तगड़ा झटका - इस दिशा में अपने बढ़ते कदम को थामने पर विवश हुई सरकारप्रणब ने कहा, सरकार मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई के निर्णय को फिलहाल टालने की इच्छुक प्रणब ने यह भी कहा, संबंधित लोगों व विपक्षी दलों के साथ सलाह-मशविरा के बाद ही इस बारे में लिया जाएगा अंतिम निर्णयसरकार बुधवार की सुबह सर्वदलीय बैठक बुलाए जिसमें वह रिटेल एफडीआई मसले पर अपना रुख स्पष्ट कर सकती है। -सुषमा स्वराज, लोकसभा में विपक्ष की नेता पिछली सर्वदलीय बैठक में भाजपा ने साफ-साफ शब्दों में यह कहा था कि वह रिटेल एफडीआई के निर्णय को वापस लिए जाने के पक्ष में है। अब देखना यह है कि सरकार का रुख क्या रहता है। -रवि शंकर प्रसाद, भाजपा प्रवक्ता अब भी हमारी मांग यही है कि रिटेल एफडीआई के निर्णय को बिना शर्त वापस लिया जाए। सर्वदलीय बैठक में सरकार का जो रुख रहेगा, उसी के मद्देनजर हम निर्णय लेंगे। सीताराम येचुरी, सीपीएम नेताविपक्ष, खुदरा कारोबारियों के भारी विरोध का असरविपक्ष और खुदरा कारोबारियों के भारी विरोध को देखते हुए मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के फैसले पर अडिग सरकार को आखिरकार पीछे हटना पड़ा है। सोमवार को वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ऐलान किया कि अब सभी राजनैतिक दलों के अलावा एफडीआई से प्रभावित होने वाले पक्षों के साथ सलाह-मशविरा करने के बाद ही इस पर कोई फैसला किया जाएगा। तब तक के लिए इस फैसले पर रोक लगी रहेगी।
वहीं, दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी ने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के फैसले को पूर्ण रूप से वापस लेने की मांग की है। विपक्ष दलों ने यह भी साफ कर दिया है कि इस बारे में सरकार के औपचारिक पक्ष को जानने के बाद ही वे अपना फैसला लेंगे। यही नहीं, आगामी 12-13 दिसंबर को देशभर के कारोबारी भी मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के विरोध में अपनी रणनीति तय करने के लिए इकट्ठा हो रहे हैं।
गत 24 नवंबर को कैबिनेट की बैठक में मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी गई थी। हालांकि, 25 नवंबर से ही इस फैसले के विरोध में संसद की कार्यवाही लगातार स्थगित होती रही। वहीं, देश भर में खुदरा कारोबारियों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया। एक दिसंबर को कारोबारियों ने देशव्यापी बंद रखा।
वैसे तो तीन दिन पहले तक केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्री आनंद शर्मा और सरकार के अन्य मंत्री इस फैसले को वापस नहीं लेने का राग अलाप रहे थे, लेकिन लगातार दो सप्ताह से संसदीय कार्यवाही में जारी गतिरोध को देखते हुए प्रणब ने सोमवार को लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और सीपीएम नेता सीताराम येचुरी को बताया कि सरकार ने मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई के फैसले पर फिलहाल रोक लगाने का फैसला किया है।
सूत्रों के मुताबिक दोनों नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार को सभी पार्टियों की बैठक बुलाने की सलाह दी है और उस बैठक में लिए जाने वाले फैसले को संसद में बताने के लिए कहा है। हालांकि, सुषमा स्वराज के मुताबिक प्रणब ने संसद में अपने पक्ष को स्पष्ट करने की बात कही है। इस मसले पर 7 दिसंबर को सभी राजनैतिक दलों की बैठक बुलाई जा सकती है जहां सरकार मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के मुद्दे पर अपना पक्ष साफ करेगी।
भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि उन्हें सर्वदलीय बैठक में अब सरकार की औपचारिक घोषणा का इंतजार है। भाजपा मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई के फैसले को वापस लेने के अपने पक्ष को पहले ही साफ कर चुकी है। येचुरी के मुताबिक प्रणब ने उनसे कहा है कि सरकार ने इस फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है ताकि संसदीय कार्यवाही चल सके। (Business Bhaskar)
06 दिसंबर 2011
05 दिसंबर 2011
पैदावार बढऩे के बावजूद दलहन का आयात बढ़ा
बिजनेस भास्कर
नई दिल्ली
सरकार भले ही दलहन की बंपर पैदावार से आयात पर निर्भरता कम होने की बात कर रही हो लेकिन आंकड़े इसके उलट हैं। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों में दलहन का आयात लगभग दो फीसदी बढ़ा है जबकि कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2011-12 में दालों का उत्पादन बढ़कर 180.9 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि देश में दालों की सालाना खपत 185-190 लाख टन की मानी जाती है। हाल ही में रुपये के मुकाबले डॉलर में आई मजबूती से दलहन आयातकों को पड़ते नहीं लग रहे हैं। ऐसे में आगामी दिनों में आयात प्रभावित होने की संभावना है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 16.59 लाख टन दालों का आयात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 16.28 लाख टन दालों का आयात हुआ था। अभी तक हुए कुल आयात में 10 लाख टन मटर और 1.60 लाख टन अरहर है। इसके अलावा 68,000 टन मसूर और 50,000 टन चने का आयात हुआ है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2011-12 में देश में दलहन का बंपर उत्पादन 180.9 लाख टन होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2009-10 में दालों का उत्पादन 146.6 लाख टन का हुआ था। वर्ष 2011-12 में खरीफ में दलहन उत्पादन 64.3 लाख टन होने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में दलहन की बुवाई 92.94 लाख टन में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 87.94 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। रिक्का ग्लोबल इम्पैक्स लिमिटेड के डायरेक्टर कर्ण अग्रवाल ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के शुरू में आयातकों ने आयात सौदे ज्यादा मात्रा में कर लिए थे लेकिन हाल ही में रुपये के मुकाबले डॉलर मजबूत होने से आयातकों को पड़ते नहीं लग रहे हैं इसलिए आगामी महीनों में आयात में कमी आने की आशंका है। वैसे भी घरेलू बाजार में खरीफ दलहनों की आवक शुरू होने से कीमतों में गिरावट आई है। मुंबई में आस्ट्रेलियाई चने का भाव 3,100-3,225 रुपये तथा तंजानियाई चने का भाव 3,450 रुपये प्रति क्विंटल है। लेकिन आयातक नए आयात सौदे नहीं कर रहे हैं। दिल्ली में चने का भाव 3,350 से 3,450 रुपये प्रति क्विंटल है। बर्मा उड़द का भाव मुंबई में 3,250 रुपये, मूंग तंजानिया 4,200 रुपये, लेमन अरहर का भाव 3,150 रुपये तंजानिया की मलावी अरहर का भाव 3,000 रुपये प्रति क्विंटल है। आयातित मटर का भाव मुंबई में 2,081 रुपये प्रति क्विंटल है। (Business Bhaskar..R S Rana)
नई दिल्ली
सरकार भले ही दलहन की बंपर पैदावार से आयात पर निर्भरता कम होने की बात कर रही हो लेकिन आंकड़े इसके उलट हैं। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों में दलहन का आयात लगभग दो फीसदी बढ़ा है जबकि कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2011-12 में दालों का उत्पादन बढ़कर 180.9 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि देश में दालों की सालाना खपत 185-190 लाख टन की मानी जाती है। हाल ही में रुपये के मुकाबले डॉलर में आई मजबूती से दलहन आयातकों को पड़ते नहीं लग रहे हैं। ऐसे में आगामी दिनों में आयात प्रभावित होने की संभावना है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान 16.59 लाख टन दालों का आयात हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में 16.28 लाख टन दालों का आयात हुआ था। अभी तक हुए कुल आयात में 10 लाख टन मटर और 1.60 लाख टन अरहर है। इसके अलावा 68,000 टन मसूर और 50,000 टन चने का आयात हुआ है। कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2011-12 में देश में दलहन का बंपर उत्पादन 180.9 लाख टन होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2009-10 में दालों का उत्पादन 146.6 लाख टन का हुआ था। वर्ष 2011-12 में खरीफ में दलहन उत्पादन 64.3 लाख टन होने का अनुमान है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में दलहन की बुवाई 92.94 लाख टन में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 87.94 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। रिक्का ग्लोबल इम्पैक्स लिमिटेड के डायरेक्टर कर्ण अग्रवाल ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के शुरू में आयातकों ने आयात सौदे ज्यादा मात्रा में कर लिए थे लेकिन हाल ही में रुपये के मुकाबले डॉलर मजबूत होने से आयातकों को पड़ते नहीं लग रहे हैं इसलिए आगामी महीनों में आयात में कमी आने की आशंका है। वैसे भी घरेलू बाजार में खरीफ दलहनों की आवक शुरू होने से कीमतों में गिरावट आई है। मुंबई में आस्ट्रेलियाई चने का भाव 3,100-3,225 रुपये तथा तंजानियाई चने का भाव 3,450 रुपये प्रति क्विंटल है। लेकिन आयातक नए आयात सौदे नहीं कर रहे हैं। दिल्ली में चने का भाव 3,350 से 3,450 रुपये प्रति क्विंटल है। बर्मा उड़द का भाव मुंबई में 3,250 रुपये, मूंग तंजानिया 4,200 रुपये, लेमन अरहर का भाव 3,150 रुपये तंजानिया की मलावी अरहर का भाव 3,000 रुपये प्रति क्विंटल है। आयातित मटर का भाव मुंबई में 2,081 रुपये प्रति क्विंटल है। (Business Bhaskar..R S Rana)
पैदावार में कमी के बावजूद तिल में तेजी नहीं
बिजनेस भास्कर नई दिल्ली
चालू खरीफ सीजन में देश में तिल की पैदावार में 4.5 फीसदी की कमी आने की आशंका है लेकिन यूरोप और अमेरिका में आर्थिक मंदी के कारण निर्यात आर्डर कम मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले अन्य देशों का तिल सस्ता है। ऐसे में घरेलू बाजार में इसकी मौजूदा कीमतों में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है। धवल एग्री एक्सपोट्र्स के अध्यक्ष सुरेश चंदाराणा ने बताया कि प्रतिकूल मौसम से चालू सीजन में तिल की पैदावार में कमी आने की संभावना है। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय तिल का एफओबी भाव 1,200 डॉलर प्रति प्रति टन है जो पिछले साल के लगभग बराबर ही हैं। उधर पाकिस्तान का भाव कम होने के कारण खाड़ी देश पाकिस्तान से आयात कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में आर्थिक मंदी का असर भी भारत से तिल के निर्यात पर पडऩे की आशंका है। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में तिल का भाव 1,050 से 1,150 रुपये प्रति 20 किलो चल रहा है जबकि पिछले साल की समान अवधि में भाव 1,300 से 1,350 रुपये प्रति 20 किलो था। सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू खरीफ में तिल की पैदावार घटकर 4.20 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 4.40 लाख टन का उत्पादन हुआ था। चालू खरीफ में राजस्थान में तिल की पैदावार 1.40 लाख टन, गुजरात में 40,000 टन, मध्य प्रदेश में 50,000 टन, उड़ीसा में 50,000 टन और कर्नाटक में 15,000 टन होने का अनुमान है। देश में तिल की पैदावार खरीफ और रबी दोनों सीजन में होती है। वर्ष 2010-11 में तिल की कुल पैदावार 7.55 लाख टन की हुई थी। एसईए के अनुसार निर्यात और घरेलू खपत को मिलाकर खरीफ सीजन में तिल की कुल मांग 3.50 लाख टन होने का अनुमान है। ऐसे में करीब 70,000 टन का बकाया स्टॉक बचने की संभावना है। तिल के थोक कारोबारी समीर भाई शाह ने बताया कि निर्यात के मुकाबले तिल की घरेलू खपत काफी कम होती है। पिछले साल देश से कुल 3.45 लाख टन तिल का निर्यात हुआ था ऐसे में घरेलू बाजार में तिल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय मांग के आधार पर ही तय होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग कमजोर होने के कारण ही पैदावार में कमी के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतें पिछले साल से कम है। (Business Bhaskar....R S Rana)
चालू खरीफ सीजन में देश में तिल की पैदावार में 4.5 फीसदी की कमी आने की आशंका है लेकिन यूरोप और अमेरिका में आर्थिक मंदी के कारण निर्यात आर्डर कम मिल रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले अन्य देशों का तिल सस्ता है। ऐसे में घरेलू बाजार में इसकी मौजूदा कीमतों में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है। धवल एग्री एक्सपोट्र्स के अध्यक्ष सुरेश चंदाराणा ने बताया कि प्रतिकूल मौसम से चालू सीजन में तिल की पैदावार में कमी आने की संभावना है। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय तिल का एफओबी भाव 1,200 डॉलर प्रति प्रति टन है जो पिछले साल के लगभग बराबर ही हैं। उधर पाकिस्तान का भाव कम होने के कारण खाड़ी देश पाकिस्तान से आयात कर रहे हैं। अमेरिका और यूरोप में आर्थिक मंदी का असर भी भारत से तिल के निर्यात पर पडऩे की आशंका है। उन्होंने बताया कि उत्पादक मंडियों में तिल का भाव 1,050 से 1,150 रुपये प्रति 20 किलो चल रहा है जबकि पिछले साल की समान अवधि में भाव 1,300 से 1,350 रुपये प्रति 20 किलो था। सॉल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू खरीफ में तिल की पैदावार घटकर 4.20 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 4.40 लाख टन का उत्पादन हुआ था। चालू खरीफ में राजस्थान में तिल की पैदावार 1.40 लाख टन, गुजरात में 40,000 टन, मध्य प्रदेश में 50,000 टन, उड़ीसा में 50,000 टन और कर्नाटक में 15,000 टन होने का अनुमान है। देश में तिल की पैदावार खरीफ और रबी दोनों सीजन में होती है। वर्ष 2010-11 में तिल की कुल पैदावार 7.55 लाख टन की हुई थी। एसईए के अनुसार निर्यात और घरेलू खपत को मिलाकर खरीफ सीजन में तिल की कुल मांग 3.50 लाख टन होने का अनुमान है। ऐसे में करीब 70,000 टन का बकाया स्टॉक बचने की संभावना है। तिल के थोक कारोबारी समीर भाई शाह ने बताया कि निर्यात के मुकाबले तिल की घरेलू खपत काफी कम होती है। पिछले साल देश से कुल 3.45 लाख टन तिल का निर्यात हुआ था ऐसे में घरेलू बाजार में तिल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय मांग के आधार पर ही तय होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग कमजोर होने के कारण ही पैदावार में कमी के बावजूद घरेलू बाजार में कीमतें पिछले साल से कम है। (Business Bhaskar....R S Rana)
कमोडिटी वायदा में स्टांप ड्यूटी बढ़ाने का विरोध
नई दिल्ली
उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर 0.003 फीसदी स्टाम्प शुल्क लगाने के वित्त मंत्रालय के प्रस्ताव का विरोध किया है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय कुछ राज्यों में कमोडिटी के वायदा कारोबार पर स्टाम्प शुल्क शून्य है तथा कई राज्यों में इसकी दर काफी कम है। इसलिए हमने वित्त मंत्रालय से मांग की है कि वर्तमान स्थिति को ही बरकरार रखा जाए। वित्त मंत्रालय ने एक करोड़ रुपये के कारोबार पर 300 रुपये स्टांप ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव किया है। अधिकारी ने बताया कि कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टाम्प शुल्क लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। राज्यों ने जिंसों पर वैट व अन्य टैक्स लगाए हुए हैं, ऐसे में अगर कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टांप शुल्क को 0.003 फीसदी कर दिया गया तो इससे जिंसों के दाम और बढ़ जाएंगे। इस समय कई राज्यों में तो कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टांप शुल्क है ही नहीं जबकि दिल्ली में कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर केवल 0.001 फीसदी स्टांप शुल्क है। कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर 0.003 फीसदी स्टाम्प शुल्क लगाने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय का है। इसके तहत एक करोड़ रुपये के कारोबार पर 300 रुपये स्टांप शुल्क लगाने की सिफारिश की गई है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय जिंस वायदा बाजार के लिए नीतियां बनाता है जबकि वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) देश के 23 जिंस एक्सचेंजों के परिचालन पर निगाह रखता है। उन्होंने बताया कि एफएमसी के साथ ही देश के पांच बड़े कमोडिटी एक्सचेंजों ने भी इसका विरोध किया है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले छह महीनों अप्रैल से सितंबर के दौरान कमोडिटी एक्सचेंजों का कारोबार 79 फीसदी बढ़ा है। एफएमसी के अनुसार पहली अप्रैल से 11 सितंबर तक एक्सचेंजों का कारोबार बढ़कर 92,61,052 करोड़ रुपये का हो गया। जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका कारोबार 52,72,550 करोड़ रुपये का था। इस दौरान एग्री जिंसों का कारोबार बढ़कर 6,30,909.74 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि एग्री केटेगरी की अखाद्य जिंसों का (जैसे ग्वार सीड, केस्टरसीड, मेंथा ऑयल, ग्वार गम, कपास और रबर आदि) का कारोबार बढ़कर 3,01,882.80 करोड़ रुपये का हुआ है। इस दौरान कारोबार में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सोना, चांदी और प्लेटिनम के वायदा कारोबार में हुई है। (Business Bhaskar...R S Rana)
उपभोक्ता मामले मंत्रालय ने कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर 0.003 फीसदी स्टाम्प शुल्क लगाने के वित्त मंत्रालय के प्रस्ताव का विरोध किया है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय कुछ राज्यों में कमोडिटी के वायदा कारोबार पर स्टाम्प शुल्क शून्य है तथा कई राज्यों में इसकी दर काफी कम है। इसलिए हमने वित्त मंत्रालय से मांग की है कि वर्तमान स्थिति को ही बरकरार रखा जाए। वित्त मंत्रालय ने एक करोड़ रुपये के कारोबार पर 300 रुपये स्टांप ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव किया है। अधिकारी ने बताया कि कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टाम्प शुल्क लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। राज्यों ने जिंसों पर वैट व अन्य टैक्स लगाए हुए हैं, ऐसे में अगर कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टांप शुल्क को 0.003 फीसदी कर दिया गया तो इससे जिंसों के दाम और बढ़ जाएंगे। इस समय कई राज्यों में तो कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर स्टांप शुल्क है ही नहीं जबकि दिल्ली में कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर केवल 0.001 फीसदी स्टांप शुल्क है। कमोडिटीज के वायदा कारोबार पर 0.003 फीसदी स्टाम्प शुल्क लगाने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय का है। इसके तहत एक करोड़ रुपये के कारोबार पर 300 रुपये स्टांप शुल्क लगाने की सिफारिश की गई है। उपभोक्ता मामले मंत्रालय जिंस वायदा बाजार के लिए नीतियां बनाता है जबकि वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) देश के 23 जिंस एक्सचेंजों के परिचालन पर निगाह रखता है। उन्होंने बताया कि एफएमसी के साथ ही देश के पांच बड़े कमोडिटी एक्सचेंजों ने भी इसका विरोध किया है। चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले छह महीनों अप्रैल से सितंबर के दौरान कमोडिटी एक्सचेंजों का कारोबार 79 फीसदी बढ़ा है। एफएमसी के अनुसार पहली अप्रैल से 11 सितंबर तक एक्सचेंजों का कारोबार बढ़कर 92,61,052 करोड़ रुपये का हो गया। जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका कारोबार 52,72,550 करोड़ रुपये का था। इस दौरान एग्री जिंसों का कारोबार बढ़कर 6,30,909.74 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि एग्री केटेगरी की अखाद्य जिंसों का (जैसे ग्वार सीड, केस्टरसीड, मेंथा ऑयल, ग्वार गम, कपास और रबर आदि) का कारोबार बढ़कर 3,01,882.80 करोड़ रुपये का हुआ है। इस दौरान कारोबार में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी सोना, चांदी और प्लेटिनम के वायदा कारोबार में हुई है। (Business Bhaskar...R S Rana)
मार्च तक 40 लाख टन भंडारण के नए गोदाम तैयार हो जाएंगे
आर.एस. राणा नई दिल्ली
खाद्य मंत्रालय नए गोदाम बनाने की अपनी योजना पर जिस तरह आगे बढ़ रहा है, इससे उसे भरोसा है कि मार्च 2012 तक वह 40 लाख टन भंडारण के नए गोदाम विकसित कर लेगा। इससे खाद्यान्न भंडारण में आ रही समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है। मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) विभिन्न राज्यों में अभी तक 109 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता को मंजूरी दे चुकी है। इसमें सबसे ज्यादा मंजूरी पंजाब में 42.2 लाख टन और हरियाणा में 20.18 लाख टन की है। सरकार ने 151 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। खाद्यान्न भंडारण की समस्या को दूर करने के लिए खाद्य मंत्रालय काफी सक्रिय है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि एचएलसी अभी तक 109 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता को मंजूरी दे चुकी है तथा बाकी को भी जल्दी ही मंजूरी दी जाएगी। अभी तक 4.75 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता तैयार भी हो चुकी है तथा यह भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को सौंपी जा चुकी है। मंत्रालय ने 40 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता मार्च 2012 तक तैयार करने का लक्ष्य तय किया है। जबकि कुल 151 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता मार्च 2013 तक पूरी होने की संभावना है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत दस साल और सात साल के लिए संशोधित गारंटी योजना के तहत भंडारण क्षमता बढ़ाई जा रही है। उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा पंजाब में 51 लाख टन की अतिरिक्त खाद्यान्न भंडारण क्षमता तैयार करनी है। इसमें से एचएलसी अभी तक 42.2 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है तथा बाकी के लिए निविदाएं मांगी गई है। इसी तरह से हरियाणा में कुल 40.55 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता बनानी है जिसमें से अभी तक एचएलसी 20.18 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में 3.6 लाख टन की अतिरिक्त खाद्यान्न की भंडारण क्षमता विकसित करनी है जिसमें से एचएलसी 2.48 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है। राजस्थान में इसके तहत 2.5 लाख टन की भंडारण क्षमता बढ़ानी है जिसमें से 2.2 लाख टन को मंजूरी दी जा चुकी है। केंद्रीय पूल में एक नवंबर को 559.01 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद है। इसमें 260.83 लाख टन चावल और 296.71 लाख टन गेहूं है। एक अप्रैल 2011 को एफसीआई की स्वयं अपनी और किराये पर मिलाकर कुल भंडारण क्षमता (कवर और प्लिंथ) 316.1 लाख टन की है। खरीफ विपणन सीजन में चावल की सरकारी खरीद चल रही है जबकि रबी विपणन सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद अप्रैल से शुरू होगी। (Business Bhaskar......R S Rana)
खाद्य मंत्रालय नए गोदाम बनाने की अपनी योजना पर जिस तरह आगे बढ़ रहा है, इससे उसे भरोसा है कि मार्च 2012 तक वह 40 लाख टन भंडारण के नए गोदाम विकसित कर लेगा। इससे खाद्यान्न भंडारण में आ रही समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है। मंत्रालय द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति (एचएलसी) विभिन्न राज्यों में अभी तक 109 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता को मंजूरी दे चुकी है। इसमें सबसे ज्यादा मंजूरी पंजाब में 42.2 लाख टन और हरियाणा में 20.18 लाख टन की है। सरकार ने 151 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता बढ़ाने का लक्ष्य तय किया है। खाद्यान्न भंडारण की समस्या को दूर करने के लिए खाद्य मंत्रालय काफी सक्रिय है। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि एचएलसी अभी तक 109 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता को मंजूरी दे चुकी है तथा बाकी को भी जल्दी ही मंजूरी दी जाएगी। अभी तक 4.75 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता तैयार भी हो चुकी है तथा यह भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को सौंपी जा चुकी है। मंत्रालय ने 40 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता मार्च 2012 तक तैयार करने का लक्ष्य तय किया है। जबकि कुल 151 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता मार्च 2013 तक पूरी होने की संभावना है। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत दस साल और सात साल के लिए संशोधित गारंटी योजना के तहत भंडारण क्षमता बढ़ाई जा रही है। उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा पंजाब में 51 लाख टन की अतिरिक्त खाद्यान्न भंडारण क्षमता तैयार करनी है। इसमें से एचएलसी अभी तक 42.2 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है तथा बाकी के लिए निविदाएं मांगी गई है। इसी तरह से हरियाणा में कुल 40.55 लाख टन की अतिरिक्त भंडारण क्षमता बनानी है जिसमें से अभी तक एचएलसी 20.18 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में 3.6 लाख टन की अतिरिक्त खाद्यान्न की भंडारण क्षमता विकसित करनी है जिसमें से एचएलसी 2.48 लाख टन को मंजूरी दे चुकी है। राजस्थान में इसके तहत 2.5 लाख टन की भंडारण क्षमता बढ़ानी है जिसमें से 2.2 लाख टन को मंजूरी दी जा चुकी है। केंद्रीय पूल में एक नवंबर को 559.01 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक मौजूद है। इसमें 260.83 लाख टन चावल और 296.71 लाख टन गेहूं है। एक अप्रैल 2011 को एफसीआई की स्वयं अपनी और किराये पर मिलाकर कुल भंडारण क्षमता (कवर और प्लिंथ) 316.1 लाख टन की है। खरीफ विपणन सीजन में चावल की सरकारी खरीद चल रही है जबकि रबी विपणन सीजन में गेहूं की सरकारी खरीद अप्रैल से शुरू होगी। (Business Bhaskar......R S Rana)
भारत की सप्लाई के दबाव से विदेशी चावल के दाम घटे
भारत के सस्ते चावल की विश्व बाजार में सप्लाई के चलते थाईलैंड और वियतनाम ने अपने चावल के निर्यात मूल्य में कमी की है। भारत से गैर बासमती चावल इन दोनों देशों के चावल के मुकाबले सस्ता बिक रहा है। थाईलैंड और वियतनाम को चावल की निर्यात बाजार में मांग कमजोर होने से मजबूरी में कीमत घटानी पड़ रही है। कारोबारियों का कहना है कि थाई १०० फीसदी बी ग्रेड व्हाइट चावल की कीमत पिछले सप्ताह ६२० डॉलर प्रति टन थी जिसे इस सप्ताह घटाकर ६१० डॉलर प्रति टन कर दिया गया। पांच फीसदी टूटन का सफेद चावल ५८०-५९० डॉलर प्रति टन रहा। दूसरी ओर वियतनाम के चावल की निर्यात मांग कम होने की वजह से इसमें थाई चावल की तुलना में और भी नरमी आई है। वियतनाम के पांच फीसदी टूटन वाले चावल का मूल्य (एफओबी) सैगोन बंदरगाह पर घटकर ५४०-५७० डॉलर प्रति टन रह गए। पिछले बुधवार को यहां चावल की कीमत ५५५- ५६५ डॉलर तक प्रति टन थी। वहीं दूसरी ओर बीते सप्ताह २५ फीसदी टूटन वाले चावल के भाव ५१५ डॉलर- ५२५ डॉलर प्रति टन से बढ़कर ५२० डॉलर - ५३० डॉलर प्रति टन हो गया। हो ची मिन्ह शहर के एक निर्यातक ने कहा कि चावल के खरीदार थाई और वियतनाम में चावल की दरें ऊंची रहने की वजह से भारत और पाकिस्तान की ओर नजरें टिकाए हुए हैं। उन्होंने कहा कि वियतनाम से इंडोनेशिया के लिए चावल का उठान शुरू हो चुका है लेकिन छोटे स्तर की मांग से कीमतों में तेजी नहीं आती है। वियतनाम ने इंडोनेशिया को तीन लाख टन चावल बेचा है। इसकी डिलीवरी अभी से शुरू होकर अगले साल की फरवरी तक की जाएगी। बैंकॉक के एक कारोबारी ने कहा कि एशियाई चावल की कीमतों में खासकर थाई ग्रेड में वर्तमान मूल्य स्तर से ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं नजर आ रही है। वर्तमान मूल्य में ज्यादा गिरावट संभव नहीं होने की वजह थाईलैंड सरकार का समर्थन होना है। उम्मीद की जाती है कि थाईलैंड सरकार से आगे मदद मिलती रहेगी और वर्तमान मूल्य में ज्यादा गिरावट दर्ज नहीं की जाएगी। थाई सरकार सात अक्टूबर 2011 से ही किसानों से बाजार मूल्य से अधिक कीमत ४८० डॉलर प्रति टन के हिसाब से चावल की खरीद कर रही है। ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया के अनुसार इंडोनेशिया जैसे बड़े खरीदार कम मूल्य होने के कारण भारतीय चावल की ओर रुख कर रहे हैं। भारत ने 2007 के बाद पहली बार 20 लाख टन चावल निर्यात की अनुमति दी है। भारतीय निर्यातकों ने 15 लाख टन गैर बासमती चावल निर्यात के सौदे किए हैं। ज्यादातर सौदे अफ्रीका और मध्य-पूर्व के लिए हुए हैं। चावल निर्यात के सौदे 425-430 डॉलर प्रति टन के भाव पर किए गए हैं। जबकि थाईलैंड और वियतनाम का इसी किस्म का चावल 555-590 डॉलर प्रति टन चल रहा है। (Business Bhaskar)
अब बाजार में आईएसआई मार्क खिलौने ही बिकेंगे
आर.एस. राणा नई दिल्ली
सरकार जल्दी ही खिलौने की बिक्री के लिए आईएसआई मार्क अनिवार्य करने जा रही है। भारत में चीन से बड़े पैमाने पर खिलौनों का आयात होता है और आयातित खिलौनों में खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है जिसका असर बच्चों की सेहत पर पड़ता है। खिलौना निर्माता घरेलू कंपनियों के साथ ही आयातकों को भी भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के पास कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा और अपने उत्पादों का स्वयं मूल्यांकन करके आईएसआई मार्क लगाना होगा। इसका पालन न करने वाली कंपनियों के खिलाफ दंड व सजा का प्रावधान होगा। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि काफी समय से शिकायत आ रही थी कि खिलौने बनाने में कंपनियां घातक रसायनों का प्रयोग करती हैं, खासकर चीन से आयातित खिलौनों में ज्यादा घातक रासायनिकों का प्रयोग होता है। यह बच्चों की सेहत के लिए काफी हानिकारक है। कंपनियां आपसी होड़ में सस्ते खिलौने बनाने के लिए खतरनाक केमिकल का प्रयोग करती हैं जिसका बच्चों के सेहत पर विपरीत असर पड़ता है। इसीलिए सरकार ने खिलौना बनाने वाली घरेलू कंपनियों के साथ ही खिलौनों का आयात करने वाली कंपनियों के लिए भी आईएसआई मार्क अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। इसके लिए दिशा-निर्देश तैयार किए जा चुके हैं तथा जल्दी ही इन्हें अनुमति के लिए कैबिनेट कमेटी के पास भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि खिलौना निर्माता कंपनी या फिर आयातकों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के पास कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके बाद कंपनियां अपने उत्पादों का स्वयं मूल्यांकन करेगी। सरकारी आदेश जारी होने के बाद अगर कोई कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करेगी तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत सजा और दंड का भी प्रावधान होगा। इसमें कंपनी पर एक लाख का जुर्माना या फिर दो साल की सजा का प्रावधान होगा। साथ ही सजा और जुर्माना दोनों का भी प्रावधान होगा। (Business Bhaskar...R S Rana)
सरकार जल्दी ही खिलौने की बिक्री के लिए आईएसआई मार्क अनिवार्य करने जा रही है। भारत में चीन से बड़े पैमाने पर खिलौनों का आयात होता है और आयातित खिलौनों में खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल होता है जिसका असर बच्चों की सेहत पर पड़ता है। खिलौना निर्माता घरेलू कंपनियों के साथ ही आयातकों को भी भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के पास कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा और अपने उत्पादों का स्वयं मूल्यांकन करके आईएसआई मार्क लगाना होगा। इसका पालन न करने वाली कंपनियों के खिलाफ दंड व सजा का प्रावधान होगा। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि काफी समय से शिकायत आ रही थी कि खिलौने बनाने में कंपनियां घातक रसायनों का प्रयोग करती हैं, खासकर चीन से आयातित खिलौनों में ज्यादा घातक रासायनिकों का प्रयोग होता है। यह बच्चों की सेहत के लिए काफी हानिकारक है। कंपनियां आपसी होड़ में सस्ते खिलौने बनाने के लिए खतरनाक केमिकल का प्रयोग करती हैं जिसका बच्चों के सेहत पर विपरीत असर पड़ता है। इसीलिए सरकार ने खिलौना बनाने वाली घरेलू कंपनियों के साथ ही खिलौनों का आयात करने वाली कंपनियों के लिए भी आईएसआई मार्क अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। इसके लिए दिशा-निर्देश तैयार किए जा चुके हैं तथा जल्दी ही इन्हें अनुमति के लिए कैबिनेट कमेटी के पास भेजा जाएगा। उन्होंने बताया कि खिलौना निर्माता कंपनी या फिर आयातकों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) के पास कंपनी का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। इसके बाद कंपनियां अपने उत्पादों का स्वयं मूल्यांकन करेगी। सरकारी आदेश जारी होने के बाद अगर कोई कंपनी इन नियमों का पालन नहीं करेगी तो उसके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसके तहत सजा और दंड का भी प्रावधान होगा। इसमें कंपनी पर एक लाख का जुर्माना या फिर दो साल की सजा का प्रावधान होगा। साथ ही सजा और जुर्माना दोनों का भी प्रावधान होगा। (Business Bhaskar...R S Rana)
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