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21 April 2019

सीसीआई ने समर्थन मूल्य पर 10.7 लाख गांठ कपास खरीदी

आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू खरीफ विपणन सीजन 2018-19 में कॉटन कार्पोरेशन आफ इंडिया (सीसीआई) ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएपी) पर 10.7 लाख गांठ (एक गांठ-170 किलो) कपास की खरीद की है। कुल खरीद में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी तेलंगाना और महाराष्ट्र की है।
सीसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार उत्पादक मंडियों में कपास के भाव इस समय समर्थन मूल्य से उंचे भाव चल रहे हैं, इसलिए मंडियों में कपास बेची जा रही है। उन्होंने बताया कि कपास की बिक्री बाजार भाव पर की जा रही है। चालू सीजन में तेलंगाना से सबसे ज्यादा 7.77 लाख गांठ और आंध्रप्रदेश से 1.95 लाख गांठ कपास खरीदी है। 
सीसीआई के अनुसार चालू सीजन में उत्पादक मंडियों में 16 अप्रैल तक 278.83 लाख गांठ कपास की आवक हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 286.03 लाख गांठ की आवक हुई थी। चालू सीजन में उत्पादक राज्यों की मंडियों में अब केवल 22.76 फीसदी कपास ही बची हुइ है। सीसीआई के अनुसार चालू सीजन 2018-19 में 361 लाख गांठ कपास के उत्पादन का अनुमान है जबकि कॉटन एसोसिएशन आफ इंडिया (सीएआई) के अनुसार उत्पादन 321 लाख गांठ ही होने का अनुमान है।
सीसीआई के अनुसार प्रमुख उत्पादक राज्य गुजरात की मंडियों में कपास की आवक 72.51 लाख गांठ, महाराष्ट्र की मंडियोें में 63.27 लाख गांठ, तेलंगाना की मंडियों में 35.46 लाख गांठ हो चुकी है। इसके अलावा राजस्थान की मंडियों में 25.91 लाख गांठ, हरियाणा की मंडियों में 21.95 लाख गांठ, मध्य प्रदेश की मंडियों में 20.75 लाख गांठ, आंध्रप्रदेश की मंडियों में 10.27 लाख गांठ, कर्नाटक की मंडियों में 11.56 लाख गांठ की आवक हो चुकी है।............  आर एस राणा

मध्य प्रदेश में समर्थन मूल्य पर 15 लाख टन गेहूं की हो चुकी है खरीद

आर एस राणा
नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 15 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है। राज्य के दो लाख किसानों से बीते साल की इसी अवधि तक खरीदे गए गेहूं की तुलना में 1.60 लाख टन अधिक है। साथ ही इसका सुरक्षित भंडारण किया जा रहा है।
खाद्य नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारियों के अनुसार राज्य में 25 मार्च से समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी शुरू हुई है तथा 17 अप्रैल तक राज्य में 15 लाख मीट्रिक टन गेंहू की खरीदी की गई। पिछले साल की तुलना में इस साल 600 खरीदी केंद्र ज्यादा बनाए गए हैं। समितियां किसानों के खातों में सीधे भुगतान कर रही हैं। राज्स से चालू रबी में 75 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया गया है, जबकि पिछले रबी सीजन में राज्य से 73.13 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी। 
कुल खरीदे गए गेहूं में से 71 फीसदी का मंडियों से हो चुका है उठाव
आधिकारिक तौर पर दावा किया गया है कि खरीदी में कोई दिक्कत न आए इसके लिए अगले एक माह की खरीदी के लिए पर्याप्त बोरे उपलब्ध हैं। खरीदे गए गेहूं में से 71 फीसदी हिस्से को भंडारण स्थल तक भेजा जा चुका है। भंडारण के लिए 4 लाख टन से ज्यादा की क्षमता के सायलो बैग उपयोग में लगाए गए हैं तथा जहां भी भंडारण सुविधा की कमी है वहां 14 लाख मीट्रिक टन के ओपन कैंप बनाए गए हैं। पिछले साल खरीदा गया गेहूं अब भी कई गोदामों में रखा हुआ है, जिसे अन्यत्र भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
मध्य प्रदेश सरकार दे रही है 160 रुपये बोनस
हाल ही में बेमौसम बारिश से मंडियों में रखा गेहूं भीग गया थी, इस स्थिति से निपटने के लिए सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए है कि खुले में गेहूं को न रखा जाए। राज्य सरकार की ओर से गेहूं किसानों को 160 रुपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि दी जा रही है। इस तरह कुल मिलाकर प्रति क्विंटल 2,000 हजार रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने चालू रबी सीजन के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,840 रुपये क्विंटल तय किया है। बीते साल समर्थन मूल्य 1735 रुपये क्विंटल था।
कुल खरीद का लक्ष्य 357 लाख टन 
भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार अन्य राज्यों में हरियाणा से 13.68 लाख टन और पंजाब 0.75 लाख टन और राजस्थान से 1.19 लाख टन गेहूं की खरीद समर्थन मूल्य पर हो चुकी है। बीते सप्ताह कई राज्यों में हुई बारिश और ओलावृष्टि से गेहूं की फसल भीग गई थी, जिससे उत्पादक मंडियों में गेहूं की दैनिक आवक पिछले साल की तुलना में कम हो रही है। केंद्र सरकार ने चालू रबी विपणन सीजन में समर्थन मूल्य पर 357 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया है। ...... आर एस राणा

19 April 2019

दाल मिलें ही कर सकेंगी आयात, अप्रैल अंत तक देना होगा आवेदन

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने दलहन आयात के नियमों को सख्त कर दिया है। अब केवल दाल मिलें ही आयात कर सकेगी तथा मिलों को आयात के लिए केंद्र सरकार को 30 अप्रैल 2019 तक आवेदन देना होगा, उसके बाद सरकार पात्र मिलों को आयात लाइसेंस जारी करेगी।
विदेशी व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2019—20 में केवल दाल मिलों को ही दलहन के आयात की अनुमति दी जायेगी, इसके लिए मिलों को केंद्र सरकार से आयात के लाइसेंस लेने के लिए 30 अप्रैल 2019 तक आवेदन करना होगा। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने आयातित दालों की जमाखोरी को रोकने के लिए यह कदम उठाया है।
उत्पादक मंडियों में भले ही किसानों को दालें समर्थन मूल्य से नीचे बेचनी पड़ रही है, इसके बावजूद केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए 6.5 लाख टन दालों के आयात को मंजूरी दी हुई है। चालू वित्त वर्ष के लिए मूंग और उड़द के डेढ़-डेढ़ लाख टन आयात को, और अरहर के दो लाख टन तथा मटर के डेढ़ लाख टन आयात करने की मंजूरी दी गई है।
अरहर, उड़द, मूंग और मटर के आयात की मात्रा तय
केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2019-20 के लिए डेढ़ लाख टन मूंग का आयात आयातकों के माध्यम से किया जा सकेगा, इसके अलावा केंद्र सरकार ने जो अनुबंध किए है उसका आयात होगा। उड़द के आयात की अनुमति भी चालू वित्त वर्ष के लिए डेढ़ लाख, अरहर के आयात के आयात की 2 लाख टन की मात्रा तय की गई, इसके अलावा केंद्र सरकार ने जो अनुबंध अरहर आयात के केंद्रीय स्तर पर किए है, वह भी आयात होगा। सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने मौजाम्बिक से 2 लाख टन के आयात अनुबंध किए हुए हैं। ऐसे में अरहर का आयात 4 लाख टन हो जायेगा। सरकार ने मटर के डेढ़ लाख टन के आयात की अनुमति दी है, जोकि वित्त वर्ष 2018-19 के एक लाख से ज्यादा है।
समर्थन मूल्य से नीचे बिक रहा है चना और मसूर
उत्पादक मंडियों में रबी दलहन की प्रमुख चना और मसूर समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही है। दलहन कारोबारी राधाकिशन गुप्ता ने बताया कि उत्पादक मंडियों में चना के भाव 4,000 से 4,100 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि केंद्र सरकार ने चना का समर्थन मूल्य 4,620 रुपये रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। इसी तरह से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की मंडियों में मसूर 3,800 से 3,900 रुपये प्रति क्विंटल बिक रही है जबकि मसूर का समर्थन मूल्य 4,475 रुपये प्रति क्विंटल है। 
बीते वित्त वर्ष में रोक के बावजूद आयात हुआ था ज्यादा
वित्त वर्ष 2018-19 के लिए केंद्र सरकार ने उड़द और और मूंग के आयात की सीमता डेढ़-डेढ़ लाख टन, और मटर के आयात की मात्रा एक लाख टन तथा अरहर के आयात सीमा तय की थी। इसके अलावा चना के आयात पर 60 फीसदी और मसूर के आयात पर 30 फीसदी आयात शुल्क लगाया था। कृषि मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 के पहले दस महीनों अप्रैल से जनवरी तक ही 21 लाख टन दालों का आयात हो चुका है।
दालों की रिकार्ड पैदावार का अनुमान
कृषि मंत्रालय के दूसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू फसल सीजन 2018-19 में दालों का रिकार्ड 240.2 लाख टन उत्पादन होने का अनुमान है जबकि पिछले फसल सीजन में 239.5 लाख टन का ही उत्पादन हुआ था। देश में दालों की सालाना खपत भी 240 से 245 लाख टन की ही होती है।...... आर एस राणा

एग्री उत्पादों का निर्यात बढ़ा, बासमती चावल और प्रोसेस फूड में मांग ज्यादा

आर एस राणा
नई दिल्ली। वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों अप्रैल से फरवरी के दौरान एग्री उत्पादों का कुल निर्यात मूल्य से हिसाब से बढ़कर 2,40,067.07 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में निर्यात 2,46,336.12 करोड़ रुपये का हुआ था। इस दौरान बासमती चावल के साथ ही प्रोसेस फूड उत्पादों के निर्यात में बढ़ोतरी हुई है। वित्त वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान एग्री उत्पादों का निर्यात 2,23,814.49 करोड़ रुपये का हुआ था।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों अप्रैल से फरवरी में मरीन उत्पादों का निर्यात 13,14,066 टन का 43,947.04 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में कुल 14,30,226.83 टन का 47,634.57 करोड़ रुपये का हुआ था। बासमती चावल का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल से फरवरी के दौरान 38,55,135 टन का 28,598.91 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष में इसका कुल निर्यात 40,51,896 टन का 26,841.19 करोड़ रुपये का हुआ था।
गैर-बासमती चावल का निर्यात घटा
मंत्रालय के अनुसार बेफेलो मीट का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों 11,16,363 टन का 22,924.50 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि वित्त वर्ष 2017-18 में इसका निर्यात 13,48,225 टन का 25,988.45 करोड़ रुपये का हुआ था। मसालों का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों में 9,52,074 टन का 20,406.71 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान कुल निर्यात 10,81,335 टन का 20,013.68 करोड़ रुपये का हुआ था। गैर बासमती चावल का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल से फरवरी के दौरान 67,11,007 टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में गैर बासमती चावल का कुल निर्यात 86,33,237 टन का 22,927 करोड़ रुपये का हुआ था।
डीओसी के साथ ही चीनी के निर्यात में हुई बढ़ोतरी
डीओसी का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल से फरवरी के दौरान 38,98,666 टन का 9,061.94 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 में डीओसी का कुल निर्यात 35,26,526 टन का 6,968.90 करोड़ रुपये का हुआ था। चीनी का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के अप्रैल से जनवरी के दौरान 32,68,074 टन का 7,892.50 करोड़ रुपये का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष में चीनी का निर्यात 17,58,036 टन का 5,228.73 करोड़ रुपये का ही निर्यात हुआ था।
केस्टर तेल का निर्यात मूल्य में घटा
केस्टर तेल का निर्यात वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 11 महीनों अप्रैल से फरवरी के दौरान 5,584.73 करोड़ रुपये का, चाय का निर्यात 5,310.74 करोड़ रुपये का और काफी का निर्यात 4,985.57 करोड़ रुपये और ताजा सब्जियों का निर्यात 4,814.56 करोड़ रुपये का हुआ है। बीते वित्त वर्ष 2017-18 में केस्टर तेल का निर्यात 6,730 करोड़ रुपये, चाय का निर्यात 5,396.39 करोड़ रुपये का तथा ताजा सब्जियों का निर्यात 4,997.49 करोड़ रुपये और ताजे फलों का निर्यात 4,746.31 करोड़ रुपये का हुआ था।.......  आर एस राणा

हरियाणा और पंजाब में गन्ने का बकाया भुगतान बनेगा चुनावी मुद्दा

आर एस राणा
नई दिल्ली। हरियाणा के साथ ही पंजाब के गन्रा किसानों का बकाया लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दलों के प्रत्याशियों पर भारी पड़ेगा। हरियाणा की चीनी मिलों पर चालू पेराई सीजन का करीब 500 करोड़ रुपये और पंजाब की चीनी मिलों पर किसानों का 1,250 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है। बकाया भुगतान को लेकर पंजाब के साथ ही हरियाणा के किसान भी लामबंद हो रहे हैं।
भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने राज्य की चीनी मिलों द्वारा गन्ना किसानों के बकाया का भुगतान नहीं किया जा रहा है, इस संबंध में कई बार संबंधित अधिकारियों और मंत्रियों से बात हुई है, लेकिन चीनी मिलों द्वारा बकाया भुगतान में तेजी नहीं लाई जा रही है, जिससे गन्ना किसानों में राज्य सरकार के खिलाफ रोष है। उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा बकाया नारायणगढ़ और भादसों चीनी मिलों करीब 225 करोड़ रुपये है, जबकि इन मिलों के पास चीनी का स्टॉक भी नहीं है। इसलिए इन मिलों द्वारा बकाया में देरी होगी। उन्होंने बताया कि बकाया भुगतान में देरी से राज्य के गन्ना किसानों में राज्य सरकार के खिलाफ रोष है, तथा राज्य के मुख्यमंत्री से भुगतान कराने की मांग की है।  
हरियाणा की जींद सहकारी चीनी मिल में हो चुकी है पेराई बंद
सूत्रों के अनसुार राज्य की सहकारी चीनी मिलों द्वारा भुगतान में सुधार तो हुआ है, लेकिन इसके बावजूद भी राज्य की शाहबाद चीनी मिल पर अभी 73 करोड़ रुपये, रोहतक चीनी मिल पर 62 करोड़ रुपये, पानीपत सहकारी चीनी मिल पर 42 करोड़ रुपये, करनाल चीनी मिल पर 45 करोड़ रुपये और सोनीपत चीनी मिल पर 38 करोड़ रुपये तथा पलवल चीनी मिल पर 39 करोड़ रुपये एवं महम शुगर मिल्स पर 64 करोड़ रुपये बकाया है। हरियाणा स्टेट फेडरेशन आफ कोआपरेटिव शुगर मिल्स लिमिटेड के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार राज्य की जींद मिल में पेराई बंद हो गई है, लेकिन बाकि मिलों में पेराई अभी चल रही है। उन्होंने बताया कि राज्य की सहकारी चीनी मिलों में चीनी का उत्पादन अभी तक पिछले साल की तुलना में कम हुआ है। 
पंजाब की चीनी मिलों पर 1,250 करोड़ से अधिक है बकाया
भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के प्रधान बलबीर सिंह राजेवाल ने बताया कि पंजाब की चीनी मिलों पर राज्य के किसानों का बकाया 1,250 रुपये से ज्यादा का हो गया है लेकिन राज्य सरकार बकाया भुगतान में तेजी लाने के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है। उन्होंने बताया कि राज्य की चीनी मिलें किसानों से 310 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गन्ना खरीद रही है, इसमें भी 25 रुपये का भुगतान राज्य सरकार करेगी। पड़ोसी राज्य हरियाणा की चीनी मिलें 340 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गन्ना खरीद रही है। उन्होंने बताया कि कम भाव पर गन्ना खरीदने के बावजूद भी राज्य की चीनी मिलों द्वारा भुगतान में देरी की जा रही है। उन्होंने बताया कि राज्य में चाहे अकाली दल की सरसों हो या फिर कांग्रेस की सब चीनी मिल मालिकों से मिली हुई है।
तुरंत भुगतान नहीं हुआ तो किसान करेंगे लोकसभा चुनाव का बहिष्कार 
पंजाब में बकाया भुगतान नहीं होने से गन्ना किसान माझा किसान संघर्ष कमेटी के बनैर तले आज से फिर आंदोलन पर बैठ गए हैं। माझा किसान संघर्ष कमेटी के एक नेता के अनुसार गन्ना किसानों को चीनी मिलों द्वारा 285 रुपये और पंजाब सरकार की तरफ से दिए जाने वाले 25 रुपये के हिसाब से गन्ने का तुरंत भुगतान नहीं किया गया तो मजबूरन गन्ना किसान को लोकसभा चुनाव का बाहिष्कार करना पड़ेगा। पंजाब में धूरी की शुगर मिल द्वारा किसानों के करोड़ों रुपये की गन्ने की अदायगी नहीं किए जाने से खफा किसानों ने धरना-प्रदर्शन किया था। ......   आर एस राणा

14 April 2019

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में जातीय समीकरण पड़ेंगे भारी

आर एस राणा
नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव 2019 में उत्तर प्रदेश के दूसरे चरण में नगीना, बुलंदशहर, आगरा और हाथरस सुरक्षित सीट है, इसके अलावा अमरोहा, अलीगढ़, मथुरा और फतेहपुर सीकरी समेत 8 सीटों पर चुनाव होना है। 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी आठ सीटों को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जीतने में कामयाब रही थी लेकिन इस बार सपा—बसपा और आरएलडी में हुए महागठबंधन के कारण जातीय समीकरण उम्मीदवारों की जीत तय करेंगे। 
उत्तर प्रदेश की 8 लोकसभा सीटों पर 18 अप्रैल को मतदान होंगे। दूसरे चरण में बसपा-सपा-आरएलडी की अगुवाई हाथी कर रहा है। आठ में से बसपा 6 सीटों पर चुनावी मैदान में है और सपा-आरएलडी एक-एक सीट पर चुनाव लड़ रही है। इसलिए दूसरे चरण का मतदान मायावती बनाम नरेंद्र मोदी के बीच चुनावी मुकाबला माना जा रहा है। इस दौर में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और भाजपा की हेमा मालिनी की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी हुई है।
बुलंशहर में जीत का अंतर हो सकता है कम
बुलंदशहर में मुख्य मुकाबला भाजपा के भोला सिंह, गठबंधन के योगेश वर्मा और कांग्रेस के बंसी सिंह में है। भोला सिंह 2014 में यहां से चार लाख से ज्यादा वोटों से जीते थे। इस सीट पर 17 लाख से अधिक वोटर हैं। इनमें 9 लाख से अधिक पुरुष और करीब 8 लाख महिला वोटर हैं। बुलंदशहर में करीब 77 फीसदी हिंदू और 22 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती हैं। बुलंदशहर लोकसभा के अंतर्गत कुल 5 विधानसभा अनूपशहर, बुलंदशहर, डिबाई, शिकारपुर और स्याना विधानसभा सीटें आती हैं। 2017 विधानसभा चुनाव में इन सभी 5 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की है। बुलंदशहर के राहुल भल्ला ने बताया कि पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 6 लाख वोट मिले थे, इस बार सपा—बसपा और आरएलडी का महागठबंधन है, इसलिए जीत का अंतर कम हो सकता है।
अमरोहा सीट पर महागठबंधन से मिल रही है चुनौती
उत्तर प्रदेश में दूसरे चरण में जाटों के मतों की अमरोहा, अलीगढ़ और मथुरा की सीटें बची है। इसलिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अमरोहा सीट पर सबकी नजर रहेगी। मुस्लिम और जाट बाहुल्य इस सीट की पहचान गन्ना उत्पादन के रूप में भी होती है। अमरोहा जिले के देहरा चक गांव के गन्ना किसान जोगिंद्र आर्य ने बताया कि चीनी मिलों पर गन्रा किसानों का बकाया बढ़ रहा है, लेकिन यह मुद्दा इस बार चुनाव में नहीं है। गठबंधन होने के कारण चुनाव जातीय समीकरण में उलझ गया है। अमरोहा लोकसभा सीट से बसपा ने जेडीएस से आए कुंवर दानिश को मैदान में उतारा है। वहीं, भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद कंवर सिंह तंवर पर दांव लगाया तो कांग्रेस ने सचिन चौधरी पर दांव खेला है। अमरोहा सीट के जातीय समीकरण को देखें तो करीब 5 लाख मुस्लिम, 2.5 लाख दलित, 1 लाख गुर्जर, 1 लाख कश्यप, 1.5 लाख जाट और 95 हजार लोध मतदाता हैं।
नगीना सीट पर मुस्लिम वोटर करेंगे भाग्य का फैसला
नगीना लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई है। यहां से बसपा ने गिरीश चंद्र, भाजपा ने मौजूदा सांसद यशवंत सिंह और कांग्रेस ने पूर्व आईएएस आरके सिंह की पत्नी ओमवती को उतारा है। नगीना सीट पर गठबंधन और कांग्रेस दोनों की नजर दलित और मुस्लिम वोटों पर है जबकि भाजपा राजपूत और गैर जाटव दलित के साथ-साथ जाट मतदाताओं के सहारे दोबारा जीत दर्ज करना चाहती है। लेकिन 6 लाख मुस्लिम वोटर इस सीट पर किंगमेकर की भूमिका में हैं।
कांग्रेस के राजबब्बर त्रिकोणीय मुकाबले में 
फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीट का मुकाबला त्रिकोणीय होता नजर आ रहा है। यहां से भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद बाबूलाल चौधरी का टिकट काटकर राजकुमार चहेर को उतारा है, जबकि कांग्रेस से प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर और बसपा से गुड्डु पंडित मैदान में हैं। इस सीट पर दो लाख जाट मतदाताओं के देखते हुए भाजपा ने जाट समुदाय पर दांव खेला है, जबकि तीन लाख ब्राह्मण मतों को ध्यान रखकर बसपा ने ब्राह्मण कार्ड खेला है। ऐसे में कांग्रेस के राजब्बर के सामने सबकी बड़ी चुनौती जातीय समीकरण को तोड़ना है।
महागठबंधन के उम्मीदवार से हेमा मालिनी को मिल रही है कड़ी टक्कर
मथुरा लोकसभा सीट से भाजपा ने एक बार फिर हेमा मालिनी को उतारा है, जबकि आरएलडी से कुंवर नरेंद्र सिंह और कांग्रेस से महेश पाठक मैदान में हैं। यहां करीब 4 लाख जाट समुदाय के मतदाता हैं, जबकि 2.5 लाख ब्राह्मण और 2.5 लाख राजपूत वोटर भी हैं तथा इतने ही दलित मतदाता हैं। इस सीट पर ढेड़ लाख के करीब मुस्लिम हैं। आरएलडी उम्मीदवार राजपूत के साथ-साथ जाट, मुस्लिम और दलितों को साधने में कामयाब रहते हैं तो फिर भाजपा के लिए कठिन हो जायेगा। कारोबारी संदीप बंसल ने बताया कि पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में हेमा मालिनी 3.5 लाख वोटों से जीती थी, लेकिन इस बार महागठबंधन होने के कारण आरएलडी के उम्मीदवार से कड़ी टक्कर मिल रही है। 
अलीगढ़ में होगा त्रिकोणीय मुकाबला
अलीगढ़ लोकसभा सीट से भाजपा ने मौजूदा सांसद सतीश गौतम और कांग्रेस ने चौधरी बिजेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा है जबकि बसपा ने अजीत बालियान को उतारा है। जातीय समीकरण के लिहाज से देखें तो यादव, ब्राह्मण, राजपूत और जाट के करीब डेढ़-डेढ़ लाख वोट हैं जबकि दलित 3 लाख और 2 लाख के करीब मुस्लिम मतदाता हैं। वोट बैंक की नजर से देंखे तो बसपा और कांग्रेस दोनों ने जाट उम्मीदवार उतारे हैं तो भाजपा ने ब्राह्मण पर दांव खेला है। इसलिए अलीगढ़ में त्रिकोणीय मुकाबला माना जा रहा है। 
हाथरस में गठबंधन बनाम भाजपा
हाथरस लोकसभा सीट से सपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन को मैदान उतारा है जबकि भाजपा ने राजवीर सिंह बाल्मीकि और कांग्रेस ने त्रिलोकीराम दिवाकर को मैदान में उतारा है। हाथरस सीट जाट बहुल मानी जाती है, इस सीट पर करीब 3 लाख जाट, 2 लाख ब्राह्मण, 1.5 लाख राजपूत, 3 लाख दलित, 1.5 लाख बघेल और 1.25 लाख मुस्लिम मतदाता हैं। ऐसे में गठबंधन होने के कारण जाट, मुस्लिम और दलित मतदाता एकजुट हो गए तो भाजपा के लिए चुनौती बन जायेगी।
आगरा में भाजपा और बसपा में जंग 
आगरा सुरक्षित सीट पर बसपा ने मनोज सोनी, भाजपा ने एसपी सिंह बघेल और कांग्रेस ने प्रीता हरित को मैदान में उतारा है। भाजपा के एसपी बघेल सपा और बसपा में रह चुके हैं, ऐसे में मुस्लिम मतदाताओं में अच्छी खासी पकड़ मानी जाती है। इस तरह से भाजपा के साथ-साथ बघेल दूसरे दलों के वोट बैंक को साधने में कामयाब रहते हैं तो एक बार फिर कमल खिल सकता है। हालांकि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर भी इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। ऐसे में उनका भी अपना एक आधार है जबकि दलित और मुस्लिम के सहारे बसपा भी जीत की आस लगाए हुए है। .............. आर एस राणा

उत्तर प्रदेश सरकार ने समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद का लक्ष्य पांच लाख टन बढ़ाया

आर एस राणा
नई दिल्ली। गेहूं किसानों को राहत देने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने गेहूं की खरीद का लक्ष्य 50 लाख टन से बढ़कर 55 लाख टन कर दिया है। राज्य के खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के अनुसार सरकार ने खरीद प्रक्रिया की राह में चुनावी बाधा नहीं आने देने का इंतजाम किया है। विभाग के अनुसार जिलाधिकारियों को नियमित खरीद की समीक्षा और उपाय करने के निर्देश दिए गए हैं।
भारत सरकार के खाद्य सचिव की अध्यक्षता में राज्यों के खाद्य सचिवों की बैठक में राज्य से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर 50 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य तय किया था, लेकिन राज्य सरकार ने इसको बढ़ाकर 55 लाख टन कर दिया है। चालू रबी विपणन सीजन 2019-20 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 1,840 रुपये प्रति क्विंटल किया हुआ है जबकि पिछले रबी विपणन सीजन में गेहूं का समर्थन मूल्य 1,735 रुपये प्रति क्विंटल था।
कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में उत्तर प्रदेश में 350 लाख टन गेहूं के उत्पादन का अनुमान है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अनुसार पिछले रबी सीजन में राज्य से समर्थन मूल्य पर 52.94 लाख टन गेहूं की खरीद हुई थी। चालू रबी में गेहूं की खरीद के लिए एफसीआई उत्तर प्रदेश में 213 और राज्य की खरीद एजेंसिया 6,000 खरीद केंद्रों के माध्यम से खरीद करेगी। राज्य में गेहूं की सरकारी खरीद पहली अप्रैल से 15 जून 2019 तक की जायेगी। एफसीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार राज्य की मंडियों से गेहूं की खरीद शुरू हो गई है, तथा 12 अप्रैल तक राज्य की मंडियों से समर्थन मूल्य पर 14,000 टन गेहूं की खरीद हो चुकी है।
उत्तर प्रदेश की मथूरा मंडी में गेहूं की दैनिक आवक 2,000 से 2,500 बोरी की हो रही है, लेकिन सरकार खरीद शुरू नहीं होने के कारण मंडी में गेहूं 1,650 से 1,660 रुपये प्रति क्विंटल बिक रहा है। माना जा रहा है कि गेहूं की कीमतों में इससे ज्यादा मंदा नहीं आयेग, आगे सरकारी खरीरद बढ़ेगी जबकि एफसीआई और फ्लोर मिलों की मांग भी निकलेगी, जिससे गेहूं की कीमतों में मई में तेजी बन सकती है।........आर एस राणा