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30 March 2015

उत्तर प्रदेष में 31 चीनी मिलें कर चुकी है गन्ने की पेराई बंद


आर एस राणा
नई दिल्ली। चीनी की कीमतें कम होने के कारण मिलें समय से पहले ही पेराई बंद करने लगी है। उत्तर प्रदेष में चालू गन्ना पेराई सीजन-2014-15 (अक्टूबर से सितंबर) में अभी तक 31 चीनी मिलें पेराई बंद कर चुकी है जबकि अभी इन क्षेत्रों में गन्ना काफी मात्रा में खड़ा हुआ है। इसका असर गन्ना किसानों पर पड़ रहा है, मिलें बंद होने की स्थिति में किसानों को कोल्हू संचालकों को कम कीमत पर गन्ना बेचने की मजबूरी बन गई है।
यूपी षुगर मिल्स एसोसिषन (यूपीएसएमए) के एक वरिश्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू सीजन में चीनी के दाम एक्स पैक्ट्ी घटकर 2,450 से 2,550 रूपये प्रति क्विंटल रह गए है जिससे चीनी मिलों को घाटा उठाना पड़ रहा है। इसलिए राज्य में चीनी मिलें समय से पहले ही पेराई बंद कर रही है। राज्य में अभी तक 31 चीनी मिलें पेराई बंद कर चुकी हैं। बंद हो चुकी मिलों में मध्य यूपी की 15 मिलें, ईस्ट यूपी की 13 और वेस्ट यूपी की 3 मिलों में पेराई बंद हो चुकी है। चालू सीजन में राज्य में 118 चीनी मिलों में पेराई चल रही थी। सहारनपुर के चीनी के थोक कारोबारी संजय गुप्ता ने बताया कि जिन क्षेत्रों में चीनी मिलों ने गन्ने की पेराई बंद की है वहां अभी काफी मात्रा में गन्ना बचा हुआ है। मिलें बंद होने से किसान गन्ने की बिकवाली कोल्हू संचालकों को कम भाव पर करने को मजबूर है।
यूपीएसएमए के अनुसार गन्ने में रिकवरी की दर ज्यादा आने से चालू सीजन में राज्य में 61.17 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 55.31 लाख टन से 10.60 फीसदी ज्यादा है। चालू पेराई सीजन में गन्ने में औसतन 9.47 फीसदी की रिकवरी आ रही है जबकि पिछले पेराई सीजन में 9.18 फीसदी की रिकवरी की दर आई थी।
उत्तर प्रदेष की चीनी मिलों पर चालू पेराई सीजन में किसानों का 5,467.10 करोड़ रूप्ये का बकाया हो चुका है। चीनी के दाम कम होने के कारण बकाया की राषि आगामी दिनों में और भी बढ़ने की आषंका है।....आर एस राणा

कमोडिटी बाजारः क्रूड में गिरावट, क्या करें

कच्चे तेल में आज भारी गिरावट आई है। एमसीएक्स पर कच्चा तेल 4 फीसदी फिसलकर 3030 रुपये के नीचे आ गया है। दरअसल अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड में गिरावट बढ़ गई है। नायमैक्स पर भाव करीब 1.5 फीसदी गिरकर 48 डॉलर तक आ गया है। वहीं ब्रेंट 56 डॉलर के भी नीचे का स्तर छू चुका है। न्युक्लियर प्रोग्राम को लेकर दुनिया के छे बड़ी शक्तिओं और ईरान के बीच गतिरोध खत्म होने की उम्मीद से क्रूड पर दबाव बढ़ गया है। माना ये जा रहा है कि ऐसे में क्रूड की सप्लाई बढ़ सकती है।

सोने और चांदी में भी गिरावट बढ़ गई है। घरेलू बाजार में सोना 0.5 फीसदी की कमजोरी के साथ 26400 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा है। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना 1195 डॉलर के नीचे है। चांदी में सोने से ज्यादा गिरावट आई है। एमसीएक्स पर चांदी 1 फीसदी से ज्यादा टूटकर 38000 रुपये के नीचे आ गई है। दरअसल फेड चेयरमैन ने इस साल के अंत से अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का संकेत दिया है, ऐसे में डॉलर मजबूत हुआ है।

बेस मेटल्स में भी गिरावट देखने को मिली है, लेकिन कॉपर में थोड़ी रिकवरी आई है। फिलहाल एमसीएक्स पर कॉपर 0.1 फीसदी की मामूली बढ़त के साथ 385 रुपये के ऊपर कारोबार कर रहा है। हालांकि निकेल 0.6 फीसदी की कमजोरी के साथ 825 रुपये पर आ गया है। एल्युमिनियम की चाल सपाट है, तो लेड में 0.25 फीसदी और जिंक में 0.3 फीसदी की कमजोरी आई है।

हल्दी में तेज गिरावट आई है। एनसीडीईएक्स पर हल्दी 0.3 फीसदी की कमजोरी के साथ 7550 रुपये पर आ गया है। दरअसल पिछले हफ्ते हाजिर में हल्दी की जोरदार आवक हुई थी। एरोड में आवक की आधी हल्दी ही बिक सकी है। इस पूरे हफ्ते के दौरान तमिलनाडू की मंडियां बंद रहेंगी।

मेंथा तेल की शुरुआती गिरावट कम हो गई है। शुरुआती कारोबार में मेंथा तेल का दाम 810 रुपये तक गिर गया था। हालांकि, फिलहाल एमसीएक्स पर मेंथा तेल 0.3 फीसदी की कमजोरी के साथ 816 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा है। दरअसल इस साल मेंथा की बुआई में कमी का अनुमान है जिससे दबाव दिख रहा है।

निर्मल बंग कमोडिटीज की निवेश सलाह

सोना एमसीएक्स (अप्रैल वायदा) : बेचें - 26480, स्टॉपलॉस - 26590 और लक्ष्य - 26200

कॉपर एमसीएक्स (अप्रैल वायदा) : बेचें - 385.5, स्टॉपलॉस - 387.5 और लक्ष्य - 379

इंडियानिवेश कमोडिटीज की निवेश सलाह

मेंथा तेल एमसीएक्स (मई वायदा) : खरीदें - 812, स्टॉपलॉस - 804 और लक्ष्य - 828... स्रोत : CNBC-Awaaz

राज्य कृषि जिंसों की खरीद के लिए ई-नीलामी को दें वरीयता : केंद्र

केंद्र सरकार की योजना है कि देश की हजारों मंडियों (एपीएमसी) को जोड़कर कृषि उपजों का एक राष्ट्रीय साझा बाजार बनाए जाए। इसके लिए पहली पहल करते हुए केंद्र ने राज्यों को लिखा है कि कृषि जिंसों की खरीद के लिए, जहां तक संभव हो, ई-नीलामी को वरीयता दी जाए।
इस पहल की शुरुआत बजट के कुछ दिनों पहले की गई थी। यह कृषि जिंसों के लिए एक साझा बाजार बनाने की योजना का हिस्सा है, जिसमें कृषि उपज विपणन समितियों (एपीएमसी) द्वारा संचालित सभी थोक मंडियों को जोड़ा जाएगा। वर्ष 2014-15 के आर्थिक आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2,777 प्रमुख मंडियां हैं और इन मंडियों के नियंत्रण वाली उप-मंडियों की संख्या 4,843 है। केंद्र सरकार की योजना एक बाजार बनाने के लिए इन मंडियों को जोडऩे की है, क्योंकि इस समय किसान के लिए इन मंडियों को बिक्री करना जरूरी है और मंडियों द्वारा 10 से 14 फीसदी तक शुल्क वसूला जाता है।
इस परियोजना के लिए माना जा रहा है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम करेगी, क्योंकि राज्यों के एपीएमसी अधिनियम में संशोधन और निजी मंडियों और बाजारों की स्थापना की खातिर रास्ता साफ करने के लिए केंद्र और राज्यों में सहयोग आवश्यक होगा। कुछ राज्यों ने फलों एवं सब्जियों को एपीएमसी अधिनियम से बाहर कर दिया है। हालांकि यह काफी नहीं है और इसलिए राज्यों से ई-नीलामी को अपनाने का सुझाव दिया गया है। 6-7 राज्य पहले ही सार्वजनिक वितरण के लिए चीनी की खरीद एनसीडीईएक्स ई-मार्केट द्वारा मुहैया कराई गई ई-नीलामी सुविधाओं के जरिये करने लगे हैं। एनसीडीईएक्स ई-मार्केट प्रमुख कृषि केंद्रित एक्सचेंज एनसीडीईएक्स की सब्सिडियरी है।
केंद्र ने एनसीडीईएक्स के मंडी आधुनिकीकरण कार्यक्रम की प्रशंसा की है। इस कार्यक्रम के तहत कर्नाटक की सभी एपीएमसी को इलेक्ट्रॉनिक रूप से जोड़ दिया गया है और किसानों को इस साझा प्लेटफॉर्म पर कारोबार होने वाली जिंसों की एक राज्य कीमत मिलती है। किसान ज्यादा कीमत देने वाले को अपनी उपज बेच सकते हैं। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि कर्नाटक में 155 मुख्य मंडियों में से 51 को और 354 उप-मंडियों को जोड़ दिया गया है। राज्य सरकार और एनसीडीईएक्स स्पॉट एक्सचेंज द्वारा बनाया गया एक संयुक्त उपक्रम राष्ट्रीय ई-मार्केट सर्विसेज लिमिटेड (आरईएमएस) स्वचालित नीलामी और इसके बाद की सुविधाएं (वजन, इनवॉइस बनाना, बाजार फीस संग्रहण, अकाउंटिंग) और बाजारो में जांच-परख सुविधाएं मुहैया कराता है। इसके अलावा यह गोदाम आधारित उपज की बिक्री, जिंसों के लिए वित्त पोषण और तकनीक के आधार कीमत मुहैया कराने में मदद करता है।
एनसीडीईएक्स मंडी आधुनिकीकरण कार्यक्रम (एमएमपी) और संयुक्त बाजार प्लेटफॉर्म को लागू करता है। एमएमपी कार्यक्रम मंडीवार लागू किया जाता है, जबकि यूएमपी के तहत एक कारोबार के लिए राज्य में सभी मंडियों को जोड़ा जाता है। हालांकि यूएमपी राज्य लाइसेंस के तहत लागू किया जाता है, लेकिन केंद्र सरकार की योजना देश में सभी एपीएमसी को संयुक्त करना है। एनसीडीईएक्स ने कर्नाटक के अलावा तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में मंडियों का एकीकरण करना शुरू कर दिया है और पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश सहित बहुत से प्रमुख राज्य एनसीडीईएक्स ई-मार्केट लिमिटेड (एनईएमएल) के साथ बातचीत कर रहे हैं।
एनसीडीईएक्स ने विभिन्न कृषि जिंसों में फॉरवर्ड ट्रेडिंग शुरू की है, जिनमें अरंडी, जीरा, मक्का और चीनी का कारोबार हो रहा है। (BS Hindi)

जल्द खराब होने वाली जिंसों के लिए विशेष जिंस बाजार '

घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्याज और सब्जियों जैसी जल्द खराब होने वाली जिंसों की खातिर संभावनाएं विकसित करने के लिए मंत्रालय ने विशेष जिंस बाजार स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है, जिनमें जल्द खराब होने वाली सब्जियों के लिए प्रसंस्करण इकाइयां लगी होंगी। इन जिंस बाजारों का विकास राज्य एपीएमसी करेंगी, जिन्हें कृषि मंत्रालय विशेष प्रोत्साहन एवं सब्सिडी मुहैया कराएगा।
प्याज एवं लहसुन बाजार विकसित करने की पृष्ठभूमि में यह बातचीत महाराष्ट्र, केंद्र सरकार और राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एïवं विकास प्रतिष्ठान के बीच हुई है। अधिकारियों का यह मानना है कि केवल कच्चे प्याज के उत्पादन और निर्यात पर निर्भरता और इसका मूल्य संवर्धन या प्रसंस्करण नहीं करने से किसानों और कारोबारियों को फायदा नहीं मिल रहा है। इस जिंस का पूरा कारोबारी मॉडल जलवायु की स्थितियों पर निर्भर है। अगर जल्द खराब होने वाली जिंसों को प्रसंस्कृत जिंसों में बदला जाए तो  यह न केवल किसानों और कारोबारियों के लिए बल्कि भारत और विदेशी उपभोक्ताओं के लिए भी फायदेमंद होगा। इसमें निर्यात की भारी संभावनाएं पैदा होंगी और ये जिंस सभी सीजनों में उपलब्ध होंगी। इसके अलावा कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) से प्याज का न्यूनतम समर्थन मूल्य सुझाने का प्रस्ताव रखा गया है, ताकि किसानों को होने वाले नुकसान पर नियंत्रण लगाया जा सके। वहीं प्याज के लिए निर्यात नीति भी तय करने का प्रस्ताव है। मंत्रालय विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के समक्ष यह प्रस्ताव रख सकता है कि वह प्याज के मुक्त निर्यात को मंजूरी दे और निर्यात के लिए निर्यातक एजेंसियों की जरूरत समाप्त करे। अधिकारियों के मुताबिक निर्यात नीति को प्याज निर्यात पर समय-समय पर रोक लगाने, एमईपी तय करने और इसे समय-समय पर बदलने जैसे प्रावधानों से मुक्त रखा जाना चाहिए। एपीएमसी की मदद से जल्द खराब होने वाली जिंसों के लिए प्रसंस्करण इकाइयां लगाने के प्रस्ताव की परीक्षण के तौर पर प्याज से शुरुआत हो सकती है। इसके बाद अन्य जिंसों जैसे मिर्च, शिमला मिर्च और लहसुन आदि के लिए प्रसंस्करण इकाइयां लगाई जा सकती है।
केंद्र सरकार ने जल्द खराब होने वाली सब्जियों के प्रसंस्करण की खातिर प्रसंस्करण इकाइयां लगाने के लिए सब्सिडी देने की संभावना पर विचार करने पर सहमति जताई है। जल्द खराब होने वाली जिंसों के ठीक बने रहने की अवधि बढ़ाने के लिए मंत्रालय इरैडिटेशन तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दे रहा है। इस तकनीक का इस्तेमाल सबसे पहले प्याज में किया जाएगा।  इरैडिटेशन एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें खाद्य सामग्री को ऊर्जा के एक स्रोत के संपर्क में लाया जाता है, जिसे खाद्य सामग्री संरक्षित रह सके। इससे खाद्य सामग्री से होने वाली बीमारी का जोखिम घटता है, तेजी से फैलने वाले कीटों के प्रसार पर रोक लगती है और खाद्य सामग्री में अंकुरण या पकाव देरी से होता है। यह प्रकाश रेडियोएक्टिव पदार्थ से निकला जा सकता है या बिजली के रूप में पैदा किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इरैडिटेशन से खाद्य पदार्थ रेडियोएक्टिव नहीं बनता है और खाद्य सामग्री के इरैडिटेशन को 60 देशों में मंजूरी मिली हुई है। पूरे विश्व में हर साल करीब 5 लाख टन खाद्य सामग्री का प्रसंस्करण होता है। भारत में लासलगांव में इरैडिटेशन संयंत्र हैं, जिसका इस्तेमाल इसके लिए किया जा सकता है। दरअसल मंत्रालय ने विभिन्न जगहों पर किसानों के खेतों में बड़े पैमाने पर की जाने वाली प्रदर्शनियों के लिए सब्सिडी मुहैया कराने पर सहमति जताई है, ताकि इरेडिएट किए हुए और बिना किए हुए प्याज में नुकसान का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सके। अधिकारियों के मुताबिक यह परियोजना आगामी खरीफ सीजन के अंत में और रबी सीजन में शुरू हो सकती है। (BS Hindi)

डेयरियों के मार्जिन पर दबाव

निर्यात मांग में सुस्ती के कारण दूध की कीमतों में स्थिरता बने रहने से डेयरी कंपनियों के मार्जिन पर दबाव पडऩे का अनुमान है। गर्मियों के महीनों में रहने वाली सुस्ती के कारण किसान खरीद मूल्य में 3 से 4 फीसदी की गिरावट की उम्मीद कर रहे हैं। गर्मियों में आम तौर पर उत्पादन में कमी देखने को मिलती है।
देश भर की डेयरियों का दावा है कि फिलहाल किसानों को दी जाने वाली कीमतों में बढ़ोतरी की कोई खास संभावना नहीं है, क्योंकि बीते साल की तुलना में इस साल मार्जिन 30-40 फीसदी नीचे चल रहा है।
दिल्ली की स्टर्लिंग ऐग्रो के प्रबंध निदेशक कुलदीप सलूजा ने कहा, 'उत्तरी पट्टी में कुछ डेयरियों के मार्जिन में 40 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिली है। निर्यात अनुमान को देखते हुए स्टर्लिंग एग्रो का मार्जिन इस वित्त वर्ष के दौरान 30 फीसदी तक गिरा है, जिसके अगले छह महीनों के दौरान बढ़ोतरी की उम्मीद कम है। मार्जिन में बढ़ोतरी के लिए भारतीय डेयरियों के लिए यह सबसे खराब साल रहने जा रहा है।'
रेटिंग कंपनी इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के मुताबिक डेयरी कंपनियां बीते पांच साल से लगभग स्थिर 5 से 8 फीसदी के मार्जिन के साथ परिचालन कर रही हैं। रेटिंग कंपनी ने एक रिपोर्ट में कहा, 'मुख्य रूप से दूध का कारोबार करने वाली कंपनियों की तुलना में मूल्य वर्धित दुग्ध उत्पादों के क्षेत्र में परिचालन करने वाली कंपनियां बेहतर स्थिति में हैं।' हात्सुन एग्रो के प्रबंध निदेशक आर जी चंद्रमोगन भी स्वीकार करते हैं कि मार्जिन पर खासा दबाव है और वित्त वर्ष 15 में बमुश्किल ही मुनाफा हुआ है। कम मुनाफे के पीछे वजह कच्चे माल की लागत है, जिसका एक डेयरी के कुल खर्च में 70-80 फीसदी योगदान होता है और किसानों के लिए हाल के वर्षों में खरीद मूल्य में खासा इजाफा हुआ है, जिसका मार्जिन पर खासा असर पड़ा है। गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (जीसीएमएमएफ) जिसके पास अमूल ब्रांड का स्वामित्व है, के प्रबंध निदेशक आर एस सोढी ने कहा कि दुग्ध सहकारी संगठन मार्जिन के सिद्धांत पर काम नहीं करते हैं, क्योंकि ऊंची कीमतों का लाभ उत्पादकों तक पहुंचाया जाता है। हालांकि सोढी मानते हैं कि इस साल खरीद मूल्य में 3-4 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी की संभावना नहीं है, क्योंकि उत्पादन स्थिर बना हुआ है। इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट में भी कहा गया, 'दुग्ध सहकारी संस्थाएं किसानों को अधिक से अधिक फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से काम करती हैं। हमें उम्मीद है कि सहकारी संगठन वित्त वर्ष 16 में भी 5 फीसदी से कम (कर मार्जिन बाद मुनाफा) मार्जिन दर्ज करती रहेंगी।' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में कमजोरी के चलते निर्यात में बढ़ोतरी की उम्मीद काफी कम है और डेयरियों के पास कम से कम 50,000 टन स्किम्ड मिल्क पाउडर का भंडार मौजूद है।
जीसीएमएमएफ डेयरियों के फैट की कीमत लगभग 550 रुपये प्रति किलोग्राम है और उत्तर भारत में भैंस के दूध की कीमत 34 रुपये प्रति किलोग्राम और गाय के दूध की कीमत 29 रुपये प्रति किलोग्राम है।
कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (नंदिनी ब्रांड) और राजस्थान कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (सारस ब्रांड) के अधिकारियों ने कहा कि अभी तक उत्पादन अच्छा रहा है।इंडिया रेटिंग्स को डेयरी क्षेत्र का आकार सालाना आधार पर 15.6 फीसदी की बढ़ोतरी की उम्मीद है। वित्त वर्ष 14 में उत्पादन 13.8 करोड़ टन रहा था और वित्त वर्ष 16 में इसके 15.1 करोड़ टन रहने का अनुमान है।
देश में लगभग 7 करोड़ ग्रामीण परिवार दुग्ध उत्पादन से जुड़े हुए हैं। ये परिवार दूध की लगभग 45 फीसदी पैदावार की खपत खुद ही करते हैं। बाकी 55 फीसदी में से 34.5 फीसदी शहरी बाजार में खुले रूप में बेचा जाता है और शेष दूध प्रसंस्कृत उत्पाद बनाने के काम आता है। सिर्फ 25 फीसदी दूध और दुग्ध उत्पाद भारतीय बाजारों में बेचे जाते हैं। BS Hindi

मानसून सामान्य रहने की उम्मीद से ग्वार और ग्वार गम में तेजी के आसार कम


जुन-जुलाई में ग्वार गम पाउडर का निर्यात बढ़ने की संभावना
आर एस राणा
नई दिल्ली। चालू सीजन में ग्वार और ग्वार गम की कीमतों न्यूनतम स्तर पर चल रही है तथा चालू खरीफ में मानसून सामान्य रहने की संभावना जताई जा रही है। षनिवार को जोधपुर में ग्वार के भाव 3,700 से 3,800 रूपये और ग्वार गम के भाव 8,600 रूपये प्रति क्विंटल रहे। चालू वित्त वर्श में मात्रा के हिसाब से तो ग्वार गम पाउडर के निर्यात में तेजी आई है लेकिन मूल्य के हिसाब से गिरावट आई है। जून-जुलाई में ग्वार उत्पादों की निर्यात मांग तो बढ़ेगी, जिससे मौजूदा कीमतों में सुधार तो आने का अनुमान है लेकिन भारी तेजी की संभावना नहीं है।
टकूराम गम एंड केमिकल प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर विपिन अग्रवाल ने बताया कि इस समय विष्व बाजार से ग्वार उत्पादों की मांग काफी कमजोर है जबकि प्लांटों के साथ ही स्टॉकिस्टों के पास ग्वार का स्टॉक पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। घरेलू मंडियों में जैसे ही ग्वार की कीमतों में 100-200 रूपये प्रति क्विंटल की तेजी आती है, ग्वार सीड की दैनिक आवक मंडियों में बढ़ जाती है जिससे तेजी स्थिर नहीं रह पाती। चालू खरीफ में मानसून सामान्य रहने का अनुमान है ऐसे में नए सीजन में ग्वार सीड की बुवाई अच्छी रहेगी। उधर जून-जुलाई के बाद विष्व बाजार से ग्वार उत्पादों की आयात मांग बढ़ेगी, जिससे भाव में सुधार आने का ही अनुमान है। उन्होंने बताया इस समय ग्वार गम पाडर की कीमतें 1,400 डॉलर प्रति टन चल रही हैं।
एपीडा के एक वरिश्ठ अधिकारी ने बताया कि चालू वित वर्श 2014-15 के पहले दस महीनों (अप्रैल से जनवरी) के दौरान ग्वार गम के निर्यात में 25 फीसदी की बढ़ोतरी होकर कुल 6 लाख टन का निर्यात हो चुका है जबकि जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.80 लाख टन का हुआ था। वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार मूल्य के हिसाब से चालू वित वर्श के पहले नो महीनों में ग्वार गम के निर्यात में 12.44 फीसदी की कमी आकर 8,765.69 करोड़ रूपये मूल्य का निर्यात हुआ है जबकि पिछले वित वर्श की समान अवधि में 10,010.97 करोड़ रूपये मूल्य का ग्वार गम का निर्यात हुआ था।
हरियाणा ग्वार गम एंड केमिकल के डायरेक्टर सुरेंद्र सिंघल ने बताया कि क्रूड तेल के दाम नीचे ही बने हुए है जिसकी वजह से विष्व बाजार से आयात मांग कम आ रही है। उन्होंने बताया कि मई के बाद निर्यात मांग बढ़ने का अनुमान है तथा तब तक स्टॉक भी कम जो जायेगा, जिससे मौजूदा भाव में सुधार आने का अनुमान है।....आर एस राणा

27 March 2015

Castor Oil Demand May Increase By 15 % In 2015



Indication of higher demand for castor oil started  emerging on ground level with increased enquiry from major importers like China,EU and US.More dip in seed price is unlikely and seed market is expected to stablize around Rs 3350 to Rs 3500 per qtl,despite expectation of higher arrivals.Notably, oil export decreased by 7.22 percent from 4.60 to 4.29 lakh tonne in 2014 ownig to higher prices and sluggish demand from overseas buyers.
 
Market experts have started pridicting considerable rise in castor oil export this year.It may increase by 15 percent from 4.29 lakh tonne to over 5 lakh tonne in 2015.Castor oil and its derivatives have many applications inagriculture, cosmetics, electronics & telecommunications, food, lubricants, paints, inks and adhesives, paper, perfumeries, pharmaceuticals, plastics and rubber and textile chemicals.
 
As crop size is slightly higher(2 lakh tonne) than last year,seed may get support at price front in the second half of the year.Total availability of seed including carryout  would be around 19 lakh tonne this year while consumption is expected at 14 lakh tonne for next year.On paper it looks comfortable right now.However,stock holding would create short supply like condition June onward.So price would follow the similar trend we have witnessed last year.The bottom side would be Rs 3300-3400 while the top level might be 4500/4600 by the end of October -Nov.2015. 
 
Market expert says that China has covered 85 percent of its annual need(1.8 lakh tonne),EU and US too have covered 80 percent of their need so far.EU and US annual need is expected to be 1.20 and 0.60 lakh tonne respectivey. Demand from other countries  is likely to improve in the month of April as buyers are waiting for higher arrivals.Farmers are receiving  much lower price and if the similar trend continues that may reduce their castor acreage this year starting from July. ...agriwatch