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22 जून 2011

नैफेड बोर्ड के आगे पवार की भी नहीं चली

केंद्रीय कृषि व खाद्य मंत्री शरद पवार राजनीतिक रूप से चाहे जितने ताकतवर हों, लेकिन उन्हें अपने मंत्रालय के अधीन कृषि सहकारी संगठन नैफेड के बोर्ड के आगे हार माननी पड़ी। गंभीर विवादों के बीच जिस प्रबंध निदेशक [एमडी] को नैफेड बोर्ड ने हटा दिया है, पवार के हस्तक्षेप के बाद भी उसकी बहाली नहीं हो पा रही है। पवार के जूनियर केंद्रीय मंत्री केवी. थॉमस ने तो दबाव बनाने के लिए नैफेड को बंद करने तक की धमकी दे दी, लेकिन इसका कोई असर नहीं पड़ा है।
लंबे समय से खिंच रहे नैफेड के विवाद को निपटाने के लिए पवार ने बोर्ड के चेयरमैन बिजेंदर सिंह को दो बार बुलाकर मसले को सुलझाने की हिदायत दी। इसके बावजूद चेयरमैन व बोर्ड सदस्यों के जिद के आगे शरद की एक नहीं चली। विजेंदर ने तो पवार के समक्ष अपना इस्तीफा देने पेशकश कर दी। इतना ही नहीं, उन्होंने बोस के कामकाज के तरीकों पर एतराज जताते हुए वापस लेने से साफ मना कर दिया। बोर्ड ने तो अब बर्खास्त तीनों सलाहकारों को भी लेने से इन्कार कर दिया है। अब तो कृषि मंत्रालय में संयुक्त सचिव संदीप चोपड़ा को नैफेड के एमडी का अतिरिक्त का प्रभार भी दे दिया गया है।
पिछले दिनों पूर्व एमडी आनंद बोस को नैफेड बोर्ड ने एक प्रस्ताव पारित कर पद से हटा दिया था। साथ ही बोर्ड ने तीन सलाहकारों को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके बाद कृषि व खाद्य राज्य मंत्री केवी. थॉमस के इस विवाद में कूद जाने से मामला और उलझ गया था। उन्होंने मंत्रालय की ओर से नैफेड पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। राज्यमंत्री थॉमस ने नैफेड के बंद करने तक की धमकी दे दी। इस सहकारी संगठन के पुनर्गठन के लिए सरकार की ओर से दिए जाने वाले पैकेज को परोक्ष तौर पर रोक दिया गया। इन दबावों के बावजूद नैफेड बोर्ड अपने पारित प्रस्तावों पर अड़ा रहा। (DH1 News)

नैफेड जिम्मेदारी टालना छोडे

कृषि सहकारी संस्था नैफेड बिना बोर्ड या सरकार की दिलचस्पी आकृष्ट किए अधर में इंतज़ार कर रहा है. बेल-आउट पैकेज दोनों पक्षों के लिए छलावा बना हुआ है - सरकार और नैफेड-बोर्ड अपने स्टैंड पर अडे हुए हैं.
नुकसान किसका है? वास्तव में न तो सरकार का और न ही नैफेड का. असहाय और मौन किसान, जिसके लिए यह सहकारी संस्था बनी, इसके शिकार बन रहे हैं. लेकिन कौन परवाह करता है?
सूत्रों के अनुसार नैफेड बोर्ड की अंतिम बैठक में बोर्ड उन शर्तों को मानने के लिए तैयार था, जिनसे सरकार को संगठन पर अत्यधिक नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त हो सकता है. यदि प्रस्ताव स्वीकार हो जाते हैं तो सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि नैफेड को किसी भी गैर-कोर गतिविधियों में लिप्त न होने दिया जाय, विशेषकर लापरवाह प्रकृति के व्यापारिक गठबन्धन.
सरकारी शर्तों की सूची में 51% इक्विटी का सरकार के पक्ष में हस्तांतरण का मामला शीर्ष पर है जब तक उचित पर्यवेक्षण और वित्तीय अनुशासन की दृष्टि से कृषि मंत्रालय को ऋण का भुगतान कर दिया जाता है.
अन्य शर्तों में नैफेड के बाइ-लॉ में बदलाव की बात शामिल है जिससे कि वह खुद को मुख्य कृषि संबंधी गतिविधियों तक सीमित रहे.
लेकिन अध्यक्ष की शक्ति में कटौती की बात ने मुद्दे को निपटने नहीं दी.
हालांकि विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार वर्तमान अध्यक्ष सहित बोर्ड के अधिकांश सदस्य इस बात पर सहमत थे लेकिन NCUI के अध्यक्ष और नैफेड के उपाध्यक्ष चन्द्रपाल सिंह ने असहमति व्यक्त की और अध्यक्ष के अधिकार को अक्षुण्ण रखना चाहा.
सरकार अपनी ओर से चुप्पी साधे हुए है. पूर्व प्रबंध निदेशक सी.ह्वी.आनंद बोस की बर्खास्तगी के मुद्दे पर अपनी अप्रसन्नता दिखाते हुए सरकार ने अपने पत्ते बन्द रखे हुए हैं. नए प्रबंध निदेशक संजीव चोपड़ा से संपर्क करने के प्रयास व्यर्थ साबित हुए क्योंकि वे प्रेस का सामना करने में झिझक रहे हैं.
इस बीच, सूत्रों के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामलों में जांच जारी है जिसके लिए केन्द्रीय पंजीयक प्रत्येक अभियुक्त से व्यक्तिगत रूप से मिल रहे हैं जिससे कि सच्चाई का पता लग सके. पाठकों को ज्ञात होना चाहिए कि जांच समिति ने कुछ निदेशकों और नैफेड के 29 अधिकारियों को नोटिस भेजा है.
नैफेड के मामलों पर नजर रखने वालों को आशंका है कि अभियुक्त सारे आरोप स्व. अजित सिंह पर मढने का प्रयाश करेंगे जो स्वयं को बचाने के लिए जीवित नहीं है. जांच का एक सरल और प्रभावी तरीका यह हो सकता कि अभियुक्त की पूर्व और वर्तमान परिसंपत्तियों की तुलना की जाय. अगर संपत्ति में वृद्धि तर्कसंगत हो तो ठीक वरना उपयुक्त कारवार्ई शुरु कर देनी चाहिए.
नैफेड, जो कभी एक प्रतिष्ठित कृषि सहकारी संस्था थी, का इस स्तर तक पतन भारत में सहकारी आंदोलन के लिए चिंता का विषय. नैफेड का भविष्य अब क्या वास्तव में भगवान के हाथों है? (Bhartiya Sahkari)

17 जून 2011

सितंबर तक नया रेकॉर्ड बना सकता है सोना

मुंबई/ नई दिल्ली : तमाम टेक्निकल चार्ट भले ही सोने की कीमत घटकर 1,500 डॉलर प्रति औंस (31.10 ग्राम) से नीचे जाने का इशारा कर रहे हों, आम मध्यवर्गीय उपभोक्ता की पहुंच से यह पीली धातु आने वाले दिनों में भी दूर रह सकती है। इसकी वजह यह है कि भारत और चीन की ओर से निचले स्तर पर होने वाली खरीदारी के चलते इसकी कीमत 20,000 रुपये प्रति 10 ग्राम से ऊपर बनी हुई है। एक विदेशी बैंक और दो सरकारी बैंकों के बुलियन डीलर्स ने माना है कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जून के अंत तक सोने का दाम गिरकर 1,470 डॉलर प्रति औंस के आसपास पहुंच जाए, लेकिन 1,505-1,510 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर गोल्ड की फिजिकल खरीदारी इसकी कीमत को मजबूत बनाए रखने में मदद दे रही है। विदेशी बाजारों में सोने का हाजिर भाव करीब 1,518 डॉलर प्रति औंस पर बना हुआ है। मौजूदा वित्त वर्ष के पहले दो महीनों के लिए ज्यादातर सरकारी व्यापार आंकडे़ निचले स्तर पर सोने की खरीदारी के बारे में बुलियन डीलर्स के रुख का समर्थन कर रहे हैं। खासतौर पर मई में, जब सोने का आयात करीब 9 अरब डॉलर पर वैल्यू किया गया, जबकि इसका सालाना औसत करीब 22 अरब डॉलर का होता है।2 मई को गोल्ड की कीमत 1,575 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी, लेकिन परंपरागत धार्मिक आधार पर सोने की खरीदारी का दिन माने जाने वाले अक्षय तृतीया के दिन 5 मई को भाव 110 डॉलर गिरकर 1,465 डॉलर पर आ गया। मई के पहले पखवाड़े में सोने का औसत भाव 1,512 डॉलर प्रति औंस रहा, जबकि जून के पहले पखवाड़े में औसत कीमत 1,533 डॉलर प्रति औंस रही। एक सरकारी बैंक के बुलियन ट्रेडर ने कहा कि सोने की कीमतों में तेज गिरावट और मजबूत रुपए की बदौलत आयात में बढ़ोतरी हुई है। एक बहुराष्ट्रीय बैंक के बुलियन डीलर के मुताबिक, 'टेक्निकल्स के हिसाब से कीमतों में गिरावट लंबे वक्त से तय दिख रही है, लेकिन निचले स्तर पर खरीदारी एक मजबूत अवरोध के तौर पर सामने आ रही है और इस वजह से कीमतों में गिरावट नहीं हो पा रही है। अक्षय तृतीया की वजह से मई में कीमतों में तेज उछाल आया और इससे ही कीमतें गिरकर 1,500 डॉलर प्रति औंस से नीचे आ गईं।' एक और डीलर ने कहा कि सोने की कीमतों में गिरावट हमेशा टेक्निकल स्वरूप में होती है, हालांकि बाजार में उछाल सेंटिमेंट आधारित होता है। ईटी ने जिन तीन डीलरों से बात की, उन्होंने जून अंत तक कीमतों के मौजूदा 1,518-1,520 डॉलर प्रति औंस के स्तर से गिरने की संभावना जताई है, लेकिन उनका अनुमान है कि कीमतें सितंबर तिमाही तक फिर नए रिकॉर्ड पर पहुंच जाएंगी क्योंकि उस वक्त देश के ग्रामीण इलाकों में खर्च शुरू हो जाएगा और साथ ही क्रिसमस से पहले होने वाली खरीदारी भी जोर पकड़ने लगेगी। एक डीलर ने कहा, 'अगर सोना 1,555 डॉलर का स्तर पार कर जाता है तो यह नया रेकॉर्ड बना सकता है। साथ ही, यह कुछ वक्त तक इस स्तर पर कायम भी रह सकता है।' (ET Hindi)

14 जून 2011

अनिश्चितता के चलते फल उत्पादन में आशातीत वृद्धि नहीं

आर.एस. राणा नई दिल्ली
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विरोधाभास - किसानों को फसल से कम फायदा जबकि उपभोक्ताओं के लिए दाम दोगुनेसेब :- नए बाग लगाने के लिए उच्च क्वालिटी के पौधों की कमी है। खाद और दवाइयां भी नहीं मिल रहीं।संतरा :- मौसम में बदलाव के कारण फलों की खेती लाभकारी नहीं है। नई पीढ़ी बागानों में कम रुचि ले रही है।आम:- फलों के उत्पादन में प्रकृति का बड़ा महत्वपूर्ण रोल है। आंधी-तूफान से आम की फसल को काफी नुकसान हुआ। केला :- जलगांव में भाव तेजी से गिरे। दो माह में भाव 600 रुपये से घटकर 400-500 रुपये क्विंटल रह गए।फलों की खेती में मौसम और बाजार संबंधी अनिश्चितता के चलते ज्यादा जोखिम होने के कारण इसका उत्पादन ज्यादा नहीं बढ़ रहा है। फलों की खेती का क्षेत्रफल में भी आशातीन बढ़ोतरी नहीं हो रही है। वर्ष 2010-11 में देश में फलों के बुवाई क्षेत्रफल में केवल 1.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई जबकि इस दौरान फलों के उत्पादन में मात्र पांच फीसदी की बढ़ोतरी का अनुमान है। राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम) के अनुसार वर्ष 2010-11 में फलों की बुवाई 64.52 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि इस दौरान उत्पादन 7.51 करोड़ टन होने का अनुमान है।
राष्ट्रीय बागवानी मिशन (एनएचएम) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2010-11 में फलों की बुवाई 64.52 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि इसके पिछले साल 63.29 लाख हैक्टेयर में हुई थी।
वर्ष 2010-11 में देश में फलों का उत्पादन बढ़कर 7.51 करोड़ टन होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल 7.15 करोड़ टन का हुआ था। वित्त वर्ष 2011-12 में बागवानी फसलों का उत्पादन बढ़ाने के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों के लिए 1,200 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। जबकि 2010-11 में 986 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था जिसमें से 970.86 करोड़ रुपये जारी किए गए।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) में बागवानी विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि जिस अनुपात में जनसंख्या में बढ़ोतरी हो रही है, उसके अनुसार फलों का उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। इसके अलावा पिछले दो-तीन सालों में आम आदमी की फल खरीदने की शक्ति भी बढ़ी है। इसीलिए फलों के दाम पिछले दो-तीन साल में लगभग दोगुने हो चुके हैं।
मांग के अनुरूप उत्पादन नहीं बढऩे से उपभोक्ता को महंगे दाम पर फल खरीदने पड़ रहे हैं। दिल्ली में एक दर्जन केले का दाम 40 रुपये, एक किलो आम 50 रुपये, एक किलो लीची 70 रुपये किलो की दर से बिक रही है। हिमाचल प्रदेश में सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष रविंद्र सिंह चौहान ने बताया कि नए बाग लगाने के लिए उच्च क्वालिटी के पौधों की कमी है। साथ ही खाद और दवाइयां उचित मात्रा में नहीं मिलने से उत्पादन प्रभावित होता है।
इसके अलावा नए बाग सीमित मात्रा में लग रहे हैं। आम उत्पादन संघ के अध्यक्ष इंशराम अली ने बताया कि फलों के उत्पादन में प्रकृति का बड़ा महत्वपूर्ण रोल है। चालू सीजन में आंधी-तूफान से आम की फसल को काफी नुकसान हुआ है। फलों की फसलों में जोखिम ज्यादा होने के कारण नए बाग सीमित मात्रा में ही लग रहे हैं।
संतरा उत्पादक संघ के अध्यक्ष मोहनरावजी टोटे ने बताया कि मार्केटिंग की सुविधा नहीं होने के कारण किसानों को औने-पौने दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है। इसीलिए नए किसान बागान लगाने में रुचि नहीं ले रहे हैं। फलों की फसलों पर मौसम की मार भी पड़ती रहती है। वर्ष 2008-09 में महाराष्ट्र के विदर्भ में सूखे जैसे हालात बनने से संतरे के करीब 20 हजार बाग सूख गए थे।
जलगांव कि केला किसान भागवत विश्वनाथ पाटिल ने बताया कि मौसम में बदलाव के कारण किसानों के लिए फलों की खेती लाभकारी नहीं रह गई है। इसीलिए नई पीढ़ी बागानों में कम रुचि ले रही है। जलगांव में केला 400 से 500 रुपये क्विंटल की दर से बिक रहा है। पिछले दो महीने में इसकी कीमतों में करीब 600 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ चुकी है। (Business Bhaskar....R S Rana)

09 जून 2011

बर्बादी और परिवहन खर्च से बढ़ी सब्जी उत्पादन की मुश्किलें

सब्जियों की पैदावार और उत्पादन के इलाके के मामले में भारत सिर्फ चीन से पीछे है। फूलगोभी की पैदावार में भारत सबसे आगे हैं। वहीं, प्याज की खेती में दूसरे और पत्ता गोभी के मामले में यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। देश के लगभग 63 लाख हेक्टेयर इलाके में करीब 9.30 करोड़ टन सब्जियों की खेती होती है। दिलचस्प है कि शांगडॉन्ग प्रांत में सब्जियों की खेती करने वाले एक किसान की आत्महत्या के बाद चीन गंभीर सामाजिक चुनौती से जूझ रहा है। पिछले साल जब सब्जियों की कीमतों में तेजी आई तो किसानों ने इस उम्मीद से बड़े पैमाने पर पत्ता गोभी की खेती की कि उन्हें अच्छी कीमत हासिल होगी। हालांकि, पत्ता गोभी की पैदावार बहुत ज्यादा होने की वजह से आपूर्ति ज्यादा और मांग कम हो गई। नतीजतन, बाजार में आए पत्ता गोभी के थोक भाव में जबरदस्त गिरावट आई। मांग में जबरदस्त से एक किसान की पूरी खेप सड़ गई। नतीजतन उस निराश किसान ने आत्महत्या कर ली। भारत में फलों और सब्जियों का रोजाना का कारोबार 275 करोड़ रुपए का है। इनमें से आमतौर पर हर दिन 130 करोड़ रुपए की फल और सब्जियां 'बर्बाद' हो जाती हैं। दुनिया के कुल सब्जी उत्पादन का करीब 15 फीसदी भारत में होने के बावजूद निर्यात में इसकी हिस्सेदारी बहुत मामूली 1.5 फीसदी है। भारतीय सब्जी बाजार में छोटे उत्पादकों की पकड़ है। देश में अनाज से होने वाली आमदनी कम है। यही वजह है कि ज्यादा आमदनी के लिए किसान महंगी सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। चीन में मुद्रास्फीति, खासतौर पर खाने-पीने की चीजों में महंगाई होने के बावजूद सब्जियों की कीमतों में हैरतअंगेज गिरावट चिंता का मुद्दा बन गया है। भारत की तरह चीनी किसान भी छोटे पैमाने पर सब्जियों की खेती करते हैं, जबकि घरेलू सब्जियों का बाजार काफी बड़ा है। इस वजह से आपूर्ति और मांग के बीच लगातार असंतुलन बना रहता है। नतीजतन, चीन की अर्थव्यवस्था मुक्त होने के बावजूद सब्जियों की कीमतों में बड़े पैमाने पर उतार-चढ़ाव होता है। चीन के किसानों को अपनी सब्जियों के लिए बहुत कम कीमत हासिल हो रही है, क्योंकि उत्पादन बहुत ज्यादा हो गया है और मांग में उस अनुपात से तेजी नहीं आई है। सब्जियों की कुल लागत का करीब दो तिहाई हिस्सा देश भर में सब्जियों के परिवहन पर खर्च होता है। परिवहन खर्च के अलावा हाईवे और टॉल ब्रिज पर शुल्क भुगतान से कुल लागत का दो तिहाई रकम परिवहन पर खर्च होता है। दिलचस्प है कि दुनिया भर की 70 फीसदी टोल सड़कें चीन में हैं। हाल के सालों में दुनिया भर के कई प्रांतों में सब्जियों की खेती और मजदूरी का खर्च बढ़ा है। शहर के बाजारों में सब्जियों और फलों की कीमतों में भी तेजी बरकरार है। खेत से बाजार तक सब्जियां आने में बिचौलिए भी हैं, जिससे भी लागत में बढ़ोतरी और अंतर है। सब्जियों की बर्बादी और आधुनिक भंडारगृह की बात करते हुए आमतौर पर हम यह भूल जाते हैं कि खेत में सब्जियों की कीमतें और उसके बाजार भाव में परिवहन खर्च की वजह से जमीन आसमान का अंतर है। भारत का हाल भी चीन की तरह है। दोनों जगह कुल लागत का 30 फीसदी रकम सब्जियों के परिवहन पर खर्च होता है। इसके अलावा 45 फीसदी लागत सब्जियों की बर्बादी के नाम रहता है। इन सब की वजह से ग्राहकों की जेब पर सब्जियों के खर्च का बोझ बढ़ जाता है, लेकिन इसका फायदा किसानों तक नहीं पहुंच पाता है। पेट्रोलियम की कीमतों में 5 रुपए प्रति लीटर का इजाफा होने से ग्राहकों और वितरकों की मुश्किल और बढ़ गई है, क्योंकि परिवहन खर्च बढ़ने से सब्जियों की लागत और बढ़ गई है। (ET Hindi)

08 जून 2011

पावर एक्सचेंजों में बोली के लिए होंगे 15 मिनट

मुंबई June 06, 2011
केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (सीईआरसी) ने पावर एक्सचेंजों को बोली का समय एक घंटे से घटाकर 15 मिनट करने को कहा है। वहीं, नियामक ने पावर एक्सचेंजों में सायंकालीन ट्रेडिंग के प्रस्ताव को फिलहाल टाल दिया है। अधिकारियों ने कहा कि बोली में भाग लेने वालों के लिए समय में कटौती करने का मकसद बिजली बाजार के ढांचे में सुधार लाना है और एक्सचेंजों को प्रक्रियागत विवरण तैयार करने के लिए इस महीने के अंत तक का समय दिया गया है। एक अधिकारी ने बताया कि 'इससे बाजार में केवल निश्चित समय पर ऊर्जा की फिजिकली डिलिवरी का ही कारोबार हो सकेगा। इससे एक्सचेंज से बिजली खरीदने वालों के लिए अनिश्चितता खत्म हो जाएगी। कम समय और वास्तविक बोली और उपलब्धता से निर्माताओं को भी बिजली की उचित कीमत मिल सकेगी' अधिकारी ने कहा कि ओटीसी बाजार में बोली के समय को घटाकर 15 मिनट करने से एक्सचेंजों में बिजली की खरीद और द्विपक्षीय या बाजार से इतर सौदों के बीच कीमत अंतर कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि रिन्यूएबल संसाधनों पर आधारित बिजली को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि अनुबंध करने और पवन ऊर्जा व सोलर ऊर्जा की वास्तवित डिलिवरी के समय में कमी आएगी। उन्होंने कहा कि एक घंटे का समय बहुत अधिक होता है, क्योंकि ये दोनों पवन की गति और सूर्य की रोशनी पर आधारित प्राकृतिक संसाधन हैं, जो मानव के वश में नहीं हैं। सायंकालीन ट्रेडिंग के बारे में सीईआरसी का यह मानना है कि सुबह का बाजार ही कारोबार के लिए पर्याप्त है और अभी तरलता काफी कम है। एक उच्च अधिकारी ने कहा कि सायंकालीन बाजार शुरू करने से बाजार की तरलता खत्म हो जाएगी। सुबह के सत्र में प्राइस डिस्कवरी पर विपरीत असर पड़ेगा। इसके अलावा सीईआरसी ने पावर एक्सचेंजों को इंट्रा-डे में कम तरलता पर एक रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। एक्सचेंजों ने लेन-देन के लिए एक अलग क्लीयरिंग हाउस के गठन का भी आग्रह किया है। एक अधिकारी के मुताबिक, 'ट्रेडिंग एक्सचेंज से अलग एक क्लीयरिंग हाउस स्थापित करने की मांग की गई। इस पर कार्य करने के लिए एक्सचेंजों के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित की गई है। हालांकि आयोग की विद्युत नियामक निर्देशों में इसका प्रावधान किया गया है, लेकिन इसकी कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गई है।' (BS Hindi)

बिहार में बारिश से मक्के की फसल बर्बाद

मुंबई June 06, 2011
देश के चौथे सबसे बड़े मक्का उत्पादक राज्य बिहार में मॉनसून पूर्व की बारिश और अंधड़ से मक्के की 5 फीसदी खड़ी हुई फसल खराब हुई है। फसल में फफूंदी लगने की भी खबरें हैं, जिसके कारण भविष्य में नुकसान बढ़ सकता है। विशेषज्ञों द्वारा फसल के नुकसान की मात्रा का आकलन अभी नहीं किया जा सका है, क्योंकि लगातार बारिश जारी है। लेकिन उनका मानना है राज्य में कुल फसल के 60 फीसदी भाग का प्रसंस्करण किया जा चुका है और यह विपणन के लिए तैयार है। राज्य में बाकी की 40 फीसदी फसल में भारी नुकसान होने की चिंताएं हैं। मक्का की बुआई और कटाई गर्मी और सर्दी दोनों ही ऋतुओं में होती है। बिहार में इसकी कटाई अपने अंतिम चरण में है, जबकि दक्षिण और पश्चिमी भारत में मॉनसून के पहुंचने के साथ ही बुआई शुरू होने वाली है। फसल के नुकसान का प्रभाव हाजिर बाजार में मक्का के भावों पर भी दिखने लगा है। औद्योगिक गुणवत्ता वाली मक्का के दाम पिछले कुछ दिनों में 20-40 रुपये प्रति क्विंटल बढ़कर निजामाबाद में फिलहाल 1,174.75 रुपये प्रति क्विंटल पर कारोबार कर रहे हैं। इसी तरह बिहार में भी अच्छी मक्का के भाव बढ़कर 1,070 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। निजामाबाद मंडी में किसानों और स्टॉकिस्टों ने बंपर पैदावार के अनुमानों से पिछले साल के स्टॉक की बिक्री शुरू कर दी है। इस बार मौसमी बारिश भारत में निर्धारित समय से एक सप्ताह पहले ही शुरू हो गई है। इससे किसानों और कारोबारियों को पूरे साल मॉनसून अनुकूल रहने की उम्मीद है। स्थानीय मक्का की गुणवत्ता बिहार आदि दूरस्थ क्षेत्रों से आयातित फसल से बेहतर है। इसके कारण स्थानीय मक्का आयातित मक्का के बजाए अच्छे भावों पर बिक रही है। आंध्र प्रदेश में बुआई का सीजन प्रारंभ होने से अगली फसल चार महीनों में बाजार में आने की संभावना है। आंध्र प्रदेश के बुआई वाले क्षेत्रों में मक्के की बुआई शुरू हो चुकी है और अगले 15-20 दिन में समाप्त होने की संभावना है। दामगिरी स्थित विजया एंड कंपनी के विजय ने कहा कि 'बिहार में फसल के नुकसान के कारण कीमतों में बढ़ोतरी हो चुकी है, लेकिन मक्का के भाव इस स्तर से ऊपर जाने की संभावना नहीं है।'ऐंजल कमोडिटीज की एक विश्लेषक नलिनी राव का कहना है कि 'अधिक क्षेत्रफल में मक्का की फसल के नुकसान के अनुमान से अगर इसके दाम 1,300 रुपये प्रति क्विंटल को पार करते हैं तो इस महीने के अंत तक मक्का के जुलाई अनुबंध घटकर 1,260 रुपये प्रति क्विंटल पर आ जाएंगे। राव ने कहा कि अगर आंध्र प्रदेश में बारिश में देरी हुई तो मक्का का क्षेत्रफल घट सकता है, लेकिन अभी तक बारिश में देरी के कोई संकेत नहीं हैं। बंपर घरेलू उत्पादन की बदौलत भारत का मक्का निर्यात अक्टूबर में समाप्त होने वाले विपणन वर्ष 2010-11 में 33 फीसदी बढ़कर 24 लाख टन रहने की संभावना है। यूएस ग्रेन काउंसिल (यूएसजीसी) की एक रिपोर्ट के अनुसार, विपणन वर्ष 2009-10 (नवंबर-अक्टूबर) में भारत ने 18 लाख टन मक्के का निर्यात किया था। कृषि मंत्रालय के तीसरे अनुमानों के मुताबिक, देश में मक्का का उत्पादन 2010-11 के सत्र में 202.3 लाख टन के आंकड़े को छूने की संभावना है, जिसमें से 158.7 लाख टन का उत्पादन खरीफ सत्र में हुआ है। लेकिन कारोबारियों का मानना है कि देश में मक्का का कुुल उत्पादन सरकारी अनुमानों से कम रहेगा और इसके 185 लाख टन रहने का अनुमान हैै। 2009-10 के सीजन में भारत में मक्के का कुल उत्पादन 167.2 लाख टन रहा था। (BS Hindi)