मुंबई September 02, 2010
मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) अपने ब्रोकर सदस्यों को 'को-लोकेशन' सुविधा की पेशकश करने की योजना बना रही है। इससे ब्रोकरों को एक्सचेंज के ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के नजदीक सर्वर रखने की अनुमति मिल जाएगी जिससे वे ज्यादा तेजी से सौदे निपटा सकेंगे।इस मामले से जुड़े कारोबारियों का कहना है कि भारत में यह पहला मौका है, जब एक अग्रणी कमोडिटी बाजार अपने सदस्यों को को-लोकेशन की सुविधा देने में रुचि ले रहा है। उल्लेखनीय है कि देश में कमोडिटी के 85 फीसदी वायदा बाजार पर एमसीएक्स का कब्जा है। यहां ज्यादातर सौदे धातु और ऊर्जा खंड में होते हैं। सूत्रों का कहना है कि यह एक्सचेंज शुरुआती तौर पर को-लोकेशन सुविधा मुहैया कराने जा रहा है। लेकिन इस बारे में पूछने पर एमसीएक्स के एक प्रवक्ता ने कहा, 'हम बाजार के अफवाहों और अटकलों पर टिप्पणी नहीं कर सकते।'उधर वायदा बाजार आयोग (एफएमसी) के अध्यक्ष बीसी खटुआ ने कहा कि एमसीएक्स की इस तरह की योजना के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है और इस मसले पर उसने कमोडिटी बाजार नियामक से अब तक कोई चर्चा नहीं की है।को-लोकेशन सुविधा के तहत एक ऐसे डाटा केंद्र की व्यवस्था की जाती है, जहां एक सर्वर से कतार में कई कंप्यूटर जुड़े होते हैं। इससे बड़े सौदे निपटाने में मदद मिलती है। वैश्विक स्तर पर शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज (सीएमई), लिफे एवं टोकियो कमोडिटी एक्सचेंज (तोकोम) जैसे कमोडिटी बाजारों में इस तरह की सुविधा मौजूद है।भारत में भी दो प्रमुख शेयर बाजार- नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) और बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) को-लोकेशन सुविधा मुहैया कराती हैं। इस सुविधा का प्रमुख उद्देश्य खास तौर पर 'डाइरेक्ट मार्केट एक्सेस (डीएमए)' जैसी इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग फैसिलिटी के तहत कारोबार प्रणाली के साथ जुड़ाव में होने वाली देरी को कम करना होता है। भारत में को-लोकेशन सुविधा के माध्यम से बड़े सौदे निपटाने का चलन धीरे-धीरे जोर पकड़ रहा है। एनएसई ऐसा पहला एक्सचेंज था, जिसने वर्ष 2009 में इस तरह की सुविधा मुहैया कराई थी, जबकि बीएसई ने इस वर्ष की शुरुआत में यह सुविधा देना शुरू किया। (BS Hindi)
03 सितंबर 2010
उत्पादन से अधिक होगी खाद्यान्न की वैश्विक खपत
मुंबई September 02, 2010
वैश्विक अनाज उत्पादन पिछले 3 साल में पहली बार खपत की तुलना में कम रहने का अनुमान है। इसकी वजह है कि मॉनसून अनुकूल नहीं रहा और अल नीनो प्रभाव के चलते दुनिया का एक हिस्सा बाढ़ से पीडि़त रहा तो एक हिस्सा सूखाग्रस्त रहा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन, इस सत्र में खपत की तुलना में 100 लाख टन कम रहेगा। इसकी एक बड़ी वजह खाने पीने के तौर तरीकों में बदलाव और बढ़ती जनसंख्या भी है। एफएओ ने अपने पुनरीक्षित आंकड़ों में कहा है कि चालू सत्र में खाद्यान्न का वैश्विक उत्पादन 22380 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि जून में एफएओ ने अनुमान लगाया था कि वैश्विक उत्पादन 22800 लाख टन रहेगा। वहीं खाद्यान्न की खपत के अनुमान में कमी की गई है और यह जून के 22680 लाख टन की तुलना में 22480 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। उत्पादन कम रहने के बावजूद अनाज का वैश्विक उत्पादन 2010 में पंचवर्षीय औसत के हिसाब से तीसरा बड़ा रिकॉर्ड होगा। इस तरह से बहुत ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं है। इसकी वजह से अंतिम स्टॉक 8 साल के उच्च शुरुआती स्टॉक से ज्यादा रहेगा। यह 2007-08 के खतरनाक न्यूतनम स्तर से कम होगा, जब खाद्यान्न संकट की स्थिति थी।बहरहाल, यह कमी अग्रिम स्टॉक के माध्यम से पूरी हो जाएगी, जो 2010-11 में 5270 लाख टन रहेगा, हालांकि इसके पहले साल में अग्रिम स्टॉक 5400 लाख टन था। ब्राजील, रूस और पाकिस्तान में प्रतिकूल मौसम रहने की वजह से अनाज के उत्पादन में गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है। गेहूं को लेकर ज्यादा खतरा है, जिसकी वजह से अन्य अनाजों में भी तेजी रहने की उम्मीद है। 2010 के लिए जारी इस अनुमान में गेहूं का उत्पादन 6460 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2009 में हुए उत्पादन की तुलना में 5 प्रतिशत कम होगा। लेकिन अभी भी यह उत्पादन का तीसरा उच्चतम स्तर होगा।हाल में उत्पादन के अनुमान में क मी इसलिए की गई है, क्योकि रशियन फेडरेशन ने इस साल के लिए फसलों के उत्पादन का अनुमान 480 लाख टन से घटाकर 430 लाख टन कर दिया है। साथ ही गेहूं का 2011 के लिए अंतिम स्टॉक कम होकर 1810 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है।शुरुआती उच्चतम स्तर 8 साल में सबसे ज्यादा था, जिसकी तुलना में यह 9 प्रतिशत कम है। मुंबई की एक एग्रो प्रॉसेसिंग कंपनी यूजर एग्रो के प्रबंध निदेशक वीके चतुर्वेदी ने कहा, 'पूरी दुनिया इस समय रूस और ब्राजील में होने वाले बदलाव पर नजर बनाए हुए है। पाकिस्तान में इस समय बुरा हाल है और वहां की खेती बाढ़ से तबाह हो गई है। ऐसी स्थिति में भारत को खाद्यान्न के निर्यात से निश्चित रूप से फायदा उठाना चाहिए।'साथ ही चावल उत्पादन के ताजा अनुमानों में भी बदलाव किया गया है। 2010 में चावल उत्पादन जून में लगाए गए अनुमान से 50 लाख टन घटकर 4670 लाख टन रहने का अनुमान है। लेकिन यह अभी भी 2009 में हुए कुल उत्पादन की तुलना में 3 प्रतिशत ज्यादा रहेगा। इसके उत्पादन में कमी का अनुमान पाकिस्तान की बाढ़ को देखते हुए लगाया गया है, लेकिन चीन, मिस्र, भारत, लाओस और फिलीपींस में भी उत्पादन कम हो सकता है। (BS Hindi)
वैश्विक अनाज उत्पादन पिछले 3 साल में पहली बार खपत की तुलना में कम रहने का अनुमान है। इसकी वजह है कि मॉनसून अनुकूल नहीं रहा और अल नीनो प्रभाव के चलते दुनिया का एक हिस्सा बाढ़ से पीडि़त रहा तो एक हिस्सा सूखाग्रस्त रहा। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के आंकड़ों के मुताबिक वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन, इस सत्र में खपत की तुलना में 100 लाख टन कम रहेगा। इसकी एक बड़ी वजह खाने पीने के तौर तरीकों में बदलाव और बढ़ती जनसंख्या भी है। एफएओ ने अपने पुनरीक्षित आंकड़ों में कहा है कि चालू सत्र में खाद्यान्न का वैश्विक उत्पादन 22380 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि जून में एफएओ ने अनुमान लगाया था कि वैश्विक उत्पादन 22800 लाख टन रहेगा। वहीं खाद्यान्न की खपत के अनुमान में कमी की गई है और यह जून के 22680 लाख टन की तुलना में 22480 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है। उत्पादन कम रहने के बावजूद अनाज का वैश्विक उत्पादन 2010 में पंचवर्षीय औसत के हिसाब से तीसरा बड़ा रिकॉर्ड होगा। इस तरह से बहुत ज्यादा चिंता की जरूरत नहीं है। इसकी वजह से अंतिम स्टॉक 8 साल के उच्च शुरुआती स्टॉक से ज्यादा रहेगा। यह 2007-08 के खतरनाक न्यूतनम स्तर से कम होगा, जब खाद्यान्न संकट की स्थिति थी।बहरहाल, यह कमी अग्रिम स्टॉक के माध्यम से पूरी हो जाएगी, जो 2010-11 में 5270 लाख टन रहेगा, हालांकि इसके पहले साल में अग्रिम स्टॉक 5400 लाख टन था। ब्राजील, रूस और पाकिस्तान में प्रतिकूल मौसम रहने की वजह से अनाज के उत्पादन में गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा है। गेहूं को लेकर ज्यादा खतरा है, जिसकी वजह से अन्य अनाजों में भी तेजी रहने की उम्मीद है। 2010 के लिए जारी इस अनुमान में गेहूं का उत्पादन 6460 लाख टन रहने का अनुमान है, जो 2009 में हुए उत्पादन की तुलना में 5 प्रतिशत कम होगा। लेकिन अभी भी यह उत्पादन का तीसरा उच्चतम स्तर होगा।हाल में उत्पादन के अनुमान में क मी इसलिए की गई है, क्योकि रशियन फेडरेशन ने इस साल के लिए फसलों के उत्पादन का अनुमान 480 लाख टन से घटाकर 430 लाख टन कर दिया है। साथ ही गेहूं का 2011 के लिए अंतिम स्टॉक कम होकर 1810 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है।शुरुआती उच्चतम स्तर 8 साल में सबसे ज्यादा था, जिसकी तुलना में यह 9 प्रतिशत कम है। मुंबई की एक एग्रो प्रॉसेसिंग कंपनी यूजर एग्रो के प्रबंध निदेशक वीके चतुर्वेदी ने कहा, 'पूरी दुनिया इस समय रूस और ब्राजील में होने वाले बदलाव पर नजर बनाए हुए है। पाकिस्तान में इस समय बुरा हाल है और वहां की खेती बाढ़ से तबाह हो गई है। ऐसी स्थिति में भारत को खाद्यान्न के निर्यात से निश्चित रूप से फायदा उठाना चाहिए।'साथ ही चावल उत्पादन के ताजा अनुमानों में भी बदलाव किया गया है। 2010 में चावल उत्पादन जून में लगाए गए अनुमान से 50 लाख टन घटकर 4670 लाख टन रहने का अनुमान है। लेकिन यह अभी भी 2009 में हुए कुल उत्पादन की तुलना में 3 प्रतिशत ज्यादा रहेगा। इसके उत्पादन में कमी का अनुमान पाकिस्तान की बाढ़ को देखते हुए लगाया गया है, लेकिन चीन, मिस्र, भारत, लाओस और फिलीपींस में भी उत्पादन कम हो सकता है। (BS Hindi)
बढ़ेगी चीनी की मिठास!
नई दिल्ली September 02, 2010
चीनी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की कवायद के तहत केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भेंट कर उन्हें प्रस्तावित कदम के बारे में जानकारी दी। माना जा रहा है कि अगर सरकार इस पर राजी होती है तो चीनी मिलों को चीनी बेचने की आजादी होगी।फिलहाल, सरकार का चीनी उद्योग पर नियंत्रण है और मिलों की ओर से हर महीने बेची जाने वाली चीनी की मात्रा का निर्धारण करती है। इस कदम का असर चीनी उत्पादक कंपनियों के शेयरों पर भी दिखा। बंबई स्टॉक एक्सचेंज में गुरुवार को देश की सबसे बड़ी चीनी उत्पादक कंपनी बजाज हिंदुस्तान के शेयर 4.25 फीसदी चढ़कर 121.35 रुपये पर बंद हुए। इसी तरह बलरामपुर चीनी के शेयर 2.98 फीसदी की तेजी के साथ 88 रुपये पर बंद हुए। रेणुका शुगर्स के शेयरों में 4.06 फीसदी की उछाल दर्ज की गई और यह 68 रुपये पर बंद हुआ।अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले सत्र में भारी उत्पादन की आस में मंत्रालय चीनी क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त करने की योजना बना रहा है। सूत्रों का कहना है कि पवार ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष चीनी उद्योग के उदारीकरण की योजना का एक खाका प्रस्तुत किया।इसके तहत मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने से किस तरह ग्राहकों और किसानों को फायदा होगा। चीनी उद्योग के उदारीकरण के प्रस्तुतीकरण में मंत्रालय ने खुले बाजार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बिक्री के लिए मासिक कोटा को निर्धारित करने की प्रणाली को समाप्त करने का प्रस्ताव किया है।साथ ही सार्वजनिक वितरण के तहत आने वाली राशन की दुकानों के लिए चीनी की जरूरत को पूरा करने के लिए मंत्रालय ने खुले बाजार से चीनी को खरीदने की सलाह दी है। मौजूदा समय में चीनी मिलों को अपने उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा सरकार को सस्ते दामों पर बेचना होता है, ताकि इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बेचा जा सके। मंत्रालय ने यह भी तर्क दिया कि किसानों को अपने उत्पाद बेचने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। मौजूदा समय में गन्ना उत्पादक केवल निर्धारित चीनी मिलों को ही गन्ना बेच सकते हैं।देश में चीनी उद्योग पर सरकार का नियंत्रण है। हालांकि 1971-72 और 1978-79 में भी इस क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त करने की कोशिश की गई थी, लेकिन बाद में कदम वापस ले लिए गए। हालांकि सरकार ने स्टील और सीमेंट क्षेत्र को बहुत पहले ही नियंत्रण मुक्त कर चुकी है।इस साल जून में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किया जा चुका है, वहीं डीज़ल की कीमतों को भी नियंत्रण मुक्त करने की योजना है। केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्रालय पिछले कुछ महीनों से चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने की कवायद में जुटी है।पिछले महीने पवार ने कहा था कि मंत्रालय चीनी क्षेत्र के विनियंत्रण के बारे में एक प्रस्ताव को तैयार कर रहा है। जिसे मंत्रिमंडल के समक्ष पेश करने से पहले विभिन्न मंत्रालयों के पास उनकी टिप्पणी के लिए भेजा जाएगा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करना जारी रखेगी। एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है जिसे चीनी मिलों को गन्ने की खरीद के लिए भुगतान करना होता है।भारतीय चीनी मिल संघ के अध्यक्ष विवेक सरावगी ने कहा कि नियंत्रण की व्यवस्था ने चीनी उद्योग के नवीनता, निवेश और सुधार करने की क्षमता को सीमित कर दिया है। बलरामपुर चीनी मिल्स के प्रबंध निदेशक सरावगी ने कहा कि दीर्घावधि में भारतीय चीनी क्षेत्र को विकास की राह पर लाने के लिए विनियंत्रण जरूरी है। (BS Hindi)
चीनी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की कवायद के तहत केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्री शरद पवार ने आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से भेंट कर उन्हें प्रस्तावित कदम के बारे में जानकारी दी। माना जा रहा है कि अगर सरकार इस पर राजी होती है तो चीनी मिलों को चीनी बेचने की आजादी होगी।फिलहाल, सरकार का चीनी उद्योग पर नियंत्रण है और मिलों की ओर से हर महीने बेची जाने वाली चीनी की मात्रा का निर्धारण करती है। इस कदम का असर चीनी उत्पादक कंपनियों के शेयरों पर भी दिखा। बंबई स्टॉक एक्सचेंज में गुरुवार को देश की सबसे बड़ी चीनी उत्पादक कंपनी बजाज हिंदुस्तान के शेयर 4.25 फीसदी चढ़कर 121.35 रुपये पर बंद हुए। इसी तरह बलरामपुर चीनी के शेयर 2.98 फीसदी की तेजी के साथ 88 रुपये पर बंद हुए। रेणुका शुगर्स के शेयरों में 4.06 फीसदी की उछाल दर्ज की गई और यह 68 रुपये पर बंद हुआ।अक्टूबर से शुरू होने वाले अगले सत्र में भारी उत्पादन की आस में मंत्रालय चीनी क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त करने की योजना बना रहा है। सूत्रों का कहना है कि पवार ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष चीनी उद्योग के उदारीकरण की योजना का एक खाका प्रस्तुत किया।इसके तहत मंत्रालय ने इस बात पर भी जोर दिया कि चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने से किस तरह ग्राहकों और किसानों को फायदा होगा। चीनी उद्योग के उदारीकरण के प्रस्तुतीकरण में मंत्रालय ने खुले बाजार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बिक्री के लिए मासिक कोटा को निर्धारित करने की प्रणाली को समाप्त करने का प्रस्ताव किया है।साथ ही सार्वजनिक वितरण के तहत आने वाली राशन की दुकानों के लिए चीनी की जरूरत को पूरा करने के लिए मंत्रालय ने खुले बाजार से चीनी को खरीदने की सलाह दी है। मौजूदा समय में चीनी मिलों को अपने उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा सरकार को सस्ते दामों पर बेचना होता है, ताकि इसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बेचा जा सके। मंत्रालय ने यह भी तर्क दिया कि किसानों को अपने उत्पाद बेचने की स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। मौजूदा समय में गन्ना उत्पादक केवल निर्धारित चीनी मिलों को ही गन्ना बेच सकते हैं।देश में चीनी उद्योग पर सरकार का नियंत्रण है। हालांकि 1971-72 और 1978-79 में भी इस क्षेत्र को नियंत्रण मुक्त करने की कोशिश की गई थी, लेकिन बाद में कदम वापस ले लिए गए। हालांकि सरकार ने स्टील और सीमेंट क्षेत्र को बहुत पहले ही नियंत्रण मुक्त कर चुकी है।इस साल जून में पेट्रोल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त किया जा चुका है, वहीं डीज़ल की कीमतों को भी नियंत्रण मुक्त करने की योजना है। केंद्रीय खाद्य एवं कृषि मंत्रालय पिछले कुछ महीनों से चीनी उद्योग को नियंत्रण मुक्त करने की कवायद में जुटी है।पिछले महीने पवार ने कहा था कि मंत्रालय चीनी क्षेत्र के विनियंत्रण के बारे में एक प्रस्ताव को तैयार कर रहा है। जिसे मंत्रिमंडल के समक्ष पेश करने से पहले विभिन्न मंत्रालयों के पास उनकी टिप्पणी के लिए भेजा जाएगा। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सरकार किसानों के हितों की रक्षा करने के लिए उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) तय करना जारी रखेगी। एफआरपी वह न्यूनतम मूल्य होता है जिसे चीनी मिलों को गन्ने की खरीद के लिए भुगतान करना होता है।भारतीय चीनी मिल संघ के अध्यक्ष विवेक सरावगी ने कहा कि नियंत्रण की व्यवस्था ने चीनी उद्योग के नवीनता, निवेश और सुधार करने की क्षमता को सीमित कर दिया है। बलरामपुर चीनी मिल्स के प्रबंध निदेशक सरावगी ने कहा कि दीर्घावधि में भारतीय चीनी क्षेत्र को विकास की राह पर लाने के लिए विनियंत्रण जरूरी है। (BS Hindi)
अच्छी बारिश से किसानों को राहत
नई दिल्ली September 02, 2010
अच्छी बारिश से गन्ना किसानों के चेहरे खिल उठे हैं। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का कहना है कि बारिश से गन्ने की फसल को काफी फायदा हो रहा है, जिससे आगामी पेराई सत्र में चीनी का उत्पादन बढऩे की संभावना है।उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के शादीपुर मिलख गांव के गन्ना किसान अरविंद कुमार ने बताया कि जुलाई के अंतिम सप्ताह से अब तक अच्छी बारिश हुई है। इससे गन्ने की फसल में तेजी से विकास हो रहा है। बारिश से गन्ने के ऊपरी भाग में लगने वाले कडुवा रोग में भी कमी आई है।मुजफ्फरपुर के कहरर गांव के गन्ना किसान जितेंद्र मलिक और मेरठ जिले के अख्तयारपुर गांव के विनोद चौधरी भी अच्छी फसल की उम्मीद कर रहे हैं। विनोद का कहना है कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्रति बीघा गन्ने की उपज 2 क्विंटल अधिक हो सकती है। गन्ने की औसत उत्पादकता 60-65 क्विंटल प्रति बीघा है।श्री रेणुका शुगर्स लिमिटेड के निदेशक जीके सूद बताते है कि अच्छी बारिश गन्ने की फसल के लिए फायदेमंद है, जिससे उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन बढ़ सकता है। सरकार के अनुसार, 26 अगस्त तक देश में गन्ने का रकबा करीब 14 फीसदी बढ़कर 47.6 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश में भी रकबा 15-20 फीसदी बढ़ा है, जिससे राज्य में चीनी उत्पादन करीब 20 फीसदी बढ़ सकता है। पिछले सीजन में राज्य में 52 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। चीनी ब्रोकर और विश्लेषक समूह किंग्समैन के मुताबिक आगामी पेराई सत्र में चीनी का उत्पादन 188 लाख टन के मुकाबले 248.5 लाख टन होने का अनुमान है। (BS Hindi)
अच्छी बारिश से गन्ना किसानों के चेहरे खिल उठे हैं। उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का कहना है कि बारिश से गन्ने की फसल को काफी फायदा हो रहा है, जिससे आगामी पेराई सत्र में चीनी का उत्पादन बढऩे की संभावना है।उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के शादीपुर मिलख गांव के गन्ना किसान अरविंद कुमार ने बताया कि जुलाई के अंतिम सप्ताह से अब तक अच्छी बारिश हुई है। इससे गन्ने की फसल में तेजी से विकास हो रहा है। बारिश से गन्ने के ऊपरी भाग में लगने वाले कडुवा रोग में भी कमी आई है।मुजफ्फरपुर के कहरर गांव के गन्ना किसान जितेंद्र मलिक और मेरठ जिले के अख्तयारपुर गांव के विनोद चौधरी भी अच्छी फसल की उम्मीद कर रहे हैं। विनोद का कहना है कि वर्तमान स्थिति को देखते हुए प्रति बीघा गन्ने की उपज 2 क्विंटल अधिक हो सकती है। गन्ने की औसत उत्पादकता 60-65 क्विंटल प्रति बीघा है।श्री रेणुका शुगर्स लिमिटेड के निदेशक जीके सूद बताते है कि अच्छी बारिश गन्ने की फसल के लिए फायदेमंद है, जिससे उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन बढ़ सकता है। सरकार के अनुसार, 26 अगस्त तक देश में गन्ने का रकबा करीब 14 फीसदी बढ़कर 47.6 लाख हेक्टेयर हो गया है। उत्तर प्रदेश में भी रकबा 15-20 फीसदी बढ़ा है, जिससे राज्य में चीनी उत्पादन करीब 20 फीसदी बढ़ सकता है। पिछले सीजन में राज्य में 52 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। चीनी ब्रोकर और विश्लेषक समूह किंग्समैन के मुताबिक आगामी पेराई सत्र में चीनी का उत्पादन 188 लाख टन के मुकाबले 248.5 लाख टन होने का अनुमान है। (BS Hindi)
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की तैयारी
नई दिल्ली September 02, 2010
चीनी उद्योग ने तेल विपणन कंपनियों को करीब 100 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति करने की पेशकश की है। कंपनियों को पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनॉल चाहिए। दरअसल सरकार ने पेट्रोल में 5 फीसदी एथेनॉल मिलाना जरूरी कर दिया है।तेल विपणन कंपनियों ने 105 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति के लिए निविदाएं मंगाई थी। रेणुका शुगर्स ने सबसे अधिक 12 करोड़ लीटर जबकि बजाज हिंदुस्तान ने 10 करोड़ लीटर एथेनॉल आपूर्ति करने की पेशकश की है।बलरामपुर चीनी ने 4 करोड़ लीटर एथेनॉल के लिए पेशकश की है। ये कंपनियां मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह द्वारा तय किए गए अंतरिम दाम 27 रुपये प्रति लीटर पर एथेनॉल की आपूर्ति करेंगी। हालांकि एथेनॉल की अंतिम कीमत पर विशेषज्ञ समिति को फैसला करना है।इससे पहले एथेनॉल का दाम 21.50 रुपये प्रति लीटर था। राज्यों की बात करें तो, सबसे अधिक 39 करोड़ लीटर एथेनॉल आपूर्ति की पेशकश महाराष्ट्र से आई है, इसके बाद उत्तर प्रदेश ने 28 करोड़ लीटर एथेनॉल और कर्नाटक ने 16 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की पेशकश की है। बाकी आपूर्ति तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और गुजरात से की जाएगी। उम्मीद है कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम इन चीनी कंपनियों को 6 सितंबर को एथेनॉल आपूर्ति के ठेके दे सकती हैं। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर बेचने की योजना अगले एक महीने में लागू हो सकती है। (BS Hindi)
चीनी उद्योग ने तेल विपणन कंपनियों को करीब 100 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति करने की पेशकश की है। कंपनियों को पेट्रोल में मिलाने के लिए एथेनॉल चाहिए। दरअसल सरकार ने पेट्रोल में 5 फीसदी एथेनॉल मिलाना जरूरी कर दिया है।तेल विपणन कंपनियों ने 105 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति के लिए निविदाएं मंगाई थी। रेणुका शुगर्स ने सबसे अधिक 12 करोड़ लीटर जबकि बजाज हिंदुस्तान ने 10 करोड़ लीटर एथेनॉल आपूर्ति करने की पेशकश की है।बलरामपुर चीनी ने 4 करोड़ लीटर एथेनॉल के लिए पेशकश की है। ये कंपनियां मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह द्वारा तय किए गए अंतरिम दाम 27 रुपये प्रति लीटर पर एथेनॉल की आपूर्ति करेंगी। हालांकि एथेनॉल की अंतिम कीमत पर विशेषज्ञ समिति को फैसला करना है।इससे पहले एथेनॉल का दाम 21.50 रुपये प्रति लीटर था। राज्यों की बात करें तो, सबसे अधिक 39 करोड़ लीटर एथेनॉल आपूर्ति की पेशकश महाराष्ट्र से आई है, इसके बाद उत्तर प्रदेश ने 28 करोड़ लीटर एथेनॉल और कर्नाटक ने 16 करोड़ लीटर एथेनॉल की आपूर्ति की पेशकश की है। बाकी आपूर्ति तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और गुजरात से की जाएगी। उम्मीद है कि इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम इन चीनी कंपनियों को 6 सितंबर को एथेनॉल आपूर्ति के ठेके दे सकती हैं। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाकर बेचने की योजना अगले एक महीने में लागू हो सकती है। (BS Hindi)
01 सितंबर 2010
मालभाड़े और उत्पादन लागत ने उड़ाई भारतीय गुलाबों की लाली
बेंगलुरु August 31, 2010
बेंगलुरु के गुलाब उत्पादक जय प्रकाश राव इस समय घरेलू बाजार में अपने गुलाब बेचने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इसके पीछे कारण यह है कि मालभाड़े में तेज बढ़ोतरी हुई है और उत्पादन लागत भी बढ़ा है, जिसकी वजह से निर्यात महंगा पड़ रहा है। वहीं इथियोपिया और केन्या जैसे देशों में उत्पादन लागत कम है और वे धीरे-धीरे निर्यात बाजार में अपनी पैठ मजबूत कर रहे हैं। बेंगलुरु के बाहरी इलाके में राव 5 हेक्टेयर जमीन में गुलाब की खेती करते हैं। वे नये साल और वेलेंटाइन डे जैसे खास अवसरों पर अमेरिका और यूरोप के देशों में गुलाब की कलियों का निर्यात करते हैं। राव ने कहा, 'मालभाड़े में बढ़ोतरी, उत्पादन लागत बढऩे और अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा बढऩे की वजह से हमें निर्यात के बजाय घरेलू बाजार में संभावनाएं तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।'उन्होंने कहा कि दीर्घावधि के हिसाब से देखें तो घरेलू बाजार में भी गुलाब की कलियों की बिक्री करना किसानों के लिए लाभदायक नजर नहीं आ रहा है। कारोबारियों के मुताबिक गुलाब की एक कली का दाम निर्यात बाजार में किसानों को 6.50 रुपये से 7.50 रुपये मिलते हैं, वहीं घरेलू बाजार में इनकी बिक्री 2 से 4 रुपये में होती है। इंटरनैशनल फ्लावर आक्शन बेंगलुरु लिमिटेड (आईएफएबी) के जनरल मैनेजर जी शंकर मूर्ति ने कहा, 'निर्यात बाजार में किसानों को अपने उत्पाद के बेहतर दाम मिलते हैं, लेकिन गुलाबों की गुणवत्ता के हिसाब से जोखिम ज्यादा होता है। साथ ही उचित गारंटी, मुद्रा की समस्या और मांग में उतार चढ़ाव के संकट से भी जूझना पड़ता है।'आईएफएबी देश के फूलों की ई-नीलामी का एक केंद्र है, जो उत्पादकों को निर्यात करने में मदद करता है। भारत में हर साल करीब 34 करोड़ गुलाब की कलियों का उत्पादन होता है, जिसमें से 24 करोड़ (70 प्रतिशत) कलियों का उत्पादन कर्नाटक में होता है। शेष उत्पादन महाराष्ट्र, तमिलनाडु और देश के कुछ अन्य हिस्सों में होता है। साउथ इंडिया फ्लोरीकल्चर एसोसिएशन (एसआईएफए) के अध्यक्ष आरडी रेड्डी ने कहा, 'कर्नाटक, खासकर बेंगलुरु भौगोलिक रूप से कटे गुलाब के निर्यात हब के रू प में उभरा है, लेकिन इस समय हम केन्या, इथियोपिया जैसे उभरते बाजारों से प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट रहे हैं।' उन्होंने कहा कि वहां की सरकारें कटे गुलाब के उत्पादन के लिए निश्चित मूल्य का फायदा देती हैं। एग्रीकल्चरल ऐंड प्रॉसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) के आंकड़ों के मुताबिक भारत से फूलों का निर्यात 2009-10 में 293.97 करोड़ रुपये का रह गया है, जो 2006-07 में 566 करोड़ रुपये का था। इस तरह पिछले 4 साल में फूलों के निर्यात में 48 प्रतिशत की गिरावट आई है। (BS Hindi)
बेंगलुरु के गुलाब उत्पादक जय प्रकाश राव इस समय घरेलू बाजार में अपने गुलाब बेचने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। इसके पीछे कारण यह है कि मालभाड़े में तेज बढ़ोतरी हुई है और उत्पादन लागत भी बढ़ा है, जिसकी वजह से निर्यात महंगा पड़ रहा है। वहीं इथियोपिया और केन्या जैसे देशों में उत्पादन लागत कम है और वे धीरे-धीरे निर्यात बाजार में अपनी पैठ मजबूत कर रहे हैं। बेंगलुरु के बाहरी इलाके में राव 5 हेक्टेयर जमीन में गुलाब की खेती करते हैं। वे नये साल और वेलेंटाइन डे जैसे खास अवसरों पर अमेरिका और यूरोप के देशों में गुलाब की कलियों का निर्यात करते हैं। राव ने कहा, 'मालभाड़े में बढ़ोतरी, उत्पादन लागत बढऩे और अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा बढऩे की वजह से हमें निर्यात के बजाय घरेलू बाजार में संभावनाएं तलाशने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।'उन्होंने कहा कि दीर्घावधि के हिसाब से देखें तो घरेलू बाजार में भी गुलाब की कलियों की बिक्री करना किसानों के लिए लाभदायक नजर नहीं आ रहा है। कारोबारियों के मुताबिक गुलाब की एक कली का दाम निर्यात बाजार में किसानों को 6.50 रुपये से 7.50 रुपये मिलते हैं, वहीं घरेलू बाजार में इनकी बिक्री 2 से 4 रुपये में होती है। इंटरनैशनल फ्लावर आक्शन बेंगलुरु लिमिटेड (आईएफएबी) के जनरल मैनेजर जी शंकर मूर्ति ने कहा, 'निर्यात बाजार में किसानों को अपने उत्पाद के बेहतर दाम मिलते हैं, लेकिन गुलाबों की गुणवत्ता के हिसाब से जोखिम ज्यादा होता है। साथ ही उचित गारंटी, मुद्रा की समस्या और मांग में उतार चढ़ाव के संकट से भी जूझना पड़ता है।'आईएफएबी देश के फूलों की ई-नीलामी का एक केंद्र है, जो उत्पादकों को निर्यात करने में मदद करता है। भारत में हर साल करीब 34 करोड़ गुलाब की कलियों का उत्पादन होता है, जिसमें से 24 करोड़ (70 प्रतिशत) कलियों का उत्पादन कर्नाटक में होता है। शेष उत्पादन महाराष्ट्र, तमिलनाडु और देश के कुछ अन्य हिस्सों में होता है। साउथ इंडिया फ्लोरीकल्चर एसोसिएशन (एसआईएफए) के अध्यक्ष आरडी रेड्डी ने कहा, 'कर्नाटक, खासकर बेंगलुरु भौगोलिक रूप से कटे गुलाब के निर्यात हब के रू प में उभरा है, लेकिन इस समय हम केन्या, इथियोपिया जैसे उभरते बाजारों से प्रतिस्पर्धा में पीछे छूट रहे हैं।' उन्होंने कहा कि वहां की सरकारें कटे गुलाब के उत्पादन के लिए निश्चित मूल्य का फायदा देती हैं। एग्रीकल्चरल ऐंड प्रॉसेस्ड फूड प्रोडक्ट्स डेवलपमेंट अथॉरिटी (एपीडा) के आंकड़ों के मुताबिक भारत से फूलों का निर्यात 2009-10 में 293.97 करोड़ रुपये का रह गया है, जो 2006-07 में 566 करोड़ रुपये का था। इस तरह पिछले 4 साल में फूलों के निर्यात में 48 प्रतिशत की गिरावट आई है। (BS Hindi)
प्याज का निर्यात मूल्य 55 डॉलर प्रति टन बढ़ा
नई दिल्ली August 31, 2010
घरेलू बाजार में प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी रोकने के लिए सरकार ने इसके निर्यात पर अंकुश लगाने का कदम उठाया है। इसके लिए सरकार ने सितंबर महीने के लिए प्याज के न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी ) में 55 डॉलर प्रति टन की बढ़ोतरी की है। है। सरकार के इस कदम से निर्यात में कमी आएगी, जिससे घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता बढऩे से कीमतों आ रही तेजी थमने की संभावना है।भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित (नेफेड ) के बागवानी मामलों को देखने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी बताया कि सितंबर महीने के लिए एमईपी को 55 डॉलर बढ़ाकर 270-275 डॉलर प्रति टन कर दिया गया है।उक्त अधिकारी के मुताबिक नेफेड ने यह कदम निर्यात को कम करने के लिए किया, जिससे घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता में बढ़ोतरी हो सके और कीमतों में आ रही तेजी पर अंकुश लग सके। अधिकारी का कहना है कि नेफेड ने पिछले माह भी एमईपी में इजाफा किया था। (BS Hindi)
घरेलू बाजार में प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी रोकने के लिए सरकार ने इसके निर्यात पर अंकुश लगाने का कदम उठाया है। इसके लिए सरकार ने सितंबर महीने के लिए प्याज के न्यूनतम निर्यात मूल्य (एमईपी ) में 55 डॉलर प्रति टन की बढ़ोतरी की है। है। सरकार के इस कदम से निर्यात में कमी आएगी, जिससे घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता बढऩे से कीमतों आ रही तेजी थमने की संभावना है।भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ मर्यादित (नेफेड ) के बागवानी मामलों को देखने वाले एक वरिष्ठ अधिकारी बताया कि सितंबर महीने के लिए एमईपी को 55 डॉलर बढ़ाकर 270-275 डॉलर प्रति टन कर दिया गया है।उक्त अधिकारी के मुताबिक नेफेड ने यह कदम निर्यात को कम करने के लिए किया, जिससे घरेलू बाजार में प्याज की उपलब्धता में बढ़ोतरी हो सके और कीमतों में आ रही तेजी पर अंकुश लग सके। अधिकारी का कहना है कि नेफेड ने पिछले माह भी एमईपी में इजाफा किया था। (BS Hindi)
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
