मुंबई June 02, 2011
जिंस वायदा बाजार नियामक वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) ने जिंस वायदा कारोबार के उदारीकरण के लिए कई कदम उठाने का फैसला किया है। सभी जिंस एक्सचेंजों के लिए एकसमान जुर्माने का ढांचा तैयार करने की खातिर एफएमसी ने दिशा-निर्देशों का मसौदा बनाने की योजना बना रहा है। मौजूदा समय में जुर्माने का फैसला एक्सचेंज विशेष करता है और यह एक्सचेंज प्लैटफॉर्म पर कारोबारी की गलती और प्रदर्शन पर निर्भर करता है। ऐसे में जुर्माना हर मामले में अलग-अलग होता है।दूसरा, बुधवार देर शाम आयोजित एक्सचेंज के अधिकारियों की बैठक में नियामक ने नो योअर क्लाइंट (केवाईसी) के नियमों को कारोबारियों के और ज्यादा अनुकूल बनाने के प्रति बचनबद्धता जाहिर की है। कारोबारियों और एक्सचेंज के अधिकारियों को लगता है कि केवाईसी नियमों में अस्पष्टता ने कारोबार को मुश्किल बना दिया है, इसलिए उन्होंने इसके सरलीकरण की मांग की है।इसके साथ ही एफएमसी ने जिंस वायदा कारोबार में आमूल बदलाव की खातिर अन्य नियमों की देखरेख के लिए अनुभवी सदस्य डी एस कमलाकर की अध्यक्षता में अधिकारियों की एक कमेटी बनाई है। कमलाकर की अध्यक्षता वाली कमेटी सोयाबीन व सोया तेल जैसे अंतरराष्ट्रीय जिंसों के लिए कारोबारी समय का विस्तार 5 बजे से रात 11.30 करने जैसे मुद्दे पर नियामक को सहयोग दे सकता है। कारोबारियों को लगता है कि इन जिंसों का कारोबार वैश्विक स्तर पर होता है और भारतीय एक्सचेंज अमेरिका व यूरोपीय यूनियन जैसे विकसित देशों में एक्सचेंज खुलने के पहले ही बंद हो जाते हैं।ऐसे में घरेलू एक्सचेंज में अनुबंध या तो प्रीमियम पर होते हैं या फिर छूट पर, जो वैश्विक बाजार में होने वाले उतारचढ़ाव पर निर्भर करता है। उस समय हालांकि लाभ मिलता दिखता है, लेकिन इसके फंडामेंटल्स सामान्यत: बदल जाते हैं। इसलिए भारतीय कारोबारी वैश्विक कारोबारी समय के दौरान कीमतों में होने वाले उतारचढ़ाव से वस्तुत: दूर रहते हैं। लेकिन एफएमसी चेयरमैन बी सी खटुआ ने इस मुद्दे पर अंतिम फैसला लेने से पहले और ज्यादा बातचीत पर जोर दे रहे हैं।माना जा रहा है कि खटुआ ने कोमलकर को निर्देश दिया है कि मार्केट मेकर्स की नियुक्ति, सोने-चांदी व ऊर्जा कारोबार पर लेन-देन शुल्क घटाने, एकसमान पोजिशन सीमा आदि जैसे मुद्दों पर वह सभी जिंस एक्सचेंजों के बीच आमराय बनाने की कोशिश करे। लेकिन एक्सचेंज के विभिन्न अधिकारी इन मुद्दों के प्रति आशंकित हैं।मार्केट मेकर्स की बाबत एक्सचेंज के अधिकारियों का तर्क है कि जिंस वायदा बाजार ऐसी व्यवस्था के लिए अभी पर्याप्त रूप से परिपक्व नहीं हुआ है। विदेश से इस व्यवस्था की प्रतिकृति किसी एक एक्सचेंज में कारोबार होने वाली किसी एक जिंस में नहीं दोहराई जा सकती। भारत में हालांकि एक जिंस का कारोबार विभिन्न एक्सचेंजों में होता है और दुर्भाग्य से किसी एक एक्सचेंज में वह तरल (लिक्विड) होता है जबकि दूसरे में नहीं। ऐसे में मार्केट मेकर्स को प्रोत्साहन देने से एक एक्सचेंज का कारोबार व मात्रा दूसरे एक्सचेंज द्वारा छीन लिया जाएगा और एक्सचेंजों के बीच विवाद उसी रफ्तार से बढ़ेगा, जो जिंस वायदा कारोबार के लिए अच्छा नहीं होगा।जिंस एक्सचेंजों की स्थापना शुरुआती दौर में कृषि जिंसों को प्रोत्साहित करने ेक लिए हुई थी। ऐसे में गैर-कृषि जिंसों के लिए लेन-देन शुल्क में कमी लाने का मतलब होगा जिंस वायदा के प्राथमिक मकसद को कुचल देना। इसके उलट कई एक्सचेंज के अधिकारियों ने कहा था कि खुदरा सहभागिता बढ़ाने के लिए कृषि जिंसों के लेन-देन शुल्क में कमी लाई जाए।एकसमान पोजिशन सीमा के लिए कारोबार का पता लगाना काफी मुश्किल है, जब तक कि सेबी की तरह एफएमसी केंद्रीकृत सर्वर के जरिए पूरे कारोबार की निगरानी न करे। चूंकि हर एक्सचेंज की पोजिशन सीमा अलग-अलग होती है, लिहाजा हर एक्सचेंज के लिए हर जिंस में एकसमान पोजिशन सीमा तय करना अव्यवहारिक होगा। हालांकि इस बैठक में कृषि जिंसों के मिनी कॉन्ट्रैक्ट पेश करने जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई, लेकिन इस पर कोई आमराय नहीं बन पाई।स्टांप ड्यूटी में बढ़ोतरी टलीमहाराष्ट्र सरकार ने जिंस वायदा कारोबार में स्टांप ड््यूटी में प्रस्तावित बढ़ोतरी को फिलहाल टाल दिया है। राज्य सरकार ने हालांकि नई तारीख की घोषणा नहींं की है, लेकिन इस कदम से कारोबारियों को बड़ी राहत मिली है। इसकी पुष्टि करते हुए एफएमसी के चेयरमैन बी सी खटुआ ने कहा - जिंस एक्सचेंजों की बात सरकार के सामने रखने में नियामक उसकी अगुआई कर रहा था और राज्य के वित्त मंत्री से लगातार संपर्क में था। उन्होंने कहा - यह अच्छा हुआ कि सरकार ने फैसला टाल दिया है। खटुआ ने कहा कि नई तारीख पर फैसला लेने से पहले सरकार एफएमसी से संपर्क करेगी। 23 मार्च को पेश बजट में सरकार ने जिंस कारोबार में हर एक लाख के लेनदेन पर 5 रुपये की स्टांप ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव रखा था, जो मौजूदा प्रति लाख 1 रुपये के मुकाबले काफी ज्यादा है। इसे 1 जून से लागू किया जाना था। महाराष्ट्र में पंजीकृत ब्रोकरों को इस निर्देश का पालन करना था, अगर उन्हें अपनी दुकानें बंद न करनी हों तो। महाराष्ट्र के ब्रोकरों को इसका भार अपने क्लाइंट पर डालना होगा। 5 रुपये प्रति लाख के कारोबार पर या 0.005 फीसदी सभी नकद व डेरिवेटिव लेनदेन पर (डिलिवरी व गैर-डिलिवरी दोनों पर)।आदर्श रूप में लेनदेन की लागत का भार उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा क्योंकि लेनदेन शुल्क बढऩे के बाद जिंस की लागत काफी ज्यादा बढ़ जाएगी।एमसीएक्स के प्रबंध निदेशक और सीईओ लेमन रूटेन ने कहा - स्टांप ड््यूटी में प्रस्तावित बढ़ोतरी को टाल देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले का मैं स्वागत करता हूं। इससे राज्य को अन्य प्रतिस्पर्धी राज्यों से नए कारोबारियों को मुंबई व राज्य के दूसरे हिस्से में आने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही जिंस वायदा कारोबार भारतीय की विकास दर में और ज्यादा योगदान दे पाएगा।फिलहाल, जिंस एक्सचेंज प्रति करोड़ रुपये के कारोबार पर 200 रुपये शुल्क वसूलते हैं। अगर सरकार ने ड्यूटी में बढ़ोतरी की तो शुल्क बढ़कर 700 रुपये प्रति करोड़ हो जाएगा, जो देश में सबसे महंगा होगा। इससे डब्बा कारोबार को भी प्रोत्साहन मिलेगा। एनसीडीईएक्स के चीफ बिजनेस अफसर विजय कुमार ने कहा कि इस फैसले के टलने से हेजर्स व सटोरियों को लाभ मिलेगा और वे जिंस बाजार में बिना किसी परेशानी के कारोबार कर पाएंगे।कई ब्रोकिंग फर्म महाराष्ट्र से अपना कारोबार समेटकर गुजरात जाने लगे थे क्योंकि वहां स्टांप ड्यूटी न के बराबर है। गुजरात सरकार ने महाराष्ट्र के कारोबारियों को आकर्षित करने के लिए राज्य में बड़ा बिजनेस पार्क स्थापित किया है। ऐश डेरिवेटिव ऐंड कमोडिटी एक्सचेंज के सीईओ दिलीप भाटिया ने कहा कि इससे महाराष्ट्र के बाहर कारोबार करने की इच्छा रखने वाले अब वहीं रूक जाएंगे यानी वहीं उनका कारोबार चलता रहेगा।पिछले दो महीने में जिंस वायदा कारोबार की मात्रा में करीब 50 फीसदी की उछाल आई है और यह 70,000 करोड़ रुपये पर पहुंच गई है जबकि पहले 40,000-45,000 करोड़ रुपये था। ऐंजल ब्रोकिंग के सहायक निदेशक (कमोडिटी) नवीन माथुर ने कहा कि इस फैसले से कम से कम अनिश्चितता दूर हो गई है। (BS Hindi)
06 जून 2011
10 फीसदी तक बढ़ेगा कपास का रकबा
अहमदाबाद June 03, 2011
साल 2011-12 में कपास के रकबे में करीब 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है और इस तरह साल 2010-11 के 111.6 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी। रकबे में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि कपास की ऊंची कीमतों के चलते ज्यादा से ज्यादा किसान कपास का रुख कर रहे हैं।कपास के रकबे में कुल मिलाकर बढ़ोतरी की संभावना इसलिए भी मजबूत हो रही है कि उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में साल 2011-12 में कपास के रकबे मेंं 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों में कपास की बुआई मोटे तौर पर समाप्त हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कपास के रकबे में करीब 2 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है और यह आज के समय में 15 से 15.5 लाख हेक्टेयर के आसपास पहुंच गया है जबकि पिछले साल 13.5 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने कहा - उत्तर भारत में कपास की बुआई का काम करीब-करीब समाप्त हो चुका है और पंजाब में हमने इसके रकबे में तीव्र बढ़ोतरी देखी है। राजस्थान व हरियाणा में भी कपास के रकबे में इजाफा हुआ है। बेहतर रिटर्न के चलते किसानों ने धान व ग्वार की बजाय कपास का रुख किया है। देश के कुल कपास उत्पादन में उत्तर भारत करीब 12-13 फीसदी का योगदान करता है और यहां का कुल उत्पादन करीब 38 से 39 लाख गांठ है।इस बीच, उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि कपास के रकबे में 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है और यह पिछले साल के 111.6 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस साल 150 से 180 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक बी के मिश्रा ने कहा - हमने इस साल कपास के रकबे में बढ़ोतरी देखी है। हाल में इसकी कीमतों में हुए उतारचढ़ाव के बाद भी किसान इसकी खेती की तरफ आकर्षित हुए हैं क्यों कि पिछले साल उनन्हें भारी रिटर्न मिला था। हालांकि इस बात का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि साल 2011-12 में कपास का वास्तविक रकबा कितना होगा। लेकिन इसके रकबे में संभवत: 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च के बाद कपास की कीमतों में भारी गिरावट आई है।कपास के शंकर-6 किस्म की कीमतें मार्च में 62,500 रुपये प्रति कैंडी पर थीं, जो अब घटकर 45,000 रुपये रह गई है। वैश्विक बाजार में भी कपास की कीमतें तेजी से गिरी हैं। भारत में कपास का रकबा साल 2009-10 में 103.1 लाख हेक्टेयर था, जो 2010-11 में बढ़कर 111.6 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया था।गुजरात में इस साल कपास का रकबा 28 लाख हेक्टेयर रह सकता है, जबकि पिछले साल 26.3 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। गुजरात स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन फेडरेशन के प्रबंध निदेशक एन एम शर्मा ने कहा - कपास से मिले रिटर्न से किसान उत्साहित हैं। ऐसे में गुजरात में भी इस सीजन में कपास का रकबा बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यहां कपास का रकबा बढ़कर 28 से 30 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा।कपास का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख राज्य आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश हैं। इन इलाकों में कपास की फसल मोटे तौर पर बारिश पर आश्रित होती है। इन इलाकों में कपास की बुआई जून के दूसरे हफ्ते से जोर पकड़ेगी। चूंकि दक्षिण पश्चिम मॉनसून देश के दक्षिणी हिस्सों में दस्तक दे चुका है और इसके धीरे-धीरे आगे बढऩे की संभावना है, लिहाजा किसान साल 2011-12 में कपास की सफल खेती के प्रति आशान्वित हैं। (BS Hindi)
साल 2011-12 में कपास के रकबे में करीब 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है और इस तरह साल 2010-11 के 111.6 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी। रकबे में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि कपास की ऊंची कीमतों के चलते ज्यादा से ज्यादा किसान कपास का रुख कर रहे हैं।कपास के रकबे में कुल मिलाकर बढ़ोतरी की संभावना इसलिए भी मजबूत हो रही है कि उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में साल 2011-12 में कपास के रकबे मेंं 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों में कपास की बुआई मोटे तौर पर समाप्त हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कपास के रकबे में करीब 2 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है और यह आज के समय में 15 से 15.5 लाख हेक्टेयर के आसपास पहुंच गया है जबकि पिछले साल 13.5 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने कहा - उत्तर भारत में कपास की बुआई का काम करीब-करीब समाप्त हो चुका है और पंजाब में हमने इसके रकबे में तीव्र बढ़ोतरी देखी है। राजस्थान व हरियाणा में भी कपास के रकबे में इजाफा हुआ है। बेहतर रिटर्न के चलते किसानों ने धान व ग्वार की बजाय कपास का रुख किया है। देश के कुल कपास उत्पादन में उत्तर भारत करीब 12-13 फीसदी का योगदान करता है और यहां का कुल उत्पादन करीब 38 से 39 लाख गांठ है।इस बीच, उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि कपास के रकबे में 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है और यह पिछले साल के 111.6 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस साल 150 से 180 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक बी के मिश्रा ने कहा - हमने इस साल कपास के रकबे में बढ़ोतरी देखी है। हाल में इसकी कीमतों में हुए उतारचढ़ाव के बाद भी किसान इसकी खेती की तरफ आकर्षित हुए हैं क्यों कि पिछले साल उनन्हें भारी रिटर्न मिला था। हालांकि इस बात का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि साल 2011-12 में कपास का वास्तविक रकबा कितना होगा। लेकिन इसके रकबे में संभवत: 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च के बाद कपास की कीमतों में भारी गिरावट आई है।कपास के शंकर-6 किस्म की कीमतें मार्च में 62,500 रुपये प्रति कैंडी पर थीं, जो अब घटकर 45,000 रुपये रह गई है। वैश्विक बाजार में भी कपास की कीमतें तेजी से गिरी हैं। भारत में कपास का रकबा साल 2009-10 में 103.1 लाख हेक्टेयर था, जो 2010-11 में बढ़कर 111.6 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया था।गुजरात में इस साल कपास का रकबा 28 लाख हेक्टेयर रह सकता है, जबकि पिछले साल 26.3 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। गुजरात स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन फेडरेशन के प्रबंध निदेशक एन एम शर्मा ने कहा - कपास से मिले रिटर्न से किसान उत्साहित हैं। ऐसे में गुजरात में भी इस सीजन में कपास का रकबा बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यहां कपास का रकबा बढ़कर 28 से 30 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा।कपास का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख राज्य आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश हैं। इन इलाकों में कपास की फसल मोटे तौर पर बारिश पर आश्रित होती है। इन इलाकों में कपास की बुआई जून के दूसरे हफ्ते से जोर पकड़ेगी। चूंकि दक्षिण पश्चिम मॉनसून देश के दक्षिणी हिस्सों में दस्तक दे चुका है और इसके धीरे-धीरे आगे बढऩे की संभावना है, लिहाजा किसान साल 2011-12 में कपास की सफल खेती के प्रति आशान्वित हैं। (BS Hindi)
हॉलमार्किंग से घटी पुराने सोने की आपूर्ति
मुंबई June 05, 2011
सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग ने विनिर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं को विस्मित किया हो, लेकिन बेंचमार्क गुणवत्ता बताने वाली इस व्यवस्था ने भारत की मौजूदा सोने की 25 रिफाइनरियों के कारोबार को झटका दिया है।देश में सोने की रिफाइनरियों की संचालन क्षमता गिरकर 20-25 फीसदी रह गई है, जो इतिहास में सबसे कम है क्योंकि पुराना सोना उपलब्ध नहीं हो पा रहा। करीब एक साल पहले इन रिफाइनरियों की संचालन क्षमता 35-40 फीसदी थी। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, रीसाइक्लिंग के लिए भारत में सोने की उपलब्धता मौजूदा कैलेंडर वर्ष की पहली तिमाही में घटकर 10 टन रह गई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 14 टन थी। इससे पहले की तिमाही में हालांकि सोने की उपलब्धता 25 टन हो गई थी।गोल्ड रिफाइनर्स एसोसिएशन के सचिव और सी. गोल्ड रिफाइनरी प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जेम्स जोस ने कहा - उपलब्ध पुराने सोने की गुणवत्ता बढ़ी है और इसका श्रेय उपभोक्ताओं केजागरूकता को जाता है। 25 साल तक चलन में रहे सोने सामान्यत: 18 कैरेट के होते थे और इसमें बाकी मात्रा तांबे की होती थी। आज बाजार में बिक्री के लिए आ रहे पुराने सोने कम से कम 22 कैरेट के हैं क्योंंकि खुदरा ज्वैलरों ने बेंचमार्क हॉलमार्किंग अपना ली है। ऐसे में पहले आ रहे सोने में जहां 80 फीसदी की शुद्धता होती थी, वहीं आज यह कम से कम 91.6 फीसदी हो गई है।सामान्यत तौर पर इस्तेमाल किए गए ऐसे गहने ज्वैलर दोबारा बेच देते हैं, लेकिन इससे पहले इन पर पॉलिस करते हैं और इसकी मरम्मत करते हैं। बाजार में उपलब्ध कुल पुराने सोने में ऐसे सोने की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी होती है, जिसकी आपूर्ति सामान्य तौर पर रिफाइनर्स को नहीं होती है। बड़े सुनार सामान्यत: इस्तेमाल किए गए आभूषण रिफाइनिंग के लिए भेजते हैं ताकि इससे तांबे जैसी अशुद्धता निकाली जा सके।स्पष्ट रूप से केरल जैसे राज्यों में गर्मी की छुट्टिïयां समाप्त होने व प्रवासी भारतीय के विदेश लौट जाने के चलते इस्तेमाल किए गए सोने की बिक्री समाप्त हो चुकी है। तमिलनाडु में भी ऐसा सीजन समाप्त हो चुका है। ये दोनों राज्य इलाके में पुराने सोने की बिक्री में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में पुराने सोने की उपलब्धता में गिरावट तो आएगी ही। दूसरा, दक्षिण भारतीय बाजार में उपभोक्ता पुराने आभूषण के बदले नए आभूषण लेते हैं, जबकि उत्तर व पश्चिम भारत में नहीं होता क्योंकि यहां के लोग पुराने सोने के बदले नकदी लेना पसंद करते हैं। जोस ने कहा कि इसलिए उपभोक्ताओं की प्राथमिकता एक जगह से दूसरी जगह अलग-अलग होती है।स्पष्ट रूप से आयात शुल्क केचलते गोल्ड कन्सन्ट्रेट (डोर बार) का आयात उपयुक्त नहीं है। जोस ने ऐसे शुल्क को समाप्त करने की मांग की है। आज के समय में गोल्ड कन्सन्ट्रेट की खुदाई अफ्रीका में होती है और इसे यूरोप में साफ किया जाता है। यूरोप की गोल्ड रिफाइनरी 50,000 रुपये प्रति किलोग्राम का शुल्क वसूलती है जबकि भारत में यह 5,000 रुपये प्रति किलोग्राम हो सकता ह ै।ऐसे में डोर बार पर आयात शुल्क घटाने से सोने की कीमतों में प्रति 10 ग्राम 450 रुपये की कमी आएगी।एनआईबीआर बुलियन के प्रबंध निदेशक हर्मेश अरोड़ा ने कहा - सरकार ने 80 फीसदी की शुद्धता वाले डोर बार के आयात पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया है, जिसे हासिल करना काफी मुश्किल है। लेकिन आज 91-92 फीसदी सोने की शुद्धता वाले डोर बार की खुदाई हो रही है। उन्होंने कहा कि कीमतों में बढ़ोतरी वाले बाजार में उपभोक्ता सामान्यत: किसी उत्पाद की बिक्री को टाल देते हैं। चूंकि सोने की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, लिहाजा उपभोक्ता इसमें और तेजी की उम्मीद में सोने को अपने पास रखे हुए हैं। (BS Hindi)
सोने के आभूषणों की हॉलमार्किंग ने विनिर्माताओं और खुदरा विक्रेताओं को विस्मित किया हो, लेकिन बेंचमार्क गुणवत्ता बताने वाली इस व्यवस्था ने भारत की मौजूदा सोने की 25 रिफाइनरियों के कारोबार को झटका दिया है।देश में सोने की रिफाइनरियों की संचालन क्षमता गिरकर 20-25 फीसदी रह गई है, जो इतिहास में सबसे कम है क्योंकि पुराना सोना उपलब्ध नहीं हो पा रहा। करीब एक साल पहले इन रिफाइनरियों की संचालन क्षमता 35-40 फीसदी थी। वल्र्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक, रीसाइक्लिंग के लिए भारत में सोने की उपलब्धता मौजूदा कैलेंडर वर्ष की पहली तिमाही में घटकर 10 टन रह गई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में यह 14 टन थी। इससे पहले की तिमाही में हालांकि सोने की उपलब्धता 25 टन हो गई थी।गोल्ड रिफाइनर्स एसोसिएशन के सचिव और सी. गोल्ड रिफाइनरी प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक जेम्स जोस ने कहा - उपलब्ध पुराने सोने की गुणवत्ता बढ़ी है और इसका श्रेय उपभोक्ताओं केजागरूकता को जाता है। 25 साल तक चलन में रहे सोने सामान्यत: 18 कैरेट के होते थे और इसमें बाकी मात्रा तांबे की होती थी। आज बाजार में बिक्री के लिए आ रहे पुराने सोने कम से कम 22 कैरेट के हैं क्योंंकि खुदरा ज्वैलरों ने बेंचमार्क हॉलमार्किंग अपना ली है। ऐसे में पहले आ रहे सोने में जहां 80 फीसदी की शुद्धता होती थी, वहीं आज यह कम से कम 91.6 फीसदी हो गई है।सामान्यत तौर पर इस्तेमाल किए गए ऐसे गहने ज्वैलर दोबारा बेच देते हैं, लेकिन इससे पहले इन पर पॉलिस करते हैं और इसकी मरम्मत करते हैं। बाजार में उपलब्ध कुल पुराने सोने में ऐसे सोने की हिस्सेदारी करीब 25 फीसदी होती है, जिसकी आपूर्ति सामान्य तौर पर रिफाइनर्स को नहीं होती है। बड़े सुनार सामान्यत: इस्तेमाल किए गए आभूषण रिफाइनिंग के लिए भेजते हैं ताकि इससे तांबे जैसी अशुद्धता निकाली जा सके।स्पष्ट रूप से केरल जैसे राज्यों में गर्मी की छुट्टिïयां समाप्त होने व प्रवासी भारतीय के विदेश लौट जाने के चलते इस्तेमाल किए गए सोने की बिक्री समाप्त हो चुकी है। तमिलनाडु में भी ऐसा सीजन समाप्त हो चुका है। ये दोनों राज्य इलाके में पुराने सोने की बिक्री में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में पुराने सोने की उपलब्धता में गिरावट तो आएगी ही। दूसरा, दक्षिण भारतीय बाजार में उपभोक्ता पुराने आभूषण के बदले नए आभूषण लेते हैं, जबकि उत्तर व पश्चिम भारत में नहीं होता क्योंकि यहां के लोग पुराने सोने के बदले नकदी लेना पसंद करते हैं। जोस ने कहा कि इसलिए उपभोक्ताओं की प्राथमिकता एक जगह से दूसरी जगह अलग-अलग होती है।स्पष्ट रूप से आयात शुल्क केचलते गोल्ड कन्सन्ट्रेट (डोर बार) का आयात उपयुक्त नहीं है। जोस ने ऐसे शुल्क को समाप्त करने की मांग की है। आज के समय में गोल्ड कन्सन्ट्रेट की खुदाई अफ्रीका में होती है और इसे यूरोप में साफ किया जाता है। यूरोप की गोल्ड रिफाइनरी 50,000 रुपये प्रति किलोग्राम का शुल्क वसूलती है जबकि भारत में यह 5,000 रुपये प्रति किलोग्राम हो सकता ह ै।ऐसे में डोर बार पर आयात शुल्क घटाने से सोने की कीमतों में प्रति 10 ग्राम 450 रुपये की कमी आएगी।एनआईबीआर बुलियन के प्रबंध निदेशक हर्मेश अरोड़ा ने कहा - सरकार ने 80 फीसदी की शुद्धता वाले डोर बार के आयात पर सीमा शुल्क समाप्त कर दिया है, जिसे हासिल करना काफी मुश्किल है। लेकिन आज 91-92 फीसदी सोने की शुद्धता वाले डोर बार की खुदाई हो रही है। उन्होंने कहा कि कीमतों में बढ़ोतरी वाले बाजार में उपभोक्ता सामान्यत: किसी उत्पाद की बिक्री को टाल देते हैं। चूंकि सोने की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं, लिहाजा उपभोक्ता इसमें और तेजी की उम्मीद में सोने को अपने पास रखे हुए हैं। (BS Hindi)
खाद्यान्न के परिवहन के लिए राष्ट्रीय योजना
नई दिल्ली June 05, 2011
खरीद के मुख्य सीजन में खाद्यान्न के परिवहन को आसान बनाने के लिए खाद्य मंत्रालय रेलवे के साथ मिलकर राष्ट्रीय योजना बना रहा है। हाल में खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने प्रधानमंत्री से इस योजना पर चर्चा की है। इसके तहत रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, खाद्य व जन वितरण प्रणाली के सचिव, भारतीय खाद्य निगम के चेयरमैन को शामिल करते हुए अलग से स्थायी तौर पर एकीकृत संयुक्त ढांचा बनाया जाएगा, जो खाद्यान्न की आवाजाही की निगरानी करेगा।केंद्रीय स्तर पर इस ढांचे की मौजूदगी के अलावा योजना के तहत ऐसा ही ढांचा राज्यों में बनाए जाने की वकालत की गई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि राज्यस्तरीय ढांचे में मुख्य सचिव, एफसीआई व भारतीय रेलवे के क्षेत्रीय प्रबंधक को शामिल किया जा सकता है। इससे प्रखंड और जिला स्तर पर भी अनाज की सहज आवाजाही सुनिश्चित होगी।आंकड़ों से पता चला है कि भारतीय खाद्य निगम औसतन 250 लाख टन अनाज का परिवहन 1500 किलोमीटर तक रेल, सड़क और जलमार्ग के जरिए करता है। हालांकि सबसे ज्यादा अनाज की ढुलाई भारतीय रेल के जरिए होती है।खरीद के मुख्य सीजन में इस गतिविधि में मुश्किलें पैदा होती हैं क्योंकि अनाज की मात्रा बढ़ जाती है जबकि रेलवे वैगन की संख्या में कमी आ जाती है। गेहूं की खरीद का मुख्य सीजन अप्रैल में शुरू होता है और जून-जुलाई तक चलता है जबकि चावल के मामले में यह अक्टूबर में शुरू होता है और दिसंबर-जनवरी तक चलता है।समस्या से निपटने के लिए खाद्यान्न के राष्ट्रीय परिवहन योजना में एफसीआई में समर्पित विभाग बनाने और रेलवे को वैगन की उपलब्धता आदि का ध्यान रखने की बात कही गई है। अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय योजना के तहत खरीद के मुख्य सीजन में उत्पादक राज्यों से खपत वाले राज्यों तक अनाज के परिवहन के लिए लंबी अवधि की रणनीति तैयार की गई है। राष्ट्रीय योजना के लिए मंत्रालय जल्द ही रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, एफसीआई चेयरमैन, संबंधित मंत्रालय के प्रतिनिधियों, अनाज खरीद की दृष्टि से पंजाब-हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों के खाद्य सचिवों की बैठक बुलाएगा। एफसीआई के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010-11 में रेल के जरिए 3142.1 लाख टन खाद्यान्न का परिवहन हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है।यह काम करीब 12,322 रैक के जरिए संपन्न हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है। अधिकारियों ने बताया कि खाद्यान्न का अतिरेक मुख्य तौर पर उत्तरी राज्यों मसलन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि तक सीमित है जबकि इसकी ढुलाई देश भर में होती है यानी लंबी दूरी तक इसका परिवहन होता है। बाजारों व खरीद केंद्रों पर खरीदे गए माल सबसे पहले नजदीकी डिपो में संग्रहित किए जाते हैं और तय समय में इसे हासिल करने वाले राज्यों को भेजा जाता है।साल 2010-11 में भारत में 23.58 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले 8.14 फीसदी ज्यादा है। साल 2011-12 के खरीद सीजन के पहले दो महीने में ही गेहूं की खरीद 260 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। (BS Hindi)
खरीद के मुख्य सीजन में खाद्यान्न के परिवहन को आसान बनाने के लिए खाद्य मंत्रालय रेलवे के साथ मिलकर राष्ट्रीय योजना बना रहा है। हाल में खाद्य मंत्री के वी थॉमस ने प्रधानमंत्री से इस योजना पर चर्चा की है। इसके तहत रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, खाद्य व जन वितरण प्रणाली के सचिव, भारतीय खाद्य निगम के चेयरमैन को शामिल करते हुए अलग से स्थायी तौर पर एकीकृत संयुक्त ढांचा बनाया जाएगा, जो खाद्यान्न की आवाजाही की निगरानी करेगा।केंद्रीय स्तर पर इस ढांचे की मौजूदगी के अलावा योजना के तहत ऐसा ही ढांचा राज्यों में बनाए जाने की वकालत की गई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि राज्यस्तरीय ढांचे में मुख्य सचिव, एफसीआई व भारतीय रेलवे के क्षेत्रीय प्रबंधक को शामिल किया जा सकता है। इससे प्रखंड और जिला स्तर पर भी अनाज की सहज आवाजाही सुनिश्चित होगी।आंकड़ों से पता चला है कि भारतीय खाद्य निगम औसतन 250 लाख टन अनाज का परिवहन 1500 किलोमीटर तक रेल, सड़क और जलमार्ग के जरिए करता है। हालांकि सबसे ज्यादा अनाज की ढुलाई भारतीय रेल के जरिए होती है।खरीद के मुख्य सीजन में इस गतिविधि में मुश्किलें पैदा होती हैं क्योंकि अनाज की मात्रा बढ़ जाती है जबकि रेलवे वैगन की संख्या में कमी आ जाती है। गेहूं की खरीद का मुख्य सीजन अप्रैल में शुरू होता है और जून-जुलाई तक चलता है जबकि चावल के मामले में यह अक्टूबर में शुरू होता है और दिसंबर-जनवरी तक चलता है।समस्या से निपटने के लिए खाद्यान्न के राष्ट्रीय परिवहन योजना में एफसीआई में समर्पित विभाग बनाने और रेलवे को वैगन की उपलब्धता आदि का ध्यान रखने की बात कही गई है। अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय योजना के तहत खरीद के मुख्य सीजन में उत्पादक राज्यों से खपत वाले राज्यों तक अनाज के परिवहन के लिए लंबी अवधि की रणनीति तैयार की गई है। राष्ट्रीय योजना के लिए मंत्रालय जल्द ही रेलवे बोर्ड के चेयरमैन, एफसीआई चेयरमैन, संबंधित मंत्रालय के प्रतिनिधियों, अनाज खरीद की दृष्टि से पंजाब-हरियाणा जैसे प्रमुख राज्यों के खाद्य सचिवों की बैठक बुलाएगा। एफसीआई के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010-11 में रेल के जरिए 3142.1 लाख टन खाद्यान्न का परिवहन हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है।यह काम करीब 12,322 रैक के जरिए संपन्न हुआ, जो पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी ज्यादा है। अधिकारियों ने बताया कि खाद्यान्न का अतिरेक मुख्य तौर पर उत्तरी राज्यों मसलन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि तक सीमित है जबकि इसकी ढुलाई देश भर में होती है यानी लंबी दूरी तक इसका परिवहन होता है। बाजारों व खरीद केंद्रों पर खरीदे गए माल सबसे पहले नजदीकी डिपो में संग्रहित किए जाते हैं और तय समय में इसे हासिल करने वाले राज्यों को भेजा जाता है।साल 2010-11 में भारत में 23.58 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान है, जो पिछले साल के मुकाबले 8.14 फीसदी ज्यादा है। साल 2011-12 के खरीद सीजन के पहले दो महीने में ही गेहूं की खरीद 260 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। (BS Hindi)
04 जून 2011
जॉब छोड़कर खेती की ओर मुड़े युवा उद्यमी
अहमदाबाद एवं कोलकाताः पैंतीस साल के गौरव सहाय ने हाल ही में एक ट्रैक्टर खरीदा है, जिसकी शोर करने वाली आवाज उन्हें होंडा एकॉर्ड के इंजन की हल्की आवाज से भी ज्यादा सुरीली लगती है। कुछ साल पहले तक सहाय अमेरिका में ह्यूलेट पैकार्ड (एचपी) के लिए काम करते थे और वह वहां होंडा एकॉर्ड में चलते थे। हालांकि, उन्हें एचपी के अमेरिकी ऑफिस से ज्यादा सुख और आराम मोहाली जिले के लादा गांव के सात एकड़ खेत में पसीना बहाकर मिलता है। ढाई साल तक एक किसान की तरह काम करने के बाद उन्हें बस इसी बात का अफसोस है कि आज भी वह 'भूमिहीन मजदूर' हैं। वह अपने एक करीबी दोस्त की जमीन पर खेती करते हैं। सहाय के दोस्त ने उन्हें न सिर्फ खेती के लिए जमीन दी, बल्कि इस गैर-पारंपरिक पेशे के लिए प्रोत्साहित भी किया। सहाय के एक अन्य दोस्त ने उन्हें चंडीगढ़ के सेक्टर 8 मार्केट में जगह दी, जहां वह हफ्ते में एकबार तीन घंटे के लिए अपनी उगाई चीजें बेचते हैं। पिछले महीने उन्होंने 1200 किलो सब्जियां बेची थीं। इस जमीन पर खेती से उन्हें जो भी आमदनी होती है, वह उसे दोबारा उसी में निवेश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने काफी रिसर्च किए और बुनियादी बातें सीखने के लिए किसानों से बातचीत भी करता हूं।' सहाय ने कहा, 'खेती सिर्फ जमीन और मिट्टी से जुड़ी नहीं है। इसमें अध्ययन और योजना की भी जरूरत है।' वह अब जड़ी बूटी और मसाले उगाने पर विचार कर रहे हैं, जिसकी मांग काफी बढ़ रही है। पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में 35 साल के एक अन्य व्यक्ति राजा अधिकारी ने अपना पारिवारिक कारोबार छोड़कर खेती की राह पकड़ ली है। वह 100 एकड़ में चाय की पैदावार करते हैं। उन्होंने कहा, 'चाय मुझे अपनी ओर खींचती है। मैं चाय की हरी पत्तियां मैकलॉयड रसेल जैसी कंपनी को बेचता हूं।' चाय की कीमतें पिछले दो साल में 95-100 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 125 रुपए प्रति किलो हो गई हैं। चाय उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'चाय की बढ़ती कीमत की वजह से युवा कारोबारियों को यह आकर्षित कर रही है।' हाल के दिनों में कमोडिटी की कीमतों में तेजी आई है। चाहे सब्जियां हों या चाय, कपास या कोई और फसल...ये सभी नई पीढ़ी को लुभा रही हैं। ये किसान रोजी-रोटी के लिए खेती नहीं करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी के उद्यमी इसमें कारोबारी संभावनाएं देख रहे हैं। वे नए तरीकों का इस्तेमाल कर नए आइडिया को अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। हल चलाने के लिए ये सभी अपने पारंपरिक करियर का मोह छोड़ रहे हैं। केपीएमजी के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर नारायणन रामास्वामी ने कहा, 'ये उद्यमियों की नई पीढ़ी है, जो वनीला, कॉफी, स्ट्रॉबेरी, चाय की खेती कर रहे हैं। इनकी नजर नए बाजारों पर है।' उन्होंने कहा, 'उत्पादन और गुणवत्ता सुधारने के लिए उन्हें कृषि के बेहतर तरीकों का इस्तेमाल करना चाहिए।' पर्यावरण अर्थशास्त्र से पोस्ट ग्रेजुएट करने वाली 33 साल की योगिता मेहरा ने खेती शुरू करने के लिए इस साल फरवरी में टेरी (एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट) की अपनी नौकरी को लात मार दी। मेहरा ने कहा, 'मैं धान और आम की खेती करूंगी।' मेहरा अब जमीन खरीदने की तैयारी कर रही हैं। उनके पति करण मनराल भी उनकी मदद कर रहे हैं, जो पेशे से स्वतंत्र मार्केटिंग कंसल्टेंट हैं। (ET Hindi)
बढ़ेगा ग्वारसीड का रकबा!
मुंबई June 03, 2011
मॉनसून के करीब आते ही ग्वारसीड का उत्पादन करने वालेकिसान खरीफ सीजन में इसकी बुआई की तैयारी शुरू कर रहे हैं, जहां उन्हें कपास व ग्वारसीड में से एक फसल को चुनना होगा, हालांकि कुछ किसान अरंडी की बुआई कर सकते हैं। एक ओर जहां ग्वारसीड ने 40 फीसदी से ज्यादा का रिटर्न दिया है, वहीं अरंडी के उत्पादन से किसानों को 45 फीसदी लाभ अर्जित हुआ है। फरवरी में कपास की कीमतें हाजिर बाजार में 63,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी में 356 किलोग्राम) पर पहुंच गई थी, जो किसानों को ज्यादा आकर्षित कर रही है। मौजूदा समय में कपास की कीमतें 45,000 रुपये प्रति कैंडी है। रकबे में हालांकि कुछ बदलाव हो सकता है, पर मोटे तौर पर कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले 15-20 फीसदी ज्यादा होगा।राजस्थान कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 में पर्याप्त बारिश के चलते राजस्थान में 30 लाख हेक्टेयर में ग्वारसीड की बुआई हुई थी और कुल उत्पादन 15.46 लाख टन रहा था। प्रदेश में ग्वारसीड की बुआई की प्राथमिकता इसकी आधारभूत प्रकृति से तय होगी, जिसके लिए कम बारिश की आवश्यकता होती है और किसान थोड़ी दुविधा में हैं कि सामान्य या अच्छी बारिश कपास जैसी फसल की बुआई के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा।जोधपुर में ग्वारसीड और ग्वारगम के कारोबारी ब्रृज मोहन ने कहा - अगर अच्छी बारिश होती है तो राजस्थान में ग्वारसीड का रकबा 20 से 25 फीसदी तक बढ़ सकता है और अगर कम बारिश हुई तो रकबे में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस साल ग्वारगम का ज्यादा निर्यात हुआ है, ऐसे में किसान इसके रकबे में बढ़ोतरी करेंगे।ग्वारगम की कीमतें किसानों को लुभा रही हैं, क्योंकि इसकी कीमतें एक साल में दोगुनी हो गई हैं। ग्वारसीड की 70 फीसदी से ज्यादा फसल की बुआई राजस्थान में होती है। हाजिर बाजार में ग्वारसीड की कीमतें 3221 रुपये प्रति क्विंटल है, वहीं पिछले साल जून में यह 2280 रुपये प्रति क्विंटल थी। ग्वारगम का उत्पादन ग्वारसीड से होता है और मजबूत निर्यात मांग के चलते इसकी कीमतों में भी 100 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कारोबारी और विश्लेषक अभी भी ग्वारसीड के रकबे में बढ़ोतरी की बात कह रहे हैं। केडिया कमोडिटीज के अजय केडिया का मानना है कि पिछले साल इसमें अच्छा रिटर्न मिला था, लिहाजा इस साल ग्वारसीड के रकबे में 15 से 20 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन इस बात की ज्यादा संभावना है कि कपास और अरंडी में भी कुछ रकबा जा सकता है। 2010-11 में 111.6 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। पाराडाइम कमोडिटीज के निदेशक बीरेन वकील ने कहा - अरंडी जैसे अन्य जिंसों के बाजार परिदृश्य को देखते हुए कहा जा सकता है कि ग्वारगम की निर्यात मांग में बढ़ोतरी व ग्वारसीड की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद इसके रकबे में कमी आएगी क्योंकि कपास व अरंडी ने बेहतर रिटर्न दिया है। (BS Hindi)
मॉनसून के करीब आते ही ग्वारसीड का उत्पादन करने वालेकिसान खरीफ सीजन में इसकी बुआई की तैयारी शुरू कर रहे हैं, जहां उन्हें कपास व ग्वारसीड में से एक फसल को चुनना होगा, हालांकि कुछ किसान अरंडी की बुआई कर सकते हैं। एक ओर जहां ग्वारसीड ने 40 फीसदी से ज्यादा का रिटर्न दिया है, वहीं अरंडी के उत्पादन से किसानों को 45 फीसदी लाभ अर्जित हुआ है। फरवरी में कपास की कीमतें हाजिर बाजार में 63,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी में 356 किलोग्राम) पर पहुंच गई थी, जो किसानों को ज्यादा आकर्षित कर रही है। मौजूदा समय में कपास की कीमतें 45,000 रुपये प्रति कैंडी है। रकबे में हालांकि कुछ बदलाव हो सकता है, पर मोटे तौर पर कुल रकबा पिछले साल के मुकाबले 15-20 फीसदी ज्यादा होगा।राजस्थान कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 में पर्याप्त बारिश के चलते राजस्थान में 30 लाख हेक्टेयर में ग्वारसीड की बुआई हुई थी और कुल उत्पादन 15.46 लाख टन रहा था। प्रदेश में ग्वारसीड की बुआई की प्राथमिकता इसकी आधारभूत प्रकृति से तय होगी, जिसके लिए कम बारिश की आवश्यकता होती है और किसान थोड़ी दुविधा में हैं कि सामान्य या अच्छी बारिश कपास जैसी फसल की बुआई के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा।जोधपुर में ग्वारसीड और ग्वारगम के कारोबारी ब्रृज मोहन ने कहा - अगर अच्छी बारिश होती है तो राजस्थान में ग्वारसीड का रकबा 20 से 25 फीसदी तक बढ़ सकता है और अगर कम बारिश हुई तो रकबे में 50 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। उन्होंने कहा कि इस साल ग्वारगम का ज्यादा निर्यात हुआ है, ऐसे में किसान इसके रकबे में बढ़ोतरी करेंगे।ग्वारगम की कीमतें किसानों को लुभा रही हैं, क्योंकि इसकी कीमतें एक साल में दोगुनी हो गई हैं। ग्वारसीड की 70 फीसदी से ज्यादा फसल की बुआई राजस्थान में होती है। हाजिर बाजार में ग्वारसीड की कीमतें 3221 रुपये प्रति क्विंटल है, वहीं पिछले साल जून में यह 2280 रुपये प्रति क्विंटल थी। ग्वारगम का उत्पादन ग्वारसीड से होता है और मजबूत निर्यात मांग के चलते इसकी कीमतों में भी 100 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। कारोबारी और विश्लेषक अभी भी ग्वारसीड के रकबे में बढ़ोतरी की बात कह रहे हैं। केडिया कमोडिटीज के अजय केडिया का मानना है कि पिछले साल इसमें अच्छा रिटर्न मिला था, लिहाजा इस साल ग्वारसीड के रकबे में 15 से 20 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। लेकिन इस बात की ज्यादा संभावना है कि कपास और अरंडी में भी कुछ रकबा जा सकता है। 2010-11 में 111.6 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। पाराडाइम कमोडिटीज के निदेशक बीरेन वकील ने कहा - अरंडी जैसे अन्य जिंसों के बाजार परिदृश्य को देखते हुए कहा जा सकता है कि ग्वारगम की निर्यात मांग में बढ़ोतरी व ग्वारसीड की कीमतों में बढ़ोतरी के बावजूद इसके रकबे में कमी आएगी क्योंकि कपास व अरंडी ने बेहतर रिटर्न दिया है। (BS Hindi)
10 फीसदी तक बढ़ेगा कपास का रकबा
अहमदाबाद June 03, 2011
साल 2011-12 में कपास के रकबे में करीब 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है और इस तरह साल 2010-11 के 111.6 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी। रकबे में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि कपास की ऊंची कीमतों के चलते ज्यादा से ज्यादा किसान कपास का रुख कर रहे हैं।कपास के रकबे में कुल मिलाकर बढ़ोतरी की संभावना इसलिए भी मजबूत हो रही है कि उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में साल 2011-12 में कपास के रकबे मेंं 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों में कपास की बुआई मोटे तौर पर समाप्त हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कपास के रकबे में करीब 2 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है और यह आज के समय में 15 से 15.5 लाख हेक्टेयर के आसपास पहुंच गया है जबकि पिछले साल 13.5 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने कहा - उत्तर भारत में कपास की बुआई का काम करीब-करीब समाप्त हो चुका है और पंजाब में हमने इसके रकबे में तीव्र बढ़ोतरी देखी है। राजस्थान व हरियाणा में भी कपास के रकबे में इजाफा हुआ है। बेहतर रिटर्न के चलते किसानों ने धान व ग्वार की बजाय कपास का रुख किया है। देश के कुल कपास उत्पादन में उत्तर भारत करीब 12-13 फीसदी का योगदान करता है और यहां का कुल उत्पादन करीब 38 से 39 लाख गांठ है।इस बीच, उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि कपास के रकबे में 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है और यह पिछले साल के 111.6 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस साल 150 से 180 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक बी के मिश्रा ने कहा - हमने इस साल कपास के रकबे में बढ़ोतरी देखी है। हाल में इसकी कीमतों में हुए उतारचढ़ाव के बाद भी किसान इसकी खेती की तरफ आकर्षित हुए हैं क्यों कि पिछले साल उनन्हें भारी रिटर्न मिला था। हालांकि इस बात का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि साल 2011-12 में कपास का वास्तविक रकबा कितना होगा। लेकिन इसके रकबे में संभवत: 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च के बाद कपास की कीमतों में भारी गिरावट आई है।कपास के शंकर-6 किस्म की कीमतें मार्च में 62,500 रुपये प्रति कैंडी पर थीं, जो अब घटकर 45,000 रुपये रह गई है। वैश्विक बाजार में भी कपास की कीमतें तेजी से गिरी हैं। भारत में कपास का रकबा साल 2009-10 में 103.1 लाख हेक्टेयर था, जो 2010-11 में बढ़कर 111.6 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया था।गुजरात में इस साल कपास का रकबा 28 लाख हेक्टेयर रह सकता है, जबकि पिछले साल 26.3 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। गुजरात स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन फेडरेशन के प्रबंध निदेशक एन एम शर्मा ने कहा - कपास से मिले रिटर्न से किसान उत्साहित हैं। ऐसे में गुजरात में भी इस सीजन में कपास का रकबा बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यहां कपास का रकबा बढ़कर 28 से 30 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा।कपास का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख राज्य आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश हैं। इन इलाकों में कपास की फसल मोटे तौर पर बारिश पर आश्रित होती है। इन इलाकों में कपास की बुआई जून के दूसरे हफ्ते से जोर पकड़ेगी। चूंकि दक्षिण पश्चिम मॉनसून देश के दक्षिणी हिस्सों में दस्तक दे चुका है और इसके धीरे-धीरे आगे बढऩे की संभावना है, लिहाजा किसान साल 2011-12 में कपास की सफल खेती के प्रति आशान्वित हैं। (BS Hindi)
साल 2011-12 में कपास के रकबे में करीब 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है और इस तरह साल 2010-11 के 111.6 लाख हेक्टेयर के मुकाबले इसमें अच्छी खासी बढ़ोतरी होगी। रकबे में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि कपास की ऊंची कीमतों के चलते ज्यादा से ज्यादा किसान कपास का रुख कर रहे हैं।कपास के रकबे में कुल मिलाकर बढ़ोतरी की संभावना इसलिए भी मजबूत हो रही है कि उत्तर भारत (पंजाब, हरियाणा और राजस्थान) में साल 2011-12 में कपास के रकबे मेंं 15-20 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इन राज्यों में कपास की बुआई मोटे तौर पर समाप्त हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा व राजस्थान में कपास के रकबे में करीब 2 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है और यह आज के समय में 15 से 15.5 लाख हेक्टेयर के आसपास पहुंच गया है जबकि पिछले साल 13.5 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। नॉर्थ इंडिया कॉटन एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश राठी ने कहा - उत्तर भारत में कपास की बुआई का काम करीब-करीब समाप्त हो चुका है और पंजाब में हमने इसके रकबे में तीव्र बढ़ोतरी देखी है। राजस्थान व हरियाणा में भी कपास के रकबे में इजाफा हुआ है। बेहतर रिटर्न के चलते किसानों ने धान व ग्वार की बजाय कपास का रुख किया है। देश के कुल कपास उत्पादन में उत्तर भारत करीब 12-13 फीसदी का योगदान करता है और यहां का कुल उत्पादन करीब 38 से 39 लाख गांठ है।इस बीच, उद्योग के विशेषज्ञों का कहना है कि कपास के रकबे में 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है और यह पिछले साल के 111.6 लाख हेक्टेयर से बढ़कर इस साल 150 से 180 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया है।कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के प्रबंध निदेशक बी के मिश्रा ने कहा - हमने इस साल कपास के रकबे में बढ़ोतरी देखी है। हाल में इसकी कीमतों में हुए उतारचढ़ाव के बाद भी किसान इसकी खेती की तरफ आकर्षित हुए हैं क्यों कि पिछले साल उनन्हें भारी रिटर्न मिला था। हालांकि इस बात का अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी कि साल 2011-12 में कपास का वास्तविक रकबा कितना होगा। लेकिन इसके रकबे में संभवत: 5 से 10 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। उन्होंने यह भी बताया कि मार्च के बाद कपास की कीमतों में भारी गिरावट आई है।कपास के शंकर-6 किस्म की कीमतें मार्च में 62,500 रुपये प्रति कैंडी पर थीं, जो अब घटकर 45,000 रुपये रह गई है। वैश्विक बाजार में भी कपास की कीमतें तेजी से गिरी हैं। भारत में कपास का रकबा साल 2009-10 में 103.1 लाख हेक्टेयर था, जो 2010-11 में बढ़कर 111.6 लाख हेक्टेयर पर पहुंच गया था।गुजरात में इस साल कपास का रकबा 28 लाख हेक्टेयर रह सकता है, जबकि पिछले साल 26.3 लाख हेक्टेयर में कपास की बुआई हुई थी। गुजरात स्टेट कोऑपरेटिव कॉटन फेडरेशन के प्रबंध निदेशक एन एम शर्मा ने कहा - कपास से मिले रिटर्न से किसान उत्साहित हैं। ऐसे में गुजरात में भी इस सीजन में कपास का रकबा बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि यहां कपास का रकबा बढ़कर 28 से 30 लाख हेक्टेयर पर पहुंच जाएगा।कपास का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख राज्य आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश हैं। इन इलाकों में कपास की फसल मोटे तौर पर बारिश पर आश्रित होती है। इन इलाकों में कपास की बुआई जून के दूसरे हफ्ते से जोर पकड़ेगी। चूंकि दक्षिण पश्चिम मॉनसून देश के दक्षिणी हिस्सों में दस्तक दे चुका है और इसके धीरे-धीरे आगे बढऩे की संभावना है, लिहाजा किसान साल 2011-12 में कपास की सफल खेती के प्रति आशान्वित हैं। (BS Hindi)
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