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19 नवंबर 2011

एफसीआरए में जल्द संशोधन से पहुंचेगा किसानों तक कमोडिटी फ्यूचर्स का लाभ

सदीय समिति उस विधेयक का परीक्षण कर रही है जिसके अंतर्गत कमोडिटी डेरिवेटिव मार्केट नियामक को स्वायत्तता देने की बात कही गई है। आठ महीने के बाद अब खाद्य, उपभोक्ता मामले और जन वितरण पर संसदीय स्थाई समिति कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट रेगुलेटर, फारवर्ड मार्केट कमीशन के अधिकारियों और कमोडिटी एक्सचेंजों के अधिकारियों से बातचीत कर रही है।

कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट को और सशक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार ने फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट (एफसीआरए) 1952 में संशोधन के लिए संसद के सामने प्रस्तुत किया है। इस अधिनियम के तहत ही भारत के कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट विनियमित होते हैं। साथ ही कमोडिटी फ्यूचर मार्केट के नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) को कमोडिटी डेरिवेटिव्स मार्केट के विकास और नियमों के कार्यान्वयन हेतु अधिकार मिलते हैं।

इस संदर्भ में पहला विधेयक लोक सभा में मार्च 2006 में रखा गया था जिसे स्थाई समिति को भेज दिया गया था। दिसंबर 2006 में ही स्थाई समिति ने अपनी रिपोर्ट दे दी थी। इसके बाद विधेयक में संशोधन हेतु कैबिनेट के लिए एक नोट तैयार किया गया था जिस पर मई 2007 में विचार भी किया गया। बाद में इस पर व्यापक विचार-विमर्श का निर्णय लिया गया और इसे अंजाम भी दिया गया।

बाद में यह निर्णय लिया गया कि साल 2006 के विधेयक को वापस लेते हुए एक नया बिल पेश किया जाए और अभी समिति इसी नये विधेयक पर विचार कर रही है।
अगर हम कमोडिटी एक्सचेंजों के ऐतिहासिक कारोबार पर एक नजर डालें तो पिछले सात वर्षों में संचयित कारोबार 40 प्रतिशत सीएजीआर के हिसाब से बढ़ कर साल 2010-11 में 120 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है।

वर्तमान एफसीआरए में कुछ मूलभूत कमियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है ताकि यह और सरल बनें। वर्तमान में ऑप्शन और वेदर डेरिवेटिव्स जैसे हेजिंग के उत्पाद उपलब्ध नहीं हैं। इसके जरिये किसान जोखिम के समय हेजिंग का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा अब तक फ्यूचर्स मार्केट में वित्तीय संस्थानों को अनुमति नहीं दी गई है।

नियामक के हाथ भी कई मामलों में बंधे हुए हैं और कई बातों के लिए उसे सरकार पर निर्भर रहना होता है। वर्तमान अधिनियम के तहत नियामक को वित्तीय और दैनिक परिचालन के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर रहना होता है। सरकार पर वित्तीय निर्भरता के कारण इंफ्रास्ट्रक्चर, टेक्नोलॉजी, मानव संसाधन में निवेश सीमित हो गया है जिस वजह से नियमनों के व्यवस्थित परिचालन और भावी विकास संभावनाओं में कठिनाई हो रही है।

देखा जाए तो बाजार के वर्तमान आकार और तेज विकास को देखते हुए फ्यूचर्स मार्केट को एक स्वायत्त और मजबूत नियामक की जरूरत है। नियामक को बाजार के कारोबारियों के गलत व्यापार पर पेनाल्टी लगाने और उसकी जांच करने का अधिकार मिलना चाहिए साथ ही फ्यूचर्स मार्केट के व्यापार को बेहतर निगरानी के लिए संपूर्ण पर्यवेक्षण का अधिकार मिलना चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह वायदा बाजार आयोग को नियमों के सख्त कार्यान्वयन के लिए सबल बनाए जिसे वर्तमान में संबद्ध मंत्रालय की अनुमति पर निर्भर रहना होता है।

कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट को और आगे बढ़ाने के लिए एफएमसी को वित्तीय स्वायत्तता मिलनी चाहिए ताकि इसके दायरे का विस्तार हो सके और इसे सभी वर्गों तक पहुंचाया जा सके।

दशकों से अर्थव्यवस्था में परिवर्तन के साथ नियामकों की भूमिका में बदलाव आया है लेकिन एक एफएमसी ही ऐसा नियामक है जो सशक्तीकरण के मामले में पीछे छूट गया है। एक सशक्त एफएमसी दूसरे नियामकों से फ्यूचर्स मार्केट में वित्तीय संस्थानों की स्वीकृति हेतु पहल और मदद कर कसता है। अगर बैंक सहभागी बन जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पहुंच की बदौलत किसानों भी फ्यूचर्स मार्केट में भाग ले सकते हैं।

इसके अलावा नेटवर्क मजबूत होने की वजह से फ्यूचर्स के भाव का प्रसारण भी बड़े पैमाने पर हो सकेगा। वर्तमान में भारतीय कॉरपोरेट जो हेजिंग के लिए वैश्विक एक्सचेंजों का उपयोग कर रहे हैं वह भारतीय एक्सचेंजों और सेवाओं का उपयोग करने लगेंगे।
यह सब तभी संभव होगा जब कमोडिटी फ्यूचर्स मार्केट के फायदे एक समर्पित, सशक्त और सक्षम नियामकीय ढांचे के जरिये समाज के सभी वर्गों तक पहुंचाया जाए। (Business Bhaskar)

ईजीओएम में चावल स्टॉक लिमिट पर फैसला संभव

आर.एस. राणा नई दिल्ल

चालू खरीफ में चावल की बंपर पैदावार होने की संभावना है जबकि इस समय केंद्रीय पूल में चावल का भारी-भरकम स्टॉक मौजूद है। इसीलिए सरकार चावल पर लगी स्टॉक लिमिट को हटाने पर विचार कर रही है। लेकिन देश के सात राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, चंडीगढ़ और अंडमान एवं निकोबार में स्टॉक लिमिट जारी रहेगी। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (ईजीओएम) की 21 नवंबर को होने वाली बैठक में इस पर फैसला हो सकता है।

उपभोक्ता मामले मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय ने सितंबर महीने में राज्य सरकारों से पत्र लिखकर चावल पर स्टॉक लिमिट हटाने के बारे में राय मांगी थी। दिल्ली, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, झारखंड, चंडीगढ़ और अंडमान एवं निकोबार की सरकारों ने स्टॉक लिमिट जारी रखने की मांग की है लेकिन अन्य राज्यों ने स्टॉक लिमिट हटाने की सिफारिश की है। इसीलिए देश के सात राज्यों में चावल पर स्टॉक लिमिट जारी रखने की योजना है लेकिन अन्य राज्यों से स्टॉक लिमिट हटाने की सिफारिश की गई है।

उन्होंने बताया कि ईजीओएम की 21 नवंबर को होने वाली बैठक में इस पर निर्णय लिया जा सकता है। वैसे भी घरेलू बाजार में परमल चावल के दाम फुटकर बाजार में पिछले पांच-छह महीनों से 22-24 रुपये प्रति किलो पर स्थिर बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि स्टॉक लिमिट हटा लेने से व्यापारियों के साथ ही किसानों को भी फायदा होगा।

उपभोक्ताओं को ऊंची कीमतों से राहत देने के लिए सरकार ने अक्टूबर 2008 में चावल पर स्टॉक लिमिट लगाई थी। आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के तहत राज्य सरकारों को अधिकार है कि वे जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती हैं।
चालू खरीफ सीजन में देश में चावल का बंपर उत्पादन 871 लाख टन होने का अनुमान है। जिससे चालू विपणन सीजन में चावल की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीद भी बढऩे की संभावना है।

देशभर की मंडियों से अभी तक एमएसपी पर 101 लाख टन से ज्यादा चावल की खरीद हो चुकी है। जबकि केंद्रीय पूल में एक नवंबर को चावल का भारी भरकम 260.83 लाख टन का स्टॉक बचा हुआ है। चालू विपणन सीजन के लिए केंद्र सरकार ने धान का एमएसपी 80 रुपये बढ़ाकर कॉमन वेरायटी के लिए भाव 1,080 रुपये और ए-ग्रेड के लिए 1,110 रुपये प्रति क्विंटल तय किया हुआ है। (Business Bhaskar.....R S Rana)

एमएसपी की सूची में और फसलें नहीं होंगी शामि

मुंबई November 17, 2011




सब्सिडी का बोझ कम करने और कीमतों पर पडऩे वाले दबाव घटाने की खातिर सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की सूची में किसी और फसल को फिलहाल शामिल नहीं करने का फैसला किया है।
किसानों के लिए तैयार कृषि मंत्रालय की राष्ट्रीय नीति में ये सिफारिशें की गई थीं, लेकिन कृषि विकास के लिए कार्ययोजना बनाने की खातिर हाल में संबंधित मंत्रालयों के साथ हुई कैबिनेट सचिव की बैठक में यह फैसला लिया गया। कृषि समीक्षा की तैयारी और कृषि के लिए कार्ययोजना बनाने की खातिर यह बैठक प्रधानमंत्री के आदेश पर बुलाई गई थी। कृषि सर्वेक्षण बजट के दौरान पेश की जाने वाली आर्थिक समीक्षा के समानांतर दस्तावेज होगा।
इस बीच, अधिकारियों ने कहा कि बजट के लिए कृषि मंत्रालय को अपनी सिफारिशें सौंपने को कहा गया है, जो कार्ययोजना के एजेंडे का अनुपूरक हो सकता है। आधिकारिक सूत्रों ने कहा - मंत्रालय किसानों की राष्ट्रीय नीति पर आधारित ज्यादातर सिफारिशें आगे बढ़ाना चाहता है, लेकिन कैबिनेट के अधिकारियों का मानना है कि खाद्य कीमतों पर महंगाई के दबाव व सरकार पर सब्सिडी के बोझ को देखते हुए इसे रोककर रखा जाए। अधिकारियों ने कहा कि मंत्रालय ज्यादातर सिफारिशें मध्यम अवधि के लिए करेगा, न कि छोटी अवधि के लिए, ताकि महंगाई के दबाव को दूर रखा जा सके।
किसानों की राष्ट्रीय नीति पर की सिफारिशों के आधार पर कृषि मंत्रालय फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य के आकलन के तौर-तरीकों की समीक्षा की वकालत कर रहा है, साथ ही इस सूची में और फसलों को शामिल करने की मांग कर रहा है। अंतरमंत्रालय बैठक में जो अन्य मांगे उठाई गईं उनमें उर्वरक, पानी व बिजली की समय पर आपूर्ति के अलावा किसानों के लिए डीजल सब्सिडी में बढ़ोतरी शामिल है। लेकिन बैठक में डीजल पर सब्सिडी बढ़ाने की मांग खारिज कर दी गई।
महंगाई और बढ़ती खाद्य कीमतों को राष्ट्रीय एजेंडे में प्राथमिकता के तौर पर रखते हुए कैबिनेट ने कृषि लागत व मूल्य आयोग द्वारा एमएसपी तय करने के लिए अपनाए गए तरीके में फिलहाल कोई फेरबदल न करने का फैसला किया। कृषि मंत्रालय के विजन डॉक्यूमेंट (किसानों की राष्ट्रीय नीति) में मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि एमएसपी का निर्धारण भारांकित औसत लागत के मुकाबले 50 फीसदी ज्यादा होना चाहिए।
हाल में सरकार ने साल 2011-12 के रबी सीजन के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किया है, जो गेहूं को छोड़कर बाकी फसलों के मामले में पिछले साल के मुकाबले करीब 20-25 फीसदी ज्यादा है। ऐसे वक्त में खाद्य मंत्रालय ने एमएसपी में होने वाली बढ़ोतरी से खाद्यान्न की कीमतों पर पडऩे वाले असर की बाबत चिंता जताई थी। एमएसपी विभिन्न जिंसों की सरकार द्वारा तय फ्लोर प्राइस है, जिसके नीचे उसका विपणन नहीं किया जा सकता। (BS Hindi)

गुड़ निर्माताओं को गन्ने की बिक्री

बई November 18, 2011




चीनी मिलों द्वारा गन्ने की पेराई में देरी करने और इसकी अंतिम कीमतों पर अनिश्चितता बरकरार रहने के कारण देश के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में किसानों ने गन्ने की बिक्री गुड़ बनाने वाली इकाइयों (कोल्हू) को 220 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर करनी शुरू कर दी है।
सबसे रोचक बात यह है कि गन्ने की यह कीमत राज्य सरकार द्वारा हाल ही में घोषित राज्य परामर्श मूल्य (सैप) 250 रुपये प्रति क्विंटल से 20-30 रुपये कम है। किसान गेहूं की बुआई के लिए खेतों को खाली कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के किसान भी गुड़ बनाने वाली इकाइयों को गन्ने की बिक्री कर रहे हैं। कोल्हू सहजता से अगेती किस्मों के पिछले साल के सैप 205 रुपये प्रति क्विंटल से 15 रुपये अधिक भुगतान कर रहे हैं। इस कीमत पर गुड़ निर्माता इकाइयों की उत्पादन लागत 980 रुपये प्रति 40 किलोग्राम बैठती है। जबकि गुड़ की वर्तमान कीमत 940-950 रुपये प्रति 40 किलोग्राम है। हालांकि गुड़ बनाने वाली इकाइयां गन्ने के अपशिष्ट को कागज मिलों को बेचकर घाटे की भरपाई करती हैं और कुछ लाभ कमाती हैं।
हालांकि चीनी मिलों के लिए अगेती किस्म के गन्ने की पेराई नुकसानदेह रिकवरी के कारण बूते से बाहर है। अगेती किस्म की रिकवरी 7.0-8.0 फीसदी होती है, जो ठंड बढऩे के साथ बढ़ती है। इसके चलते खड़े गन्ने में शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है। उत्तर प्रदेश में 9.2-9.3 फीसदी वार्षिक औसत रिकवरी के बावजूद चीनी मिलें अगेती किस्म की खरीद में उत्साह नहीं दिखा रही हैं।
हालांकि समान गन्ने से मिलों को कम रिकवरी मिलती है, वहीं गुड़ बनाने वाली इकाइयों की रिकवरी 9.5 फीसदी होती है, क्योंकि ये अपशिष्ट में बिल्कुल भी रस नहीं छोड़ती हैं।
इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महासचिव अविनाश वर्मा ने कहा,'उत्तर प्रदेश में चीनी मिलें आमतौर पर नवंबर के तीसरे सप्ताह में पेराई शुरू करती हैं। हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि किसान चीनी मिलों के बजाए कोल्हू को गन्ने की आपूर्ति करने के विकल्प का इस्तेमाल कर रहे हैं। चीनी मिलों ने अभी पेराई शुरू नहीं की है। पैसे की जरूरत वाले किसानों के पास कोल्हू को आपूर्ति के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है।'
उन्होंने कहा कि हालांकि इस साल एक नया रुझान उभरा है, बहुत से कोल्हू पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश पलायन कर गए हैं। इसकी वजह मप्र में गन्ने की बंपर उपलब्धता है। वहीं, मध्य प्रदेश में कोल्हू को चीनी मिलों से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी पड़ती, क्योंकि वहां बड़ी पेराई इकाइयां नहीं हैं।
मध्य प्रदेश में 10-12 लघु चीनी विनिर्माता इकाइयां हैं। लेकिन वे राज्य में उपलब्ध पूरे गन्ने की पेराई नहीं कर पाती हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश में गन्ने की औसत रिकवरी 10.5-11 फीसदी होती है, जो उत्तर प्रदेश में 9.2-9.3 फीसदी रिकवरी से काफी अधिक है। इसलिए मध्य प्रदेश में कोल्हू अन्य राज्यों में अपने समकक्षों की तुलना में ज्यादा फायदे की स्थिति में हैं।
हापुड़ (उत्तर प्रदेश) स्थित गुड़ निर्माता इकाई दुर्गादास नारायणदास के मालिक विजेंद्र कुमार बंसल ने कहा कि आमतौर पर चीनी मिलेें सीजन के प्रारंभ में बड़े किसानों को सूचीबद्ध करती हैं और सबसे पहले उनका गन्ना खरीदती हैं। छोटे और मझोले किसान अपने गन्ने की आपूर्ति कोल्हू को करने को आर्थिक दृष्टि से ज्यादा उचित पाते हैं। क्योंकि वे चीनी मिलों तक गन्ने को पहुंचाने के लिए गाड़ी/ट्रैक्टर किराए पर नहीं ले सकते। इसलिए वे अपने नजदीक के कोल्हू को गन्ने की आपूर्ति करने को प्राथमिकता देते हैं। इससे उन्हें तत्काल नकदी मिल जाती है, जिससे वे अगली फसल के लिए तिलहन या गेहूं, खाद और कीटनाशक खरीद सकते हैं।
बंसल ने कहा कि महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार समेत अन्य प्रमुख राज्यों में किसान कोल्हूओं को गन्ने की आपूर्ति करने को ज्यादा फायदेमंद पाते हैं। देशभर में इस साल गुड़ का उत्पादन 1 करोड़ टन के आसपास रहने की संभावना है। हालांकि बंसल ने कहा कि मॉनसून के बाद तेज पूर्वी हवाओं के कारण गन्ने की फसल पूरी तरह पकी नहीं है। इसलिए फसल की औसत उत्पादकता 9 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी। (BS Hindi)

एथेनॉल का मिश्रण, फायदे का सौदा

ई दिल्ली November 18, 2011




सितंबर 2012 में समाप्त होने वाले वर्ष में पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट से तेल कंपनियों को 1200 करोड़ रुपये की बचत होगी। तीन कंपनियों इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने साल 2011-12 के चीनी सीजन (अक्टूबर-सितंबर) में चीनी उद्योग से 60 करोड़ लीटर एथेनॉल खरीदने का अनुबंध किया है।
निजी चीनी मिलों की अग्रणी संस्था इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के मुताबिक, जब एक बार एथेनॉल की कीमतों का जुड़ाव पेट्रोल से हो जाएगा तो कंपनियों को 27 रुपये प्रति लीटर की मौजूदा कीमत के मुकाबले 33.50 रुपये प्रति लीटर का भाव मिलने लगेगा। सौमित्र चौधरी समिति ने एथेनॉल की कीमतों का जुड़ाव पिछली तिमाही के पेट्रोल से करने की सिफारिश की है और इससे पहले इसमें कर प्रोत्साहन जैसे कुछ समायोजन करने का सुझाव दिया है।
33.50 रुपये प्रति लीटर की एक्स-मिल कीमतों को देखते हुए तेल विपणन कंपनियों के डिपो में एथेनॉल की लागत प्रति लीटर 41.28 रुपये बैठेगी जबकि पेट्रोल की कीमतें 50.36 रुपये प्रति लीटर बैठती है। इन दोनों में अंतर इसलिए है क्योंकि एथेनॉल पर उत्पाद शुल्क की दर कम है और एथेनॉल व पेट्रोल की कीमतों के बीच अंतर है। एथेनॉल पर 10.3 फीसदी का ऐड वेलोरम उत्पाद शुल्क लगता है जबकि पेट्रोल पर 14.78 रुपये प्रति लीटर का विशेष शुल्क है। उपभोक्ताओं को एथेनॉल मिश्रित उत्पाद पेट्रोल की खुदरा कीमतों 66.42 रुपये प्रति लीटर (दिल्ली में) पर बेचा जाता है।
इस्मा के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने कहा - कुल मिलाकर तेल विपणन कंपनियां एथेनॉल के हर लीटर की खरीद पर 20 रुपये की बचत करने में सक्षम होंगी। ऐसे में 60 करोड़ लीटर एथेनॉल की खरीद पर तेल विपणन कंपनियों को साल 2011-12 में ही 1200 करोड़ रुपये की बचत होगी।
पेट्रोलियम राज्यमंत्री आर पी एन सिंह ने अगस्त में संसद में कहा था कि पिछले वित्त वर्ष में तेल विपणन कंपनियों को एथेनॉल की मिलावट से 154 करोड़ रुपये की बचत हुई थी। साल 2008-09 व 2009-10 में एथेनॉल के मिश्रण से तेल विपणन कंपनियों की कुल बचत 153 करोड़ रुपये रही थी। कंपनी के एक अधिकारी ने कहा - एथेनॉल की मिलावट हमारे लिए काफी अच्छी है, लेकिन उन्होंने इस बात ताजा आंकड़े नहीं बताए।
चीनी मिलें पिछले एक साल से ज्यादा समय से 27 रुपये प्रति लीटर पर एथेनॉल की आपूर्ति कर रही है। इस बीच, पिछले एक साल में तेल विपणन कंपनियां पेट्रोल की कीमतों में कई बार फेरबदल कर चुकी हैं (BS Hindi)

17 नवंबर 2011

रुपये में गिरावट से बढ़ी घबराहट

मुंबई November 16, 2011
वैश्विक अनिश्चितता को देखते हुए डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट देखी जा रही है। अर्थशास्त्रियों और कारोबारियों का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपया अपने न्यूनतम स्तर के करीब पहुंच गया है और यूरो क्षेत्र में संकट गहराने से भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 52 रुपये के स्तर को छू सकती है।बुधवार को रुपये में करीब 7 पैसे की गिरावट दर्ज की गई और यह डॉलर के मुकाबले 50.73 रुपये पर पहुंच गया। मार्च 2009 में भारतीय मुद्रा अपने न्यूनतम स्तर 51.97 रुपये पर पहुंच गई थी। पिछले तीन माह के दौरान डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 15 फीसदी की गिरावट आ चुकी है।रेटिंग एजेंसी केयर के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा, 'रुपये में गिरावट से देश के व्यापार संतुलन पर असर पड़ रहा है। निर्यात में नरमी का रुख देखा जा रहा है जबकि आयात में तेजी आ रही है। इसके चलते डॉलर भी बाहर निकल रहा है।' उन्होंने कहा कि यूरोपीय ऋण संकट अगर आगे भी जारी रहा तो साल के अंत तक भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 52 रुपये के स्तर पर पहुंच सकता है।तेल आयात की मांग बढऩे से भी डॉलर मजबूत हो रहा है और फंड का देश से बाहर जाने के चलते भी रुपया कमजोर हो रहा है। बंबई स्टॉक एक्सचेंज के मुताबिक बुधवार को विदेशी निवेशकों ने घरेलू शेयर बाजारों में करीब 488 करोड़ रुपये की बिकवाली की, जिसके चलते बाजार 0.7 फीसदी गिरावट पर बंद हुआ।वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक स्थिति पर नजर रख रहा है और जरूरत पडऩे पर वह हस्तक्षेप कर सकता है। सितंबर में जब रुपये में 6.25 फीसदी की गिरावट आई थी तब रिजर्व बैंक ने डॉलर बेचकर रुपये को सहारा दिया था। वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु ने कहा कि रुपये में गिरावट के चलते महंगाई पर भी दबाव पड़ रहा है। (BS Hindi)

दो अरब डॉलर के सोने की बिक्री से मंदी के संकेत

सोने में तेजी के दिन लद चुके हैं या फिर इसकी बिक्री के पीछे कोई दूसरी खास वजह है। लेकिन करीब दो अरब डॉलर मूल्य के सोने की बिक्री ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में सनसनी ला दी है। दुनिया के बड़े हेज फंड मैनेजर और लंबे अरसे से तेजडिय़ा रहे जॉन पॉल्सन ने तीसरी तिमाही में अपनी सोने की होल्डिंग एक तिहाई घटा दी है। उसने करीब दो अरब डॉलर के सोने की बिक्री की है। इससे सोने के वैश्विक बाजार में तेजी की धारणा प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका में रेग्यूलेटरी फाइलिंग के आंकड़ों के मुताबिक पॉल्सन एंड कंपनी ने एसपीडीआर गोल्ड ट्रस्ट में अपनी होल्डिंग घटाकर 203 लाख शेयर की है। दूसरी तिमाही के अंत में उसकी होल्डिंग 315 लाख शेयर की थी। मौजूदा मूल्य के आधार पर पॉल्सन की बिक्री करीब 11 लाख औंस के बराबर है। इसका मूल्य 1.94 अरब डॉलर है। चालू वर्ष के शुरू में अरबपति फाइनेंसर जॉर्ज सोरोस द्वारा सोने में अपना लगभग पूरा हिस्सा (80 करोड़ डॉलर) बेचे के बाद पॉल्सन के पास बुलियन में निवेश काफी ज्यादा हो गया था।
सोरोस ने सोने के मूल्य को अंतिम बुलबुला करार देकर अपना सारा हिस्सा बेच दिया था। उन्होंने अपना सोना 6 सितंबर को 1920.30 डॉलर प्रति औंस का रिकॉर्ड स्तर छूने से पहले बेच दिया था। इसके बाद सोना 26 सितंबर को 1,534.49 डॉलर प्रति औंस का स्तर भी छू गया।
एएनजेड रिसर्च ने एक नोट में कहा है कि अमेरिकी रेग्यूलेटरी में इस फाइलिंग की ओर हर किसी का ध्यान जाएगा और सोने में मंदी आने की उम्मीद बनेगी। नोट में कहा गया है कि वास्तव में सोने की तेजी के दिन लद चुके हैं। लंदन के हाजिर बाजार में मंगलवार को सोना करीब एक फीसदी गिरकर 1762.98 डॉलर प्रति औंस रह गया। हालांकि चालू वर्ष में अब तक इसके दाम करीब 25 फीसदी बढ़ चुके हैं।
पॉल्सन द्वारा सोने की बिक्री के पीछे की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं है। एएनजेड के अनुसार संभव है कि पॉल्सन अपनी होल्डिंग को एक्सचेंज ट्रेडेड फंड एसपीडीआर से शिफ्ट करके हाजिर होल्डिंग में लाए। इस कदम से वह एसपीडीआर की मैनेजमेंट फीस से बचत कर सकता है। हमें संदेह है कि पॉल्सन का सोने के प्रति लगाव खत्म हो रहा है।
बैंक ऑफ अमेरिका और हैलिट पैकर्ड जैसे शेयरों में सितंबर के अंत में गिरावट आने से पॉल्सन एडवांटेज प्लस फंड की वैल्यू करीब आधी घट चुकी है। ऐसे में हो सकता है कि उसने रिडीम्शन (पैसा निकालने) के लिए सोने की बिक्री की हो। पॉल्सन करेंसी रिस्क की हेजिंग के लिए एसपीडीआर होल्डिंग का इस्तेमाल करती है। उसने इस महीने के शुरू में कहा था कि उसकी कुल फंड वैल्यू में करीब आठ फीसदी के रिडीम्शन आवेदन मिले हैं। उसके फंड की कुल वैल्यू करीब 30 अरब डॉलर है।ऊंचे भाव पर मांग घटने से सोना व चांदी नरमनई दिल्ली ऊंची कीमतों पर मांग घटने से मंगलवार को दिल्ली सराफा बाजार में चांदी की कीमतों में 500 रुपये की गिरावट आकर भाव 57,500 रुपये प्रति किलो रह गए। सोने की कीमतों में भी 30 रुपये का मंदा आकर भाव 29,265 रुपये प्रति दस ग्राम रह गए। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी निवेशकों की मुनाफावसूली से मंगलवार को सोने की कीमतों में 19 डॉलर की गिरावट आकर भाव 1,761 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करते देखा गया।
जबकि 14 अक्टूबर को इसका भाव 1,780 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ था। चांदी की कीमतें भी मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटकर 33.79 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार करते देखी गई जबकि पिछले कारोबारी दिवस में इसका भाव 34.24 डॉलर प्रति औंस पर बंद हुआ था। (Business Bhaskar)