03 सितंबर 2010
गुड़ में भारी गिरावट के आसार
प्रमुख उत्पादक मंडी मुजफ्फरनगर में गुड़ का स्टॉक 47 फीसदी अधिक होने के कारण कीमतों में गिरावट की संभावना है। मंडी में इस समय गुड़ का 6.93 लाख कट्टे (प्रति कट्टा 40 किलो) का स्टॉक बचा हुआ है जबकि पिछले साल की समान अवधि में 4.69 लाख कट्टों का ही स्टॉक था। मौसम साफ रहा तो डेढ़ महीने बाद नए गुड़ की आवक शुरू हो जाएगी। इसीलिए गुड़ में मांग घट गई है जिससे कीमतों में गिरावट बननी शुरू हो गई है। फेडरेशन ऑफ गुड़ ट्रेडर्स के अध्यक्ष अरुण खंडेलवाल ने बताया कि गुड़ का बंपर स्टॉक होने के कारण मांग कम हो गई है। वैसे भी चालू सीजन में गन्ने के बुवाई क्षेत्रफल में बढ़ोतरी हुई है। अगर मौसम साफ रहा तो 15 अक्टूबर के बाद उत्पादक मंडियों में नए गुड़ की आवक शुरू हो जाएगी। उन्होंने बताया कि पिछले सप्ताह में करीब 80 हजार कट्टे गुड़ की बिक्री हुई है।अगर मांग इसी हिसाब से बनी रही तो अगले छह सप्ताह में करीब 4.80 लाख कट्टे गुड़ की खपत हो जाएगी जबकि इस समय स्टॉक 6.93 लाख कट्टों का बचा हुआ है। गुड़ के थोक कारोबारी मांगी लाल मुंदड़ा ने बताया कि पशुआहार गुड़ का स्टॉक ज्यादा बचा हुआ है जबकि इसमें मांग कमजोर बनी हुई है। इस समय मंडी में रसकट गुड़ का स्टॉक 2.36 लाख कट्टों का है जो पिछले साल की समान अवधि के 1.10 लाख कट्टों से ज्यादा है। इसी तरह से पपड़ी गुड़ का स्टॉक भी इस समय 1.18 लाख कट्टों का है जो पिछले साल की समान अवधि के 99 हजार कट्टों से ज्यादा है। खारी बावली स्थित मैसर्स देशराज राजेंद्र कुमार के प्रोपराइटर देशराज ने बताया कि स्टॉकिस्टों की बिक्री बढ़ गई है जिससे पिछले दो-तीन दिनों में गुड़ की कीमतों में करीब 100 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट आ चुकी है। दिल्ली में गुड़ चाकू का भाव घटकर 2,800 से 2,850 रुपये और गुड़ पेड़ी का भाव घटकर 2,900 से 2,950 रुपये प्रति क्विंटल रह गया है। उधर मुजफ्फरनगर मंडी में गुड़ चाकू का भाव घटकर 980-1,020 रुपये प्रति 40 किलो रह गया। रसकट का भाव घटकर इस दौरान 660 से 670 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। उन्होंने बताया कि चालू सीजन में रसकट गुड़ के स्टॉकिस्टों को भारी घाटा हुआ है। (Business Bhaskar....aar as raana)
पवार द्वारा चीनी डिकंट्रोल प्रस्ताव पीएम को
नियंत्रण हटने से किसान और उपभोक्ताओं को भी होगा फायदा - केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवारचीनी उद्योग को डिकंट्रोल करने के प्रस्ताव पर जानकारी देने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने गुरुवार को प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से मुलाकात की। सरकार चीनी की बिक्री में मिलों को स्वतंत्रता देने पर विचार कर रही है। इस समय सरकार मिलों द्वारा चीनी बिक्री के लिए हर माह कोटा निर्धारित करती है और राशन की दुकानों पर बेचने की 20 फीसदी चीनी बाजार भाव से कम दर पर लेवी के रूप में मिलों से खरीदती है।अगले सीजन में चीनी का जोरदार उत्पादन होने की संभावना है। चीनी उद्योग की लॉबी का सरकार पर जबर्दस्त दबाव है। अगले साल चीनी के बेहतर उत्पादन की संभावना को डिकंट्रोल के लिए आधार बनाया जा रहा है। खाद्य मंत्रालय ने चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने के लिए मन बना लिया है। सूत्रों के अनुसार पवार ने प्रधानमंत्री के समक्ष चीनी से नियंत्रण हटाने के संबंध में विस्तृत प्रजेंटेशन दिया।पवार ने अपने प्रजेंटेशन में यह समझाने की कोशिश की कि चीनी उद्योग से नियंत्रण हटाने से किसानों और उपभोक्ताओं को किस तरह फायदा हो सकता है। समझा जाता है कि पवार ने चीनी के मासिक कोटे और राशन की दुकानों पर वितरण के लिए हर माह मिलों से फिक्स रेट पर चीनी की अनिवार्य खरीद की व्यवस्था बंद करने की पैरवी की। उन्होंने प्रधानमंत्री को बताया कि मिलों से सस्ते रेट पर चीनी लेने के बजाय सरकार को खुले बाजार से चीनी खरीदकर राशन की दुकानों पर बांटना चाहिए। इस समय मिलों को 20 फीसदी चीनी लेवी के रूप में सरकार को बेचनी पड़ती है।प्रस्ताव के अनुसार किसानों को गन्ने की फसल किसी भी मिल को कहीं भी बेचने की छूट दी जानी चाहिए। पिछले माह सरकार ने कहा था कि मंत्रालय चीनी उद्योग को डिकंट्रोल करने के लिए प्रस्ताव तैयार कर रहा है। यह प्रस्ताव संबंधित मंत्रालयों को विचार विमर्श के लिए भेजा जाएगा और बाद में पारित कराने के लिए केबिनेट के समक्ष रखा जाएगा। हालांकि उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार गन्ने की मिलों द्वारा खरीद के लिए फेयर एंड रिन्यूनरेटिव प्राइस (एफआरपी) तय करने का अधिकार अपने पास ही रखेगी। पवार ने बातचीत में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश पर भी प्रधानमंत्री से चर्चा की जिसमें उसने गेहूं और चावल सडऩे देने के बजाय गरीबों को बेचने का बात कही है। (Business Bhaskar)
राज्यों को 25 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न
केंद्र सरकार गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) कीमतों पर राज्यों को 25 लाख टन अतिरिक्त खाद्यान्न उपलब्ध कराएगी। यह आवंटन चालू साल की बकाया अवधि में किया जाएगा। केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की अध्यक्षता में खाद्यान्न मामलों पर गठित अधिकार प्राप्त मंत्रियों के समूह (ईजीओएम) की गुरुवार को हुई बैठक में यह फैसला लिया गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट द्वारा गरीबों को मुफ्त में खाद्यान्न बांटने के आदेश को लेकर इस बैठक में कोई फैसला नहीं हुआ। बैठक के बाद केंद्रीय कृषि, खाद्य और उपभोक्ता मामले मंत्री शरद पवार ने संवाददाताओं को इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अतिरिक्त अनाज का आवंटन राज्य सरकारों को अगले छह महीने के लिए किया जायेगा। मालूम हो कि बीपीएल परिवारों को गेहूं 4.15 प्रति किलो और चावल 5.65 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि बीपीएल परिवारों को आवंटित अनाज की प्रणाली में भी सुधार किया जायेगा। इससे बीपीएल परिवारों की संख्या में भी बढ़ोतरी होने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के अनाज सडऩे के बजाए गरीबों में मुफ्त बांटने के आदेश के बाद सरकार ने ईजीओएम की बैठक बुलाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अगस्त को स्पष्ट कर दिया था कि उसने केंद्र सरकार को अनाज बांटने संबंधी सलाह नहीं स्पष्ट आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को केंद्रीय कृषि मंत्री ने सलाह बताते हुए कहा था कि सुप्रीम कोर्ट की हर सलाह को मानना संभव नहीं है। केंद्र सरकार ने पास जुलाई के पहले सप्ताह में 578.50 लाख टन खाद्यान्न का स्टॉक बचा हुआ है जबकि तय मानकों के हिसाब से एक जुलाई को 269 लाख टन खाद्यान्न का बफर स्टॉक और रिजर्व स्टॉक को मिलाकर दे तो 319 लाख टन अनाज का स्टॉक होना चाहिए। हाल ही में कृषि मंत्री शरद पवार ने लोकसभा में बताया था कि 6.86 करोड़ रुपये का 11,700 टन खाद्यान्न बर्बाद हुआ है। बर्बाद हुए अनाज में 9,141 टन चावल, 2,486 टन गेहूं और 81 टन चावल है। (Business Bhaskar....aar as raana)
कॉफी निर्यात 56 प्रतिशत बढ़ा
बेंगलुरु September 01, 2010
चालू साल के जनवरी-अगस्त अवधि के दौरान कॉफी निर्यात 56 प्रतिशत बढ़कर 204,519 टन हो गया। पिछले साल की समान अवधि में 130,672 टन कॉफी का निर्यात हुआ था। मंदी के बाद से यूरोप के देशों इटली और जर्मनी में कॉफी की मांग में तेजी आई है। मूल्य के हिसाब से देखें तो निर्यात में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और कुल निर्यात 2075.07 करोड़ रुपये का हो गया है। वहीं पिछले साल की समान अवधि में कुल 1400 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था। इस अवधि के दौरान रोबस्टा किस्म की कॉफी के निर्यात में 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 112,027 टन हो गया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 72,700 टन निर्यात हुआ था। अरेबिका कॉफी के निर्यात में भी 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और पिछले साल की समान अवधि में हुए 39077 टन की तुलना में इस साल बढ़कर 72,700 टन हो गया है।कॉफी बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक यूरोप के बड़े देशों- इटली और जर्मनी में आयात बढऩे से यह तेजी दर्ज की गई है। इटली में होने वाला निर्यात 21 प्रतिशत बढ़कर 8,192 टन हो गया है, जबकि जर्मनी में इस अवधि के दौरान 20.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और निर्यात बढ़कर 8,038 टन पर पहुंच गया। वर्ष 2009 में भारत ने कुल 187,348 टन कॉफी का निर्यात किया था, जिसकी कुल कीमत 2006 करोड़ रुपये थी।उद्योग के जानकारों के मुताबिक अगले फसल वर्ष में निर्यात में और तेजी की उम्मीद है, क्योंकि उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है। (BS Hindi)
चालू साल के जनवरी-अगस्त अवधि के दौरान कॉफी निर्यात 56 प्रतिशत बढ़कर 204,519 टन हो गया। पिछले साल की समान अवधि में 130,672 टन कॉफी का निर्यात हुआ था। मंदी के बाद से यूरोप के देशों इटली और जर्मनी में कॉफी की मांग में तेजी आई है। मूल्य के हिसाब से देखें तो निर्यात में 48 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और कुल निर्यात 2075.07 करोड़ रुपये का हो गया है। वहीं पिछले साल की समान अवधि में कुल 1400 करोड़ रुपये का निर्यात हुआ था। इस अवधि के दौरान रोबस्टा किस्म की कॉफी के निर्यात में 54 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और यह 112,027 टन हो गया, जबकि पिछले साल की समान अवधि में 72,700 टन निर्यात हुआ था। अरेबिका कॉफी के निर्यात में भी 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है और पिछले साल की समान अवधि में हुए 39077 टन की तुलना में इस साल बढ़कर 72,700 टन हो गया है।कॉफी बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक यूरोप के बड़े देशों- इटली और जर्मनी में आयात बढऩे से यह तेजी दर्ज की गई है। इटली में होने वाला निर्यात 21 प्रतिशत बढ़कर 8,192 टन हो गया है, जबकि जर्मनी में इस अवधि के दौरान 20.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई और निर्यात बढ़कर 8,038 टन पर पहुंच गया। वर्ष 2009 में भारत ने कुल 187,348 टन कॉफी का निर्यात किया था, जिसकी कुल कीमत 2006 करोड़ रुपये थी।उद्योग के जानकारों के मुताबिक अगले फसल वर्ष में निर्यात में और तेजी की उम्मीद है, क्योंकि उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है। (BS Hindi)
लगा रहे चीनी पर नियंत्रण : समिति
नई दिल्ली September 01, 2010
खाद्य एवं कृषि मामलों की संसदीय समिति ने चीनी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के खिलाफ राय दी है। समिति का तर्क है कि ऐसा करना गन्ना किसानों एवं चीनी उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ होगा। संसदीय समिति की यह राय एक रिपोर्ट में दर्ज है, जिसे मंगलवार को संसद के पटल पर रखा गया जिसे मानना या न मानना सरकार की मर्जी पर निर्भर करेगा।कांग्रेस पार्टी के सांसद विलास मुत्तेमवार की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'समिति का मानना है कि यदि चीनी उत्पादन और इसके वितरण पर से तमाम नियंत्रण हटा लिए गए तो इसका सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर प्रतिकूल असर होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में चीनी मिलें केंद्र सरकार की ओर से तय भाव लेवी चीनी की आपूर्ति के लिए बाध्य नहीं रह जाएंगी।'समिति ने यह आशंका भी जताई है कि चीनी मिलें सरकारी नियंत्रण से मुक्ति का नाजाज फायदा उठा सकती हैं। वे अपने गोदामों में अधिक-से-अधिक चीनी का भंडार जमा कर भाव में कृत्रिम बढ़ोतरी लाने का प्रयास कर सकती हैं, खासकर तब, जब चीनी उत्पादन में गिरावट वाली स्थिति हो।समिति का मानना है कि देश में पहले से ही कम चीनी उत्पादन की समस्या है और इस पर से सरकारी नियंत्रण हटा लेने से परिस्थितियां और खराब ही होंगी। यही वजह है कि समिति ने सिफारिश की है कि सरकार को चीनी को नियंत्रण एवं विनियमन मुक्त करने की अवधारण नहीं मानना चाहिए। ऐसा करना किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हित में भी नहीं होगा।उल्लेखनीय है कि चीनी भारत में सबसे ज्यादा सरकारी नियंत्रण वाला उद्योग है। वर्ष 1971-72 एवं 19-79 में इस पर नियंत्रण हटाने के प्रयास हुए, लेकिन इससे पिछे हटना ही पड़ा।पिछले कई वर्षों के दौरान सरकार ने इस्पात एवं सीमेंट जैसे कई बड़े उद्योगों पर अपना नियंत्रण धीरे-धीरे ढीला किया है। चीनी पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था लेवी चीनी की उपलब्धता और मिलों पर इसका दायित्व सुनिश्चित करने के लिए है।गौरतलब है कि इस वर्ष जून में सरकार ने पेट्रोल की कीमत पर से अपना नियंत्रण हटा लिया था और डीजल के मामले में भी ऐसा ही करने की मंशा जाहिर की थी। अब केंद्रीय खाद्य मंत्रालय चीनी को भी नियंत्रण मुक्त करने के लिए इस उद्योग के संगठनों के साथ पिछले 2 महीनों से विचार-विमर्श कर रहा है।मौजूदा व्यवस्था के तहत चीनी मिलें खुले बाजार में चीनी की बिक्री केवल कोटा प्रणाली के आधार पर ही कर सकती हैं। केंद्र सरकार का चीनी महानिदेशालय हर महीने रिलीज ऑर्डर जारी करता है और प्रत्येक मिल को चीनी बिक्री का कोटा देता है। चीनी मिलें कोटे से ज्यादा बिक्री नहीं कर सकतीं। यदि वे संबंधित महीने के दौरान कोटा भर चीनी की बिक्री नहीं कर पाते, तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है।बाजार में चीनी की उपलब्धता कम होने की स्थिति में सरकार इस प्रणाली में ढील देती है। मसलन इस वर्ष सरकार ने कोटा प्रणाली को साप्ताहिक एवं अद्र्घ मासिक कर दिया था। लेवी दायित्व के तहत चीनी मिलों को अपनी उत्पादन का एक निश्चित हिस्सा (फिलहाल 20 फीसदी) बाजार भाव से कम दाम पर सरकार को बेचना पड़ता है। इसकी आपूर्ति सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को की जाती है। (BS Hindi)
खाद्य एवं कृषि मामलों की संसदीय समिति ने चीनी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के खिलाफ राय दी है। समिति का तर्क है कि ऐसा करना गन्ना किसानों एवं चीनी उपभोक्ताओं के हितों के खिलाफ होगा। संसदीय समिति की यह राय एक रिपोर्ट में दर्ज है, जिसे मंगलवार को संसद के पटल पर रखा गया जिसे मानना या न मानना सरकार की मर्जी पर निर्भर करेगा।कांग्रेस पार्टी के सांसद विलास मुत्तेमवार की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, 'समिति का मानना है कि यदि चीनी उत्पादन और इसके वितरण पर से तमाम नियंत्रण हटा लिए गए तो इसका सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) पर प्रतिकूल असर होगा क्योंकि ऐसी स्थिति में चीनी मिलें केंद्र सरकार की ओर से तय भाव लेवी चीनी की आपूर्ति के लिए बाध्य नहीं रह जाएंगी।'समिति ने यह आशंका भी जताई है कि चीनी मिलें सरकारी नियंत्रण से मुक्ति का नाजाज फायदा उठा सकती हैं। वे अपने गोदामों में अधिक-से-अधिक चीनी का भंडार जमा कर भाव में कृत्रिम बढ़ोतरी लाने का प्रयास कर सकती हैं, खासकर तब, जब चीनी उत्पादन में गिरावट वाली स्थिति हो।समिति का मानना है कि देश में पहले से ही कम चीनी उत्पादन की समस्या है और इस पर से सरकारी नियंत्रण हटा लेने से परिस्थितियां और खराब ही होंगी। यही वजह है कि समिति ने सिफारिश की है कि सरकार को चीनी को नियंत्रण एवं विनियमन मुक्त करने की अवधारण नहीं मानना चाहिए। ऐसा करना किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं के हित में भी नहीं होगा।उल्लेखनीय है कि चीनी भारत में सबसे ज्यादा सरकारी नियंत्रण वाला उद्योग है। वर्ष 1971-72 एवं 19-79 में इस पर नियंत्रण हटाने के प्रयास हुए, लेकिन इससे पिछे हटना ही पड़ा।पिछले कई वर्षों के दौरान सरकार ने इस्पात एवं सीमेंट जैसे कई बड़े उद्योगों पर अपना नियंत्रण धीरे-धीरे ढीला किया है। चीनी पर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था लेवी चीनी की उपलब्धता और मिलों पर इसका दायित्व सुनिश्चित करने के लिए है।गौरतलब है कि इस वर्ष जून में सरकार ने पेट्रोल की कीमत पर से अपना नियंत्रण हटा लिया था और डीजल के मामले में भी ऐसा ही करने की मंशा जाहिर की थी। अब केंद्रीय खाद्य मंत्रालय चीनी को भी नियंत्रण मुक्त करने के लिए इस उद्योग के संगठनों के साथ पिछले 2 महीनों से विचार-विमर्श कर रहा है।मौजूदा व्यवस्था के तहत चीनी मिलें खुले बाजार में चीनी की बिक्री केवल कोटा प्रणाली के आधार पर ही कर सकती हैं। केंद्र सरकार का चीनी महानिदेशालय हर महीने रिलीज ऑर्डर जारी करता है और प्रत्येक मिल को चीनी बिक्री का कोटा देता है। चीनी मिलें कोटे से ज्यादा बिक्री नहीं कर सकतीं। यदि वे संबंधित महीने के दौरान कोटा भर चीनी की बिक्री नहीं कर पाते, तो उन्हें जुर्माना भरना पड़ता है।बाजार में चीनी की उपलब्धता कम होने की स्थिति में सरकार इस प्रणाली में ढील देती है। मसलन इस वर्ष सरकार ने कोटा प्रणाली को साप्ताहिक एवं अद्र्घ मासिक कर दिया था। लेवी दायित्व के तहत चीनी मिलों को अपनी उत्पादन का एक निश्चित हिस्सा (फिलहाल 20 फीसदी) बाजार भाव से कम दाम पर सरकार को बेचना पड़ता है। इसकी आपूर्ति सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को की जाती है। (BS Hindi)
गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए मिली रकम
मुंबई September 02, 2010
कृषि विभाग ने गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए 9 राज्यों को 350 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यह धनराशि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत उत्पादन बढ़ाने की योजना लागू करने के लिए जारी की गई है।इन 9 गेहूं उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, जिन्होंने कुछ महीने पहले अपनी कार्य योजना पेश की थी। इस कार्ययोजना को लागू करने के लिए मंत्रालय ने धन दिए जाने को स्वीकृति दी है। इस धन का आवंटन विभिन्न योजनाओं- प्रमाणित हाइब्रिड बीज के आवंटन, माइक्रो न्यूट्रिएंट्स को प्रोत्साहन देने, उपकरणों और कृषि मशीनरी की खरीद के लिए किया गया है। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों को बाद में गेहूं की खेती की योजना के तहत बाद में और धन का आवंटन किया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि बेहतर बारिश होने की वजह से गेहूं का उत्पादन बेहतर रहने के अनुमान हैं। उम्मीद की जा रही है कि इस साल गेहूं का उत्पादन पिछले कुछ सालों की तुलना में बेहतर रहेगा। सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्त 640 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 1000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का मुख्य उद्देश्य आवश्यक जिंसों- गेहूं, चावल, मक्का और दलहन के उत्पादन में बढ़ोतरी करना है। प्राथमिकता के अन्य क्षेत्र हैं कि बॉयो फर्टिलाइजर और माइक्रो न्यूट्रिएंट्स का इस्तेमाल कर मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति को बढ़ाया जाए।साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि अरहर, मसूर की खेती को बढ़ावा दिया जाए और मक्के तथा गन्ने की खरीफ फसल का रकबा बढ़ाया जाए। कृषि फार्मों में यंत्रीकरण के साथ-साथ ड्रिप और फुहार विधि से सिंचाई को बढ़ावा दिया जाए। गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध के बाद से भारत के पास गेहूं का अतिरिक्त स्टॉक है। बंपर पैदावार की उम्मीद और ज्यादा स्टॉक होने की वजह से सरकार को निर्यात की छूट देने का अवसर मिला है। जुलाई 2010 में वाणिज्य मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय से संपर्क किया है, जिससे सरकारी कंपनियां 9 लाख टन और निजी क्षेत्र 6.5 लाख टन गेहूं का निर्यात कर सके। अधिकारियों ने कहा कि निर्यात पर प्रतिबंध मॉनसूनी बारिश की प्रगति का आकलन किए जाने के बाद हटाया जा सकता है। (BS Hindi)
कृषि विभाग ने गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए 9 राज्यों को 350 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यह धनराशि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत उत्पादन बढ़ाने की योजना लागू करने के लिए जारी की गई है।इन 9 गेहूं उत्पादक राज्यों में बिहार, गुजरात, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं, जिन्होंने कुछ महीने पहले अपनी कार्य योजना पेश की थी। इस कार्ययोजना को लागू करने के लिए मंत्रालय ने धन दिए जाने को स्वीकृति दी है। इस धन का आवंटन विभिन्न योजनाओं- प्रमाणित हाइब्रिड बीज के आवंटन, माइक्रो न्यूट्रिएंट्स को प्रोत्साहन देने, उपकरणों और कृषि मशीनरी की खरीद के लिए किया गया है। मंत्रालय ने यह भी कहा है कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों को बाद में गेहूं की खेती की योजना के तहत बाद में और धन का आवंटन किया जाएगा। अधिकारियों ने कहा कि बेहतर बारिश होने की वजह से गेहूं का उत्पादन बेहतर रहने के अनुमान हैं। उम्मीद की जा रही है कि इस साल गेहूं का उत्पादन पिछले कुछ सालों की तुलना में बेहतर रहेगा। सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्त 640 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 1000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है।राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन का मुख्य उद्देश्य आवश्यक जिंसों- गेहूं, चावल, मक्का और दलहन के उत्पादन में बढ़ोतरी करना है। प्राथमिकता के अन्य क्षेत्र हैं कि बॉयो फर्टिलाइजर और माइक्रो न्यूट्रिएंट्स का इस्तेमाल कर मिट्टी की ऊर्वरा शक्ति को बढ़ाया जाए।साथ ही यह भी प्रस्ताव है कि अरहर, मसूर की खेती को बढ़ावा दिया जाए और मक्के तथा गन्ने की खरीफ फसल का रकबा बढ़ाया जाए। कृषि फार्मों में यंत्रीकरण के साथ-साथ ड्रिप और फुहार विधि से सिंचाई को बढ़ावा दिया जाए। गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध के बाद से भारत के पास गेहूं का अतिरिक्त स्टॉक है। बंपर पैदावार की उम्मीद और ज्यादा स्टॉक होने की वजह से सरकार को निर्यात की छूट देने का अवसर मिला है। जुलाई 2010 में वाणिज्य मंत्रालय ने कृषि मंत्रालय से संपर्क किया है, जिससे सरकारी कंपनियां 9 लाख टन और निजी क्षेत्र 6.5 लाख टन गेहूं का निर्यात कर सके। अधिकारियों ने कहा कि निर्यात पर प्रतिबंध मॉनसूनी बारिश की प्रगति का आकलन किए जाने के बाद हटाया जा सकता है। (BS Hindi)
लंबी अवधि के अनुबंध करना चाहती हैं एल्युमीनियम कंपनियां
बेंगलुरु September 02, 2010
भारतीय एल्युमीनियम कंपनियां एल्युमिना की कीमतें निर्धारित करने के लिए हाजिर भाव प्रणाली के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं। इसके बजाए वे लंबी अवधि के अनुबंध पर आधारित मूल्य निर्धारण की मौजूदा प्रणाली का समर्थन कर रही हैं।चीन में एल्युमीनियम की घटती हुई मांग और इसके भाव में उतार-चढ़ाव को देखते हुए इस प्रणाली की पेशकश की गई थी। एल्युमिना एल्युमीनियम उत्पादन प्रक्रिया का मध्यवर्ती उत्पाद है, जिसे एल्युमिना रिफाइनरी में बॉक्साइट के रूपांतरण से तैयार किया जाता है।इस धातु को एल्युमीनियम में परिवर्तित किया जा सकता है और इसके अन्य उपयोग भी हैं। मसलन इसका इस्तेमाल प्लास्टिक फिलर के रूप में, औद्योगिक इकाइयों में उत्प्रेरक के रूप में, गैस के शुद्घीकरण प्रक्रिया में और अपघर्षक के रूप में भी किया जाता है।भारतीय एल्युमीनियम कंपनियां अतिरिक्त एल्युमिना का वैश्विक बाजारों में निर्यात करती हैं। इसके लिए सौदे खरीदारों के साथ लंबी अवधि के अनुबंध के आधार पर निपटाए जाते हैं। सामान्य तौर पर एल्युमिना के भाव एल्युमीनियम के भाव से प्रभावित होते हैं। लंदन मेटल एक्सचेंज में एल्युमीनियम के भाव में आने वाले उतार-चढ़ाव से इसका सीधा वास्ता होता है। लेकिन, अल्कोआ और एल्युमिना लिमिटेड जैसी वैश्विक एल्युमीनियम कंपनियों ने हाल ही में एल्युमिना के भाव को एल्युमीनियम के भाव से अलग रखने का प्रस्ताव रखा है।उनके विचार के मुताबिक एल्युमिना के भाव इसके अंतिम उत्पाद एल्युमीनियम के भाव पर आधारित होते हैं। दोनों उत्पादों के बीच इस संबंध को तोड़ा जाना चाहिए ताकि एल्युमिना का बेहतर भाव निर्धारित किया जा सके। इसके बाद लंबी अवधि के लिए अनुबंध के बजाए इसका भाव हाजिर बाजार में रुझान के मुताबिक निर्धारित करने का विचार सामने आया है।नैशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (नाल्को) के निदेशक (वाणिज्यिक) अंशुमन दास ने कहा, 'हालांकि हाजिर बाजार के माध्यम से भाव निर्धारण के ज्यादा विकल्प हैं, लेकिन लंबी अवधि के अनुबंध पर आधारित भाव ज्यादा स्थिर होते हैं और यह भाव में उतार-चढ़ाव को प्रभावी तरीके से रोक पाने में सक्षम होते हैं।'नाल्को ने वित्त वर्ष 2010 के दौरान 15.9 लाख टन एल्युमिना का उत्पादन किया था। यह कंपनी अतिरिक्त एल्युमिना की बिक्री अंतरराष्ट्रीय बाजार में करती है और इसके भाव बड़े स्तर पर बेंचमार्क कीमत की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।दास ने बताया, 'एल्युमिना के भाव को एल्युमीनियम के भाव से अलग करना व्यावहारिक रूप से कठिन है क्योंकि इसकी मांग एल्युमीनियम की मांग पर निर्भर करती है।'उन्होंने यह भी कहा कि हाजिर बाजार में मांग के स्तर पर उतार-चढ़ाव का हवाला देकर इसके हाजिर मांग का आकलन भरोसेमंद नहीं होगा।फिलहाल चीन, इरान और किरगिस्तान के हाजिर बाजार बहुत प्रभावशाली हैं, जहां एल्युमिना की बिक्री हाजिर मांग के आधार पर होती है। दास ने बताया, 'चीन में मांग बढऩे की वजह से वर्ष 2003 से लेकर वर्ष 2007 के दौरान एल्युमिना के भाव में तेजी रही थी। लेकिन चीन में घरेलू स्तर पर उत्पादन बढऩे के चलते वहां की मांग में पहले से ही गिरावट आ चुकी है।'लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) में फिलहाल एल्युमीनियम के भाव 2,050 डॉलर प्रति टन के स्तर पर है और अंतरराष्टï्रीय बाजार में एल्युमिना के भाव 310-330 डॉलर प्रति टन है। कोच्चि स्थित एक ब्रोकरेज फर्म के एक विश्लेषक ने इस मसले पर कहा, 'एलएमई के भाव पर स्वतंत्र रूप से सौदा कठिन है क्योंकि बेंचमार्क भाव हमेशा खरीदारों के मानस पर निर्भर करता है।'बावजूद इसके उनका कहना है कि एल्युमिना के भाव निर्धारण के नए प्रस्ताव को लागू किया जाना बड़ी एल्युमीनियम कंपनियों के सक्रिय खेमा के रुख पर निर्भर करेगा। (BS Hindi)
भारतीय एल्युमीनियम कंपनियां एल्युमिना की कीमतें निर्धारित करने के लिए हाजिर भाव प्रणाली के प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं। इसके बजाए वे लंबी अवधि के अनुबंध पर आधारित मूल्य निर्धारण की मौजूदा प्रणाली का समर्थन कर रही हैं।चीन में एल्युमीनियम की घटती हुई मांग और इसके भाव में उतार-चढ़ाव को देखते हुए इस प्रणाली की पेशकश की गई थी। एल्युमिना एल्युमीनियम उत्पादन प्रक्रिया का मध्यवर्ती उत्पाद है, जिसे एल्युमिना रिफाइनरी में बॉक्साइट के रूपांतरण से तैयार किया जाता है।इस धातु को एल्युमीनियम में परिवर्तित किया जा सकता है और इसके अन्य उपयोग भी हैं। मसलन इसका इस्तेमाल प्लास्टिक फिलर के रूप में, औद्योगिक इकाइयों में उत्प्रेरक के रूप में, गैस के शुद्घीकरण प्रक्रिया में और अपघर्षक के रूप में भी किया जाता है।भारतीय एल्युमीनियम कंपनियां अतिरिक्त एल्युमिना का वैश्विक बाजारों में निर्यात करती हैं। इसके लिए सौदे खरीदारों के साथ लंबी अवधि के अनुबंध के आधार पर निपटाए जाते हैं। सामान्य तौर पर एल्युमिना के भाव एल्युमीनियम के भाव से प्रभावित होते हैं। लंदन मेटल एक्सचेंज में एल्युमीनियम के भाव में आने वाले उतार-चढ़ाव से इसका सीधा वास्ता होता है। लेकिन, अल्कोआ और एल्युमिना लिमिटेड जैसी वैश्विक एल्युमीनियम कंपनियों ने हाल ही में एल्युमिना के भाव को एल्युमीनियम के भाव से अलग रखने का प्रस्ताव रखा है।उनके विचार के मुताबिक एल्युमिना के भाव इसके अंतिम उत्पाद एल्युमीनियम के भाव पर आधारित होते हैं। दोनों उत्पादों के बीच इस संबंध को तोड़ा जाना चाहिए ताकि एल्युमिना का बेहतर भाव निर्धारित किया जा सके। इसके बाद लंबी अवधि के लिए अनुबंध के बजाए इसका भाव हाजिर बाजार में रुझान के मुताबिक निर्धारित करने का विचार सामने आया है।नैशनल एल्युमीनियम कंपनी लिमिटेड (नाल्को) के निदेशक (वाणिज्यिक) अंशुमन दास ने कहा, 'हालांकि हाजिर बाजार के माध्यम से भाव निर्धारण के ज्यादा विकल्प हैं, लेकिन लंबी अवधि के अनुबंध पर आधारित भाव ज्यादा स्थिर होते हैं और यह भाव में उतार-चढ़ाव को प्रभावी तरीके से रोक पाने में सक्षम होते हैं।'नाल्को ने वित्त वर्ष 2010 के दौरान 15.9 लाख टन एल्युमिना का उत्पादन किया था। यह कंपनी अतिरिक्त एल्युमिना की बिक्री अंतरराष्ट्रीय बाजार में करती है और इसके भाव बड़े स्तर पर बेंचमार्क कीमत की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं।दास ने बताया, 'एल्युमिना के भाव को एल्युमीनियम के भाव से अलग करना व्यावहारिक रूप से कठिन है क्योंकि इसकी मांग एल्युमीनियम की मांग पर निर्भर करती है।'उन्होंने यह भी कहा कि हाजिर बाजार में मांग के स्तर पर उतार-चढ़ाव का हवाला देकर इसके हाजिर मांग का आकलन भरोसेमंद नहीं होगा।फिलहाल चीन, इरान और किरगिस्तान के हाजिर बाजार बहुत प्रभावशाली हैं, जहां एल्युमिना की बिक्री हाजिर मांग के आधार पर होती है। दास ने बताया, 'चीन में मांग बढऩे की वजह से वर्ष 2003 से लेकर वर्ष 2007 के दौरान एल्युमिना के भाव में तेजी रही थी। लेकिन चीन में घरेलू स्तर पर उत्पादन बढऩे के चलते वहां की मांग में पहले से ही गिरावट आ चुकी है।'लंदन मेटल एक्सचेंज (एलएमई) में फिलहाल एल्युमीनियम के भाव 2,050 डॉलर प्रति टन के स्तर पर है और अंतरराष्टï्रीय बाजार में एल्युमिना के भाव 310-330 डॉलर प्रति टन है। कोच्चि स्थित एक ब्रोकरेज फर्म के एक विश्लेषक ने इस मसले पर कहा, 'एलएमई के भाव पर स्वतंत्र रूप से सौदा कठिन है क्योंकि बेंचमार्क भाव हमेशा खरीदारों के मानस पर निर्भर करता है।'बावजूद इसके उनका कहना है कि एल्युमिना के भाव निर्धारण के नए प्रस्ताव को लागू किया जाना बड़ी एल्युमीनियम कंपनियों के सक्रिय खेमा के रुख पर निर्भर करेगा। (BS Hindi)
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