मुंबई November 22, 2011
जुलाई-सितंबर की तिमाही के दौरान आभूषणों की बिक्री में आई भारी गिरावट के बाद आभूषण निर्माताओं ने अपने प्रतिनिधि संगठन के साथ मिलकर इसे पटरी पर लाने की कवायद शुरू कर दी है। इसकी अगुआई करते हुए शहर के आभूषण निर्माता त्रिभुवनदास भीमजी जवेरी ने पहली बार भारत में 24 कैरेट का स्वर्ण आभूषण पेश किया है। मशीन से तैयार यह आभूषण थोड़ा महंगा होगा क्योंकि इस पर 10-15 फीसदी गढ़ाई लगेगा। निवेश वाले उत्पादों पर हालांकि सोने की कीमत पर करीब 1 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगता है। सोने के सिक्के व सिल्लियों की तरह यह निवेश उत्पाद का विकल्प बन सकेगा। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के प्रबंध निदेशक अजय मित्रा ने कहा - 'चीन में शुद्ध सोने का आभूषण काफी लोकप्रिय है। वैश्विक स्तर पर सोने की बिक्री में इजाफे के लिए हम हर तरह का समर्थन प्रदान करेंगे।'दुर्भाग्य से 24 कैरेट सोने के आभूषण के कोई खरीदार नहीं हैं क्योंकि इसे एक महीने पहले ही पेश किया गया है। चूंकि भारतीय उपभोक्ता सोने के वैसे आभूषणों की खरीदारी करने में दिलचस्पी रखते हैं जिसमें तांबा या फिर दूसरे धातुओं का मिश्रण हो। ऐसे मिश्रण से सोना थोड़ा ठोस हो जाता है। लिहाजा बाजार में फिलहाल 24 कैरेट सोने के खरीदार नहीं हैं। अब तक भारत में 22 कैरेट का हॉलमार्क आभूषण ज्यादा मशहूर है। सिक्के और सिल्लियों समेत निवेश उत्पाद तापरोधी पैकेट में जारी करने वालों के प्रमाणपत्र के साथ देश भर बेचे जाते हैं।समझा जाता है कि टीबीजेड ने डब्ल्यूजीसी से संपर्क कर लेटर ऑफ अथॉन्टिसिटी जारी करने का अनुरोध किया है ताकि खरीदारों को 24 कैरेट स्वर्ण आभूषण का आश्वासन मिल सके। शुद्ध सोने के आभूषण की तरफ उपभोक्ताओं के आकर्षण से इसकी बिक्री पर 100 फीसदी कीमत पाने में मदद मिलेगी। हालांकि ऑल इंडिया जेम्स ऐंड ज्वैलरी ट्रेड फेडरेशन (जीजेएफ) के चेयरमैन बी बामलवा ने कहा - मशीन के जरिए सिर्फ निश्चित किस्म के आभूषण (24 कैरेट) का निर्माण किया जा सकता है। भारत वैल्यू एडिशन के लिए मशहूर है और हाथ से बने आभूषणों की यहां भरमार है।शुद्ध सोने से बने आभूषण को बेचने पर इसके इस्तेमाल के अलावा 100 फीसदी कीमत वापस मिलेगी और यह सुविधा निवेश के दूसरे उत्पादों मसलन सिक्के, सिल्लियों और एक्सचेंज ट्रेडेड फंड में उपलब्ध नहीं हैं। एक बार जब उपभोक्ता इसे स्वीकार कर लेता है तो वे इसका इस्तेमाल निवेश के विकल्प के तौर पर भी कर सकेंगे।सोने के प्रति भारतीय उपभोक्ताओं का लगाव पीढिय़ों से रहा है, ऐसे में आभूषणों की बिक्री होती रही है। बामलवा ने कहा - हाल में मशहूर हुए निवेश उत्पादों में हालांकि उसके निचले आधार के चलते जोरदार बढ़त आई है, पर आभूषण आने वाले महीनों में इस पर कब्जा जमा सकता है।डब्ल्यूजीसी के मुताबिक, मौजूदा कैलेंडर वर्ष में तीसरी तिमाही के दौरान आभूषणों की बिक्री में 26 फीसदी की गिरावट आई है और यह 125.3 टन पर आ गया है जबकि निवेश उत्पादों में 18 फीसदी की गिरावट आई है और यह 78 टन पर आ गया है। तीसरी तिमाही में सोने की कुल बिक्री 23 फीसदी घटकर 203.3 टन रह गई है।जेम्स ऐंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के उपाध्यक्ष संजय कोठारी ने कहा - जेम्स ऐंड ज्वैलरी उद्योग के लिए सबसे बड़ी चिंता आभूषणों की बिक्री में आई गिरावट है। सोने के सिक्केव सिल्लियों की बिक्री में बढ़ोतरी से सिर्फ और सिर्फ खनन करने वालों को फायदा होगा, जो भारत के लिए अज्ञात है। ऐसे में हमें सिक्के व सिल्लियों की बजाय आभूषणों की बिक्री को प्रोत्साहित करने की दरकार है।परिषद जीजेएफ के साथ गठजोड़ कर भारत में आभूषणों की बिक्री को प्रोत्साहित करने की योजना बना रहा है। जीजेएफ ने भी सोने की बिक्री में इजाफा करने के लिए 100 करोड़ रुपये के निवेश की योजना बनाई है और मुख्य रूप से इसका ध्यान आभूषणों की बिक्री पर होगा। इसमें वैयक्तिक आभूषण निर्माताओं द्वारा निवेश प्रस्तावित है। उपभोक्ताओं तक सीधे पहुंचने के लिए यह सेमिनार का भी आयोजन करेगा। (BS Hindi)
23 नवंबर 2011
रबर के बागान खरीद रहीं टायर कंपनियां
कोच्चि November 22, 2011
घरेलू बाजार में प्राकृतिक रबर की भारी किल्लत और देसी व वैश्विक बाजार के बीच कीमतों में बड़े अंतर के चलते टायर बनाने वाली अग्रणी कंपनियां थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में रबर के बागान के अधिग्रहण का विकल्प तलाश रही हैं। अग्रणी कंपनी अपोलो टायर्स ने तो लाओस में बागान का अधिग्रहण कर भी लिया है और एमआरएफ व जे के टायर्स जैसी कंपनियां इसी राह पर चलने की योजना बना रही हैं।कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपोलो टायर्स ने दक्षिण पूर्व एशिया में प्राकृतिक रबर के और बागानों के अधिग्रहण की योजना बनाई है। टायर के उत्पादन कुल लागत में लागत प्राकृतिक रबर का हिस्सा 50 फीसदी से ज्यादा होता है। कंपनी लाओस में 10,000 हेक्टेयर का बागान पहले ही अधिग्रहित कर चुकी है और इसकी योजना और अधिग्रहण करने की है। लाओस के बागान में पौधों को फिर से लगाने का काम जोरों पर है और अगले 5-6 साल में इनसे टैपिंग शुरू हो जाएगी। कीमत के बजाय रबर की उपलब्धता अब चिंता का विषय बन गई है। ऐसे में कंपनियों ने कुल जरूरत का 25 फीसदी अपने बागानों से पूरा करने की योजना बनाई है और यह काम कुछ वर्षों में पूरा हो जाएगा, ताकि लगातार आपूर्ति बनी रह सके। अपोलो टायर्स औसतन 16,000 टन प्राकृतिक रबर का इस्तेमाल एक महीने में करती है। अपोलो विदेश में बागानों के अधिग्रहण करने वाली पहली टायर कंपनी है। भारत में सालाना 2 लाख टन रबर की कमी है और इसकी भरपाई आयात के जरिए होती है।टायर निर्माता कंपनी एमआरएफ भी थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में रबर के बागानों का अधिग्रहण करना चाहती है ताकि कच्चे माल की बढ़ती लागत पर लगाम कसी जा सके। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। बढ़ती लागत को देखते हुए कंपनी रबर की खरीद के अलावा विदेश में अधिग्रहण और रबर के बागानों का प्रबंधन करने की योजना बना रही है। मौजूदा समय में एमआरएफ ज्यादातर रबर की खरीद या तो घरेलू बाजार में करती है या फिर इसका आयात करती है। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा - अगर हम विदेश में रबर के बागान का प्रबंधन कर पाएंगे तो हम इसका फायदा भी उठा सकेंगे। यह पूछे जाने पर किस देश की तरफ कंपनी की नजरें हैं, तो उन्होंने कहा कि हमारी नजर थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम पर है। हालांकि उन्होंने इसकी समयावधि और सौदे के आकार समेत दूसरी सूचनाएं देने से मना कर दिया।लागत घटाने के लिए जेके टायर भी विदेश में बागानों के अधिग्रहण की संभावनाएं गंभीरता से तलाश रही हैं। कंपनी के आला अधिकारी ने कहा - हमारी योजना विदेश में बागानों का अधिग्रहण करने की है। हालांकि उन्होंने इस बाबत निवेश का ब्योरा नहीं दिया। आरपीजी ग्रुप की कंपनी सीएट टायर्स की भी योजना विदेश में बागानों के अधिग्रहण की है।देसी व विदेशी बाजार में रबर की कीमतों के बीच के बड़े अंतर और विदेशी बागानों की कम लागत भी टायर कंपनियों को इसमें निवेश के लिए उत्साहित कर रही है। पिछले तीन महीने से बेंचमार्क आरएसएस-4 किस्म की रबर की औसत कीमतें वैश्विक कीमतों के मुकाबले 20 रुपये प्रति किलोग्राम ज्यादा हैं। साल के ज्यादातर समय में भारतीय कीमतें विदेश के मुकाबले ज्यादा रही हैं और इससे टायर कंपनियों के मुनाफे पर भारी असर पड़ा है। (BS Hindi)
घरेलू बाजार में प्राकृतिक रबर की भारी किल्लत और देसी व वैश्विक बाजार के बीच कीमतों में बड़े अंतर के चलते टायर बनाने वाली अग्रणी कंपनियां थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में रबर के बागान के अधिग्रहण का विकल्प तलाश रही हैं। अग्रणी कंपनी अपोलो टायर्स ने तो लाओस में बागान का अधिग्रहण कर भी लिया है और एमआरएफ व जे के टायर्स जैसी कंपनियां इसी राह पर चलने की योजना बना रही हैं।कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपोलो टायर्स ने दक्षिण पूर्व एशिया में प्राकृतिक रबर के और बागानों के अधिग्रहण की योजना बनाई है। टायर के उत्पादन कुल लागत में लागत प्राकृतिक रबर का हिस्सा 50 फीसदी से ज्यादा होता है। कंपनी लाओस में 10,000 हेक्टेयर का बागान पहले ही अधिग्रहित कर चुकी है और इसकी योजना और अधिग्रहण करने की है। लाओस के बागान में पौधों को फिर से लगाने का काम जोरों पर है और अगले 5-6 साल में इनसे टैपिंग शुरू हो जाएगी। कीमत के बजाय रबर की उपलब्धता अब चिंता का विषय बन गई है। ऐसे में कंपनियों ने कुल जरूरत का 25 फीसदी अपने बागानों से पूरा करने की योजना बनाई है और यह काम कुछ वर्षों में पूरा हो जाएगा, ताकि लगातार आपूर्ति बनी रह सके। अपोलो टायर्स औसतन 16,000 टन प्राकृतिक रबर का इस्तेमाल एक महीने में करती है। अपोलो विदेश में बागानों के अधिग्रहण करने वाली पहली टायर कंपनी है। भारत में सालाना 2 लाख टन रबर की कमी है और इसकी भरपाई आयात के जरिए होती है।टायर निर्माता कंपनी एमआरएफ भी थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे देशों में रबर के बागानों का अधिग्रहण करना चाहती है ताकि कच्चे माल की बढ़ती लागत पर लगाम कसी जा सके। कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी ने यह जानकारी दी। बढ़ती लागत को देखते हुए कंपनी रबर की खरीद के अलावा विदेश में अधिग्रहण और रबर के बागानों का प्रबंधन करने की योजना बना रही है। मौजूदा समय में एमआरएफ ज्यादातर रबर की खरीद या तो घरेलू बाजार में करती है या फिर इसका आयात करती है। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा - अगर हम विदेश में रबर के बागान का प्रबंधन कर पाएंगे तो हम इसका फायदा भी उठा सकेंगे। यह पूछे जाने पर किस देश की तरफ कंपनी की नजरें हैं, तो उन्होंने कहा कि हमारी नजर थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम पर है। हालांकि उन्होंने इसकी समयावधि और सौदे के आकार समेत दूसरी सूचनाएं देने से मना कर दिया।लागत घटाने के लिए जेके टायर भी विदेश में बागानों के अधिग्रहण की संभावनाएं गंभीरता से तलाश रही हैं। कंपनी के आला अधिकारी ने कहा - हमारी योजना विदेश में बागानों का अधिग्रहण करने की है। हालांकि उन्होंने इस बाबत निवेश का ब्योरा नहीं दिया। आरपीजी ग्रुप की कंपनी सीएट टायर्स की भी योजना विदेश में बागानों के अधिग्रहण की है।देसी व विदेशी बाजार में रबर की कीमतों के बीच के बड़े अंतर और विदेशी बागानों की कम लागत भी टायर कंपनियों को इसमें निवेश के लिए उत्साहित कर रही है। पिछले तीन महीने से बेंचमार्क आरएसएस-4 किस्म की रबर की औसत कीमतें वैश्विक कीमतों के मुकाबले 20 रुपये प्रति किलोग्राम ज्यादा हैं। साल के ज्यादातर समय में भारतीय कीमतें विदेश के मुकाबले ज्यादा रही हैं और इससे टायर कंपनियों के मुनाफे पर भारी असर पड़ा है। (BS Hindi)
ग्वाटेमाला की फसल आने से इलायची में गिरावट की संभावना
ग्वाटेमाला में इलायची की नई फसल आने से भारत से निर्यात मांग कम हो गई है। जबकि चालू फसल सीजन में ग्वाटेमाला में इलायची की पैदावार 22.2 फीसदी ज्यादा होने का अनुमान है तथा घरेलू फसल की पैदावार भी 16.6 फीसदी ज्यादा है। इसीलिए घरेलू बाजार में इलायची की मौजूदा कीमतों में और भी गिरावट की संभावना है।
सेमैक्स एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम बी रुबारल ने बताया कि ग्वाटेमाला में इलायची की नई फसल की आवक शुरू हो गई है तथा ग्वाटेमाला में चालू फसल सीजन में इलायची की पैदावार बढ़कर 22,000 टन से ज्यादा होने का अनुमान है। पिछले साल ग्वाटेमाला में 18,000 टन इलायची की पैदावार हुई थी। भारत के मुकाबले ग्वाटेमाला की इलायची सस्ती है इसीलिए भारत से निर्यात मांग कम हो गई है।
भारतीय इलायची का भाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में 16 से 18 डॉलर प्रति किलो है जबकि ग्वाटेमाला के निर्यातक 14 से 15 डॉलर प्रति किलो की दर से सौदे कर रहे हैं। ऐसे में घरेलू बाजार में इलायची की मौजूदा कीमतों में और भी पांच से सात फीसदी की गिरावट आने की संभावना है।
कार्डमम ग्रोवर एसोसिएशन के सचिव के के देवेशिया ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में निर्यात में भारी बढ़ोतरी हुई है लेकिन अगले चार-पांच महीने निर्यात कमजोर रहने की संभावना है। घरेलू बाजार में नीलामी केंद्रों पर आवक बराबर बनी हुई है तथा चालू फसल सीजन में देश में इलायची की पैदावार बढ़कर 14,000 टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 12,000 टन की पैदावार हुई थी। इसीलिए गिरावट को बल मिल रहा है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले छह महीनों में इलायची के निर्यात में 122 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल से सितंबर के दौरान निर्यात बढ़कर 1,850 टन का हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 355 टन का निर्यात हुआ था। अग्रवाल स्पाइसेज के पार्टनर अरुण अग्रवाल ने बताया कि नीलामी केंद्रों पर इलायची की साप्ताहिक आवक 500-600 टन की हो रही है। (Business Bhaskar....R S Rana)
सेमैक्स एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम बी रुबारल ने बताया कि ग्वाटेमाला में इलायची की नई फसल की आवक शुरू हो गई है तथा ग्वाटेमाला में चालू फसल सीजन में इलायची की पैदावार बढ़कर 22,000 टन से ज्यादा होने का अनुमान है। पिछले साल ग्वाटेमाला में 18,000 टन इलायची की पैदावार हुई थी। भारत के मुकाबले ग्वाटेमाला की इलायची सस्ती है इसीलिए भारत से निर्यात मांग कम हो गई है।
भारतीय इलायची का भाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में 16 से 18 डॉलर प्रति किलो है जबकि ग्वाटेमाला के निर्यातक 14 से 15 डॉलर प्रति किलो की दर से सौदे कर रहे हैं। ऐसे में घरेलू बाजार में इलायची की मौजूदा कीमतों में और भी पांच से सात फीसदी की गिरावट आने की संभावना है।
कार्डमम ग्रोवर एसोसिएशन के सचिव के के देवेशिया ने बताया कि चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों में निर्यात में भारी बढ़ोतरी हुई है लेकिन अगले चार-पांच महीने निर्यात कमजोर रहने की संभावना है। घरेलू बाजार में नीलामी केंद्रों पर आवक बराबर बनी हुई है तथा चालू फसल सीजन में देश में इलायची की पैदावार बढ़कर 14,000 टन से भी ज्यादा होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 12,000 टन की पैदावार हुई थी। इसीलिए गिरावट को बल मिल रहा है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2011-12 के पहले छह महीनों में इलायची के निर्यात में 122 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। अप्रैल से सितंबर के दौरान निर्यात बढ़कर 1,850 टन का हो चुका है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 355 टन का निर्यात हुआ था। अग्रवाल स्पाइसेज के पार्टनर अरुण अग्रवाल ने बताया कि नीलामी केंद्रों पर इलायची की साप्ताहिक आवक 500-600 टन की हो रही है। (Business Bhaskar....R S Rana)
बासमती के एमईपी में कमी के आसार, फैसला जल्द
बासमती चावल के निर्यात के प्रोत्साहन के लिए जल्द ही इसके न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) को कम किया जा सकता है। वाणिज्य मंत्रालय ने इस संबंध में मंत्रियों के समूह को अपनी सिफारिश भेज दी है और जल्द ही इस पर फैसले की संभावना है। वर्तमान में बासमती चावल का एमईपी 900 डालर प्रति टन है।
निर्यातकों के मुताबिक बासमती के चावल के एमईपी में कमी से निर्यात में 10-15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। निर्यातकों के मुताबिक बासमती चावल के एमईपी में 150-200 डालर तक प्रति टन की कमी की जा सकती है। हालांकि वाणिज्य मंत्रालय की तरफ की अभी इसका खुलासा नहीं किया गया है।
एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी आफ इंडिया (एपीडा) द्वारा आयोजित बासमती फॉर वल्र्ड 2011 सम्मेलन के दौरान वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर ने कहा कि बासमती चावल के निर्यात को लेकर विश्व के कई देश विभिन्न प्रकार की रुकावट पैदा कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वे बासमती चावल के एमईपी को कम करने के पक्ष में है और मंत्रालय ने इसकी सिफारिश भी की है। इस संबंध में ग्रुप आफ मिनिस्टर्स को प्रस्ताव भेज दिया गया है। बासमती चावल के निर्यातकों के मुताबिक एमईपी में कमी नहीं होने पर घरेलू बाजार में इसकी कीमत काफी कम हो सकती है। (Business Bhaskar)
निर्यातकों के मुताबिक बासमती के चावल के एमईपी में कमी से निर्यात में 10-15 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो सकती है। निर्यातकों के मुताबिक बासमती चावल के एमईपी में 150-200 डालर तक प्रति टन की कमी की जा सकती है। हालांकि वाणिज्य मंत्रालय की तरफ की अभी इसका खुलासा नहीं किया गया है।
एग्रीकल्चरल एंड प्रोसेस्ड फूड प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी आफ इंडिया (एपीडा) द्वारा आयोजित बासमती फॉर वल्र्ड 2011 सम्मेलन के दौरान वाणिज्य सचिव राहुल खुल्लर ने कहा कि बासमती चावल के निर्यात को लेकर विश्व के कई देश विभिन्न प्रकार की रुकावट पैदा कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि वे बासमती चावल के एमईपी को कम करने के पक्ष में है और मंत्रालय ने इसकी सिफारिश भी की है। इस संबंध में ग्रुप आफ मिनिस्टर्स को प्रस्ताव भेज दिया गया है। बासमती चावल के निर्यातकों के मुताबिक एमईपी में कमी नहीं होने पर घरेलू बाजार में इसकी कीमत काफी कम हो सकती है। (Business Bhaskar)
कीमतें गिरने से उत्पादक बेहाल
बिजनेस भास्कर नई दिल्ली
अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले एक साल में इलायची के दाम 40.9 फीसदी घटे, 12 नवंबर 2010 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम 26.66 डॉलर प्रति किलो था जबकि चालू महीने के 11 नवंबर को दाम घटकर 15.73 डॉलर प्रति किलो के स्तर पर आ गया ग्वाटेमाला में इलायची की पैदावार 22.2 फीसदी और घरेलू पैदावार में 16.6' की बढ़ोतरी का अनुमानपिछले एक साल में हल्दी के दाम 66 फीसदी घट चुके हैं। एक दिसंबर 2010 को इरोड़ मंडी में भाव 17,000 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 56,300 रुपये प्रति क्विंटल रह गयाचालू सीजन में हल्दी की पैदावार 75 लाख बोरी होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 65 लाख बोरी का ही उत्पादन हुआ थाबासमती चावल निर्यात के लिए एमईपी 900 डॉलर प्रति टन, जबकि पाकिस्तान का चावल बिक रहा है सस्ताईरान से भुगतान विवाद और पाकिस्तान का निर्यात बढऩे से भारतीय बासमती चावल की निर्यात मांग कमजोरबासमती धान की पैदावार 10-15' ज्यादा होने से कीमतें 44.4' कमन्यूयॉर्क में मई महीने के वायदा अनुबंध में चार अप्रैल को कपास का दाम 196.49 सेंट प्रति पाउंड था जबकि मंगलवार को इसका भाव घटकर 90.81 सेंट प्रति पाउंड रह गयाचालू फसल सीजन में कपास की बंपर 61 लाख गांठ की पैदावार की संभावना31 मार्च को उत्पादक मंडियों में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 61,500 से 61,700 रुपये प्रति कैंडी था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 3,7000 से 37,400 रुपये प्रति कैंडी रह गयापिछले एक साल में कपास, बासमती चावल, इलायची और हल्दी की कीमतों में करीब 39 से 66 फीसदी की गिरावट आ चुकी है जिससे उत्पादकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस दौरान कपास की कीमतों में 53.7 फीसदी, बासमती धान की कीमतों में 25 फीसदी और इलायची की कीमतों में 41 फीसदी की गिरावट आई है। बासमती चावल में भुगतान विवाद और पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा बनी हुई है जबकि कपास, इलायची तथा हल्दी की पैदावार में बढ़ोतरी का असर निर्यात पर पड़ रहा है।
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि ईरान से भुगतान विवाद और पाकिस्तान का निर्यात बढऩे से भारतीय बासमती चावल की निर्यात मांग कमजोर है। जबकि सरकार ने बासमती चावल के निर्यात के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 900 डॉलर प्रति टन तय किया हुआ है तथा पाकिस्तान का चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में इससे भी सस्ता है। अक्टूबर 2010 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पूसा-1121 बासमती सेला चावल का भाव 1,150-1,200 डॉलर और ट्रेडिशनल बासमती का भाव 1,500 से 1,700 डॉलर प्रति टन था।
इस समय पूसा-1,121 का भाव 900-950 डॉलर और ट्रेडिशनल बासमती का 1,150-1,200 डॉलर प्रति टन है। उत्पादक मंडियों में पूसा-1,121 बासमती धान का भाव घटकर 1,775-1,800 रुपये प्रति क्विंटल रह गया जबकि पिछले साल इसका भाव 2600 से 2,800 रुपये प्रति क्विंटल था। ऐसे में बासमती धान के किसानों को चालू सीजन भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। वैसे भी चालू खरीफ में बासमती धान की पैदावार 10-15 फीसदी बढऩे की संभावना है।
केसीटी एंड एसोसिएटस के मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश राठी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढऩे से घरेलू बाजार में मार्च महीने में कपास के दाम उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे। 31 मार्च को उत्पादक मंडियों में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 61,500 से 61,700 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 3,7000 से 37,400 रुपये प्रति कैंडी रह गया।
उधर न्यूयार्क में मई महीने के वायदा अनुबंध में चार अप्रैल को कपास का दाम 196.49 सेंट प्रति पाउंड था जबकि मंगलवार को इसका भाव घटकर 90.81 सेंट प्रति पाउंड रह गया। चालू फसल सीजन में कपास की रिकार्ड घरेलू पैदावार का असर कीमतों पर पड़ रहा है।
सेमैक्स एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम बी रुबारल ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले एक साल में इलायची के दाम 40.9 फीसदी घटे हैं। 12 नवंबर 2010 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका भाव 26.66 डॉलर प्रति किलो था जबकि चालू महीने के 11 नवंबर को दाम घटकर 15.73 डॉलर प्रति किलो के स्तर पर आ गया।
चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों अप्रैल से सितंबर के दौरान रिकार्ड 1,850 टन का निर्यात भी हुआ है लेकिन ग्वाटेमाला में पैदावार 22.2 फीसदी और घरेलू पैदावार में 16.6 फीसदी की बढ़ोतरी का असर कीमतों पर पड़ रहा है।
नीलामी केंद्रों पर फरवरी से अभी तक इलायची की कीमतों में 40.7 फीसदी की गिरावट आकर भाव 800 रुपये प्रति किलो रह गए हैं। ग्वाटेमाला में इसकी पैदावार बढ़कर 22,000 टन और घरेलू फसल 14,000 टन होने की संभावना है। टरमरिक मर्चेंट्स एसोसिएशन के सचिव के वी रवि ने बताया कि पिछले एक साल में हल्दी के दाम 66 फीसदी घट चुके हैं। (Business Bhaskar....R S Rana)
अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले एक साल में इलायची के दाम 40.9 फीसदी घटे, 12 नवंबर 2010 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम 26.66 डॉलर प्रति किलो था जबकि चालू महीने के 11 नवंबर को दाम घटकर 15.73 डॉलर प्रति किलो के स्तर पर आ गया ग्वाटेमाला में इलायची की पैदावार 22.2 फीसदी और घरेलू पैदावार में 16.6' की बढ़ोतरी का अनुमानपिछले एक साल में हल्दी के दाम 66 फीसदी घट चुके हैं। एक दिसंबर 2010 को इरोड़ मंडी में भाव 17,000 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 56,300 रुपये प्रति क्विंटल रह गयाचालू सीजन में हल्दी की पैदावार 75 लाख बोरी होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 65 लाख बोरी का ही उत्पादन हुआ थाबासमती चावल निर्यात के लिए एमईपी 900 डॉलर प्रति टन, जबकि पाकिस्तान का चावल बिक रहा है सस्ताईरान से भुगतान विवाद और पाकिस्तान का निर्यात बढऩे से भारतीय बासमती चावल की निर्यात मांग कमजोरबासमती धान की पैदावार 10-15' ज्यादा होने से कीमतें 44.4' कमन्यूयॉर्क में मई महीने के वायदा अनुबंध में चार अप्रैल को कपास का दाम 196.49 सेंट प्रति पाउंड था जबकि मंगलवार को इसका भाव घटकर 90.81 सेंट प्रति पाउंड रह गयाचालू फसल सीजन में कपास की बंपर 61 लाख गांठ की पैदावार की संभावना31 मार्च को उत्पादक मंडियों में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 61,500 से 61,700 रुपये प्रति कैंडी था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 3,7000 से 37,400 रुपये प्रति कैंडी रह गयापिछले एक साल में कपास, बासमती चावल, इलायची और हल्दी की कीमतों में करीब 39 से 66 फीसदी की गिरावट आ चुकी है जिससे उत्पादकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस दौरान कपास की कीमतों में 53.7 फीसदी, बासमती धान की कीमतों में 25 फीसदी और इलायची की कीमतों में 41 फीसदी की गिरावट आई है। बासमती चावल में भुगतान विवाद और पाकिस्तान से प्रतिस्पर्धा बनी हुई है जबकि कपास, इलायची तथा हल्दी की पैदावार में बढ़ोतरी का असर निर्यात पर पड़ रहा है।
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया कि ईरान से भुगतान विवाद और पाकिस्तान का निर्यात बढऩे से भारतीय बासमती चावल की निर्यात मांग कमजोर है। जबकि सरकार ने बासमती चावल के निर्यात के लिए न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 900 डॉलर प्रति टन तय किया हुआ है तथा पाकिस्तान का चावल अंतरराष्ट्रीय बाजार में इससे भी सस्ता है। अक्टूबर 2010 में अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय पूसा-1121 बासमती सेला चावल का भाव 1,150-1,200 डॉलर और ट्रेडिशनल बासमती का भाव 1,500 से 1,700 डॉलर प्रति टन था।
इस समय पूसा-1,121 का भाव 900-950 डॉलर और ट्रेडिशनल बासमती का 1,150-1,200 डॉलर प्रति टन है। उत्पादक मंडियों में पूसा-1,121 बासमती धान का भाव घटकर 1,775-1,800 रुपये प्रति क्विंटल रह गया जबकि पिछले साल इसका भाव 2600 से 2,800 रुपये प्रति क्विंटल था। ऐसे में बासमती धान के किसानों को चालू सीजन भारी घाटा उठाना पड़ रहा है। वैसे भी चालू खरीफ में बासमती धान की पैदावार 10-15 फीसदी बढऩे की संभावना है।
केसीटी एंड एसोसिएटस के मैनेजिंग डायरेक्टर राकेश राठी ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढऩे से घरेलू बाजार में मार्च महीने में कपास के दाम उच्चतम स्तर पर पहुंच गए थे। 31 मार्च को उत्पादक मंडियों में शंकर-6 किस्म की कपास का भाव 61,500 से 61,700 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी-356 किलो) था जबकि मंगलवार को भाव घटकर 3,7000 से 37,400 रुपये प्रति कैंडी रह गया।
उधर न्यूयार्क में मई महीने के वायदा अनुबंध में चार अप्रैल को कपास का दाम 196.49 सेंट प्रति पाउंड था जबकि मंगलवार को इसका भाव घटकर 90.81 सेंट प्रति पाउंड रह गया। चालू फसल सीजन में कपास की रिकार्ड घरेलू पैदावार का असर कीमतों पर पड़ रहा है।
सेमैक्स एजेंसी के मैनेजिंग डायरेक्टर एम बी रुबारल ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले एक साल में इलायची के दाम 40.9 फीसदी घटे हैं। 12 नवंबर 2010 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसका भाव 26.66 डॉलर प्रति किलो था जबकि चालू महीने के 11 नवंबर को दाम घटकर 15.73 डॉलर प्रति किलो के स्तर पर आ गया।
चालू वित्त वर्ष के पहले छह महीनों अप्रैल से सितंबर के दौरान रिकार्ड 1,850 टन का निर्यात भी हुआ है लेकिन ग्वाटेमाला में पैदावार 22.2 फीसदी और घरेलू पैदावार में 16.6 फीसदी की बढ़ोतरी का असर कीमतों पर पड़ रहा है।
नीलामी केंद्रों पर फरवरी से अभी तक इलायची की कीमतों में 40.7 फीसदी की गिरावट आकर भाव 800 रुपये प्रति किलो रह गए हैं। ग्वाटेमाला में इसकी पैदावार बढ़कर 22,000 टन और घरेलू फसल 14,000 टन होने की संभावना है। टरमरिक मर्चेंट्स एसोसिएशन के सचिव के वी रवि ने बताया कि पिछले एक साल में हल्दी के दाम 66 फीसदी घट चुके हैं। (Business Bhaskar....R S Rana)
तीन साल में 34 फीसदी महंगा हुआ दूध
दूध के थोक मूल्य में पिछले तीन साल के दौरान 34 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान मंगलवार को संसद में कृषि राज्य मंत्री चरण दास महंत ने बताया कि उत्पादन की लागत खर्च में भारी बढ़ोतरी होने से इसके भाव में इजाफा हुआ है।
उन्होंने लोकसभा में कहा कि दूध का थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 7 नवंबर 2009 के 146.9 से बढ़कर ५ नवंबर 2011 को 196.9 हो गया। डब्ल्यूपीआई का आधार-वर्ष 2004-05 रखा गया।
महंत ने बताया कि पिछले तीन साल में दूध के उत्पादन में सात फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2008-09 में यहां दूध का उत्पादन 1,086 लाख टन होता था जबकि यह वर्ष 2010-11 में बढ़कर 1,162 लाख टन हो गया। मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर दुग्ध का उत्पादन घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि लीन सीजन के दौरान दूध की कमी को पाउडर से पूरा किया जाता है।
सरकार ने दूध की उपलब्धता और दूध और दूध से बने उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखने के लिए बहुत सारे उपाय किए हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनएसडीबी) ने स्किम्ड मिल्क पाउडर और व्हाइट मिल्क पाउडर 50,000 टन आयात करने की मंजूरी दी है। इसके अलावा 15,000 टन बटर, बटर ऑयल और एन्हाइडरस (जलरहित) मिल्क वसा का बगैर शुल्क के आयात करने की इजाजत दी है। (Business Bhaskar)
उन्होंने लोकसभा में कहा कि दूध का थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 7 नवंबर 2009 के 146.9 से बढ़कर ५ नवंबर 2011 को 196.9 हो गया। डब्ल्यूपीआई का आधार-वर्ष 2004-05 रखा गया।
महंत ने बताया कि पिछले तीन साल में दूध के उत्पादन में सात फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वर्ष 2008-09 में यहां दूध का उत्पादन 1,086 लाख टन होता था जबकि यह वर्ष 2010-11 में बढ़कर 1,162 लाख टन हो गया। मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय स्तर पर दुग्ध का उत्पादन घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। हालांकि लीन सीजन के दौरान दूध की कमी को पाउडर से पूरा किया जाता है।
सरकार ने दूध की उपलब्धता और दूध और दूध से बने उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखने के लिए बहुत सारे उपाय किए हैं। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनएसडीबी) ने स्किम्ड मिल्क पाउडर और व्हाइट मिल्क पाउडर 50,000 टन आयात करने की मंजूरी दी है। इसके अलावा 15,000 टन बटर, बटर ऑयल और एन्हाइडरस (जलरहित) मिल्क वसा का बगैर शुल्क के आयात करने की इजाजत दी है। (Business Bhaskar)
दस लाख टन चीनी निर्यात को मंजूरी
बिजनेस भास्कर नई दिल्ली
चालू पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) के लिए केंद्र सरकार ने ओपन जरनल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत दस लाख टन चीनी निर्यात को मंजूरी दे दी है। चीनी व्यापारियों पर लगी स्टॉक लिमिट को भी समाप्त कर दिया गया है। इसके अलावा चावल पर भी सात राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, चंडीगढ़ और अंडमान एवं निकोबार को छोड़ बाकी राज्यों से स्टॉक लिमिट हटा ली गई है।
खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की मंगलवार को हुई बैठक में ये फैसले हुए। खाद्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के.वी. थॉमस ने बताया कि ओजीएल के तहत 10 लाख टन चीनी निर्यात की मंजूरी दी गई है। इसके अलावा चीनी और चावल पर लगी स्टॉक लिमिट को भी समाप्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि उद्योग ने 30 लाख टन चीनी निर्यात की मांग की थी लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए 10 लाख टन के निर्यात को ही मंजूरी दी गई है।
इससे घरेलू बाजार में चीनी कीमतों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि चालू सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढऩे की संभावना है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन 247.7 लाख टन होने का अनुमान है जबकि उद्योग का अनुमान 260 लाख टन का है। इस समय फुटकर बाजार में चीनी के दाम 32 से 35 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं जबकि प्रमुख उत्पादक राज्यों की सभी मिलों में पेराई शुरू होने से दिसंबर महीने में दाम घटने की आशंका है।
वर्ष 2009 में फुटकर बाजार में चीनी के दाम बढ़कर 47 से 49 रुपये प्रति किलो हो गए थे ऐसे में उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों से राहत देने के लिए सरकार ने अगस्त 2009 में स्टॉक लिमिट लगाई थी। चीनी पर स्टॉक लिमिट की अवधि 30 नवंबर 2011 तक है। चावल पर सरकार ने अक्टूबर 2008 में स्टॉक लिमिट लगाई थी। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत राज्य सरकारों को अधिकार है कि वे जमाखोरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती हैंं। (Business Bhaskar....R S Rana)
चालू पेराई सीजन 2011-12 (अक्टूबर से सितंबर) के लिए केंद्र सरकार ने ओपन जरनल लाइसेंस (ओजीएल) के तहत दस लाख टन चीनी निर्यात को मंजूरी दे दी है। चीनी व्यापारियों पर लगी स्टॉक लिमिट को भी समाप्त कर दिया गया है। इसके अलावा चावल पर भी सात राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, चंडीगढ़ और अंडमान एवं निकोबार को छोड़ बाकी राज्यों से स्टॉक लिमिट हटा ली गई है।
खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की मंगलवार को हुई बैठक में ये फैसले हुए। खाद्य राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रो. के.वी. थॉमस ने बताया कि ओजीएल के तहत 10 लाख टन चीनी निर्यात की मंजूरी दी गई है। इसके अलावा चीनी और चावल पर लगी स्टॉक लिमिट को भी समाप्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि उद्योग ने 30 लाख टन चीनी निर्यात की मांग की थी लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए 10 लाख टन के निर्यात को ही मंजूरी दी गई है।
इससे घरेलू बाजार में चीनी कीमतों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि चालू सीजन में देश में चीनी का उत्पादन बढऩे की संभावना है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार चालू पेराई सीजन में चीनी का उत्पादन 247.7 लाख टन होने का अनुमान है जबकि उद्योग का अनुमान 260 लाख टन का है। इस समय फुटकर बाजार में चीनी के दाम 32 से 35 रुपये प्रति किलो चल रहे हैं जबकि प्रमुख उत्पादक राज्यों की सभी मिलों में पेराई शुरू होने से दिसंबर महीने में दाम घटने की आशंका है।
वर्ष 2009 में फुटकर बाजार में चीनी के दाम बढ़कर 47 से 49 रुपये प्रति किलो हो गए थे ऐसे में उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों से राहत देने के लिए सरकार ने अगस्त 2009 में स्टॉक लिमिट लगाई थी। चीनी पर स्टॉक लिमिट की अवधि 30 नवंबर 2011 तक है। चावल पर सरकार ने अक्टूबर 2008 में स्टॉक लिमिट लगाई थी। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत राज्य सरकारों को अधिकार है कि वे जमाखोरों के खिलाफ कार्यवाही कर सकती हैंं। (Business Bhaskar....R S Rana)
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