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04 जून 2011

अब राज करेगी घरवाली

नई दिल्ली 06 03, 2011
देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अब महिलाओं का रुतबा बढ़ाने की तैयारी शुरू हो गई है। खाद्य सुरक्षा विधेयक के मसौदे में 18 साल से अधिक उम्र की लड़की या महिला को परिवार का प्रमुख बनाने का प्रस्ताव शामिल है। अब तक राशन कार्ड के वितरण के दौरान जीवित पुरुष सदस्य को ही परिवार का मुखिया माना जाता था। अधिकारियों का कहना है कि प्रस्तावित विधेयक में अनाज की मासिक अधिप्राप्ति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी। मसौदे में राज्य में खाद्य वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति नहीं होने पर नकद देने की भी बात कही गई है। प्रस्ताव पारित हुआ तो खुले बाजार से अनाज खरीदने में महिलाओं की रायशुमारी बढ़ेगी। मसौदे में प्रस्ताव है कि अगर किसी परिवार में सभी महिलाओं की उम्र 18 साल से कम है तो उनमें से सबसे बड़ी महिला की उम्र 18 साल होते ही उसे परिवार का मुखिया बनाया जाए।संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्टï्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने भी राशन कार्ड के वितरण में महिला को परिवार का मुखिया बनाने की सिफारिश की थी। खाद्य सुरक्षा बिल काफी हद तक परिषद की सिफारिशों पर ही आधारित है।मसौदे में परिवार के बजाय व्यक्तियों के आधार पर अनाज बांटने का प्रस्ताव भी शामिल है। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया की अध्यक्षता में खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण पर बनाए गए कार्यकारी समूह ने भी ऐसा ही सुझाव दिया था।फिलहाल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवार को तय मात्रा में अनाज मिलता है। इसमें परिवार के सदस्यों की संख्या को अहमियत नहीं दी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सही तरीके से अनाज का आवंटन नहीं हो पाता है। विधेयक में गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले 29 फीसदी परिवारों को कानूनी रूप से अनाज देने का प्रस्ताव है। हालांकि एनएसी ने इसके दायरे में गरीबी रेखा से ऊपर रहने वाले 44 फीसदी परिवारों को लाने की सिफारिश की थी।मसौदे में कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करने की भी सिफारिश है। मसौदे में केंद्रीय या राज्य स्तर पर इस कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को तीन साल की कारावास या 3 लाख रुपये का जुर्माना या फिर कारावास व जुर्माना दोनों लगाने का प्रस्ताव है। मसौदे में अनाज वितरण संबंधी शिकायतों को 15 दिन में सुलझाने का निर्देश है। एनएसी की सिफारिश मानते हुए गर्भवती महिलाओं, असहाय, बेघर, प्रवासी मजदूर और बच्चों को अनाज या पका हुआ भोजन देने का भी प्रस्ताव है। (BS Hindi)

02 जून 2011

सरकार ने खाद्य सामग्री की बर्बादी को रोकने के लिए समिति का गठन किया

उपभोक्‍ता मामले, खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने खाद्य पदार्थों की बर्बादी को रोकने के लिए संभव उपाय एवं मार्ग सुझाने के लिए और इस संबंध में विचार-विमर्श करने के लिए एक पन्‍द्रह सदस्‍यीय समिति का गठन किया है । खाद्य सामग्रियों की बर्बादी पर और दिखावे के नाम पर खास तौर पर शादियों/पार्टियों/बैठकों जैसे अवसरों के नाम पर की गई बर्बादी पर समय–समय पर चिंता व्‍यक्‍त की गई है । यह अनुमान लगाया गया है कि हमारे देश में खाद्य सामग्रियों का लगभग 15 से 20 प्रतिशत ऐसे सामाजिक समारोहों में बर्बाद हो जाता है । यह समिति खाद्य सामग्री की बर्बादी को रोकने के लिए उपयुक्‍त जागरूकता कार्यक्रम/जन अभियान का सुझाव देगी । यह इस दिशा में विधार्थी एवं प्रशासनिक पहलों को शुरू करने के लिए विभिन्‍न विकल्‍पों की भी तलाश करेगी । इसके अलावा यह समिति इस बात की भी जांच करेगी कि किस प्रकार सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र मितव्‍ययिता के द्वारा एक उदाहरण प्रस्‍तुत कर सकते हैं । उपभोक्‍ता मामलों के सचिव श्री राजीव अग्रवाल इस समिति के अध्‍यक्ष होंगे । इस समिति के सदस्‍य हैं : पत्र सूचना कार्यालय की प्रधान महानिदेशक (मीडिया व संचार) श्रीमती नीलम कपूर, डीएवीपी के महानिदेशक ए. पी. फ्रैंक नोरोन्‍हा, तमिलनाडु सरकार के खाद्य एवं उपभोक्‍ता संरक्षण विभाग के प्रधान सचिव स्‍वर्ण सिंह, पश्चिम बंगाल सरकार के उपभोक्‍ता मामले के प्रधान सचिव के. साथियावासन, महाराष्‍ट्र सरकार के खाद्य व जन आपूर्ति विभाग के सचिव बलदेव सिंह, दिल्‍ली सरकार के खाद्य व जन आपूर्ति विभाग के सचिव धरम पाल, पत्रकार के. एम. रॉय, पत्रकार जॉर्ज वर्गीज, पूर्व विधायक एम. ए. चंद्रशेखरन , उपभोक्‍ता विषय पर लिखने वाली पुस्‍पा गिरिमाजी, उपभोक्‍ता कार्यकर्ता विनोद आशिष, उपभोक्‍ता कार्यकर्ता राजन गांधी, आईआईपीए में उपभोक्‍ता अध्‍ययन केंद्र के प्रोफेसर सुरेश मिश्रा । उपभोक्‍ता मामले विभाग के उप सचिव जी. एन. सिंह इस समिति के संयोजक होंगे । (Pib)

महंगा पड़ रहा है ड्रैगन का सोना प्रेम

मुंबई : भारतीय खरादारों को सोने के गहनों के लिए ज्यादा कीमत चुकानी होगी। इसकी वजह सिर्फ
सोने की बढ़ती कीमतें नहीं हैं। दरअसल, चीन में बढ़ी मांग के चलते भारतीय उपभोक्ताओं की जेब ढीली होगी। चीन में मांग बढ़ने और विमानों का ईंधन महंगा होने के चलते विदेशी सप्लाइकर्ताओं ने हाल में सोने पर प्रीमियम बढ़ा दिया है। एक प्रमुख सरकारी बैंक की बुलियन ब्रांच के एक अधिकारी ने कहा कि सप्लायरों ने इस महीने चीनी मांग में तेज उछाल के चलते एक औंस (31.10 ग्राम) के लिए प्रीमियम 75 सेंट से एक डॉलर तक बढ़ा दिया। घरेलू ज्वैलर्स को सोने की सप्लाई करने वाले स्कॉटियाबैंक के एक अधिकारी ने कहा कि जेट ईंधन में तेजी ने भी बैंक को प्रीमियम बढ़ाने के लिए मजबूर किया है। सरकारी बैंक के अधिकारी ने कहा, 'चीन से मांग लगातार बढ़ रही है। उनकी वजह से सप्लाई पर दबाव पड़ा है, जिसके चलते इस महीने प्रीमियम 1-1.5 डॉलर प्रति औंस से बढ़कर 1.5-2 डॉलर प्रति औंस हो गया।' बैंक सप्लायर के प्रीमियम के ऊपर 30-50 सेंट प्रति औंस का कमीशन लेता है। सप्लायर के प्रीमियम में पैकिंग, इंश्योरेंस और ट्रांसपोर्ट का खर्च शामिल होता है। स्कॉटियाबैंक की शाखा स्कॉटियामोकाटा के एमडी (बुलियन) राजन वेंकटेश के मुताबिक, हवाई ईंधन की ऊंची कीमतों की भरपाई के लिए सोने के प्रीमियम में 20-30 सेंट प्रति औंस की हल्की बढ़ोतरी की गई थी। सोने की ढुलाई मुख्य तौर पर हवाई रास्ते से होती है। क्रूड ऑयल की कीमतों में तेजी के साथ अंतरराष्ट्रीय जेट ईंधन के दाम मार्च के 918.5 डॉलर प्रति किलोलीटर से बढ़कर अप्रैल में 1020.66 डॉलर प्रति किलोलीटर और मई में 1061.14 प्रति किलोलीटर रहे। पिछले 11 वषोर्ं से हर साल सोने के भाव बढ़े हैं। डॉलर में कमजोरी और हाल में यूरो जोन के कर्ज संकट, साथ ही चीन और भारत जैसे उभरते बाजारों में महंगाई की वजह से पिछले एक साल में सोने के भाव में 21 फीसदी की तेजी आई है और यह 22,593 रुपए प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया है। सोने के भाव में डॉलर से उलटी गति देखी जाती है और महंगाई के खिलाफ हेजिंग के लिए इसका इस्तेमाल होता है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (डब्ल्यूजीसी) ने पाया है कि साल 2011 की पहली तिमाही में चीन में सोने की मांग वहां के लोगों के सांस्कृतिक जुड़ाव, महंगाई पर काबू पाने के लिए की जा रही मौद्रिक सख्ती और सोने पर चीन के केंदीय बैंक की सकारात्मक नजर तथा रियल एस्टेट से नकदी दूसरे सेक्टरों में जाने की वजह से बढ़ी है। बैंकरों का कहना है, 'आज चीन दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। 2010 में सोने के भाव में औसतन सालाना 25 फीसदी की तेजी के बाद भी सोने की मांग 32 फीसदी बढ़ी। पहली बार ज्वैलरी, निवेश और टेकनेलॉजी सभी को मिलाकर सोने की सालाना मांग 700 टन के पार पहुंच गई।' बैंकरों का कहना है कि फिलहाल चीन की मांग भारत से ज्यादा है। चीन ने पिछले साल 958 टन सोने का आयात किया था। डब्ल्यूजीसी के मुताबिक, चालू साल की पहली तिमाही में सोने की ज्वैलरी के लिए भारतीय मांग 206.2 टन रही, जो वैश्विक मांग का 37 फीसदी है। (ET Hindi)

तांबा, सोना और कोयले के दाम में रहेगी तेजी

मुंबई: अगले दो से तीन सालों के दौरान कमोडिटी में तेजी की अगुवाई तांबा, सोना, लौह अयस्क और कोयला के हाथों में होगी। यह कहना है स्टैंडर्ड चार्टर्ड का। बैंक मुताबिक, भारत और चीन जैसे देशों में खपत ज्यादा रहने की वजह से इन कमोडिटी की मांग आपूर्ति से ज्यादा रहेगी। स्टैंचार्ट के ग्लोबल हेड (कमोडिटी सेल्स) आशीष मित्तल ने कहा, 'मांग और आपूर्ति के बीच अंतर बढ़ रहा है। इसकी वजह से अगले तीन सालों के दौरान कमोडिटी की कीमतें बढ़ेंगी। असल में वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान कंपनियों ने कई निवेश स्थगित कर दिए थे।' अप्रैल में भी लगातार पांचवें महीने स्टैंडर्ड एंड पुअर्स जीएससीआई इंडेक्स ने शेयरों, बॉन्ड और डॉलर से बेहतर प्रदर्शन किया है। इसकी प्रमुख वजह निवेशकों की कमोडिटी में दिलचस्पी है। ऊंची मंहगाई दर के चलते निवेशक कमोडिटी पर दांव लगाना फायदेमंद मान रहे हैं। पिछले करीब 14 सालों में यह पहला मौका है, जब इस इंडेक्स ने लगातार पांच महीनों तक शेयर, बॉन्ड और डॉलर को पीछे किया है। इस इंडेक्स में 24 कमोडिटी शामिल हैं। उधर, गोल्डमैन सैक्स ने भी इस हफ्ते कमोडिटी में तेजी का रुझान व्यक्त किया है। इसने ऑयल, तांबा और जिंक में खरीदारी की सलाह दी है जबकि पिछले महीने गौल्डमैन सैक्स ने इन कमोडिटी को बेचने की सलाह दी थी। गुरुवार को जी-8 के नेताओं की ओर से ऐसे संकेत आए कि कमोडिटी की ऊंची कीमतें वैश्विक आर्थिक रिकवरी के लिए खतरा साबित हो सकती हैं। बैंक ऑफ जापान के असिस्टेंट गवर्नर हिरोशी नाकासो ने कहा कि उभरते बाजारों में तेज ग्रोथ की वजह से पैदा हो रही मांग को पूरा करने में उत्पादकों को समय लग सकता है, जिसके कारण कीमतों में और इजाफे की आशंका है। कमोडिटी की बढ़ती कीमतों के कारण अप्रैल में वैश्विक खाद्य कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं। इसके चलते कई देशों के केंद्रीय बैंकों को ब्याज दरों में वृद्धि करनी पड़ी। मित्तल ने कहा, 'लोग अपनी कारों के लिए महंगे ईंधन का खर्च वहन कर सकते हैं, लेकिन वे खाद्य पदार्थों की ऊंची कीमतें नहीं दे सकते।' मित्तल ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर कृषि कमोडिटी पर भी पड़ेगा क्योंकि क्रूड के दाम बढ़ने से वैकल्पिक ईंधन की मांग बढ़ेगी और चीनी, मक्का और पॉम ऑयल के भाव बढ़ेंगे। संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन के मुताबिक, पिछले महीने 55 खाद्य कमोडिटी का एक सूचकांक बढ़कर 232.1 पर पहुंच गया जो मार्च में 231 अंक पर था। फरवरी में यह सूचकांक 237.2 अंक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। 6 मई को खत्म हुए हफ्ते के दौरान एसएंडपी जीएससीआई इंडेक्स 11 फीसदी उछल गया, जो दिसंबर 2008 के बाद से सबसे बड़ा उछाल है। पिछले साल की तुलना में इस साल इसमें 10 फीसदी उछाल आ चुका है। गैसोलीन, गैस ऑयल और चांदी में आई तेजी की वजह से इसमें इतनी उछाल देखने को मिली। (ET Hindi)के

रबड़ के दाम में फिर आ सकता है उछाल

कोच्चि : पिछले कुछ हफ्तों में प्राकृतिक रबड़ की कीमतों में तेज गिरावट आई है। इसकी वजह ज्यादा उत्पादन और बढ़ता आयातहै। हालांकि, मानसून आने के बाद रबड़ का ऑफ सीजन होने पर इसकी कीमतों में फिर बढ़ोतरी हो सकती है। मई में टायर कंपनियों की खरीदारी टालने से रबड़ की हाजिर कीमत में 11 फीसदी गिरावट आई थी। बाजार के सूत्रों के मुताबिक, कुल रबड़ उत्पादन की 62 फीसदी खरीदारी टायर कंपनियां करती हैं। मई के दौरान उनकी खरीदारी में 25 फीसदी की कमी आई थी। अप्रैल में रबड़ का उत्पादन लगभग 6 फीसदी ज्यादा रहा। रबड़ उत्पादकों और डीलरों के मुताबिक, मई में भी ऐसी की स्थिति रह सकती है। वित्त वर्ष 2010-11 में उत्पादन में लगभग 4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई थी। इंडियन रबड़ डीलर्स फेडरेशन के प्रेसिडेंट जॉर्ज वैली के मुताबिक, 'ज्यादा बारिश, पेड़ों की बेहतर सुरक्षा और 20 फीसदी आयात शुल्क को बदलकर 20 रुपए या 20 फीसदी (जो भी कम हो) किए जाने से कीमतों में गिरावट आई है।' अप्रैल से 27 मई के बीच देश में 16,668 टन रबड़ का आयात हुआ, लेकिन यह पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 35 फीसदी कम है। सूत्रों के मुताबिक, आने वाले दिनों में और रबड़ का आयात हो सकता है। बाजार के जानकारों का कहना है कि मानसून के दौरान उत्पादन का ऑफ सीजन शुरू होने पर रबड़ की कीमतों में फिर से उछाल आ सकता है। केरल तट पर उम्मीद से पहले मानसून आने से उत्पादन में कमी और कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। मई में 215 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहे रबड़ की कीमत सोमवार को 218 रुपए प्रति किलोग्राम हो गई थी। विदेशी बाजार में मई के अंतिम पखवाड़े में रबड़ की कीमतों में कमी आई। इस दौरान इसकी औसत कीमत 230.63 रुपए प्रति किलोग्राम रही। (ET Hindi)

पेट्रोल में एथॅनाल मिलाने के कार्यक्रम पर संकट के बादल

नई दिल्लीः पेट्रोल में अनिर्वाय रूप से 5 फीसदी एथनॉल मिलाने के प्रस्ताव पर काले बादल घिर आए हैं। एक प्रभावशाली सलाहकार समिति ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस कार्यक्रम पर दोबारा विचार करने या कम से कम फिलहाल इसे अनिवार्य न बनाने का मशविरा दिया है। सी रंगराजन की अगुवाई वाली प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी) ने कहा है कि देशभर में पेट्रोल में एथनॉल मिलाने का कार्यक्रम शुरू करने से पहले से कुछ सवालों के जवाब ढूंढे जाने चाहिए। एक सरकारी अधिकारी ने बताया कि ईएसी ने सरकार को फिलहाल एथनॉल मिश्रण को अनिवार्य बनाने से बचने और रसायन तथा पोटेबल अल्कोहल जैसे दूसरे अहम क्षेत्रों की जरूरत पूरा होने के बाद बचने वाले एथनॉल पर काम करने की सलाह दी थी। अप्रैल के मध्य में लिखे गए एक पत्र में दलील दी गई है कि मंत्रालय की ओर से बताए गए उद्देश्यों और इन उद्देश्यों का समर्थन करने वाले सबूतों के बीच 'तालमेल' की भारी कमी है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन सवालों को खाद्य, पीडीएस और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के सामने रखा था, जिसने ब्लेंडिंग के इस कार्यक्रम पर विचार-विमर्श किया। एथनॉल मिलाने को अनिवार्य बनाने के पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी, ऊर्जा सुरक्षा मिलेगी, चीनी सेक्टर को फायदा पहुंचेगा और साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी यह कदम वाजिब रहेगा। यह कार्यक्रम तभी कामयाब रहेगा, जब पर्याप्त मात्रा में एथनॉल हो। और इस बारे में राय बंटी हुई है। रसायन और अल्कोहल उद्योग का कहना है कि सभी के लिए पर्याप्त एथनॉल नहीं है। अगर एथनॉल को ब्लेंडिंग के लिए घुमा दिया जाता है, तो उन्हें अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए आयात करने पर मजबूर होना होगा। तमिलनाडु ने पहले ही एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के लिए होने वाली सप्लाई पर पाबंदी लगा दी है, जबकि बिहार ने 'अनाधिकारिक' रूप से इसे प्रोत्साहित न करने का रुख दिखाया है। योजना आयोग के सदस्य सौमित्र चौधरी की अगुवाई में सरकार की ओर से गठित एक समिति ने एथनॉल की उपलब्धता को लेकर सवाल खड़े किए थे। चौधरी ईएसी के सदस्य भी हैं। हालांकि, चौधरी पैनल के आठ सदस्यों में से पांच ने एथनॉल के सेक्टरवार आवंटन के मुद्दे के खिलाफ जाने का फैसला किया है, जिसमें एथनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम भी शामिल है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक ए वर्मा ने 5 फीसदी ब्लेंडिंग कार्यक्रम के लिए एथनॉल की सप्लाई में कमी आने वाली चिंताओं को सिरे से दरकिनार किया है। उन्होंने बताया कि 58 करोड़ लीटर की सप्लाई के लिए पहले ही अनुबंध हो चुका है। सौमित्र चौधरी पैनल का कहना है कि ब्लेंडिंग के लिए 60 करोड़ लीटर एथनॉल उपलब्ध है। अक्टूबर से शुरू होने वाले साल में एथनॉल की कुल मांग 100 करोड़ लीटर रहने की उम्मीद जताई जा रही है। ईएसी ने खाद्य सुरक्षा चिंताओं को लेकर सीधे गन्ने से एथनॉल का उत्पादन करने का भी विरोध किया है। फिलहाल एथनॉल का उत्पादन चीनी मैन्युफैक्चरिंग के बाई-प्रोडक्ट के रूप में होता है। (ET Hindi)

रीटेल में 51% FDI करने का सशर्त प्रस्ताव

नई दिल्लीः वॉलमार्ट, कैरफूर और टेस्को जैसी मल्टीनेशनल रीटेल कंपनियों को भारत में अपने आउटलेट खोलने की इजाजत जल्द ही मिल सकती है, हालांकि उन्हें निवेश, सप्लाई और बड़े शहरों में स्टोर की सीमा को लेकर कई पाबंदियों का सामना करना पड़ेगा। औद्योगिक नीति और संवर्द्धन विभाग (डीआईपीपी) एक ऐसा प्रस्ताव कैबिनेट के पास भेज सकता है, जिसमें मल्टी ब्रांड रीटेल में 51 फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सिफारिश हो। डीआईपीपी इस सेक्टर में विदेशी निवेश की न्यूनतम सीमा 10 करोड़ डॉलर तय कर सकता है। इस कदम का राजनीतिक विरोध न हो, इसलिए विदेशी रीटेल चेन स्टोर पर आखिरी फैसले का अधिकार संबंधित राज्य सरकारों को दिए जाने का प्रस्ताव है। डीआईपीपी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं जाहिर करने की शर्त पर बताया, 'ड्राफ्ट फ्रेमवर्क तैयार कर लिया गया है। इसमें छोटे दुकानदारों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। ड्राफ्ट फ्रेमवर्क में यह कोशिश की गई है कि इस सेक्टर में एफडीआई आने से बैक-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिले।' ड्राफ्ट फ्रेमवर्क को एक सचिवों की समिति को बांटा गया है। समिति इसमें संशोधन करके इसे अंतिम रूप देगी, जिसके बाद औपचारिक कैबिनेट नोट भेजा जाएगा। हफ्ते भर पहले कौशिक बसु की अगुवाई वाली उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी समिति ने मल्टी ब्रांड रीटेल सेक्टर को एफडीआई के लिए खोलने की सिफारिश की थी। भारत में अभी सिंगल ब्रांड रीटेल में 51 फीसदी और होलसेल कैश एंड कैरी में 100 फीसदी एफडीआई की इजाजत है। डीआईपीपी के प्रस्ताव के मुताबिक, विदेशी रीटेलरों को कम से कम 50 फीसदी निवेश बैक-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर में करना होगा। इस निवेश के स्टेटमेंट ऑफ एकाउंट को उन्हें आरबीआई और विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड (एफआईपीबी) के पास जमा कराना होगा। सरकार बैक-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर को अलग इकाई के जरिए तैयार करने की इजाजत भी दे सकती है, जिससे उसे इस पर नजर रखने में सहूलियत होगी। विदेशी रीटेलरों को खाद्य उत्पाद सहित 30 फीसदी सामान भारत में छोटे और मझोले उपक्रम से खरीदने होंगे। विदेशी मल्टी ब्रांड रीटेल स्टोर को खोलने की इजाजत उन्हीं शहरों में दी जाएगी, जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है। हालांकि इस बारे में आखिरी फैसला राज्यों पर छोड़ा जा सकता है। आउटलेट शहर के 10 किलोमीटर के दायरे में हो सकता है। डीआईपीपी के इस अधिकारी ने बताया कि सरकार चाहती है कि मल्टी ब्रांड रीटेल में एफडीआई से बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन हो। साथ ही इससे बैंक-एंड इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने में भी मदद मिलनी चाहिए। भारत में कोल्ड चेन की कमी से 40 फीसदी कृषि उत्पाद बर्बाद हो जाते हैं। उद्योग के अनुमान के मुताबिक, इससे सालाना 50,000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है। भारत में रीटेल इंडस्ट्री 400 अरब डॉलर की है और यह तेजी से बढ़ रही है। मल्टीनेशनल रीटेल चेन यहां आने के लिए काफी समय से लॉबीइंग कर रहे हैं। हालांकि लेफ्ट और बीजेपी सहित दूसरे आलोचकों का कहना है कि विदेशी रीटेल चेन के आने से छोटे दुकानदारों के हितों को चोट पहुंचेगी। (ET Hindi)