बिजनेस भास्कर नई द
घरेलू बाजार में नेचुरल रबर का कुल स्टॉक कम होने से आ रही है तेजीपिछले पंद्रह दिनों में नेचुरल रबर की कीमतों में 6.8 फीसदी की तेजीअंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमतें सप्ताह भर में 3.4 फीसदी बढ़ीटायर उद्योग की मांग बढऩे से नेचुरल रबर की कीमतों में तेजी बननी शुरू हो गई है। पिछले पंद्रह दिनों में इसकी कीमतों में 6.8 फीसदी की तेजी आ चुकी है। गुरुवार को कोट्टायम में नेचुरल रबर का भाव बढ़कर 200 से 204 रुपये प्रति किलो हो गया। उधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में नेचुरल रबर की कीमतें सप्ताह भर में 3.4 फीसदी तेज हुई है।
दिसंबर के बाद नेचुरल रबर के उत्पादन का लीन सीजन शुरू हो जायेगा जिससे दाम और भी बढऩे की संभावना है। हरिसंस मलयालम लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर पंकज कपूर ने बताया कि टायर निर्माताओं की मांग बढऩे से नेचुरल रबर की कीमतों में तेजी बननी शुरू हो गई है।
24 नवंबर को कोट्टायम में नेचुरल रबर का भाव 193-196 रुपये प्रति किलो था जबकि गुरुवार को भाव बढ़कर 200-204 रुपये प्रति किलो हो गया। उधर अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी इसकी कीमतें सप्ताह भर में करीब छह रुपये प्रति किलो बढ़ी है। ऐसे में आयात पड़ता भी महंगा हो गया है जिससे घरेलू बाजार में नेचुरल रबर की मौजूदा कीमतों में तेजी को बल मिल रहा है।
ऑल इंडिया रबर इंडस्ट्रीज एसोसिएशन के चेयरमैन एम एल गुप्ता ने बताया कि जनवरी के बाद नेचुरल रबर के उत्पादन का लीन सीजन शुरू हो जायेगा। तथा घरेलू बाजार में नेचुरल रबर का कुल स्टॉक कम है। रबर बोर्ड के अनुसार 31 अक्टूबर को घरेलू बाजार में नेचुरल रबर का कुल स्टॉक 247,000 टन का है जबकि पिछले साल पहली अक्टूबर को 253,877 टन का स्टॉक था।
उधर बैंकाक में नेचुरल रबर का भाव बढ़कर गुरुवार को 181 रुपये प्रति किलो (भारतीय मुद्रा में) जो गया जबकि दो दिसंबर को इसका भाव 175 रुपये प्रति किलो था। भारतीय रबर बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2011-12 की पहले सात महीनों अप्रैल से अक्टूबर के दौरान नेचुरल रबर का उत्पादन बढ़कर 4.80 लाख टन का हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.57 लाख टन का उत्पादन हुआ है। इस दौरान खपत में हल्की बढ़ोतरी हुई है। (Business Bhaskar....R S Rana)
10 दिसंबर 2011
महंगे गन्ने से चीनी मिलों को 220 करोड़ रुपये का नुकसान
मुंबई December 09, 2011
उत्पादन लागत और चीनी की मौजूदा एक्स-फैक्ट्री बिक्री कीमत के बीच बढ़ते अंतर से चीनी उत्पादन के मामले में दूसरे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों को इस सीजन में 220 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महासचिव अविनाश वर्मा ने कहा - राज्य प्रशासित कीमत (सैप) में संशोधन के बाद मौजूदा समय में चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमत 30.5 रुपये प्रति किलोग्राम है जबकि लागत 33 रुपये प्रति किलोग्राम। ऐसे में चीनी उत्पादन के हर किलोग्राम पर मिलों को 2.5 रुपये का नुकसान हो रहा है।103 लाख टन गन्ने की पेराई के बाद उत्तर प्रदेश में मिलों का कुल उत्पादन 8.5 लाख टन रहा है। इस सीजन में रिकवरी की औसत दर 8.2 फीसदी रही है। वर्मा ने कहा - नुकसान की एकमात्र वजह सैप में हुई भारी बढ़ोतरी है। उन्होंने कहा कि गन्ने की पेराई के साथ ही राज्य की चीनी मिलों की वित्तीय हालत खराब होती जा रही है। इस स्थिति में उद्योग बिना वित्तीय समर्थन के लंबी अवधि तक मिलों का संचालन नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि चीनी मिलों के हितों की रक्षा के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की दरकार है।चीनी उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा 18 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से लेवी कोटा में देने के चलते उनका नुकसान बढ़ रहा है। चीनी की यह कीमत उत्पादन लागत की करीब आधी है।इस साल भी सरकार ने सैप में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी की है, इसके परिणामस्वरूप बीमार चीनी मिलों पर वित्तीय बोझ काफी ज्यादा बढ़ा है। सामान्य किस्म के गन्ने की राज्य प्रशासित कीमत में 35 रुपये की बढ़ोतरी की गई है और यह 240 रुपये पर पहुंच गया है। राज्य में गन्ने के कुल उत्पादन में इस किस्म की हिस्सेदारी 60 फीसदी से ज्यादा है। गन्ने की अगैती किस्म और अस्वीकार की गई गन्ने की किस्म का उत्पादन 20-20 फीसदी है। अस्वीकार की गई गन्ने की किस्म भी इस साल 235 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है, जो पिछले साल के मुकाबले 35 रुपये ज्यादा है। वहीं अगैती किस्म के गन्ने की लागत इस साल 240 रुपये प्रति क्विंटल है, जो पिछले साल के मुकाबले 40 रुपये ज्यादा है।वर्मा ने कहा - गन्ने की कीमत में भारी बढ़ोतरी और अन्य लागत में हुई सामान्य बढ़ोतरी से इस साल उत्तर प्रदेश में उत्पादन लागत 33-34 रुपये प्रति किलोग्राम रहने का अनुमान है, वहीं महाराषष्ट्र में यह 29-30 रुपये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है। ऐसे में इन स्तरों पर एक्स-मिल कीमतों को स्थिर करने की अनुमति सरकार को देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे कम पर मिलों को नुकसान होगा और जनवरी 2012 में गन्ने की बकाया राशि में बढ़ोतरी हो जाएगी।इस्मा के मुताबिक, इस साल 30 नवंबर तक करीब 350 मिलें संचालित थीं, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 355 मिलों का संचालन हो रहा था। 30 नवंबर तक उत्तर प्रदेश ने चीनी उत्पादन में भारी उछाल दर्ज की है और यह 5.30 लाख टन पर पहुंच गया है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1.83 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था क्योंकि राज्य में पेराई तेजी से शुरू हुई है।उद्योग के एक अधिकारी ने कहा - अगर मिलों को मौजूदा कीमत पर गन्ने की पेराई के लिए बाध्य किया जाता है तो उनकी कार्यशील पूंजी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी और इसमें महज दो महीने का वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि किसानों का गन्ना बकाया इस साल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगा।इस बीच, उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों द्वारा दायर याचिका की सुनवाई अब 13 दिसंबर को होगी। (BS Hindi)
उत्पादन लागत और चीनी की मौजूदा एक्स-फैक्ट्री बिक्री कीमत के बीच बढ़ते अंतर से चीनी उत्पादन के मामले में दूसरे सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों को इस सीजन में 220 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महासचिव अविनाश वर्मा ने कहा - राज्य प्रशासित कीमत (सैप) में संशोधन के बाद मौजूदा समय में चीनी की एक्स-फैक्ट्री कीमत 30.5 रुपये प्रति किलोग्राम है जबकि लागत 33 रुपये प्रति किलोग्राम। ऐसे में चीनी उत्पादन के हर किलोग्राम पर मिलों को 2.5 रुपये का नुकसान हो रहा है।103 लाख टन गन्ने की पेराई के बाद उत्तर प्रदेश में मिलों का कुल उत्पादन 8.5 लाख टन रहा है। इस सीजन में रिकवरी की औसत दर 8.2 फीसदी रही है। वर्मा ने कहा - नुकसान की एकमात्र वजह सैप में हुई भारी बढ़ोतरी है। उन्होंने कहा कि गन्ने की पेराई के साथ ही राज्य की चीनी मिलों की वित्तीय हालत खराब होती जा रही है। इस स्थिति में उद्योग बिना वित्तीय समर्थन के लंबी अवधि तक मिलों का संचालन नहीं कर पाएगा। उन्होंने कहा कि चीनी मिलों के हितों की रक्षा के लिए नीतिगत हस्तक्षेप की दरकार है।चीनी उत्पादन का 10 फीसदी हिस्सा 18 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से लेवी कोटा में देने के चलते उनका नुकसान बढ़ रहा है। चीनी की यह कीमत उत्पादन लागत की करीब आधी है।इस साल भी सरकार ने सैप में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी की है, इसके परिणामस्वरूप बीमार चीनी मिलों पर वित्तीय बोझ काफी ज्यादा बढ़ा है। सामान्य किस्म के गन्ने की राज्य प्रशासित कीमत में 35 रुपये की बढ़ोतरी की गई है और यह 240 रुपये पर पहुंच गया है। राज्य में गन्ने के कुल उत्पादन में इस किस्म की हिस्सेदारी 60 फीसदी से ज्यादा है। गन्ने की अगैती किस्म और अस्वीकार की गई गन्ने की किस्म का उत्पादन 20-20 फीसदी है। अस्वीकार की गई गन्ने की किस्म भी इस साल 235 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है, जो पिछले साल के मुकाबले 35 रुपये ज्यादा है। वहीं अगैती किस्म के गन्ने की लागत इस साल 240 रुपये प्रति क्विंटल है, जो पिछले साल के मुकाबले 40 रुपये ज्यादा है।वर्मा ने कहा - गन्ने की कीमत में भारी बढ़ोतरी और अन्य लागत में हुई सामान्य बढ़ोतरी से इस साल उत्तर प्रदेश में उत्पादन लागत 33-34 रुपये प्रति किलोग्राम रहने का अनुमान है, वहीं महाराषष्ट्र में यह 29-30 रुपये प्रति किलोग्राम रहने की संभावना है। ऐसे में इन स्तरों पर एक्स-मिल कीमतों को स्थिर करने की अनुमति सरकार को देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे कम पर मिलों को नुकसान होगा और जनवरी 2012 में गन्ने की बकाया राशि में बढ़ोतरी हो जाएगी।इस्मा के मुताबिक, इस साल 30 नवंबर तक करीब 350 मिलें संचालित थीं, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 355 मिलों का संचालन हो रहा था। 30 नवंबर तक उत्तर प्रदेश ने चीनी उत्पादन में भारी उछाल दर्ज की है और यह 5.30 लाख टन पर पहुंच गया है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 1.83 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था क्योंकि राज्य में पेराई तेजी से शुरू हुई है।उद्योग के एक अधिकारी ने कहा - अगर मिलों को मौजूदा कीमत पर गन्ने की पेराई के लिए बाध्य किया जाता है तो उनकी कार्यशील पूंजी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी और इसमें महज दो महीने का वक्त लगेगा। उन्होंने कहा कि किसानों का गन्ना बकाया इस साल रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगा।इस बीच, उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों द्वारा दायर याचिका की सुनवाई अब 13 दिसंबर को होगी। (BS Hindi)
07 दिसंबर 2011
एफएमसी को स्वतंत्र करने में देरी होगी
आर.एस. राणा नई दिल्ल
वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को स्वतंत्र नियामक बनने में अभी और भी देरी होने की संभावना है। क्योंकि संसदीय समिति ने उपभोक्ता मामले मंत्रालय को वायदा अनुबंध (विनियमन) अधिनियम, 1952 (एफसीआरए) पर राज्य सरकारों से भी सलाह लेने के लिए कहा गया है। स्वतंत्र नियामक बनने के बाद एफएमसी को भी वायदा बाजार के बाबत उसी तरह का अधिकार मिल जायेगा, जैसा कि पूंजी बाजार के लिए सेबी को मिला हुआ है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि संसदीय समिति ने एफसीआरए पर राज्य सरकारों से भी सलाह लेने के लिए कहा है। खाद्य उपभोक्ता मामले और जन वितरण पर संसदीय स्थाई समिति ने एफएमसी और कमोडिटी एक्सचेंजों के अधिकारियों से बातचीत के बाद यह निर्णय लिया है।
ऐसे में एफएमसी को स्वायत्तता के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने में और भी देरी होने की संभावना है। एफसीआरए का मसौदा संसदीय समिति के पास पहले ही काफी लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है। इस संदर्भ में पहला विधेयक लोकसभा में मार्च 2006 में रखा गया था जिसे स्थाई समिति को भेज दिया गया था।
उन्होंने बताया कि वर्तमान एफसीआरए में कुछ मूलभूत कमियां हैं जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है जिससे यह और सरल हो जाए। वर्तमान में ऑप्शन और डेरिवेटिव्स जैसे हैजिंग के उत्पाद उपलब्ध नहीं है। ऐसे में किसान जोखिम के समय हैजिंग का लाभ नहीं उठा पाते। इसके अलावा कमोडिटी वायदा कारोबार में वित्तीय संस्थानों को अनुमति नहीं दी गई है।
एफएमसी के अधिकार भी कई मामलों में सीमित है और कई बातों के लिए उसे सरकार पर निर्भर रहना होता है। वर्तमान अधिनियम के तहत एफएमसी को वित्तीय और दैनिक परिचालन के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहना होता है।
उन्होंने बताया कि बाजार के वर्तमान आकार और तेज विकास को देखते हुए कमोडिटी वायदा कारोबार को एक स्वतंत्र और मजबूत नियामक की आवश्यकता है। एफएमसी को कारोबारियों के गलत व्यापार पर पेनल्टी लगाने और उसकी जांच करने का अधिकार मिलना चाहिए। कमोडिटी वायदा कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए एफएमसी को वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए ताकि इसके दायरे का विस्तार हो सके और इसे सभी वर्गों तक पहुंचाया जा सके।(Business Bhaskar....R S Rana)
वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को स्वतंत्र नियामक बनने में अभी और भी देरी होने की संभावना है। क्योंकि संसदीय समिति ने उपभोक्ता मामले मंत्रालय को वायदा अनुबंध (विनियमन) अधिनियम, 1952 (एफसीआरए) पर राज्य सरकारों से भी सलाह लेने के लिए कहा गया है। स्वतंत्र नियामक बनने के बाद एफएमसी को भी वायदा बाजार के बाबत उसी तरह का अधिकार मिल जायेगा, जैसा कि पूंजी बाजार के लिए सेबी को मिला हुआ है।
उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि संसदीय समिति ने एफसीआरए पर राज्य सरकारों से भी सलाह लेने के लिए कहा है। खाद्य उपभोक्ता मामले और जन वितरण पर संसदीय स्थाई समिति ने एफएमसी और कमोडिटी एक्सचेंजों के अधिकारियों से बातचीत के बाद यह निर्णय लिया है।
ऐसे में एफएमसी को स्वायत्तता के लिए केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने में और भी देरी होने की संभावना है। एफसीआरए का मसौदा संसदीय समिति के पास पहले ही काफी लंबे समय से लंबित पड़ा हुआ है। इस संदर्भ में पहला विधेयक लोकसभा में मार्च 2006 में रखा गया था जिसे स्थाई समिति को भेज दिया गया था।
उन्होंने बताया कि वर्तमान एफसीआरए में कुछ मूलभूत कमियां हैं जिन्हें दूर किए जाने की जरूरत है जिससे यह और सरल हो जाए। वर्तमान में ऑप्शन और डेरिवेटिव्स जैसे हैजिंग के उत्पाद उपलब्ध नहीं है। ऐसे में किसान जोखिम के समय हैजिंग का लाभ नहीं उठा पाते। इसके अलावा कमोडिटी वायदा कारोबार में वित्तीय संस्थानों को अनुमति नहीं दी गई है।
एफएमसी के अधिकार भी कई मामलों में सीमित है और कई बातों के लिए उसे सरकार पर निर्भर रहना होता है। वर्तमान अधिनियम के तहत एफएमसी को वित्तीय और दैनिक परिचालन के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहना होता है।
उन्होंने बताया कि बाजार के वर्तमान आकार और तेज विकास को देखते हुए कमोडिटी वायदा कारोबार को एक स्वतंत्र और मजबूत नियामक की आवश्यकता है। एफएमसी को कारोबारियों के गलत व्यापार पर पेनल्टी लगाने और उसकी जांच करने का अधिकार मिलना चाहिए। कमोडिटी वायदा कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए एफएमसी को वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए ताकि इसके दायरे का विस्तार हो सके और इसे सभी वर्गों तक पहुंचाया जा सके।(Business Bhaskar....R S Rana)
पांच माह में सिर्फ 50 हजार टन गेहूं उत्पादों का निर्यात
समय सीमा - निर्यात करने की अवधि 31 मार्च 2012 तक तयकमजोर मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के मुकाबले गेहूं सस्ता होने से निर्यात मांग कमजोरपहली नवंबर को केंद्रीय पूल में 296.71 लाख टन गेहूं का स्टॉकरबी सीजन में गेहूं का उत्पादन 840 लाख टन होने का अनुमानसरकार ने 11 जुलाई को ही 6.5 लाख टन गेहूं उत्पाद निर्यात के को मंजूरी दीकेंद्र सरकार की गेहूं उत्पादों के निर्यात के लिए लंबी अवधि की नीति न होने के कारण निर्यात धीमी गति से ही हो रहा है। जुलाई से अभी तक केवल 45 से 50 हजार टन गेहूं उत्पादों (आटा और मैदा) का ही निर्यात हो पाया है। खाद्य मामलों पर प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले उच्च अधिकार मंत्री प्राप्त समूह (ईजीओएम) ने 11 जुलाई को 6.5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात को मंजूरी दी थी।
रोलर फ्लोर मिलर्स फैडरेशन ऑफ इंडिया की सचिव वीणा शर्मा ने बताया कि जुलाई से अभी तक केवल 45 से 50 हजार टन गेहूं उत्पादों (आटा और मैदा) का निर्यात हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम भारत के मुकाबले कम है जबकि निर्यात के लिए सरकार ने 31 मार्च 2012 तक ही समय तय किया है।
ऐसे में विदेशी आयातक लंबी अवधि के आयात सौदे नहीं कर पा रहे हैं। जबकि केंद्रीय पूल में गेहूं का भारी-भरकम स्टॉक मौजूद है तथा रबी सीजन में मौसम भी फसल के अनुकूल है। ऐसे में गेहूं का बंपर उत्पादन होने की संभावना है। इसलिए सरकार निर्यात के लिए गेहूं उत्पादों की मात्रा तो तय करें लेकिन समय की पाबंदी समाप्त कर देनी चाहिए।
आरती रोलर फ्लोर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर बी सी सिंगला ने बताया कि सरकार ने 11 जुलाई को 6.5 लाख टन गेहूं उत्पादों (आटा और मैदा) के निर्यात की अनुमति दी थी तथा निर्यात करने की अवधि 31 मार्च 2012 तक तय की गई है। ऐसे में विदेशी आयातकों को ये पता ही नहीं है कि भारत सरकार मार्च 2012 के बाद गेहूं उत्पादों का निर्यात जारी रखेगी या फिर से रोक लगा देगी।
इससे पहले भी सरकार ने मई 2009 में 6.5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी तथा निर्यात करने की अवधि 31 मार्च 2011 तक थी। इस अवधि में केवल 1.50 लाख टन गेहूं उत्पादों का ही निर्यात हो पाया था।
प्रवीन कॉमर्शियल कंपनी के डायरेक्टर एन के गुप्ता ने बताया कि गेहूं उत्पादों में इंडोनेशिया, मलेशिया तथा खाड़ी देशों की मांग निकल रही है लेकिन मांग काफी कमजोर है। बंदरगाहों के नजदीक होने के कारण दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें ही थोड़ा-बहुत निर्यात कर पा रही है। दिल्ली में गेहूं के भाव 1,190 से 1,195 रुपये प्रति क्विंटल है।
जबकि आटे का भाव 1,100 से 1,150 रुपये और मैदा का भाव 1,150 से 1,200 रुपये प्रति 90 किलो है। केंद्रीय पूल में पहली नवंबर को 296.71 लाख टन गेहूं का स्टॉक बचा हुआ है जबकि कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2011-12 में गेहूं का उत्पादन 840 लाख टन होने का अनुमान है। वर्ष 2010-11 में गेहूं का उत्पादन 859.30 लाख टन का हुआ है। (Business Bhaskar.....R S Rana)
रोलर फ्लोर मिलर्स फैडरेशन ऑफ इंडिया की सचिव वीणा शर्मा ने बताया कि जुलाई से अभी तक केवल 45 से 50 हजार टन गेहूं उत्पादों (आटा और मैदा) का निर्यात हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम भारत के मुकाबले कम है जबकि निर्यात के लिए सरकार ने 31 मार्च 2012 तक ही समय तय किया है।
ऐसे में विदेशी आयातक लंबी अवधि के आयात सौदे नहीं कर पा रहे हैं। जबकि केंद्रीय पूल में गेहूं का भारी-भरकम स्टॉक मौजूद है तथा रबी सीजन में मौसम भी फसल के अनुकूल है। ऐसे में गेहूं का बंपर उत्पादन होने की संभावना है। इसलिए सरकार निर्यात के लिए गेहूं उत्पादों की मात्रा तो तय करें लेकिन समय की पाबंदी समाप्त कर देनी चाहिए।
आरती रोलर फ्लोर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर बी सी सिंगला ने बताया कि सरकार ने 11 जुलाई को 6.5 लाख टन गेहूं उत्पादों (आटा और मैदा) के निर्यात की अनुमति दी थी तथा निर्यात करने की अवधि 31 मार्च 2012 तक तय की गई है। ऐसे में विदेशी आयातकों को ये पता ही नहीं है कि भारत सरकार मार्च 2012 के बाद गेहूं उत्पादों का निर्यात जारी रखेगी या फिर से रोक लगा देगी।
इससे पहले भी सरकार ने मई 2009 में 6.5 लाख टन गेहूं उत्पादों के निर्यात की अनुमति दी थी तथा निर्यात करने की अवधि 31 मार्च 2011 तक थी। इस अवधि में केवल 1.50 लाख टन गेहूं उत्पादों का ही निर्यात हो पाया था।
प्रवीन कॉमर्शियल कंपनी के डायरेक्टर एन के गुप्ता ने बताया कि गेहूं उत्पादों में इंडोनेशिया, मलेशिया तथा खाड़ी देशों की मांग निकल रही है लेकिन मांग काफी कमजोर है। बंदरगाहों के नजदीक होने के कारण दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें ही थोड़ा-बहुत निर्यात कर पा रही है। दिल्ली में गेहूं के भाव 1,190 से 1,195 रुपये प्रति क्विंटल है।
जबकि आटे का भाव 1,100 से 1,150 रुपये और मैदा का भाव 1,150 से 1,200 रुपये प्रति 90 किलो है। केंद्रीय पूल में पहली नवंबर को 296.71 लाख टन गेहूं का स्टॉक बचा हुआ है जबकि कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार वर्ष 2011-12 में गेहूं का उत्पादन 840 लाख टन होने का अनुमान है। वर्ष 2010-11 में गेहूं का उत्पादन 859.30 लाख टन का हुआ है। (Business Bhaskar.....R S Rana)
12 साल से कमोबेश स्थिर है यूरिया उत्पादन
नई दिल्ली December 07, 2011
यूरिया की खपत में बढ़ोतरी के बावजूद देश में इसका उत्पादन पिछले 12 साल से कमोबेश स्थिर है। इसकी वजह स्पष्ट है, साल 1999 से यूरिया उत्पादन में कोई नया निवेश नहीं हुआ है।उत्पादन स्थिर रहने की वजह सख्त नियमों और मौजूदा नीति के तहत निवेश पर आकर्षक रिटर्न का नहीं मिलना है। देश में होने वाले नाइट्रोजन की खपत में यूरिया की हिस्सेदारी 75 फीसदी से ज्यादा है और यहां इसकी खपत 280 लाख टन से ज्यादा होती है और देश में महज 220 लाख टन का उत्पादन ही हो पाता है जबकि बाकी मात्रा का आयात होता है। इसके अतिरिक्त, इस साल अगस्त में सचिवों की समिति द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद भी यूरिया के विनियंत्रण की प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हो पाई है।यूरिया उत्पादन में निवेश साल 1999 में हुआ था, तब चंबल फर्टिलाइजर्स ने उस साल कोटा में 8 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता वाले संयंत्र की स्थापना की थी। रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री ने 1 दिसंबर को संसद में कहा था कि सितंबर 2008 में यूरिया के लिए निवेश संबंधी नई नीति अधिसूचित किए जाने के बाद अब तक संयंत्रों के विस्तार व नई परियोजना आदि में कोई नया निवेश नहीं हुआ है।साल 2008 से अब तक यूरिया उत्पादन में महज 20 लाख टन का इजाफा हुआ है और वह भी मौजूदा संयत्रों के जरिए। यहां इस बात पर गौर किया जा सकता है कि साल 2008 में गैस इस्तेमाल की नीति अधिसूचित किए जाने के बाद भी इस क्षेत्र में नया निवेश नहीं हुआ है। इस नीति के तहत उर्वरक विनिर्माण इकाइयों को प्राथमिकता के आधार पर गैस की आपूर्ति की जाती है।फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक सतीश चंदर ने कहा - इस क्षेत्र में निवेश तभी होगा जब सरकार इस बात का आश्वासन देगी कि उद्योग को उचित दर पर गैस उपलब्ध हो जाएगी और कीमत की बाबत भी नई नीति बनेगी। उन्होंंने कहा कि कम से कम छह प्रस्तावित यूरिया परियोजनाएं निवेश नीति की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं और इन परियोजनाओं के जरिए करीब 80 लाख टन यूरिया उत्पादन हो सकेगा। इफ्को को प्रबंध निदेशक डॉ. यू एस अवस्थी ने कहा कि उद्योग को आवंटित गैस भी नहीं मिल पा रहा है। यह पूछे जाने पर कि किसानों को सीधे सब्सिडी का हस्तांतरण किया जाए, तो उन्होंने कहा कि मौजूदा नीति निवेशकों में भरोसा नहीं जगाती। ऐसे में उद्योग यूरिया को एनबीएस योजना में शामिल करने की मांग कर रहा है।इंडस्ट्रियल असिस्टेंस सचिवालय के आंकड़े भी देश में उर्वरक क्षेत्र में अरुचि की पुष्टि करते हैं। एसआईए के आंकड़ों से पता चलता है कि अगस्त 1991 से अगस्त 2011 के बीच उïर्वरक उद्योग में निवेश के लिए एक भी आशय पत्र सामने नहीं आया है। हालांकि उर्वरक विभाग ऐसे आंकड़ों को सही नहीं बता रहा है।दूसरी ओर चीन (जो साल 2006 तक यूरिया का आयातक था) अब यूरिया का शुद्ध निर्यातक बन गया है। सुनिधि सिक्टोरिटीज के तरुण सुराणा ने कहा कि चीन में यूरिया उत्पादन की क्षमता में काफी बढ़ोतरी हुई है और उन संयंत्रों का 70 फीसदी हिस्सा कोयला आधारित है। भारत में कोयला आधारित यूरिया उत्पादन संयंत्र नहीं है। भारतीय उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस, नेफ्था और ईंधन पर आधारित है। (BS Hindi)
यूरिया की खपत में बढ़ोतरी के बावजूद देश में इसका उत्पादन पिछले 12 साल से कमोबेश स्थिर है। इसकी वजह स्पष्ट है, साल 1999 से यूरिया उत्पादन में कोई नया निवेश नहीं हुआ है।उत्पादन स्थिर रहने की वजह सख्त नियमों और मौजूदा नीति के तहत निवेश पर आकर्षक रिटर्न का नहीं मिलना है। देश में होने वाले नाइट्रोजन की खपत में यूरिया की हिस्सेदारी 75 फीसदी से ज्यादा है और यहां इसकी खपत 280 लाख टन से ज्यादा होती है और देश में महज 220 लाख टन का उत्पादन ही हो पाता है जबकि बाकी मात्रा का आयात होता है। इसके अतिरिक्त, इस साल अगस्त में सचिवों की समिति द्वारा मंजूरी दिए जाने के बाद भी यूरिया के विनियंत्रण की प्रक्रिया में कोई प्रगति नहीं हो पाई है।यूरिया उत्पादन में निवेश साल 1999 में हुआ था, तब चंबल फर्टिलाइजर्स ने उस साल कोटा में 8 लाख टन सालाना उत्पादन क्षमता वाले संयंत्र की स्थापना की थी। रसायन व उर्वरक राज्य मंत्री ने 1 दिसंबर को संसद में कहा था कि सितंबर 2008 में यूरिया के लिए निवेश संबंधी नई नीति अधिसूचित किए जाने के बाद अब तक संयंत्रों के विस्तार व नई परियोजना आदि में कोई नया निवेश नहीं हुआ है।साल 2008 से अब तक यूरिया उत्पादन में महज 20 लाख टन का इजाफा हुआ है और वह भी मौजूदा संयत्रों के जरिए। यहां इस बात पर गौर किया जा सकता है कि साल 2008 में गैस इस्तेमाल की नीति अधिसूचित किए जाने के बाद भी इस क्षेत्र में नया निवेश नहीं हुआ है। इस नीति के तहत उर्वरक विनिर्माण इकाइयों को प्राथमिकता के आधार पर गैस की आपूर्ति की जाती है।फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक सतीश चंदर ने कहा - इस क्षेत्र में निवेश तभी होगा जब सरकार इस बात का आश्वासन देगी कि उद्योग को उचित दर पर गैस उपलब्ध हो जाएगी और कीमत की बाबत भी नई नीति बनेगी। उन्होंंने कहा कि कम से कम छह प्रस्तावित यूरिया परियोजनाएं निवेश नीति की घोषणा का इंतजार कर रहे हैं और इन परियोजनाओं के जरिए करीब 80 लाख टन यूरिया उत्पादन हो सकेगा। इफ्को को प्रबंध निदेशक डॉ. यू एस अवस्थी ने कहा कि उद्योग को आवंटित गैस भी नहीं मिल पा रहा है। यह पूछे जाने पर कि किसानों को सीधे सब्सिडी का हस्तांतरण किया जाए, तो उन्होंने कहा कि मौजूदा नीति निवेशकों में भरोसा नहीं जगाती। ऐसे में उद्योग यूरिया को एनबीएस योजना में शामिल करने की मांग कर रहा है।इंडस्ट्रियल असिस्टेंस सचिवालय के आंकड़े भी देश में उर्वरक क्षेत्र में अरुचि की पुष्टि करते हैं। एसआईए के आंकड़ों से पता चलता है कि अगस्त 1991 से अगस्त 2011 के बीच उïर्वरक उद्योग में निवेश के लिए एक भी आशय पत्र सामने नहीं आया है। हालांकि उर्वरक विभाग ऐसे आंकड़ों को सही नहीं बता रहा है।दूसरी ओर चीन (जो साल 2006 तक यूरिया का आयातक था) अब यूरिया का शुद्ध निर्यातक बन गया है। सुनिधि सिक्टोरिटीज के तरुण सुराणा ने कहा कि चीन में यूरिया उत्पादन की क्षमता में काफी बढ़ोतरी हुई है और उन संयंत्रों का 70 फीसदी हिस्सा कोयला आधारित है। भारत में कोयला आधारित यूरिया उत्पादन संयंत्र नहीं है। भारतीय उत्पादन मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस, नेफ्था और ईंधन पर आधारित है। (BS Hindi)
प्राकृतिक रबर की आपूर्ति घटने के संकेत
कोच्चि December 07, 2011
मांग और आपूर्ति पर प्राकृतिक रबर उत्पादक देशों के संघ (एएनआरपीसी) के ताजा अनुमान से संकेत मिलता है कि साल 2011 में आपूर्ति में 5.6 फीसदी की कमी आएगी जबकि साल 2012 में 3.6 फीसदी। संशोधित अनुमान से पता चलता है कि इस साल (जनवरी से दिसंबर) कुल आपूर्ति 5.6 फीसदी बढ़कर 1.23 करोड़ टन हो जाएगी, लेकिन यह पूर्व में अनुमानित 6 फीसदी से कम होगी और पिछले साल (2010) के 6.6 फीसदी के मुकाबले भी कम रहेगी।एएनआरपीसी के प्रारंभिक अनुमान से संकेत मिलता है कि कीमतों में गिरावट शुरू होने के बाद इस जिंस की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आरएसएस-4 किस्म की रबर की कीमतें वैश्विक बाजार में गिरकर 174-175 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई हैं जबकि एक महीने पहले यह 185 रुपये पर बिक रहा था। सितंबर में इसकी औसत कीमतें 205 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। कीमतों में गिरावट के रुख से रबर के उत्पादन पर भारी असर पडऩे की संभावना है। एएनआरपीसी के सदस्य देशों की तरफ से कुल आपूर्ति (जिसमें सालाना आधार पर पहली तिमाही के दौरान 10.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और दूसरी तिमाही में 10.7 फीसदी की) तीसरी तिमाही में घटकर 2.5 फीसदी पर आ गई है और चौथी तिमाही में भी इसके और नीचे यानी 0.6 फीसदी पर आने की संभावना है। एएनआरपीसी ने पाया कि 2010 की आखिरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में प्राकृतिक रबर की आपूर्ति में काफी कमी दर्ज की गई थी और साल 2011 की समान अवधि के लिए इसका अनुमान थोड़ा ऊपर है। यूरो जोन के मौजूदा आर्थिक संकट के चलते ज्यादातर उत्पादक देशों में उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। एएनआरपीसी का यह भी अनुमान है कि मौजूदा वर्ष में अक्टूबर-दिसंबर के दौरान निर्यात में 3 फीसदी की गिरावट आएगी।इस बीच, कीमत के मोर्चे पर स्थानीय बाजार की स्थिति थोड़ी बेहतर नजर आ रही है क्योंकि मंगलवार को आरएसएस-4 किस्म की रबर की कीमतें यहां 202 रुपये प्रति किलोग्राम रहीं। पिछली दो तिमाही के दौरान उत्पादन में कमी के चलते बाजार में आपूर्ति की स्थिति असहज है। पिछले कुछ माह से स्थानीय आपूर्ति मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लिहाजा भारत का बाजार अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत है। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष के आखिर में प्राकृतिक रबर की आपूर्ति में करीब 1.5 लाख टन की कमी हो सकती है। भारतीय बाजार के मजबूत होने की यह प्रमुख वजह है।मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल-अक्टूबर के दौरान प्राकृतिक रबर के उत्पादन में 5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान कुल उत्पादन बढ़कर 4,80,700 टन पर पहुंच गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4,57,650 टन रबर का उत्पादन हुआ था। वहीं इस अवधि में उपभोग बढ़कर 5,51,425 टन पर पहुंच गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 5,50,230 टन रबर की खपत हुई थी। उत्पादन और खपत के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है और ऐसे में वित्त वर्ष के आखिर में यह अंतर 1.50 लाख टन पर पहुंचने के आसार हैं। पिछले एक साल के दौरान पहली बार देश में प्राकृतिक रबर के भंडार में मामूली गिरावट आई है। 31 अक्टूबर तक कुल 2.47 लाख टन रबर का भंडार था, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 2,53,877 टन रबर का भंडार था। (BS Hindi)
मांग और आपूर्ति पर प्राकृतिक रबर उत्पादक देशों के संघ (एएनआरपीसी) के ताजा अनुमान से संकेत मिलता है कि साल 2011 में आपूर्ति में 5.6 फीसदी की कमी आएगी जबकि साल 2012 में 3.6 फीसदी। संशोधित अनुमान से पता चलता है कि इस साल (जनवरी से दिसंबर) कुल आपूर्ति 5.6 फीसदी बढ़कर 1.23 करोड़ टन हो जाएगी, लेकिन यह पूर्व में अनुमानित 6 फीसदी से कम होगी और पिछले साल (2010) के 6.6 फीसदी के मुकाबले भी कम रहेगी।एएनआरपीसी के प्रारंभिक अनुमान से संकेत मिलता है कि कीमतों में गिरावट शुरू होने के बाद इस जिंस की आपूर्ति पर असर पड़ा है। आरएसएस-4 किस्म की रबर की कीमतें वैश्विक बाजार में गिरकर 174-175 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई हैं जबकि एक महीने पहले यह 185 रुपये पर बिक रहा था। सितंबर में इसकी औसत कीमतें 205 रुपये प्रति किलोग्राम थीं। कीमतों में गिरावट के रुख से रबर के उत्पादन पर भारी असर पडऩे की संभावना है। एएनआरपीसी के सदस्य देशों की तरफ से कुल आपूर्ति (जिसमें सालाना आधार पर पहली तिमाही के दौरान 10.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई और दूसरी तिमाही में 10.7 फीसदी की) तीसरी तिमाही में घटकर 2.5 फीसदी पर आ गई है और चौथी तिमाही में भी इसके और नीचे यानी 0.6 फीसदी पर आने की संभावना है। एएनआरपीसी ने पाया कि 2010 की आखिरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में प्राकृतिक रबर की आपूर्ति में काफी कमी दर्ज की गई थी और साल 2011 की समान अवधि के लिए इसका अनुमान थोड़ा ऊपर है। यूरो जोन के मौजूदा आर्थिक संकट के चलते ज्यादातर उत्पादक देशों में उत्पादन गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। एएनआरपीसी का यह भी अनुमान है कि मौजूदा वर्ष में अक्टूबर-दिसंबर के दौरान निर्यात में 3 फीसदी की गिरावट आएगी।इस बीच, कीमत के मोर्चे पर स्थानीय बाजार की स्थिति थोड़ी बेहतर नजर आ रही है क्योंकि मंगलवार को आरएसएस-4 किस्म की रबर की कीमतें यहां 202 रुपये प्रति किलोग्राम रहीं। पिछली दो तिमाही के दौरान उत्पादन में कमी के चलते बाजार में आपूर्ति की स्थिति असहज है। पिछले कुछ माह से स्थानीय आपूर्ति मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, लिहाजा भारत का बाजार अपेक्षाकृत ज्यादा मजबूत है। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष के आखिर में प्राकृतिक रबर की आपूर्ति में करीब 1.5 लाख टन की कमी हो सकती है। भारतीय बाजार के मजबूत होने की यह प्रमुख वजह है।मौजूदा वित्त वर्ष में अप्रैल-अक्टूबर के दौरान प्राकृतिक रबर के उत्पादन में 5 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस दौरान कुल उत्पादन बढ़कर 4,80,700 टन पर पहुंच गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4,57,650 टन रबर का उत्पादन हुआ था। वहीं इस अवधि में उपभोग बढ़कर 5,51,425 टन पर पहुंच गया जबकि पिछले साल की समान अवधि में 5,50,230 टन रबर की खपत हुई थी। उत्पादन और खपत के बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है और ऐसे में वित्त वर्ष के आखिर में यह अंतर 1.50 लाख टन पर पहुंचने के आसार हैं। पिछले एक साल के दौरान पहली बार देश में प्राकृतिक रबर के भंडार में मामूली गिरावट आई है। 31 अक्टूबर तक कुल 2.47 लाख टन रबर का भंडार था, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 2,53,877 टन रबर का भंडार था। (BS Hindi)
आपूर्ति में कमी से बढ़ सकता है काली मिर्च का भाव
कोच्चि December 07, 2011
वैश्विक बाजार में अभी भी काली मिर्च की भारी किल्लत है, लिहाजा अल्पावधि में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी की भूमिका तैयार हो रही है। फरवरी के आखिर में या फिर मार्च के शुरू में काली मिर्च की वैश्विक आपूर्ति स्थिर होने की संभावना है, जब बाजार में वियतनाम से नई फसल की आवक होगी। मौजूदा समय में वैश्विक मांग भी कम है क्योंकि आयात करने वाले ज्यादातर देश भारत और वियतनाम के ताजा फसल का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में काली मिर्च के वैश्विक बाजार में फिलहाल छुट्टी का माहौल है और क्रिसमस व नए साल का सीजन इसे समर्थन प्रदान कर रहा है।वियतनाम में काली मिर्च का प्रसंस्करण करने वालों के मुताबिक, देश में इसका भंडार काफी कम है और पिछले 5-6 हफ्ते से इसका निर्यात भी घटा है। नवंबर में वियतनाम ने महज 2200 टन काली मिर्च का निर्यात किया, जिससे पता चलता है कि देश में काली मिर्च का काफी कम भंडार है। प्रसंस्करण करने वाली ज्यादातर इकाइयां काली मिर्च की किल्लत के चलते फिलहाल बंद हैं। निर्यात क्षेत्र का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। 500 जीएल किस्म की सांकेतिक कीमतें वहां 7000 डॉलर प्रति टन हैं और 550 जीएल की कीमतें 7400 डॉलर प्रति टन। इंडोनेशिया व वियतनाम में कम स्टॉक के चलते सफेद मिर्च की कीमतें बढ़कर 10,000-10,100 डॉलर प्रति टन के दायरे में आ गई हैं। फिलहाल काली मिर्च का वैश्विक कारोबार काफी कम हो रहा है क्योंकि सिर्फ ब्राजील और भारत ही इस मसाले की पेशकश कर रहा है।भारत एएसटीए किस्म की काली मिर्च 7350-7400 डॉलर प्रति टन पर बेच रहा है जबकि ब्राजील इसका भाव 7100 डॉलर प्रति टन बता रहा है। भारत के पास मोटे तौर पर 4000 टन काली मिर्च का भंडार है जबकि ब्राजील के पास 12,000 टन का भंडार। अगले सीजन की फसल के लिए बाजार को दो महीने इंतजार करना होगा और इस बीच काली मिर्च की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर आयातक नई फसल का इंतजार कर रहे हैं। जब बाजार में नई फसल की आवक होगी तो फिर कीमतों में गिरावट की संभावना है। अगले सीजन में वियतनाम के पास 1.40 लाख टन काली मिर्च का भंडार होने की उम्मीद है, लेकिन इसकी वैश्विक आपूर्ति साल 2012 में स्थिर रहने की संभावना है। ऐसे में अगले सीजन के मध्य में भी इसकी कीमतों में बहुत ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं है। भारत में दक्षिणी राज्यों से नई फसल की आवक इस महीने के अंत तक बाजार पहुंचेगी। आपूर्ति में बढ़ोतरी मार्च के आखिर तक होने की संभावना है, जब वियतनाम में इसकी कटाई सर्वोच्च स्तर पर होगी। (BS Hindi)
वैश्विक बाजार में अभी भी काली मिर्च की भारी किल्लत है, लिहाजा अल्पावधि में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी की भूमिका तैयार हो रही है। फरवरी के आखिर में या फिर मार्च के शुरू में काली मिर्च की वैश्विक आपूर्ति स्थिर होने की संभावना है, जब बाजार में वियतनाम से नई फसल की आवक होगी। मौजूदा समय में वैश्विक मांग भी कम है क्योंकि आयात करने वाले ज्यादातर देश भारत और वियतनाम के ताजा फसल का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में काली मिर्च के वैश्विक बाजार में फिलहाल छुट्टी का माहौल है और क्रिसमस व नए साल का सीजन इसे समर्थन प्रदान कर रहा है।वियतनाम में काली मिर्च का प्रसंस्करण करने वालों के मुताबिक, देश में इसका भंडार काफी कम है और पिछले 5-6 हफ्ते से इसका निर्यात भी घटा है। नवंबर में वियतनाम ने महज 2200 टन काली मिर्च का निर्यात किया, जिससे पता चलता है कि देश में काली मिर्च का काफी कम भंडार है। प्रसंस्करण करने वाली ज्यादातर इकाइयां काली मिर्च की किल्लत के चलते फिलहाल बंद हैं। निर्यात क्षेत्र का हाल भी कमोबेश ऐसा ही है। 500 जीएल किस्म की सांकेतिक कीमतें वहां 7000 डॉलर प्रति टन हैं और 550 जीएल की कीमतें 7400 डॉलर प्रति टन। इंडोनेशिया व वियतनाम में कम स्टॉक के चलते सफेद मिर्च की कीमतें बढ़कर 10,000-10,100 डॉलर प्रति टन के दायरे में आ गई हैं। फिलहाल काली मिर्च का वैश्विक कारोबार काफी कम हो रहा है क्योंकि सिर्फ ब्राजील और भारत ही इस मसाले की पेशकश कर रहा है।भारत एएसटीए किस्म की काली मिर्च 7350-7400 डॉलर प्रति टन पर बेच रहा है जबकि ब्राजील इसका भाव 7100 डॉलर प्रति टन बता रहा है। भारत के पास मोटे तौर पर 4000 टन काली मिर्च का भंडार है जबकि ब्राजील के पास 12,000 टन का भंडार। अगले सीजन की फसल के लिए बाजार को दो महीने इंतजार करना होगा और इस बीच काली मिर्च की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर आयातक नई फसल का इंतजार कर रहे हैं। जब बाजार में नई फसल की आवक होगी तो फिर कीमतों में गिरावट की संभावना है। अगले सीजन में वियतनाम के पास 1.40 लाख टन काली मिर्च का भंडार होने की उम्मीद है, लेकिन इसकी वैश्विक आपूर्ति साल 2012 में स्थिर रहने की संभावना है। ऐसे में अगले सीजन के मध्य में भी इसकी कीमतों में बहुत ज्यादा गिरावट की संभावना नहीं है। भारत में दक्षिणी राज्यों से नई फसल की आवक इस महीने के अंत तक बाजार पहुंचेगी। आपूर्ति में बढ़ोतरी मार्च के आखिर तक होने की संभावना है, जब वियतनाम में इसकी कटाई सर्वोच्च स्तर पर होगी। (BS Hindi)
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