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07 जनवरी 2011

दलहन उत्पादन 165 लाख टन संभव

चालू सीजन में देश का दलहन उत्पादन बढ़कर 165 लाख टन होने का अनुमान है। कृषि आयुक्त गुरबचन सिंह ने बताया कि आंध्र प्रदेश में प्रतिकूल मौसम से दालों का उत्पादन प्रभावित जरुर हुआ है। लेकिन अन्य राज्यों में मौसम अनुकूल बना हुआ है। साथ ही रबी सीजन में दालों के बुवाई क्षेत्रफल में भी 7.5 लाख हैक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने बताया कि चालू रबी में दालों की बुवाई बढ़कर 90.83 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 83.31 लाख हैक्टेयर से ज्यादा है। प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में मौसम भी अनुकूल बना हुआ है। ऐसे में दालों का उत्पादन बढ़कर तय लक्ष्य 165 लाख टन से ज्यादा ही होने का अनुमान है। खरीफ में दालों का उत्पादन 43 लाख टन से बढ़कर 60 लाख टन होने की संभावना है। जबकि रबी दलहन की प्रमुख फसल चने के लिए मौसम अनुकूल बना हुआ है। ऐसे में रबी में भी पैदावार बढ़ेगी। उन्होंने बताया कि आंध्रप्रदेश में बारिश और बाढ़ से हुए नुकसान का आंकलन किया जा रहा है। तथा जनवरी मध्य तक रिपोर्ट आने की संभावना है। (Buisness Bhaskar.....R S Rana)

अनुकूल मौसम से गेहूं के रिकॉर्ड उत्पादन की उम्मीद

मौसम का वरदानउत्तर भारत में दिसंबर की बारिश से खेतों में पर्याप्त नमीपंजाब, हरियाणा, यूपी व राजस्थान में भू-जलस्तर भी बढ़ाकड़ाके की सर्दी से गेहूं की फसल को जबर्दस्त फायदादिन में अच्छी धूप निकलने से भी गेहूं का बेहतर विकासबुवाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी और अनुकूल मौसम से चालू रबी सीजन में देश में गेहूं का रिकार्ड उत्पादन 820 लाख टन होने का अनुमान है। चालू रबी में गेहूं के बुवाई क्षेत्रफल में 10.04 लाख हैक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। जबकि दिसंबर महीने में उत्तर भारत के प्रमुख उत्पादक राज्यों में हुई बारिश से नमी भी बराबर बनी हुई है। कड़ाके की सर्दी के साथ ही दिन में धूप भी निकल रही है जो फसल के अनुकूल है। कृषि आयुक्त डॉ. गुरबचन सिंह ने बिजनेस भास्कर को बताया कि गेहूं के प्रमुख उत्पादक राज्यों में मौसम फसल के अनुकूल बना हुआ है। दिसंबर महीने में उत्तर भारत के राज्यों में बारिश हुई थी जिससे नमी की मात्रा भी बनी हुई है। इसके अलावा मानसून अच्छा होने से पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भूमिगत जलस्तर भी बढ़ा है। जबकि पिछले दस-बारह दिनों से उत्तर भारत के राज्यों में कड़ाके की सर्दी तो पड़ ही रही है, साथ में दिन के समय धूप भी निकल रही है जो गेहूं की फसल के लिए एकदम उपयुक्त है। फसल की पकाई तक मौसम अनुकूल रहा तो गेहूं का उत्पादन तय लक्ष्य 820 लाख टन से ज्यादा ही होने का अनुमान है। पिछले साल गेहूं का उत्पादन 807 लाख टन का हुआ था। गेहूं अनुसंधान निदेशालय के प्रोजेक्ट डायरेक्टर एस. एस. सिंह ने बताया कि सर्दी जितनी बढ़ती है उसका फायदा गेहूं की फसल को होता है। उत्तर भारत के राज्यों में सप्ताह भर से न्यूनतम तापमान घटकर पाच-सात डिग्री से नीचे चला गया है जो गेहूं की फसल के लिए फायदेमंद है। ठंड बढऩे से गेहूं का प्रति हैक्टेयर उत्पादन बढ़ जाता है। पिछले साल मध्य प्रदेश में ठंड और बारिश से गेहूं के प्रति हैक्टेयर उत्पादन में करीब 25 फीसदी का इजाफा हुआ था। ज्यादा ठंड गेहूं की देर से होने वाली बुवाई के लिए भी अच्छी है। चालू सीजन में गेहूं की बुवाई भी पिछले साल के 285 लाख हैक्टेयर से बढऩे का अनुमान है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी बुवाई आंकड़ों के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 275.85 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 265.81 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। प्रमुख उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में 93.77 लाख हैक्टेयर में, मध्य प्रदेश में 42.61 लाख हैक्टेयर में, पंजाब में 34.85 लाख हैक्टेयर में और हरियाणा में 24.7 लाख हैक्टेयर तथा राजस्थान में 23.38 लाख हैक्टेयर में बुवाई हो चुकी है। (Business Bhaskar......R S Rana)

स्पॉट एक्सचेंजों का कारोबार कई गुना बढ़ा

ऑनलाइन मंडियांएनएसईएल और एनस्पॉट का कारोबार पिछले साल में 400-500 फीसदी तक बढ़ गयाजिंसों की ऑनलाइन स्पॉट ट्रेडिंग दर्जन भर से ज्यादा राज्यों में शुरू हो गईएनएमसीई का भी स्पॉट एक्सचेंज जल्दी गुजरात से कारोबार शुरू करेगाविभिन्न जिंसों के ऑनलाइन हाजिर कारोबार के लिए स्थापित स्पॉट एक्सचेंजों का कारोबार हर साल कई गुना बढ़ रहा है। इस समय देश में एमसीएक्स का नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लि. (एनएसईएल) और एनसीडीईएक्स का एनसीडीईएक्स स्पॉट एक्सचेंज (एनस्पॉट) काम कर रहे हैं। जल्दी ही एक और एनएमसीई का स्पॉट एक्सचेंज जल्दी ही आने वाला है। एनएसईएल का वर्ष 2010 में कारोबार बढ़कर 17,058.45 करोड़ रुपये रहा। जबकि एनस्पॉट का कारोबार मात्रा के लिहाज से वित्तीय वर्ष 2010-11 में अब तक 55,000 टन का हो चुका है। एनएसईएल के प्रबंध निदेशक एवं सीईओ अंजनी सिन्हा ने बताया कि स्पॉट एक्सचेंजों का कारोबार 400-500 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ रहा है। वर्ष 2009 में एनएसईएल का कारोबार 2,558.56 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2010 में बढ़कर 17,058.45 करोड़ रुपये का हो गया। चालू वर्ष 2011 में कंपनी ने एक लाख करोड़ के कारोबार की उम्मीद है। उन्होंने बताया कि एनएसईएल अभी गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, उड़ीसा तथा केरल समेत 14 राज्यों में विभिन्न जिंसों में कारोबार कर रहा है। चालू साल में हरियाणा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में भी स्पॉट एक्सचेंज में कारोबार शुरू किया जाएगा। हरियाणा में कंपनी ने हेफेड और आंध्र प्रदेश में एपी मार्कफेड के साथ मिलकर कारोबार का करार किया है। इस समय एनएसईएल 30 जिंसों में स्पॉट एक्सचेंज में कारोबार कर रहा है। एनएसईएल में सबसे ज्यादा कारोबार सोना और चांदी में हो रहा है। कीमती धातुओं के कारण कीमत के लिहाज से उनका कारोबार काफी ज्यादा है।उधर एनसीडीईएक्स स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनस्पॉट) के प्रमुख राजेश सिन्हा ने बताया कि कंपनी ने वर्ष 2009-10 में 8,000 टन जिंसों का कारोबार किया था जो वर्ष 2010-11 में अब तक 55,000 टन का हो चुका है। हम सार्वजनिक कंपनियों एमएमटीसी, पीईसी और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा नीलामी के जरिये बेची जाने वाली कमोडिटी जैसे गेहूं, खाद्य तेल और दाल आदि की ऑनलाइन ट्रेडिंग की सुविधा दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि स्पॉट एक्सचेंजों के कारोबार में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे किसानों के साथ ही व्यापारियों को भी लाभ हो रहा है। एक्सचेंज में किसान और व्यापारी अपनी जिंस को तुरंत बेच और खरीद कर बेहतर भाव पा सकते हैं। किसानों को उचित भाव मिलें, इसके लिए एक्सचेंज ने दक्षिण भारत के करीब 3,500 किसानों को अपने साथ जोड़ा है। एनस्पॉट देश के 15 राज्यों में ई-नीलामी के जरिए कारोबार कर रहा है। इसके सदस्यों में राज्य और केंद्र सरकार की सार्वजनिक कंपनियां भी शामिल हैं। एनस्पॉट में सबसे ज्यादा दाल और चीनी का कारोबार हो रहा है।नेशनल मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनएमसीई) के सीईओ अनिल मिश्रा ने बताया कि जिंसों का ऑनलाइन स्पॉट कारोबार काफी तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किसानों के साथ ही छोटे व्यापारी, मिलों और सार्वजनिक कंपनियों की भागीदारी बढ़ रही है। एनएमसीई का नेशनल एपीएमसी स्पॉट एक्सचेंज जल्दी ही गुजरात में कारोबार शुरू करेगा। इसमें शुरू में तीन जिंसों कॉटन, जीरा और केस्टरसीड में कारोबार होगा। स्पॉट एक्सचेंजों में देश की विभिन्न मंडियों के भावों की जानकारी किसानों को मिलने से उनको अपनी जिंसों की बिक्री करने में आसानी होती है। स्पॉट एक्सचेंज का कारोबार बढऩे से बिचौलियों की भूमिका भी कम होगी तथा इससे व्यापार में पारर्दिशता बढ़ेगी। (Business Bhaskar.....R S Rana)

मध्य जनवरी से मक्का में तेजी संभव

मध्य जनवरी के बाद निर्यात मांग बढऩे से मक्का की कीमतों में तेजी की संभावना है। सूखे के कारण अर्जेंटीना में मक्का के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। जिसके चलते वैश्विक स्तर पर मक्का की सप्लाई प्रभावित होगी। शिकागो बोर्ड ऑफ ट्रेड (सीबॉट) में मक्का के दाम दो साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। वर्तमान में पोल्ट्री फीड निर्माताओं के साथ स्टार्च मिलों की भी अच्छी मांग बनी हुई है।अमेरिका कृषि विभाग के भारत में प्रतिनिधि अमित सचदेव ने बताया कि अर्जेंटीना में सूखे जैसे हालात बनने से मक्का के उत्पादन में भारी कमी आने की आशंका है। अर्जेंटीना विश्व में मक्का का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक देश है। दक्षिण पूर्वी एशियाई देश अर्जेंटीना और ब्राजील से हर साल करीब 100 लाख टन मक्का का आयात करते हैं। अर्जेंटीना में उत्पादन प्रभावित होने की आशंका के कारण ही सीबॉट में मार्च महीने के वायदा अनुबंध में मक्का की कीमतें बढ़कर 6.29 डॉलर प्रति बुशल हो गई है, जो जुलाई 2008 के बाद का उच्चतम भाव है। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में अक्टूबर से दिसंबर तक करीब चार लाख टन मक्का का निर्यात हो चुका है। बीते सीजन (अक्टूबर-09 से सितंबर-10) के दौरान देश से मक्का का 8 लाख टन का निर्यात हुआ था। लेकिन चालू सीजन में निर्यात बढ़कर 22 से 25 लाख टन होने की संभावना है। लक्ष्मी ओवरसीज के मैनेजिंग डायरेक्टर दलीप काबरा ने बताया कि निर्यातक काकीनाड़ा और कांडला बंदरगाह डिलीवरी 1,070-1,080 रुपये प्रति क्विंटल की दर से मक्का की खरीद कर रहे हैं। जबकि वियतनाम और मलेशिया के आयातक 260-270 डॉलर प्रति टन (सीएंडएफ) की दर से आयात सौदे कर रहे हैं। पंद्रह जनवरी के बाद इन देशों की मांग बढऩे की संभावना है।इसके अलावा बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका की मांग भी बनी हुई है। अनिल प्रोडक्टस लिमिटेड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस समय स्टॉर्च मिलों के साथ पोल्ट्रीफीड निर्माताओं की मक्का में अच्छी मांग बनी हुई है। जबकि उत्पादक मंडियों में मक्का की आवक पहले की तुलना में कम हो गई है। आंध्रप्रदेश की मंडियों में मक्का का भाव बढ़कर सोमवार को 1,030 रुपये और कर्नाटक की मंडियों में 1,010 रुपये प्रति क्विंटल हो गया। स्टार्च मिलों की सालाना खपत करीब 20-22 लाख टन की और पोल्ट्रीफीड में 80 से 85 लाख टन की होती है। कृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ में मक्का का उत्पादन बढ़कर 140 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2009-10 में मक्का का उत्पादन 120 लाख टन का ही हुआ था। निजामाबाद मंडी में मक्का के थोक कारोबारी पूनम चंद गुप्ता ने बताया कि आंध्रप्रदेश में मक्का की दैनिक आवक घटकर दस हजार क्विंटल और कर्नाटक की मंडियों में 25-30 हजार क्विंटल की रह गई है। दिल्ली के मक्का व्यापारी राजेश अग्रवाल ने बताया कि पंजाब और हरियाणा के पोल्ट्री फीड निर्माताओं की मांग से मक्का की कीमतों में 30 रुपये की तेजी आकर भाव 1,080 रुपये प्रति क्विंटल हो गए। राजस्थान की मंडियों में मक्का का भाव 970-980 रुपये और मध्य प्रदेश की मंडियों में 960-970 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है।बात पते कीकृषि मंत्रालय के आरंभिक अनुमान के अनुसार चालू खरीफ में मक्का का उत्पादन 140 लाख टन होने का अनुमान है। जबकि वर्ष 2009-10 में मक्का का उत्पादन 120 लाख टन का ही हुआ था। (Business Bhaskar....R S Rana)

कच्चे काजू के उत्पादन में बढ़ोतरी की उम्मीद

बेंगलुरू January 04, 2011
कच्चे काजू के उत्पादन में इस साल 11 फीसदी की बढ़ोतरी की संभावना है और कुल उत्पादन 7 लाख टन पर पहुंच सकता है। हालांकि दक्षिण भारत के प्रमुख इलाकों में पिछले साल नवंबर में हुई असमय बारिश के चलते इस फसल में एक महीने की देरी हुई है।काजू व कोकोआ विकास निदेशालय (डीसीसीडी) के निदेशक वेंकटेश हुबली ने कहा - 'नवंबर में हुई असमय बारिश के चलते इस साल हालांकि पौधों में फूल लगने में एक महीने की देरी हुई है, लेकिन सुबह में कम तापमान व दिन में खिली धूप होने के चलते मुझे उम्मीद है कि प्रमुख उत्पादक इलाके में इसकी पैदावार में इजाफा होगा। इसके अलावा हमने इस साल इसके रकबे में भी बढ़ोतरी देखी है।Óकाजू का रकबा इस साल बढ़कर 9.20 लाख हेक्टेयर हो गया है जबकि पिछले साल 8.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में काजू की बुआई हुई थी, इस तरह इसमें 3.3 फीसदी की बढ़ोतरी का संकेत मिल रहा है। डीसीसीडी पिछले तीन साल से रकबे में 20000 हेक्टेयर सालाना की दर से इजाफा कर रहा है।इससे पहले निदेशालय ने कच्चे काजू के उत्पादन में करीब 15 फीसदी की गिरावट का अनुमान लगाया था। हुबली ने कहा - हालांकि 20 दिसंबर के बाद बदली हुई परिस्थितियों से पौधों में फूल लगने में मदद मिली और मौजूदा संकेतकों के मुताबिक कुल उत्पादन 7 लाख टन को पार कर सकता है। उन्होंने कहा कि अगर जनवरी में बारिश नहीं होती है तो काजू की फसल अच्छी होगी और आने वाले सूखे मौसम में यह और बेहतर हो जाएगा। फूल लगने और इसके फल में तब्दील होने के समय में सूखा मौसम उत्पादन के लिहाज से बेहतर होता है। भारत में काजू की कटाई फरवरी से मई तक होती है। साल 2010 में कुल 6.3 लाख टन काजू का उत्पादन हुआ था।काजू निर्यात संवर्धन परिषद के पूर्व उपाध्यक्ष और मेंगलूर से काजू निर्यात करने वाले जी. गिरिधर प्रभु ने कहा - घरेलू प्रसंस्करण उद्योग को उम्मीद है कि इस साल काजू का बेहतर उत्पादन होगा। उन्होंने कहा कि नमी की अच्छी मात्रा के चलते इस साल उत्पादकता में इजाफा होने की उम्मीद है। लेकिन फसल का सही आकलन फरवरी महीने में ही किया जा सकता है।काजू का उत्पादन मुख्य रूप से महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में होता है। निदेशालय अब इस फसल का विस्तार दूसरे राज्यों मसलन छत्तीसगढ़, उत्तर-पूर्वी राज्यों और अंडमान व निकोबार द्वीप में करने की कोशिश कर रहा है। काजू के पौधों में कम उत्पादकता के चलते भारत अपनी जरूरतों के आधे से ज्यादा हिस्से का आयात करता है। मुख्य रूप से तंजानिया, मोजांबिक, केन्या, आइवरी कोस्ट और वियतनाम जैसे देश से काजू का आयात होता है। मौजूदा वर्ष में प्रसंस्करण करने वाले भारतीय ने आयातित काजू की कीमत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी है। तंजानिया से आयातित काजू की कीमतें 47.6 फीसदी बढ़कर 1845 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है जबकि साल 2009-10 में यह 1250 डॉलर प्रति टन के भाव पर मिल रहा था। प्रभु ने कहा कि भारत में आयातित काजू की कीमत मौजूदा वित्त वर्ष में करीब 75-82 रुपये प्रति किलोग्राम बैठती है जबकि पिछले साल यह 55-65 ररुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में था, इस तरह से इसमें 26 फीसदी की बढ़ोतरी नजर आ रही है। (BS Hindi)

कॉफी उत्पादन घटने की आशंका

बेंगलुरु January 05, 2011
कॉफी की एक खास किस्म रोबस्टा का घरेलू उत्पादन इस साल 20,000 से 25,000 टन के दायरे में रहने का अनुमान है। पिछले साल इसी अवधि में रोबस्टा का उत्पादन 35,000 टन रहा था। यानी पिछले साल की तुलना में इस साल रोबस्टा का उत्पादन करीब 28 फीसदी गिरने की आशंका है। बताया जा रहा है कि पिछले साल ज्यादा उत्पादन के चलते बाजार में रोबस्टा कॉफी की जरूरत से ज्यादा आपूर्ति हो गई थी जिससे अंतरराष्टï्रीय बाजारों में इस किस्म की कॉफी की कीमतों में भारी गिरावट आई थी। कीमत काफी कम मिलने की वजह से कॉफी किसानों ने इस बार रोबस्टा के उत्पादन पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। कर्नाटक कॉफी उत्पादक संघ के अध्यक्ष सहदेव बालकृष्ण ने कहा, 'वर्ष 2009 में अंतरराष्टï्रीय बाजार में रोबस्टा कॉफी की कीमत 600 से 800 डॉलर प्रति टन (35 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम) रही थी। लंदन बाजार में कॉफी का उत्पादन घटने की खबरों के चलते 2009 में इसकी कीमतों में जबरदस्त इजाफा हुआ था। इसके चलते वर्ष 2010 में ज्यादातर कॉफी उत्पादकों ने रोबस्टा की ओर अपना रुख किया। परिणामस्वरूप पिछले साल किसानों ने इसकी जमकर खेती की और इसका उत्पादन बढ़कर 35,000 टन पहुंच गया। उत्पादन की अधिकता के चलते पिछले साल रोबस्टा की कीमतों में भारी गिरावट आई और यह घटकर 200 डॉलर प्रति टन (10 रुपये प्रति किलोग्राम) के स्तर पर आ गई थी। यह उत्पादकों के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। इसके चलते इस साल किसानों ने रोबस्टा के उत्पादन से मुंह मोड़ लिया।Ó उन्होंने कहा कि इस साल रोबस्टा का उत्पादन 25,000 टन से ज्यादा होने की संभावना बिल्कुल भी नहीं है। रोबस्टा कॉफी के मामले में भारत वैश्विक बाजारों में आपूर्ति करने वाला सबसे बड़ा देश है। भारतीय कॉफी बोर्ड के चेयरमैन जावेद अख्तर ने कहा, 'प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2011 में रोबस्टा कॉफी का उत्पादन 20,000 से 25,000 टन के बीच रहने का अनुमान है।Ó उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजारों में इससे मिलने वाली कीमतों से तय होता है कि बाजार में इसकी मांग और उपलब्धता का स्तर क्या रहेगा। दरअसल अच्छी कीमत मिलने की स्थिति में ही कॉफी किसान इसके उत्पादन पर अधिक जोर देते हैं। चूंकि पिछले साल इसके दाम गिरकर काफी नीचे आ गए थे ऐसे में लोगों ने इस साल इसका उत्पादन काफी कम कर दिया है। कॉफी बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2009 में भारत ने 18,000 टन रोबस्टा कॉफी का उत्पादन किया था। जबकि वर्ष 2010 में उत्पादन बढ़कर करीब 35,000 टन हो गया जिसमें से 32,500 टन रोबस्टा का निर्यात कर दिया गया था। अख्तर ने कहा कि वैश्विक बाजारों में पिछले साल जरूरत से ज्यादा रोबस्टा की आवक होने से इसके दामों में जबरदस्त गिरावट आई थी। इससे कॉफी उत्पादकों को भारी नुकसान हुआ। कॉफी नियॉतक संघ के अध्यक्ष रमेश रंजन ने कहा, 'पिछले साल रोबस्टा के दामों में गिरावट का असर इस साल इसके उत्पादन पर दिखेगा। हालांकि पिछले साल की तुलना में इस साल इसके दाम बेहतर रहने की संभावना है। फिर भी 2008 या 2009 के मूल्य स्तर पर पहुंच पाना मुश्किल है। 2008 में इसकी कीमत रिकॉर्ड 1,000 डॉलर प्रति टन के स्तर पर पहुंच गई थी। इस साल रोबस्टा के दाम 500 डॉलर प्रति टन तक जाने का अनुमान है।Ó उन्होंने बताया कि रोबस्टा किस्म की कॉफी की सबसे ज्यादा मांग इटली और अन्य यूरोपीय देशों में है जबकि इन देशों को ज्यादातर रोबस्टा की आपूर्ति भारत करता है। (BS Hindi)

ग्राहकों के जख्मों पर नमक

अहमदाबाद January 05, 2011
लगता है प्याज की महंगाई पर्याप्त नहीं थी कि विस्तारित मॉनसून और ज्यादा ठंड उपभोक्ताओं की जख्मों पर नमक छिड़कने के लिए तैयार हो गए। उत्पादन में 35-40 फीसदी की गिरावट के बाद नमक की कीमत बढ़त की राह पर है। इसके साथ ही नमक के उत्पादन में तीन महीने की देरी हो सकती है।मॉनसून के ज्यादा समय तक टिके रहने से नमक की करीब 75 फीसदी कड़ाही (पैन) में पानी का मिश्रण हो गया है। दूसरी ओर, ज्यादा ठंड की वजह से इन कड़ाहियों से पानी का वाष्पीकरण धीमा हो गया है। उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, इस वजह से नमक के उत्पादन में देरी हो सकती है।इंडियन सॉल्ट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईएसएमए) के आला अधिकारी ने कहा - मौजूदा साल में भारत में नमक का उत्पादन 35 से 40 फीसदी तक गिरने की आशंका है। इसकी वजह विस्तारित मॉनसून यानी देर तक मॉनसून का टिका रहना है। इस बार मॉनसून नवंबर तक टिका रहा, वहीं ज्यादा ठंड की वजह से वाष्पीकरण धीमा हो गया है, लिहाजा नमक के उत्पादन में देरी हो रही है। इस वजह से उत्पादन में कम से कम 120 दिन की देरी होगी।उद्योग के सूत्रों के मुताबिक, भारत में औसतन 185-190 लाख टन नमक का उत्पादन होता है, जिसकी आपूर्ति मुख्यत: तीन कामों के लिए होती है और इनमें खाने के काम में इस्तेमाल होने के अलावा औद्योगिक मांग और निर्यात बाजार की मांग शामिल है। खाने के लिए सालाना 65 लाख टन नमक की मांग है, वहीं औद्योगिक मांग 75-80 लाख टन की है। इसके अलावा भारत हर साल 20-25 लाख टन नमक का निर्यात भी करता है।सौराष्ट्र के नमक विनिर्माता ने कहा - सामान्यत: नमक का उत्पादन अक्टूबर के आखिर में शुरू होता है और जून तक चलता है। लेकिन इस साल मॉनसून के देर तक टिके रहने की वजह से नमक के उïत्पादन में परेशानी हुई। स्टॉक फिलहाल कम है और नया उत्पादन बाजार में आने में वक्त लगेगा, इस वजह से अगले कुछ महीने में इसकी कीमतें बढ़ेंगी।नमक की कीमत में बढ़ोतरी का उद्योग पर प्रतिकूल असर पड़ेगा, क्योंकि सोडा ऐश उद्योग के लिए यह प्रमुख जिंसों में से एक है। गुजरात हैवी केमिकल्स लिमिटेड (जीएचसीएल) के प्रेजिडेंट सुनील भटनागर (बिक्री व विपणन) ने कहा - कीमतों में बढ़ोतरी शुरू हो चुकी है और यह हमारी लागत पर भारी असर डाल रही है क्योंकि सोडा ऐश उद्योग के लिए यह प्रमुख कच्चा माल है। उपलब्धता में कमी होने से सोडा ऐश के उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।जीएचसीएल के पास 2200 टन रोजाना विनिर्माण की क्षमता है और मौजूदा समय में संयंत्र पूरी क्षमता के साथ संचालित किया जा रहा है। हालांकि कीमतों में संभावित बढ़ोतरी से कंपनियों को सोडा ऐश और कास्टिक सोडा के उत्पादन में कटौती करनी पड़ सकती है। नमक का इस्तेमाल करने वाली अन्य औद्योगिक इकाइयों में निरमा लिमिटेड, टाटा केमिकल्स, सौराष्ट्र केमिकल्स लिमिटेड और जीएचसीएल शामिल है।इस बीच, विशेषज्ञों का कहना है कि विदेश से आयात कर बढ़ती कीमतोंं पर लगाम कसा जा सकता है। उद्योग के सूत्रों का कहना है कि 1997 से ओपन जनरल लाइसेंस के तहत शून्य आयात शुल्क पर नमक आयात की अनुमति है। लेकिन हालिया वैश्विक जलवायु गतिरोध ने यूरोप को बर्फ से ढक दिया है जबकि चीन बाढ़ की चपेट में आ गया है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में नमक की मांग भी तेजी से बढ़ी है। बताया जाता है कि जापान, चीन, यूरोप के कुछ देशों और नेपाल, भूटान व बांग्लादेश की तरफ से भारत से नमक आयात की बाबत पूछताछ हो रही है। (BS Hindi)