10 जनवरी 2011
इस वर्ष भी बनी रहेगी कमोडिटी के दाम में तेजी
नई दिल्ली : नए वर्ष का आरंभ हो चुका है, लेकिन कमोडिटी बाजार में हालात ज्यादा नहीं बदले हैं। कृषि कमोडिटी का मार्केटिंग सीजन अक्टूबर से सितंबर या अप्रैल से मार्च तक चलता है। ऐसे में आपूर्ति की समस्याएं और कीमतों में उतार-चढ़ाव गर्मियों तक जारी रहेगा। इस समय धान, तिलहन, दालों, गन्ने और सब्जियों की दोबारा बुआई होगी। विश्व की बात की जाए तो मौसम 2011 का सबसे बड़ा जुआ होगा। ला नीना की वजह से ब्राजील, मलेशिया, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना और अमेरिका में सूखे ने मक्का, गेहूं, चीनी, पाम ऑयल और सोयाबीन के वैश्विक दाम कई वर्षों के उच्च स्तरों पर पहुंचा दिए हैं। 2009 के सूखे और 2010 में सामान्य से अधिक मानसून और उसके बाद की वर्षा से भारत में फलों, सब्जियों, अनाज, दालों, तिलहन, चीनी, कॉफी, चाय और मसालों की आपूर्ति घट गई है। भारत पाम ऑयल, ड्राई फ्रूट और दालों का आयात करता है और ये सभी महंगे हैं। मेटल, ईंधन, कोयला, रबड़ और कपास जैसी कमोडिटी भी और महंगी होगी। पिछले सप्ताह धातु और कोयला खदानों के साथ ही तेल के कुओं पर काम में काफी तेजी आई है लेकिन इनमें उत्पादन शुरू होने में अभी लंबा समय लगेगा। इसका मतलब यह है कि इस वर्ष भी हमें 2010 की तरह कमोडिटी की सप्लाई की दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। कंपनियां कमोडिटी की ज्यादातर खरीदारी हाजिर बाजार से करेंगी। इससे उनके प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव बनेगा। 2011 में भी मुद्रास्फीति सुर्खियों में बनी रहेगी। महंगाई दर बढ़ने से केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका, ब्राजील, चीन, रूस जैसे बड़े देश भी चिंता में हैं। इससे लड़ने के लिए मौद्रिक सख्ती करनी पड़ेगी। भारत में गेहूं, चावल, कपास या खनिज उत्पादन को देश में ही रखना होगा और घरेलू कीमतें घटाने के लिए निर्यात पर लगाम लगानी होगी। सरकारें घटते भंडारों को मजबूत करने के लिए खुद के खाते में कच्चे माल का आयात करेंगी। ऐसा करने वालों में चीन प्रमुख होगा। एक बात स्पष्ट है कि महंगे बैंक लोन और कामकाजी पूंजी की कमी की वजह से ज्यादा निजी कंपनियां ऊंची कीमतों पर आयात नहीं कर पाएंगी और इन्हें स्टॉक जमा करने में भी परेशानी होगी। संरक्षणवाद का जोर रहेगा क्योंकि जब अर्थव्यवस्थाएं कमजोर होती हैं तो उपभोक्ता मांग घटती है और बेरोजगारी अधिक होती है। कोई भी देश ऐसी आयातित वस्तुएं नहीं चाहेगा, जिनसे नौकरियों में कटौती हो या फिर मार्जिन पर दबाव बढ़े। इस वर्ष वैश्विक अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से नहीं बढ़ेगी जितनी हमने उम्मीद की थी। पिछले सप्ताह जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2011 में वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर 3 फीसदी और 2012 में 3.5 फीसदी रह सकती है। इन दरों से उन तीन करोड़ नौकरियों की रिकवरी नहीं हो जाएगी जो आर्थिक मंदी के दौरान खत्म हुई थीं। अमेरिका में आर्थिक वृद्धि 2010 में 2.6 फीसदी थी जो इस वर्ष घटकर 2.2 फीसदी पर आने का अनुमान है। ईयू और जापान के लिए भी हालात बहुत अच्छे नहीं दिख रहे। क्या कुछ अच्छे समाचार भी मिलेंगे? कुछ सेक्टर काफी आकर्षक रहेंगे। इनमें पर्यावरण और सतत ऊर्जा प्रमुख हैं क्योंकि सरकारें प्रदूषण को लेकर मानक कड़े करने के साथ ही निवेश पर सब्सिडी भी देंगी। सोना 2010 में 30 फीसदी चढ़ा है और निराशाजनक आर्थिक समाचारों का प्रवाह बढ़ने से इसमें और तेजी आ सकती है। 2011 उन कंपनियों के लिए आसान होगा जो अनिश्चितता पर कारोबार करती हैं और मुश्किलों में आगे बढ़ने का हुनर जानती हैं। इसके साथ ही, वे ब्रांड सफल रहेंगे जो ग्राहक की बदलती जरूरतों और इच्छाओं के अनुसार खुद को ढाल सकते हैं। 2011 एक आसान वर्ष नहीं होगा। (ET Hindi)
राज्य कसे जमाखोरों पर शिकंजा: वित्त मंत्री
नई दिल्ली January 07, 2011
खाने-पीने की चीजों की महंगाई में नरमी लाने की खातिर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर महंगाई को नियंत्रित करने में उनकी मदद मांगी है। वित्त मंत्री ने कहा है कि आपूर्ति की स्थिति ठीक करने के लिए राज्य जमाखोरों पर शिकंजा कसे। उन्होंने कहा है कि खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति ठीक करने के लिए राज्य सरकारों को तत्काल स्थानीय तत्वों पर नजर डालनी चाहिए, जो थोक व खुदरा कीमतों के बीच की खाई को चौड़ा कर रहे हैं। 25 दिसंबर को समाप्त हफ्ते में महंगाई का आंकड़ा 18.32 फीसदी पर पहुंच गया है और गुरुवार को इसके जारी होने के एक दिन बाद वित्त मंत्री ने यह कदम उठाया है।वित्त मंत्रालय की जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, वित्त मंत्री ने सभी राज्य सरकारों से अनुरोध किया है कि वह आपूर्ति श्रृंखला के सभी अवरोधों को दूर करें और इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करें क्योंकि ये चीजें अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ा रहे हैं। गुरुवार को जारी महंगाई के आंकड़ों से पता चलता है कि महंगाई में मुख्य तौर पर इजाफा सब्जियों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से हुई है, वहीं इसके एक चौथाई हिस्से के लिए दूध की बढ़ती कीमतें जिम्मेदार रही हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में अनाज व दालों के दाम गिरे हैं और हाल के हफ्तोंं में भी इसका गिरना जारी है जबकि खाद्य महंगाई का रुख इसके ठीक उलट है। अप्रैल 2010 में 21 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच चुकी महंगाई साल दर साल के हिसाब से 20 नवंबर 2010 को गिरकर 8.6 फीसदी पर आ गई थी, लेकिन उसके बाद से इसमें बढ़ोतरी होती रही है। (BS Hindi)
खाने-पीने की चीजों की महंगाई में नरमी लाने की खातिर वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर महंगाई को नियंत्रित करने में उनकी मदद मांगी है। वित्त मंत्री ने कहा है कि आपूर्ति की स्थिति ठीक करने के लिए राज्य जमाखोरों पर शिकंजा कसे। उन्होंने कहा है कि खाने-पीने की चीजों की आपूर्ति ठीक करने के लिए राज्य सरकारों को तत्काल स्थानीय तत्वों पर नजर डालनी चाहिए, जो थोक व खुदरा कीमतों के बीच की खाई को चौड़ा कर रहे हैं। 25 दिसंबर को समाप्त हफ्ते में महंगाई का आंकड़ा 18.32 फीसदी पर पहुंच गया है और गुरुवार को इसके जारी होने के एक दिन बाद वित्त मंत्री ने यह कदम उठाया है।वित्त मंत्रालय की जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, वित्त मंत्री ने सभी राज्य सरकारों से अनुरोध किया है कि वह आपूर्ति श्रृंखला के सभी अवरोधों को दूर करें और इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करें क्योंकि ये चीजें अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ा रहे हैं। गुरुवार को जारी महंगाई के आंकड़ों से पता चलता है कि महंगाई में मुख्य तौर पर इजाफा सब्जियों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी से हुई है, वहीं इसके एक चौथाई हिस्से के लिए दूध की बढ़ती कीमतें जिम्मेदार रही हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में अनाज व दालों के दाम गिरे हैं और हाल के हफ्तोंं में भी इसका गिरना जारी है जबकि खाद्य महंगाई का रुख इसके ठीक उलट है। अप्रैल 2010 में 21 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंच चुकी महंगाई साल दर साल के हिसाब से 20 नवंबर 2010 को गिरकर 8.6 फीसदी पर आ गई थी, लेकिन उसके बाद से इसमें बढ़ोतरी होती रही है। (BS Hindi)
रबी फसलों को मिला बारिश का फायदा
मुंबई January 07, 2011
बेमौसम बारिश ने महाराष्ट्र में खरीफ की फसलों को भले ही भारी क्षति पहुंचाई हो लेकिन इससे यहां रबी फसलों को जबरदस्त फायदा पहुंचने का अनुमान है। राज्य में लंबे समय तक बारिश होना रबी फसलों की बुआई के लिए अनुकूल माना जा रहा है। यही कारण है कि चालू रबी सत्र के दौरान राज्य में अब तक फसलों की बुआई में अच्छी खासी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। राज्य में रबी फसलों की बुआई के लिए कुल तय लक्ष्य 58.6 लाख हेक्टेयर में से 3 जनवरी तक 55 लाख हेक्टेयर भूमि में फसलों की बुआई हो चुकी है। इस आधार पर देखें तो फसल बुआई का काम लगभग 94 फीसदी पूरा हो चुका है। बाकी हिस्सों में भी कुछ दिनों के अंदर बुआई हो जाने की उम्मीद है। प्रमुख रबी फसल गेहूं, चना आदि की बुआई अब तक तय लक्ष्य से भी ज्यादा हो चुकी है। राज्य में इस साल 9 लाख हेक्टेयर में गेहूं लगाने का लक्ष्य रखा गया था जबकि अब तक कुल 10.9 लाख हेक्टेयर में इसकी बुआई हो चुकी है। इसी तरह अब तक 12.9 लाख हेक्टेयर में चने की बुआई की जा चुकी है जबकि चालू सत्र के लिए केवल 10.6 लाख हेक्टेयर भूमि में चना बोने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि इस दौरान ज्वार के रकबे में कमी आई है। 30.8 लाख हेक्टेयर तय तक्ष्य की तुलना में अब तक केवल 26 लाख हेक्टेयर भूमि में ज्वार की बुआई हो सकी है। माना जा रहा है कि यह तय लक्ष्य से पीछे रह सकता है। इसी तरह सूरजमुखी तेल की खेती को लेकर भी किसानों ने बेरुखी दिखाई है। बाजार में इसके दामो में स्थिरता और पानी की पर्याप्त उपलब्धता न होने की वजह से किसानों ने इस बार काफी कम मात्रा में सूरजमुखी की खेती की है। अब तक 0.82 लाख हेक्टेयर भूमि में ही इसकी फसल लगाई गई है जबकि लक्ष्य 2.03 लाख हेक्टेयर में फसल लगाने का था। महाराष्ट्र कृषि आयुक्त कार्यालय के अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'राज्य में इस बार अतिरिक्त बारिश होने से रबी फसलों को काफी फायदा पहुंचा है। यही कारण है कि चालू रबी सत्र में अब तक इसका रकबा बढ़ा है। महाराष्ट्र में कुल खाद्यान्न उपज में से करीब 35 फीसदी हिस्सा रबी सत्र का और 65 फीसदी हिस्सा खरीफ सत्र का होता है। अधिकारी के मुताबिक खरीफ सत्र के दौरान कुल 1.50 करोड़ टन अनाज में से करीब 12.5 लाख टन अनाज बेमौसम बारिश के चलते बर्बाद हो गया। हालांकि रबी फसलों के लिए ऐसी स्थिति नहीं होने की उम्मीद है। रबी सत्र के दौरान प्याज की खेती में कमी के संकेत मिल रहे हैं। कहा जा रहा है कि प्याज के दामों में अचानक आई तेजी के बावजूद प्याज की रबी फसल की बुआई में कमी आई है। राज्य में प्याज के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र नासिक में भी प्याज के रकबे में गिरावट की खबरें हैं। इसका कारण यह है कि खरीफ सत्र के दौरान बारिश की वजह से प्याज की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। इसके अलावा किसानों को प्याज की खेती के लिए पर्याप्त बीज भी नहीं मिल पा रहे हैं। अधिकारी ने बताया कि इस वजह से प्याज फसल की बुआई प्रभावित हो रही है। अधिकारी का कहना है, 'प्याज की खरीफ फसल पूरी तरह तैयार हो चुकी थी और अब किसान इसकी हार्वेस्टिंग कर इसे बाजार में लाने की योजना बना रहे थे कि तभी बारिश ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बारिश के चलते प्याज की फसल तबाह हो गई और किसानों को भारी नुकसान हुआ। जबकि इस समय बाजार में प्याज के भाव ऊंचे होने से किसानों को इससे जबरदस्त मुनाफे की उम्मीद थी। (BS Hindi)
बेमौसम बारिश ने महाराष्ट्र में खरीफ की फसलों को भले ही भारी क्षति पहुंचाई हो लेकिन इससे यहां रबी फसलों को जबरदस्त फायदा पहुंचने का अनुमान है। राज्य में लंबे समय तक बारिश होना रबी फसलों की बुआई के लिए अनुकूल माना जा रहा है। यही कारण है कि चालू रबी सत्र के दौरान राज्य में अब तक फसलों की बुआई में अच्छी खासी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। राज्य में रबी फसलों की बुआई के लिए कुल तय लक्ष्य 58.6 लाख हेक्टेयर में से 3 जनवरी तक 55 लाख हेक्टेयर भूमि में फसलों की बुआई हो चुकी है। इस आधार पर देखें तो फसल बुआई का काम लगभग 94 फीसदी पूरा हो चुका है। बाकी हिस्सों में भी कुछ दिनों के अंदर बुआई हो जाने की उम्मीद है। प्रमुख रबी फसल गेहूं, चना आदि की बुआई अब तक तय लक्ष्य से भी ज्यादा हो चुकी है। राज्य में इस साल 9 लाख हेक्टेयर में गेहूं लगाने का लक्ष्य रखा गया था जबकि अब तक कुल 10.9 लाख हेक्टेयर में इसकी बुआई हो चुकी है। इसी तरह अब तक 12.9 लाख हेक्टेयर में चने की बुआई की जा चुकी है जबकि चालू सत्र के लिए केवल 10.6 लाख हेक्टेयर भूमि में चना बोने का लक्ष्य रखा गया था। हालांकि इस दौरान ज्वार के रकबे में कमी आई है। 30.8 लाख हेक्टेयर तय तक्ष्य की तुलना में अब तक केवल 26 लाख हेक्टेयर भूमि में ज्वार की बुआई हो सकी है। माना जा रहा है कि यह तय लक्ष्य से पीछे रह सकता है। इसी तरह सूरजमुखी तेल की खेती को लेकर भी किसानों ने बेरुखी दिखाई है। बाजार में इसके दामो में स्थिरता और पानी की पर्याप्त उपलब्धता न होने की वजह से किसानों ने इस बार काफी कम मात्रा में सूरजमुखी की खेती की है। अब तक 0.82 लाख हेक्टेयर भूमि में ही इसकी फसल लगाई गई है जबकि लक्ष्य 2.03 लाख हेक्टेयर में फसल लगाने का था। महाराष्ट्र कृषि आयुक्त कार्यालय के अधिकारी ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, 'राज्य में इस बार अतिरिक्त बारिश होने से रबी फसलों को काफी फायदा पहुंचा है। यही कारण है कि चालू रबी सत्र में अब तक इसका रकबा बढ़ा है। महाराष्ट्र में कुल खाद्यान्न उपज में से करीब 35 फीसदी हिस्सा रबी सत्र का और 65 फीसदी हिस्सा खरीफ सत्र का होता है। अधिकारी के मुताबिक खरीफ सत्र के दौरान कुल 1.50 करोड़ टन अनाज में से करीब 12.5 लाख टन अनाज बेमौसम बारिश के चलते बर्बाद हो गया। हालांकि रबी फसलों के लिए ऐसी स्थिति नहीं होने की उम्मीद है। रबी सत्र के दौरान प्याज की खेती में कमी के संकेत मिल रहे हैं। कहा जा रहा है कि प्याज के दामों में अचानक आई तेजी के बावजूद प्याज की रबी फसल की बुआई में कमी आई है। राज्य में प्याज के प्रमुख उत्पादक क्षेत्र नासिक में भी प्याज के रकबे में गिरावट की खबरें हैं। इसका कारण यह है कि खरीफ सत्र के दौरान बारिश की वजह से प्याज की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। इसके अलावा किसानों को प्याज की खेती के लिए पर्याप्त बीज भी नहीं मिल पा रहे हैं। अधिकारी ने बताया कि इस वजह से प्याज फसल की बुआई प्रभावित हो रही है। अधिकारी का कहना है, 'प्याज की खरीफ फसल पूरी तरह तैयार हो चुकी थी और अब किसान इसकी हार्वेस्टिंग कर इसे बाजार में लाने की योजना बना रहे थे कि तभी बारिश ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। बारिश के चलते प्याज की फसल तबाह हो गई और किसानों को भारी नुकसान हुआ। जबकि इस समय बाजार में प्याज के भाव ऊंचे होने से किसानों को इससे जबरदस्त मुनाफे की उम्मीद थी। (BS Hindi)
इस साल नई ऊंचाई का रुख करेगी तांबे की कीमत
January 07, 2011
अगर आपसे कोई यह पूछे कि नए साल में किस धातु की चमक सबसे ज्यादा रहने वाली है तो आप बिना हिचकिचाए तांबे का नाम ले सकते हैं। क्रिसमस के मौके पर छुट्टी के समय या इससे कुछ पहले बाजार में बहुत ज्यादा गतिविधियां नहीं रहती हैं क्योंकि ज्यादातर ट्रेडर्स सौदा बेचकर मुनाफावसूली करने में लगे रहते हैं। इसके बावजूद तांबे की कीमतें छुट्टी के पहले ही करीब तीन महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई थी। इसके पक्ष में कई बुनियादी चीजें हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है तांबा नए साल में तेजी से आगे बढ़ेगा और यह जल्द ही 1,100 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंचेगा। यदि वैश्विक स्तर पर इसकी आपूर्ति का स्तर सामान्य रहा और मांग में अपेक्षाकृत वृद्घि थोड़ी धीमी रही तो इसकी तेजी पर थोड़ा ब्रेक लग सकता है। लेकिन तमाम आंकड़े और अनुमान इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि तांबे की मांग में इजाफा होने के साथ ही इसकी आपूर्ति को लेकर संकट बरकरार रह सकता है। चिली स्थित विश्व की तीसरी सबसे बड़ी तांबे की खदान कोलाहुसई से तांबे की आपूर्ति पर अनिश्चित समय तक के लिए रोक लगा दी गई है। इससे वैश्विक स्तर पर तांबे की आपूर्ति का संकट उत्पन्न हो गया है। कोलाहुसई के पास वर्ष 2009 में तांबे की कुल खदान का करीब 3.3 फीसदी हिस्सा था। पिछले दिनों एक दुर्घटना की वजह से यहां काम करने वाले तीन मजदूरों की जान चली गई थी और पोर्ट टर्मिनल भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसकी वजह से खदान से फिलहाल तांबे की अपूर्ति पर रोक लगानी पड़ी है। हालांकि कोलाहुसई से तांबे की आपूर्ति ठप ज्यादा दिन तक नहीं रहने वाली है और कुछ दिन के बाद यहां से आपूर्ति सामान्य हो सकती है। लेकिन कोलाहुसई में हुई इस दुर्घटना के पहले भी ज्यादातर शोधकर्ताओं, बैंकों और बाजार जानकारों ने यह अनुमान लगाया था कि आने वाले समय में तांबे की आपूर्ति में बाधा पहुंच सकती है। कारोबारियों का तो यह भी कहना था कि आपूर्ति में तंगी होने से इसका प्रभाव अन्य मूल धातुओं पर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं की भविष्यवाणी के मुताबिक वर्ष 2011 में मांग की तुलना में तांबे की आपूर्ति में कमी 3,80,000 टन के स्तर से बढ़कर 5,00,000 टन के स्तर पर पहुंच सकती है। स्टैंडर्ड बैंक का अनुमान है कि 2012 में मांग और पूर्ति के बीच अंतर 5,62,000 टन रह सकता है। तांबा उद्योग की अंतरराष्टï्रीय स्तर की संस्था इंटरनैशनल कॉपर स्टडी ग्रुप का अनुमान है कि इस साल मांग की तुलना में 4,35,000 टन तांबे की कमी रह सकती है। तांबे की आपूर्ति दिन प्रति दिन घटने की पीछे कई प्रमुख कारण रहे हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि हाल के कुछ वर्षों में तांबा उद्योग में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ है। तांबे की नई खदानों की खोज और शोध आदि पर पिछले लंबे समय से कोई काम नहीं हुआ है। इसके अलावा इस समय तांबे की जो खदानें हैं उससे भी आपूर्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है जबकि इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में से 2011 में तांबे की खपत भारत में सबसे तेजी से बढऩे की उम्मीद है। वर्ष 2009-10 देश में 13 फीसदी की दर से तांबे की खपत बढ़ी थी। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के विस्तार पर जोर से लगाता है कि आने वाले सालों में तांबे की खपत और तेजी से बढ़ेगी। हालांकि घरेलू तांबा उद्योग लगातार मुश्किलों से जूझ रहा है और इन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से घरेलू स्तर पर तांबे की आपूर्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। हिंदुस्तान कॉपर के चेयरमैन शकील अहमद इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि एचसीएल को 28 करोड़ टन का लीस अधिकार मिला हुआ है जबकि देश में 37 करोड़ टन तांबे का भंडार है। उन्होंने एचसीएल से सिफारिश की है कि तांबे का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में वे कदम उठाए। एचसीएल ने वर्ष 2015-16 तक 1.25 करोड़ टन तांबा उत्पादन का लक्ष्य रखा है जबकि पिछले साल इसका कुल उत्पादन केवल 32 लाख टन रहा था। हालांकि एचसीएल के लिए इस लक्ष्य को प्राप्त कर पाना बहुत मुश्किल नहीं है। वैश्विक स्तर पर तांबे की कम आपूर्ति की वजह से ही इसके दाम लगातार बढ़ रहे हैं। बताया जाता है कि जिस तरह सभी क्षेत्रों की ओर से इसकी मांग में बढ़ोतरी हो रही है उससे लगता है कि आने वाले समय में इसकी किल्लत और ज्याद बढ़ेगी। ऐसे में भारत जैसे देशों को जरूरत के हिसाब से तांबे का उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा। चीन के बाद अमेरिका तांबे का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। फेड रिजर्व के पूर्व चेयरमैन अलेन ग्रीनस्पेन के मुताबिक 2011 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी 3 से 3.5 फीसदी की दर से बढऩे की उम्मीद है। ऐसे में यहां भी तांबे की मांग में इजाफा होने की संभावना है। नवंबर माह के आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें कहा गया है कि अमेरिका में उपभोक्ता और बिजनेस खर्च में तेजी आई है और यह पिछले माह की मजबूती पर है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि 2011 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की भी रफ्तार तेज होने जा रही है। दूसरी तरफ चीन में तो तांबे की मांग पहले से ही सबसे ज्यादा है। (BS Hindi)
अगर आपसे कोई यह पूछे कि नए साल में किस धातु की चमक सबसे ज्यादा रहने वाली है तो आप बिना हिचकिचाए तांबे का नाम ले सकते हैं। क्रिसमस के मौके पर छुट्टी के समय या इससे कुछ पहले बाजार में बहुत ज्यादा गतिविधियां नहीं रहती हैं क्योंकि ज्यादातर ट्रेडर्स सौदा बेचकर मुनाफावसूली करने में लगे रहते हैं। इसके बावजूद तांबे की कीमतें छुट्टी के पहले ही करीब तीन महीने की ऊंचाई पर पहुंच गई थी। इसके पक्ष में कई बुनियादी चीजें हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है तांबा नए साल में तेजी से आगे बढ़ेगा और यह जल्द ही 1,100 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंचेगा। यदि वैश्विक स्तर पर इसकी आपूर्ति का स्तर सामान्य रहा और मांग में अपेक्षाकृत वृद्घि थोड़ी धीमी रही तो इसकी तेजी पर थोड़ा ब्रेक लग सकता है। लेकिन तमाम आंकड़े और अनुमान इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि तांबे की मांग में इजाफा होने के साथ ही इसकी आपूर्ति को लेकर संकट बरकरार रह सकता है। चिली स्थित विश्व की तीसरी सबसे बड़ी तांबे की खदान कोलाहुसई से तांबे की आपूर्ति पर अनिश्चित समय तक के लिए रोक लगा दी गई है। इससे वैश्विक स्तर पर तांबे की आपूर्ति का संकट उत्पन्न हो गया है। कोलाहुसई के पास वर्ष 2009 में तांबे की कुल खदान का करीब 3.3 फीसदी हिस्सा था। पिछले दिनों एक दुर्घटना की वजह से यहां काम करने वाले तीन मजदूरों की जान चली गई थी और पोर्ट टर्मिनल भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था। इसकी वजह से खदान से फिलहाल तांबे की अपूर्ति पर रोक लगानी पड़ी है। हालांकि कोलाहुसई से तांबे की आपूर्ति ठप ज्यादा दिन तक नहीं रहने वाली है और कुछ दिन के बाद यहां से आपूर्ति सामान्य हो सकती है। लेकिन कोलाहुसई में हुई इस दुर्घटना के पहले भी ज्यादातर शोधकर्ताओं, बैंकों और बाजार जानकारों ने यह अनुमान लगाया था कि आने वाले समय में तांबे की आपूर्ति में बाधा पहुंच सकती है। कारोबारियों का तो यह भी कहना था कि आपूर्ति में तंगी होने से इसका प्रभाव अन्य मूल धातुओं पर पड़ सकता है। शोधकर्ताओं की भविष्यवाणी के मुताबिक वर्ष 2011 में मांग की तुलना में तांबे की आपूर्ति में कमी 3,80,000 टन के स्तर से बढ़कर 5,00,000 टन के स्तर पर पहुंच सकती है। स्टैंडर्ड बैंक का अनुमान है कि 2012 में मांग और पूर्ति के बीच अंतर 5,62,000 टन रह सकता है। तांबा उद्योग की अंतरराष्टï्रीय स्तर की संस्था इंटरनैशनल कॉपर स्टडी ग्रुप का अनुमान है कि इस साल मांग की तुलना में 4,35,000 टन तांबे की कमी रह सकती है। तांबे की आपूर्ति दिन प्रति दिन घटने की पीछे कई प्रमुख कारण रहे हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि हाल के कुछ वर्षों में तांबा उद्योग में कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ है। तांबे की नई खदानों की खोज और शोध आदि पर पिछले लंबे समय से कोई काम नहीं हुआ है। इसके अलावा इस समय तांबे की जो खदानें हैं उससे भी आपूर्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई है जबकि इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में से 2011 में तांबे की खपत भारत में सबसे तेजी से बढऩे की उम्मीद है। वर्ष 2009-10 देश में 13 फीसदी की दर से तांबे की खपत बढ़ी थी। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार और इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के विस्तार पर जोर से लगाता है कि आने वाले सालों में तांबे की खपत और तेजी से बढ़ेगी। हालांकि घरेलू तांबा उद्योग लगातार मुश्किलों से जूझ रहा है और इन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस वजह से घरेलू स्तर पर तांबे की आपूर्ति में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। हिंदुस्तान कॉपर के चेयरमैन शकील अहमद इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि एचसीएल को 28 करोड़ टन का लीस अधिकार मिला हुआ है जबकि देश में 37 करोड़ टन तांबे का भंडार है। उन्होंने एचसीएल से सिफारिश की है कि तांबे का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में वे कदम उठाए। एचसीएल ने वर्ष 2015-16 तक 1.25 करोड़ टन तांबा उत्पादन का लक्ष्य रखा है जबकि पिछले साल इसका कुल उत्पादन केवल 32 लाख टन रहा था। हालांकि एचसीएल के लिए इस लक्ष्य को प्राप्त कर पाना बहुत मुश्किल नहीं है। वैश्विक स्तर पर तांबे की कम आपूर्ति की वजह से ही इसके दाम लगातार बढ़ रहे हैं। बताया जाता है कि जिस तरह सभी क्षेत्रों की ओर से इसकी मांग में बढ़ोतरी हो रही है उससे लगता है कि आने वाले समय में इसकी किल्लत और ज्याद बढ़ेगी। ऐसे में भारत जैसे देशों को जरूरत के हिसाब से तांबे का उत्पादन बढ़ाने पर जोर देना होगा। चीन के बाद अमेरिका तांबे का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। फेड रिजर्व के पूर्व चेयरमैन अलेन ग्रीनस्पेन के मुताबिक 2011 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी 3 से 3.5 फीसदी की दर से बढऩे की उम्मीद है। ऐसे में यहां भी तांबे की मांग में इजाफा होने की संभावना है। नवंबर माह के आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें कहा गया है कि अमेरिका में उपभोक्ता और बिजनेस खर्च में तेजी आई है और यह पिछले माह की मजबूती पर है। इससे संकेत मिल रहे हैं कि 2011 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की भी रफ्तार तेज होने जा रही है। दूसरी तरफ चीन में तो तांबे की मांग पहले से ही सबसे ज्यादा है। (BS Hindi)
ऊंचे प्रीमियम पर सोने की बुकिंग करा रहे हैं आभूषण निर्माता
मुंबई January 09, 2011
भारतीय आयातक यूरोप से सोने की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 20-30 सेंट प्रति पाउंड के हिसाब से अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान कर रहे हैं। आगामी शादी ब्याह व त्योहारी सीजन में आभूषणों के ठीक-ठाक प्रवाह की बाबत तैयारी के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। यह प्रीमियम ब्रिटेन व स्विट्जरलैंड समेत विभिन्न यूरोपीय देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सामान्य तौर पर 80 सेंट से एक डॉलर तक दिए जाने वाले प्रीमियम के ऊपर है। यानी इतना प्रीमियम वे सामान्य स्थिति में चुकाते हैं जबकि मौजूदा समय में वे 20-30 सेंट अतिरिक्त प्रीमियम दे रहे हैं।आश्चर्यजनक रूप से भारतीय उपभोक्ताओं में सोने के प्रति बढ़ते लगाव ने दुबई के निर्यातकों को यूरोपीय बाजार के हिसाब से कीमत बढ़ाने का मौका मुहैया करा दिया है। सामान्य तौर पर यूरोप के मुकाबले मामूली छूट पर दुबई से सोने का आयात किया जाता है। लेकिन मौजूदा समय में मांग यूरोप से दुबई शिफ्ट कर गया है। इसके परिणामस्वरूप दुबई में सोने की कीमतें असामान्य रूप से यूरोप के स्तर पर पहुंच गई हैं।मुंबई के विशेषज्ञ बी. एन. वैद्य ऐंड एसोसिएट्स के भार्गव वैद्य ने कहा - छुट्टियों की वजह से जब यूरोपीय बाजार लंबे समय तक बंद रहेगा और हम अतिरिक्त मात्रा की मांग अचानक करेंगे तो प्रीमियम ऊपर चला जाएगा। हर जिंस के साथ ऐसा होता है, लिहाजा इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।आगामी सीजन के लिए आभूषण तैयार करने की खातिर आभूषण निर्माता सोने की आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं, जो 14 जनवरी के बाद शुरू होने वाला है। 14 जनवरी को दक्षिण भारत में पोंगल के तौर पर मनाया जाता है जबकि उत्तर भारत में यह मकर संक्रांति के तौर पर। इसके साथ ही पूरे भारत में सोने के आभूषण की खरीदारी शुरू हो जाती है। जनवरी के आखिरी हफ्ते से भारत में शादी-विवाह का सीजन भी शुरू हो जाता है, इसके लिए आभूषण निर्माता दो-ढाई महीने पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। एक पखवाड़े पहले ही सामान्यत: आभूषण शोरूम में सजा दिए जाते हैं ताकि उपभोक्ता अपनी पसंद के हिसाब से चयन कर सके।रिद्धि-सिद्ध बुलियन के निदेशक पृथ्वीराज कोठारी ने कहा कि मौजूदा समय में भारत में सोने की मांग सामान्य स्थिति में है, लेकिन हर गिरावट में बिक्री बढ़ रही है। चूंकि शुक्रवार को कीमतों में गिरावट आई है, लिहाजा मांग में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई। अगर कीमतों में और संशोधन होता है तो खरीदार इस अनुमान के आधार पर खरीदारी से परहेज करेंगे कि आगामी दिनों में और गिरावट आ सकती है।शुक्रवार को सोना 145 रुपये गिरकर 20150 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया जबकि चांदी 745 रुपये टूटकर 45175 रुपये प्रति किलोग्राम रही। हालांकि शनिवार को सोने की कीमतों में थोड़ा सुधार आया और सोना 130 रुपये की बढ़ोतरी के साथ 20280 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। इसी तरह चांदी में 225 रुपये की तेजी देखी गई और यह 45400 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई।एमसीएक्स में हालांकि फरवरी में डिलिवरी वाला सोना 20375 रुपये प्रति 10 ग्राम पर रहा जबकि अहमदाबाद के हाजिर बाजार में सोना 20375 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पर बिका। कॉमेक्स में फरवरी में डिलिवरी वाला सोना वायदा 2.80 डॉलर गिरकर 1368.90 डॉलर प्रति आउंस पर रहा। भारत में आभूषण व निवेश मांग के चलते सोने की खपत इस साल 750 टन के पार चले जाने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल सोने में 18 से 20 फीसदी का रिटर्न मिलने की उम्मीद है और कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना का बाजार गुलजार रहेगा। (BS Hindi)
भारतीय आयातक यूरोप से सोने की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 20-30 सेंट प्रति पाउंड के हिसाब से अतिरिक्त प्रीमियम का भुगतान कर रहे हैं। आगामी शादी ब्याह व त्योहारी सीजन में आभूषणों के ठीक-ठाक प्रवाह की बाबत तैयारी के लिए वे ऐसा कर रहे हैं। यह प्रीमियम ब्रिटेन व स्विट्जरलैंड समेत विभिन्न यूरोपीय देशों से आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सामान्य तौर पर 80 सेंट से एक डॉलर तक दिए जाने वाले प्रीमियम के ऊपर है। यानी इतना प्रीमियम वे सामान्य स्थिति में चुकाते हैं जबकि मौजूदा समय में वे 20-30 सेंट अतिरिक्त प्रीमियम दे रहे हैं।आश्चर्यजनक रूप से भारतीय उपभोक्ताओं में सोने के प्रति बढ़ते लगाव ने दुबई के निर्यातकों को यूरोपीय बाजार के हिसाब से कीमत बढ़ाने का मौका मुहैया करा दिया है। सामान्य तौर पर यूरोप के मुकाबले मामूली छूट पर दुबई से सोने का आयात किया जाता है। लेकिन मौजूदा समय में मांग यूरोप से दुबई शिफ्ट कर गया है। इसके परिणामस्वरूप दुबई में सोने की कीमतें असामान्य रूप से यूरोप के स्तर पर पहुंच गई हैं।मुंबई के विशेषज्ञ बी. एन. वैद्य ऐंड एसोसिएट्स के भार्गव वैद्य ने कहा - छुट्टियों की वजह से जब यूरोपीय बाजार लंबे समय तक बंद रहेगा और हम अतिरिक्त मात्रा की मांग अचानक करेंगे तो प्रीमियम ऊपर चला जाएगा। हर जिंस के साथ ऐसा होता है, लिहाजा इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।आगामी सीजन के लिए आभूषण तैयार करने की खातिर आभूषण निर्माता सोने की आपूर्ति सुनिश्चित कर रहे हैं, जो 14 जनवरी के बाद शुरू होने वाला है। 14 जनवरी को दक्षिण भारत में पोंगल के तौर पर मनाया जाता है जबकि उत्तर भारत में यह मकर संक्रांति के तौर पर। इसके साथ ही पूरे भारत में सोने के आभूषण की खरीदारी शुरू हो जाती है। जनवरी के आखिरी हफ्ते से भारत में शादी-विवाह का सीजन भी शुरू हो जाता है, इसके लिए आभूषण निर्माता दो-ढाई महीने पहले से ही तैयारी शुरू कर देते हैं। एक पखवाड़े पहले ही सामान्यत: आभूषण शोरूम में सजा दिए जाते हैं ताकि उपभोक्ता अपनी पसंद के हिसाब से चयन कर सके।रिद्धि-सिद्ध बुलियन के निदेशक पृथ्वीराज कोठारी ने कहा कि मौजूदा समय में भारत में सोने की मांग सामान्य स्थिति में है, लेकिन हर गिरावट में बिक्री बढ़ रही है। चूंकि शुक्रवार को कीमतों में गिरावट आई है, लिहाजा मांग में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई। अगर कीमतों में और संशोधन होता है तो खरीदार इस अनुमान के आधार पर खरीदारी से परहेज करेंगे कि आगामी दिनों में और गिरावट आ सकती है।शुक्रवार को सोना 145 रुपये गिरकर 20150 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया जबकि चांदी 745 रुपये टूटकर 45175 रुपये प्रति किलोग्राम रही। हालांकि शनिवार को सोने की कीमतों में थोड़ा सुधार आया और सोना 130 रुपये की बढ़ोतरी के साथ 20280 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ। इसी तरह चांदी में 225 रुपये की तेजी देखी गई और यह 45400 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई।एमसीएक्स में हालांकि फरवरी में डिलिवरी वाला सोना 20375 रुपये प्रति 10 ग्राम पर रहा जबकि अहमदाबाद के हाजिर बाजार में सोना 20375 रुपये प्रति 10 ग्राम के भाव पर बिका। कॉमेक्स में फरवरी में डिलिवरी वाला सोना वायदा 2.80 डॉलर गिरकर 1368.90 डॉलर प्रति आउंस पर रहा। भारत में आभूषण व निवेश मांग के चलते सोने की खपत इस साल 750 टन के पार चले जाने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस साल सोने में 18 से 20 फीसदी का रिटर्न मिलने की उम्मीद है और कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना का बाजार गुलजार रहेगा। (BS Hindi)
सोना वायदा में उतार-चढ़ाव के संकेत
मुंबई January 09, 2011
न्यू यॉर्क में सोना वायदा में पिछले छह माह की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। सोना वायदा इस आशंका में टूटा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार से सुरक्षित निवेश की बाबत इस धातु की मांग में कमी आएगी। न्यू यॉर्क के कॉमेक्स में फरवरी में डिलिवरी वाला सोना वायदा 52.5 डॉलर (3.75 फीसदी) गिरकर 1368.90 डॉलर प्रति आउंस पर बंद हुआ।सोना वायदा में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है और पिछले सोमवार को यह 1424 डॉलर प्रति आउंस की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाओं के चलते हफ्ते का निचला स्तर 1352.70 डॉलर रहा। बाद में हालांकि सोना इस खबर के बाद 1368.90 डॉलर पर बंद हुआ कि अमेरिका में दिसंबर में नौकरियों में अर्थशास्त्रियों के अनुमान से ज्यादा इजाफा हुआ है। साल 2010 में सोने में 30 फीसदी की बढ़त आई है और पिछले महीने इस वजह से यह रिकॉर्ड पर पहुंच गया था कि वैश्विक आर्थिक मंदी में अभी पूरा सुधार नहीं हो पाएगा।अगले हफ्ते बहुमूल्य धातु की तेजी सीमित दायरे में रहने की उम्मीद है और टीपीओ आधारित लक्ष्य 1397 डॉलर रहने की संभावना है। इसे 1350 डॉलर मजबूत समर्थन है। 21 दिनों का मूविंग औसत संकेत देता है कि इसमें 1390 डॉलर तक ऊपर जाने की संभावना है और समर्थन का स्तर 1350 डॉलर पर है। कारोबारियों ने इस उम्मीद में 1400 डॉलर पर कॉल ऑप्शन बेचा कि इस स्तर के ऊपर मजबूत प्रतिरोध है।शिकागो में लासैले फ्यूचर ग्रुप में मेटल ट्रेडर मैथ्यू जीमन ने कहा - चूंकि अर्थव्यवस्था में सुधार जारी है, लिहाजा सोने पर गिरावट का दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी कमोडिटी फ्यूचर ट्रेडिंग कमिशन के आंकड़ों के मुताबिक, 4 जनवरी को समाप्त हफ्ते में हेज फंड मैनेजरों व अन्य सटोरियों ने न्यू यॉर्क गोल्ड फ्यूचर में लॉन्ग पोजिशन में कमी की है। एक हफ्ते पहले के मुकाबले सकल लॉन्ग पोजिशन में 13470 कॉन्ट्रैक्ट यानी 6 फीसदी की कमी आई है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक बुलियन के मामले में सबसे बड़े एक्सचेंज ट्रेडेड फंड एसपीडीआर गोल्ड ट्रस्ट में 7 जनवरी को सोना 9.56 टन घटकर 1271.16 टन रह गया है। आईशेयर्स कॉमेक्स गोल्ड ट्रस्ट में सोना पिछले हफ्ते के मुकाबले 2723 आउंस घट गया है, जो बताता है कि मुनाफावसूली हुई है। (BS Hindi)
न्यू यॉर्क में सोना वायदा में पिछले छह माह की सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। सोना वायदा इस आशंका में टूटा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार से सुरक्षित निवेश की बाबत इस धातु की मांग में कमी आएगी। न्यू यॉर्क के कॉमेक्स में फरवरी में डिलिवरी वाला सोना वायदा 52.5 डॉलर (3.75 फीसदी) गिरकर 1368.90 डॉलर प्रति आउंस पर बंद हुआ।सोना वायदा में काफी उतारचढ़ाव देखा गया है और पिछले सोमवार को यह 1424 डॉलर प्रति आउंस की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया था, लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार की संभावनाओं के चलते हफ्ते का निचला स्तर 1352.70 डॉलर रहा। बाद में हालांकि सोना इस खबर के बाद 1368.90 डॉलर पर बंद हुआ कि अमेरिका में दिसंबर में नौकरियों में अर्थशास्त्रियों के अनुमान से ज्यादा इजाफा हुआ है। साल 2010 में सोने में 30 फीसदी की बढ़त आई है और पिछले महीने इस वजह से यह रिकॉर्ड पर पहुंच गया था कि वैश्विक आर्थिक मंदी में अभी पूरा सुधार नहीं हो पाएगा।अगले हफ्ते बहुमूल्य धातु की तेजी सीमित दायरे में रहने की उम्मीद है और टीपीओ आधारित लक्ष्य 1397 डॉलर रहने की संभावना है। इसे 1350 डॉलर मजबूत समर्थन है। 21 दिनों का मूविंग औसत संकेत देता है कि इसमें 1390 डॉलर तक ऊपर जाने की संभावना है और समर्थन का स्तर 1350 डॉलर पर है। कारोबारियों ने इस उम्मीद में 1400 डॉलर पर कॉल ऑप्शन बेचा कि इस स्तर के ऊपर मजबूत प्रतिरोध है।शिकागो में लासैले फ्यूचर ग्रुप में मेटल ट्रेडर मैथ्यू जीमन ने कहा - चूंकि अर्थव्यवस्था में सुधार जारी है, लिहाजा सोने पर गिरावट का दबाव बढ़ेगा। अमेरिकी कमोडिटी फ्यूचर ट्रेडिंग कमिशन के आंकड़ों के मुताबिक, 4 जनवरी को समाप्त हफ्ते में हेज फंड मैनेजरों व अन्य सटोरियों ने न्यू यॉर्क गोल्ड फ्यूचर में लॉन्ग पोजिशन में कमी की है। एक हफ्ते पहले के मुकाबले सकल लॉन्ग पोजिशन में 13470 कॉन्ट्रैक्ट यानी 6 फीसदी की कमी आई है। कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक बुलियन के मामले में सबसे बड़े एक्सचेंज ट्रेडेड फंड एसपीडीआर गोल्ड ट्रस्ट में 7 जनवरी को सोना 9.56 टन घटकर 1271.16 टन रह गया है। आईशेयर्स कॉमेक्स गोल्ड ट्रस्ट में सोना पिछले हफ्ते के मुकाबले 2723 आउंस घट गया है, जो बताता है कि मुनाफावसूली हुई है। (BS Hindi)
कर्नाटक में रबी के रकबे में गिरावट
बेंगलुरु January 09, 2011
कर्नाटक में इस साल रबी फसलों के रकबे में तकरीबन 15 फीसदी तक की गिरावट आई है। चालू रबी सत्र के दौरान राज्य में रबी फसलों का कुल बुआई क्षेत्र घटकर 30 लाख हेक्टेयर रह गया है जबकि पिछले साल 35.2 लाख हेक्टेयर भूमि में रबी फसलें लगाई गई थी। रकबा घटने के पीछे मूल कारण यह है कि असमय बारिश के चलते रबी फसलों की बुआई में बाधा पहुंची। साथ ही कुछ किसानों ने रबी फसल की जगह कपास या अन्य फसलों की ओर अपना रुख किया। राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से में इस साल मॉनसून की स्थिति अच्छी रहने से यहां खाद्यान्न का उत्पादन अपेक्षाकृत बेहतर रहने की संभावना है। अक्टूबर से दिसंबर की अवधि में राज्य में औसतन 271.3 एमएम की वर्षा हुई जबकि यहां औसत बारिश 172 एमएम है। यानी औसत से तकरीबन 57 फीसदी ज्यादा बारिश ने भले ही खरीफ फसलों को फायदा पहुंचाया लेकिन इसके चलते राज्य में रबी फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। इसका कारण यह है कि मिट्टïी में अभी भी पर्याप्त नमी है और खेतों में कहीं-कहीं पानी भी फसा हुआ है। इसके चलते राज्य के किसी-किसी हिस्सों में अभी भी धान और मक्के की फसलों की कटाई नहीं हो सकी है। ऐसी सूरत में एक तो खेतों में खड़ी फसल भी बर्बाद हो रही है और रबी फसलों की बुआई का समय भी निकलता जा रहा है। बताया जाता है कि राज्य में करीब 2,00,000 हेक्टेयर भूमि में अभी भी धान और मक्के की फसल खड़ी है। जल्द इसकी कटाई नहीं की गई तो यह फसल पूरी तरह बर्बाद हो सकती है। राज्य के कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा, 'वर्ष 2009-10 में खरीफ सीजन के दौरान भी कम मॉनसूनी बारिश के चलते राज्य में खरीफ फसलों विशेषकर धान की बुआई प्रभावित हुई थी और इसका रकबा घटा था लेकिन रबी फसलों की स्थिति बेहतर रही थी। इस साल स्थिति ठीक इसके विपरीत है। प्रचुर बारिश के चलते राज्य में अलग-अलग खरीफ फसलों का रकबा खूब बढ़ा। यानी इस साल खरीफ फसलों के लिए मौसम अनुकूल रहा तो रबी फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। अधिकारी ने कहा कि खरीफ फसलों की स्थिति अच्छी होने से इस साल राज्य में खाद्यान्न का उत्पादन 1.23 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। कर्नाटक में खाद्यान्न का सबसे ज्यादा उत्पादन का रिकॉर्ड वर्ष 2007-08 में 1.20 करोड़ टन है। इस आधार पर कह सकते हैं कि अनुकूल मौसम के चलते राज्य में इस बार खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन होने जा रहा है। राज्य कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में इस साल 1.23 करोड़ टन अनाज उत्पादन होने का अनुमान है जो पिछले साल की तुलना में करीब 16 फीसदी ज्यादा है। वर्ष 2009-10 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 1.06 करोड़ टन रहा था। रबी फसलों के लिए 36.5 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है। राज्य के कुल खाद्यान्न उत्पादन में से रबी फसलों का हिस्सा 20 फीसदी है। चालू रबी सत्र में अब तक 10 लाख हेक्टेयर में ज्वार और चने की बुआई भी 10 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। जबकि इस साल इन फसलों का बुआई लक्ष्य 8.86 लाख हेक्टेयर तय किया गया था। यानी ज्वार और चने का रकबा लक्ष्य से ज्यादा है। वहीं इस साल 2 लाख हेक्टयर भूमि में गेहूं लगाई गई है। जो लक्ष्य की तुलना में कम है। कपास की खेती 1,16,000 हेक्टेयर भूमि में की जा रही है। दाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाए गए खास कार्यक्रम का कुछ असर दिखाई दिया है। खरीफ और रबी दोनों सत्रों को मिलाकार इस साल कुल 28 लाख हेक्टेयर भूमि में दालों की खेती की जा रही है। यह अब तक का सर्वाधिक स्तर है। (BS Hindi)
कर्नाटक में इस साल रबी फसलों के रकबे में तकरीबन 15 फीसदी तक की गिरावट आई है। चालू रबी सत्र के दौरान राज्य में रबी फसलों का कुल बुआई क्षेत्र घटकर 30 लाख हेक्टेयर रह गया है जबकि पिछले साल 35.2 लाख हेक्टेयर भूमि में रबी फसलें लगाई गई थी। रकबा घटने के पीछे मूल कारण यह है कि असमय बारिश के चलते रबी फसलों की बुआई में बाधा पहुंची। साथ ही कुछ किसानों ने रबी फसल की जगह कपास या अन्य फसलों की ओर अपना रुख किया। राज्य के उत्तर-पूर्वी हिस्से में इस साल मॉनसून की स्थिति अच्छी रहने से यहां खाद्यान्न का उत्पादन अपेक्षाकृत बेहतर रहने की संभावना है। अक्टूबर से दिसंबर की अवधि में राज्य में औसतन 271.3 एमएम की वर्षा हुई जबकि यहां औसत बारिश 172 एमएम है। यानी औसत से तकरीबन 57 फीसदी ज्यादा बारिश ने भले ही खरीफ फसलों को फायदा पहुंचाया लेकिन इसके चलते राज्य में रबी फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। इसका कारण यह है कि मिट्टïी में अभी भी पर्याप्त नमी है और खेतों में कहीं-कहीं पानी भी फसा हुआ है। इसके चलते राज्य के किसी-किसी हिस्सों में अभी भी धान और मक्के की फसलों की कटाई नहीं हो सकी है। ऐसी सूरत में एक तो खेतों में खड़ी फसल भी बर्बाद हो रही है और रबी फसलों की बुआई का समय भी निकलता जा रहा है। बताया जाता है कि राज्य में करीब 2,00,000 हेक्टेयर भूमि में अभी भी धान और मक्के की फसल खड़ी है। जल्द इसकी कटाई नहीं की गई तो यह फसल पूरी तरह बर्बाद हो सकती है। राज्य के कृषि विभाग के एक अधिकारी ने कहा, 'वर्ष 2009-10 में खरीफ सीजन के दौरान भी कम मॉनसूनी बारिश के चलते राज्य में खरीफ फसलों विशेषकर धान की बुआई प्रभावित हुई थी और इसका रकबा घटा था लेकिन रबी फसलों की स्थिति बेहतर रही थी। इस साल स्थिति ठीक इसके विपरीत है। प्रचुर बारिश के चलते राज्य में अलग-अलग खरीफ फसलों का रकबा खूब बढ़ा। यानी इस साल खरीफ फसलों के लिए मौसम अनुकूल रहा तो रबी फसलों की बुआई प्रभावित हुई है। अधिकारी ने कहा कि खरीफ फसलों की स्थिति अच्छी होने से इस साल राज्य में खाद्यान्न का उत्पादन 1.23 करोड़ टन तक पहुंचने का अनुमान है। कर्नाटक में खाद्यान्न का सबसे ज्यादा उत्पादन का रिकॉर्ड वर्ष 2007-08 में 1.20 करोड़ टन है। इस आधार पर कह सकते हैं कि अनुकूल मौसम के चलते राज्य में इस बार खाद्यान्न का रिकॉर्ड उत्पादन होने जा रहा है। राज्य कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में इस साल 1.23 करोड़ टन अनाज उत्पादन होने का अनुमान है जो पिछले साल की तुलना में करीब 16 फीसदी ज्यादा है। वर्ष 2009-10 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 1.06 करोड़ टन रहा था। रबी फसलों के लिए 36.5 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य तय किया गया है। राज्य के कुल खाद्यान्न उत्पादन में से रबी फसलों का हिस्सा 20 फीसदी है। चालू रबी सत्र में अब तक 10 लाख हेक्टेयर में ज्वार और चने की बुआई भी 10 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। जबकि इस साल इन फसलों का बुआई लक्ष्य 8.86 लाख हेक्टेयर तय किया गया था। यानी ज्वार और चने का रकबा लक्ष्य से ज्यादा है। वहीं इस साल 2 लाख हेक्टयर भूमि में गेहूं लगाई गई है। जो लक्ष्य की तुलना में कम है। कपास की खेती 1,16,000 हेक्टेयर भूमि में की जा रही है। दाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाए गए खास कार्यक्रम का कुछ असर दिखाई दिया है। खरीफ और रबी दोनों सत्रों को मिलाकार इस साल कुल 28 लाख हेक्टेयर भूमि में दालों की खेती की जा रही है। यह अब तक का सर्वाधिक स्तर है। (BS Hindi)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
