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11 जनवरी 2011

दिल्ली प्याज में प्याज सब्सिडी पर खेल

नई दिल्ली अब आपको 35 रुपये किलो नहीं, बल्कि 37 रुपये किलो प्याज मिलने की संभावना है। वह भी नेफेड के चुनिंदा स्टॉलों पर। मदर डेयरी काउंटर पर तो सोमवार को भी प्याज का भाव 50 रुपये किलो रहा। मदर डेयरी और नेफेड के भावों में इस अंतर को लेकर कोई भी अधिकारी बोलने को तैयार नहीं है। नेफेड के चेयरमैन बिजेंद्र सिंह बताते हैं कि सोमवार को कैबिनेट कमेटी ऑन प्राइज की बैठक हुई। इसमें नेफेड के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया था। बैठक में निर्णय लिया गया कि दिल्ली में 42 रुपये किलो के भाव में आने वाले प्याज पर सरकार 20 फीसदी की सब्सिडी देगी न कि 10 रुपये की। उन्होंने बताया कि पहले दिल्ली को 1300 टन प्याज भेजा जाना था। अब 31 जनवरी तक 6000 टन प्याज केंद्र सरकार भेजेगी। अभी गुजरात व नासिक मंडी में कालाबाजारियों के विरुद्ध छापेमारी जारी है, जिससे मंडी के प्याज व्यापारी हड़ताल पर हैं। यह प्याज अगले सप्ताह से मिलना शुरू होगा। इसके बाद जितनी चाहें उतना प्याज मदर डेयरी, केंद्रीय भंडार नेफेड से ले सकते हैं। इससे पहले 10 रुपये की सब्सिडी देने से हम मदर डेयरी, केंद्रीय भंडार और नेफेड के काउंटरों को 32 रुपये किलो में प्याज बेचते। इसे वह परिवहन खर्च और श्रम जोड़कर 35 रुपये किलो में बेचते। अब 42 रुपये पर 20 फीसदी की छूट से प्याज 37 रुपये किलो तक बिकने की संभावना है। हालांकि सोमवार को नेफेड के सभी छह काउंटरों पर प्याज 35 रुपये किलो बिका, लेकिन मंगलवार से नए मूल्य तय होंगे। सोमवार को केंद्र सरकार ने 65 टन प्याज दिल्ली भेजी। आने वाले दिनों में आवक बढ़ने की उम्मीद है। जहां तक सोमवार को मदर डेयरी पर 50 रुपये किलो प्याज बिकने की बात है तो इस बारे में भारत सरकार या मदर डेयरी कार्रवाई करते हुए राजधानीवासियों को राहत दें। नेफेड ने मदर डेयरी, केंद्रीय भंडार के अधिकारियों को पहले ही सूचित कर दिया था कि जितना चाहे उतना प्याज लो और नेफेड द्वारा तय मूल्यों पर बिक्री करो। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नेफेड के काउंटरों पर तय मूल्य से अधिक दामों पर प्याज बिकेगा तो ऐसा करने वालों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उधर आजादपुर मंडी में प्याज का थोक भाव सोमवार को 43 रुपये से 17.5 रुपये किलो रहा और फुटकर में में प्याज का भाव 60 रुपये से 70 रुपये किलो रहा। Press not

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में महंगाई पर बैठक शुरू

नई दिल्ली।। लगातार बढ़ रही महंगाई पर नियंत्रण के लिए उठाए जाने वाले कदमों पर विचार-विमर्श के लिए मंगलवार सुबह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में प्रमुख केंद्रीय मंत्रियों और सम्बंधित अधिकारियों की बैठक शुरू हुई। प्रधानमंत्री के 7 रेस कोर्स रोड स्थित आवास पर सुबह साढ़े 10 बजे यह बैठक शुरू हुई। बैठक में केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी, केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार, केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम, कैबिनेट सचिव के. एम. चंद्रशेखर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया पहुंचे। खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि के कारण देश की खाद्य महंगाई दर 25 दिसम्बर को समाप्त सप्ताह में बढ़कर 18.32 प्रतिशत हो गई है। (Navbharat)

10 जनवरी 2011

नई फसल की आवक के बावजूद केस्टर सीड में तेजी

निर्यातकों ने केस्टर ऑयल के अग्रिम सौदे ज्यादा मात्रा में कर रखे हैं। इसीलिए प्रमुख उत्पादक राज्यों गुजरात और राजस्थान में केस्टर सीड की नई फसल की आवक शुरू होने के बावजूद कीमतों में तेजी बनी हुई है। हाजिर बाजार में सप्ताह के दौरान इसकी कीमतों में 4.8 फीसदी और वायदा बाजार में 6.6 फीसदी की तेजी आ चुकी है। चालू फसल सीजन में देश में केस्टर सीड का उत्पादन 21.6 फीसदी बढऩे की संभावना तो है लेकिन केस्टर तेल की निर्यात मांग भी लगातार बढ़ रही है। ऐसे में केस्टर सीड की मौजूदा कीमतों में फरवरी-मार्च में आवक बढऩे पर पांच-सात फीसदी की गिरावट तो आ सकती है लेकिन भारी गिरावट की संभावना नहीं है। वायदा बाजार में भाव बढ़े नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (एनसीडीईएक्स) पर निवेशकों की खरीद से सप्ताह भर में ही केस्टर सीड की कीमतों में 4.8 फीसदी की तेजी आ चुकी है। 30 दिसंबर को जनवरी महीने के वायदा अनुबंध में केस्टर सीड का भाव 4,030 रुपये प्रति क्विंटल था जो शुक्रवार को बढ़कर 4,300 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। जनवरी महीने के वायदा अनुबंध में केस्टर सीड में 4,660 लॉट के सौदे खड़े हुए हैं। एंजेल ब्रोकिंग के एग्री कमोडिटी विश£ेषक बदरुदीन ने बताया कि प्रमुख उत्पादक राज्यों गुजरात और राजस्थान में नवंबर महीने में बारिश होने से फसल लेट हो गई है जबकि निर्यातकों ने केस्टर ऑयल के अग्रिम सौदे ज्यादा मात्रा में कर रखे हैं। इसीलिए आवक बढऩे के बावजूद कीमतों में तेजी बनी हुई है। चालू महीने के आखिर तक उत्पादक मंडियों में केस्टर सीड की आवक तो बढ़ेगी लेकिन कीमतों में गिरावट की संभावना फरवरी-मार्च महीने में बनने की संभावना है। पैदावार में बढ़ोतरी का अनुमान साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एसईए) के अनुसार वर्ष 2010-11 में केस्टर सीड का उत्पादन बढ़कर 11.80 लाख टन होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2009-10 में इसका उत्पादन 9.7 लाख टन का ही हुआ था। वर्ष 2009-10 में 4.4 लाख टन तेल की उपलब्धता हुई थी जबकि वर्ष 2010-11 में 5.31 लाख टन तेल की उपलब्धता होने की संभावना है। केस्टर तेल का निर्यात बढ़ा एस. सी. केमिकल के मैनेजिंग डायरेक्टर कुशल राज पारिख ने बताया कि वर्ष 2010 में जनवरी से दिसंबर तक केस्टर तेल का निर्यात बढ़कर 3.75 लाख टन होने का अनुमान है जबकि वर्ष 2009 में इसका निर्यात 2.90 लाख टन का हुआ ही था। चीन और यूरोपीय देशों की बढ़ी हुई मांग को देखते हुए वर्ष 2011 में केस्टर तेल के निर्यात में और भी बढ़ोतरी होने की संभावना है। चीन के आयातक इस समय 1875 से 1925 डॉलर प्रति टन की दर से आयात सौदे कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि केस्टर तेल की घरेलू खपत भी बढ़कर 1.25 से 1.50 लाख टन की हो गई है जबकि ऑटो उद्योग की बढ़ती मांग को देखते हुए वर्ष 2011 में मांग में और बढ़ोतरी होने की संभावना है। चालू महीने के आखिर तक बढ़ेगी आवक जयंत एग्रो ऑर्नामिक लिमिटेड के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर वामन भाई ने बताया कि गुजरात की मंडियों में केस्टर सीड की दैनिक आवक बढ़कर 25 हजार बोरी (एक बोरी-75 किलो) की हो गई है। चालू महीने के आखिर तक आवक बढ़कर एक लाख बोरी की हो जायेगी। इस समय संयंत्रों के पास स्टॉक नहीं है जबकि संयंत्र ने तेल के अग्रिम सौदे कर लिए थे। वैसे भी प्रतिकूल मौसम के कारण फसल करीब महीना भर लेट हो गई है इसीलिए भाव बढ़ रहे हैं। सीड और तेल की कीमतें तेज मेहसाना के थोक कारोबारी रौनक भाई ने बताया कि आवक के मुकाबले प्लांटों की मांग ज्यादा होने के कारण केस्टर सीड और तेल की कीमतें बढ़ी है। शुक्रवार को केस्टर सीड के भाव बढ़कर 4,250-4,300 रुपये प्रति क्विंटल हो गया जबकि इस दौरान केस्टर तेल का भाव बढ़कर 925-930 रुपये प्रति दस किलो हो गया। प्रमुख उत्पादक राज्यों गुजरात और राजस्थान में फसल लेट हो गई है जबकि आंध्रप्रदेश में आवक लगभग समाप्त हो गई है। फरवरी-मार्च में आवक बढऩे पर मौजूदा कीमतों में पांच से सात फीसदी की गिरावट आने की संभावना है लेकिन भारी गिरावट की संभावना नहीं है। (Buisness Bhaskar....R S Rana)

खराब मौसम से काली मिर्च की नई फसल में देरी संभव

प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में मौसम प्रतिकूल होने से काली मिर्च की नई फसल की आवक में देरी हो रही है। इस वजह से काली मिर्च के भाव में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। कोच्चि में शुक्रवार को एमजी वन काली मिर्च का भाव 23,000 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया। खराब मौसम के चलते उत्पादन में कमी की भी आशंका है। ऐसे में मध्य फरवरी के बाद आवक बढऩे पर ही कारोबारियों को मूल्य में गिरावट आने की उम्मीद है।
केदारनाथ एंड संस के पार्टनर अजय अग्रवाल ने बिजनेस भास्कर को बताया कि नवंबर-दिसंबर में उत्पादक क्षेत्रों में मौसम खराब रहा था जिसकी वजह से काली मिर्च की नई फसल लेट हो गई है। सामान्यत: दिसंबर मध्य में नई फसल की आवक शुरू हो जाती है। लेकिन इस समय छिटपुट आवक ही हो रही है। इसीलिए काली मिर्च की कीमतों में अपेक्षित गिरावट नहीं आ पा रही है।
शुक्रवार को एमजी-वन काली मिर्च का भाव 23,000 रुपये प्रति क्विंटल रहा। 17 दिसंबर को इसका भाव 21,200 रुपये प्रति क्विंटल था। मध्य फरवरी तक नई फसल की आवक में बढ़ोतरी की संभावना है। इसीलिए काली मिर्च की कीमतों में फरवरी के आखिर में ही मंदा आने की संभावना है। वैसे मार्च में वियतनाम में भी नई फसल की आवक शुरू हो जायेगी।
इंटरनेशनल पिपर कम्युनिटी (आईपीसी) के अनुसार वर्ष 2011 में विश्व में काली मिर्च का उत्पादन घटकर 309,952 टन रहने का अनुमान है। यह वर्ष 2010 में उत्पादित 316,380 टन से कम है। वर्ष 2009 के दौरान विश्व का काली मिर्च का उत्पादन 318,662 टन रहा था। प्रमुख उत्पादक देशों में बकाया स्टॉक भी वर्ष 2011 में घटकर 94,582 टन ही रहने की संभावना है। जबकि वर्ष 2010 में बकाया स्टॉक 95,442 टन रहा था। बंगलुरू के काली मिर्च निर्यातक अनीश रावथर ने बताया कि भारत और वियतनाम की नई फसल को देखते हुए विश्व बाजार में काली मिर्च की मांग कम हो गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में काली मिर्च के भाव 5.51 डॉलर प्रति किलो चल रहे है। जबकि पिछले साल की समान अवधि में काली मिर्च का भाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में 3.46 डॉलर प्रति किलो था। अन्य देशों की काली मिर्च का भाव भी 5.3 से 5.5 डॉलर प्रति किलो है।
भारतीय मसाला बोर्ड के अनुसार चालू वित्त वर्ष के पहले आठ महीनों अप्रैल -नवंबर के दौरान कालीमिर्च के निर्यात में 17 फीसदी की कमी आई है। इस दौरान निर्यात घटकर 11,500 टन रह गया। जबकि पिछले साल की समान अवधि में 13,850 टन का निर्यात हुआ था। बाफना इंटरप्राइजेज के एक्जूक्युटिव आफिसर जे मालायाली ने बताया कि मसाला बोर्ड ने चालू सीजन में देश का काली मिर्च उत्पादन 50 हजार टन होने का अनुमान लगाया है। लेकिन उद्योग का मानना है कि उत्पादन 45-46 हजार टन ही होने की संभावना है। इसलिए कीमतों में गिरावट नहीं आ पा रही है।बात पते कीवर्ष 2011 में विश्व में काली मिर्च का उत्पादन घटकर 309,952 टन रहने का अनुमान है। देश में काली मिर्च का उत्पादन खराब मौसम के कारण 50 हजार टन के पिछले अनुमान से घटकर 45-46 हजार टन रहने की संभावना है। (Business Bhaskar......R S Rana)

अगले सप्ताह रबड़ कीमतों में तेजी की संभावना

नई दिल्ली: टायर बनाने में उपयोग में आने वाले प्राकृतिक रबड़ की कीमत वैश्विक संकेतों और वाहन टायर निर्माताओं की मजबूत मांग के कारण अगले सप्ताह मजबूत बने रहने की संभावना है। भारतीय रबड़ डीलर महासंघ के कोषाध्यक्ष इब्राहिम जलाल ने बताया, अंतरराष्ट्रीय कीमत रिकॉर्ड ऊंचाई पर है और मजबूत मांग के कारण इसके ऊंची बने रहने की संभावना है। घरेलू कीमतें भी अंतरराष्ट्रीय रूख के हिसाब से चल रही हैं। उन्होंने कहा कि आपूर्ति की कोई समस्या नहीं है और जहां तक प्राकृतिक रबड़ के अंतरराष्ट्रीय कीमत अधिक रहती है तब तक घरेलू बाजार में भी इसकी कीमत अधिक रहेगी। प्राकृतिक रबड़ की कीमत घरेलू बाजार में लगातार चौथे दिन बढ़ता हुआ 215 रुपए किलो के नए सर्वोच्च ऊंचाई को छू गया है जिसका कारण आवक में कमी के साथ साथ वैश्विक संकेत हैं जिसके कारण टायर बनाने वाली कंपनियों का मुनाफा प्रभावित हो सकता है। (ET Hindi)

समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद के लिए अभी से तैयारियां शुरू

भोपाल: बीते साल की कामयाबी के बाद प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद के और इजाफे की संभावना को देखते हुए राज्य नागरिक आपूर्ति निगम ने अभी से कमर कसना शुरू कर दिया है। निगम के अध्यक्ष रमेश शर्मा गुट्टू भैया ने यहां हुई संचालक मंडल की बैठक में आने वाले रबी सीजन में गेहूं उपार्जन के बड़े लक्ष्य की आशा में बारदाने (बोरी) और पर्याप्त धनराशि के इंतजाम के लिए अमले को दिशा निर्देश दिए। निगम अध्यक्ष ने संचालक मंडल के इस फैसले का खुलासा किया कि बारदाने और पैसों के इस बार विशेष इंतजाम किए जाएंगे। इस सिलिसिले में बनाए जाने वाले सारे खरीद केन्द्रों का खाका अभी से खींच कर वहां पर्याप्त बारदाने समय से पहले पहुंचाए जाने की रणनीति तैयार की गई है। उन्होंने कहा कि प्रदेश के अधिकाधिक किसान अपनी उपज बेच कर उचित मूल्य और इस पर राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले बोनस का लाभ उठा सकें, इसके लिए पैसों की कोई कमी निगम आड़े नहीं आने देगा। गेहूं खरीदी के लक्ष्य और उस पर बोनस की घोषणा के पहले ही नागरिक आपूर्ति निगम सारी तैयारियां करने जा रहा है। खरीदे गए गेहूं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भी निगम मुस्तैद हो चुका है। बैठक में इस सिलसिले में अमले के प्रशिक्षण के साथ ही अन्य सभी जरूरी उपाय करने का फैसला भी किया गया। (ET Hindi)

किसानों को मिल सकती है गन्ने की ज्यादा कीमत

नई दिल्ली।। गन्ना किसानों को 2011-12 सीजन में अपनी उपज की ज्यादा कीमत मिलेगी। दरअसल, केंद्र ने गन्ने की एफआरपी 4 रुपए बढ़ाकर 143 रुपए प्रति क्विंटल करने की योजना बनाई है। केंद्र ने चीनी वर्ष 2010-11 के लिए 139 रुपए का एफआरपी तय किया था। चीनी वर्ष अक्टूबर से सितंबर तक चलता है। आधिकारिक सूत्र के मुताबिक, खाद्य मंत्रालय ने एक नोट में एफआरपी बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। आथिर्क मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति इस नोट को जल्द मंजूरी दे सकती है। एफआरपी गन्ना खरीद की न्यूनतम राशि होती है जिसे केंद्र सरकार तय करती है। यह किसानों के पारिवारिक श्रम, कृषि भूमि के किराए, जोखिम और मुनाफे को ध्यान में रखकर तय किया जाता है। एफआरपी का निर्धारण कृषि लागत और मूल्य आयोग करता है। आयोग ऑल इंडिया वेटेड एनुअल एवरेज निकालने के लिए चीनी उत्पादक राज्यों के लागत के आकलन पर भी गौर करता है। साल 2010-11 में गन्ने के एफआरपी में मुनाफे पर 15 फीसदी और जोखिम पर 20 फीसदी की बढ़ोतरी की गई थी। चीनी मिलें किसानों को एफआरपी के ऊपर कितनी भी रकम की पेशकश कर सकती हैं। लेकिन चीनी उद्योग आमतौर पर आयोग की सिफारिशों के हिसाब से न्यूनतम मूल्य तय करता है। उद्योग प्रतिनिधि ने बताया कि केंद्र को राज्य सरकारों के एडवाइजरी प्राइस तय करने से पहले एफआरपी का एलान कर देना चाहिए। उनके मुताबिक, 'जब तक एफआरपी का एलान होगा, प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य तब तक उससे अधिक एडवाइजरी प्राइस तय कर चुके होंगे। इससे एफआरपी का खास मतलब नहीं रह जाएगा।' खाद्य मंत्रालय भी चीनी पर लगे आयात शुल्क को मार्च तक मौजूदा 60 से घटाकर 20 से 30 फीसदी करने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। ऐसा इसलिए कि तीन साल में पहली बार चीनी की आपूतिर् मांग से ज्यादा होने के आसार बन रहे हैं। बाजार पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति कम और कीमतें ऊंची रहने के चलते चीनी आयात करना आकर्षक नहीं रह गया है। चीनी आयात पर शून्य आयात शुल्क व्यवस्था खत्म होने पर सरकार ने एक जनवरी को 60 फीसदी का आयात शुल्क लगाने का फैसला किया था। सरकार ने 2011-12 में 2.45 करोड़ टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान लगाया था। लेकिन उद्योग जगत का मानना है कि इस बार चीनी का उत्पादन सरकार के अनुमान से 10 लाख टन ज्यादा हो सकता है। पिछले चीनी वर्ष में देश में 1.88 करोड़ टन चीनी का उत्पादन हुआ था। उद्योग पर नजर रखने वाले एनालिस्ट का कहना है कि चीनी उत्पादन के बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन उद्योग को लगता है कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चीनी उत्पादक राज्यों में प्रति एकड़ चीनी उत्पादन का स्तर नहीं बढ़ा तो यह पूर्ववत रह सकता है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के एक पदाधिकारी ने कहा, 'वर्ष 2011-12 में गन्ने का बुवाई ज्यादा रह सकती है।' केंद्र सरकार भी चीनी की अधिक आपूतिर् को देखते हुए ट्रेडरों द्वारा चीनी के भंडारण पर रोक हटा सकती है। यह पाबंदी मार्च 2009 में लगी थी। इसके हिसाब से ट्रेडर ज्यादा से ज्यादा 200 टन चीनी का भंडारण कर सकता था। यह पाबंदी 31 दिसंबर को खत्म होने वाली थी लेकिन सरकार ने इसे तीन महीने के लिए बढ़ा दिया। (ET Hindi)