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13 January 2019

सस्ती दालों की खरीद में राज्यों की बेरुखी, मात्र साढ़े पांच लाख टन के किए सौदे

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने अगस्त में राज्य सरकारों को सस्ती दालें बेचने का फैसला किया था, लेकिन पांच महीने बीतने के बावजूद राज्यों की बेरुखी के कारण केंद्रीय पूल से अभी तक मात्र 5.50 लाख टन दालें ही राज्यों ने खरीदी हैं। केंद्रीय पूल से राज्यों को दालों की बिक्री थोक मूल्य से 15 रुपये प्रति किलो सस्ते भाव पर बेचने का फैसला केंद्र सरकार ने 9 अगस्त 2018 को लिया था।
केंद्रीय पूल में दालों का स्टॉक ज्यादा है जबकि राज्यों की मांग सीमित मात्रा में आ रही है। दलहन को स्टॉक में ज्यादा समय तक रख भी नहीं सकते, इसलिए सार्वजनिक कपंनियों को आगे खुले बाजार में बिकवाली ज्यादा करनी पड़ेगी। सूत्रों के अनुसार नेफेड ने खुले बाजार में अभी तक 12 लाख टन से ज्यादा दालें बेची हैं। नेफेड उत्पादक राज्यों में 4,050 से 4,405 रुपये प्रति क्विंटल के भाव चना बेच रही है जबकि नेफेड ने चना की खरीद समर्थन मूल्य 4,620 रुपये प्रति क्विंटल की दर से की थी।
नेफेड के पास 38 लाख टन दालों का स्टॉक
सूत्रों के अनुसार नेफेड के पास दलहन का करीब 38 लाख टन का बकाया स्टॉक है जबकि चालू खरीफ में उड़द, मूंग और अरहर की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद चल रही है। प्राइस स्पोर्ट स्कीम के तहत नेफेड ने पिछले दो सालों में 51.62 लाख टन दालों की खरीद की है। इसके अलावा भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पास भी दालों का बकाया स्टॉक है।  
उड़द, मूंग और अरहर की हो रही है एमएसपी पर खरीद
खरीफ के बाद रबी में भी दालों की पैदावार कम होने की आशंका है लेकिन उत्पादक मंडियों में भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ने नीचे ही बने हुए हैं, इसलिए केंद्रीय एजेंसियों का आगे दलहन की समर्थन मूल्य पर और खरीद करनी होगी। ऐसे में केंद्रीय पूल में दालों का स्टॉक और बढ़ेगा। नेफेड ने चालू खरीफ विपणन सीजन 2018-19 में एमएसपी पर 2.93 लाख टन मूंग, 3.22 लाख टन उड़द और 23,475 टन अरहर का खरीद की है। 
मंडियों में भाव समर्थन मूल्य से नीचे 
दलहन कारोबारी राधाकिशन गुप्ता ने बताया कि उत्पादक मंडियों में अरहर के भाव 4,700 से 5,500 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे है जबकि केंद्र सरकार ने अरहर का समर्थन मूल्य 5,675 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। इसी तरह से मंडियों में उड़द के भाव 4,000 से 4,500 रुपये प्रति क्विंटल हैं जबकि उड़द का एमएसपी 5,600 रुपये प्रति क्विंटल है। मूंग के भाव उत्पादक मंडियों में 4,700 से 5,700 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं जबकि मूंग का एमएसपी 5,975 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है।
खरीफ में दलहन उत्पादन घटने का अनुमान
कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ सीजन 2018-19 में दालों का उत्पादन घटकर 92.2 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि पिछले साल खरीफ में 93.4 लाख टन का उत्पादन हुआ था। चालू रबी में दालों की बुवाई 5.73 फीसदी घटकर 147.91 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 156.90 लाख हेक्टेयर में इनकी बुवाई हो चुकी थी। रबी की प्रमुख फसल चना की बुवाई 10.14 फीसदी घटकर 94.61 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 105.28 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी।.............आर एस राणा

मानसूनी बारिश की कमी से रबी फसलों की बुवाई 4.75 फीसदी पिछड़ी

आर एस राणा
नई दिल्ली। खरीफ सीजन में देश के कई राज्यों में मानसूनी बारिश कम होने का असर रबी फसलों की बुवाई पर पड़ा है। चालू रबी में फसलों की कुल बुवाई में 4.75 फीसदी की कमी आकर कुल बुवाई 581.50 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 610.51 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। चालू सीजन में दलहन, मोटे अनाज और चावल की रोपाई में सबसे ज्यादा कमी आई है।
कृषि मंत्रालय के अनुसार रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं की बुवाई चालू सीजन में 11 जनवरी तक 294.07 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 300.51 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। गेहूं की बुवाई समान्यत: 306.39 लाख हेक्टेयर में होती है। 
दलहन की बुवाई 5.73 फीसदी पिछे
रबी दलहन की बुवाई चालू सीजन में 5.73 फीसदी घटकर 147.91 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक 156.90 लाख हेक्टेयर में इनकी बुवाई हो चुकी थी। रबी दलहन की प्रमुख फसल चना की बुवाई 10.14 फीसदी घटकर अभी तक केवल 94.61 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 105.28 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी।
मसूर की बुवाई कम, मटर की ज्यादा
अन्य दालों में मसूर की बुवाई चालू सीजन में 16.77 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 17.10 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। मटर की बुवाई जरुर पिछले साल के 9.26 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 10.29 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। उड़द और मूंग की बुवाई चालू रबी में क्रमश: 6.74 और 4.86 लाख हेक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुवाई क्रमश: 7.49 और 4.88 लाख हेक्टेयर में हुई थी।
मोटे अनाजों में ज्वार की बुवाई सबसे ज्यादा घटी
मोटे अनाजों की बुवाई चालू रबी में 15.87 फीसदी घटकर 44.98 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 53.47 लाख हेक्टेयर में इनकी बुवाई हो चुकी थी। मोटे अनाजों में ज्वार की बुवाई चालू रबी में 21.27 फीसदी घटकर केवल 23.54 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 30.08 लाख हेक्टेयर में इसकी बुवाई हो चुकी थी। मक्का और जौ की बुवाई चालू रबी में क्रमश: 13.61 और 7.13 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुवाई क्रमश: 15.13 और 7.40 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
सरसों की बुवाई 2.54 फीसदी बढ़ी
तिलहन की बुवाई चालू रबी में 0.99 फीसदी घटकर 77.97 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 78.75 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। रबी तिलहन की प्रमुख फसल सरसों की बुवाई जरुर पिछले साल के 66.60 लाख हेक्टेयर से 2.54 फीसदी बढ़कर 68.28 लाख हेक्टेयर में हुई है। मूंगफली और असली की बुवाई चालू रबी में घटकर क्रमश: 4.07 और 3.36 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुवाई क्रमश: 5.05 और 3.95 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।
धान की रोपाई कम
धान की रोपाई चालू रबी सीजन में 20.66 फीसदी घटकर केवल 16.57 लाख हेक्टेयर में ही हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 20.88 लाख हेक्टेयर में इसकी रोपाई हो चुकी थी।..........  आर एस राणा

किसानों को लुभाने के लिए केंद्र सीधे खाते में पैसे देने की कर रही है तैयारी

आर एस राणा
नई दिल्ली। बजट से पहले ही मोदी सरकार किसानों को लुभाने के लिए बड़ा कदम उठाने जा रही है। सूत्रों के अनुसार किसानों को सीधे पैसे देने की योजना है तथा इस स्कीम में जिन किसानों के पास जमीन नहीं है, उन्हें भी शामिल किया जा सकता है। 
बिना जमीन वाले किसानों को भी किया जायेगा शामिल
किसानों की कर्जमाफी के बदले मोदी सरकार ने नया प्रस्ताव तैयार कर लिया है। नए प्रस्ताव के अनुसार, किसानों के खाते में सीधे रकम भेजी जायेगी। बिना जमीन वाले किसानों को भी इसमें शामिल किया जा सकता है। केंद्र सरकार के इस प्रस्ताव में ओडिशा और तेलंगाना मॉडल की झलक है। स्कीम के तहत हर परिवार के लिए रकम की अधिकतम सीमा तय की जाएगी।
प्रस्ताव में दो राज्य ओडिशा और तेलंगाना मॉडल की झलक है। तेलंगाना में राज्य सरकार खरीफ और रबी के बुवाई सीजन से पहले किसानों के खाते में 4,000-4,000 रुपये प्रति एकड़ पैसा जमा जाती है। वहीं ओडिशा में राज्य सरकार ने कालिया योजना चालू की है जिसके तहत किसानों को 5,000 रुपये प्रति एकड़ दिए जायेंगे। इसके अलावा केंद्र सरकार नई योजना के तहत किसानों की फसलों की सरकारी खरीद भी सुनिश्चित की जायेगी। 
परिवार को मदद देने पर जोर
इस पैकेज में बीमा, कृषि कर्ज, आर्थिक मदद एक साथ देने पर विचार हो रहा है। सरकार व्यक्तिगत फायदा देने के बजाए परिवार को मदद देने पर विचार कर रही है। इस स्कीम के तहत किसान परिवार के अलावा ज्यादा आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार को मदद देने की रणनीति बन रही है। स्कीम में छोटे, सीमांत और बटाईदारों या किराये पर खेती करने वाले किसानों को भी शामिल किये जाने की योजना है। नई योजना के तहत किसानों को शून्य फीसदी पर ऋण देने पर भी फैसला हो सकता है।...........  आर एस राणा

केस्टर सीड के उत्पादन में 30.39 फीसदी की भारी गिरावट की आशंका

आर एस राणा
नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्य गुजरात में चालू सीजन में केस्टर सीड की पैदावार में 30.39 फीसदी की भारी गिरावट आकर कुल 10.43 लाख टन का ही उत्पादन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल 14.84 लाख टन का उत्पादन हुआ था।
राज्य के कृषि निदेशालय द्वारा जारी दूसरे अग्रिम अनुमान के अनुसार चालू सीजन में केस्टर सीड का उत्पादन घटकर 10.43 लाख टन ही होने का अनुमान है जबकि जानकारों का मानना है कि राज्य में 9 लाख टन से ज्यादा उत्पादन नहीं होगा। खरीफ में बारिश की कमी से राज्य के कई जिलों में सूखे जैसे हालात बने हुए हैं।
अभी तक केस्टर तेल का निर्यात कम, आगे सुधार आने का अनुमान
केस्टर तेल के निर्यातक कुशल राज पारिख ने बताया कि केस्टर तेल के निर्यात सौदे 1,550 डॉलर प्रति टन की दर से हो रहे हैं तथा आगामी दिनों में चीन की आयात मांग बढ़ने की संभावना है। नवंबर में केस्टर तेल का निर्यात 47,264 टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल नवंबर में 49,976 टन का हुआ था। चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 8 महीनों अप्रैल से नवंबर के दौरान केस्टर तेल का कुल निर्यात 3,90,921 टन का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 की समान अवधि में 4,36,300 टन का निर्यात हुआ था। पिछले वित्त वर्ष में कुल 6,51,326 टन केस्टर तेल का निर्यात हुआ था।
भाव में आयेगा सुधार
गुजरात की मंडियों में केस्टर सीड के भाव 1,020 से 1,030 रुपये प्रति 20किलो चल रहे हैं। चालू सीजन में उत्पादन में कमी आने की आशंका के कारण स्टॉकिस्टों की बिकवाली कम आ रही है। केस्टर सीड की नई फसल की आवक जनवरी में बनेगी, तथा आवकों का दबाव फरवरी में बनेगा। उत्पादन में कमी की आशंका के कारण आगे इसके भाव में और भी तेजी बनने की संभावना है।
केस्टर डीओसी का निर्यात हुआ कम
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 की पहले 9 महीनों अप्रैल से नवंबर के दौरान केस्टर डीओसी का निर्यात घटकर 2,85,945 टन का ही हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 की समान अवधि में 4,73,317 टन का निर्यात हुआ था। दिसंबर में इसका निर्यात 10,664 टन का ही हुआ है जबकि नवंबर में 46,686 टन का निर्यात हुआ था। केस्टर सीड के भाव भारतीय बंदरगाह पर 82 डॉलर प्रति टन चले रहे हैं।...........   आर एस राणा

मॉनसेंटो को बड़ी राहत, GM कॉटन सीड्स पर पेटेंट के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने जायज ठहराया

आर एस राणा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट से बहुराष्ट्रीय कंपनी मॉनसेंटो को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने आनुवांशिक रूप से संवर्द्धित कपास के बीजों (जीएम कॉटन सीड्स) पर कंपनी के पेटेंट के दावे को जायज ठहराया है। कोर्ट ने कहा है कि अमेरिकी बीज निर्माता कंपनी जीएम (जीन संवर्द्धित) कॉटन सीड्स पर पेटेंट का दावा कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है, जिसकी वजह से मॉनसेंटो जीएम कॉटन सीड्स पर पेटेंट का दावा नहीं कर पा रही थी।
मॉनसेंटो को जर्मनी की दवा और फसलों के लिए रासायन बनाने वाली कंपनी बेयर एजी खरीद चुकी है। कोर्ट के इस फैसले को विदेशी कृषि कंपनियों मसलन मॉनसेंटो, बेयर, डूपॉ पायोनियर और सेनजेंटा के लिए राहत के तौर पर देखा जा रहा है। इन कंपनियों को भी भारत में जीएम फसलों पर पेटेंट के हाथ से जाने का डर सता रहा था।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने किसानों के संगठन शेतकारी संगठन के नेता अजित नार्डे के हवाले से कहा है कि यह अच्छी खबर है क्योंकि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय कंपनियों ने पेटेंट नियमों को लेकर जारी अनिश्चितता की वजह से भारतीय बाजार में नई तकनीक को जारी करने पर रोक लगा दी थी। उन्होंने कहा कि नई तकनीक तक किसानों की पहुंच से उन्हें मदद मिलेगी।
मेको मॉनसेंटो बायोटेक (इंडिया), मॉनसेंटो और महाराष्ट्र की हाइब्रिड सीड कंपनी (मेको) का संयुक्त उपक्रम है और यही कंपनी 40 से अधिक भारतीय बीज कंपनियों को जीएस कॉटन बीज की बिक्री करती है। दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला स्थानीय कंपनी एनएसएल की याचिका पर आया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि भारत का पेटेंट कानून मॉनसेंटो को उसके जीएम कॉटन बीज पर किसी तरह के पेटेंट की इजाजत नहीं देता है।
इसके बाद मॉनसेंटो के भारतीय साझा उपक्रम (जेवी) ने रॉयल्टी भुगतान के विवाद को लेकर 2015 में एनएसएल के साथ अपने करार को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट को मॉनसेंटो के उस दावे को भी देखना था, जिसमें उन्होंने कहा था कि एनएसएल ने बीटी कॉटन सीड्स को लेकर उसकी बौद्धिक संपदा का उल्लंघन किया है। 2003 में मॉनसेंटो के जीएम कॉटन सीड को मंजूरी दी गई थी। भारत दुनिया में सबसे अधिक कपास का उत्पादन करता है। इसके साथ ही वह कपास का दूसरा बड़ा निर्यातक है। भारत में कपास की खेती का 90 फीसद रकबा, मॉनसेंटो की जीएम बीज पर निर्भर है।..........  आर एस राणा

दिसंबर में डीओसी के निर्यात में 23 फीसदी की भारी गिरावट

आर एस राणा
नई दिल्ली। विश्व बाजार में भाव नीचे होने के कारण देश से दिसंबर में डीओसी के निर्यात में 23 फीसदी की भारी गिरावट आकर कुल निर्यात 3,03,115 टन का ही हुआ है जबकि पिछले साल दिसंबर में इनका निर्यात 3,91,431 टन का हुआ था।
डीओसी के निर्यात में ईरान की मांग ज्यादा रही
साल्वेंट एक्सट्रेक्टर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (एसईए) के अनुसार दक्षिण कोरिया के साथ ही वियतनाम की मांग में चालू वित्त वर्ष में कमी आई है। हालांकि इस दौरान थाईलैंड की आयात मांग बढ़ी है, साथ ही डीओसी में ईरान एक बड़ा आयातक बनकर उभरा है। अप्रैल से दिसंबर के दौरान ईरान ने करीब 3 लाख डीओसी का आयात किया है जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में केवल 23,000 टन का ही आयात किया था।
पहले 9 महीनों में कुल निर्यात 6 फीसदी ज्यादा
एसईए के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2018-19 के पहले 9 महीनों अप्रैल से दिसंबर के दौरान डीओसी का कुल निर्यात 6 फीसदी बढ़कर 23,87,028 टन का हुआ है जबकि पिछले वित्त वर्ष 2017-18 की समान अवधि में इनका निर्यात 22,46,989 टन का ही हुआ था। चालू वित्त वर्ष के पहले 9 महीनों में जहां सोया डीओसी, राईसब्रान डीओसी और केस्टर डीओसी के निर्यात में कमी आई है, वहीं सरसों डीओसी का निर्यात बढ़ा है। सरसों डीओसी का निर्यात चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से दिसंबर के दौरान बढ़कर 8,21,777 टन का हो गया जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात 4,61,937 टन का ही हुआ था।
कीमतों में आई गिरावट
भारतीय बंदरगाह पर दिसंबर में सोया डीओसी का औसत भाव 364 डॉलर प्रति टन रहा जबकि नवंबर में इसका भाव 365 डॉलर प्रति टन था। सरसों डीओसी का भाव नवंबर के 230 डॉलर प्रति टन से घटकर औसतन 222 डॉलर डॉलर प्रति टन रहा। केस्टर डीओसी का भाव भी नवंबर के 95 डॉलर से घटकर दिसंबर में 82 डॉलर प्रति टन रहे।..........  आर एस राणा

गन्ना के बकाया भुगतान में तेजी लाने के लिए मिलों को एक और पैकेज देने की तैयारी

आर एस राणा
नई दिल्ली। केंद्र सरकार आम चुनाव से पहले किसानों की नाराजगी दूर करना चाहती है इसलिए गन्ना किसानों के बढ़ते बकाया भुगतान में तेजी लाने के लिए आम बजट से पहले चीनी मिलों को एक और राहत पैकेज दे सकती है। सूत्रों के अनुसार मिलों को लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन दे सकती है। इसके अलावा चीनी के न्यूनतम बिक्री भाव में भी बढ़ोतरी करने की तैयारी है।
खाद्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार केंद्र सरकार पांच साल के लिए 6 फीसदी ब्याज पर चीनी मिलों को कर्ज देगी। यह कर्ज चीनी मिलों को एथेनॉल उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के साथ ही नए एथेनॉल प्लांट लगाने के लिए दिया जायेगा। इसके अलावा केंद्र सरकार चीनी के न्यूनतम बिक्री भाव को 29 रुपये से बढ़ाकर 32 रुपये प्रति किलोग्राम कर सकती है। सूत्रों के अनुसार आगामी कैबिनेट की बैठक में इस पर फैसला हो सकता है।
चालू पेराई सीजन में 11,000 करोड़ हो चुका है बकाया
गन्ना किसानों का बकाया दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा है। खासकर के उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की चीनी मिलें गन्ना किसानों के बकाया का भुगतान समय से नहीं कर पा रहीं है। जिसकी वजह से चालू पेराई सीजन 2018-19 (अक्टूबर से सितंबर) में अभी तक बकाया बढ़कर करीब 11 हजार करोड़ के स्तर पर पहुंच गया है। माना जा रहा है कि स्थिति अगर ऐसे ही बनी रही तो अप्रैल तक बकाया बढ़कर 20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों पर पिछले पेराई सीजन का भी बकाया बचा हुआ है। 
सितंबर में चीनी मिलों को 5,500 करोड़ का दिया था पैकेज
केंद्र सरकार ने सितंबर 2018 में चीनी उद्योग को 5,500 करोड़ रुपये का पैकेज दिया था। इसके तहत चीनी मिलों को चालू पेराई सीजन 2018-19 में तय कोटा 50 लाख टन चीनी के निर्यात पर सहायता राशि के अलावा निर्यात करने के लिए चीनी मिलों को परिवहन लागत पर भी सब्सिडी दी जा रही है।
जून में दिया था 8,500 करोड़ का पैकेज
इससे पहले जून 2018 में भी केंद्र सरकार ने उद्योग के लिए 8,500 करोड़ रुपये का पैकेज घोषित किया था। इसमें 4,440 करोड़ रुपये मिलों को सस्ते कर्ज के रूप में एथेनॉल क्षमता बढ़ाने के लिए दिए गए थे। इसमें 1,332 करोड़ रुपये की ब्याज सहायता थी। इसके अलावा भी केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को राहत देने के लिए एथेनॉल के खरीद मूल्य में तो बढ़ोतरी की ही थी, साथ ही चीनी पर आयात शुल्क दोगुना कर 100 फीसदी किया और इस पर निर्यात शुल्क समाप्त कर दिया था।
यूपी में राज्य सरकार ने भी दिया पैकेज
उधर गन्ना के सबसे बड़े उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ सरकार ने किसानों का भुगतान करने के लिए चीनी मिलों के लिए 4,000 करोड़ रुपये के आसान ऋण कार्यक्रम की घोषणा की थी। राज्य ने भुगतान की स्थिति आसान बनाने के लिए अन्य लाभों की भी घोषणा की हुई है, इसके बावजूद भी बकाया भुगतान लगातार बढ़ता जा रहा है।
पहली तिमाही में बढ़ा चीनी उत्पादन
पहली अक्टूबर 2018 से शुरू हुए चालू पेराई सीजन की पहली तिमाही एक अक्टूबर से 31 दिसंबर 2018 तक चीनी का उत्पादन 5.72 फीसदी बढ़कर 110.52 लाख टन का हो चुका है जबकि पिछले पेराई सीजन की समान अवधि में 103.56 लाख टन चीनी का ही उत्पादन हुआ था। उद्योग के अनुसार चालू पेराई सीजन में महाराष्ट्र और कर्नाटक में चीनी मिलों में गन्ने की पेराई पहले आरंभ होने से चीनी का अभी तक उत्पादन बढ़ा है लेकिन महाराष्ट्र के कई जिलों में बारिश की कमी का असर गन्ने की फसल पर पड़ा है इसलिए चीनी का कुल उत्पादन चालू पेराई सीजन में पिछले साल की तुलना में कम होने का अनुमान है। देशभर में 501 चीनी मिलों में पेराई चल रही है जबकि पिछले साल इस समय 505 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी।
चीनी के भाव में आ सकता है सुधार
मंगलवार को दिल्ली में चीनी के भाव 3,400 से 3,450 रुपये प्रति क्विंटल और उत्तर प्रदेश में एक्स फैक्ट्री भाव 3,100 से 3,225 रुपये प्रति क्विंटल रहे। केंद्र सरकार द्वारा उद्योग को राहत देने के लिए चीनी की कीमतों में 100 ससे 200 रुपये प्रति क्विंटल का सुधार आने की संभावना है। ............  आर एस राणा