शहरों में लागू करने की योजना है।
उन्होंने बताया कि ज्वैलर्स को बीआईएस के पास रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके बाद ज्वैलर्स अपने उत्पादों का स्वयं मूल्यांकन करेंगे तथा हॉलमार्क लगाकर ही बिक्री कर सकेंगे।
हॉलमार्किंग अनिवार्य होने के बाद इसका पालन नहीं करने वाले ज्वैलर्स के खिलाफ बीआईएस (संशोधन) विधेयक 2011 और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत सजा और दंड का भी प्रावधान होगा। इसमें ज्वैलर्स पर एक लाख का जुर्माना या फिर दो साल की सजा का प्रावधान होगा। साथ ही सजा और जुर्माना दोनों का भी प्रावधान होगा।
भारतीय मानक ब्यूरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में सोने के आभूषणों पर बीआईएस हॉलमार्किंग स्वैच्छिक है। इस समय पूरे देश में केवल 8,712 ज्वैलर्स ने ही सोने के गहनों के लिए ब्यूरो से हॉलमार्क के लाइसेंस लिये हैं। जबकि सोने की शुद्धता मापने के लिए देशभर में 159 लैब खुली हुई हैं। देश भर में इस समय करीब 3 लाख रजिस्टर्ड ज्वैलर्स है। (Business Bhaskar....R S Rana)

सबको सस्ता अनाज देने पर फैसला जल्द

तैयारीअंतर-मंत्रालय समिति में चर्चा के बाद खाद्य मंत्रालय ने कैबिनेट को भेजा मसौदाखाद्य सुरक्षा की गारंटी देने वाले विधेयक के इसी सत्र में आने की पूरी संभावनाखाद्य सुरक्षा विधेयक पर कैबिनेट में चर्चा शीघ्र ही होने की उम्मीददेश की तकरीबन दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पर तैयार कैबिनेट नोट को खाद्य मंत्रालय ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास भेज दिया है। सूत्रों का कहना है कि कैबिनेट इस विधेयक पर जल्द ही चर्चा कर सकती है क्योंकि यूपीए सरकार इसे संसद के चालू शीतकालीन सत्र में ही पेश करना चाहती है। प्रस्तावित विधेयक से सरकारी राजकोष पर बतौर खाद्य सब्सिडी 94,973 करोड़ रुपये का सालाना बोझ पड़ेगा।
सूत्रों का कहना है कि इस विधेयक पर अंतर-मंत्रालय समिति 1 दिसंबर को चर्चा कर चुकी है और इसे कैबिनेट को भेज दिया गया है। सूत्रों ने यह भी बताया कि रियायती खाद्यान्न का कानूनी हक लोगों को मिल जाने से सरकार दो लक्ष्यों को पूरा कर पाएगी। एक तो गरीबों को खाद्य सुरक्षा का उत्तरदायित्व पूरा होगा। दूसरा, वर्ष 2015 तक गरीबी उन्मूलन को लेकर संयुक्त राष्ट्र की ओर से तय किए गए सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकेगा। इससे पहले जुलाई में खाद्य पर मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल के मसौदे को मंजूरी दे दी थी।
सूत्रों कहना है कि प्रस्तावित बिल से खाद्य सब्सिडी का खर्च मौजूदा 67,310 करोड़ रुपये से बढ़कर 94,973 करोड़ रुपये सालाना हो जाएगा। इस विधेयक के तहत राशन कार्ड परिवार की सबसे बड़ी महिला सदस्य के नाम दिया जाएगा। गरीब परिवार (बीपीएल) के प्रत्येक सदस्य को 7 किलो चावल 3 रुपये प्रति किलो, गेहूं 2 रुपये प्रति किलो और मोटा अनाज एक रुपये प्रति किलो के हिसाब से दिया जाएगा। गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) के परिवारों को हर महीने तीन किलो खाद्यान्न न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधी कीमत पर दिया जाएगा। (Business Bhaskar)