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08 सितंबर 2022

आयात पड़ते महंगे होने से उड़द तेज, अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर मंदी

नई दिल्ली। बर्मा में उड़द की कीमतों में आये सुधार से आयात पड़ते महंगे होने के कारण घरेलू बाजार में बुधवार को उड़द की कीमतों में तेजी दर्ज की गई, जबकि अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर एवं देसी मूंग की कीमतों में गिरावट आई। नीचे दाम पर दाल मिलों की हाजिर मांग बढ़ने से चना एवं मसूर की कीमतों में भी हल्का सुधार आया।

बर्मा से आयातित उड़द एफएक्यू और एसक्यू की कीमतों में पांच-पांच डॉलर की तेजी आकर भाव क्रमशः 855 डॉलर और 985 डॉलर प्रति टन, सीएडंएफ हो गए। चेन्नई में 20 सितंबर से 20 अक्टूबर तक की डिलवरी के व्यापार हुए। बर्मा में लेमन अरहर के भाव 895 डॉलर प्रति टन पर स्थिर बने रहे। जानकारों के अनुसार बर्मा में उड़द कीमतों में सुधार तो आया है, लेकिन जिस तरह से घरेलू बाजार में खरीफ की उड़द की आवक बढ़ रही है, उसे देखते हुए ज्यादा तेजी की उम्मीद नहीं है। वैसे भी बर्मा में उड़द का बकाया स्टॉक ज्यादा है।

मध्य प्रदेश की मंडियों में नई उड़द की आवक बढ़ने लगी है। माना जा रहा है कि मौसम साफ रहा तो चालू महीने तक इसकी आवकों में और बढ़ेगी होगी, जबकि पितृ पक्ष के कारण अभी दालों में ग्राहकी सामान्य की तुलना में कमजो रहेगी। उड़द दाल में दक्षिण भारत की मांग भी सामान्य की तुलना में कमजोर है। मध्य प्रदेश की अशोकनगर मंडी में नई उड़द की आवक 60 से 70 क्विंटल की हुई तथा इसका व्यापार 5900 से 6800 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर हुआ। नए मालों में नमी की मात्रार 15 से 17 फीसदी है।

अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर की कीमतों में मंदा आया है। जानकारों के अनुसार आगामी दिनों में अफ्रीकी देशों से अरहर का आयात बढ़ेगी, जबकि इन देशों से आयातित अरहर सस्ती है। इसलिए अरहर की कीमतों पर दबाव तो रहेगा, लेकिन घरेलू बाजार में देसी अरहर का अच्छी क्वालिटी का बकाया स्टॉक कम है, तथा नई फसल की आवक दिसंबर में बनेगी। इसलिए बड़ी गिरावट के आसार कम है।

राजस्थान की मंडियों में खरीफ मूंग की आवक शुरू हो गई है, तथा आगामी दिनों में इसकी दैनिक आवक बढ़ने के आसार है। इसलिए मूंग की कीमतों में आगे गिरावट आने की उम्मीद है। राज्य की मेड़ता मंडी में आज 50 बोरी नए मूंग की आवक हुई तथा इसका व्यापार 5,500 से 6,300 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ। जानकारों के अनुसार चालू महीने के अंत तक इसकी दैनिक आवक बढ़कर 5,000 से 6,000 बोरी हो जायेगी। उधर श्रीगंगानगर मंडी में नई मूंग की आवक सप्ताहभर बाद शुरू होने की उम्मीद है।

चना एवं मसूर में बिकवाली कम आने से दाम लगभग स्थिर हो गए हैं। व्यापारियों के अनुसार नीचे दाम पर मांग निकलने से इनकी कीमतों में 25 से 50 रुपये का सुधार तो आ सकता है लेकिन बड़ी तेजी के आसार अभी नहीं है। नेफेड लगातार चना की बिकवाली कर रही है, जोकि हल्की क्वालिटी का है।

दिल्ली में बर्मा उड़द एसक्यू और एफएक्यू के भाव के भाव में 25-50 रुपये की तेजी आकर भाव क्रमशः 8150 से 8175 रुपये एवं 7250 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

आंध्रप्रदेश लाईन की नई उड़द का दिल्ली के लिए व्यापार 7500 रुपये प्रति क्विंटल की पूर्व दर पर हुआ।

मुंबई में उड़द एफएक्यू की कीमतों में 75 रुपये की तेजी आकर भाव 7150 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

चेन्नई में एफएक्यू उड़द की कीमतों में 100 रुपये की तेजी आकर भाव 7000 रुपये एवं एसक्यू की कीमतों में 25 रुपये की तेजी आकर भाव 7800 प्रति क्विंटल हो गए।

दिल्ली में बर्मा की लेमन अरहर के भाव 7300 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए।

चेन्नई में लेमन अरहर के भाव 6950 रुपये प्रति क्विंटल के पूर्व स्तर पर स्थिर बने रहे।

अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के दाम मुंबई में कमजोर हुए। तंजानिया की अरुषा अरहर के भाव 150 रुपये कमजोर होकर 5350 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मोजाम्बिक लाइन की गजरी अरहर की कीमतें 150 रुपये घटकर भाव 5350 से 5400 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। मलावी से आयातित अरहर के दाम 4800 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। सूडान से आयातित अरहर के दाम भी 7400 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

हालांकि हाजिर में बकाया स्टॉक कम होने के कारण मुंबई में लेमन अरहर की कीमतों में 50 रुपये की तेजी आकर भाव 6950 रुपये प्रति क्विंटल हो गए।

दिल्ली में कनाडा और मध्य प्रदेश की मसूर की कीमतों में 25-25 रुपये की तेजी आकर भाव क्रमशः 6200 रुपये 6450 प्रति क्विंटल हो गए।

मुंबई में कनाडा की मसूर के दाम 6100 से 6200 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे। ऑस्ट्रेलिया की मसूर की कीमतें इस दौरान 6300 रुपये प्रति क्विंटल बोली गई। कनाडा की मसूर के दाम मुंद्रा और हजिरा बंदरगाह पर इस दौरान 5850-5900 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे।

दिल्ली में राजस्थानी चना की कीमतों में 25 रुपये की तेजी आकर भाव 4825 रुपये प्रति क्विंटल हो गए, जबकि इस दौरान मध्य प्रदेश के चना के भाव 4750 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे।

मौसम अनुकूल रहा तो सोयाबीन का उत्पादन बढ़ने का अनुमान - सोपा

नई दिल्ली। प्रमुख उत्पादक राज्यों मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में एकाध क्षेत्रों को छोड़ अन्य में सोयाबीन की फसल अच्छी स्थिति में है, तथा कटाई तक मौसम अनुकूल रहा तो चालू खरीफ में उत्पादन बढ़ने का अनुमान है।

सोयाबीन प्रोससर्स एसोसिएशन आफ इंडिया, सोपा ने सोयाबीन के प्रमुख उत्पादक राज्यों का दौरा करने के साथ ही सेटेलाईट इमेज के अनुसार अधिकांश क्षेत्रों में सोयबीन की फसल अच्छी स्थिति में है। अधिकांश फसल फूलने और फली बनने की अवस्था में है, जबकि सोयाबीन के खेत ज्यादातर खरपतवार मुक्त होते हैं और इसमें कीड़ों या बीमारियों का कोई खास असर नहीं होता है।

सोपा के अनुसार हालांकि ज्यादा और लगातार बारिश के कारण महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में निचले इलाकों में जरुर सोयाबीन के खेतों में पानी भरा हुआ है, जिससे पत्तियां पीली पड़ रही हैं और इन क्षेत्रों में फसल को कुछ नुकसान हो सकता है, साथ ही उत्पादकता में भी इन क्षेत्रों में कमी आयेगी।

हालांकि पीला मोज़ेक वायरस का किसी भी राज्य में फसल पर ज्यादा असर नहीं है। माना रहा है कि यदि सितंबर में मौसम फसल के अनुकूल रहता है और तापमान में अचानक और महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होता है। साथ ही फसल की कटाई तक मौसम अनुकूल रहा तो इस साल सोयाबीन का उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में सोयाबीन की बुआई 120.37 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है जोकि पिछले साल की समान अवधि के 120.63 लाख हेक्टेयर थोड़ी कम है।

मानसून की बेरुखी से धान की रोपाई 5.62 फीसदी घटी, दालों के साथ ही तिलहन कम भी कम

नई दिल्ली। देश के कई राज्यों में बारिश की कमी के कारण धान की रोपाई 5.62 फीसदी पीछे चल रही है, इसके साथ ही दलहन एवं तिलहन की बुआई में भी चालू खरीफ में कमी आई है। हालांकि कपास के साथ ही मोटे अनाजों की बुआई पिछले साल की तुलना में बढ़ी है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू खरीफ में देशभर के राज्यों में 2 सितंबर 2022 तक फसलों की कुल बुआई घटकर 1,069.29 लाख हेक्टेयर में हो पाई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई 1,082.95 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

चालू मानसूनी सीजन में उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड एवं पश्चिम बंगाल में बारिश कम होने से इन राज्यों के कई जिलों में सूखे जैसे हालात है।

कृषि मंत्रालय के अनुसार खरीफ की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू खरीफ में 5.62 घटकर 383.99 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि में 406.89 लाख हेक्टेयर में रोपाई हो चुकी थी।

दलहनी फसलों की कुल बुआई चालू खरीफ में 4.36 फीसदी घटकर 129.55 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 135.46 लाख हेक्टेयर से कम है। खरीफ दलहन की प्रमुख फसल अरहर की बुआई चालू खरीफ में 44.86 लाख हेक्टेयर में, उड़द की 36.62 लाख हेक्टेयर में और मूंग की 32.98 लाख हेक्टेयर में ही हुई है। पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि में इनकी बुआई क्रमशः 47.56 लाख हेक्टेयर में, 38.18 लाख हेक्टेयर में और 34.38 लाख हेक्टेयर में हुई थी।

अन्य दालों की बुआई चालू खरीफ में 14.85 लाख हेक्टेयर में हुई है, जोकि पिछले खरीफ की समान अवधि के बराबर ही है।

मोटे अनाजों की बुआई चालू खरीफ में बढ़कर 178.96 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 171.62 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है। मोटे अनाजों में ज्वार की बुआई 13.92 लाख हेक्टेयर में और बाजरा की 70.44 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल समय तक इनकी बुआई क्रमशः 14.49 लाख हेक्टेयर और 63.26 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी।

मक्का की बुआई चालू खरीफ में 80.52 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 80.37 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी। रागी की बुआई चालू खरीफ में 7.51 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले खरीफ में इसकी बुआई 8.31 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

तिलहनी फसलों की बुआई चालू खरीफ में घटकर 188.51 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 189.66 लाख हेक्टेयर से कम है। तिलहन में मूंगफली की बुवाई चालू खरीफ में 45.14 लाख हेक्टेयर में, सोयाबीन की 120.37 लाख हेक्टेयर में और सनफ्लावर की 1.91 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है। पिछले साल इस समय तक इनकी बुआई क्रमशः 48.64 लाख हेक्टेयर में, 120.63 लाख हेक्टेयर में और 1.46 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी।

शीशम सीड की बुवाई चालू खरीफ में 12.83 लाख हेक्टेयर में और कैस्टर सीड की 7.28 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले खरीफ में इनकी बुआई क्रमशः 12.77 लाख हेक्टेयर और 5.65 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी।

कपास की बुआई चालू खरीफ में बढ़कर 125.69 लाख हेक्टेयर में ही हुई है, जबकि पिछले साल इस समय तक 117.68 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी।

गन्ने की बुआई चालू खरीफ में 55.65 लाख हेक्टेयर में हुई है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 54.70 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।

कपास की बुआई 6.81 फीसदी बढ़कर 125.69 लाख हेक्टेयर में

नई दिल्ली। चालू खरीफ सीजन में 2 सितंबर तक देशभर के राज्यों में कपास की बुआई 6.81 फीसदी बढ़कर 125.69 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुआई 117.68 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई थी।

उत्तर भारत के राज्यों पंजाब और हरियाणा में चालू खरीफ में कपास की बुआई घटकर क्रमशः 2.48 और 6.50 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले साल इस समय तक इन राज्यों में क्रमशः 2.54 और 6.88 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी।

राजस्थान में जरूर चालू खरीफ में कपास की बुआई बढ़कर 6.53 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 6.29 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।

गुजरात में चालू खरीफ में कपास की बुआई बढ़कर 25.45 लाख हेक्टेयर में और महाराष्ट्र में 42.29 लाख हेक्टेयर मेें हो चुकी है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में इन राज्यों में क्रमशः 22.51 और 39.36 लाख हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी।

मध्य प्रदेश में चालू खरीफ में कपास की बुआई घटकर 5.99 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि में इसकी बुआई 6 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

दक्षिण भारत के राज्यों तेलंगाना में कपास की बुआई घटकर 19.72 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जबकि पिछले खरीफ की समान अवधि में इसकी बुआई 20.45 लाख हेक्टेयर में हो चुकी थी।

आंध्र प्रदेश में चालू खरीफ में कपास की बुआई 5.88 लाख हेक्टेयर में, कर्नाटक में 8.12 लाख हेक्टेयर में और तमिलनाडु में 0.29 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी है, जबकि पिछले खरीफ सीजन की समान अवधि में इन राज्यों में क्रमशः 4.81 लाख हेक्टेयर में, 6.27 लाख हेक्टेयर में और 0.21 हेक्टेयर में ही बुआई हो पाई थी।

चालू खरीफ में ओडिशा में कपास की बुआई 2.16 लाख हेक्टेयर में हो चुकी है, जोकि पिछले साल की समान अवधि के 1.96 लाख हेक्टेयर से ज्यादा है।

अप्रैल से जून के दौरान बासमती चावल का निर्यात तीन फीसदी से ज्यादा बढ़ा

नई दिल्ली। चालू वित्त वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही अप्रैल से जून के दौरान जहां बासमती चावल के निर्यात में 3.40 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई, वहीं गैर-बासमती चावल का निर्यात इस दौरान 5.63 फीसदी बढ़ गया।

वाणिज्य एवं उद्वयोग मंत्रालय के अनुसार चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बासमती चावल का निर्यात बढ़कर 11.25 लाख टन का हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात केवल 10.88 लाख टन का ही हुआ था। मंत्रालय के अनुसार मूल्य के हिसाब से चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बासमती चावल का निर्यात 8,943.47 करोड़ रुपये का हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इसका निर्यात केवल 6,798 करोड़ करोड़ रुपये का ही हुआ था।

मंत्रालय के अनुसार गैर बासमती चावल का निर्यात चालू वित्त वर्ष 2022-23 के अप्रैल से जून के दौरान 43.48 लाख टन का हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात केवल 41.16 लाख टन का ही हुआ था। मूल्य के हिसाब से गैर-बासमती चावल का निर्यात चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बढ़कर 12,094 करोड़ रुपये का हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में इनका निर्यात 11,009 करोड़ रुपये का ही हुआ था।


पूसा 1,121 गोल्डन सेला बासमती चावल में तरावड़ी में व्यापार 9,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर हुआ, जबकि गाजियाबाद में इसका भाव 9,000 से 9,025 रुपये एवं दिल्ली में 9,000 से 9,100 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बना रहा। 

दिल्ली की नरेला मंडी में गुरूवार को 1,000 बोरी पूसा 1,509 किस्म के धान की आवक हुई तथा कंबाइन के धान का व्यापार 3,570 रुपये एवं हाथ की कटाई के धान का भाव 3,725 रुपये प्रति क्विंटल रहा। पंजाब की अमृतसर मंडी में 3,000 बोरी नए पूसा 1,509 किस्म के धान की आवक हुई तथा इसका भाव 3,325 से 3,699 रुपये प्रति क्विंटल क्वालिटी अनुसार रहा।

कृषि मंत्रालय के अनुसार खरीफ की प्रमुख फसल धान की रोपाई चालू खरीफ में घटकर 367.55 लाख हेक्टेयर में ही हो पाई है, जोकि पिछले खरीफ की समान अवधि के 390.99 लाख हेक्टेयर से कम है। जानकारों के अनुसार कई राज्यों में प्रतिकूल मौसम की मार भी फसल पर पड़ी है, जिसका असर चावल के कुल उत्पादन पर पड़ने का डर है। हालांकि चालू महीने के अंत पूसा 1,509 किस्म के धान की आवक बढ़ेगी, तथा बासमती चावल में बढ़े दाम पर निर्यात सौदे कम हो रहे हैं। इसलिए आगामी दिनों में धान के साथ ही चावल की कीमतों में गिरावट ही आने का अनुमान है।

01 सितंबर 2022

ग्राहकी कमजोर होने से दालों में गिरावट जारी

नई दिल्ली। दाल मिलों की हाजिर कमजोर बनी रहने के कारण मंगलवार को अरहर एवं उड़द के साथ ही कनाडा एवं आस्ट्रेलिया की मसूर के दाम कमजोर हो गए। दालों में खुदरा के साथ ही थोक में मांग कमजोर है, जिस कारण मिलर्स केवल जरुरत के हिसाब से ही खरीद कर रहे हैं।

अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर के दाम सस्ते हैं, तथा आगामी दिनों में अफ्रीकन देशों से आयात बढ़ने का अनुमान हैं। हालांकि घरेलू बाजार में अच्छी क्वालिटी की अरहर में बिकवाली कमजोर है, क्योंकि एक तो चालू सीजन में इसकी बुआई पिछले साल की तुलना में कम हुई है। दूसरा देश के कई राज्यों सूखे जैसे हालात बनने के साथ मध्य और दखिण भारत के राज्यों में ज्यादा बारिश का असर भी फसल पर पड़ने का डर है। इसलिए अरहर की कीमतों में अभी सीमित तेजी, मंदी ही बनी रहने का अनुमान है।

उड़द की नई फसल की आवक महाराष्ट्र और कर्नाटक की मंडियों में अगले महीने बढ़ेगी, जिससे इसकी कीमतों में गिरावट ही आने का अनुमान है। हालांकि चालू सीजन में उड़द की फसल को भी नुकसान की आशंका है, साथ ही कई राज्यों में भारी बारिश का असर भी फसल पर हुआ है, लेकिन उड़द दाल में दक्षिण भारत की मांग कमजोर बनी हुई है। गुलबर्गा मंडी में आज नई उड़द की 100 बोरियों की आवक हुई तथा इसका व्यापार 6600 से 7151 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुआ।

कनाडा एवं ऑस्ट्रेलिया से आयातित मसूर सस्ती होने के कारण घरेलू बाजार में इनकी कीमतों में लगातार गिरावट बनी हुई है। माना जा रहा है कि मौजूदा कीमतों में 100 से 150 रुपये का मंदा आने के बाद भाव रुक जायेंगे। वैसे भी देसी मसूर की आवक मंडियों में नहीं के बराबर हो रही है, तथा नई फसल की आवक मार्च, अप्रैल में ही बनेगी।

उत्पादक मंडियों में नई मूंग की आवक शुरू हो गई है तथा मौसम अनुकूल रहा तो अगले महीने मूंग की आवक बढ़ेगी। मूंग दाल में ग्राहकी सामान्य की तुलना में कमजोर है इसलिए आगामी दिनों में इसकी कीमतों में गिरावट ही आने का अनुमान है। गुलबर्गा मंडी में 1,000 बोरी नई मूंग की आवक हुई तथा चमकी के भाव 5600 से 6900 रुपये प्रति क्विंटल रहे। अक्कलकोट मंडी में 300 कट्टे नई की आई, तथा इसका व्यापार 5500 से 6800 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर हुआ।

दिल्ली में बर्मा की लेमन अरहर के भाव में 25 रुपये की गिरावट आकर दाम 7450 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

चेन्नई में लेमन अरहर के भाव में भी 25 रुपये की गिरावट आकर दाम 7175 से 7200 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

मुंबई में बर्मा की लेमन अरहर के भाव 7200 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे।

अफ्रीकी देशों से आयातित अरहर में मंदा आया। तंजानिया की अरुषा अरहर के भाव 50 रुपये कमजोर 5850 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मोजाम्बिक लाइन की गजरी अरहर की कीमतें 100 रुपये कमजोर होकर 5700 रुपये प्रति क्विंटल रह गई। मलावी से आयातित अरहर के दाम भी 100 रुपये घटकर भाव 5100-5200 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। सूडान से आयातित अरहर के दाम भी 50 रुपये कमजोर होकर 7750 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

दिल्ली में बर्मा उड़द एफएक्यू और एसक्यू के भाव क्रमशः 7300 रुपये एवं 8300 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर हो गए। हालांकि इन भाव में दाल मिलों की मांग कमजोर देखी गई।

आंध्रप्रदेश लाईन की नई उड़द का दिल्ली के लिए व्यापार 7600 रुपये प्रति क्विंटल की दर पर हुआ।

मुंबई में उड़द एफएक्यू के भाव में 50 रुपये की गिरावट आकर भाव 7150 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।

चेन्नई में एसक्यू उड़द के हाजिर डिलीवरी के भाव 75 रुपये कमजोर होकर भाव 7,925 रुपये प्रति क्विंटल रह गए, जबकि अक्टूबर डिलवरी के दाम 50 रुपये घटकर 8,000 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए।

दिल्ली में कनाडा की मसूर की कीमतों में 50 रुपये की गिरावट आकर भाव 6250 रुपये प्रति क्विंटल रह गए। इस दौरान मध्य प्रदेश की मसूर के दाम 6650 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे।

कनाडा की मसूर के दाम मुंद्रा बंदरगाह पर 5950 से 6000 रुपये प्रति क्विंटल पर स्थिर बने रहे, जबकि हजिरा बंदरगाह पर 50 रुपये घटकर 6000 रुपये प्रति क्विंटल बोले गए। इस दौरान कनाडा की मसूर के दाम कंटेनर में 50 घटकर 6350 रुपये एवं ऑस्ट्रेलियाई मसूर के भाव भी कंटेनर में 50 कमजोर होकर 6450 रुपये प्रति क्विंटल रह गए।


देशभर में 6 फीसदी बारिश सामान्य से ज्यादा, 17 फीसदी हिस्सा अभी भी सूखे की चपेट में

नई दिल्ली। पहली जून से शुरू हुए चालू मानसूनी सीजन के पहले तीन महीनों  यानी 31 अगस्त तक देशभर में 6 फीसदी बारिश सामान्य से ज्यादा हुई है, लेकिन इसके बावजूद भी देशभर में करीब 17 फीसदी हिस्सा सूखे की चपेट में है।

भारतीय मौसम विभाग, आईएमडी के अनुसार पहली जून से 31 अगस्त तक देशभर में 743.8 मिलीमीटर बारिश हुई है, जबकि सामान्यतः इस दौरान 700.7 मिलीमीटर बारिश होती है।

सब डिवीजनों के आधार पर देखें तो कुल 36 सब डिवीजनों में से 6 में यानी कि 17 फीसदी हिस्सा अभी भी सूखे की चपेट में हैं, तथा 3 सब डिवीजनों में अत्याधिक तो 11 में ज्यादा बारिश हुई है। अतः देशभर की 16 सब डिवीजनों यानी की 38 फीसदी क्षेत्र में ही इस दौरान सामान्य बारिश हुई है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहली जून से 31 अगस्त तक सामान्य से 44 फीसदी कम और पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी इस दौरान सामान्य की तुलना में 44 फीसदी बारिश कम हुई है। बिहार में इस दौरान सामान्य से 38 फीसदी, झारखंड में 27 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 29 फीसदी बारिश सामान्य की तुलना में कम हुई है। अतः इन राज्यों में खरीफ फसलों की बुआई में तो कमी आई ही है, साथ ही बुआई की गई फसलों को भी नुकसान  होने का डर है।

उत्तर भारत के उत्तराखंड, हरियाणा एवं पंजाब में भी इस दौरान सामान्य की तुलना में क्रमशः 12 फीसदी, 8 फीसदी और 12 फीसदी बारिश सामान्य की तुलना में कम हुई है। हालांकि पश्चिमी राजस्थान में इस दौरान जहां सामान्य से 76 फीसदी और पूर्वी राजस्थान में सामान्य से 27 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है।

मध्य भारत के राज्यों ओडिशा में इस दौरान सामान्य से 8 फीसदी, मध्य प्रदेश में 22 फीसदी, गुजरात में 30 फीसदी, महाराष्ट्र में 18 फीसदी तो छत्तीसगढ़ में सामान्य से 12 फीसदी ज्यादा बारिश दर्ज की गई।

दक्षिण भारत के राज्यों आंध्र प्रदेश में पहली जून से 31 अगस्त तक सामान्य से 14 फीसदी, तेलंगाना में 49 फीसदी, तमिलनाडु में 87 फीसदी और कर्नाटक में 33 फीसदी ज्यादा बारिश हुई है लेकिन इस दौरान केरल में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई।