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14 April 2014

प्याज की आवक हुई कम, बढ़ सकते हैं दाम

देश के कई हिस्सों में हाल ही में हुई बेमौसम बारिश और ओला वृष्टि से प्याज की फसल खराब होने की आशंका अब बाजार पर भारी पडऩे लगी है। देश की प्रमुख प्याज मंडियों में लगातार आवक कम हो रही है। देश के सबसे बड़े प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में रबी सीजन में प्याज का उत्पादन करीब 50 फीसदी घटने की बात कही जा रही है। इन खबरों की वजह से छोटे कारोबारी और किसान फिलहाल प्याज नहीं बेचना चाह रहे हैं, जिससे आवक कमजोर पडऩे लगी है। हालांकि कीमतों पर अभी खास फर्क नहीं पड़ा है, लेकिन लगातार कम हो रही आपूर्ति कीमतों में तेजी का साफ संकेत दे रही है। राज्य में प्याज की पैदावार कम होने का असर अभी से मंडियों में दिखाई देने लगा है। महाराष्ट्र की सबसे बड़ी प्याज मंडियों लासलगांव, नासिक और मुंबई में आवक लगातार कम हो रही है। इस महीने की शुरुआत में लासलगांव में 1,800 टन, मुंबई में 1,115 टन और नासिक में 280 टन प्याज आ रहा था, जो अब लगातार कम हो रहा है। 12 अप्रैल को इन मंडियों में आपूर्ति कम होकर क्रमश: 1,200 टन, 820 टन और 200 टन रह गई है। एपीएमसी कांदा-बट्टा मार्केट के कारोबारी मनोहर तोतलानी कहते हैं कि अभी से आपूर्ति कमजोर होना इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में प्याज की कीमतें एक बार फिर लोगों को रुला सकती हैं। हालांकि अभी भी मांग के अनुरूप आपूर्ति हो रही है, लेकिन किसानों और छोटे कारोबारियों की रणनीति को देखते हुए कहा जा सकता है कि जल्द ही मांग की अपेक्षा आपूर्ति कम हो जाएगी। मांग और आपूर्ति लगभग बराबर होने की वजह से फिलहाल कीमतों में खास बदलाव नहीं आया है। एक अप्रैल को लासलगांव में प्याज की औसत कीमत 850 रुपये थी, जो 12 अप्रैल को भी लगभग वहीं थी। मुंबई में औसत थोक कीमत में 200 रुपये की कमी देखने को मिल रही है। नवी मुंबई थोक मंडी में एक अप्रैल को प्याज 1,000 रुपये क्विंटल था, जो इस समय घटकर करीब 800 रुपये प्रति क्विंटल है। नासिक में प्याज की कीमत 860 रुपये से बढ़कर 960 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है। वाशी कांदा-बट्टा मार्केट के कारोबारी रमेश भाई कहते हैं कि फिलहाल कीमतों में बहुत ज्यादा बदलाव नहीं आया है, क्योंकि अभी फसल का सीजन है। लेकिन अगले महीने से कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो जाएगी, क्योंकि आपूर्ति अभी से कमी आना शुरू हो गई है। वह कहते हैं दरअसल पैदावार कम होने के साथ ही किसानों और छोटे कारोबारियों को लग रहा है कि अगर वे एक महीने अपने माल को रोक लेते हैं तो आने वाले समय में उनको अच्छे दाम मिलेंगे। इस समय प्याज को बिना कोल्ड स्टोरेज में रखे आराम से किसान अपने घरों में एक-दो महीने तक जमा रख सकते हैं। देश के कई हिस्सों में फरवरी और मार्च में हुई बारिश से प्याज की फसल को भारी नुकसान हुआ है। महाराष्ट्र में रबी सीजन में प्याज का उत्पादन करीब 50 से 60 फीसदी तक कम होने की आशंका है। राज्य में पिछले साल रबी सीजन के दौरान 6.04 लाख टन प्याज का उत्पादन हुआ था, जो इस बार 2.94 लाख टन होने की ही उम्मीद है। एपीएमसी नासिक मंडी के चेयरमैन नाना साहेब दत्ताजी पाटिल कहते हैं कि इस बार ओले और बारिश से महाराष्ट्र के अहमदनगर, पुणे, नासिक और सोलापुर जिलों में रबी और खरीफ सीजन के प्याज को भारी नुकसान हुआ है। राज्य में 47,000 हेक्टेयर में प्याज की फसल थी, जिसमें से 41,000 हेक्टेयर फसल बारिश से प्रभावित हुई है। इस सीजन में कई बार बारिश होन से प्रति हेक्टेयर पैदावार भी कम हुई है। पिछले रबी सीजन में राज्य में प्याज की औसत पैदावार 150 क्विंटल प्रति एकड़ थी, जबकि इस बार फसल खराब होने के कारण पैदावार कम होकर 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ रह गई है। राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान की रिपोर्ट में इस साल प्याज की पैदावार कम होने की आशंका जताई जा चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि असमय बारिश और ओलावृष्टि के कारण प्याज उत्पादक प्रमुख राज्य मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में उत्पादन 15 फीसदी तक कम हो सकता है। गौरतलब है कि शुरुआती अनुमान के मुताबिक वर्ष 2013-14 में करीब 190 लाख टन प्याज पैदा होने की उम्मीद थी, लेकिन नुकसान के बाद अब इसमें 10 फीसदी तक की कमी आने की आशंका जताई जा रही है। वर्ष 2012-13 में 175.1 लाख टन प्याज पैदा हुई थी।a (BS Hindi)

पहली बार प्राकृतिक रबर का आयात 3 लाख टन के पार

प्राकृतिक रबर का आयात वर्ष 2013-14 में पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले 49 फीसदी बढ़ा है। रबर बोर्ड के अनंतिम आंकड़ों के मुताबिक कुल आयात 3,24,467 टन रहा, जो वर्ष 2012-13 में 2,17,364 टन था। पहली बार आयात का आंकड़ा 3 लाख टन के पार हुआ है और इसके साथ ही पिछले 12 माह में आयात 1 लाख टन से ज्यादा बढ़ा है। वित्त वर्ष के आखिरी महीने मार्च में ही आयात इससे पिछले साल के समान महीने की तुलना में 144 फीसदी बढ़ा है, जो अब तक किसी एक महीने में सबसे ज्यादा वृद्धि है। मार्च में आयात 24,196 टन रहा, जो वर्ष 2013 के मार्च माह में 9,921 टन था। आयात में भारी बढ़ोतरी की मुख्य वजह पिछले एक साल से लगातार विदेशी बाजारों में इसकी कीमतों का सस्ता होना है। रबर के प्रमुख बाजार जैसे बैंकॉक में वित्त वर्ष 2014 के दौरान औसत मूल्य भारत के मुकाबले 15 से 17 रुपये प्रति किलोग्राम कम रहा है। एक अन्य वजह घरेलू बाजार में उत्पादन घटने सहित विभिन्न कारणों से रबर की उपलब्धता कम होना रही। रबर बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013-14 में इसका उत्पादन 7.6 फीसदी गिरकर 8,44,000 टन रहा जबकि पिछले वित्त वर्ष में उत्पादन 9,13,700 टन था। पिछले 10 सालों में पहली बार प्राकृतिक रबर के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। भारत के बाजार में इसकी उपलब्धता कम होने का कारण इसकी कीमतों का अधिक होना है। इससे पहले रबर बोर्ड ने वर्ष 2013-14 के वास्तविक उत्पादन का आकलन दो बार घटाया था। पहले 9.6 लाख टन से घटाकर 8.7 लाख टन किया गया और बाद में घटाकर 8.5 लाख टन कर दिया गया। हालांकि अंतिम संशोधित उत्पादन का आंकड़ा भी प्राप्त नहीं हो सका है। (BS Hindi)

जीएम फसलों के परीक्षण पर आगे बढ़ेगी सरकार

आमतौर पर शांत रहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अगर चाहें तो वह किसी बात पर अड़ सकते हैं। विवादास्पद जीन संवद्र्घित (जीएम) फसलों के मामले में उन्होंने सरकार को आगे बढऩे का आदेश दिया है। बिज़नेस स्टैंडर्ड के पास मौजूद दस्तावेजों के अनुसार जीएम फसलों के खेतों में परीक्षण को आगे बढ़ाने में प्रधानमंत्री और उनके कार्यालय ने करीब दो साल तक अहम भूमिका निभाई है, इसमें खाद्य फसलें भी शामिल हैं। प्रधानमंत्री ने नियामकीय सुधारों या उच्चतम न्यायालय में चल रहे फैसले का इंतजार किए बिना ही जीएम फसलों के परीक्षण को आगे बढ़ाने का फैसला किया। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के एक वरिष्ठï अधिकारी ने बताया, 'मनमोहन सिंह ने खाद्य सुरक्षा बिल में कटौती और जीएम फसलों के समर्थन पर काफी हठी रुख अपनाया है।' पूर्व केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्री जयंती नटराजन के सख्त विरोध के बावजूद जीत आखिर में सिंह की ही हुई। 21 दिसंबर 2013 को नटराजन ने मंत्री पद से इस्तीफा दिया तो अटकलें लगने लगी कि नटराजन की वजह से फैसले लेने में देरी हो रही थी और वह परियोजनाओं को लटका रही थीं। नटराजन के इस्तीफे के एक दिन बाद ही राहुल गांधी ने उद्योगों के साथ बैठक में कहा कि वह ज्यादा सक्षम पर्यावरण अनुमति तंत्र की वकालत करते हैं। वास्तविकता यही थी कि जीएम फसलों के मामले में प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने के कारण ही नटराजन को मंत्रालय छोडऩा पड़ा। नटराजन की जगह इस मंत्रालय का प्रभार वीरप्पा मोइली को सौंप दिया गया। फरवरी में हुई एक बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा था, 'सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन हमें अवैज्ञानिक अवधारणाओं के दबाव में आकर जीएम फसलों का विरोध नहीं करना चाहिए।' और इस तरह एक ही झटके में सिंह ने जीएम फसलों के विरोध में उठ रहीं आवाजों को 'अवैज्ञानिक' करार दे डाला। जीएम फसलों का मुखरता से विरोध करने वालों में नटराजन, कृषि पर संसदीय स्थायी समिति, उच्चतम न्यायालय की विशेषज्ञ समिति के अधिकांश सदस्य और कई राज्य सरकारें शामिल हैं। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का प्रभार संभालने के महज एक सप्ताह बाद ही मोइली ने प्रधानमंत्री के आदेश पर आगे बढऩे की घोषणा की। मोइली ने अपने पूर्ववर्ती के फैसलों को दरकिनार कर दिया और 'नियमित फैसला' करार देते हुए जीएम खाद्य फसलों के परीक्षण को दी गई अनुमति की वैधता की अवधि बढ़ा दी। मोइली ने कहा कि ये अनुमतियां काफी समय से लंबित थी और उच्चतम न्यायालय ने उन पर पाबंदी नहीं लगाई थी, जैसा कि नटराजन ने समझ लिया था। यह शब्दों का अच्छा जाल था। मोइली ने पर्यावरण मंत्रालय के सचिव को आदेश दिया कि वह कैबिनेट सचिव व अन्य अधिकारियों के साथ बैठकर विचार-विमर्श करें, जिससे उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक संगठित रुख अपनाया जाए। इसका मतलब था कृषि मंत्री शरद पवार और प्रधानमंत्री कार्यालय के नजरिये से सहमति जताना। मोइली और पर्यावरण सचिव ने कहा कि नटराजन एक संयुक्त हलफनामे के खिलाफ नहीं थीं। भारत में जीएम खाद्य फसलों पर बहस में ऐसा ही ध्रुवीकरण होता है, जैसा कि परमाणु ऊर्जा के मामले में हुआ था। परमाणु ऊर्जा ऐसे मामले का एक और उदाहरण है, जिसमें प्रधानमंत्री बिल्कुल अड़ गए थे। जीएम फसल उद्योग, कई वैज्ञानिक, कृषि मंत्री, प्रधानमंत्री और कुछ राज्यों का मानना है कि इन फसलों से उत्पादकता बढ़ेगी और इससे खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसके विरोध में खड़े हैं कांग्रेस के कुछ नेता, ज्यादातर राज्य सरकारें, कुछ राजनीतिक दल, कुछ वैज्ञानिक, शिक्षाविद् और पर्यावरण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता, जो इन फसलों को लेकर संशय में हैं। सबसे अहम बात है कि उनका डर पर्यावरण और लोगों पर इन फसलों के संभावित अपरिवर्तनीय नुकसान को लेकर है, जिसका अभी तक आकलन नहीं किया गया है। अभी 100 से भी ज्यादा जीएम खाद्य फसलों की किस्में प्रायोगिक चरण से गुजर रही हैं और ये देश में खाद्य फसलों की प्रकृति और उत्पादन में बुनियादी बदलाव ला सकती हैं। इस्तीफा देने से कई दिन पहले नटराजन ने एक तीन पन्ने के नोट में लिखा था, 'पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अलग हलफनामा दायर करने की मेरी गुजारिशों के बावजूद यही कहा जा रहा है कि सरकार को संयुक्त हलफनामा दायर करना चाहिए, जिससे ऐसा नहीं लगे कि इस मामले में सरकार व मंत्रालय आमने-सामने हैं।' नटराजन ने यह नोट प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री के उस आग्रह के जवाब में लिखा था, जिसमें उन्होंने सुधारों का इंतजार या नियामकीय प्रक्रिया की समीक्षा किए बिना जीएम खाद्य फसलों के परीक्षण की अनुमति देने का समर्थन किया था। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित तकनीकी विशेष समिति के अधिकतर सदस्यों ने 2013 में नियामकों में व्यापक बदलाव का समर्थन किया था और ऐसा होने तक जीएम फसलों के खेतों में परीक्षण को स्थगित करने की सिफारिश की थी। लेकिन कृषि मंत्रालय और विज्ञान एवं तकनीक विभाग ने इसका कड़ा विरोध किया। प्रधानमंत्री कार्यालय ने किया हस्तक्षेप अक्टूबर 2012 में न्यायालय की समिति ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी, जिसमें इन फसलों के खेतों में परीक्षण पर रोक लगाई गई थी और तभी प्रधानमंत्री ने पहली बार इस मामले में हस्तक्षेप किया। दस्तावेजों के अनुसार तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने प्रधानमंत्री के साथ बातचीत के बाद जीएम फसलों के खेतों में परीक्षण के खिलाफ अपने सख्त रवैये को नरम कर दिया। नटराजन ने पहले लिखा था, 'मंत्रालय के लिए यह मुमकिन नहीं है कि वह कृषि मंत्रालय के रुख के अनुसार इन फसलों के परीक्षण को अभी अनुमति दे दे और मेरा यह भी मानना है कि इनके परीक्षण पर फिलहाल रोक लगाने की समिति की सिफारिश को मानना चाहिए।' लेकिन प्रधानमंत्री के साथ बातचीत के बाद उन्होंने उसी दिन अपना रवैया नरम कर लिया और इस बात से पर्यावरण सचिव व कैबिनेट सचिव अच्छी तरह वाकिफ थे। इसके बाद कृषि मंत्रालय ने भारत सरकार की ओर से एक हलफनामा दायर किया और उसमें अंतरिम रिपोर्ट का विरोध करते हुए न्यायालय द्वारा गठित समिति में एक सेवानिवृत्त सरकारी कृषि वैज्ञानिक को भी सदस्य बना दिया। जब इस समिति ने अंतिम रिपोर्ट सौंपी तो इसी सदस्य ने स्थगनादेश की सिफारिश के खिलाफ राय दी, जबकि अन्य पांच सदस्यों ने परीक्षण के स्थगन पर सहमति जताई। इस बारे में जब बिजऩेस स्टैंडर्ड ने प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब मांगा तो उसने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। नटराजन ने यह भी कहा कि उनके मंत्रालय के तहत आने वाली सांविधिक जेनेटिक इंजीनियरिंग समीक्षा समिति को भी तब तक किसी तरह की अनुमति नहीं देनी चाहिए, जब तक न्यायालय इस बारे में अंतिम फैसला नहीं दे देता। नवंबर 2013 तक समिति की अंतिम रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देने का समय आ चुका था। कृषि मंत्रालय ने एक बार फिर वही कहा, जो केंद्र सरकार को उच्चतम न्यायालय के समक्ष कहना था। कृषि मंत्रालय ने समिति के अधिकतर सदस्यों की रिपोर्ट की खारिज कर दिया और ए सदस्य वाली रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए जीएम फसलों के परीक्षण को अनुमति दी। लेकिन इस राह में पर्यावरण मंत्रालय रोड़ा बनकर खड़ा था। प्रत्येक अधिकारी ने बताया कि इस रवैये से लगता है जैसे 'मंत्रालय की रणनीति अधिकतर सदस्यों की रिपोर्ट को खारिज करने की है।' अधिकारी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अधिकांश सदस्यों की रिपोर्ट को दरकिनार करने की संभावना बहुत कम है। मंत्रालय को हलफनामे में यह स्पष्टï लिखने की सलाह दी जाती है कि परीक्षण से पहले सुधारों को पूरा कर लिया जाएगा। (BS Hindi)

केंद्रीय पूल से 15 लाख टन गेहूं के निर्यात सौदे

आर. एस. राणा नई दिल्ली | Apr 13, 2014, 01:55AM IS प्राइसिंग 285.17 डॉलर प्रति टन के भाव पर बोलियां मिली हैं हाल ही में कंपनियों को 260 डॉलर प्रति टन का न्यूनतम भाव तय किया है सरकार ने निर्यात के लिए केंद्र सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के गोदामों से सार्वजनिक कंपनियों के माध्यम से 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी हुई है, जिसमें से अभी तक करीब 15 लाख टन के निर्यात सौदे हो चुके हैं। विश्व बाजार में भाव बढऩे से सार्वजनिक कंपनी पीईसी लिमिटेड को हाल ही में गेहूं निर्यात के लिए 285.17 डॉलर प्रति टन की ऊंची बोली प्राप्त हुई है, जबकि सरकार ने गेहूं का न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी) 260 डॉलर प्रति टन तय किया हुआ है। इसके बावजूद भी केंद्रीय पूल से ओर गेहूं के निर्यात की अनुमति नई सरकार के गठन के बाद ही मिलेगी। खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बिजनेस भास्कर को बताया कि केंद्रीय पूल से सरकार ने अगस्त, 2013 में 20 लाख टन गेहूं के निर्यात की अनुमति दी थी, जिसमें से सार्वजनिक कंपनियां पीईसी, एमएमटीसी और एसटीसी करीब 15 लाख टन गेहूं के निर्यात सौदे कर चुकी हैं। उन्होंने बताया कि रूस-यूक्रेन विवाद के कारण हाल ही में विश्व बाजार में गेहूं के दाम बढ़े हैं, जिससे भारतीय गेहूं की मांग बढ़ी है। पीईसी लिमिटेड को 11 अप्रैल को 285.17 डॉलर प्रति टन की ऊंची बोली मिली है, जोकि 260 डॉलर प्रति टन के एमईपी से काफी ज्यादा है। उम्मीद है कि आगामी ढ़ाई-तीन महीनों तक विश्व बाजार में भारतीय गेहूं की अच्छी मांग बनी रहेगी, लेकिन केंद्रीय पूल से ओर गेहूं के निर्यात की अनुमति नई सरकार के गठन के बाद ही मिलेगी। पीईसी और एमएमटीसी को 11 अप्रैल को एक लाख टन गेहूं के निर्यात के लिए 281.83 से 285.17 डॉलर प्रति टन की निविदा मिली है। प्रवीन कॉमर्शियल कंपनी के प्रबंधक नवीन गुप्ता ने बताया कि विश्व बाजार में गेहूं के दाम बढऩे से प्राइवेट निर्यातक कंपनियों को भी अच्छे पड़ते लग रहे हैं। प्राइवेट निर्यातक कांडला बंदरगाह पहुंच गेहूं की खरीद 1,625 रुपये प्रति क्विंटल की दर से कर रहे हैं। महीने भर में प्राइवेट निर्यातक कंपनियां करीब 40 रैक गेहूं की खरीद कर चुकी हैं। (Business Bhaskar.....R S Rana)

Gold up as Ukraine tensions saps risk appetite, palladium rises

LONDON, April 14. - Gold jumped to a three-weekhigh on Monday as mounting tensions in Ukraine curbed investorappetite for risk, sending equities lower and boosting bullion''sappeal as an insurance asset. Palladium hit a fresh high since August 2011 at $814.20 anounce on growing fears that supply would suffer from fresh U.S.sanctions on top producer Russia and prolonged labour strikes inNo. 2 miner South Africa. Ukraine gave pro-Russian separatists a Monday morningdeadline to disarm or face a "full-scale anti-terroristoperation" by its armed forces, while the UN''s Security Councilheld an emergency session on Sunday night to discuss the crisis. Spot gold rose 0.5 percent to $1,324.90 an ounce at0944 GMT, while gold futures for June delivery were upby the same margin to $1,325.20 an ounce. "You have tensions between Russia and the West over Ukraineagain which is giving support to gold, although the strengthcoming from expectations interest rates in the U.S. will staylow for a prolonged period is a more dominant driver overall,"ABN Amro analyst Georgette Boele said. "But as the U.S. data continues to improve, there could be areadjustment in interest rate expectations and that''s when goldis going to suffer," she added. "As for the geopoliticalsituation, it is much harder to predict how things can go but Idon''t expect a full-blown crisis there and prices shouldn''t gobeyond the $1,391 level hit in mid-March." Gold has built up support over the past week after the Fed''sMarch meeting minutes showed officials were not keen onincreasing interest rates straight after unwinding bondpurchases, as the markets had feared. But an improvement in U.S. economic reports left investorsstill unconvinced that the rally in gold could continue,analysts said. "...We continue to stand by our year-end gold price targetof $1,050 an ounce," Goldman Sachs said in a note. "Morebroadly, we believe that with tapering of the Fed''s QE, U.S.economic releases are back to being a key driving force behindgold prices." Implying underlying investor bearishness and pessimism overthe longer-term outlook, outflows continued from SPDR Gold Trust, the world''s largest gold-backed exchange-traded fund. Holdings in the fund fell 1.80 tonnes to 804.42 tonnes onFriday. Buying in the physical markets was still thin with Chineseprices trading at a discount to spot gold.

PALLADIUM AT NEAR-3-YEAR HIGHS Palladium was up 1 percent at $808 an ounce, oncourse for its fifth session of gains. Relations between Russia and the West are at their worstsince the Cold War, after Moscow annexed Crimea from Ukraine,saying the Russian population there was under threat. The United States is prepared to step up sanctions againstMoscow if pro-Russian military actions in eastern Ukrainecontinue, a senior U.S. envoy said, with the sanctions set totarget mining, banking and energy, among other sectors.[ID:nL2N0N50AK Palladium has outperformed other precious metals this year,gaining about 14 percent also supported by fears of supply,growing demand in the auto sector and buying from twonewly-launched exchange-traded funds (ETFs) in Johannesburg. Platinum gained about 1 percent to its highest innearly a month at $1,464.40 as labour strikes continued in SouthAfrica. Silver was down 0.4 percent to $19.87 an ounce.

Gold regains 30k level on strong global cues

New Delhi, Apr 14. Gold regained the psychological Rs 30,000 per ten gram level after three weeks in the national capital today on brisk buying by stockists for the ongoing wedding season amid firming global trend. Gold surged by Rs 220 to Rs 30,200, a level last seen on March 24, and silver by Rs 150 to Rs 43,900 per kg on increased offtake by industrial units and coin makers. Traders said brisk buying by stockists for the ongoing wedding season mainly led an upsurge in precious metal prices. They said firming global trend, as tension escalated in Ukraine, boosting demand for a haven also influenced the sentiment. Gold in Singapore, which normally sets price trend on the domestic front, rose by 0.9 per cent to USD 1,329.92 an ounce, the highest since March 24 and silver by 0.5 per cent to USD 20.09 an ounce. On the domestic front, gold of 99.9 and 99.5 per cent purity shot up by Rs 220 each to Rs 30,200 and Rs 30,000 per ten gram respectively, a level last seen on March 24. Sovereign, however, held steady at Rs 25,000 per piece of eight gram. Silver ready also advanced by Rs 150 to Rs 43,900 per kg while weekly-based delivery held steady at Rs 43,180 per kg, while silver coins ruled flat at Rs 82,000 for buying and Rs 83,000 for selling of 100 pieces.

12 April 2014

बकाया स्टॉक ज्यादा होने से मेंथा तेल में और गिरावट की संभावना

नरमी का रुख मांग कमजोर होने से मेंथा तेल के मूल्य में सुस्ती नए सीजन में मेंथा का रकबा बढऩे की संभावना चंदौसी में मेंथा तेल घटकर 973 रुपये प्रति किलो क्रिस्टल बोल्ड "1,050-1,100 प्रति किलो रह गया डॉलर के मुकाबले रुपये में आई मजबूती से मेंथा उत्पादों के निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव पडऩे लगा है। निर्यातकों ने दिसंबर-जनवरी में मेंथा उत्पादों के अप्रैल-मई डिलीवरी के सौदे जिस समय किए, उस समय रुपये के मुकाबले डॉलर 64-65 के स्तर पर था जबकि इस समय डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होकर 60 के स्तर पर आ गया है। दूसरी ओर, चालू फसल सीजन में मेंथा की बुवाई बढऩे का अनुमान है जबकि उत्पादक मंडियों में बकाया स्टॉक भी बचा हुआ है। ऐसे में मेंथा तेल की मौजूदा कीमतों में मंदे की ही संभावना है। एसेंशियल एसोसिएशन ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जुगल किशोर ने बिजनेस भास्कर को बताया कि डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती से निर्यातकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। निर्यातकों ने दिसंबर-जनवरी में अप्रैल-मई डिलीवरी के मेंथा उत्पादों के निर्यात सौदे 17-18 डॉलर प्रति किलो की दर से किए थे जबकि जनवरी में डॉलर के मुकाबले रुपया 64-65 के स्तर पर था। इस समय डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होकर 60 के स्तर पर आ गया है तथा आगामी दिनों में रुपया और भी मजबूत होने की संभावना है। उधर, आयातकों ने खरीद सौदे भी ज्यादा कर लिए थे, जिसकी वजह से इस समय मांग कमजोर है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई बड़ी कंपनियों ने मेंथा तेल के बजाय सिंथेटिक तेल का उपयोग शुरू कर दिया है जिसका असर निर्यात पर पड़ रहा है। ग्लोरियस केमिकल के प्रबंधक अनुराग रस्तोगी ने बताया कि चुनाव के साथ ही किसान गेहूं की कटाई में लगे हुए हैं इसीलिए उत्पादक मंडियों में मेंथा तेल की दैनिक आवक घटकर 250 से 300 ड्रम (एक ड्रम-180 किलो) की ही हो रही है। लेकिन इसके मुकाबले में निर्यात के साथ ही घरेलू मांग भी कमजोर है, जिससे कीमतों में गिरावट आई है। उत्तर प्रदेश मेंथा उद्योग एसोसिएशन के अध्यक्ष फूल प्रकाश ने बताया कि मेंथा की नई फसल की आवक जून-जुलाई में बनेगी। पौध वाली फसल की रोपाई गेहूं की कटाई के बाद होगी, जबकि सीधी रोपाई वाली फसल लग चुकी है। चालू फसल सीजन में कुल बुवाई पिछले साल से ज्यादा ही होने का अनुमान है। भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2013-14 के पहले 9 महीनों (अप्रैल से दिसंबर) के दौरान 17,850 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 9,210 टन मेंथा उत्पादों का निर्यात हुआ था (Business Bhaskar....R S Rana)