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07 जनवरी 2011

ग्राहकों के जख्मों पर नमक

अहमदाबाद January 05, 2011
लगता है प्याज की महंगाई पर्याप्त नहीं थी कि विस्तारित मॉनसून और ज्यादा ठंड उपभोक्ताओं की जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए तैयार हो गए। उत्पादन में 35-40 फीसदी की गिरावट के बाद नमक की कीमत बढ़त की राह पर है। इसके साथ ही नमक के उत्पादन में तीन महीने की देरी हो सकती है।मॉनसून के ज्यादा समय तक टिके रहने से नमक की करीब 75 फीसदी कड़ाही (पैन) में पानी का मिश्रण हो गया है। दूसरी ओर, ज्यादा ठंड की वजह से इन कड़ाहियों से पानी का वाष्पीकरण धीमा हो गया है। उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, इस वजह से नमक के उत्पादन में देरी हो सकती है।इंडियन सॉल्ट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के आला अधिकारी ने कहा - मौजूदा साल में भारत में नमक का उत्पादन 35 से 40 फीसदी तक गिरने की आशंका है। इसकी वजह विस्तारित मॉनसून यानी देर तक मॉनसून का टिका रहना है। इस बार मॉनसून नवंबर तक टिका रहा, वहीं ज्यादा ठंड की वजह से वाष्पीकरण धीमा हो गया है, लिहाजा नमक के उत्पादन में देरी हो रही है। इस वजह से उत्पादन में कम से कम 120 दिन की देरी होगी।उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, भारत में औसतन 185-190 लाख टन नमक का उत्पादन होता है, जिसकी आपूर्ति मुख्यत: तीन कामों के लिए होती है और इनमें खाने के काम में इस्तेमाल होने के अलावा औद्योगिक मांग और निर्यात बाजार की मांग शामिल है। खाने के लिए सालाना 65 लाख टन नमक की मांग है, वहीं औद्योगिक मांग 75-80 लाख टन की है। इसके अलावा भारत हर साल 20-25 लाख टन नमक का निर्यात भी करता है।सौराष्ट्र के नमक विनिर्माता ने कहा - सामान्यत: नमक का उत्पादन अक्टूबर के आखिर में शुरू होता है और जून तक चलता है। लेकिन इस साल मॉनसून के देर तक टिके रहने की वजह से नमक के उïत्पादन में परेशानी हुई। स्टॉक फिलहाल कम है और नया उत्पादन बाजार में आने में वक्त लगेगा, इस वजह से अगले कुछ महीने में इसकी कीमतें बढ़ेंगी।नमक की कीमत में बढ़ोतरी का उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, क्योंकि सोडा ऐश उद्योग के लिए यह प्रमुख जिंसों में से एक है। गुजरात हैवी केमिकल्स लिमिटेड (जीएचसीएल) के प्रेजिडेंट सुनील भटनागर (बिक्री व विपणन) ने कहा - कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो चुकी है और यह हमारी लागत पर भारी असर डाल रही है क्योंकि सोडा ऐश उद्योग के लिए यह प्रमुख कच्चा माल है। उपलब्धता में कमी होने से सोडा ऐश के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।जीएचसीएल के पास 2200 टन रोजाना विनिर्माण की क्षमता है और मौजूदा समय में संयंत्र पूरी क्षमता के साथ संचालित किया जा रहा है। हालांकि कीमतों में संभावित बढ़ोतरी से कंपनियों को सोडा ऐश और कास्टिक सोडा के उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है। नमक का इस्तेमाल करने वाली अन्य औद्योगिक इकाइयों में निरमा लिमिटेड, टाटा केमिकल्स, सौराष्ट्र केमिकल्स लिमिटेड और जीएचसीएल शामिल है।इस बीच, विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश से आयात कर बढ़ती कीमतोंं पर लगाम कसा जा सकता है। उद्योग के सूत्रों का कहना है कि 1997 से ओपन जनरल लाइसेंस के तहत शून्य आयात शुल्क पर नमक आयात की अनुमति है। लेकिन हालिया वैश्विक जलवायु गतिरोध ने यूरोप को बर्फ से ढक दिया है जबकि चीन बाढ़ की चपेट में आ गया है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में नमक की मांग भी तेजी से बढ़ी है। बताया जाता है कि जापान, चीन, यूरोप के कुछ देशों और नेपाल, भूटान व बांग्लादेश की तरफ से भारत से नमक आयात की बाबत पूछताछ हो रही है। (BS Hindi)

पंजाब और हरियाणा में गेहूं की बंपर पैदावार की उम्मीद

चंडीगढ़ January 05, 2011
मौजूदा समय में जारी शीतलहर और पिछले साल हुई बारिश ने पंजाब और हरियाणा के किसानों के चेहरे पर मुस्कान ला दी है क्योंकि इस वजह से इस साल गेहूं की बंपर पैदावार की संभावना बढ़ गई है। कृषि अधिकारियों के मुताबिक, ज्यादा ठंड गेहूं की फसल के लिए अच्छा होता है।पंजाबफसल विविधीकरण के चलते पंजाब में गेहूं का रकबा इस साल कमोबेश पिछले साल के 35.22 लाख हेक्टेयर के आसपास ही रहेगा। हालांकि कुल उत्पादन पिछले साल के मुकाबले ज्यादा होने की संभावना है। राज्य कृषि विभाग को उम्मीद है कि इस साल 154 लाख टन का उत्पादन होगा जबकि पिछले साल 152 लाख टन का उत्पादन हुआ था। उन्होंने कहा कि इस साल प्रति हेक्टेयर पैदावार बढ़ेगी। पिछले साल 43.07 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से उत्पादन हुआ था जबकि इस साल यह 44 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर पहुंचने की संभावना है। राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक इस साल रबी सीजन मेंं गेहूं का कुल रकबा 35 लाख हेक्टेयर है जो पिछले साल के 35.22 लाख हेक्टेयर से थोड़ा कम है क्योंकि राज्य सरकार फसल विविधीकरण पर जोर दे रही है। हालांकि वास्तविक रकबे का आकलन किया जाना अभी बाकी है। यहां पर यह उल्लेख करना जरूरी है कि पिछले साल राज्य कृषि विभाग ने कहा था कि गेहूं का कुल रकबा 34.8 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा, लेकिन कुल रकबा 35.22 लाख हेक्टेयर था। यह भी गौर करने लायक है कि राज्य में रबी सीजन में कुल बोए गए क्षेत्र का 90 फीसदी गेहूं के तहत आता है जबकि बाकी में तिलहन, दलहन और जौ आदि आते हैं।
हरियाणापिछले साल राज्य में 105 लाख टन गेहूं का उत्पादन हुआ था, लेकिन इस साल 114.62 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान है। राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों ने बताया कि बेहतर मॉनसून के चलते इस साल प्रति हेक्टेयर पैदावार 46.5 क्विंटल पर पहुंच सकती है जबकि पिछले साल यह 42 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था। केंद्रीय कोष में गेहूं के अंशदान के मामले में दूसरे सबसे बड़े राज्य हरियाणा में गेहूं का कुल रकबा 24.75 लाख हेक्टेयर पर पहुंचेगा जबकि पिछले साल कुल रकबा 24.65 लाख हेक्टेयर था। कृषि अधिकारियों ने कहा कि पिछले महीने हुई बारिश से न सिर्फ इस साल रबी फसल की संभावनाएं बेहतर हुई हैं बल्कि किसानों की सिंचाई लागत में कमी लाने में भी मदद की है। एक किसान खास तौर से फसल के महत्वपूर्ण चरणों में कृत्रिम सिंचाई पर औसतन 200-300 रुपये खर्च करता है। बारिश की वजह से किसानों को 150-200 करोड़ रुपये की बचत हुई है। अधिकारियों ने कहा कि हरियाणा में सरसों का कुल रकबा इस साल 5.50 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा, जो पिछले साल 5.13 लाख हेक्टेयर था। राज्य में 10.5 लाख टन सरसों उत्पादन की संभावना है। कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, ज्यादा ठंड और कोहरे का मौसम सरसों की फसल के लिए खतरनाक होता है क्योंंकि इससे फसल पर कवक (फंगस) के हमले का खतरा तब बढ़ जाता है। (BS Hindi)

जिंस और उत्पाद के बीच फर्क करना मुश्किल

January 05, 2011
किसी भी जिंस को किस आधार पर उत्पाद का दर्जा मिलता है? इस प्रश्न का उत्तर खोजना आसान नहीं है। उदाहरण के तौर पर लौह अयस्क, कोयला और बिजली से इस्पात का निर्माण किया जाता है। जबकि दुनिया भर के बाजारों में ये सभी जिंस की तरह ही खरीदे-बेचे जाते हैं। यहां तक कि इस्पात के मामले में भी यह बात सही साबित हुई है कि यह कमोडिटी के अलावा और कुछ नहीं है। हमारे देश की कुछ बड़ी इस्पात निर्माता कंपनियां जिनमें टाटा स्टील सर्वप्रमुख हैं, अपने बिजनेस में इस्पात के कमोडिटी हिस्से को घटा रही हैं जबकि ग्राहकों की मांग के अनुरूप इसके डिजाइन पक्ष पर अधिक जोर दिया जा रहा है। यही स्थिति एल्युमीनियम के साथ भी है। एल्युमीनियम से कई तरह के उत्पाद तैयार किए जाते हैं जबकि सभी के सभी जिंस के तहत आते हैं। इसी तरह तांबे को तो जिंस माना ही जाता है जबकि इससे तैयार कैथोड और वायर रोड स्टेज भी जिंस के अंतर्गत आते हैं। लेकिन आप कार्पेट के बारे में क्या कहेंगे? इसमें कलाकारी और डिजाइन किए गए कार्पेट को कलाकार ऊंचे दामों पर बेचते हैं। और इसे अमीर लोग इसके कला पक्ष को देखते हुए शौकिया तौर पर इसकी महंगी कीमत चुकाने के लिए तैयार रहते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो फिर सदबी और क्रिस्टी जैसीे नीलामी कंपनियां कालीन और कार्पेट के लिए अलग से खंड क्यों रखते। या फिर कहें कि नवंबर 2005 में पूर्वी फारस में सफविड कार्पेट की नीलामी पर इसे 20.32 लाख डॉलर की भारी कीमत कैसे मिलती। लेकिन हम यहां इस तरह के कार्पेट के दामों की चर्चा नहीं कर रहे हैं। हम तो यहां केवल जूट, ऊन, नायलॉन और कमोडिटी से तैयार कार्पेट के बारे बात कर रहे हैं। कार्पेट के निर्यात के मामले में भारत सबसे बड़ा देश है। खास बात यह है कि निर्यात में सबसे ज्यादा योगदान हस्तनिर्मित कार्पेट और कालीन का है। जिसमें आकर्षक कलाकारी की गई होती है और विदेशों में इसकी भारी मांग भी है। हालांकि विदेशी बाजारों में आजकल चीन में मशीन द्वारा तैयार कार्पेट की बाढ़ आ गई है। जिसने भारतीय कलीन की मांग को कुछ हद तक तोड़ा है। चूंकि यह हस्तनिर्मित कालीन की तुलना में कुछ हद तक आकर्षक और कम दाम का होने की वजह से विदेशी ग्राहकों का इस ओर झुकाव बढ़ रहा है। आश्चर्यजनक रूप से चीन ही नहीं ईरान व अन्य देशों में भी मशीन निर्मित कालीन विदेशी बाजारों में दस्तक दे रही है। इससे यही लग रहा है कि कार्पेट उद्योग एक उभरते उद्योग के रूप में दुनिया के सामने आ रहा है। इसमें खास बात यह है कि वैश्विक स्तर पर कार्पेट इंडस्ट्री में भारत, चीन, पाकिस्तान, ईरान आदि एशियाई देशों का दबदबा कायम है। यही कारण है कि सभी देशों ने मिलकर संयुक्त रूप से कार्पेट फेयर (कार्पेट मेला) का आयोजन किया है। सौभाग्य की बात है कि इस तरह के संयुक्त मेले की पहली मेजबानी भारत को ही मिली है। दिल्ली में मार्च 2011 में कार्पेट मेले का आयोजन होना है जिसमें दुनिया के आकर्षक कार्पेट की प्रदशर्नी लगाई जाएगी। इसके बाद पेइचिंग में कार्पेट मेले का आयोजन करने की योजना है। इसका उद्देश्य कार्पेट उत्पादों को लेकर लोगों में जागृति पैदा करना है। पश्चिमी देशों में वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते पिछले एक-दो सालों में वहां इसकी मांग में गिरावट आई थी। यही कारण है कि पिछले साल भारत से कार्पेट का निर्यात करीब 12 फीसदी गिरकर 52.5 लाख डॉलर रहा था। चूंकि देश का 70 फीसदी कार्पेट निर्यात अमेरिका और यूरोपीय देशों को किया जाता है, ऐसे में वहां मंदी की वजह से पिछले साल कार्पेट निर्यात को भारी क्षति पहुंची थी। इसको देखते हुए कालीन निर्यात संवद्र्घन परिषद ने नए बाजारों की तलाश शुरू कर दी है। इसका असर अभी से ही दिखने लगा है। इस साल अब तक कार्पेट निर्यात में करीब 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हो चुकी है। आश्चर्यजनक रूप से घरेलू बाजार में भी कालीन की मांग अभी भी कुल निर्यात के 10वां हिस्से से भी कम है। माना जा रहा है कि इस तरह की प्रदर्शनी या कार्पेट मेले से घरेलू स्तर पर भी उपभोक्ताओं में जागरूकता आएगी और आने वाले समय में घरेलू बाजार में कालीन की मांग में तेजी से वृद्घि होगी। हम यहां बड़े कार्पोरेट्स हाउस में उपयोग होने वाले कार्पेट की बात कर रहे हैं। देखा जा रहा है कि पश्चिमी देशों की तुलना में उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में कर्पेट की मांग में बढ़ोतरी हुई है। यहां बड़े पैमाने पर सतह को ढकने वाले कार्पेट की की मांग बढ़ी है। (BS Hindi)

ठंड में और उबल पड़ा अंडा

नई दिल्ली January 06, 2011
प्याज, लहसुन और दूध के दाम सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने के बाद अब अंडे के दाम भी सबसे उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं। कारोबारी इसकी वजह कड़कड़ाती ठंड में अंडे की खपत में काफी बढ़ोतरी होना बता रहे हैं। उनके मुताबिक दाम बढऩे की दूसरी वजह उत्पादक राज्यों में इसके उत्पादन में कमी आना भी है। आने वाले दिनों में भी अंडे की कीमतों में तेजी बरकरार रहने की संभावना है। एक माह के दौरान राष्टï्रीय राजधानी दिल्ली में अंडे के थोक भाव 270 रुपये से बढ़कर 346 रुपये प्रति सैकड़ा हो गए है, जो कि रिकॉर्ड भाव है। इसके अलावा इस दौरान मुख्य उत्पादक केंद्र नमक्कल में अंडे के दाम 205 रुपये से बढ़कर 291 रुपये, पंजाब में इसके दाम 268 रुपये से बढ़कर 326 रुपये प्रति सैकड़ा हो चुके हैं।अंडा कारोबारी प्रमोद नागपाल ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि सर्दियों के कारण अंडे की खपत काफी बढ़ गई है। इस वजह से अंडे की कीमतों में लगातार तेजी आ रही है। गुरूवार को दिल्ली में अंडे की कीमतों में 346 रुपये प्रति सैकड़ा का स्तर छू लिया। अंडा कारोबारी एच आर गुप्ता भी सर्दियों में अंडे के दाम बढऩे की बात से इत्तेफाक रखते हैं। वे बताते है कि उत्पादक इलाकों पंजाब, हरियाणा में पिछले साल के मुकाबले इस बार उत्पादन भी कम है। इस वजह से भी कीमतों में तेजी को बल मिला है। आने वाले दिनों में अंडे की कीमतों के बारे में नागपाल का कहना है मांग को देखते हुए अगले दस दिनों में अंडों की कीमतों में गिरावट के आसार नहीं है। साथ ही भाव रिकॉर्ड स्तर पहुंचने की वजह से दामों में थोड़ी और तेजी की संभावना है। हालांकि दामों में भारी बढ़ोतरी के आसार नहीं है। आवक के बारे में नागपाल ने बताया कि दिल्ली में पंजाब, हरियाणा से 55-60 लाख अंडों की दैनिक आवक हो रही है। भारत से इराक, कतर और कुवैत सहित कई देशों को अंडों का निर्यात भी कि या जाता है। इस साल नवंबर तक देश से 68.79 करोड़ अंडों का निर्यात हो चुका है। पिछली समान अवधि में यह आंकडा 95.24 करोड़ था। इस तरह इस अवधि में अंडे के निर्यात में 27 फीसदी से अधिक गिरावट दर्ज की गई है। देश में नमक्कल मुख्य अंडा निर्यात केंद्र है। उत्तर भारत में अंडे की सप्लाई पंजाब, हरियाणा से की जाती है। इन राज्यों से मांग की आपूर्ति पूरी न होने की स्थिति में अन्य अंडा उत्पादक राज्यों से भी अंडे की आवक होती है। (B S Hindi)

01 जनवरी 2011

तंजानिया की तुअर से देसी दाल बेहाल

भोपाल December 31, 2010
तंजानिया से आ रही सस्ती तुअर के कारण मध्य प्रदेश की तुअर दालों की मांग पर असर पड़ रहा है। मिलों से लेकर दूसरे राज्यों तक में प्रदेश की तुअर की मांग का सन्नाटा पसरा हुआ है। तंजानिया की तुअर दाल अपेक्षाकृत 600 से लेकर 800 रुपये प्रति क्विंटल तक सस्ती है, वहीं खड़ी तुअर भी देसी तुअर की तुलना में 3,000 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे के दामों पर बाज़ार में आसानी से उपलब्ध हो रही है। ऐसे में पिछले 1-2 महीनों में प्रदेश से जाने वाली दालों में 40 फीसदी तक की कमी देखने को मिली है।इंदौर के दाल निर्यातक पंकज कुमार ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि तंजानिया की साटैक्स मोटी तुअर की भारत में भारी मांग बनी हुई है। देसी तुअर से सस्ती होने के चलते प्रदेश की दालों को प्रदेश की मिलों का भी सहारा भी नहीं मिल पा रहा है। कई जगह तो देसी तुअर तंजानिया की तुलना में 1,000 रुपये तक मंहगी है। ऐसे में देसी तुअर के दाम कम किये जाने पर भी मांग में उछाल की संभावना न के बराबर ही है। दाम ज्यादा कम किये जाने से किसानों और व्यापारियों को भी नुकसान सहना पड़ेगा।प्रदेश से हर साल काफी मात्रा तुअर दाल गुजरात और अन्य राज्यों को जाती है। हालांकि इस साल तंजानिया की तुअर के चलते दूसरे राज्यों से तुअर की मांग देखने को नहीं मिल रही है। प्रदेश की दाल मिलों में भी तंजानिया की तुअर से दाल बनाने का काम चल रहा है। ऐसे में अगले सत्र में तुअर की दाल को पैदा करने में किसानों की रुचि कम होने की बात कही जा रही है।तुअर दाल उत्पादक किसान सुनील मिश्रा ने बताया कि सरकार द्वारा किसानों को दालों की बेहतर कीमत दिये जाने से इस साल दालों के उत्पादन में बढ़ोतरी की संभावना है। हालांकि दूसरे राज्यों के साथ ही अपने राज्यों में देसी दाल को हतोत्साहित होना पड़ रहा है। इस साल गुजरात जैसे राज्यों की मिलों से भी मांग न के बराबर है।देश भर में मध्यप्रदेश, महाराष्टï्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भारी मात्रा में तुअर दाल का उत्पादन किया जाता है। मध्यप्रदेश में देश भर का लगभग 25 फीसदी दाल उत्पादन किया जाता है। साथ ही देश को लगभग 20 फीसदी तुअर उत्पादन भी मध्य प्रदेश में ही होता है। प्रदेश में मुख्यत: छिंदवाड़ा, भिंड, होशंगाबाद, नरसिंहपुर, जबलपुर, दमोह, छतरपुर, पन्ना, धार, ग्वालियर, मुरैना, टीकमगढ़ और भोपाल जिलों में तुअर की पैदावार है। वर्ष 2008-09 में प्रदेश में 2.6 लाख टन तुअर का उत्पादन किया गया था, जोकि इससे पहले वाले वर्ष की तुलना में अधिक था। वर्ष 2007-08 में प्रदेश में 2.2 लाख टन तुअर की पैदावार दर्ज की गयी थी। इस वर्ष भी पैदावार में बढ़ोतरी के आसार बनते दिख रहे हैं। प्रदेश के साथ ही अधिकतर तुअर उत्पादक राज्यों में इस साल उत्पादन बढऩे के अनुमान लगाये जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2010-11 में देश में तुअर दाल में बढ़ोतरी की उम्मीद है। बढ़ोतरी के साथ इस वर्ष उत्पादन 53 लाख टन होने की बात कही गयी है। वर्ष 2009-10 में 43 लाख टन और 2008-09 में 46.9 लाख टन तुअर दाल का उत्पादन हुआ था। (BS Hindi)

जिंस वायदा कारोबार 100 खरब रुपये के पार

मुंबई December 31, 2010
जिंस वायदा बाजार को प्रशासित करने वाले वायदा अनुबंध विनियमन अधिनियम के संशोधन की खातिर पेश किया जाने वाला विधेयक उपभोक्ता मंत्रालय से जुड़ी स्थायी समिति को सुपुर्द कर दिया गया है। विधेयक की स्वीकृति महत्वपूर्ण है क्योंकि जिंस वायदा बाजार आने वाले सालों में बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है, लिहाजा बाजार नियामक को मजबूत बनाए जाने की दरकार है। इसके लिए उसके पास गलत कदम उठाने वालों को आर्थिक रूप से दंडित करने का अधिकार होना चाहिए और बाजार पर कड़ी निगरानी रखने के लिए पर्याप्त कर्मचारी भी होने चाहिए।सात साल पहले राष्ट्रीय स्तर के तीन ऑनलाइन एक्सचेंज को अनुमति देने के साथ जिंस वायदा बाजार की शुरुआत हुई थी और बुधवार का इसका सालाना वॉल्यूम 100 खरब रुपये को पार कर गया। ऐसी अभूतपूर्व बढ़त इस वास्तविकता से बावजूद है कि कई संस्थागत खिलाडिय़ों को बाजार में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई है और वायदा बाजार आयोग और ज्यादा अधिकार हासिल करने का इंतजार कर रहा है। अब तक बाजार में कोई बड़ी अनियमितता नजर नहीं आई है, लेकिन बढ़ते वॉल्यूम के साथ उचित निगरानी की दरकार महसूस हो रही है।उद्योग के एक अधिकारी ने कहा, 'हमें उम्मीद करनी चाहिए कि स्थायी समिति विधेयक को मंजूरी देने में ज्यादा वक्त नहीं लगाएगी क्योंकि पिछले साल कुछ समिति ने राय दी थी कि समय गंवाए बिना विधेयक को पारित किया जाना चाहिए क्योंकि आर्थिक रूप से दंडित करने की ताकत के बिना नियामक का होना और श्रमशक्ति की कमी बाजार के विकास के लिए ठीक नहीं है।Ó एफएमसी को जैसे ही अधिकार मिलेगा, वह कई नियम तैयार कर लेगा और इस बाबत शुरुआती काम हो चुका है। आज के समय में एफएमसी को एक्सचेंज से सीधे आंकड़े प्राप्त होते हैं, लेकिन इनकी निगरानी मुश्किल है क्योंकि नियामक के पास इन आंकड़ों को विश्लेषित करने के लिए पर्याप्त कर्मचारी नहीं हैं। जैसे ही संसद में यह विधेयक पारित हो जाएगा, सात साल पुराना जिंस वायदा बाजार में बड़ा बदलाव दिखेगा। बाजार में गहराई नजर आने लगेगी और तरलता भी बढ़ेगी क्योंकि नए उपकरण मसलन इंडेक्स ऐंड ऑप्शन ट्रेडिंग, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड के साथ-साथ नए कारोबारी मसलन बैंकों व संस्थागत निवेशकों को इस बाजार में प्रवेश की अनुमति मिल जाएगी। परिणामस्वरूप भारत में विभिन्न जिंस निवेश वर्ग के रूप में उभर सकता है, जो फिलहाल सोने-चांदी तक सीमित है।जिंस वायदा पर करीब साढ़े तीन दशक की पाबंदी के बाद साल 2003 में तीन राष्ट्रीय एक्सचेंज (ऑनलाइन) की स्थापना हुई और पिछले तीन साल से यह सालाना 40 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ रहा है। 2003 तक वायदा कुछ चुनिंदा जिंसों तक सीमित था और वह भी क्षेत्रीय स्तर पर ही होता था। रेलिगेयर कमोडिटीज के प्रेजिडेंट जयंत मांगलिक कहते हैं 'एक ओर जहां साल 2010 को जिंस वायदा बाजार के मजबूत आधार के तौर पर याद किया जाएगा, वहींं साल 2011 एक ऐसा साल होगा जब विकास योजनाएं क्रियान्वित होने की उम्मीद है।Ó जिंस वायदा बाजार में फिलहाल राष्ट्रीय स्तर के पांच एक्सचेंज हैं और कुछ और स्थापित होने की संभावना है।प्राइसवाटरहाउस के साझेदार कुमार दासगुप्ता कहते हैं - जिंस वायदा बाजार में पर्याप्त नकदी की कमी है और संस्थागत खिलाडिय़ों के प्रवेश से इस बाजार में पर्याप्त नकदी आएगी, जो इसे हेजिंग के लिहाज से भी आकर्षक बनाएगी। भारतीय उद्योग अब वैश्वीकृत हो गया है, लेकिन उसका मुख्य बाजार स्थानीय ही है। घरेलू बाजार में हेजिंग उपयोगी होगा क्योंकि मांग-पूर्ति के बीच की खाई और मुद्रा में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से स्थानीय और विदेशी बाजारों की प्रवृत्ति अलग-अलग होने की संभावना है। धातुओं व अन्य उत्पादों में हेजिंग की खातिर भारतीय बाजार को आकर्षक बनाने के लिए वह नकदी वाले लंबी अवधि के अनुबंध को अनुकूल मानते हैं। (BS Hindi)

मुनाफे की डगर पर सबसे सयानी चांदी

मुंबई December 31, 2010
मंदी की मार से उबरने के बाद निवेश के सभी विकल्पों ने अपने निवेशकों को मालामाल किया है। लेकिन चांदी में निवेश करने वालों के लिए साल 2010 बेहतरीन साल रहा है। बीते साल ने शेयर बाजार में निवेश करने वालों को तकरीबन 15 फीसदी, कमोडिटी में 25 फीसदी, प्रॉपर्टी में 30 फीसदी और सोने में 22 फीसदी का प्रतिफल मिला जबकि चांदी ने इस साल 65 फीसदी से ज्यादा का प्रतिफल दिया है। वैश्विक हालात को देखते हुए आने वाले साल में भी चांदी सबसे सयानी निकल जाए तो कोई हैरानी वाली बात नहीं होगी। बढ़ती महंगाई और ब्याज दर पर बढ़ते दबाव के साथ एक के बाद एक कई घोटालों का खुलासा होने से निवेशकों की चिंता बढ़ती जा रही है, जिसका बाजार की धारणा पर असर पड़ सकता है। निवेशकों की बढ़ती परेशानी को देखते हुए माना जा रहा है कि यह साल प्रॉपर्टी बाजार के लिए सही नहीं रहने वाला है। इसका असर शेयर बाजार पर भी पडऩे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। बढ़ती महंगाई और वैश्विक अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार निवेशकों को सुरक्षित निवेश की तरफ जाने के लिए मजबूर कर सकती है। यही वजह है कि बाजार के जानकार 2011 में सबसे सही निवेश विकल्प के रूप में सफेद धातु चांदी को प्राथमिकता दे रहे हैं। सोने और चांदी की बढ़ती कीमतों के बावजूद इन दोनों धातुओं पर निवेशक सालभर फिदा रहे। साल के अंत में नफा नुकसान के तराजू में तौलने के बाद पता चला कि फायदा देने के मामले में एक बार फिर से चांदी ने सोने को पटखनी दे दी। पिछले साल (2009) भी चांदी से 55.52 फीसदी का रिटर्न प्राप्त हुआ था जबकि सोने में 24.23 फीसदी का मुनाफा प्राप्त हुआ। आदित्य बिड़ला मनी के अमर सिंह कहते हैं कि औद्योगिक मांग की वजह से इस साल चांदी 65 फीसदी से भी ज्यादा प्रतिफल देकर पहले पायदान पर खड़ी है। सोने और धातुओं की ऊंची कीमतों ने भी निवेशकों को चांदी में निवेश करने के लिए मजबूर किया है। मुनाफे की चोटी पर खड़ी चांदी के बारे में ऐंजल ब्रोकिंग के नवीन माथुर का कहना है कि बढ़ती निवेश और औद्योगिक मांग ही चांदी की चमक में चार चांद लगा रही है। (BS Hindi)